Sunday, July 29, 2007

रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर दो अलबेले गीतों से पुष्पांजलि

रफ़ी साहब की पुण्यतिथि (31 जुलाई) के अवसर पर उनके बारे में कुछ लिखने की शुरुआत करूँ तो कहाँ से करूँ, क्योंकि उनके बारे में सब कुछ तो कहा जा चुका है, फ़िर भी कम लगता है, रफ़ी साहब की आवाज, उनकी गीतों की अदायगी, उनकी भलमनसाहत के बारे में काफ़ी कुछ पहले ही लिखा जा चुका है, अब और कुछ लिखना तो मात्र सूरज को दीपक दिखाने जैसा होगा । रफ़ी साहब के हजारों खूबसूरत गीतों में से एक या दो को चुनना ठीक वैसा ही है, जैसे खिलौने की दुकान में भ्रमित सा एक बच्चा... जो सोच-सोच कर हैरान है कि "क्या चुनूँ" ! फ़िर भी रफ़ी साहब को पुष्पांजलि पेश करते हुए मैने उनके दो गीतों का चुनाव किया है । और इन गीतों का चुनाव इसलिये किया कि ये हीरो की छवि के विपरीत स्वभाव वाले गीत हैं । अक्सर कहा जाता है (और यह सच भी है) कि रफ़ी साहब हों या लता या आशा अथवा किशोर कुमार... गीत गाने से पहले फ़िल्म में यह किस हीरो पर फ़िल्माया जाना है उसके बारे में जरूर पता करते थे, फ़िर उस हीरो या हीरोईन के अन्दाजे-बयाँ और अदाओं के हिसाब से वे अपनी आवाज को ढालते थे । प्रस्तुत दोनों गीतों का चयन मैने इसी आधार पर किया है कि जिससे श्रोताओं को रफ़ी साहब की " वाईड रेंज" के बारे में जानकारी मिल सके । नृत्य करते हुए दिलीप कुमार और बेहद गंभीर मुद्राओं में शम्मी कपूर की कल्पना करना कितना मुश्किल होता है ना... जबकि अधिकतर लोगों के दिमाग में "ट्रेजेडी किंग" और "याहू" की छवियाँ ऐसी कैद हैं कि चाहकर भी उन्हें नहीं भुलाया जा सकता । अब सोचिये कि मोहम्मद रफ़ी साहब को जब ये विपरीत स्वभाव वाले गीत गाने को कहा गया होगा तब गीत गाने से पहले उन्होंने "माइंड-सेट" कैसे किया होगा, क्योंकि वे इन गीतों को गाने से पहले इन अभिनेताओं की छवि के अनुरूप यूसुफ़ साहब के लिये बेहद दर्द भरे और शम्मी जी के लिए जोरदार उछलकूद वाले और कमर-हिलाऊ गीत गा चुके थे, लेकिन यहीं पर उनकी "मास्टरी" उभरकर सामने आती है...
पहला गीत मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ फ़िल्म "गंगा-जमुना" का लिखा है शकील बदायूँनी ने और धुन बनाई है नौशाद ने । इस फ़िल्म को पहली "अनऑफ़िशियल" भोजपुरी फ़िल्म कहा जा सकता है, क्योंकि इस फ़िल्म के नब्बे प्रतिशत संवादों और गीतों में भोजपुरी का उपयोग किया गया है । बोल हैं... "नैन लड़ जइहैं तो मनवा मा कसक होईबे करी..." यदि किसी को पता न हो कि ये गीत किस पर फ़िल्माया गया है तो उसके जेहन में दिलीप कुमार कतई नहीं आयेगा... इतनी मस्ती में यह गीत रफ़ी साहब ने गाया है कि यह सीधे आपको गाँव के मेले में ले जाता है और छेड़छाड़ भरे मासूम भोजपुरी शब्दों से आपको सराबोर कर देता है । नौशाद ने रफ़ी साहब से काफ़ी गीत गवाये हैं (अधिकतर दर्द भरे और गंभीर किस्म के), लेकिन इस गीत में दिलीप कुमार नृत्य भी करेंगे और गीत भोजपुरी में भी होगा यह रफ़ी साहब ने भी नहीं सोचा होगा... बहरहाल आप इस गीत को "यहाँ क्लिक करके" भी सुन सकते हैं और नीचे दिये विजेट में प्ले करके भी । मस्ती में खो जाईये और रफ़ी साहब को याद कीजिये.... इस बार मैं शब्दों को नहीं लिख रहा हूँ ना ही धुन पर कुछ लिख रहा हूँ, आज बात होगी सिर्फ़ रफ़ी साहब की आवाज की ।
nain lad jai re to...


इसी प्रकार जो दूसरा गीत मैने चुना है वह है "मैं गाऊँ तुम सो जाओ..." फ़िल्म है ब्रह्मचारी, लिखा है हसरत जयपुरी ने, संगीत दिया है शंकर-जयकिशन ने और यह दर्दीली लोरी फ़िल्माई गई है शम्मी कपूर पर... शम्मी कपूर की जैसी खिलन्दड़ और याहू छवि है यह गीत उससे अलग हटकर है, फ़िल्म में अनाथ बच्चे भूखे हैं और सोने का प्रयत्न कर रहे हैं तथा शम्मी कपूर जो कि बेहद दुखी हैं, उन्हें यह लोरी गाकर सुलाने का प्रयास करते हैं । हालांकि शंकर-जयकिशन जो कि ऑर्केस्ट्रा के प्रयोग के मोह से बच नहीं पाते, इस गीत में भी साजों की काफ़ी आवाज है, फ़िर भी रफ़ी साहब ने बेहद कोमल अन्दाज और नीचे सुरों में उम्दा गीत गाया है (जैसे यह "फ़ुसफ़ुसाता सा यह गीत", या फ़िर "यह गीत") । इस लोरीनुमा गीत को आप "यहाँ क्लिक करके" सुन सकते हैं या विजेट में प्ले करके । आईये आवाज के इस देवदूत को सलाम करें, उनकी यादों में खो जायें और हमारी पीढी को रफ़ी-लता-आशा-किशोर-मुकेश आदि का तोहफ़ा देने के लिये ईश्वर को धन्यवाद दें ।
Main Gaaon Tum So ...


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Thursday, July 26, 2007

"क्रेन बेदी" हार गईं ?

एक बार फ़िर से हमारी "व्यवस्था" एक होनहार और काबिल व्यक्ति के गले की फ़ाँस बन गई, टीवी पर किरण बेदी की आँखों में आँसू देखकर किसी भी देशभक्त व्यक्ति का खून खौलना स्वाभाविक है । (जिन लोगों को जानकारी नहीं है उनके लिये - किरण बेदी से दो साल जूनियर व्यक्ति को दिल्ली का पुलिस कमिश्नर बना दिया गया है, जबकि उस पर गंभीर किस्म के आरोप हैं) हमारी भ्रष्ट व्यवस्था के आगे "क्रेन बेदी" के नाम से मशहूर एक फ़ौलादी महिला को जिस कदर दरकिनार कर दिया गया, उससे एक बार फ़िर स्पष्ट हो गया है कि इटली की महिला का "महिला सशक्तिकरण" का दावा कितना खोखला है । "त्याग", "बलिदान" और "संस्कृति" की दुहाई देने वाली एक औरत दिल्ली में सत्ता की केन्द्र है, एक और औरत उसकी रबर स्टाम्प है, एक गैर-लोकसभाई (गैर-जनाधारी)उसका "बबुआ" बना हुआ है तथा एक और महिला (शीला दीक्षित) की नाक के नीचे ये सारा खेल खेला जा रहा है, इससे बडी़ शर्म की बात इस देश के लिये नहीं हो सकती । शायद किरण बेदी का अपराध यह रहा कि वे सिर्फ़ "ईमानदारी" से काम करने में यकीन रखती हैं, उन्हें अपने अफ़सरों और मातहतों को दारू-पार्टियाँ देकर "खुश" करना नहीं आता । वे पुस्तकें लिखती हैं, कैदियों को सुधारती हैं, अनुशासन बनाती हैं, लेकिन वे यह साफ़-साफ़ भूल जाती हैं कि हमारे "कीचड़ से सने" नेताओं के लिये यह बात मायने नहीं रखती, उन्हें तो चाहिये "जी-हुजूर" करने वाले "नपुंसक और बिना रीढ़ वाले" अधिकारी, जो "खाओ और खाने दो" में यकीन रखते हैं । एक तरफ़ कलाम साहब कल ही 2020 तक देश को महाशक्ति बनाने के लिये सपने देखने की बात फ़रमा कर, सिर्फ़ दो सूटकेस लेकर राष्ट्रपति भवन से निकल गये, वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट को दिल्ली के बंगलों पर काबिज नेताओं और उनके लगुए-भगुओं को निकाल बाहर करने में पसीना आ रहा है, और ये भी मत भूलिये कि "महिला सशक्तिकरण" तो हुआ है, क्योंकि मोनिका बेदी छूट गई ना ! किरण बेदी की नाक भले ही रगड़ दी गई हो । क्या देश है और क्या घटिया व्यवस्था है ?
आईये हम सब मिलकर जोर से कहें - "इस व्यवस्था की तो %&^$*&&%**$% (इन स्टार युक्त चिन्हों के स्थान पर अपने-अपने गुस्से, अपनी-अपनी बेबसी और अपने-अपने संस्कारों के मुताबिक शब्द भर लें) और स्वतंत्रता दिवस नजदीक आ रहा है... झूठा ही सही "मेरा भारत महान" कहने में किसी का क्या जाता है ?

Wednesday, July 25, 2007

घनघोर चिल्लर संकट...

हाल ही में एक समाचार आया था कि उत्तरप्रदेश के एक शहर से लाखों रुपये की चिल्लर (१ और २ रुपये के सिक्के) बरामद किये गये,वहाँ उन्हें गलाया जा रहा था और उसकी सिल्लियाँ बनाकर बांग्लादेश भेजा जा रहा था । बांग्लादेश में भारत के एक रुपये के सिक्के की चार-पाँच ब्लेड (रेजर) बनाई जाती हैं । हालांकि इस खबर में कुछ नया नहीं है, लेकिन यह बताता है कि हमारा प्रशासन किस कदर बेखबर, और सोया हुआ रहता है । बडे़ महानगरों के बारे में तो नहीं पता, लेकिन हमारे मालवा क्षेत्र में पिछले २-३ महीने से चिल्लर संकट बहुत बढ गया है, उज्जैन, रतलाम, देवास, शाजापुर जैसे छोटे कस्बों में यह समस्या कुछ अधिक है । इसके कारण सबसे अधिक तकलीफ़ में हैं वे लोग या वे छोटे व्यापारी जिनका अधिकतर काम चिल्लर से ही चलता है । सब्जी बेचने वाले, पान वाले, बूट-पॉलिश वाले, हार-फ़ूल बेचने वाले, फ़ोटोकॉपी वाले, पीसीओ चलाने वाले, मतलब हजारों-हजार लोग इस समस्या से पीडि़त हैं, परन्तु सरकारी मशीनरी कान में तेल डाले बैठी है । जनरल स्टोर वाले या किराना वाले या सब्जी वाले तो इसका सामना कर लेते हैं, क्योंकि उनके पास एक रुपये या दो रुपये वाले कई आईटम होते हैं, माचिस, आलपिन, लिफ़ाफ़े, टॉफ़ियाँ वे कुछ भी दे सकते हैं, सब्जी वाले भी आजकल "राउंड फ़िगर" में सब्जी तौलते हैं, लेकिन मैं / हम (यानी फ़ोटोकॉपी का बिजनेस करने वाले) क्या करें, क्योंकि यदि किसी व्यक्ति को चार फ़ोटोकॉपी करवानी हैं तो दो रुपये हुए (जी हाँ फ़ोटोकॉपी आज भी पचास पैसे ही है, जो दस-पन्द्रह साल पहले थी), तो क्या मैं उसे राउंड फ़िगर करने के लिये उसकी दस कॉपी कर सकता हूँ, नहीं कर सकता... कुछ दुकान वालों ने अपनी "व्यक्तिगत मुद्रा" चलन में ला दी है, कागज के एक टुकडे़ के एक-दो रुपये / आठ आने के कूपन बना दिये हैं वे कूपन उसी दुकान पर चल जायेंगे, क्या करें कुछ ना कुछ तो करना ही होगा न ! और ये आज की पीढी के नौजवानों का क्या कहना... "कॉमन सेंस" इन लोगों में बहुत "अनकॉमन" हो चला है, मुलाहिजा फ़रमायें.. घर से मार्कशीट की फ़ोटोकॉपी करवाने निकले हैं, जेब में है सौ रुपये का नोट, जैसे कि माने बैठे हैं कि दुकानदार तो चिल्लर की टकसाल खोले बैठा है...समस्या को बढाने में ATM ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसमें से पचास, बीस या दस के नोट नहीं निकलते... अब शाम को मजदूरों को पेमेंट करना है, किसी को चालीस, किसी को साठ, तो साला ATM कार्ड क्या करेगा ? क्रेडिट कार्ड का उपयोग करने वालों का प्रतिशत कितना है ? सरकार कहती है कि बैंकों में चिल्लर की कोई कमी नहीं है, बैंक वालों को खुल्ले पैसे लेना होंगे... सरकार तो यह कह कर मुक्त हो गई, जरा जमीन पर उतर कर देखो अर्थशास्त्रियों.. बैंके साफ़-साफ़ मना कर देती हैं, खुल्ले के लेन-देन से, जो बन पडे़ सो कर लो... एकाध बैंक चिल्लर बाँटती भी है तो अहसान जता कर "एक हजार रुपये के सिक्के लेने होंगे कम से कम, जिसमें पाँच-पाँच के सौ सिक्के भी शामिल हैं".. अब बताईये पाँच के सौ सिक्के लेकर मैं क्या करूँ जबकि मुझे असली आवश्यकता एक रुपये के सिक्के की है...असल समस्या है भारतीयों की रग-रग में समाया हुआ भ्रष्टाचार.. यहाँ "चिता की लकडियों" में भी कमीशन खाया जाता है तो चिल्लर (राष्ट्रीय मुद्रा) की जमाखोरी और उसे बरबाद करने में कैसी शर्म... और जो पुलिसवेश्याओं के अड्डे जानती है, सटोरियों के ठीये जानती है, अवैध शराब की भट्टियाँ जानती है, वह सिक्कों को गलाने वाले माफ़िया के बारे में अन्जान होगी.. यह बात गले उतरने वाली नहीं है । राष्ट्रीय मुद्रा का हम कितना सम्मान करते हैं यह तो नोटों पर लिखे प्रेम संदेशों, गुणा-भाग या फ़िर महिलाओं की विशिष्ट जगह पर मुडे़-तुडे़, खुँसे हुए देखकर हो जाती है..अब सरकार कह रही है कि "हम प्लास्टिक के नोट छापेंगे"... चलिये इंतजार करें उन नोटों का, "भाई लोगों" ने पहले ही उसको ठिकाने लगाने का इंतजाम सोच रखा होगा...

Friday, July 20, 2007

दाऊद भाई..पधारो ना म्हारे देस

दाऊद भाई, आपको ये पत्र लिखते हुए बहुत खुशी हो रही है, चारों तरफ़ खुशी जैसे पसरी हुई है, खुशी का कारण भी है, मोनिका "जी" को भोपाल की एक अदालत ने फ़र्जी पासपोर्ट मामले में बरी कर दिया है, जिसकी खुद मोनिका ने भी सपने में कल्पना नहीं की होगी, लेकिन कल्पना करने से क्या होता है, आप तो जानते ही हैं कि हमारे यहाँ का सिस्टम कैसा "यूजर-फ़्रेंण्डली" हो गया है (जो इस सिस्टम को "यूज़" करता है, ये सिस्टम उसका फ़्रेण्ड बन जाता है), अब आप हों या अबू भाई, कहीं भी बैठे-बैठे सारी जेलों को अपने तरीके से संचालित कर सकते हैं (मैं तो कहता हूँ कि सरकार को आपको जेल सुधार का ठेका दे देना चाहिये)... तो भाई, भूमिका बनाने का तात्पर्य यही है कि हम पलक-पाँवडे़ बिछाये बैठे हैं आपकी राहों में, क्यों खामख्वाह हमारे सीबीआई अधिकारियों को तकलीफ़ देते हो और हमारे गाढे़ पसीने की कमाई जैसी पुर्तगाल से अबू-मोनिका को लाने में बहाई गई, उसे दुबई या कहीं और बहने देना चाहते हो ? भाई सब कुछ तो आपका ही है, हमारे लिये जैसे आप, वैसे पप्पू यादव, वैसे ही शहाबुद्दीन, हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता । तो भाई तारीख बताओ और आ जाओ.. मोनिका दीदी पहले ही फ़रमा चुकी हैं कि जेल से ज्यादा सुरक्षित जगह भारत में कोई नहीं है (देखा ! क्या रोशन ख्याल आया है संगत के असर से), एकदम सुरक्षित जेलें हैं यहाँ की, अदालतें भी, कानून भी, वकील भी उनके गुर्गे भी, सब से सब एकदम गऊ, आप जहाँ भी रहना चाहेंगे व्यवस्था करा दी जायेगी, अस्पताल में रहें तो भी कोई बात नहीं हम आप जैसों की सेहत का खयाल रखने वालों में से हैं, सच्ची कहता हूँ भाई खुदा ने चाहा तो एकाध साल में ही मोटे हो जाओगे, जब तक जी करे हमसे सेवा-चाकरी करवाओ, और जब जाने की इच्छा हो बोल देना, हम आपको फ़िर से हवाई जहाज का अपहरण करने की तकलीफ़ नहीं देंगे..वैसे ही छोड़ देंगे.. हाँ, लेकिन आने से पहले "मुझे भारतीय न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास है" यह सूत्रवाक्य बोलना मत भूलना... फ़िर देखना कैसे हाथों-हाथ उठाये जाते हो हमारे चिरकुट मीडिया द्वारा, जो आपकी बरसों पुरानी फ़िल्में दिखा-दिखा कर ही टाईम पास कर रहा है, मुम्बई बम ब्लास्ट के चौदह साल बाद फ़ैसले आना शुरु हुए हैं और अभी सुप्रीम कोर्ट बाकी है, तो भाई आपकी बाकी की जिन्दगी तो आराम से कटना तय है यहाँ... फ़िर आपके भाई-बन्धु भी काफ़ी मौजूद हैं यहाँ पहले से ही, जहाँ चार यार मिल जायेंगे रातें गुलजार हो जायेंगी...
आपकी मदद के लिये यहाँ राजनैतिक पार्टियाँ हार-फ़ूल लिये तैयार खडी़ हैं, इधर आपने पावन धरती पर कदम रखा और उधर तड़ से आपकी संसद सदस्यता पक्की... फ़िर मानवाधिकार वाले हैं (जो सूअर के मानवाधिकार भी सुरक्षित रखते हैं)... कई "उद्दीन" जैसे शहाबुद्दीन, तस्लीमुद्दीन और सोहराबुद्दीन (कुछ सरेआम, कुछ छुपे हुए) भी मौजूद हैं जो आपको सर-माथे लेने को उतावले हो उठेंगे.. बस..बस अब मुझसे बयान नहीं किया जाता कि आपको कितनी-कितनी सुविधायें मिलने वाली हैं यहाँ...। मन पुलकित-पुलकित हो रहा है यह सोच-सोचकर ही कि जिस दिन आप इस "महान" देश में पधारेंगे क्या माहौल होगा...यहाँ पासपोर्ट की अदला-बदली आम बात है, कार से कुचलना और बरी होना तो बेहद मामूली बात है, और आप तो माशाअल्लाह.. अब आपकी तारीफ़ क्या करूँ, आपने बडे़ काम किये हैं कोई ऐरे-गैरे जेबकतरे या झुग्गी वाले थोडे़ ही ना हैं आप, अकेले मध्यप्रदेश में बडे़ उद्योगपतियों पर सिर्फ़ बिजली का हजारों करोड़ रुपया बकाया है, मतलब कि आप अकेले नहीं रहेंगे यहाँ... बस अब और मनुहार ना करवाओ... कराची, दुबई, मुम्बई पास-पास ही तो है...आ जाओ... कहीं मुशर्रफ़ का दिमाग सटक गया तो.. नहीं..नहीं.. रिस्क ना लो, आप तो दुनिया की सबसे "सेफ़" जगह पर आ ही जाओ... मैं इन्तजार कर रहा हूँ...

प्रिये प्राणेश्वरी, हृदयेश्वरी - शुद्ध हिन्दी गाना

हिन्दी फ़िल्मों में अक्सर गीतों को लिखते समय या उनके चित्रीकरण के समय कोई जरूरी नहीं है कि उनका आपस में कोई तालमेल हो ही...हिन्दी फ़िल्मी गीतों के इतिहास को देखें तो हिन्दी के शब्दों का अधिकतम प्रयोग करने वाले गीतकार कम ही हुए हैं, जैसे भरत व्यास, प्रदीप आदि । यह लगभग परम्परा का ही रूप ले चुका है कि उर्दू शब्दों का उपयोग तो गीतों में होगा ही (आजकल तो अंग्रेजी के शब्दों के बिना हिन्दी गीत नहीं बन पा रहे गीतकारों से) इसलिये यह गीत कुछ "अलग हट के" बनता है, क्योंकि इस गीत में शुद्ध हिन्दी शब्दों का खूबसूरती का प्रयोग किया गया है, और कई लोगों को जानकर आश्चर्य होगा कि गीत लिखा है वर्मा मलिक साहब ने (इन्हीं वर्मा मलिक साहब ने शादियों में बजने वाला कालजयी गीत "आज मेरे यार की शादी है" भी लिखा है, इनका दुर्भाग्य यह रहा कि इन्हें अधिकतर "बी" और "सी" ग्रेड की फ़िल्में ही मिलीं जिन्हें फ़िल्मी भाषा में "सुपरहिट" कहा जाता है, वैसी नहीं), गीत को धुनों में बाँधा है कल्याणजी-आनन्दजी ने, फ़िल्म है "हम तुम और वो" (१९७१) तथा गीत को बडे़ मजे लेकर गाया है किशोर दा ने । फ़िल्म में यह गीत फ़िल्माया गया है विनोद खन्ना और भारती पर (दक्षिण की हीरोइन - कुंवारा बाप, मस्ताना, पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण आदि हिन्दी फ़िल्मों में ये दिखाई दी हैं) । मुझे हमेशा लगता है कि यह गीत वर्मा मलिक ने काफ़ी पहले लिख लिया होगा एक कविता के रूप में, लेकिन फ़िल्म की सिचुएशन को देखते हुए शायद कल्याणजी भाई को गीत के रूप में दिया होगा... फ़िल्म में विनोद खन्ना हिन्दी अध्यापक के रोल में भारती से प्रणय निवेदन करते हैं, इसलिये इस गीत को थोडा़ मजाहिया अन्दाज में फ़िल्माया गया है, बीच-बीच में कल्याणजी-आनन्दजी ने जो "बीट्स" दिये हैं, वे दक्षिण के "मृदंगम" का अहसास कराते हैं, लेकिन यदि हम शब्दों पर गौर करें तो पाते हैं कि यह तो एक विलक्षण कविता है.. जिसे गीत का रूप दिया गया है... कई शब्द ऐसे हैं जो अब लगभग सुनाई देना तो दूर "दिखाई" देना भी बन्द हो गये हैं, जैसे चक्षु (आँखें), कुंतल (बालों की लट), श्यामल (काला), अधर (होंठ), भ्रमर (भंवरा), याचक (माँगने वाला), व्यथित (परेशान)... तात्पर्य यह कि कोई-कोई उम्दा शब्दों वाला गीत कई बार अनदेखा रह जाता है...या फ़िल्म में उसके चित्रीकरण से उस गीत के बारे में विशेष धारणा बन जाती है, या फ़िर फ़िल्म के पिट जाने पर लगभग गुमनामी में खो जाते हैं, ऐसे कई गीत हैं...
बहरहाल पहले आप गीत (या कविता) पढिये, इसका तीसरा अन्तरा अधिकतर सुनने में नहीं आता, और मैं भी प्रयास करके दो ही अन्तरे आपको सुनवा सकूँगा..

प्रिये... प्रिये...
प्रिये प्राणेश्वरी.. हृदयेश्वरी, यदि आप हमें आदेश करें तो
प्रेम का हम श्रीगणेश करें... यदि आप हमें आदेश करें तो
प्रेम का हम श्रीगणेश करें...
(१) ये चक्षु तेरे चंचल-चंचल, ये चक्षु तेरे चंचल-चंचल
ये कुंतल भी श्यामल-श्यामल...
ये अधर धरे जीवन ज्वाला, ये रूप चन्द्र शीतल-शीतल
ओ कामिनी... ओ कामिनी मन में प्रवेश करें
यदि आप आदेश करें तो प्रेम का हम श्रीगणेश करें...
(२) हम भ्रमर नहीं इस यौवन के
हम याचक हैं मन उपवन के..
हम भाव पुष्प कर दें अर्पण
स्वीकार करो सपने मन के...
मन मोहिनी... मन मोहिनी, मन में प्रवेश करें...
यदि आप हमें आदेश करें ...
(३) हों संचित पुण्यों की आशा
सुन व्यथित हृदय की मृदुभाषा
सर्वस्व समर्पण कर दें हम
करो पूर्ण हमारी अभिलाषा..
गज गामिनी... गजगामिनी दूर क्लेश करें..
यदि आप हमें आदेश करें तो प्रेम का श्रीगणेश करें...


नीचे दिये गये विजेट में "प्ले" बटन पर चूहे का चटका लगायें
PriyePraneshwari.m...

Thursday, July 19, 2007

काँच की बरनी और दो कप चाय - एक बोध कथा

जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होती है, सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है, और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं, उस समय ये बोध कथा, "काँच की बरनी और दो कप चाय" हमें याद आती है ।दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं...उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी (जार) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ... आवाज आई...फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये, धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी, समा गये, फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्या अब बरनी भर गई है, छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ.. कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई, अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ.. अब तो पूरी भर गई है.. सभी ने एक स्वर में कहा..सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली, चाय भी रेत के बीच में स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई...प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया - इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो... टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान, परिवार, बच्चे, मित्र, स्वास्थ्य और शौक हैं, छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बडा़ मकान आदि हैं, और रेत का मतलब और भी छोटी-छोटी बेकार सी बातें, मनमुटाव, झगडे़ है..अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती, या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते, रेत जरूर आ सकती थी...ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है...यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो, बगीचे में पानी डालो, सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ, घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको, मेडिकल चेक-अप करवाओ..टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो, वही महत्वपूर्ण है... पहले तय करो कि क्या जरूरी है... बाकी सब तो रेत है..छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे.. अचानक एक ने पूछा, सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि "चाय के दो कप" क्या हैं ?प्रोफ़ेसर मुस्कुराये, बोले.. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया... इसका उत्तर यह है कि, जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे, लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये । अपने खास मित्रों और निकट के व्यक्तियों को यह विचार तत्काल बाँट दो..मैंने अभी-अभी यही किया है.. :)

Tuesday, July 17, 2007

"माँ" पर निबन्ध : माँ से पहचान

राहुल.. होमवर्क हो गया क्या ? चलो जल्दी करो.. स्कूल को देर हो रही है । हो गया मम्मी.. देखो स्कूल में मुझे "मेरी माँ" पर निबन्ध लिखकर ले जाना है, मैने लिखा है - "मेरी माँ मुझे जल्दी उठाती है, होमवर्क करवाती है, पढा़ती है, मुझे कहानियाँ सुनाती है, मुझे डॉक्टर के यहाँ ले जाती है..." चलो,चलो ठीक है, जल्दी से नाश्ता कर लो... बस आती ही होगी । माँ ने राहुल को मदद करके उसे स्कूल भेज दिया । लेकिन शाम को जब राहुल स्कूल से वापस आया तो गुमसुम सा था, निराश सा था । स्कूल में मैडम ने कहा कि जो तुम लोग लिखकर लाये हो, वह तो सभी बच्चों ने थोडे-बहुत फ़ेरबदल के साथ लिखा है, तुम लोगों ने निबन्ध में नया क्या लिखा ? माँ तुम्हारे लिये इतना कुछ करती है, इसलिये वह तुम्हें अच्छी लगती है, लेकिन अपनी माँ के बारे में तुम्हें क्या-क्या मालूम है, वह लिखो... तुम्हारी माँ को क्या पसन्द-नापसन्द है, उसके शौक क्या हैं, उसका जन्मदिन, उसकी मेहनत... इन सब के बारे में तुम्हारे पिताजी को, तुम्हारी दीदी और भैया को क्या लगता है, तुम लोग अपनी माँ के लिये क्या करते हो ? इन सब बातों को देखो, परखो और निरीक्षण करके नया निबन्ध लिखकर लाओ, चाहो तो अपने दीदी, भाई या पिताजी से मदद ले सकते हो... तुम लोग अब आठवीं के बच्चे हो, जरा अपना भी दिमाग लगाओ और फ़िर से निबन्ध लिख कर लाओ..
राहुल के निरीक्षण की शुरुआत हो गई.... माँ की पसन्द-नापसन्द... मैं तो सिर्फ़ आलू की सब्जी खाता हूँ, माँ तो सभी सब्जियाँ, चटनियाँ खाती है, हम सभी को ताजा परोसती है, और यदि किसी दिन कम पड़ जाये तो थोडा़ सा ही खाती है.. बचा हुआ खाना बेकार ना जाये इसलिये कई बार खामख्वाह एक रोटी ज्यादा भी खा लेती है । ताजा और गरम खाना हमें परोसती है, और सुबह का या कल का बासी खुद की थाली में लेती है...अरे.. मैने तो कभी माँ से नहीं कहा कि आज मुझे बासी खाना दे दो, ताजी रोटी तुम खा लो.. मैं ही क्यों, दीदी, भैया और पिताजी ने भी माँ से ऐसा नहीं कहा । मुझे टेबल टेनिस खेलना पसन्द है, इसलिये माँ ने मेरे बर्थ-डे पर बैट लाकर दिया । माँ के शौक क्या हैं ? ... हाँ ठीक.. उसे पत्रिकायें पढना और हारमोनियम बजाना अच्छा लगता है, लेकिन बहुत सालों से हमारा हारमोनियम खराब हो गया है, माँ ने तो सभी से कहा था, लेकिन ना तो भैया, न पापा, किसी ने उस हारमोनियम को ठीक नहीं करवाया... थोडा़ सा समय मिलता है तो माँ कुछ पढने बैठ जाती है, लेकिन एकाध पुस्तक खरीदने की बात चलते ही पापा कहते हैं, पत्रिकायें बहुत महंगी हो गई हैं, इतने में तो दीदी की एक किताब आ जायेगी । अब.. रंग.. रंग.. रंग.. माँ को कौन सा रंग पसन्द है ? पता नहीं, क्योंकि माँ खुद के लिये बहुत ही कम साडियाँ खरीदती है, शादी-ब्याह में जो मिल जाती हैं उसी से काम चलाती है, हाँ, लेकिन बिस्तर की चादरें माँ ने हल्के नीले रंग की ली थीं... निबन्ध में नीला लिख लेता हूँ.. । माँ का जन्मदिन.. कब होता है.. मैडम ने कहा है कि कुछ भी माँ से नहीं पूछना है, दीदी ने बताया - ४ जनवरी... इस दिन हम लोग क्या करते हैं... छिः माँ का जन्मदिन तो हमने कभी ठीक से मनाया ही नहीं.. मेरे, दीदी और पापा के बर्थ-डे पर माँ लौकी का हलवा, गुलाब जामुन और पुरणपोली बनाती है । माँ को कौन सी मिठाई पसन्द है ? मालूम नहीं.. क्यों पापा, माँ को मीठे में क्या पसन्द है ? पापा... पापा... "अरे क्या चाहिये, मैं अखबार पढ रहा हूँ, दिखता नहीं क्या ? माँ से पूछो.. मुझे क्या मालूम !
पिछले हफ़्ते दीदी अपनी सहेलियों के साथ पिकनिक गई थी.. माँ ने सुबह जल्दी उठकर उसके लिये आलू की सब्जी और पूडि़याँ बनाकर दी थीं, पापा ने जो पैसे दिये थे, उसके अलावा अपने पास से पचास रुपये भी दिये... माँ कब पिकनिक पर गई थी ? याद नहीं.. पिछले महीने माँ के महिला मंडल की पिकनिक थी, लेकिन पिताजी ने अपने दोस्तों को खाने पर बुला लिया था और माँ पिकनिक पर नहीं जा पाई । माँ की पढाई के बारे में...मुझे ऐसा याद आ रहा है कि माँ किसी को बता रही थी कि दो मामाओं की पढाई के लिये माँ को कॉलेज बीच में ही छोड़ना पडा़ और उसकी शादी कर दी गई थी । अखबार पढना भी माँ को बहुत पसन्द है, दोपहर में सारे काम निपटाकर माँ अखबार पढती थी, लेकिन दीदी कॉलेज जाने लगी और मैं आठवीं में आ गया तो पिताजी ने हमारी अंग्रेजी सुधारने के लिये हिन्दी अखबार बन्द करके इंग्लिश अखबार लगवा दिया । माँ को टीवी देखना भी अच्छा लगता है, लेकिन रात को पिताजी घर आते ही अंग्रेजी कार्यक्रम और न्यूज लगा देते हैं और मैं दोपहर में कार्टून देखता हूँ, इन सब के बीच माँ को टीवी भी देखने को नहीं मिलता । माँ की सहेलियाँ... एकाध ही हैं महिला मंडल को छोड़कर... मतलब इतने सारे काम करते-करते माँ को सहेलियों के यहाँ जाने का समय ही नहीं मिलता... दीदी अपनी सहेलियों के साथ पिकनिक, फ़िल्में जाती है, मैं शाम को क्रिकेट खेलने जाता हूँ..पिताजी के दोस्त भी हर रविवार को ताश खेलने आ जाते हैं, माँ उनके लिये चाय-नाश्ता बनाती रहती है । माँ को शाम को घूमने जाना अच्छा लगता है, लेकिन पिताजी तो हमेशा रात को देर से घर आते हैं, मैं खेलने में मगन, दीदी और भैया अपने-अपने दोस्तों में, ऐसे में माँ अकेले ही सब्जी खरीदने के बहाने घूमकर आती है, लेकिन उसे वहाँ से भी जल्दी लौटना पडता है, क्योंकि यदि उसे देर हो जाये तो हम "भूख लगी..भूख लगी" करके उसे परेशान कर देते हैं । माँ कभी-कभी क्यों जरा-जरा सी बात पर चिढ जाती है, अब मुझे समझने लगा है ।
मैडम ने निबन्ध लिखने के लिये दस दिन का समय दिया था, राहुल का निरीक्षण जारी था... माँ के कामकाज, उसकी दिनचर्या और दूसरों के साथ उसकी तुलना करते-करते राहुल की धीरे-धीरे अपनी माँ से "पहचान" हो गई थी.. माँ पर निबन्ध लगभग पूरा हो चला था... और अचानक निबन्ध समाप्त करते-करते उसकी कॉपी पर दो बूँद आँसू टपक पडे़ ।
(एक मराठी रचना का अनुवाद, आंशिक फ़ेरबदल व सम्पादन के साथ)

Monday, July 16, 2007

हिन्दी फ़िल्मों का पहला "रैप" गाना - रेलगाडी...

इसे हिन्दी का पहला "रैप" गाना कहा जा सकता है... यूँ तो अशोक कुमार ने कई फ़िल्मों में कई गाने गाये हैं, बल्कि जब फ़िल्मों में अशोक कुमार का प्रवेश हुआ था तब देविका रानी के साथ उन्होंने कुछ गीत गाये । उस जमाने में हीरो को ही खुद का प्लेबैक देना होता था, जो कि शूटिंग के समय ही रिकॉर्ड कर लिया जाता था, उस परम्परा में के.एल.सहगल, सोहराब मोदी, चन्द्रमोहन आदि कई कलाकार उच्च कोटि के रहे... परन्तु यह गीत जो कि फ़िल्म आशीर्वाद का है, सन १९६८ का है, जब प्लेबैक गायन कोई नई बात नहीं रह गई थी, लेकिन संगीतकार वसन्त देसाई ने इस गाने को अशोक कुमार से ही गवाना उचित समझा... यह गाना यूँ तो एक बालगीत है, लेकिन बेहद तेज गति से गाया गया है, और यह कमाल कर दिखाया है अशोक कुमार ने.. गीत के कई शब्द पकड़ में नहीं आते, लेकिन ध्यान से सुनने पर मजा आ जाता है । इतना जरूर कह सकता हूँ कि "खांडवा-मांडवा" शब्द जरूर अशोक कुमार ने अपने आग्रह पर जोडा़ होगा । पूरे गांगुली परिवार का खंडवा (मप्र) से हमेशा विशेष प्रेम रहा है, यह गीत लिखा है हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने, जिन्होंने इस फ़िल्म में एक महत्वपूर्ण रोल भी किया । हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने फ़िल्म बावर्ची में भी एक अविस्मरणीय रोल किया था और एक गीत में पूरा अन्त्तरा भी गाया था... बहरहाल... इस "रैप" गाने का मजा लीजिये (नीचे दिये गये विजेट में प्ले पर चूहे का चटका लगायें)

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Friday, July 13, 2007

टेलीमार्केटिंग से बचने के तरीके

आजकल टेलीमार्केटिंग कम्पनियों का जमाना है, रोज-ब-रोज कोई ना कोई बैंक, इंश्योरेंस, फ़ाईनेंस एजेन्सी आदि-आदि फ़ोन कर-कर के आपकी नींद खराब करते रहते हैं, ब्लडप्रेशर बढाते रहते हैं, और आप हैं कि मन-ही-मन कुढते रहते हैं, कभी-कभी फ़ोन करने वाले को गालियाँ भी निकालते हैं, लेकिन अब पेश है कुछ नये आईडिया इन टेलीमार्केटिंग कम्पनियों से प्रभावी बचाव का - इनको आजमा कर देखिये कम से कम चार तो आपको पसन्द आयेंगे ही -

(१) जैसे ही टेलीमार्केटर बोलना बन्द करे, उसे तत्काल शादी का प्रस्ताव दे दीजिये, यदि वह लड़की है तो दोबारा फ़ोन नहीं आयेगा, और यदि वह लड़का है तो शर्तिया नहीं आयेगा ।
(२) टेलीमार्केटर से कहें कि आप फ़िलहाल व्यस्त हैं, तुम्हारा फ़ोन नम्बर, पता, घर-ऑफ़िस का नम्बर दो, मैं अभी वापस कॉल करता हूँ..
(३) उसे, उसी की कही तमाम बातों को दोहराने को कहें, कम से कम चार बार..
(४) उसे कहें कि आप लंच कर रहे हैं, कृपया होल्ड करें, फ़िर फ़ोन को प्लेट के पास रखकर ही चपर-चपर खाते जायें, जब तक कि उधर से फ़ोन ना कट जाये..
(५) उससे कहिये कि मेरी सारे हिसाब-किताब मेरा अकाऊंटेंट देखता है, लीजिये उससे बात कीजिये और अपने सबसे छोटे बच्चे को फ़ोन पकडा़ दीजिये...
(६) उससे कहिये आप ऊँचा सुनते हैं, जरा जोर से बोलिये (ऐसा कम से कम चार बार करें)..
(७) उसका पहला वाक्य सुनते ही जोर से चिल्लाईये - "अरे पोपटलाल, तुम... ! माय गॉड, कितन दिनों बाद फ़ोन किया,,,, और,,,,, और,,,,,, बहुत कुछ लगातार बोलिये... फ़िर वह कहेगा कि मैं पोपटलाल नहीं हूँ, फ़िर भी मत मानिये, कहिये "अरे मजाक छोड़ यार...." । अगली बार फ़ोन आ जाये तो गारंटी...
(८) उससे कहिये कि एकदम धीरे-धीरे बोले, क्योंकि आप सब कुछ हू-ब-हू लिखना चाहते हैं, फ़िर भी यदि वह पीछा ना छोडे, तो एक बार और उसी गति से रिपीट करने को कहें....
(९) यदि ICICI से फ़ोन है तो उसे कहिये कि मेरे ऑफ़िस के नम्बर पर बात करें और उसे HSBC का नम्बर दे दें...

आजमा कर देखिये और मुझे रिपोर्ट करें (फ़ोन पर) :)

एक था बचपन, एक था बचपन...

यह गीत एक विशुद्ध "नॉस्टैल्जिक" गीत है... इस गीत को सुनकर हर कोई अपने बचपन में खो जाता है और अपने "खोये" हुए पिता को अवश्य याद करता है, खासकर तब, जबकि या तो वह खुद पिता बन चुका हो, या अपने माता-पिता से बहुत दूर बैठा हो, रोजी-रोटी के चक्करों में देश छोड़कर और अपने-अपने पिता को बेहद "मिस" करते हुए यह गीत अक्सर कईयों की आँखें भिगोता है... गीत गाया है लता मंगेशकर ने, लिखा है गुलजार ने, संगीत दिया है वसन्त देसाई ने और फ़िल्म है आशीर्वाद (१९६८)... जिसमें अशोक कुमार ने एक ही रोल में बेबस पिता, उदारमना जमींदार और अन्त में एक भिखारी की अविस्मरणीय भूमिका निभाई है । गीत के बोल गुलजार की चिर-परिचित शैली में हैं अर्थात धुनों में बाँधने को कठिन (एक बार पंचम दा ने मजाक में कहा था कि शायद एक दिन गुलजार जी अखबार की हेडलाईन की भी धुन बनवायेंगे मुझसे, और उन्होंने बनाई भी, जैसे - मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पडा़ है [इजाजत]), लेकिन उतने ही कर्णप्रिय और आसान धुन में गीत को बाँधा है वसन्त देसाई जी ने । वसन्त देसाई जी ने मराठी में काफ़ी उत्कृष्ट काम किया है और हिन्दी में भी (जैसे - बोले रे पपीहरा...) । पहले गीत के बोल देखिये -

इक था बचपन, इक था बचपन
छोटा सा नन्हा सा बचपन, इक था बचपन
बचपन के एक बाबूजी थे, अच्छे-सच्चे बाबूजी थे
दोनों का सुन्दर था बन्धन, इक था बचपन..
(१) टहनी पर चढ़के जब फ़ूल बुलाते थे
हाथ उसके वो टहनी तक ना जाते थे
बचपन के नन्हें दो हाथ उठाकर वो फ़ूलों से हाथ मिलाते थे
इक था बचपन, इक था बचपन
(२) चलते-चलते, चलते-चलते जाने कब इन राहों में
बाबूजी बस गये बचपन की बाहों में
मुठ्ठी में बन्द हैं वो सूखे फ़ूल भी, खुशबू है जीने की छाँव में
इक था बचपन, इक था बचपन
(३) होंठों पर उनकी आवाज भी है, मेरे होठों पर उनकी आवाज भी है
साँसों में सौंपा विश्वास भी है,
जाने किस मोड़ पे कब मिल जायेंगे वो, पूछेंगे बचपन का एहसास भी है..
इक था बचपन, इक था बचपन
छोटा सा नन्हा बचपन, इक था बचपन...

जिस मर्मभेदी आवाज में लताजी ने यह गीत गाया है वह कमाल करने वाला है... दरअसल ये गीत उन्हें ज्यादा "हॉण्ट" करता है जो अपने पिता से बहुत दूर चले आये हैं, या उनके पिता उन्हें सेवा का मौका दिये बगैर इस फ़ानी दुनिया से कूच कर गये हैं..रह-रह कर उनके दिलों में टीस उठाता है यह गीत... सच तो यह है कि इस दुनिया में सुखी कोई भी नहीं है, अमीर से अमीर और प्रसिद्ध से प्रसिद्ध व्यक्ति को भी कोई ना कोई दुःख जरूर है, सुख और दुःख सापेक्ष होते हैं, दूसरे का सुख हमेशा ज्यादा लगता है, लेकिन दूसरे का दुःख हमेशा कम लगता है.. जिसके पास पैसा नहीं है वह सोचता है कि पैसे से ही सारी खुशियाँ आ जाती हैं और जिसके पास पैसा है, लेकिन "अपने" नहीं हैं, वह सोचता है कि क्यों मैं जीवन भर पैसे के पीछे भागता रहा...इस गीत को सुनकर अवश्य ही कईयों को पिता के कंधे पर बैठकर रावण देखना, पहली बार स्कूल में छोड़ते वक्त ऊपर से मजबूत दिखने वाले लेकिन भीगे मन वाले, मारने के लिये हाथ उठाने से पहले दो बार सोचने वाले पिता जरूर याद आयेंगे.. और आदमी अपने चेहरे पर कितने ही लेप लगा ले, मन पर सुखों के मरहम लगाता है ऐसा ही मधुर संगीत...इसीलिये तो ये कालजयी रचनायें हैं, आज से चालीस साल पहले यह गीत रचा गया और आज से पचास साल बाद भी जब हमारे बच्चे इसे सुनेंगे तो वही महसूस करेंगे, जो हम आज महसूस कर रहे हैं..इसे नीचे दिये गये विजेट पर क्लिक करके सुना जा सकता है...इस पोस्ट को पढने का मजा दूना हो जायेगा यदि "पिता : घर का अस्तित्व" पढेंगे...




Tuesday, July 10, 2007

एक सवाल मैं करूँ, एक सवाल तुम करो....

हिन्दी फ़िल्मों में शैलेन्द्र और शंकर-जयकिशन की जोडी़ ने कई अदभुत गीत दिये हैं । शैलेन्द्र तो आसान शब्दों में अपनी बात कहने के लिये मशहूर रहे हैं । उन्होंने बहुत ही कम क्लिष्ट शब्दों का उपयोग किया और जब धुनों पर लिखा तो ऐसे सरल शब्दों में, कि एक आम आदमी उसे आसानी से गा सके और उससे भी बडी़ बात यह कि समझ सके । गुलजार की तरह कठिन शब्द, या साहिर / शकील की तरह कठिन उर्दू शब्दों के उपयोग से वे बचे हैं । शैलेन्द्र की परम्परा में हम आनन्द बक्षी को रख सकते हैं, जिन्होंने हिन्दी फ़िल्मी गीतों को एक नया आयाम दिया, हालांकि शैलेन्द्र इस मामले में भाग्यशाली रहे कि उन्हें अच्छी पटकथाओं और बेहतरीन निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिला, जो कि आनन्द बक्षी को काफ़ी देर से स्थापित होने के बाद मिला, लेकिन दोनो ही गीतकारों ने सरल शब्दों को ही अपना माध्यम बनाया । प्रस्तुत गीत एक पहेली या सवाल-जवाब नुमा गीत है, जिसमें शैलेन्द्र ने बडी़ गहरी बातें हँसते-खेलते कह दी हैं । फ़िल्म है "ससुराल" (१९६१), गीत की धुन बनाई है शंकर-जयकिशन ने, गाया है रफ़ी-लता और कोरस ने, और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे जुबली कुमार राजेन्द्रकुमार और दक्षिण की हीरोईन बी.सरोजा देवी...। इस गीत में शैलेन्द्र के सामने चुनौती यह थी कि जिस पहेली को पूछा जा रहा है उसका जवाब भी एक सवाल ही होना चाहिये, और उन्होंने कमाल कर दिखाया है वह भी एक-दो नहीं, बल्कि तीन अंतरों में... पहले गीत पढिये....

रफ़ी साहब -
एक सवाल मैं करूँ, एक सवाल तुम करो
हर सवाल का सवाल ही जवाब हो...
लता जी दोहराती हैं -
एक सवाल मैं करूँ, एक सवाल तुम करो
हर सवाल का सवाल ही जवाब हो...
रफ़ी - प्यार की बेला साथ सजन का, फ़िर क्यों दिल घबराये
नैहर से घर जाती दुल्हन, क्यों नैना छलकाये ?

लता - है मालूम के जाना होगा, दुनिया एक सराय
फ़िर क्यों जाते वक्त मुसाफ़िर रोये और रुलाये..
कोरस - फ़िर क्यों जाते वक्त मुसाफ़िर रोये और रुलाये..
एक सवाल मैं करूँ, एक सवाल तुम करो
हर सवाल का सवाल ही जवाब हो...

लता - चाँद के माथे दाग है, फ़िर क्यों चाँद को लाज ना आये
उसका घटता बढता चेहरा, क्यों सुन्दर कहलाये ?

रफ़ी - काजल से नैनों की शोभा, क्यों दुगुनी हो जाये
गोरे-गोरे गाल पे काला तिल क्यों मन को भाये..
कोरस - गोरे-गोरे गाल पे काला तिल क्यों मन को भाये..
एक सवाल मैं करूँ, एक सवाल तुम करो
हर सवाल का सवाल ही जवाब हो...

रफ़ी - उजियाले में जो परछाँई पीछे-पीछे आये
वही अँधेरा होने पर क्यों साथ छोड़ छुप जाये ?

लता - सुख में क्यों घेरे रहते हैं अपने और पराये
बुरी घडी़ में क्यों हर कोई देख के भी कतराये..
कोरस - बुरी घडी़ में क्यों हर कोई देख के भी कतराये..

लता - एक सवाल मैं करूँ, एक सवाल तुम करो
हर सवाल का सवाल ही जवाब हो...

रफ़ी - एक सवाल मैं करूँ, एक सवाल तुम करो
हर सवाल का सवाल ही जवाब हो...


शब्दों पर गौर कीजिये, दुल्हन की विदाई के वक्त और मृत्यु के वक्त रोने-रुलाने की तुलना इसलिये की गई है कि दोनों ही एक सच्चाई हैं, फ़िर किस बात का रोना, लेकिन फ़िर भी सभी को दुख तो होता ही है, इसी प्रकार दूसरे अंतरे में चाँद के दाग की तुलना नैनों के काजल और गोरे गाल के तिल से की गई है, और तीसरे अंतरे में शैलेन्द्र एक कड़वी हकीकत को हमारे सामने रख देते हैं, सुख-दुख को अँधेरे-उजाले की परछाईयों से तुलना करके । तो यही है पहचान एक महान गीतकार की, वे हमें चलते-चलते एक लाईन में आध्यात्म भी समझा देते हैं कि "सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है, न हाथी है ना घोडा़ है, वहाँ पैदल ही जाना है" (तीसरी कसम), या फ़िर ढोंगी सन्यासियों को वे दुत्कारते हैं "संसार से भागे फ़िरते हो, भगवान को तुम क्या पाओगे, इस लोक को भी अपना ना सके, उस लोक में भी पछताओगे" (चित्रलेखा).. ऐसे अनेकों गीत शैलेन्द्र ने हमें दिये हैं, सोचकर रोमांच सा होता है कि शब्दों के जादूगर शैलेन्द्र, मेलोडी के बादशाह शंकर-जयकिशन और सपनो के सौदागर राजकपूर साथ बैठते होंगे तो क्या समाँ बँधता होगा... बहरहाल यह गीत आप यहाँ क्लिक करके सुन सकते हैं ।

Monday, July 9, 2007

मेरी १०० वीं पोस्ट

भाईयों और बहनों, ब्लॉगिंग शुरु करने के ठीक साढे़ पाँच माह पूरे होने पर अपनी सौवीं पोस्ट लिखते हुए बेहद खुशी हो रही है । इस संक्षिप्त यात्रा (अभी तो बहुत सारा लिखना है..) में बहुत-बहुत मजा आया, कई नये दोस्त मिले, काफ़ी कुछ सीखने को मिला, गालियाँ भी खाईं, तारीफ़ भी पाई, सहमति-असहमति के दौर चले, व्यक्तिगत ई-मेल पर भी कई मित्रों / चिंतकों ने कई तरह की गोलाबारी की, लेकिन चूँकि यह कोई दुश्मनी वाली बात नहीं थी, इसलिये मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू करते आगे बढ चला, क्योंकि असहमत होने वाले से भी और कुछ नहीं तो एक अलग दृष्टिकोण सीखने को मिलता है.. जब ब्लॉगिंग शुरु की थी उससे कुछ समय पहले ही "बरहा" के बारे में भी पता चला था...महसूस हुआ कि हिन्दी के लिये लाखों लोग कितना-कितना काम कर रहे हैं... फ़िर रवि रतलामी, श्रीश शर्मा, सागर नाहर, बेंगाणी बन्धुओं, पंगेबाज, उड़न तश्तरी, संजीत त्रिपाठी, ममता जी, शानू जी, मैथिली जी आदि कई मित्रों ने कई प्रकार के मार्गदर्शन दिये, शुभकामनायें दीं, काफ़ी सारे नये मित्र बने, कई बहसबाजियाँ हुईं, सागर भाई से हैदराबाद में मिलना हुआ, फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों के प्रति दीवानगी के चलते यूनुस भाई से भी मित्रता हुई, कई नये सॉफ़्टवेयर पता चले, गरज कि नया-नया सीखता ही गया.. और आगे भी सीखता ही रहूँगा..दुआ माँगता हूँ कि आगे भी ऐसा ही लिखता रहूँ.. और दुआ का पुछल्ला यह भी कि मित्रों में मुझे झेलने की ताकत बरकरार रहे.. तमाम मुस्कुराहटों के साथ... आमीन

Friday, July 6, 2007

मेहमूद का एक अविस्मरणीय गीत

इस गीत में प्रथम दृष्टया देखने पर कोई खास बात नहीं दिखती... लेकिन इस गीत पर लिखने की पहली वजह तो यह है कि यह रेडियो पर बहुत कम बजता है और जब भी बजता है पूरा नहीं बजता.. दूसरा कारण है ख्यात हास्य अभिनेता मेहमूद द्वारा यह गीत गाना, न सिर्फ़ गाना बल्कि इतने बेहतरीन तरीके से प्रस्तुत करना । यह संगीतकार राजेश रोशन की पहली फ़िल्म है, जिन्हें मेहमूद ने अपने भाईयों के कहने पर एक बार सुनना कबूल किया था, उस एक ही बैठक में राजेश रोशन ने मेहमूद को इतना प्रभावित किया कि वे आजीवन मित्र बने रहे और मेहमूद की कई फ़िल्मों में राजेश रोशन ने संगीत दिया । फ़िल्म का नाम है "कुँवारा बाप", और गीत फ़िल्माया गया है मेहमूद और अन्य कलाकारों पर जिसमें विशेष तौर पर शामिल हैं चन्द वृहन्नला (जिसे आम बोलचाल की भाषा में हिजडे़ कहा जाता है)। दरअसल इस जमात, "हिजडा़", को सामाजिक तौर पर लगभग बॉयकॉट कर दिया गया है । इन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है, इनका मजाक उडा़या जाता है और कई बार इनका गाहे-बगाहे अपमान भी कर दिया जाता है, जबकि इनकी शारीरिक बनावट में यदि किसी का दोष है तो वह है ईश्वर का, लेकिन फ़िर भी कोई दोष ना होते हुए इन्हें जिल्लत सहनी पडती है । फ़िल्मों में अधिकतर इनका उपयोग किसी गाने या किसी फ़ूहड़ दृश्य को फ़िल्माने के लिये किया जाता है । लेकिन मेहमूद ने इस गीत में कहीं भी अश्लीलता नहीं आने दी, बल्कि वही फ़िल्माया जैसा कि भारत के कुछ हिस्सों में मान्यता है कि हिजडों की दुआ लेने से नवजात शिशु को बीमारियाँ नहीं घेरतीं और वह सुखी रहता है । कुछ महिलायें इनसे डरती भी हैं, जिसकी कोई आवश्यकता नहीं है, बल्कि ये लोग बच्चे को दिल से दुआयें देते हैं... (यदि पर्याप्त नेग मिले तो..) हालांकि आजकल इनमें भी कई फ़र्जी संगठन खडे़ हो गये हैं जो नपुंसक ना होते हुए भी सिर्फ़ पैसा कमाने के लिये हिजडा़ बनने का स्वांग रचते हैं...। मध्यप्रदेश वालों ने इस वर्ग का खयाल रखते हुए इनमें से एक बार महापौर और एक बार विधायक चुन लिया है । बहरहाल, यह पता नहीं चल सका कि हिजडे़ की आवाज में किसने गाया है, क्योंकि हू-ब-हू आवाज निकाली गई है (हो सकता है कि मेहमूद साहब ने रिकॉर्डिंग के वक्त सचमुच हिजडों से गवा लिया हो)... गीत की शुरुआत में और अन्त में रफ़ी साहब द्वारा दो-दो लाईने गाई गईं हैं... कुछ हिस्सा हिजडों की आवाज में है, और गीत की असली जान है मेहमूद की मार्मिक आवाज, खासकर उस वक्त जब वे अंतिम पंक्तियाँ (फ़िर बारिश आई, अंधियारी छाई, जब बिजली कड़की, मेरी छाती धडकी..) गाते हैं..और सारा गीत लूट ले जाते हैं... एक कॉमेडियन होते हुए सुपर स्टार का दर्जा पाने वाले मेहमूद पहले कलाकार थे, उनके लिये अलग से कहानी बनाई जाती थी और कई फ़िल्मों में वे हीरो-हीरोईनों पर भारी पडे़...गीत की पंक्तियाँ इस प्रकार हैं...

रफ़ी साहब की आवाज में गीत प्रारम्भ होता है...
सुनहरी गोटे में रुपहरी गोटे में...
सज रही गली मेरी माँ, सुनहरी गोटे में.. (२)
सज रही गली मेरी माँ, सुनहरी गोटे में..(२)
सुनहरी गोटे में रुपहरी गोटे में...(४)
अम्मा तेरे मुन्ने की अजब है बात (४)
ओ चन्दा जैसा मुखडा़ किरन जैसे हाथ (३)
सज रही गली मेरी माँ..... (२)
एक इंटरल्यूड के बाद हिजडों की आवाज शुरु होती है..जिसमें कोरस में "हाँ जी" का लगातार टेका लगाया जाता है..
तू माँ का बच्चा, हाँ जी, ना बाप ना जच्चा हाँ जी
बिन खेत का बन्दा हाँ जी, बिन मुर्गी अंडा हाँ जी
बिन पहिये गाडी़ हाँ जी, बिन औरत साडी़ हाँ जी,
बिन आम की गुठली हाँ जी
होय आम से हमको मतेलब गुठली से क्या लेना
मिल जाये हक अपना, दूजे से क्या लेना
सज रही गली मेरी अम्मा, चुनेरी गोटे में.. (२)
इसके बाद हिजडा़ मेहमूद से पूछता है कि उसे यह बच्चा कहाँ से मिला... और फ़िर मेहमूद साहब की आवाज शुरु होती है..इस अन्तरे में भी सभी हिजडों की ओर से "हाँ जी" की टेक जारी रहती है, जो एक विशेष माहौल तैयार करती है..
मैं मन्दिर पहुँचा हाँ जी, एक बच्चा देखा हाँ जी
ना कोई आगे हाँ जी, ना कोई पीछे हाँ जी
मैं तरस में आके हाँ जी, ले चला उठा के हाँ जी
के माँ को दे दूँ हाँ जी, मन्दिर में रख दूँ हाँ जी
पंडे ने देखा हाँ जी, वो जालिम समझा हाँ जी
ये पाप है मेरा हाँ जी, बस मुझको घेरा हाँ जी
फ़िर पोलीस आई हाँ जी, दी लाख दुहाई हाँ जी
वो एक ना माना हाँ जी, पड़ गया ले जाना हाँ जी
सोचा ले जाकर हाँ जी, फ़ेंकूँगा बाहर हाँ जी
सौ जतन लगाया हाँ जी, कोई काम ना आया हाँ जी
सड़कों पर देखा हाँ जी, गाड़ी में फ़ेंका हाँ जी
बन गया ये बन्दा हाँ जी, इस गले का फ़न्दा
मैं फ़िर भी टाला हाँ जी, कचरे में डाला हाँ जी
फ़िर बारिश आई हाँ जी, अँधियारी छाई हाँ जी
बिजली जब कड़की हाँ जी, मेरी छाती धड़की हाँ जी
एक तीर सा लागा हाँ जी, मैं वापस भागा हाँ जी
फ़िर बच्चे को उठाया, गले से यूँ लगाया
आगे क्या बोलूं यारा, मैं पापी दिल से हारा..
फ़िर रफ़ी साहब की आवाज आती है..
बेटा तेरे किस्से पे दिल मेरा रोये..
जिये तेरा मुन्ना.. जिये तेरा मुन्ना नसीबों वाला होये..
सज रही गली मेरी माँ, सुनहरी गोटे में..
सज रही गली मेरी अम्मा, रुपेहरी गोटे में..

इस गीत को यहाँ क्लिक करके भी सुना जा सकता है...और नीचे दिये विजेट में सीधे "प्ले" करके भी...





Saj Rahi Gali meri...

Thursday, July 5, 2007

लादेन के नाम एक खत

ओसामा बिन लादेन जी
नमस्कार, हाल में आपने फ़रमाया कि अमेरिका, ब्रिटेन और इसराईल के साथ-साथ भारत भी हमारा दुश्मन है, ये बात कुछ समझ नहीं आई... सबसे ज्यादा आपत्ति इसी बात को लेकर है और आपको पत्र लिखने का खयाल भी इसी बात को लेकर आया कि आपने अमेरिका, ब्रिटेन और भारत को एक समान मान लिया । मैंने सुना है कि आप बहुत अमीर आदमी हैं, करोडों-अरबों की दौलत आपके पास है, आपके पास हवाई जहाज, तेल के कुँए, महंगे हथियार और डॉलर हैं, मैने तो इनमें से एक भी चीज आज तक नहीं देखी । सुना है कि आप अमेरिका से लड़ रहे हो, हो सकता है आप सही भी हों । आपके बारे में तो ज्यादा पता नहीं है, लेकिन अमेरिका के बारे में जरूर बहुत पता है कि वह एक व्यवसायी देश है जो गरीबों का खून चूस-चूस कर अमीर बना हुआ है । बचपन में दादाजी कहा करते थे कि जब अचानक कहीं कोई टीला या ढेर उठा हुआ देखो तो समझ जाओ कि कहीं ना कहीं गढ्ढा हो गया होगा । बचपन में तो समझ नहीं पाते थे, लेकिन अब समझ में आने लगी हैं । अमेरिका के वैभव और चकाचौंध के टीले और भारत-पाकिस्तान में दरिद्रता के गढ्ढे अब मुझे साफ़ दिखाई देने लगे हैं । हमें और ईरान-इराक को आपस में लड़वाकर, हमें ही हथियार बेचकर कमाया, फ़िर इराक पर दादागिरी करके तेल पर कब्जा करना, विश्व बैंक को आगे करके गरीब देशों की गरदन पर सवार होना, खुली अर्थव्यवस्था के नाम पर उसकी कम्पनियों द्वारा खुल्लमखुल्ला नोट चरना, अनेक बातें हम देख चुके हैं, देख रहे हैं, तो उसकी मंशा तो पहले से ही साफ़ है, लूटना और मतलब निकल जाने के बाद लात मार देना । हम ही बेवकूफ़ हैं जो उसकी चरण-वन्दना में लगे हुए हैं । और भारत ने आपका क्या बिगाडा़ है पता नहीं ? आपको तो ये भी पता नहीं होगा कि भारत में जितने मुसलमान रहते हैं, उतनी तो कई मुस्लिम देशों की कुल जनसंख्या भी नहीं है । शिरडी वाले सांई बाबा और अजमेर के ख्वाजा का तो आपने नाम भी नहीं सुना होगा, रहीम, कबीर और खानखाना से आपका कोई वास्ता कभी नहीं पडा़ होगा, तो भला आप भारत को कैसे जानेंगे ? भारत का एक और पहलू अमेरिका और ब्रिटेन से अलग है... यहाँ की कुल आबादी का लगभग आधा हिस्सा निरक्षर है, तीस फ़ीसदी से ज्यादा लोग रात को आधे पेट सोते हैं, और हम जैसे निम्न-मध्यमवर्गीय लोग जब बारह-चौदह घंटे काम करते हैं तब कहीं जाकर इज्जत की रोटी मिलती है । आपने हिम्मत कैसे की अमेरिका के साथ भारत की तुलना करने की बन्दापरवर...भारत पर आतंकवादी हमला करके आपको कुछ नहीं मिलने वाला... ना ! कोई फ़ायदा नहीं होने वाला.. हमारे यहाँ की जनता बहुत सहनशील है, बहुत ! मतलब बहुत ज्यादा सहनशील है... इतनी.. कि पिछले पचपन -साठ साल से एक जैसे निकम्मे नेताओं को झेलती जा रही है, कष्ट उठाये जाती है, पर विद्रोह नहीं करती । हमारे यहाँ खामख्वाह लोग मारे जाते हैं, अकाल से, बाढ से, ठंड से, गरीबी से, भूख से, मलेरिया से, भूकम्प से, फ़ुटपाथ पर कुचलकर... गोया कि हजारों तरह से मौत रोज दस्तक देती है । जम्मू-कश्मीर में हजारों जवान मारे जा चुके हैं, श्रीलंका में जबरन ही सैकडों शहीद हो गये थे, देश धर्मशाला बना हुआ है, पाकिस्तानियों आओ, तिब्बतियों यहाँ बसो, बांग्लादेशियों डाके डालो, नेपालियों अपना घर समझो, जिसकी जब मर्जी हो आओ-जाओ... इस सबका यहाँ की जनता पर कोई असर नहीं होता और नेताओं के कानों पर ढक्कन लगा होता है । तो भाई भारत को दुश्मन समझने की गलती मत करो... हमारा जीवन भी उतना ही कठिन है, जितना पाक, या बांग्लादेश में रहने वाले का.. और एक बात ध्यान रखना गरीब आदमी मरने से नहीं डरता, क्योंकि वो तो रोज ही मरता है । डरता है अमीर, उसे डर होता है कि जो उल्टे-सीधे धंधे करके कमाया है, कहीं हाथ से निकल ना जाये, मर गये तो इतने पैसे का क्या होगा । अमेरिका भी इसीलिये डरा हुआ है और इतना डरा हुआ है कि अफ़गानिस्तान में रस्सी को साँप समझ कर मिसाइल चला देता है । हमें कोई डर नहीं है, क्योंकि हमें मालूम है कि हमारा कुछ नहीं बिगडेगा, दो-चार हजार आदमी मारे जायेंगे, एकाध नेता मारा जायेगा, थोडा़ बहुत हो-हल्ला मचेगा, राजनीति होगी, एकाध सरकार उलटेगी, एक डाकू जायेगा दूसरा आ जायेगा, फ़िर वही कुछ होगा जो आज भी हो रहा है । भ्रष्टाचार, साँठगाँठ, अनैतिकता, गंदी राजनीति इन सबने मिलकर हमारा जीवन तो पहले से नर्क बना रखा है तुम हमें क्या मारोगे ? हमारी दुश्मन है अशिक्षा, बेरोजगारी, जनसंख्या और गरीबी.. इनके सामने आप तो कहीं नहीं लगते भाई । हाँ.. यह जरूर होगा कि आपको मारने के लिये अमेरिका ने हजारों मिसाइलें और बम गिराये हैं, उनकी कीमत वह हमसे वसूलेगा, वो नये-नये तरीके लायेगा हमें चूसने के लिये, क्या फ़र्क पडेगा, जिन्दगी जो पहले से ही कठिन है और कठिन हो जायेगी । सुना है कि एक मिसाइल की कीमत बीस लाख डॉलर होती है, रुपये में कितना होगा यह तो पता नहीं, लेकिन ये पता है कि इतने पैसों में कई अस्पताल बन सकते हैं, सैकडों स्कूल खोले जा सकते हैं, हजारों भूखों को भोजन करवाया जा सकता है..। इस लडाई से न तो आपको कोई नुकसान होगा, ना अमेरिका का । असली नुकसान होगा हम जैसे और हमसे भी अधिक गरीबों का होगा, चाहे वह झाबुआ-कालाहांडी का आदिवासी हो जो दिन भर गढ्ढे खोदकर शाम को पचास रुपये पाता है, या फ़िर कराची की गंदी गलियों में घूमने वाला महमूद हो जो कडी मेहनत के बावजूद परिवार नहीं पाल पाता, या फ़िर ढाका के किसी सीलनभरे कमरे में कालीन सीकर उँगलियाँ तुडवाने वाला इम्तियाज हो...। रही बात कि मैं कौन हूँ या मेरा क्या परिचय है, यह कतई महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि मैं एक आम मध्यमवर्गीय हूँ, जो रोजमर्रा के रोजीरोटी के संघर्ष में इतना घिस-पिट चुका हूँ कि मेरी पहचान खो चुकी है और ये मध्यमवर्गीय आदमी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश या श्रीलंका कहीं का भी हो सकता है । मुख्य बात ये नहीं है उसकी राष्ट्रीयता क्या है बल्कि यह है कि उसके सरोकार क्या हैं ? उसकी जिन्दगी का संघर्ष क्या है ? उसके जीवन का लक्ष्य क्या है ? मोटे तौर पर देखा जाये तो सबके समान हैं, चाहे वह कोई भी देश हो । आपने लुटेरे जमींदार की लड़की को छेड़ दिया है, अब वह पूरे गाँव को सजा देगा । माहौल ये है कि दो साँडों की लडा़ई में रोटी खरीदने आये मजदूर की टाँग टूटने का खतरा है, और ये आदमी पहले भी जापान में, वियतनाम में, इराक और अफ़गानिस्तान में बहुत चोट खा चुका है.. थोडे़ लिखे को बहुत समझना और आगे से कभी भी इजराईल, अमेरिका के साथ हमें मत रखना... कहाँ वो और कहाँ हम ?

Monday, July 2, 2007

कुछ "क्रियेटिव" फ़ोटो एवं पैकिंग

एक ईमेल में प्राप्त कुछ "क्रियेटिव" पैकिंग बैग एवं फ़ोटोग्राफ़्स...





























Sunday, July 1, 2007

दादा कोंडके : एक धरतीपुत्र मेरी नजर से...

दादा कोंडके - यह नाम आते ही हमारे सामने छवि उभरती है द्विअर्थी संवादों वाली फ़िल्में बनाने वाले, एक बेहद साधारण से चेहरे मोहरे वाले, नाडा़ लटकती हुई ढीली-ढाली चड्डीनुमा पैंट पहनने वाले, अस्पष्ट सी आवाज में संवाद बोलने वाले एक शख्स की । दादा कोंडके के नाम पर अक्सर हमारे यहाँ का तथाकथित उच्च वर्ग समीक्षक नाक-भौंह सिकोड़ता है, हमेशा दादा को एक दोयम दर्जे का, सिर्फ़ द्विअर्थी और अश्लील संवादों के सहारे अपनी फ़िल्में बनाने वाले के रूप में उनकी व्याख्या की जाती है । यह सुविधाभोगी वर्ग आसानी से भूल जाता है कि मल्टीप्लेक्स के बाहर भी जनता रहती है और उसे भी मनोरंजन चाहिये होता है, उसी वर्ग के लिये फ़िल्में बनाकर दादा का नाम लगातार नौ सिल्वर जुबली फ़िल्में बनाने के लिये "गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स" में शामिल हुआ है (जबकि राजकपूर, यश चोपडा़ और सुभाष घई की भारी-भरकम बजट और अनाप-शनाप प्रचार पाने वाली फ़िल्में कई बार टिकट खिडकी पर दम तोड़ चुकी हैं)।

हिन्दी फ़िल्मों के कलाकार, निर्देशक और यहाँ तक कि फ़िल्म समीक्षक भी एक विशेष प्रकार के घमंड में रहते हैं । उन्हें लगता है कि कुछ चुनिंदा हिन्दी फ़िल्मों में काम करके, करोडों रुपये कमाकर उन्होंने कोई बहुत बडा तीर मार लिया हो या "कला" की बहुत सेवा कर दी हो । जबकि हकीकत यह है कि रजनीकांत की "फ़ैन फ़ॉलोइंग" के आगे अमिताभ बच्चन कहीं नहीं ठहरते, यहाँ तक कि भोजपुरी में भी रवि किशन का जलवा शाहरुख से कहीं ज्यादा है । मराठी भाषा में तो नाटकों की इतनी समृद्ध परम्परा है कि उसके कथ्य, प्रस्तुतीकरण और अभिनय (और सबसे बढकर, एक बडे़ दर्शक वर्ग) के आगे हिन्दी के नाटक कहीं नहीं ठहरते, एक मराठी कलाकार प्रशान्त दामले का नाम रिकॉर्ड बुक्स में इसलिये है कि उन्होंने एक ही दिन में अलग-अलग नाटकों के पाँच शो किये, उन्होंने अब तक तेईस वर्ष में लगभग आठ हजार नाटकों के शो किये, लेकिन फ़िर भी ना जाने क्यों क्षेत्रीय भाषा के कलाकारों को हिन्दी का एक वर्ग जरा हेय दृष्टि से देखता है । दादा कोंडके ने कुछ फ़िल्में हिन्दी में भी बनाईं और वे हिट भी हुईं, लेकिन आरोप लगाने वाले सदा यही राग अलापते रहे कि दादा अश्लील और द्विअर्थी संवाद रखते हैं, इस कारण उनकी फ़िल्में चलती हैं । लेकिन ये आरोप लगाने वाले महेश भट्ट और उनकी टीम को भूल जाते हैं, जो हीरोईन को अर्धनग्न दिखाने के बावजूद फ़िल्म हिट नहीं करवा पाते । खैर.. इस लेख का उद्देश्य है जनता के दिमाग में दादा कोंडके को लेकर बनी छवि को बदलना ।


जन्माष्टमी को मुम्बई के लालबाग इलाके में एक साधारण से परिवार में पैदा हुए दादा कोंडके को बचपन में लोग कृष्णा कहकर बुलाते थे । परिवेश के कारण उनका बचपन गलियों और छोटे-छोटे झगडों में बीता, खुद दादा के शब्दों में - "मेरे बचपन में सभी मुझसे डरते थे, क्योंकि मैं मारपीट करने से नहीं हिचकता था, हमारे मोहल्ले की किसी लड़की को छेडा़ कि समझो उसपर सोडावाटर की बोतलों, ईंटों और पत्थरों से हमला हो जाता था" । बचपन से ही उनमें संगीत की प्रतिभा थी, इसीलिये जब वे एक स्थानीय बैंड पार्टी में शामिल हुए तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ, और इस कारण पहले लोग उन्हें बैंडवाले दादा कहा करते थे । उन्हें नाटकों में पहला मौका दिया वसंत सबनीस ने अपने नाटक "विच्छा माझी पुरी करा" (मेरी इच्छा पूरी करो) । अपने गजब के कॉमेडी सेंस और संवाद अदायगी के कारण दादा कोंडके और वह नाटक बेहद हिट हुआ, उस नाटक के पन्द्रह सौ से अधिक शो में दादा ने काम किया ।

मराठी फ़िल्मों के पितामह तुल्य श्री भालजी पेंढारकर ने दादा को पहली बार "तांबडी माती" (लाल मिट्टी) फ़िल्म मे काम दिया, फ़िर उसके बाद आई फ़िल्म "सोंगाड्या" (बहुरूपिया जोकर) ने उन्हें प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँचा दिया, और उसके बाद तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा । एक के बाद एक हिट और सुपरहिट की झडी लगा दी दादा ने । एक समय साठ रुपये महीने पर "अपना बाजार" में पैकिंग करने वाले इस गांवठी व्यक्ति को मराठी जनता ने भरपूर प्यार और पैसा दिया, चाल के एक मामूली से कमरे से मुम्बई के शिवाजी पार्क जैसे पॉश इलाके में एक अपार्टमेंट का मालिक और करोड़पति बनाया, वही शिवाजी पार्क जहाँ सचिन और गावस्कर खेलते-खेलते बच्चे से बडे़ हुए । दादा की पृष्ठभूमि मराठी "तमाशा" और नाटकों की थी इसलिये अपनी फ़िल्मों में भी उन्होंने आम आदमी से जुडे मुद्दों और उसके मनोरंजन का पूरा खयाल रखा । वे हमेशा कहते थे कि "मेरी फ़िल्में मिल मजदूरों, किसानों और सडक के आदमी के लिये हैं, क्योंकि उन्हें भी मनोरंजन का पूरा हक है । मेरी फ़िल्में उच्च वर्ग के लोगों के लिये नहीं हैं, ये तथाकथित उच्च वर्ग के लोग मेरी फ़िल्म यदि अच्छी भी होगी तो एक बार ही देखेंगे, लेकिन एक श्रमिक मेरी फ़िल्म तीन-तीन बार देखेगा और उसे हमेशा मजा आयेगा...(ख्यात अभिनेता और निर्देशक सचिन ने उनके नाटक "विच्छा माझी पुरी करा" अठ्ठाईस बार और "सोंगाड्या" फ़िल्म दस बार देखी) मेरी फ़िल्में "मास" के लिये हैं, "क्लास" के लिये नहीं"। जो व्यक्ति अपनी सीमायें वक्त रहते जान जाता है वही सफ़ल भी हो जाता है, दादा को अपनी शक्लो-सूरत की सीमाओं का ज्ञान था इसलिये कभी भी उन्होंने फ़िल्मों में "शिवाजी" का रोल करने का दुस्साहस नहीं किया, हाँ.. अपने अन्तिम दिनों में वे एक गंभीर फ़िल्म पर काम कर रहे थे, वे शांताराम बापू की "दो आँखे बारह हाथ" से बहुत प्रभावित थे और वैसी ही फ़िल्म बनाना चाहते थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था ।

वे हमेशा जमीन से जुडे़ अभिनेता रहे... दोस्तों को बच्चों की शादी के लिये पैसे की मदद करना, लोगों के आग्रह पर उनके घर जाकर फ़ोटो खिंचवाना, मुफ़्त में उदघाटन करना तो उन्होंने कई बार किया । जब वे सुपर स्टार बन गये थे तब भी वे अपने पुराने बैंड वाले साथियों को नहीं भूले, जब भी समय मिलता वे उनसे मिलने जरूर जाते और उनके साथ ही दरी पर बैठते, जबकि वे लोग कहते ही रहते कि दादा अब आप बडे़ आदमी बन गये हो कम से कम कुर्सी पर तो बैठो...उनके सेक्रेटरी और स्टाफ़ के सदस्य अक्सर उनसे कहते कि दादा आपको फ़िल्म के सेट पर या आऊटडोर में गाँवों में किसी से पान नहीं लेना चाहिये, हो सकता है उसमें जहर मिला हो... लेकिन दादा हमेशा कहते थे कि जिस दिन मैं स्टार जैसा बर्ताव करूँगा तो मैं खुद से ही निगाह नहीं मिला सकूँगा और ये समझूँगा कि क्या मैने अपने बचपन के दिन भुला दिये ? नहीं.. मैं आम आदमी का हूँ और उसी का रहूँगा...।

लगभग बीस वर्षों तक वे मराठी फ़िल्मों के एकछत्र राजा रहे, लेकिन हिन्दी फ़िल्मों में उन्हें उस तरह की सफ़लता नहीं मिली । उन्हें हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री का मिजाज कभी समझ नहीं आया, वे अक्सर मजाक में कहा करते थे कि हिन्दी फ़िल्मों के कलाकार "चरण सिंह" हैं - "वे पल भर में आपके चरण पकड़ते हैं और कुछ दिन बाद ही चरण खींचने भी लगते हैं", "हिन्दी फ़िल्मों की हीरोईने कोई काम-धाम ना होने पर भी हमेशा कहती हैं कि मैं ३६ फ़िल्मों में काम कर रही हूँ.." । अस्सी के मध्य दशक में जब शिवसेना का जनाधार उफ़ान पर था तब बालासाहेब ठाकरे के साथ दादा कोंडके सर्वाधिक भीड़खेंचू नेता थे । दादा की पहली सुपरहिट फ़िल्म "सोंगाड्या" के प्रदर्शन के दौरान जबकि दादा ने कोहिनूर थियेटर अग्रिम राशि देकर बुक कर लिया था, बावजूद इसके थियेटर मालिक देव आनन्द की फ़िल्म "तीन देवियाँ" प्रदर्शित करने पर अड़ गया था, तब बालासाहेब ठाकरे ने अपने "प्रभाव" से दादा कोंडके की फ़िल्म उसी थियेटर में प्रदर्शित करवाई, उस दिन से बाल ठाकरे और दादा अभिन्न मित्र बन गये और मित्रता भी ऐसी कि दादा के पार्थिव शरीर पर बाल ठाकरे ने सिर्फ़ हार नहीं चढाये बल्कि उनके पैरों पर सिर भी रखा । मजे की बात यह है कि बाल ठाकरे और दादा कोंडके दोनो का कैरियर लगभग साथ-साथ ही शुरु हुआ और अपने शीर्ष पर पहुँचा...(ये और बात है कि जिस कार्टूनिस्ट बाल ठाकरे की तारीफ़ आर.के.लक्ष्मण नें सर्वाधिक प्रतिभाशाली और प्रभावशाली के रूप में की थी, वह राजनीति की भूलभुलैया में उस कला को खो बैठा), लेकिन दादा कोंडके ने कभी अपनी राह नहीं खोई और आम आदमी के लिये फ़िल्में बनाना जारी रखा ।

दरअसल उनकी कॉमेडी यात्रा का आरम्भ तब हुआ जब एक ही साल के अन्दर उनके कई नजदीक के नाते-रिश्तेदारों की मृत्यु हो गई, दादा कहते थे - मैं इन मौतों से बुरी तरह से हिल गया था, एक साल तक मैने किसी से बात नहीं की, खाने की इच्छा भी नहीं होती थी, मुझे लगता था कि मैं पागल हो जाऊँगा, लेकिन अचानक पता नहीं क्या हुआ मैने मन में ठाना कि अब अपने दुःख भुलाकर मैं लोगों को हँसाऊँगा..और मैने कॉमेडी शुरु कर दी" । दादा कोंडके ने कई लोगों को मौका दिया, जिनमें से प्रमुख हैं मराठी के एक और सुपरस्टार अशोक सराफ़ और संगीतकार राम-लक्ष्मण । दादा की फ़िल्मों की हीरोइन अधिकतर फ़िल्मों में ऊषा चव्हाण ही रहीं, दादा पर फ़िल्माये अधिकतर गाने महेन्द्र कपूर ने गाये और हीरोईन के ऊषा मंगेशकर ने । महेन्द्र कपूर ने पंजाबी होते हुए भी मराठी में दादा के लिये इतने गाने गाये कि एक बार दादा ने मजाक में उनसे पूछ लिया था कि "महेन्द्र जी कहीं अब आप हिन्दी गाना भूल तो नहीं गये" । १४ मार्च १९९८ को अड़सठ वर्ष की आयु में दादा का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया और मराठी सिनेमा का एक युग समाप्त हुआ...

संक्षेप में कहें तो - दादा कोंडके हों या रजनीकांत (जो आज भी अपने बरसों पुराने ड्रायवर दोस्त से मिलने बंगलोर जाते हैं तो उसी के घर ठहरते हैं) या एनटीआर (दो रुपये किलो चावल वाली सफ़ल योजना उन्हीं की देन थी), ये सभी लोग महान इसलिये बने हैं क्योंकि वे शिखर पर पहुँचने के बावजूद जमीन से जुडे रहे, हमेशा आम आदमी की समस्याओं को लेकर फ़िल्में बनाईं या गरीब तबके के लोगों का शुद्ध मनोरंजन किया । मुझे पूरा विश्वास है कि यदि दादा कोंडके आज विज्ञापन बनाते तो वे ब्रा-पैंटी और कंडोम के विज्ञापन भी इस तरह से बनाते कि जिसे समझना है वह पूरी तरह समझ जाये और जिस उम्र के लायक नहीं है वह बिलकुल भी ना समझ पाये, और तब शायद दादा को द्विअर्थी और अश्लील कहने वाले बगलें झाँकते (अभी वे लोग इसलिये बगलें झाँकते हैं कि टीवी पर दिखाया जा रहा "तमाशा" और तथाकथित "सभ्य विज्ञापन" उन्हें अश्लील नहीं दिखते)। अश्लीलता या सेक्स मानव की आँखों से दिमाग मे होते हुए कमर के नीचे पहुँचता है, यदि दिमाग पर व्यक्ति का नियंत्रण है तो अनावृत्त नारी या अश्लील बातें भी पुरुष को उत्तेजित नहीं कर सकतीं । यह लोगों को तय करना है कि "खुल्लमखुल्ला" अच्छी बात है या "द्विअर्थी" होना... उम्मीद है कि दादा कोंडके की तरफ़ देखने का हिन्दीभाषियों का नजरिया कुछ बदलेगा...