Friday, June 29, 2007

शिवजी बिहाने चले.....एक विलक्षण गीत

शिवजी की नगरी उज्जैन में श्रावण के सोमवारों को भगवान महाकालेश्वर की सवारी निकलती है और अन्तिम सोमवार को बाबा महाकाल की विशाल और भव्य सवारी निकाली जाती है । ऐसी मान्यता है कि महाकाल बाबा श्रावण में अपने भक्तों और प्रजा का हालचाल जानने के नगर-भ्रमण करते हैं । उस शाही अन्तिम सवारी में विशाल जनसमुदाय उपस्थित होता है और दर्शनों का लाभ लेता है । शाही सवारी में सरकारी तौर पर और निजी तौर पर हजारों लोग अपने-अपने तरीके से सहयोग करते हैं । बैंड, होमगार्ड, स्काऊट-गाईड, विभिन्न सेवा संगठन, एवं कुछ विशिष्ट भक्तजन भी उस सवारी में शामिल होते हैं । सवारी में शामिल लोग विभिन्न रूप धरे होते हैं जैसे भूत, चुडैल, नन्दी, शेर आदि और ऐसा माहौल तैयार हो जाता है कि बस देखते ही बनता है, शब्दों में बयान करना मुश्किल है । उस वक्त हमेशा मुझे एक गीत याद आता है...गीत है फ़िल्म "मुनीमजी" का, लिखा है शैलेन्द्र ने, संगीत दिया है एस.डी.बर्मन ने और गाया है हेमन्त कुमार और कोरस ने । यह एक विलक्षण गीत है जिसे धरोहर गीत की संज्ञा भी दी जा सकती है । यह गीत हिन्दी से मिलती-जुलती भाषा में है, शायद यह अवधी, भोजपुरी या मैथिली में है ? शिव जी की बारात और विवाह प्रसंग का आँखों देखा हाल सुनाता है यह गीत । इस गीत में शैलेन्द्र ने जिस खूबसूरती से शिवजी के विवाह का वर्णन किया है वह अदभुत है । गीत की भाषा और कुछ शब्द तो ठीक से समझ में नहीं आते, लेकिन इतने लम्बे गीत लिखना, उसकी धुन बनाना और फ़िर उसे हेमन्त दा द्वारा त्वरित गति में गाना एक अतिउल्लेखनीय कार्य है, यह कल्पना ही की जा सकती है कि पुराने गीतों में ये महान लोग कितनी मेहनत करते होंगे, जबकि तकनीक इतनी उन्नत भी नहीं थी... बहरहाल, इस गीत को कई बार सुनने के बावजूद मैं इसके कुछेक शब्दों को नहीं पकड़ पाया (हो सकता है कि मेरा हेडफ़ोन उच्च क्वालिटी का नहीं है इसलिये..) गीत के बोलों को लिखते समय मैने कुछ जगहों पर ***** का प्रयोग किया है, अब लोग इसे सुनें और मेरी मदद करें ताकि इस गीत के पूरे बोलों को सामने लाया जा सके, साथ ही जब बोल सही रूप में सामने आयेंगे तभी हम गीत का सही मतलब भी समझ पायेंगे । वैसे मैने अपने तईं भरपूर कोशिश की है सही बोल लिखने की, फ़िर भी जब अन्तरा समाप्त होने को होता है उस वक्त जल्दी-जल्दी में गाये गये बोल पकड़ में नहीं आते । इसी प्रकार मैने कोशिश की है कि प्रत्येक अन्तरे के बाद उसका अर्थ समझाने का प्रयास करूँ, हो सकता है कि किसी अन्य को वह अर्थ सही ना लगे, तो वह कृपया उसका सही अर्थ मालूम करके मुझे बताने का कष्ट करें, ताकि भविष्य में इस गीत को पूरे अर्थ और सही बोलों के साथ प्रस्तुत किया जा सके... प्रस्तावना बहुत हुई अब पहले आप यह गीत सुनिये (यहाँ क्लिक करके) - फ़िर आते हैं इसके विश्लेषण पर...

गीत शुरु होता है हेमन्त दा के बोले हुए शब्दों से -

बम-बम भोला... बम-बम भोला..
बम-बम भोला... बम-बम भोला..

डमरू, ढोल, ताशे, शंख और नगाडे़ की आवाज के साथ गीत शुरु होता है -

हो..शिवजी बिहाने चले
पालकी सजाय के
भभूति लगाय के, नाथ...
ओ शिवजी बिहाने चले पालकी सजाय के
कोरस - भभूति लगाय के, पालकी सजाय के, नाथ...
हो.. जब शिव बाबा करे तैय्यारी
कईके सकल समान हो..
दईने अंग त्रिशूल विराजे
नाचे भूत शैतान हो..
ब्रह्मा चले विष्णु चले
लईके वेद पुरान हो..
शंख, चक्र और गदा धनुष लै
चले श्री भगवान हो...
और बन-ठन के चलें बम भोला
लिये भांग-धतूर का गोला
बोले ये हरदम
चले लाड़का पराय के..
कोरस - हो भभूति लगाय के
पालकी सजाय के... ला..ला..
हो शिवजी बिहाने चले....

(मेरे मतानुसार यह अन्तरा विवाह से पहले दूल्हे की तैयारी के बारे में है, जिसमें भोलेनाथ को दाँये हाथ में त्रिशूल और भांग-धतूरे के साथ एवं साथी के रूप में ब्रह्मा और विष्णु को भी बताया गया है, सारे भूत-शैतान बारात में नाच भी रहे हैं)

कोरस - ओई आई, ओई आया..(२ बार)
फ़िर शहनाई की मधुर आवाज...

ओ माता मतदिन पर चंचललि
तिलक जलि लिल्हार हो
काला नाग गर्दन के नीचे
वोहू दियन फ़ुफ़कार हो..
नाग के फ़ुफ़कारने की आवाज आती है...
लोटा फ़ेंक के भाग चलैलि
ताविज निकल लिलार हो..
इनके संगे बिबाह ना करबो
गौरी रही कुंवारी हो
कहें पारवती समझाईं
बतियाँ मानो हमरो माईं
जै भराइलै हाँ हम करमवा लिखाय के
कोरस - भभूति लगाय के
पालकी सजाय के... हाँ...
हो शिवजी बिहाने चले....
(मेरे मतानुसार जब विवाह के पहले दूल्हे का द्वारचार किया जाता है, यह उस वक्त का दृश्य है जिसमें शिवजी की गर्दन का नाग फ़ुफ़कारता है तो आरती उतारने वाली, लोटा फ़ेंक के भाग खडी होती है, उस समय पार्वतीजी की माँ कहती हैं कि इनसे मेरी पुत्री का विवाह नहीं हो सकता भले वह कुंवारी ही रह जाये, और पार्वती उन्हें समझाती हैं कि बात मानो और जो भाग्य में लिखा है वह तो होगा ही..)

फ़िर शहनाई के स्वर और मंत्रोच्चार...
ओम नमः शिवाय, ओ..म स्वाहा..ओम स्वाहा...

ओ.. जब शिव बाबा मंडवा गईले
होला मंगलाचार हो
बाबा पंडित वेद विचारे
होला गस्साचार हो
बजरबाटी की लगी झालरी
नागिन की अधिकार हो
विज मंडवा में नावन अईली
करे झंगन वडियार हो..
एगो नागिन गिले विदाई
********* (???)
********* (???)
कोरस - हो भभूति लगाय के
पालकी सजाय के.. हाँ..
हो शिवजी बिहाने चले...
(इस अन्तरे को समझना थोडा़ मुश्किल होता है, शायद शिवजी के मंडप में पहुँचने के बाद जब पंडित मंगलगान शुरु करते हैं और मंडप की सजावट का उल्लेख है, फ़िर शब्दों के खो जाने के कारण उसका पूर्ण अर्थ समझ में नहीं आता)

कोरस - आ..आ.आ.आ.आ.आ

तो कोमल रूप धरे शिवशंकर
खुशी भये नर-नारी हो
राजहि नाचन गान करईले
इज्जत रहें हमार हो
रहें वर साथी शिवशंकर से
केहू के ना पावल पार हो
इनके जटा से गंगा बहिली
महिमा अगम अपार हो..
जब शिवशंकर ध्यान लगाये
इनको तीनो लोक दिखाये
कहे दुःखहरन यही
******* (???)

कोरस - भभूति लगाय के
पालकी सजाय के हाँ..
(इस अंतरे में शिव की महिमा का गुणगान किया गया है । जब सभी के परेशान हो चुकने के बाद शंकर जी औघड़ बाबा वाला चोला छोडकर कोमल रूप धारण कर लेते हैं और सभी लोग खुश हो जाते हैं)
गीत में प्रत्येक अन्तरे के शुरु होने से पहले जो डमरू और ढोल का धूमधडाका किया जाता है, उससे एक मस्ती भरी बारात का दृश्य जीवन्त हो उठता है, इसे कहते हैं संगीत से माहौल रचना..
बहनों और भाईयों, अब गीत एक बार फ़िर सुनिये, और अपनी राय, सुझावों, मेरी गलतियों से मुझे अवगत करायें...इस मामले में यूनुस भाई मेरी कुछ मदद कर सकें ...

Tuesday, June 26, 2007

प्रकाश प्रदूषण : एक धीमा जहर ?

पाठकगण शीर्षक देखकर चौंकेंगे, लेकिन यह एक हकीकत है कि धीरे-धीरे हम जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण के बाद अब प्रकाश प्रदूषण के भी शिकार हो रहे हैं । प्रकाश प्रदूषण क्या है ? आजकल बडे़ शहरों एवं महानगरों में सडकों, चौराहों एवं मुख्य सरकारी और व्यावसायिक इमारतों पर तेज रोशनी की जाती है, जिसका स्रोत या तो हेलोजन लैम्प, सोडियम वेपर लैम्प अथवा तेज नियोन लाईटें होती हैं । उपग्रह से पृथ्वी के जो चित्र लिये गये हैं उसमें टोकियो और जापान का कुछ हिस्सा, पश्चिमी यूरोप के लन्दन और फ़्रैंकफ़ुर्ट और अमेरिका के शिकागो और न्यूयार्क शहरों की तेज रोशनी के चित्र स्पष्ट तौर पर नजर आते हैं, इससे कल्पना की जा सकती है कि इन महानगरो में रात के समय कितनी तेज रोशनी होती है । रात्रि के समय इस प्रकार के तेज प्रकाश से नागरिक तो खुश होते हैं और उन्हें कोई असुविधा नहीं होती, लेकिन पर्यावरण एवं छोटे-छोटे जीव-जंतुओं पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है । सबसे पहले बात प्रकृतिप्रेमियों की, इन शहरों के लोग आसपास की तेज रोशनी के कारण आकाशगंगा को ही ठीक से नहीं देख पाते । मुम्बई के किसी मुख्य चौराहे पर खडे होकर हम अधिक से अधिक २५० तारे देख सकते हैं, लेकिन शहर के बाहर निकलने पर किसी अन्धेरे स्थान पर खडे होकर हमें नंगी आँखों से २५०० से अधिक नक्षत्र और तारे आसानी से दिख जाते हैं । यह कोई मुख्य समस्या नहीं है, बल्कि असल बात तो यह है कि रात्रिकालीन तेज प्रकाश के कारण अनेक पक्षी, कीट-पतंगे अपना रास्ता भूल जाते हैं और भटक कर रोशनी के स्रोतों से टकराते रहते हैं । एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग दस करोड़ पक्षी ऊँची इमारतों से टकराकर मर जाते हैं । वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर रॉड क्राफ़ोर्ड के अनुसार "पहले आमतौर पर दिखाई दे जाने वाले कई कीट हमारी नजरों से दूर होते जा रहे हैं, कुछ छोटे पतंगे तो शहरों से लगभग लुप्तप्राय होने लगे हैं, क्योंकि रात की तेज रोशनी में वे अपना सफ़र नहीं कर पाते और उनके प्राकृतिक "मिलन" के लिये जो रात का कम समय मिल पाता है, उसमें भी कमी हो गई है । साथ ही तेज प्रकाश के कारण वे बडे पक्षियों के शिकार बन जाते हैं । इसी प्रकार एक जीव विज्ञानी डॉ. मारिआन मूर, जिन्होंने झीलों के सूक्ष्म जीवों (zooplanktons) पर गहन अनुसन्धान किया है, कहते हैं "तालाब या झील के ये सूक्ष्म जीव रात के समय पानी की सतह पर आकर जल शैवालों का भक्षण करते हैं, लेकिन नदी या झीलों के किनारे तेज प्रकाश के कारण वे सतह पर आने से कतराते हैं और उन्हें अधिक समय पानी के नीचे ही गुजारना पड़ता है, इसलिये सतह पर शैवालों (Algae) का बढना जारी रहता है जिसके कारण अन्य दूसरी जलीय वनस्पतियों को पनपने का मौका ही नहीं मिलता । चन्द्रमा के नैसर्गिक प्रकाश में इन विविध प्राणियों को सहवास का जो समय मिलता है वह अब तेज रोशनी के कारण होने वाले दिमागी भ्रम के कारण नहीं मिलता, इस कारण लाखों प्रजातियाँ लुप्त होने की कगार पर आ गई हैं ।

(यह चित्र अमेरिका में रात होते समय का उपग्रह से लिया गया है, जिसमें अमेरिका के चकाचौंध शहर साफ़ दिखाई देते हैं)
हालांकि लोग कहते हैं कि मनुष्य की सुविधा और अपराधों पर नियन्त्रण के लिये रात में तेज प्रकाश आवश्यक है और उसके कारण पर्यावरण को होने वाले नुकसान की परवाह नहीं करना चाहिये, लेकिन इस तेज प्रकाश का मनुष्यों पर भी घातक प्रभाव पड़ रहा हो तब तो हमें सचेत हो ही जाना चाहिये । "नेशनल कैन्सर इंस्टिट्यूट" की एक शोध रिपोर्ट के अनुसार प्राकृतिक प्रकाश की अपेक्षा रात्रिकालीन प्रकाश में अधिक देर तक रहने से कैंसर का खतरा बढ जाता है । रिपोर्ट के अध्ययन के अनुसार जो स्त्रियाँ नाईट शिफ़्ट में काम करती हैं, उनमें स्तन कैंसर की मात्रा अधिक पाई गई, इसी प्रकार बोस्टन के एक अस्पताल में किये गये शोध के अनुसार रात्रि पाली में काम करने वाली नर्सों में कैंसर की सम्भावना 36% तक बढ गई थी । दरअसल, तेज प्रकाश के कारण शरीर में मेलाटोनिन के निर्माण में कमी आती है, इस हार्मोन पर शरीर के "चक्र" का दारोमदार होता है, जिससे यह चक्र गडबडा़ जाता है । मेलेटोनिन में Antioxidant गुण होते हैं, इनमें कमी के कारण Astrogen का निर्माण भी बाधित होता है और अन्ततः यही कैंसर का कारण बनता है ।

(इस चित्र में जापान, यूरोप, दुबई, और अमेरिका के बडे शहरों को आसानी से चिन्हित किया जा सकता है)

नैसर्गिक प्रकाश मनुष्य या प्राणी के शरीर के लिये औषधि का काम करता है, लेकिन कृत्रिम प्रकाश का अधिकाधिक उपयोग बीमारियों को बढा़ता जा रहा है । यह एक सामान्य सा स्थापित तथ्य है कि जिन घरों में सूर्य का प्रकाश अधिक देर तक रहता है, वहाँ लोग अधिक स्वस्थ रहते हैं । नॉर्वे, स्वीडन आदि स्कैंडेनेवियाई देशों के नागरिक सूर्य देखने के लिये तरस जाते हैं, वहाँ कई बार चार-छः महीनों तक धूप ही नहीं निकलती । विदेशी पर्यटक यूँ ही नहीं गोवा और कोवलम के बीचों पर नंग-धडंग पडे़ रहते, बल्कि धूप से अधिक देर तक दूर रहने के कारण उनको त्वचा कैंसर का खतरा होता है, इसलिये डॉक्टर उन्हें "धूप-स्नान" की सलाह देते हैं । हम भारतवासी सौभाग्यशाली हैं कि हमें धूप, ठंड और बारिश लगभग समानुपात में मिलती है (ये और बात है कि हम उसकी कद्र नहीं करते) । सामान्यतः एक बडे़ बल्ब की प्रखरता 2900 ल्यूमेन्स होती है, जबकि फ़्लोरोसेंट ट्यूब की 7750, मरकरी लैम्प की 19100, कम प्रेशर के सोडियम लैम्प की 33000, अधिक दबाव वाले सोडियम लैम्प की 45000 और मेटल हेलाईड के प्रकाश की तीव्रता 71000 ल्यूमेन्स होती है । इसके कारण इनके आसपास के वातावरण के तापमान में भारी वृद्धि हो जाती है । स्टेडियमों में लगने वाले बल्बों से अल्ट्रावॉयलेट किरणें एवं अन्य उच्च दाब के प्रकाश से इन्फ़्रारेड किरणें निकलती हैं, और यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि इन किरणों का मनुष्य के शरीर पर क्या प्रभाव पडता है । यदि किसी बडे शहर की सभी सार्वजनिक लाईटों को दो सौ वॉट की बजाय सौ वॉट एवं ढाई सौ की बजाय डेढ सौ वॉट में बदल दिया जाये तो कितनी ऊर्जा और बिजली की बचत होगी । इमारतों और सडकों पर उतना ही प्रकाश होना चाहिये जितनी जरूरत है, खामख्वाह आँखें चौंधियाने वाले प्रकाश की कोई आवश्यकता नहीं है और ऐसा अभी सिद्ध नहीं हुआ है कि अंधेरी रातों में अधिक चोरियाँ होती हैं, बल्कि पुलिस के अनुसार सेंधमारी और लूट दिन के वक्त ज्यादा होती है, जब घरों में कोई नहीं होता । इसलिये समय आ गया है कि सभी नगरीय प्रशासनिक संस्थायें इस दिशा में विचार करें, वैसे ही हमारे देश में बिजली की कमी है, फ़िर क्यों उसका इस तरह से अपव्यय किया जाये ? साथ ही स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिये तो यह हितैषी होगा ही, कि हम सब मिलकर कटौती करने की कोशिश करें । बडे़-बडे़ शोरूमों और कम्पनियों से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने यहाँ गैरजरूरी लाईटों में कमी करें, साईन बोर्ड रात के दस बजे तक ही चालू रखें । नगरपालिकायें सडक की बत्तियाँ एक खंभा छोडकर एक पर जलायें । यही बात घरों पर भी लागू करने की कोशिश करें और ट्यूबलाईटों को निकालकर CFL का अधिकाधिक प्रयोग शुरु करें, साथ ही यह भी याद करने की कोशिश करें कि पिछली बार आपने "जुगनू" कब देखा था ?
स्व-आचार संहिता : इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री एवं लेखों पर आधारित

Monday, June 25, 2007

बीबियाँ ऐसे धमकाती होंगी ?

हमेशा उत्सुकता होती है कि किसी प्रोफ़ेशन को लेकर बीबियाँ कैसे अपने-अपने पतियों को धमकाती होंगी ?

पायलट को : उडा़कर रख दूँगी
मन्त्री को : बस बहुत हुए आश्वासन
शिक्षक को : मुझे मत सिखाओ
पेंटर को : चेहरा लाल कर दूँगी
कारपेंटर को : ठोक कर सीधा कर दूँगी
डेंटिस्ट को : दाँत निकालकर हाथ में दे दूँगी
अभिनेता को : बस बहुत हुआ तुम्हारा नाटक
किराने वाले को : मुझे पुडिया मत दो, मैं तुम्हें खूब समझती हूँ
कम्प्यूटर वाले को : खबरदार, सारी हार्ड डिस्क फ़ॉरमेट कर दूँगी
ठेकेदार को : क्या मैंने तुम्हारा ठेका लिया है
मैकेनिक को : सारे नट-बोल्ट कस के रख दूँगी
धोबी को : ज्यादा चूं-चपड की तो धोकर रख दूँगी

और अन्त में...
ब्लॉगर को : तुम्हारा कच्चा चिठ्ठा खोलकर रख दूँगी..

ब्लॉगर बन्धु अपने-अपने "अनुभवों" पर आधारित टिप्पणियाँ इसमें जोड़ सकते हैं.... :)

Sunday, June 24, 2007

पिता : घर का अस्तित्व

"माँ" घर का मंगल होती है तो पिता घर का "अस्तित्व" होता है, परन्तु इस अस्तित्व को क्या कभी हमनें सच में पूरी तरह समझा है ? पिता का अत्यधिक महत्व होने के बावजूद उनके बारे में अधिक बोला / लिखा नहीं जाता, क्यों ? कोई भी अध्यापक माँ के बारे में अधिक समय बोलता रहता है, संत-महात्माओं ने माँ का महत्व अधिक बखान किया है, देवी-देवताओं में भी "माँ" का गुणगान भरा पडा़ है, हमेशा अच्छी बातों को माँ की उपमा दी जाती है, पिता के बारे में कुछ खास नहीं बोला जाता । कुछ लेखकों ने बाप का चित्रण किया भी है तो गुस्सैल, व्यसनी, मार-पीट करने वाला इत्यादि । समाज में एक-दो प्रतिशत बाप वैसे होंगे भी, लेकिन अच्छे पिताओं के बारे में क्यों अधिक नहीं लिखा जाता, क्यों हमेशा पुरुष को भावनाशून्य या पत्थरदिल समझा जाता है ? माँ के पास आँसू हैं तो पिता के पास संयम । माँ तो रो-धो कर तनावमुक्त हो जाती है, लेकिन सांत्वना हमेशा पिता ही देता है, और यह नहीं भूलना चाहिये कि रोने वाले से अधिक तनाव सांत्वना / समझाईश देने वाले को होता है । दमकती ज्योति की तारीफ़ हर कोई करता है, लेकिन माथे पर तेल रखे देर तक गरम रहने वाले दीपक को कोई श्रेय नहीं दिया जाता । रोज का खाना बनाने वाली माँ हमें याद रहती है, लेकिन जीवन भर के खाने की व्यवस्था करने वाला बाप हम भूल जाते हैं । माँ रोती है, बाप नहीं रो सकता, खुद का पिता मर जाये फ़िर भी नहीं रो सकता, क्योंकि छोटे भाईयों को संभालना है, माँ की मृत्यु हो जाये भी वह नहीं रोता क्योंकि बहनों को सहारा देना होता है, पत्नी हमेशा के लिये साथ छोड जाये फ़िर भी नहीं रो सकता, क्योंकि बच्चों को सांत्वना देनी होती है । जीजाबाई ने शिवाजी निर्माण किया ऐसा कहा जाता है, लेकिन उसी समय शहाजी राजा की विकट स्थितियाँ नहीं भूलना चाहिये, देवकी-यशोदा की तारीफ़ करना चाहिये, लेकिन बाढ में सिर पर टोकरा उठाये वासुदेव को नहीं भूलना चाहिये... राम भले ही कौशल्या का पुत्र हो लेकिन उनके वियोग में तड़प कर जान देने वाले दशरथ ही थे । पिता की एडी़ घिसी हुई चप्पल देखकर उनका प्रेम समझ मे आता है, उनकी छेदों वाली बनियान देखकर हमें महसूस होता है कि हमारे हिस्से के भाग्य के छेद उन्होंने ले लिये हैं... लड़की को गाऊन ला देंगे, बेटे को ट्रैक सूट ला देंगे, लेकिन खुद पुरानी पैंट पहनते रहेंगे । बेटा कटिंग पर पचास रुपये खर्च कर डालता है और बेटी ब्यूटी पार्लर में, लेकिन दाढी़ की क्रीम खत्म होने पर एकाध बार नहाने के साबुन से ही दाढी बनाने वाला पिता बहुतों ने देखा होगा... बाप बीमार नहीं पडता, बीमार हो भी जाये तो तुरन्त अस्पताल नहीं जाते, डॉक्टर ने एकाध महीने का आराम बता दिया तो उसके माथे की सिलवटें गहरी हो जाती हैं, क्योंकि लड़की की शादी करनी है, बेटे की शिक्षा अभी अधूरी है... आय ना होने के बावजूद बेटे-बेटी को मेडिकल / इंजीनियरिंग में प्रवेश करवाता है.. कैसे भी "ऎड्जस्ट" करके बेटे को हर महीने पैसे भिजवाता है.. (वही बेटा पैसा आने पर दोस्तों को पार्टी देता है) । पिता घर का अस्तित्व होता है, क्योंकि जिस घर में पिता होता है उस घर पर कोई बुरी नजर नहीं डालता, वह भले ही कुछ ना करता हो या ना करने के काबिल हो, लेकिन "कर्तापुरुष" के पद पर आसीन तो होता ही है और घर की मर्यादा का खयाल रखता है.. किसी भी परीक्षा के परिणाम आने पर माँ हमें प्रिय लगती है, क्योंकि वह तारीफ़ करती है, पुचकारती है, हमारा गुणगान करती है, लेकिन चुपचाप जाकर मिठाई का पैकेट लाने वाला पिता अक्सर बैकग्राऊँड में चला जाता है... पहली-पहली बार माँ बनने पर स्त्री की खूब मिजाजपुर्सी होती है, खातिरदारी की जाती है (स्वाभाविक भी है..आखिर उसने कष्ट उठाये हैं), लेकिन अस्पताल के बरामदे में बेचैनी से घूमने वाला, ब्लड ग्रुप की मैचिंग के लिये अस्वस्थ, दवाईयों के लिये भागदौड करने वाले बेचारे बाप को सभी नजरअंदाज कर देते हैं... ठोकर लगे या हल्का सा जलने पर "ओ..माँ" शब्द ही बाहर निकलता है, लेकिन बिलकुल पास से एक ट्रक गुजर जाये तो "बाप..रे" ही मुँह से निकलता है । जाहिर है कि छोटी मुसीबतों के लिये माँ और बडे़ संकटों के लिये बाप याद आता है...। शादी-ब्याह आदि मंगल प्रसंगों पर सभी जाते हैं लेकिन मय्यत में बाप को ही जाना पड़ता है.. जवान बेटा रात को देर से घर आता है तो बाप ही दरवाजा खोलता है, बेटे की नौकरी के लिये ऐरे-गैरों के आगे गिड़गिडा़ता, घिघियाता, बेटी के विवाह के लिये पत्रिका लिये दर-दर घूमता हुआ, घर की बात बाहर ना आने पाये इसके लिये मानसिक तनाव सहता हुआ.. बाप.. सच में कितना महान होता है ना !
(यह एक मराठी रचना का अनुवाद है)

Friday, June 22, 2007

बरसात पर एक कालजयी गाना

देश के कुछ हिस्सों में बारिश ने अपनी खुश-आमदीद दर्ज करवा दी है, और कुछ में सौंधी खुशबुओं ने समाँ बाँधना शुरु कर दिया है । बरसात के मौसम पर हिन्दी फ़िल्मों मे दर्जनों गीत हैं, बारिश तो मानो गीतकारों के लिये एक "पार्टी" की तरह होती है, एक से बढकर एक गीत लिखे गये बरसात पर, लेकिन जब भी झूम कर बारिश होती है, यह गीत सबसे पहले जुबाँ पर आता है । गाया है सुमन कल्याणपूर और कमल बारोट ने, लिखा है साहिर साहब ने और तर्ज बनाई है रोशन ने, फ़िल्म का नाम है बरसात की रात । इस गीत का प्रारम्भ म्यूजिक के जिस टुकडे़ से होता है, बरसों तक वह धुन विविध भारती के संगीत सरिता की "सिग्नेचर ट्यून" रही । गीत कुछ इस प्रकार है -

गरजत बरसत सावन आयो रे..
गरजत बरसत सावन आयो रे..
लायो ना संग में हमरे बिछडे बलमवा
सखी का करुँ हाय..
गरजत बरसत...

(१) रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसे
रिमझिम रिमझिम मेघा बरसे
बरसे, मेघा...
रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसे
तरसे जियरवा मीन समान
पड गई पी की लाल चुनरिया
पिया नहीं आये
गरजत बरसत सावन आयो रे...

(२) पल-पल छिन-छिन पवन झकोरे (३ बार)
लागे तन पर तीर समान, तीर समान
सखी लागे तन पर तीर समान
नैनन ढले तो भीगी सजरिया
अगन लगाये...
गरजत-बरसत सावन आयो रे...
लायो ना संग में हमरे बिछडे बलमवा
सखी का करुँ हाय... गरजत-बरसत..



इस प्रकार हमें भिगोता हुआ यह गीत रागों के साथ समाप्त हो जाता है... फ़िर सुनने वाले को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि यह किस राग पर आधारित है, क्योंकि बारिश में अगर संगीत का साथ है तो फ़िर मन वैसे ही मोर हो जाता है । इस गीत में साहिर ने दो सहेलियों की आपसी छेड़छाड़, उनके प्रेमियों का बरसात में ना आना और उसके कारण उनके तड़पने का सुन्दर वर्णन किया है.. "पवन झकोरे तन पर तीर समान लगते हैं" और "रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसने में जिया मीन समान तडपे" एक कोमल लेकिन मन को तृप्त करने वाली शब्द रचना है, और संगीत के तो क्या कहने... रौशन साहब मानो बरसती बूँदों का अपनी धुन और साजों से एक माहौल रच देते हैं और श्रोता सुनते-सुनते स्वतः को बाहर बरामदे में भीगता हुआ पाता है.. । इस गीत में कमल बारोट की आवाज है, जिन्होंने एकल गीत कम ही गाये हैं, लेकिन युगल में लता, आशा, सुमन, महेन्द्र कपूर और रफ़ी आदि के साथ काफ़ी गीत गाये हैं । इनका एक और उल्लेखनीय गीत है पारसमणि फ़िल्म का "हँसता हुआ नूरानी चेहरा..", उनकी आवाज एक विशिष्ट प्रकार की ध्वनि लिये हुए है, जो कम ही सुनने में आती है...। इसी प्रकार सुमन कल्याणपूर को एक बार लता का विकल्प कहा गया था, उन्होंने गीत भी वैसे ही गाये हैं और कहीं-कहीं तो सुमन को सुनकर लता का आभास भी होता है, जैसे "अजहुँ ना आये बालमा, सावन बीता जाये" अथवा "जूही की कली मेरी लाड़ली" जैसे गीतों में... । बहरहाल... इस गीत को यहाँ क्लिक करके सुनिये और भीगने का आनन्द लीजिये...
(प्रस्तुत चित्र एक दुर्लभ चित्र है जिसमें तलत महमूद, रफ़ी, किशोर, मुकेश, जी.एम.दुर्रानी, मीना कपूर, गीता दत्त, कमल बारोट, मुबारक बेगम इत्यादि दिखाई दे रहे हैं - चित्र www.talatmahmood.net से लिया गया है)

Wednesday, June 20, 2007

बीती ना बिताई रैना.. : परिचय

गुलजार और आर.डी.बर्मन की अदभुत जोडी़ ने हमें कई-कई मधुर गीत दिये हैं, उन्हीं में से यह एक गीत है । शब्दों में गुलजार की छाप स्पष्ट नजर आती है (उलझाव वाले शब्द जो ठहरे) और गीत की धुन पंचम दा ने बहुत ही उम्दा बनाई है । गीत की खासियत लता मंगेशकर के साथ भूपेन्द्र की आवाज है, लता के साथ भूपेन्द्र ने जितने भी गीत गाये हैं सभी के सभी कुछ खास ही हैं (जैसे "किनारा" फ़िल्म का "मेरी आवाज ही पहचान है" या "मौसम" का दिल ढूँढता है आदि), वही जादू इस गीत में भी बरकरार है, फ़िल्म है "परिचय"..

लता की जादुई आवाज से गीत शुरू होता है..
बीती ना बिताई रैना
बिरहा की जाई रैना
भीगी हुई अँखियों ने लाख बुझाई रैना..
बीती ना बिताई रैना

(१) बीती हुई बतियाँ कोई दोहराये
भूले हुए नामों से कोई तो बुलाये
चाँद..चाँद.. ओ..ओ..ओ..
अचानक भूपेन्द्र की धीर-गम्भीर आवाज उभरती है
चाँद की बिन्दी वाली, बिन्दी वाली रतियाँ
जागी हुई अँखियों में रात ना आई रैना...
बीती ना बिताई रैना....
अगला अन्तरा भूपेन्द्र की आवाज में शुरु होता है...
(२) युग आते हैं, और युग जायें
छोटी-छोटी यादों के पल नहीं जायें...

अब फ़िर लता की आवाज -
झूठ से काली लागे, लागे काली रतियाँ
रूठी हुई अँखियों में लाख मनाई रैना..
बीती ना बिताई रैना...

इस प्रकार यह क्लासिकल गाना हमें एक मोड़ पर लाकर छोड़ देता है । "चाँद की बिन्दी वाली रात" हो या "रूठी हुई आँखों में बिताई हुई लम्बी रात" हो, गुलजार हमेशा कुछ विचित्र से विशेषणों का उपयोग करते हैं, जो अच्छे भी लगते हैं चाहे वह "महकती हुई आँखों की खुशबू" (खामोशी) हो, या फ़िर "कुछ सुस्त कदम रस्ते, कुछ तेज कदम राहें" (आँधी) हो, या फ़िर "जिगर से बीडी जलाने की" (ओंकारा) बात हो, गुलजार सदा ही विशिष्ट दिखाई देते हैं । लोगों को हमेशा लगता रहा है कि आर.डी.बर्मन का सर्वश्रेष्ठ हमेशा गुलजार के साथ काम करते हुए आता था, सही भी है । इस गीत में एक जगह पर फ़िल्म में संजीव कुमार खाँसते-खाँसते रुक जाते हैं और उस वक्त उनकी बेटी जया भादुडी गीत पूरा करती हैं, यह खाँसी की आवाज किसी रिकॉर्ड पर अंकित है । संजीव कुमार और जया भादुडी़ किस ऊँचे कैलिबर के कलाकार हैं और उनके अभिनय की रेंज इस उदाहरण से स्पष्ट होती है कि, "परिचय" में वे जया भादुडी के पिता बने हैं, "कोशिश" में दोनों गूँगे-बहरे पति-पत्नी बने हैं, "शोले" में ससुर और बहू के रूप में, "नौकर" में प्रेमी-प्रेमिका के रोल में, "सिलसिला" में दुविधाग्रस्त विपरीत जोडी़ के रूप में... तात्पर्य यह कि यह जोडी़ किसी भी रूप में हमारे सामने आई हो, इन्होंने अपने अभिनय से हमें चमत्कृत ही किया है... कितना मुश्किल होता होगा ऐसा अभिनय कि अलग-अलग फ़िल्मों में एक ही हीरोईन के साथ विभिन्न प्रकार के रोल करना, न सिर्फ़ करना साथ में दर्शकों को विश्वास भी दिलाना, कहने की जरूरत नही कि इसमे संजीव-जया सफ़ल रहे हैं । हालांकि परिचय में संजीव कुमार "गेस्ट रोल" में ही हैं, लेकिन फ़िर भी उतने से वक्फ़े में फ़िल्म पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं... गुलजार साहब के पसन्दीदा कलाकारों में संजीव कुमार और विनोद खन्ना रहे हैं, और इनके निर्देशन में दोनों ने बेहतरीन काम किया है । बहरहाल.. इस मधुर गीत को आप यहाँ क्लिक करके सुन सकते हैं ।

महाकालेश्वर मन्दिर में धर्म के नाम पर...

बारह ज्योतिर्लिंगों में से सबसे बडे़ आकार वाले और महत्वपूर्ण "महाकालेश्वर" मन्दिर का ऑडिट सम्पन्न हुआ । यह ऑडिट सिंहस्थ-२००४ के बाद में मन्दिर को मिले दान और उसके रखरखाव के बारे में था । इसमें ऑडिट दल को कई चौंकाने वाली जानकारियाँ मिलीं, दान के पैसों और आभूषणों में भारी भ्रष्टाचार और हेराफ़ेरी हुई है । ऑडिट दल यह जानकर आश्चर्यचकित हो गया कि मन्दिर को भेंट में मिले आभूषणों का वजन नहीं किया जाता, ऐसे में ऑडिट कैसे किया जाये ? ऑडिट टीम ने पहले ही दिन एक बडा़ घपला पकड़ लिया जिसमें एक रसीद कट्टे में 7000 रुपये को 700.00 रुपये कर दिया गया था, इसके लिये एक जीरो को दशमलव बना दिया गया और आगे एक जीरो लगा दिया गया, ऐसा शून्य वाली कई रसीदों में पाया गया, कभी 51 को 5/- बना दिया गया, कभी 101 को 10/- बना दिया है, कुछ रसीदों की कार्बन कॉपी को रबर से ही मिटा दिया गया है, ऐसे में यह भी नहीं पता कि उस रसीद में कितना दान मिला था । ऑडिट दल को पहले ही दिन लगभग 65000 रुपये की हेराफ़ेरी के बारे में पता चल गया जो कि मन्दिर कर्मचारियों ने हजम कर ली है । इसी प्रकार सोने के पाँच आभूषणों की रसीद है, लेकिन स्टॉक रजिस्टर में उसकी आमद दर्ज नहीं है, सात चाँदी के छत्र मिलाकर कुल २० आभूषण रसीद पर तो हैं, लेकिन स्टॉक में नहीं हैं । दान लेने वाले कर्मचारियों ने समझदारी (?) दिखाते हुए किसी भी आभूषण की रसीद पर उसका वजन अंकित नहीं किया है, ऐसे में अन्दाजा लगाना भी मुश्किल है कि वह आभूषण १०० ग्राम का था या १० ग्राम का ? ऑडिट दल को सन्देह है कि वजन नहीं लिखने के पीछे कारण यह है कि बाद में दूसरे हल्के कम वजन के आभूषणों को उसकी जगह रखा जा सके, बिछिया, नाग, छत्र, चाँदी के पाट और न जाने क्या-क्या, किसी भी रसीद पर वजन अंकित नहीं है । ऐसे ही हमारे दानवीर लोग भी हैं, दान देने वाले ने कहीं सिर्फ़ अपना नाम और कहीं सिर्फ़ जगह का नाम लिखवाया है, जैसे रुपये १०,००० रामलाल की ओर से अथवा सोने के कुंडल जोधपुर वालों की ओर से आदि... अब ऑडिट वाले यदि पता भी करना चाहें कि वाकई दानदाता ने कितनी रकम दी थी, तो वे कैसे पता करें, यानी कि पूरा का पूरा माल खल्लास । कई कर्मचारियों का तबादला हो गया, कई रिटायर हो गये, किस रसीद पर किसके हस्ताक्षर हैं, कौन-कौन से कर्मचारी उस वक्त मन्दिर काऊंटर पर तैनात थे, किसी को कुछ भी पता नहीं... प्रथम दृष्टया यह एक बडे घोटाले की ओर संकेत करता है । मजे की बात यह है कि एक "साम्प्रदायिक" (?) सरकार ने पहली बार प्रदेश के १२५ मन्दिरों का ऑडिट करवाने का निर्णय लिया और इसके लिये बाकायदा गजट नोटिफ़िकेशन जारी किया गया और महाकालेश्वर के दरबार से ही इसकी शुरुआत की, अब आगे-आगे देखिये होता है क्या ? जाँच दल अब तक कलेक्टर को इस सम्बन्ध में १६ पत्र लिख चुका है और मन्दिर प्रशासक ने जो समिति बनाई है, उसमें अकाऊंट विभाग के कर्मचारी भी हैं, जबकि ऑडिट वालों ने इन्ही कर्मचारियों को सन्देह के दायरे में रखा है, बात साफ़ है कि "भारत की महान परम्परा" (!) के अनुसार सिर्फ़ लीपापोती कर दी जायेगी, होना-जाना कुछ नहीं है । जैसा कि तिरुपति मन्दिर के लड्डू घोटाले के समय हुआ था, जिन भाईयों को जानकारी नहीं है उन्हें बता दूँ कि कुछ वर्षॊं पूर्व प्रसिद्ध तिरुपति मन्दिर में भी एक महाकाय घोटाला पकड़ में आया था । हुआ यूँ था कि तिरुपति में प्रसाद के रूप में एक किलो का विशाल लड्डू भक्तों को बेचा जाता है, ताकि वे अपने घर ले जा सकें और दूसरों में बाँट सकें, यह लड्डू सूखे मेवों, काजू, किशमिश आदि से बनता है और महंगा होता है (लागत में) और वह भक्तों को "नो प्रॉफ़िट नो लॉस" पर बेचा जाता है । अब भारतीयों का उम्दा भ्रष्टाचारी दिमाग देखिये - एक किलो के लड्डू को पापियों ने ९०० ग्राम या ९५० ग्राम का कर दिया और उस ५०-१०० ग्राम में से काजू, बदाम, पिस्ते बेच खाये, और यह वर्षों से चल रहा था, अब सोचिये कितने करोडों के वारे-न्यारे कर लिये गये होंगे वह भी धर्म और आस्था के नाम पर । कोई भक्त इतना नीच नहीं सोच सकता कि चलो लड्डू को तुलवाकर देख लें.. इसका फ़ायदा दुराचारियों ने उठाया और लाखों-करोडों रुपये सिर्फ़ लड्डू के वजन में थोडा़ सा फ़र्क करके खा लिये । देखा आपने उर्वर दिमाग ! यहाँ भ्रष्टाचार रग-रग में इतना समा चुका है कि करने वाले को शर्म आना तो दूर वह रिश्वत को अपना हक समझने लगा है । लोगबाग मन्दिर के चन्दे के पैसे खा सकते हैं, श्मशान घाट की लकडि़यों में कमीशन खा सकते हैं, विकलांग बच्चों की बैसाखियों और ट्रायसिकल में रिश्वत खा सकते हैं, मध्यान्ह भोजन योजना में गरीब बच्चों का दलिया और तेल खा जाते हैं, सरकारी अस्पतालों में रोगी कल्याण समितियों से गरीबों को मिलने वाली मुफ़्त दवा बेच खाते हैं.. गरज कि जिसे जहाँ मौका मिल रहा है सिर्फ़ खा रहा है...सरकार का तो डर पहले से ही नहीं था और अब भगवान का डर भी खत्म हो गया है, क्योंकि उसके दलाल चारों तरफ़ फ़ैले हुए हैं जो पापियों से कहते हैं "इतना दान कर दो.. तो इतने पाप धुल जायेंगे", "यदि एक बार भंडारा करवा दिया तो तुम्हें पुण्य मिलेगा", "नवरात्रि में विशाल कन्या भोज करवा दो, भ्रूण हत्या का पाप कम लगेगा"...मेरे मत में मन्दिरों में बढती दानदाताओं की भीड़ का अस्सी प्रतिशत हिस्सा उन लोगों का है जो भ्रष्ट, अनैतिक और गलत रास्तों से पैसा कमाते हैं और फ़िर अपनी अन्तरात्मा पर पडे बोझ को कम करने के लिये भगवान को भी रिश्वत देते हैं... किसी पण्डे/पुजारी/महाराज आदि नें कभी यह नहीं कहा कि "बच्चा तूने बहुत पाप किये हैं, जा कुछ दिन जेल में रहकर आ..." वह दलाल यही कहेगा कि भगत तू सोने का मुकुट तिरुपति को दान कर और मेरी दक्षिणा दे दे बस, तेरा काम (!) हो जायेगा...। इस दृष्टि से यदि देखा जाये तो महाकालेश्वर मन्दिर में हुई धाँधली के निहितार्थ हैं "चोरों को पड़ गये मोर"... एक ने माल कमाया, उससे भगवान को खुश (?) करने के लिये थोडा़ सा माल उधर सरकाया, उस माल को दूसरा चोर ले गया (यानी "मनी सर्कुलेशन", जो "बाजार" को मजबूत बनाता है)... यदि देश भर के मन्दिरों को दान देने वाले महापुरुषों और उन मठों, मन्दिरों और आश्रमों की वास्तविक आय और उसके स्रोत का पता लगाने की कोशिश की जाये, तो ऐसी सडाँध उठेगी कि...

Tuesday, June 19, 2007

उज्जैन भी महानगर बन गया !

मध्यप्रदेश का हमारा धार्मिक शहर उज्जैन भी अब महानगरों की होड़ में आ गया है... ना, ना, यह न समझिये कि यहाँ कोई बडी़ इंडस्ट्री लगने वाली है या कोई मॉल खुलने वाला है, दरअसल उज्जैन में भी पहली बार अश्लील MMS पकडाया है, जो खालिस उज्जैन के लडकों द्वारा अपने मित्रों के लिये बनाया गया है और एडिटिंग, डबिंग से लेकर "काम" करने वाले और वालियाँ एकदम निखालिस उज्जैन के, और यहाँ हमें पता ही नहीं था कि उज्जैन के युवकों में इतनी प्रतिभा कूट-कूट कर भरी है । लडकी भी एक सम्भ्रान्त परिवार की है और लडके (चार हैं) भी एक से बढकर एक "कुलदीपक" । अब लडकी कह रही है कि मेरा चेहरा लगाकर यह सीडी और MMS बनाई गई है (क्या बात है ! सभी लोग ऐसा ही कहते हैं), और लडके कहते हैं कि "मुझे तो मेरे दोस्त ने भेजा था मैं कुछ नहीं जानता", क्या नौनिहाल हैं, ना बाप को पता है कि उनके लडके कैमरे वाले मोबाईल से क्या गुल खिला रहे हैं और ना माँओं को पता है कि उनकी लडकियाँ कहाँ-कहाँ जाती हैं, क्या सीन है... इसीलिये मैं उज्जैन के महानगर बनते जाने पर धीरे-धीरे ही सही गौरव (?) महसूस करने लगा हूँ, वरना आज तक तो इस हीनभावना से ही ग्रस्त रहता था कि हमारा छोटा सा शहर इन्दौर के कारण विकसित नहीं हो पा रहा है । इन्दौर को सारी सुविधायें मिलती हैं उज्जैन को बारह साल में एक बार (जब कुम्भ मेला लगता है तब), लेकिन मुझे अब जरा भी मलाल नहीं हो रहा है, उज्जैन में भी अश्लील MMS बनने लगे हैं, डकैतियाँ पडने लगीं है, महान धर्मनिरपेक्ष सोहराब भाई तो उज्जैन जिले के ही हैं, गरज यह कि हम भी छाती फ़ुला कर कह सकते हैं कि "ऐ..हम भी बडे शहर में रहते हैं, गाँव वाला मत समझ लेना हाँ.."

Sunday, June 17, 2007

मैनेजमेंट के दो मजेदार किस्से....

दो वर्ष तक नौकरी करने के बाद एक व्यक्ति को समझ में आया कि इन दो सालों में ना कोई प्रमोशन, ना ट्रांसफ़र, ना कोई तनख्वाह वृद्धि, और कम्पनी इस बारे में कुछ नहीं कर रही है.. उसने फ़ैसला किया कि वह HR मैनेजर से मिलेगा और अपनी बात रखेगा... लंच टाईम में वह HR मैनेजर से मिला और उसने अपनी समस्या रखी.. HR मैनेजर बोला, मेरे बच्चे तुमने इस कम्पनी में एक दिन भी काम नहीं किया है... कर्मचारी भौंचक्का हो गया और बोला - ऐसा कैसे.. पिछले दो वर्ष से मैं यहाँ काम कर रहा हूँ.. HR मैनेजर बोला - देखो मैं समझाता हूँ...
मैनेजर - एक साल में कितने दिन होते हैं ?
कर्मचारी - 365 या 366
मैनेजर - एक दिन में कितने घंटे होते हैं ?
कर्मचारी - 24 घंटे
मैनेजर - तुम दिन में कितने घंटे काम करते हो ?
कर्मचारी - सुबह 8.00 से शाम 4.00 तक, मतलब आठ घंटे..
मैनेजर - मतलब दिन का कितना भाग तुम काम करते हो ?
कर्मचारी - (हिसाब लगाता है) 24/8 = 3 एक तिहाई भाग
मैनेजर - बहुत बढिया..अब साल भर के 366 दिनों का एक-तिहाई कितना होता है ?
कर्मचारी - (???) 366/3 = 122 दिन..
मैनेजर - तुम "वीक-एण्ड" पर काम करते हो ?
कर्मचारी - नहीं
मैनेजर - साल भर में कितने वीक-एण्ड के दिन होते हैं ?
कर्मचारी - 52 शनिवार और 52 रविवार, कुल 104
मैनेजर - बढिया, अब 122 में से 104 गये तो कितने बचे ?
कर्मचारी - 18 दिन
मैनेजर - एक साल में दो सप्ताह की "सिक लीव" मैं तुम्हें देता हूँ, ठीक ?
कर्मचारी - जी
मैनेजर - 18 में से 14 गये, तो बचे 4 दिन, ठीक ?
कर्मचारी - जी
मैनेजर - क्या तुम मई दिवस पर काम करते हो ?
कर्मचारी - नहीं..
मैनेजर - क्या तुम 15 अगस्त,26 जनवरी और 2 अक्टूबर को काम करते हो ?
कर्मचारी - नहीं..
मैनेजर - जब तुमने एक दिन भी काम नहीं किया, फ़िर किस बात की शिकायत कर रहे हो भाई ?
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ऐसे ही एक बार एक कम्पनी में लालू, आडवाणी और जया अम्मा काम कर रही होती हैं... लालू को खयाल आता है कि मुझे तनख्वाह में वृद्धि नहीं मिली, वे शिकायत करते हैं.. HR मैनेजर कहता है कि इसमें पक्षपात की कोई बात नहीं है, इन दोनो ने परीक्षा पास की है तभी इन्हें प्रमोशन मिला है । लालू कहते हैं कि फ़िर से परीक्षा ली जाये, मैं भी परीक्षा दूँगा.. HR मैनेजर कहता है.. ठीक है, सही उत्तर दोगे तभी प्रमोशन मिलेगा... पहला सवाल अंग्रेजी भाषा से है -
आडवाणी, तुम बताओ "कैट" की स्पेलिंग क्या है ?
आडवाणी - CAT
जया अब तुम बताओ - "मैन" की स्पेलिंग क्या है ?
जया - MAN
ठीक है, लालू अब तुम बताओ - "चेकोस्लोवाकिया" की स्पेलिंग क्या है ?
लालू - ???????
लालू फ़िर पक्षपात की शिकायत करते हैं... HR मैनेजर कहता है कि इस बार जीव विज्ञान की परीक्षा ले लेते हैं, ठीक है लालू.. लालू सोचते हैं कि भैंसों के बारे में मुझे बहुत ज्ञान है, देख लेंगे...
HR मैनेजर पूछता है - आडवाणी, बताओ घोडे़ के कितने पैर होते हैं ?
आडवाणी - चार
जया तुम बताओ - मछली कहाँ रहती है ?
जया - पानी में...
HR मैनेजर, बढिया... अब लालू तुम "हिप्पोपोटेमस" की आवाज निकालकर बताओ...
लालू - ???????
लालूजी उच्चाधिकारियों से एक बार फ़िर शिकायत करते हैं, HR मैनेजर कहता है कि यह अन्तिम बार है इस बार का विषय होगा - इतिहास । लालू सहमत हो जाते हैं ।
HR मैनेजर पूछता है - आडवाणी, पानीपत का युद्ध कहाँ हुआ था ?
आडवाणी - पानीपत में
HR - जया, बताओ उस युद्ध में कितने सैनिक मारे गये थे ?
जया - लगभग दो लाख...
HR मैनेजर - लालू जी उन सैनिकों के नाम लिखो...
लालूजी बेहोश हो जाते हैं...

दोनो कहानियों का सबक - यदि मैनेजमेंट चाहे तो वह कुछ भी कर सकता है...

दो मजेदार चुटकुले...

पहला -
शादी से पहले -

मर्द - आहा..अन्ततः.. कितना मुश्किल था इन्तजार करना...
औरत - क्या तुम मुझे छोड़ सकते हो ?
मर्द - नहीं..नहीं.. तुमने ऐसा सोचा भी कैसे ?
औरत - क्या तुम मुझे प्यार करते हो ?
मर्द - बिलकुल, बिलकुल
औरत - क्या तुमने कभी मुझे धोखा दिया है ?
मर्द - नहीं तो..ऐसा तुम क्यों पूछ रही हो ?
औरत - ठीक..क्या तुम मुझे किस करोगे ?
मर्द - हाँ, हाँ
औरत - क्या तुम मुझे पीटोगे ?
मर्द - नहीं, नहीं, मैं उस तरह का आदमी नहीं हूँ..
औरत - क्या मैं तुम पर विश्वास कर सकती हूँ ?
मर्द - हाँ..

और शादी के बाद -
कृपया पूरा मैटर दोबारा नीचे से ऊपर की ओर पढें...
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दूसरा -
चार दोस्त अपनी-अपनी पालतू बिल्लियों के गुणगान बखान कर रहे थे । उनमें से एक इंजीनियर था, दूसरा अकाऊंटेण्ट, तीसरा केमिस्ट था और चौथा सरकारी कर्मचारी । उन लोगों ने अपनी बिल्लियों के नाम भी अपने पेशे के हिसाब से रखे थे.. तय हुआ कि किसकी बिल्ली अधिक प्रतिभाशाली है साबित किया जाये...
इंजीनियर ने अपनी बिल्ली को पुकारा - "टी-स्क्वेयर" यहाँ आओ..
बिल्ली आई, उसने टेबल पर एक कागज बिछाया, उस पर पेन से एक त्रिकोण और चतुर्भुज बनाया..
बाकी के तीनों मित्र बहुत प्रभावित हुए, उन्होंने माना कि वाकई बिल्ली प्रतिभाशाली है...
फ़िर अकाऊंटेण्ट ने पुकारा - "स्प्रेडशीट" अपना काम करो..
बिल्ली आई..किचन में जाकर १२ बिस्कुट लाई.. उन बिस्किटों के बराबर-बराबर चार हिस्से करके तीन-तीन बिस्कुट अलग-अलग रखे..
तीनों मित्र मान गये कि वाह.. क्या प्रतिभाशाली बिल्ली है..
केमिस्ट ने पुकारा - "मिक्स्चर" अपना काम बताओ..
बिल्ली किचन में गई, दराज से दूध की बोतल निकाली, ठीक एक पाव दूध गिलास में लिया फ़िर पानी लेकर बिलकुल ठीक सौ ग्राम पानी उसमें मिलाया... बगैर एक भी बूँद छलकाये... सभी दोस्त उस बिल्ली से बहुत प्रभावित हुए..
अब नम्बर आया सरकारी कर्मचारी का, उसने भी पुकारा - "कॉफ़ी-ब्रेक" अपना काम दिखाओ..
बिल्ली टेबल पर कूदी, सारे बिस्किट खा लिये, दूध एक झटके में पी लिया, त्रिभुज-चतुर्भुज वाले कागज से हाथ पोंछे... बाकी तीनों बिल्लियों को घूरकर देखा.. फ़िर उसने शिकायत की इस काम के दौरान वह घायल हो गई है और मालिक पर काम की स्थितियाँ ठीक न होने का आरोप लगाकर इस नुकसान की भरपाई की माँग की... और "कैजुअल लीव" लेकर आराम करने चली गई...
बताओ कौन सी बिल्ली अधिक प्रतिभाशाली है ?
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Saturday, June 16, 2007

मर्दों के लिये रोमांस गाईड

रोमांस की दुनिया में मर्दों के लिये एक ही मुख्य नियम होता है - औरत को खुश रखें ।
लेकिन दरअसल यह एक खेल है जिसमें मर्दों को कुछ अंक मिलते हैं उनके कामों के अनुसार औरत जो पसन्द करती है वह आपने किया तो आपको कुछ पॉजिटिव अंक मिलेंगे, जो वह नापसन्द करती है वह करने पर आपको निगेटिव अंक मिलेंगे ही.. लेकिन यदि आपने वह किया जो वह पहले से अपेक्षा करती है, तो कोई अंक नहीं मिलेगा... सॉरी.. यही नियम है...
अब इन अंकों को प्राप्त करने हेतु मर्दों के लिये एक गाईडलाईन पेश है, ताकि वे अपना काम बखूबी अंजाम दे सकें -

साधारण कार्य -
(१) आप बिस्तर बिछाते हैं (+10)
(२) बिस्तर बिछाते हैं, लेकिन तकिये के गिलाफ़ भूल जाते हैं (-25)
(३) बिस्तर की चादर पर सलवटें हैं (-30)
(४) उसकी पसन्द की चीज लेने जाते हैं (+5), बारिश में जाते हैं (+8), लेकिन बीयर लेकर वापस आते हैं (-15)
(५) रात को एक शंकास्पद आवाज आने पर बाहर देखने जाते हैं (0)
(६) शंकास्पद आवाज आने पर लोहे की रॉड से हमला करते हैं (+5)
(७) पता चलता है कि मरने वाली उसकी पालतू बिल्ली है (-20)

सामान्य शिष्टाचार -
(१) पार्टी में पूरे समय उसके पास ही खडे़ रहते हैं (0)
(२) पार्टी प्रारम्भ होने के कुछ देर बाद ही मित्र से बातें करने लगते हैं (-5), मित्र का नाम रीटा है (-10), रीटा एक डांसर है (-20), और वह बहुत ही खूबसूरत है (-80)

उसका जन्मदिन -
(१) आप जन्मदिन भूल जाते हैं (-50,000)
(२) उसे जन्मदिन पर डिनर पर ले जाते हैं (0)
(३) उसकी पसन्द की डिश मंगवाते हैं (+5)
(४) अपनी पसन्द की डिश मंगवाते हैं (-10)
(५) होटल में टीवी पर क्रिकेट चल रहा है (-10) और आप उसे देखते भी हैं (-30)

उसके सवालों पर -
(१) क्या मैं मोटी लग रही हूँ ?
आपकी चुप्पी पर (-10), हिचकिचाने पर (-20), कहाँ से ? पूछने पर (-50), कोई और उत्तर देने पर (-40)
(२) मैं क्या पहनूँ ?
कुछ भी पहनो (-50), वो ऑरेंज कलर की बेकार साडी भर मत पहनो (-20), मैं क्या बताऊँ ? (-100)

उसके द्वारा किसी समस्या को बताने पर -
बडी़ गम्भीरता से दस मिनट तक सुनने पर (0), गम्भीरता से एक घंटा सुनने पर (+100), इस एक घंटे में टीवी की ओर नजर तक ना घुमाना (+250), उसकी समस्या सुनते-सुनते झपकी लग जाना (-10000)

तो भाईयों... इस संक्षिप्त गाईड से आपको अन्दाजा तो हो ही गया होगा कि रोमांस में सफ़ल होने के लिये आप कैसे अपने अंक बटोर सकते हैं, तो लग जाईये आज ही से...। कागज काले करने के नशे और टीवी की गन्दी लत के कारण मैं जन्मदिन भूलकर अपने लिये (-50000 और -10000) अंक बटोर चुका हूँ, जिसकी भरपाई में काफ़ी वक्त लगेगा, लेकिन मेरे अन्य भाई-बन्धु सावधान हो जायें, इसलिये यह गाईड पेश कर दी है...
यह अपने मर्द मित्रों को पढवाईये हँसने के लिये और महिलाओं को पढवाईये जोर से हँसने के लिये...

Friday, June 15, 2007

सोनिया की नई कठपुतली

आखिरकार इस महान देश को राष्ट्रपति पद का / की उम्मीदवार मिल ही गया, महीनों की खींचतान और घटिया राजनीति के बाद अन्ततः सोनिया गाँधी ने वामपंथियों को धता बताते हुए प्रतिभा पाटिल नामक एक और कठपुतली को उच्च पद पर आसीन करने का रास्ता साफ़ कर लिया है, दूसरी कठपुतली कौन है यह तो सभी जानते हैं । इस तरह सोनिया के दोनो हाथों मे लड्डू हो गये हैं, एक जेब में प्रधानमन्त्री और दूसरी में राष्ट्रपति । इन्दिरा गाँधी ने भी जैल सिंह को इसीलिये राष्ट्रपति बनवाया था क्योंकि वे सार्वजनिक तौर पर कह चुके थे कि "मुझे मैडम की चप्पलें उठाने में भी कोई शर्म नहीं है"...। कलाम साहब तो उसी दिन से सबको खटकने लगे थे, जब उन्होंने "लाभ के पद" वाले मुद्दे पर सरकार को "डंडा" कर दिया था, हालांकि उन्होंने भी अफ़जल की फ़ाँसी रोककर अपनी गोटियाँ चलने की कोशिश की थी, लेकिन उनका गैर राजनैतिक होना आडे़ आ गया । प्रतिभा पाटिल का नाम अचानक नहीं आया लगता, क्योंकि हमारे यहाँ सत्ता प्रतिष्ठान हमेशा ऐसा राष्ट्रपति पसन्द करता है जो "यस मैन" हो, इसलिये प्रणब मुखर्जी की सम्भावना तो वैसे ही कम हो गई थी (फ़िर महारानी को यह भी याद था कि उनके पति को प्रधानमन्त्री बनाने का विरोध प्रणब बाबू ने किया था), अर्जुनसिंह तो अति-राजनीति का शिकार हो गये लगते हैं और काँग्रेस को अभी आरक्षण की फ़सल काटना बाकी है, इसलिये शायद उनका नाम आगे नहीं बढाया गया (यदि अर्जुनसिंह खडे होते तो शेखावत की जीत पक्की हो जाती, क्योंकि अर्जुनसिंह के कांग्रेस में ही इतने दुश्मन हैं कि वे पार्टी लाईन से हटकर शेखावत को वोट देते), शिवराज पाटिल को वामपंथियों ने समर्थन नहीं दिया, क्योंकि वे मोदी को "वाजिब डंडा" करने में असफ़ल रहे । कर्ण सिंह "सॉफ़्ट हिन्दुत्ववादी" (?) माने जाते हैं इसलिये कट गये, सिर्फ़ रहस्य है कि सुशील कुमार शिन्दे का नाम क्यों कटा, जबकि वे तो दलित भी हैं और मायावती से सोनिया पींगें बढा़ चुकी हैं । शायद महारानी को प्रतिभा पाटिल का नाम इसलिये आगे बढाना पडा़ ताकि "राजस्थान की बहू" होने के नाते शेखावत के वोट काटे जा सकें (हकीकत तो यही है कि यूपीए भैरोंसिंह शेखावत के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए आतंकित है), खैर जो भी हो अब देखना यही है कि महिला आरक्षण के नाम पर नौटंकी करने वाले सारे दल क्या-क्या खेल खेलते हैं, कुछ अनहोनी नहीं हुई तो पहली महिला राष्ट्रपति (या पत्नी ?) बनना तय है ।

Thursday, June 14, 2007

ताज : दूध का दूध पानी का पानी करें !

(१) प्रोफ़ेसर पी.एन.ओक की मूल मराठी पुस्तक (जो कि इन्दिरा गाँधी द्वारा प्रतिबन्धित कर दी गई थी) की PDF फ़ाईल यहाँ क्लिक करके प्राप्त की जा सकती है (साईज 25 MB है) ।
(२) प्रोफ़ेसर पीएन ओक के सवालों का हिन्दी अनुवाद यहाँ पर उपलब्ध है ।
(३) लाल किले और ताजमहल सम्बन्धी तस्वीरों वाले प्रमाण स्टीफ़न नैप की साईट पर (यहाँ क्लिक करें) उपलब्ध हैं ।
ताजमहल पर जो देश भर में नौटंकी चल रही है वह एक अलग विषय है । ताजमहल सच में ताजमहल है या "तेजोमहालय" नामक एक शिव मन्दिर, इस बात पर भी काफ़ी बहस हो चुकी है । इस मुद्दे को लेकर सरकार, वामपंथियों और धर्मनिरपेक्षतावादियों (?) से कुछ प्रश्न हैं -
(अ) ताजमहल के पुरातात्विक निर्माणों का C-14 (कार्बन-१४) टेस्ट करने में क्या आपत्ति है ? क्यों नहीं केन्द्र सरकार या ASI किसी विशेषज्ञ लेबोरेटरी (देशी और विदेशी दोनों) से ताज के कुछ हिस्सों का कार्बन-१४ टेस्ट करवाती ?
(ब) ताजमहल में जो कमरे वर्षों से बन्द हैं, उन्हें किसी निष्पक्ष संस्था के साये में खोलकर देखने में क्या आपत्ति है ? कुछ कमरों को तो दीवार में चुनवा दिया गया है, उन्हें खोलने में क्या आपत्ति है ?
पीएन ओक एवं एक निष्पक्ष व्यक्ति स्टीफ़न नैप के शोधों को मात्र बकवास कहकर खारिज नहीं किया जा सकता । ताजमहल की कुछ मंजिलें सन १९६० तक खुली थीं लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद उसे बन्द कर दिया गया, उसे पुनः खोलने के लिये हमारे धर्मनिरपेक्ष बन्धु क्यों प्रयत्न नहीं करते ? दरअसल इन लोगों के मन में यह आशंका है कि कहीं उन बन्द कमरों से कोई हिन्दू मूर्तियाँ निकल आईं या कोई शिलालेख निकल आया जो यह साबित करता हो कि ताजमहल का निर्माण उसके बताये हुए वर्ष से कहीं पहले हुआ था, तो सरकार के लिये एक नया सिरदर्द पैदा हो जायेगा और संघ परिवार को बैठे-बिठाये एक मुद्दा मिल जायेगा, लेकिन सिर्फ़ इस आशंका के चलते इतिहास के एक महत्वपूर्ण पन्ने को जनता से दूर नहीं रखा जा सकता । जब डायनासोर के अंडे की उम्र पता की जा सकती है तो फ़िर ताज क्या चीज है ? और हमारे महान इतिहासकारों के पास उस जमाने के कई कागजात और दस्तावेज मौजूद हैं, फ़िर जरा सा शोध करके ताजमहल को बनवाने के लिये शाहजहाँ के दरबार का हुक्मनामा, उसकी रसीदें इत्यादि, सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत करें, इससे दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा और "तेजोमहालय" के समर्थकों का मुँह हमेशा के लिये बन्द हो जायेगा । ऊपर उल्लेखित मात्र दोनों कृत्यों से ही असलियत का पता चल सकता है फ़िर केन्द्र सरकार ये दोनो काम क्यों नहीं करवाती ?

Wednesday, June 13, 2007

ताजमहल पर जारी मूर्खता

ताजमहल को लेकर हमारे देश में एक मुहिम चलाई जा रही है, एसएमएस भेजो, ईमेल करो, रैली निकालो, तस्वीरें छपवाओ, अपीलें जारी करो, और भी ना जाने क्या-क्या । जिससे कि ताज को सात आश्चर्यों में शामिल करवाया जा सके । अव्वल तो यह शायद ही हो, और मान लो चलो ताज सात आश्चर्यों में आ भी गया, तो उससे क्या होगा ? समर्थक कहते हैं - इससे पर्यटन बढेगा, ताज के संरक्षण के लिये विदेशी मदद मिलेगी, देश का गौरव बढेगा... आदि-आदि...
एक बात समझ में नहीं आती कि यदि ताज "सेवन वंडर्स" में नहीं आ पाया तो पर्यटन कैसे घटेगा, जबकि सरकारी संस्थायें गला फ़ाड़-फ़ाड़कर हमें बता रही हैं कि भारत में पर्यटन पच्चीस प्रतिशत की दर से बढ रहा है, फ़िर ताजमहल उसमें कितना बदलाव ला पायेगा ? क्या विदेशी पर्यटन पचास प्रतिशत तक पहुँच जायेगा ? या विदेशी लोग ताज देखने आना बन्द कर देंगे ? अरे, जब खजुराहो जैसी घटियातम सुविधाओं के बावजूद वे वहाँ जाते हैं तो ताजमहल तो वे देखेंगे ही चाहे वह "अजूबों" में शामिल हो या ना हो । दूसरी बात, ताज के संरक्षण के लिये विदेशी मदद की । जो लाखों मूर्ख रोजाना करोडों एसएमएस भेज रहे हैं, यदि उनसे सिर्फ़ एक रुपया प्रति व्यक्ति लिया जाये (SMS के तीन रुपये लगते हैं) तो भी करोडों रुपया एकत्रित होता है जो ताज के संरक्षण के लिये काम में लिया जा सकता है, और विदेशी मदद मिल भी गई तो क्या कर लेंगे ? विदेशी मदद तो झुग्गी-झोंपडी हटाने के लिये हर साल लाखों डालर मिलती है, झाबुआ के आदिवासियों की दशा सुधारने के लिये भी कई बार विदेशी मदद मिली, उसका क्या होता है पता नहीं है क्या ? हम तो इतने बेशर्म हैं कि अपनी आस्था की केन्द्र गंगा को साफ़ करने / रखने के लिये भी विदेशी मदद ले लेते हैं, और उसी में अपना कूडा़ डालते रहते हैं । एक तरफ़ ताज को स्थान दिलाने के नाम पर कई कम्पनियाँ और ग्रुप नोट छाप रहे हैं, दूसरी तरफ़ राष्ट्रपति चुनाव के लिये सौदेबाजी के तहत माया के खिलाफ़ ताज कॉरीडोर मामले में मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं दी गई, ये है हमारे देश का चरित्र....। और फ़िर ताजमहल को उक्त स्थान दिलाकर उसके साथ क्या करने वाले हो... वहाँ जाकर प्लास्टिक की बोतलें फ़ेंकेगे, जगह-जगह मूतेंगे, दीवारों पर खोद-खोद कर दिल का आकार और "आई लव यू" लिखेंगे, चारों ओर झुग्गियाँ बनाकर जमीनों पर कब्जा करेंगे, यमुना को नाला तो पहले ही बना दिया है, अब कीचड़ भरा डबका बनाओगे... क्या-क्या करोगे ? खोखला देशप्रेम अपने पास ही रहने दो भाईयों, नौजवानों की "अंगूठा-टेक" पीढी़ (एसएमएस के लिये अंगूठा ही लगता है ना !) पैसे का मोल क्या जाने, कईयों को तो आसानी से मिला है, कईयों के बाप अपना-अपना पेट काटकर नौनिहालों के हाथ में मोबाईल सजाये हुए हैं... कल ये लोग कहेंगे कि सूरज पूरब से निकलता है या नहीं SMS भेजो, तुम्हारा बाप तुम्हारा ही है या नहीं, कम से कम सौ SMS भेजो...

Tuesday, June 12, 2007

एक फ़ुसफ़ुसाता सा मधुर गीत...

यह गीत कुछ अलग हट कर है, क्योंकि इस गीत में संवादों की अधिकता तो है ही, लेकिन संगीत भी बहुत ही मद्धिम है और संवादों के अलावा जो गीत के बोल हैं वे भी लगभग बोलचाल के अन्दाज में ही हैं । यह गीत इतने धीमे स्वरों में गाया गया है कि आश्चर्य होता है कि इतने नीचे सुरों में भी रफ़ी साहब इतने सुरीले और मधुर कैसे हो सकते हैं (यही तो रफ़ी-लता की महानता है)। यह गीत एक तो कम बजता है और जब भी बजता है तो बहुत ध्यान से सुनना पडता है...। गीत लिखा है कैफ़ी आजमी ने, संगीत है मदनमोहन साहब का और फ़िल्म है "हीर-रांझा" (राजकुमार-प्रिया राजवंश वाली)। उल्लेखनीय है कि फ़िल्म हीर-रांझा ही आधुनिक भारत (आजादी के बाद) की सम्भवतः एकमात्र फ़िल्म है जिसमे पूरी फ़िल्म के संवाद पद्य शैली में हैं, अर्थात तुकबन्दी में । गीत कुछ इस प्रकार से है -

रफ़ी - मेरी दुनिया में तुम आईं
क्या-क्या अपने साथ लिये
तन की चांदी, मन का सोना
सपनों वाली रात लिये...
तनहा-तनहा, खोया-खोया,
दिल में दिल की बात लिये
कब से यूँ ही फ़िरता था मैं
अरमाँ की बारात लिये..
(संवाद शुरु होते हैं - )
राजकुमार - अंधेरे का इशारा समझो, आज दिया दिल का जलाना होगा
प्रिया - तुम बडे़ वो हो मुझे जाने दो
राजकुमार - जा सकोगी
प्रिया - मुझे जाना होगा
राजकुमार - आज की रात तो दिल तोडो़ ना..
अब लता की आवाज शुरु होती है ..
ढलका आँचल फ़ैला काजल
आँखों मे ये रात लिये
कैसे जाऊँ सखियों में अब
तेरी ये सौगात लिये..
रफ़ी - मेरी दुनिया में तुम आईं..
लता - सीने की ये धडकन सुन ले ना कोई
हाय-हाय अब देखे ना कोई

रफ़ी - ना जाओ, न जाओ..
लता - हटो, हटो डर लगता है
रफ़ी - सुनो, सुनो.
लता - डर लगता है
रफ़ी - दिल में कितनी कलियाँ महकीं
कैसे कैसे फ़ूल खिले
नाजुक-नाजुक मीठे मीठे होठों की खैरात लिये
मेरी दुनिया में तुम आईं...

लता - चाँद से कैसे आँख मिलाऊँ..
रफ़ी - बाँहों में आओ तुमको बताऊँ..
लता - बस भी करो
रफ़ी - अब ना डरो, रात है ये अपनी
लता - पायल छनके, कंगना खनके, बदली जाये चाँदनी
मंजिल-मंजिल चलना होगा, हाथों में ये हाथ लिये
रफ़ी - मेरी दुनिया में तुम आईं...
और हौले से गीत समाप्त हो जाता है...
कैफ़ी आजमी ने छुप-छुप कर मिलने वाले प्रेमी जोडे़ की स्वाभाविक बातचीत को एक रोमांटिक गीत का स्वरूप दिया, पूरे गीत में एक व्याकुल प्रेमी और जमाने से डरी हुई और लाज से सिमटी प्रेमिका के दिल की आवाज हमें सुनाई देती है... हम पुरानी यादों में खो जाते हैं, और मदनमोहन साहब ने भी उतने ही मादक अन्दाज की लय और धुन तैयार की है...
यह गीत यहाँ क्लिक करके सुना जा सकता है...

Monday, June 11, 2007

नौकरी के इंटरव्यू में दिल की आवाज !

आजकल विभिन्न मैनेजमेंट साईटें हमे बताती हैं कि नौकरी के लिये इंटरव्यू देते समय क्या-क्या कहना चाहिये, क्या नहीं कहना चाहिये, क्या बताना चाहिये, क्या छुपाना चाहिये आदि-आदि । इसलिये इंटरव्यू के समय प्रत्याशी रेडीमेड और रटे-रटाये, ऊँचे-ऊँचे उत्तर देते हैं, लेकिन असल में उनके मन में क्या होता है, यह पढिये -
हालांकि प्रश्न भी लगभग वही होते हैं सभी कम्पनियों में...लेकिन जो उत्तर हैं वे असल में दिल की आवाज हैं ।

प्रश्न - आपने इस नौकरी के लिये क्यों आवेदन किया ?
उत्तर - बस यूँ ही बहुत सारी जगह आवेदन दिया था, आपने बुला लिया तो चला आया ।
प्रश्न - आप इस कम्पनी के लिये क्यों काम करना चाहते हैं ?
उत्तर - जो कम्पनी मुझे नौकरी दे मुझे वहाँ करना ही है, लेकिन खासतौर से आपकी कम्पनी का नाम मेरे दिमाग में नहीं है..
प्रश्न - हम आपको नौकरी क्यों दें ?
उत्तर - किसी ना किसी को तो आपको रखना ही है, मुझे ही ट्राय करें..
प्रश्न - यदि यह नौकरी मिल जाती है तो आप क्या करेंगे ?
उत्तर - यह तो मेरे मूड और तात्कालिक परिस्थिति पर निर्भर करेगा..
प्रश्न - आपकी प्रमुख शक्ति या मजबूती क्या है ?
उत्तर - अच्छी तनख्वाह देने वाली किसी भी कम्पनी में नौकरी करना, मेरे या कम्पनी के भविष्य की परवाह किये बिना..
प्रश्न - आपकी सबसे बडी कमजोरी क्या है ?
उत्तर - लड़कियाँ (आपकी कम्पनी में भी अच्छी-अच्छी लडकियाँ हैं)
प्रश्न - आपकी सबसे बडी गलती क्या थी, और उससे आपने क्या सीखा ?
उत्तर - पहले वाली कम्पनी में नौकरी करना और सीख मिली कि अधिक तनख्वाह होना चाहिये, इसीलिये मैं आज यहाँ हूँ..
प्रश्न - आप पिछली नौकरी क्यों छोड रहे हैं ?
उत्तर - सीधी सी बात है, सैलेरी बढाने के लिये..
प्रश्न - इस नौकरी से आपकी क्या अपेक्षायें हैं ?
उत्तर - काम ना दिया जाये और हर साल सैलेरी प्रमोशन दिया जाये..
प्रश्न - इस नौकरी का प्रमुख उद्देश्य क्या है और आपकी भविष्य की क्या योजनायें हैं ?
उत्तर - अधिक से अधिक पैसा प्राप्त करना, और उसके लिये प्रत्येक दो-चार वर्षों में कम्पनी बदलते रहना..
प्रश्न - आप की तनख्वाह की क्या अपेक्षायें हैं, और आप उसे कैसे उचित ठहरायेंगे ?
उत्तर - कोई भी व्यक्ति तब तक मौजूदा कम्पनी नहीं छोडता जब तक कि उसे बीस प्रतिशत अधिक तनख्वाह दूसरी कम्पनी में ना मिले (यह एक अलिखित नियम है) इसलिये मुझे बीस प्रतिशत अधिक तनख्वाह चाहिये (और मुझे मालूम है कि आप "बारगेनिंग" करेंगे, इसलिये मैंने पिछली तनख्वाह भी बीस प्रतिशत बढाकर बताई है...)
धन्यवाद, आप जा सकते हैं...

Sunday, June 10, 2007

नई भरती कैसे की जाये ?

यदि आपको अपनी कम्पनी में कुछ कर्मचारी नियुक्त करने हैं तो यह तरीका आजमाईये -
एक बडे़ कमरे में सौ ईंटें रख दीजिये और दो-तीन उम्मीदवारों को कमरे में भेजकर दरवाजा बन्द कर दीजिये...
छः घण्टे बाद वापस आकर देखिये कि उन्होंने क्या किया, नौकरी पर रखने हेतु परिणाम इस प्रकार हैं -
(१) यदि वे लोग ईंटें गिन रहे हैं तो उन्हें "अकाऊंट्स" विभाग में भेजिये ।
(२) यदि वे दोबारा ईंटें गिन रहे हैं तो उन्हें "ऑडिट" विभाग में नौकरी दीजिये ।
(३) यदि पूरा कमरा ईंटों से बेतरतीब भरा हुआ है, तो उन्हें "इंजिनियरिंग" विभाग में भेजिये ।
(४) यदि वे ईंटों को ना समझ में आने वाले तरीके से जमा रहे हैं, तो उन्हें "प्लानिंग" विभाग में भेजिये ।
(५) यदि वे एक दूसरे को ईंटें मार रहे हों, तो उन्हें "ऑपरेशन" विभाग में भेजिये ।
(६) यदि सभी लोग सो रहे हों, तो उन्हें "सिक्योरिटी" विभाग में भेजिये ।
(७) यदि वे लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे हों, तो उन्हें "ह्यूमन रिसोर्स" विभाग में भेजिये ।
(८) यदि वे आपसे कहें कि उन्होंने बहुत कोशिश की लेकिन एक भी ईंट नहीं जमा सके, तो उनके लिये "सेल्स" विभाग ठीक रहेगा ।
(९) यदि उन्होंने कोई यूनियन बना ली हो, तो उन्हें पश्चिम बंगाल या केरल भेजना ही ठीक होगा ।
(१०) और सबसे अन्त में मुख्य बात, यदि वे आपस में छः घंटे से मीटिंग कर रहे हों कि शुरुआत कैसे करें, तो उन्हें बधाई देकर "मैनेजमेण्ट" विभाग में भेजिये ।

स्रोत : मेल-मण्डली

Saturday, June 9, 2007

फ़िल्मों की शाश्वत घटनायें...

भारत में हर साल औसतन (सभी भाषाओं को मिलाकर) लगभग एक हजार फ़िल्में बनती हैं, जो कि विश्व में सर्वाधिक हैं । जाहिर है कि फ़िल्में हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन गई हैं और जैसा कि मैंने "फ़िल्मी मौत : क्या सीन है" में कहा था कि हम हिन्दी फ़िल्मों से प्यार करते हैं । वे अच्छी हो सकती हैं, बुरी हो सकती हैं, लेकिन आम जन के जीवन और समाज पर उनके सकारात्मक या नकारात्मक प्रभावों को खारिज नहीं किया जा सकता है । हिन्दी फ़िल्मों के जन्म से लेकर आज तक या कहें कि आलमआरा से लेकर धूम-२ तक हिन्दी फ़िल्मों ने काफ़ी उतार-चढाव देखे हैं और तकनीकी बदलाव लाये हैं, लेकिन यहाँ हम हिन्दी फ़िल्मों के कुछ ऐसे दृश्यों का जिक्र करने जा रहे हैं, जो सालों से लाखों फ़िल्मों के बन जाने के बाद भी नहीं बदले हैं । ना.. ना.. मैं उन "टिपिकल" फ़ार्मूलों के बारे में नहीं कह रहा हूँ, कि दो भाई कुंभ के मेले में बिछडेंगे और अन्त में ताबीज या गोदना देखकर आपस में भै...या!! कहते हुए लिपट जायेंगे, या कि कलफ़ लगे कडक कपडे पहने और तिलक लगाये डाकू का हृदय परिवर्तन हो जायेगा (पुलिस के आने से पहले), या कि गरीब हीरो और अमीर हीरोईन की प्रेम-कहानी जिसमें लडकी का बाप सिगार पीते हुए हीरो के सामने चेकबुक रख देता है और मूर्ख (जी हाँ) हीरो उसे ठुकरा देता है, ना ही इस पर बात होगी कि मरियल सा हीरो दस-बीस गुंडों को कैसे धूल चटाता है, कैसे वह कार या मोटर-साईकल की रेस लगाकर हीरोईन को बचाता है, भले ही हीरो के बाप ने कभी साईकल भी नहीं चलाई हो.. ये सब बातें तो "कॉमन" हैं...। हम बात करने जा रहे हैं कुछ विशिष्ट दृश्यों की या कहें घटनाक्रमों की । इन दृश्यों और संवादों को हिन्दी फ़िल्मों में इतनी बार दोहराया जा चुका है कि मेरे बेटे को भी याद हो चला है कि यदि धर्मेन्द्र है तो वह कम से कम एक बार "कु...त्ते ~!!" जरूर बोलेगा । "माँ..." और "भगवान के लिये मुझे छोड़ दो.." (हालांकि इस संवाद पर एक फ़िल्म में शक्ति कपूर ने बडे़ मजेदार अन्दाज में कहा था - भगवान के लिये तुम्हें छोड दूँगा तो मैं क्या लूँगा...परसाद !!), ढीली-ढाली पैंट वाले पुलिसिये के मुँह से "यू आर अंडर अरेस्ट.." भी जब-तब हमें सुनाई दे ही जाता है...।
यदि हीरो गरीब है तो भी उसका घर बहुत बडा़ होगा और उसकी माँ जबरन खाली डब्बे उलट-पुलट करते हुए आँसू बहाती रहेगी (ये नहीं कि बडा घर बेचकर छोटा ले लें)। लीला चिटणीस और सुलोचना की आँखें तो सिलाई मशीन पर काम करते-करते ही खराब हुई होंगी, और निरुपा राय की ग्लिसरीन लगा-लगा कर । मुस्टण्डे हीरो का सारा घर-खर्चा सिलाई मशीन से निकलता है और वो नालायक बगीचे में हीरोईन से पींगें बढा रहा होता है । कोई-कोई हीरो जब भी टेनिस या बैडमिंटन का मुकाबला या कप जीतकर आता है तो माँ उसके लिये गाजर का हलवा या खीर जरूर बनाती है, कभी-कभार आलू का पराँठा भी चल जाता है, सारे हीरो की पसन्द का मेनू यही है । बेरोजगार और निकम्मा होते हुए भी हीरोईन के साथ बगीचे की घास पर ऐसे मस्तायेगा जैसे बगीचा उसके बाप का ही हो । इसी प्रकार पुलिस के फ़िल्म के अन्त में ही पहुँचने की महान परम्परा रही है, जब विलेन पिट-पिट कर अधमरा हो जायेगा, तब इफ़्तेखार साहब कहेंगे "कानून को अपने हाथ में मत लो विजय..." (और विजय भी तड़ से मान जायेगा, जैसे कानून कोई काँच का बरतन हो)। विलेन को पिटते देखना भी अपने-आप में एक दावत की तरह ही होता है, विलेन की एक भी गोली हीरो को छू जाये मजाल है ? उसके अड्डे पर तमाम जलती-बुझती लाईटें देखकर लगता है कहीं वह इलेक्ट्रीशियन तो नहीं ! आलमारी में से तहखाने का दरवाजा तो विलेन के अड्डे का जरूरी अंग है, और हमारे लगभग सारे विलेन पैकिंग और ढुलाई के काम को साइड-बिजनेस के रूप में करते होंगे, तभी तो आज तक मुझे यह नहीं पता चला कि हर विलेन के अड्डे पर खाली ड्रम और खाली खोके क्यों रखे रहते हैं.. अन्तिम संघर्ष में जाने कितने सब्जी भरे ठेलों को उलटाया जाता है और थर्माकोल की दीवारों को नष्ट किया जाता है (इसी कारण सब्जियाँ और थर्माकोल महंगा भी हो गया है)। सबसे पवित्र सीन जो राजकपूर साहब के पहले भी था, बाद में भी है और सदा रहेगा, वह है हीरोईन के नहाने का सीन । हीरोईनों को नहाने का इतना शौक होता है कि वे जलसंकट की रत्तीभर परवाह नहीं करतीं । "जिस देश में गंगा बहती है" से लेकर "मोहरा" तक हीरोईनों ने मात्र नहाने में इतना पानी बर्बाद किया है कि भाखडा़-नंगल और हीराकुंड को भी शर्म आ जाये। हिन्दी फ़िल्मों के डाकू अभी भी घोडों पर ही हैं, जबकि चम्बल के असली डाकुओं ने खुली अर्थव्यवस्था को अपनाते हुए हीरो होंडा और स्कोडा ले ली है । फ़िल्मी माँओं-बहनों ने तो हाथ से थाली गिराने में मास्टरी हासिल कर ली है, बुरी खबर सुनते वक्त अधिकतर उनके हाथ में थाली होती ही है... न...~~हीं...!! कहते हुए झन्न से थाली हाथ से छोडी.. (अरी मूढ़ धीरे से रख भी तो सकती थी), अब तक न जाने कितनी थालियों में अनगिनत टोंचे पड़ गये होंगे ।
वैसे आजकल फ़िल्मों में वक्त के साथ काफ़ी बदलाव आ गये हैं, हीरो की माँ अब बूढी़ नहीं होती, बल्कि रीमा लागू जैसी ग्लैमरस और सेक्सी होती है, गोदरेज के रहते उसके बाल सफ़ेद होने का तो अब सवाल ही नहीं । धारावाहिकों में भी हीरो जब माँ कहता है तभी पता चलता है कि ये उसकी माँ है, माशूका नहीं...। हीरो भी आजकल कम्प्यूटर पर काम करने लगा है (कम से कम ऐसा अभिनय तो वह करता ही है), हीरोईनों का नहाना भी इधर आजकल कुछ कम हो चला है (जलसंकटग्रस्त लोगों के लिये खुश होने का मौका), क्योंकि उन्हें अब कपडे़ उतारने के लिये नहाने का बहाना करने की जरूरत नहीं रही । डाकू और गुण्डे भी हमारे आसपास के लोगों जैसे ही दिखने लगे हैं (सत्या, वास्तव आदि) । कहने का तात्पर्य यह कि बदलाव तो आ रहा है, लेकिन धीरे-धीरे, तब तक हमें यदा-कदा इन दृश्यों को झेलने को तैयार रहना चाहिये...

Thursday, June 7, 2007

येसुदास के दो मधुर गीत

दक्षिण भारत के एक और महान गायक डॉ. के.जे.येसुदास के दो अनमोल गीत यहाँ पेश कर रहा हूँ ।
पहला गीत है फ़िल्म "आलाप" का - बोल हैं "कोई गाता मैं सो जाता...", गीत लिखा है हरिवंशराय बच्चन ने, संगीत है जयदेव का । यह एक बेहतरीन गीत है और जयदेव जो कि कम से कम वाद्यों का प्रयोग करते हैं, इस गीत में भी उन्होंने कमाल किया है । प्रस्तुत दोनों गीत यदि रात के अँधेरे में अकेले में सुने जायें तो मेरा दावा है कि अनिद्रा के रोगी को भी नींद आ जायेगी । अन्तरों के बीच में जयदेव कम वाद्यों के कारण गायक की पूरी रेंज का उपयोग कर लेते हैं और येसुदास की पवित्र सी लगने वाली आवाज गजब ढाती है...सबसे बडे़ बच्चन साहब के शब्द तो खैर बढिया हैं ही, फ़िल्म में आज के बडे़ बच्चन साहब की अदाकारी भी उम्दा है (जैसी कि हृषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों में हमेशा वे करते रहे हैं चाहे वह नमकहराम हो, चुपके-चुपके हो या मिली हो) । इस फ़िल्म में उन्होंने एक संघर्षशील संगीतकार की भूमिका बखूबी निभाई है । गीत इस प्रकार है -

कोई गाता मैं सो जाता....

(१) संस्रिति के विस्तृत सागर में
सपनों की नौका के अन्दर,
दुख-सुख की लहरों में उठ गिर
बहता जाता, मैं सो जाता ....
(२) आँखों में लेकर प्यार अमर
आशीष हथेली में भरकर
कोई मेरा सिर गोदी में रख
सहलाता, मैं सो जाता....
(३) मेरे जीवन का कारा जल
मेरे जीवन का हालाहल
कोई अपने स्वर में मृदुमय कर
दोहराता, मैं सो जाता....
कोई गाता मैं सो जाता...


इस गीत को यहाँ क्लिक करके सुना जा सकता है ।

येसुदास ने हिन्दी फ़िल्मों में कम ही गाया है, हिन्दी फ़िल्म उद्योग उनकी असीमित प्रतिभा का उपयोग नहीं कर सका यह बडे़ खेद की बात है, एसपी बालासुब्रमण्यम को तो भी कई मौके मिले और उन्होंने भी खूब गाया, लेकिन शास्त्रीय़ संगीत की गहरी समझ रखने वाले येसुदास और सुरेश वाडकर का हिन्दी फ़िल्मों और गीतों को अधिक लाभ नहीं मिल पाया, इसका कारण शायद यह हो सकता है कि इन दोनों की आवाजें एक विशिष्ट प्रकार की है (जैसे कि भूपेन्द्र की भी है), इसलिये हिन्दी फ़िल्मों के "मुँछमुण्डे" और "बनियान-ब्रिगेड" के हीरो (?) पर उनकी आवाज फ़िट नहीं बैठती । कारण जो भी हो येसुदास और सुरेश वाडकर के गीतों से श्रोताओं को वंचित होना पडा है । बहरहाल....
दूसरा गीत भी उतना ही प्रभावशाली है - फ़िल्म है "सदमा", गीत लिखा है गुलजार ने और संगीत दिया है दक्षिण की एक और जबरदस्त प्रतिभा इलैया राजा ने (इनका उम्दा संगीत तो छोडिये, हो सकता है कि इनका नाम भी कई हिन्दीभाषियों ने नहीं सुना होगा)। इसका फ़िल्मांकन भी बहुत बढिया है, फ़िल्म में श्रीदेवी सारा श्रेय लूट ले गई हैं, जबकि कमल हासन ने भी मनोभावों के द्वन्द्व को बेहतरीन तरीके से पेश किया है... गीत इस प्रकार है -

सुरमई अँखियों में नन्हा-मुन्ना एक सपना दे जा रे
निन्दिया के उडते पाखी रे
अँखियों मे आ जा साथी रे
रारी रारी ओ रारी रुम, रारी रारी ओ रारी रुम..


(१) अच्छा सा कोई सपना दे जा
मुझको कोई अपना दे जा
अन्जाना सा मगर कुछ पहचाना सा
हल्का-फ़ुल्का शबनमी, रेशम से भी रेशमी..
सुरमई अँखियों में नन्हा-मुन्ना एक सपना दे जा रे .....
(२) रात के रथ पर जाने वाले
नींद का रस बरसाने वाले
इतना कर दे, के मेरी आँखें भर दे
आँखों में बसता रहे, सपना ये हँसता रहे...

सुरमई अँखियों में नन्हा-मुन्ना एक सपना दे जा रे ....
निन्दिया के उडते पाखी रे
अँखियों मे आ जा साथी रे
रारी रारी ओ रारी रुम, रारी रारी ओ रारी रुम..

यह गीत यहाँ क्लिक करके सुना जा सकता है ।

इस गीत में जब येसुदास "रारी रारी ओ रारी रुम..." गाते हैं और साथ में "टिंग" की जो मधुर ध्वनि आती है, मानो ऐसा लगता है कि कोई मासूम बच्चे को झूला झुला रहा है । "धीरे से आ जा री अँखियन में.." की टक्कर में इस लोरी को रखा जा सकता है । वैसे भी आजकल फ़िल्मों में लोरियाँ लुप्तप्राय हो चली हैं, इसी बहाने इन दो मधुर गीतों को सुनकर हम अपनी प्यास बुझा लें ।

Sunday, June 3, 2007

फ़िल्मी मौत : क्या सीन है !

हिन्दी फ़िल्मों से हम प्यार करते हैं वे कैसी भी हों, हम देखते हैं, तारीफ़ करते हैं, आलोचना करते हैं लेकिन देखना नहीं छोडते, इसी को तो प्यार कहते हैं । हमारी हिन्दी फ़िल्मों में मौत को जितना "ग्लैमराईज" किया गया है उतना शायद और कहीं नहीं किया गया होगा । यदि हीरो को कैन्सर है, तो फ़िर क्या कहने, वह तो ऐसे मरेगा कि सबकी मरने की इच्छा होने लगे और यदि उसे गोली लगी है (वैसे ऐसा कम ही होता है, क्योंकि हीरो कम से कम चार-छः गोलियाँ तो पिपरमेंट की गोली की तरह झेल जाता है, वो हाथ पर गोली रोक लेता है, पीठ या पैर में गोली लगने पर और तेज दौडने लगता है), खैर... यदि गोली खाकर मरना है तो वह अपनी माँ, महबूबा, दोस्त, जोकरनुमा कॉमेडियन, सदैव लेटलतीफ़ पुलिस आदि सबको एकत्रित करने के बाद ही मरता है । जितनी देर तक वो हिचकियाँ खा-खाकर अपने डॉयलॉग बोलता है और बाकी लोग मूर्खों की तरह उसका मुँह देखते रहते हैं, उतनी देर में तो उसे गौहाटी से मुम्बई के लीलावती तक पहुँचाया जा सकता है । हीरो गोली खाकर, कैन्सर से, कभी-कभार एक्सीडेंट में मरता तो है, लेकिन फ़िर उसकी जगह जुडवाँ-तिडवाँ भाई ले लेता है, यानी कैसे भी हो "फ़ुटेज" मैं ही खाऊँगा ! साला..कोई हीरो आज तक सीढी से गिरकर या प्लेग से नहीं मरा ।

चलो किसी तरह हीरो मरा या उसका कोई लगुआ-भगुआ मरा (हवा में फ़डफ़डाता दीपक अब बुझा कि तब बुझा..बच्चा भी समझने लगा है कि दीपक बुझा है मतलब बुढ्ढा चटकने वाला है...) फ़िर बारी आती है "चिता" की और अंतिम संस्कार की । उज्जैन में रहते हुए इतने बरस हो गये, लोग-बाग दूर-दूर से यहाँ अंतिम संस्कार करवाने आते हैं, आज तक सैकडों चितायें देखी हैं, लेकिन फ़िल्मों जैसी चिता... ना.. ना.. कभी नहीं देखी, क्या "सेक्सी" चिता होती है । बिलकुल एक जैसी लकडियाँ, एक जैसी जमी हुई, खासी संख्या में और एकदम गोल-गोल, "वाह" करने और तड़ से जा लेटने का मन करता है... फ़िर हीरो एक बढिया सी मशाल से चिता जलाता है, और माँ-बहन-भाई-दोस्त या किसी और की कसम जरूर खाता है, और इतनी जोर से चीखकर कसम खाता है कि लगता है कहीं मुर्दा चिता से उठकर न भाग खडा हो...।

यदि चिता हीरोईन की है, और वो भी सुहागन, फ़िर तो क्या कहने । चिता पर लेटी हीरोईन ऐसी लगती है मानो "स्टीम बाथ" लेने को लेटी हो और वह भी फ़ुल मेक-अप के साथ । हीरो उससे कितना भी लिपट-लिपट कर चिल्लाये, मजाल है कि विग का एक बाल भी इधर-उधर हो जाये, या "आई-ब्रो" बिगड़ जाये, चिता पूरी जलने तक मेक-अप वैसा का वैसा । शवयात्रा के बाद बारी आती है उठावने या शोकसभा की । हीरो-हीरोईन से लेकर दो सौ रुपये रोज वाले एक्स्ट्रा के कपडे भी एकदम झकाझक सफ़ेद..ऐसा लगता है कि ड्रेस-कोड बन गया हो कि यदि कोई रंगीन कपडे पहनकर आया तो उसे शवयात्रा में घुसने नहीं दिया जायेगा । तो साथियों आइये कसम खायें कि जब भी हमारी चिता जले ऐसी फ़िल्मी स्टाईल में जले, कि लोग देख-देखकर जलें । जोर से बोलो...हिन्दी फ़िल्मों का जयकारा...

Saturday, June 2, 2007

ऐ भाई जरा देख के चलो (राजकपूर - २ जून)



दो जून को महान शोमैन राजकपूर की पुण्यतिथि है, और इस अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए मैं उनकी फ़िल्म "मेरा नाम जोकर" का एक असाधारण गीत प्रस्तुत करना चाहता हूँ, जो कई बार सुनाई दे जाता है, लेकिन अधिकतर लोग उसे सुनते वक्त "इग्नोर" कर देते हैं, दरअसल यह गीत भी अक्सर रेडियो पर पूरा नहीं बजाया जाता.. पहली बार में सुनते वक्त तो यह एक साधारण सा गीत लगता है, लेकिन गीतकार ने इसमें खोखली होती पूरी जीवन शैली को उघाडकर रख दिया है ।

यह गीत लिखा है कवि/गीतकार "नीरज" ने (जैसा कि यहाँ बताया गया है) अभी भी कई लोग यह समझते हैं कि यह गीत या तो शैलेन्द्र ने लिखा है या हसरत जयपुरी ने... गीत के बोल हैं - "ऐ भाई जरा देख के चलो..." । राजकपूर जी ने सरकस वाले जोकर के दिल के दर्द के माध्यम से जो भावनायें व्यक्त की हैं, जिससे लगता है कि "तीसरी कसम" की असफ़लता और उसके बाद "जोकर" के कटु अनुभव इस गीत में उभरकर आ गये हैं । शायद फ़िल्म "मेरा नाम जोकर" राजकपूर ने समय से पहले बना ली थी, आज के मार्केटिंग के दौर में यदि वे इस फ़िल्म को बनाते तो निश्चित ही दुनिया उसे "क्लासिक" का दर्जा देकर सिर-आँखों पर बिठाती... खैर...बात हो रही है गीत की... दुनिया के लोगों का व्यवहार और इन्सानी फ़ितरत का खूब चित्रण किया गया है इस गीत में...
गीत शुरु होता है सरकस के माहौल के संगीत और मन्ना दा की गहरी आवाज से -

ऐ भाई जरा देख के चलो
आगे ही नहीं पीछे भी, दायें ही नहीं बाँये भी
ऊपर ही नहीं, नीचे भी.. ऐ भाई..
तू जहाँ आया है, वो तेरा
घर नहीं, गाँव नहीं, कूचा नहीं, रस्ता नहीं, दुनिया है..
(यहाँ पहले नीरज गीत को एक आध्यात्मिक स्पर्श देते हैं और लगभग उपदेशात्मक रूप में हमें बताते हैं कि..)
और प्यारे दुनिया ये सरकस है और सरकस में..
बडे को भी छोटे को भी, दुबले को भी मोटे को भी, खरे को भी खोटे भी
ऊपर से नीचे को, नीचे से ऊपर को आना-जाना पडता है..
और रिंग मास्टर के कोडे़ पर...
कोडा़ जो भूख है, कोडा़ जो पैसा है, कोडा़ जो किस्मत है,
तरह-तरह नाच के दिखाना यहाँ पडता है,
बार-बार रोना और गाना यहाँ पडता है,
हीरो से जोकर बन जाना पडता है...
ऐ भाई...
(भूख, पैसा और किस्मत को यहाँ कोडा़ बताया गया है, और जाहिर है कि रिंग मास्टर भगवान है..)

अगले अन्तरे में गीतकार इन्सानी फ़ितरत की कठोर सच्चाई बयान कर देते हैं और इन्सान को जानवर से भी बदतर बताते हैं, जो कि काफ़ी हद तक सही भी है...
क्या है करिश्मा, कैसा खिलवाड है,
जानवर आदमी से ज्यादा वफ़ादार है,
खाता है कोडा भी, रहता है भूखा भी
फ़िर भी वो मालिक पर करता नहीं वार है
और इन्सान ये..
माल जिसका खाता है, प्यार जिससे पाता है
गीत जिसके गाता है
उसके ही सीने में भोंकता कटार है
कहिये श्रीमान आपका क्या खयाल है ? (यह पंक्ति राजकपूर बोलते हैं)
ऐ भाई..
अगले अन्तरे में फ़िर एक बार नीरज आदमी के अन्दर के इन्सान को जगाने की कोशिश करते हैं और उसे हिम्मत दिलाते हैं कि -
गिरने से डरता है क्यों, मरने से डरता है क्यों
ठोकर तू जब तक ना खायेगा
पास किसी गम को न जब तक बुलायेगा
जिन्दगी है चीज क्या, नहीं जान पायेगा
रोता हुआ आया है, रोता चला जायेगा..
ऐ भाई...
क्या सटीक लिखा है - जब तक ठोकर और गम जिन्दगी में नहीं मिलते, व्यक्ति जीवन को पूरी तरह समझ ही नहीं पाता..
गीत का अन्तिम हिस्सा अधिकतर सुनने को नहीं मिलता, क्योंकि तब तक गीत की लम्बाई इतनी अधिक हो जाती है कि रेडियो पर इसे बजाना शायद सम्भव नहीं होता होगा... लेकिन गीत का यही हिस्सा सबसे मार्मिक है.. जीवन-दर्शन को शब्दों में उतारना और उसे फ़िल्म में सरकस के साथ जोडना.... वाकई राजकपूर और नीरज के लिये "कमाल" शब्द बहुत छोटा प्रतीत होता है...
इसके बाद एक हल्का सा विराम देकर राजकपूर स्वतः की आवाज में कहते हैं -
सरकस, (हँसते हैं)
हाँ बाबू..ये सरकस है..
और ये सरकस है शो तीन घंटे का..

फ़िर मन्ना दा की आवाज शुरू होती है..
पहला घंटा बचपन है,
दूसरा जवानी है,
तीसरा बुढापा..
और इसके बाद
माँ नहीं, बाप नहीं, बेटा नहीं, बेटी नहीं, तू नहीं, मैं नहीं, ये नहीं, वो नहीं
कुछ भी नहीं रहता है
रहता है जो कुछ बस
(राजकपूर की आवाज में)
खाली-खाली कुर्सियाँ हैं, खाली-खाली तम्बू है
खाली-खाली डेरा है,
बिना चिडिया का बसेरा है,
ना तेरा है ना मेरा है.
..

आध्यात्म की इस ऊँचाई पर ले जाने के बाद अन्त में एक दर्दीला वॉयलिन का सुर आपको सुन्न अवस्था में छोड़ देता है, और आप अपने अन्दर जीवन के नये अर्थ तलाशने लगते हैं....

यह गीत यहाँ क्लिक करके सुना जा सकता है ।

Friday, June 1, 2007

जीवन डोर तुम्हीं संग बाँधी - पं. भरत व्यास

पंडित भरत व्यास हमारी हिन्दी फ़िल्मों के एक वरिष्ठ गीतकार रहे हैं । उनके गीतों में हमें हिन्दी के शब्दों की बहुतायत मिलती है और साथ ही उच्च कोटि की कविता का आनन्द भी । यह गीत उन्होंने फ़िल्म सती-सावित्री के लिये लिखा है, संगीतकार हैं लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल । यह गीत राग "यमन कल्याण" पर आधारित है, और गाया है स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने । पहले इस गीत की सुमधुर पंक्तियों पर नजर डाल लें....

जीवन डोर तुम्हीं संग बाँधी (२)
क्या तोडेंगे इस बन्धन को, जग के तूफ़ाँ-आँधी रे आँधी..

हों न सके न कभी हम तुम न्यारे
दो तन हैं एक प्राण हमारे...
चाहें मिले पथ में अन्धियारे
चाहे घिरे हों बादर कारे
फ़िर भी रहूँगी तुम्हारी तुम्हारी... जीवन डोर (१)

यूँ घुलमिल रहना जीवन में
जैसे रहे कजरा अँखियन में
तेरी छवि छाई रहे मन में
तेरा ही नाम रहे धडकन मे
तेरे दरस की मैं प्यासी से प्यासी... जीवन डोर (१)

ऐसा मुझे वरदान मिला है
तुम क्या मिले भगवान मिला है
अब तो जनम भर संग रहेगा
इस मेहन्दी का रंग रहेगा
तेरे चरण की मैं दासी रे दासी... जीवन डोर (१)

यह गीत हमे एक विशिष्ट "नॉस्टेल्जिया" में ले जाता है । उस वक्त में ले जाता है, जब स्त्री अपना सम्पूर्ण व्यक्तित्व अपने पति पर न्यौछावर कर देती थी । भरत व्यास जी के शब्दों में जो सरलता होती है वह हमें मुग्ध कर देती है, और उस पर लता की पवित्र आवाज, ऐसा लगता है मानो हम अकेले किसी बडी सी झील के किनारे बैठे हैं और एक हंस किनारे पर आकर हमसे बतियाना चाहता है । इस गीत में एक पतिव्रता स्त्री की भावनाओं को उकेरा गया है । वाकई में स्त्री में जो धैर्य, सहनशीलता और त्याग की भावना होती है, उसका मुकाबला पुरुष कभी नहीं कर सकता । स्त्री का समर्पण कोई कमजोरी नहीं होता, बल्कि वह एक अगाध प्रेम होता है । गीत में वह कहती भी है कि "यूँ घुलमिल रहना जीवन में, जैसे रहे कजरा अँखियन में", "अब तो जनम भर संग रहेगा, इस मेहन्दी का रंग रहेगा"... कितने लोगों ने अपनी अर्धांगिनी को छोटे-छोटे उपहारों पर खुश होते देखा है ? जिसने नहीं देखा, वह जीवन भर बडी खुशियाँ बटोरने के चक्कर में समय गँवा रहा है... यह गीत रेडियो पर कम ही सुनाई देता है, और मेरा हमेशा प्रयास रहा है कि लोगों का फ़िल्मी गीतों की ओर देखने का नजरिया बदले, इसलिये यह गीत... इसे यहाँ क्लिक करके भी सुना जा सकता है । आज के माहौल का प्रेम "पिज्जा" की तरह का है, जबकि मेरे अनुसार प्रेम अचार की तरह होना चाहिये, जो समय बीतने के साथ और-और मधुर होता जाता है.....और यह गीत हमें उस दौर की याद दिलाता है, जब अभावों और दर्जन भर बच्चों के बावजूद स्त्री निश्छल हँसी हँसने का माद्दा रखती थी.....