Thursday, May 31, 2007

भुतहा संयोग या कुछ और ?



अब्राहम लिंकन कॉंग्रेस के लिये 1846 में चुने गये,
जॉन एफ़ केनेडी कॉंग्रेस के लिये 1946 में चुने गये..

अब्राहम लिंकन 1860 में राष्ट्रपति चुने गये,
जॉन एफ़ केनेडी 1960 में राष्ट्रपति चुने गये..

दोनों नागरिक कानूनों के जोरदार पैरोकार रहे,
दोनों की पत्नियों ने अपनी-अपनी संतान खोई, जब वे व्हाईट हाऊस में थीं...

दोनों को शुक्रवार को गोली मारी गई,
दोनों के सिर में गोली मारी गई..

आगे और जबरदस्त भुतहा संयोग....

लिंकन की सेक्रेटरी का नाम था केनेडी
केनेडी की सेक्रेटरी का नाम था लिंकन..

दोनों की हत्या दक्षिणपंथियों ने की,
दोनों के उत्तराधिकारी दक्षिणपंथी जॉनसन नामधारी थे..

एण्ड्र्यू जॉनसन, जो लिंकन के उत्तराधिकारी बने, का जन्म हुआ 1808 में,
लिंडन जॉनसन, जो केनेडी के उत्तराधिकारी बने, का जन्म हुआ 1908 में..

लिंकन के हत्यारे जॉन विल्क्स बूथ का जन्म हुआ 1839 में,
केनेडी के हत्यारे ली हार्वे ओसवाल्ड का जन्म हुआ 1939 में..

दोनों के हत्यारों को तीन नामों से जाना जाता था,
दोनों के हत्यारों के नाम की स्पेलिंग में 15 अक्षर आते हैं..

अब जरा कुर्सी थाम लीजिये....

लिंकन की हत्या जिस थियेटर में हुई उसका नाम था "फ़ोर्ड"
केनेडी की हत्या जिस कार में हुई उसका नाम था "फ़ोर्ड"..

लिंकन की हत्या थियेटर में हुई और हत्यारा भागकर गोदाम में छुपा,
केनेडी की हत्या गोदाम से हुई और हत्यारा भागकर थियेटर में छुपा..

बूथ और ओसवाल्ड दोनों हत्यारों की कोर्ट में सुनवाई से पहले ही हत्या हो गई.

हत्या से एक सप्ताह पहले लिंकन की सभा जिस जगह थी उसका नाम था "मुनरो मेरीलैण्ड"
हत्या से एक सप्ताह पहले केनेडी की मुलाकात हुई उसका नाम था "मर्लिन मुनरो"

अब इन संयोगों के बारे में क्या कहा जा सकता है ? किसी इतिहासकार से पूछें या किसी बंगाली जादूगर से...

(स्रोत : ई-मेल मित्रमंडली)

Wednesday, May 30, 2007

यह "भूख" हमें कहाँ ले जायेगी ?

किसी ने सच ही कहा है कि जिस देश को बरबाद करना हो सबसे पहले उसकी संस्कृति पर हमला करो और वहाँ की युवा पीढी को गुमराह करो । जो समाज इनकी रक्षा नहीं कर सकता उसका पतन और सर्वनाश निश्चित हो जाता है । हमारे आसपास घटने वाली काफ़ी बातें समाज के गिरते नैतिक स्तर और खोखले होते सांस्कृतिक माहौल की ओर इशारा कर रही हैं, एक खतरे की घंटी बज रही है, लेकिन समाज और नेता लगातार इसकी अनदेखी करते जा रहे हैं । इसके लिये सामाजिक ढाँचे या पारिवारिक ढाँचे का पुनरीक्षण करने की बात अधिकतर समाजशास्त्री उठा रहे हैं, परन्तु मुख्यतः जिम्मेदार है हमारे आसपास का माहौल और लगातार तेज होती जा रही "भूख" । जी हाँ "भूख" सिर्फ़ पेट की नहीं होती, न ही सिर्फ़ तन की होती है, एक और भूख होती है "मन की भूख" । इसी विशिष्ट भूख को "बाजार" जगाता है, उसे हवा देता है, पालता-पोसता है और उकसाता है। यह भूख पैदा करना तो आसान है, लेकिन क्या हमारा समाज, हमारी राजनीति, हमारा अर्थतन्त्र इतना मजबूत और लचीला है, कि इस भूख को शान्त कर सके ।
दृश्य-श्रव्य माध्यमों का प्रभाव कोमल मन पर सर्वाधिक होता है, एक उम्र विशेष के युवक, किशोर, किशोरियाँ इसके प्रभाव में बडी जल्दी आ जाते हैं । जब यह वर्ग देखता है कि किसी सिगरेट पीने से बहादुरी के कारनामे किये जा सकते हैं, या फ़लाँ शराब पीने से तेज दौडकर चोर को पकडा जा सकता है, अथवा कोई कूल्हे मटकाती और अंग-प्रत्यंग का फ़ूहड प्रदर्शन करती हुई ख्यातनाम अभिनेत्री किसी साबुन को खरीदने की अपील (?) करे, तो वयःसन्धि के नाजुक मोड़ पर खडा किशोर मन उसकी ओर तेजी से आकृष्ट होता है । इन्तिहा तो तब हो जाती है, जब ये सारे तथाकथित कारनामे उनके पसन्दीदा हीरो-हीरोईन कर रहे होते हैं, तब वह भी उस वस्तु को पाने को लालायित हो उठता है, उसे पाने की कोशिश करता है, वह सपने और हकीकत में फ़र्क नहीं कर पाता । जब तक उसे इच्छित वस्तु मिलती रहती है, तब तक तो कोई समस्या नहीं है, परन्तु यदि उसे यह नहीं मिलती तो वह युवक कुंठाग्रस्त हो जाता है । फ़िर वह उसे पाने के लिये नाजायज तरीके अपनाता है, या अपराध कर बैठता है । और जिनको ये सुविधायें आसानी से हासिल हो जाती हैं, वे इसके आदी हो जाते हैं, उन्हें नशाखोरी या पैसा उडाने की लत लग जाती है, जिसकी परिणति अन्ततः किसी मासूम की हत्या या फ़िर चोरी-डकैती में शामिल होना होता है । ये युवक तब अपने आपको एक अन्धी गली में पाते हैं, जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझता । आजकल अपने आसपास के युवकों को धडल्ले से पैसा खर्च करते देखा जा सकता है । यदि सिर्फ़ पाऊच / गुट्खे का हिसाब लगाया जाये, तो एक गुटका यदि दो रुपये का मिलता है, और दिन में पन्द्रह-बीस पाऊच खाना तो आम बात है, इस हिसाब से सिर्फ़ गुटके का तीस रुपये रोज का खर्चा है, इसमें दोस्तों को खिलाना, सिगरेट पिलाना, मोबाइल का खर्च, दिन भर यहाँ-वहाँ घूमने के लिये पेट्रोल का खर्चा, अर्थात दिन भर में कम से कम सौ रुपये का खर्च, मासिक तीन हजार रुपये । क्या भारत के युवा अचानक इतने अमीर हो गये हैं ? यह अनाप-शनाप पैसा तो कुछ को ही उपलब्ध है, परन्तु जब उनकी देखादेखी एक मध्यम या निम्नवर्गीय युवा का मन ललचाता है, तो वह रास्ता अपराध की ओर ही मुडता है । यह "बाजार" की मार्केटिंग की ताकत (?) ही है, जो इस "मन की भूख" को पैदा करती है, और यही सबसे खतरनाक बात है ।
अपसंस्कृति की भूख फ़ैलाने में बाजार और उसके मुख्य हथियार (!) टीवी का योगदान (?) इसमें अतुलनीय है । उदारीकरण की आँधी में हमारे नेताओं द्वारा सांस्कृतिक प्रदूषण की ओर से आँखें मूंद लेने के कारण इनकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने वाला कोई न रहा, जिसके कारण ये तथाकथित "मीडिया" और अधिक उच्छृंखल और बदतर होता गया है । एक जानकारी के अनुसार फ़्रेण्डशिप डे के लिये पूरे देश के "बाजार" में लगभग चार सौ करोड़ रुपयों की (ग्रीटिंग, गुलाब के फ़ूल, चॉकलेट और उपहार मिलाकर) खरीदारी हुई । जो चार सौ करोड रुपये (जिनमें से अधिकतर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की जेब में गये हैं) अगले वर्ष बढकर सात सौ करोड हो जायेंगे, इसका उन्हें पूरा विश्वास है । लेकिन "प्रेम" और "दोस्ती" के इस भौंडे प्रदर्शन में जिस "धन" की भूमिका है वही सारे पतन की जड है, और इसका सामाजिक असर क्या होगा, इस बारे में कोई सोचने को भी तैयार नहीं है । जिस तरह से भावनाओं का बाजारीकरण किया जा रहा है, युवाओं का मानसिक और आर्थिक शोषण किया जा रहा है, वह गलत है, कई बार यह आर्थिक शोषण, शारीरिक शोषण में बदल जाता है । मजे की बात तो यह है कि कई बार कोई दिवस क्यों मनाया जाता है, इसका पता भी उन्हें नहीं होता, परन्तु जैसा मीडिया बता दे अथवा जैसी "भेडचाल" हो वैसा ही सही, जैसा कि वेलेण्टाइन के मामले मे है कि "जिस दिन को ये युवा प्रेम-दिवस के रूप में मनाते हैं दरअसल वह एक शहीद दिवस है, क्योंकि संयोगवश तीनों वेलेण्टाइनों को तत्कालीन राजाओं ने मरवा दिया था, और वह भी चौदह फ़रवरी को" । अब आपत्ति इस बात पर है कि जब आप जानते ही नहीं कि यह उत्सव किसलिये और क्यों मनाया जा रहा है, ऐसे दिवस का क्या औचित्य है ? मार्केटिंग के पैरोकारों की रटी-रटाई दलील होती है कि "यदि इन दिवसों का बाजारीकरण हो भी गया है तो इसमें क्या बुराई है ? क्या पैसा कमाना गलत बात है ? किसी बहाने से बाजार में तीन-चार सौ करोड रुपया आता है, तो इसमें हाय-तौबा क्यों ? जिसे खरीदना हो वह खरीदे, जिसे ना खरीदना हो ना खरीदे, क्या यह बात आपत्तिजनक है ?" नहीं साहब पैसा कमाना बिलकुल गलत बात नहीं, लेकिन जिस आक्रामक तरीके उस पूरे "पैकेज" की मार्केटिंग की जाती है, उसका उद्देश्य युवाओं से अधिक से अधिक पैसा खींचने की नीयत होती है और वह "मार्केटिंग" उस युवा के मन में भी खर्च करने के भाव जगाती है जिसकी जेब में पैसा नहीं है और ना कभी होगा, यह गलत बात है । पढने-सुनने में भले ही अजीब लगे, परन्तु सच यही है कि आज की तारीख में भारत के पचास-साठ प्रतिशत युवाओं की खुद की कोई कमाई नहीं है, और ऐसे युवाओं की संख्या भी कम ही है जिन्हें नियमित जेबखर्च मिलता हो । बाप वीआरएस और जबरन छँटनी का शिकार है, और बेटे को कोई नौकरी नहीं है, इसलिये दोनों ही बेकार हैं और टीवी उन्हें यह "भूख" परोस रहा है, पैसे की भूख, साधनों की भूख । भूख जो कि एक दावानल का रूप ले रही है । इसी मोड पर आकर "सामाजिक परिवर्तन", "सामाजिक क्रान्ति", "सामाजिक असर" की बात प्रासंगिक हो जाती है, लेकिन लगता है कि देश कानों में तेल डाले सो रहा है । आज हमारे चारों तरफ़ घोटाले, राजनीति, पैसे के लिये मारामारीम हत्याएं, बलात्कार हो रहे हैं, इन सभी के पीछे कारण वही "भूख" है । समाजशास्त्रियों की चिंता वाजिब है कि ऐसे लाखों युवाओं की फ़ौज समाज पर क्या असर डालेगी ? लेकिन "मदर्स डे", "फ़ादर्स डे", "वेलेन्टाईन", "फ़्रेण्डशिप डे", ये सब प्रतीक मात्र नहीं है, बल्कि इनसे आपको कमतरी का एहसास कराया जाता है कि यदि आपने कोई उपहार नहीं दिया तो आपको दोस्ती करना नहीं आता, यदि आपने कार्ड या फ़ूल नहीं खरीदा इसका मतलब है कि आप प्रेम नहीं करते, परिणाम यह होता है कि विवेकानन्द या अपने कोर्स की कोई किताब खरीदने की बजाय व्यक्ति किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी की कोई बेहूदा चॉकलेट खरीद लेता है, क्योंकि उस चॉकलेट से तथाकथित "स्टेटस" (?) जुडा है, और यही "स्टेटस" यानी एक और "भूख" । बाजार को नियन्त्रित करने वालों से यही अपेक्षा है कि उस "भूख" को भडकाने का काम ना करें, जो आज समाज के लिये "भस्मासुर" साबित हो रही है, कल उनके लिये भी खतरा बन सकती है ।

Tuesday, May 29, 2007

नौकरी में प्रमोशन पाने हेतु "गारंटीड" नुस्खे

यदि आपको प्रमोशन चाहिये या बॉस की नजरों में चढना है तो कृपया ये आजमाये हुए नुस्खे देखें और अमल में लायें, शर्तिया फ़ायदे की गारंटी....

(१) हमेशा आपके हाथ में काम से सम्बन्धित कागज होने चाहिये
वह कर्मचारी जिसके हाथ में सदैव काम के कागज या फ़ाईलें होती हैं, बहुत मेहनती माना जाता है (माना जाता है, होता नहीं है),इसलिये ऑफ़िस में इधर-उधर खामख्वाह घूमते हुए आपके हाथ में हमेशा कोई कागज होना चाहिये, यदि आपके हाथ में कुछ नहीं है तो लोग समझेंगे कि आप कैण्टीन जा रहे हैं, और यदि आपके हाथ में अखबार है तो ऐसा प्रतीत होगा कि आप टॉयलेट जा रहे हैं । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शाम को ऑफ़िस से जाते समय कुछ फ़ाईलें घर जरूर ले जायें, ताकि यह भ्रम बना रहे कि आप ऑफ़िस का काम घर पर भी करते हैं ।

(२) व्यस्त दिखने के लिये कम्प्य़ूटर का उपयोग करें -
जब भी आप कम्प्य़ूटर का उपयोग करते हैं तो लोगों को आप बहुत व्यस्त प्रतीत होते हैं । हालांकि मॉनिटर का मुँह ऐसी तरफ़ रखें जहाँ से कोई यह ना देख सके कि आप चैटिंग कर रहे हैं और गेम खेल रहे हैं । कम्प्य़ूटर क्रांति के इस अनोखे सामाजिक उपयोग से आप बॉस की निगाह में चढ जायेंगे । यदि भगवान ना करे आप पकडे जायें (और यह तो कभी ना कभी होकर रहेगा) तो आप बहाना बना सकते हैं कि मैं इस "सॉफ़्टवेयर" को सीख कर देख रहा था, जिससे कम्पनी का "ट्रेनिंग" का पैसा बचे ।

(३) काम करने की टेबल हमेशा भरी हुई होना चाहिये -
आपके काम करने की जगह हमेशा भरी हुई और अस्तव्यस्त होनी चाहिये । टेबल पर ढेर सारे कागज और फ़ाईलें इधर-उधर बिखरे होने चाहिये, कुछ सीडी, कुछ फ़्लॉपियाँ और आधे-अधूरे प्रिंट आऊट भी बिखरे हों तो सोने पर सुहागा । जब आपको मालूम हो कि किसी व्यक्ति को आपसे किसी फ़ाईल का काम है, तो उस खास फ़ाईल को एक बडे ढेर मे छुपा दीजिये और उसके सामने ही ढूँढिये । हो सके तो कम्प्य़ूटर से सम्बन्धित मोटी-मोटी किताबें कहीं से इकठ्ठा कर लें (पढने के लिये नहीं).. उससे आपकी इमेज विशिष्ट बनेगी । एक बात याद रखें कि पढने वाले को प्रमोशन नहीं मिलता, झाँकी जमाने वाले को मिलता है ।

(४) वॉइस (आन्सरिंग) मशीन का अधिकाधिक उपयोग करें -
संचार तकनीक के एक और वरदान "आन्सरिंग मशीन" का अधिक से अधिक उपयोग करें । जब आपका बॉस या कोई सहकर्मी आपको फ़ोन करे तो जरूरी नहीं कि वह काम आवश्यक ही हो... इसलिये भले ही आप फ़ोन के सिर पर बैठे हों, कभी सीधे जवाब ना दें, बल्कि यह काम "आन्सरिंग मशीन" को करने दें । फ़िर थोडी देर बाद सभी सन्देशों को सुनें, उसमें से मुख्य और आवश्यक को छाँटकर ठीक लंच टाईम में सामने वाले को फ़ोन करें, ताकि उसे लगे कि आप लंच टाईम में भी ऑफ़िस वर्क भूलते नहीं हैं ।

(५) हमेशा असंतुष्ट और अन्यमनस्क दिखें -
काम करते समय हमेशा असन्तुष्ट और तनावग्रस्त दिखें । जब भी कोई सहकर्मी आपसे कुछ पूछे तो सबसे पहले एक गहरी साँस लें, ताकि उसे लगे कि आप काम के बोझ से बेहद दबे हुए हैं । साथ ही अपने जूनियर को हमेशा सीख देते रहें और उससे हमेशा असन्तुष्ट रहें, जूनियर के चार कामों में से तीन में जरूर मीनमेख निकालें और एक में "हाँ.. ठीक है" कहें..

(६) ऑफ़िस से हमेशा सबसे देर से निकलें -
ऑफ़िस से हमेशा आपको देर से घर के लिये निकलना चाहिये, खासकर तब जबकि आपका बॉस ऑफ़िस में हो । आराम से मैगजीन और किताबें पढते रहें, जब तक कि जाने का समय ना हो जाये । ऑफ़िस टाईम के बाद कोशिश करें कि बॉस के कमरे के सामने से कम से कम दो-तीन बार गुजरें । यदि बॉस की गाडी खराब हो जाये और आप उसे उसके घर पर "ड्रॉप" कर सकें, इससे अधिक पुण्य आपके लिये और कुछ नहीं है, इसलिये हो सके तो साल में तीन बार कुछ ऐसा करें कि बॉस आपकी गाडी में लिफ़्ट ले । जितनी महत्वपूर्ण ई-मेल हो उसे हमेशा विषम समय पर ही भेजें, जैसे रात के साढे नौ बजे या सुबह सात बजे । बॉस की निगाह जरूर ई-मेल में पडे समय पर पडेगी, और वह बेहद "इम्प्रेस" हो जायेगा ।

(७) अपना भाषा ज्ञान और व्याकरण बढायें -
आपको अंग्रेजी के कुछ मुहावरे और लच्छेदार भाषा कंठस्थ करनी होगी । कम्प्य़ूटर और मैनेजमेंट से सम्बन्धित कुछ भारी-भरकम शब्द और वाक्य रचना यदि आप रट सकें तो बेहतर होगा, और जब भी बॉस के साथ बात करें इन शब्दों का भरपूर उपयोग करें, इस अन्दाज में कि बॉस को लगना चाहिये कि यदि यह बात नहीं मानी गई तो कम्पनी में प्रलय आ जायेगी ।

(८) हमेशा दो कोट या जैकेट (जो भी पहनते हों) रखें -
यदि आप किसी बडे ऑफ़िस में काम करते हैं, तो आपको हमेशा दो कोट रखना चाहिये । एक पहने रहें और दूसरा आपकी कुर्सी पर टंगा होना चाहिये । इससे एक तो आप आराम से घूम-फ़िर सकते हैं और दूसरे लोग समझेंगे कि आप आस-पास ही कहीं हैं, आते ही होंगे । यदि देर हो भी जाये तो आप कह सकते हैं कि जरूरी मीटिंग थी ।

तो साहेबान, इन नुस्खों को आज से ही लागू कर दीजिये, फ़िर देखिये आपका बॉस तो आपसे खुश रहेगा ही, आपके सहकर्मी भी आपके प्रमोशन को देख-देख जलेंगे...

Monday, May 28, 2007

दो मजेदार कहानियाँ

(१) मजाक
एक मैनेजर साहब अपने मातहतों के साथ अक्सर मजाक किया करते थे और मजाक करते वक्त वे इस बात का ध्यान नहीं रखते थे कि उनके मजाक से किसी को बुरा लग सकता है । इसके कारण कर्मचारी उस मैनेजर से परेशान रहते थे । एक बार क्रिसमस की पार्टी में लोगों ने उन्हे सबक सिखाने का तय किया । जब पार्टी शबाब पर थी मैनेजर साहब दो मिनट के लिये टॉयलेट गये तो एक व्यक्ति ने उनके कोट की जेब से पर्स निकाला और देखा कि उसमें क्या-क्या सामान है, उसके हाथ उसी रात घोषित होने वाली लॉटरी का टिकट लगा, उन्होंने उसका नम्बर नोट करके उसे वापस उनके कोट की जेब में रख दिया । अब वे लोग मजाक के लिये तैयार थे । फ़िर उन्होंने होटल के बैरे को एक कोने में ले जाकर कुछ गुफ़्तगू की । मैनेजर साहब टॉयलेट से वापस आकर पार्टी का आनन्द उठाने लगे ।
अचानक थोडी देर बाद एक वेटर ने हॉल में आकर घोषणा की कि आज रात को जो महालॉटरी खुलने वाली थी उसकी घोषणा हो गई है, और उसने एक नम्बर बताया और कहा कि इस नम्बर के मालिक को दस करोड़ रुपये मिलने वाले हैं । मैनेजर साहब ने चुपचाप पर्स निकालकर नम्बरों का मिलान किया और मन-ही-मन बहुत खुश हुआ, लेकिन जैसी कि उसकी आदत थी, उसने यह किसी पर जाहिर नहीं किया, हालांकि मजाक करने वाले कर्मचारी सब कुछ जानते थे । सभी ने देखा कि मैनेजर साहब बहुत मस्त हो गये हैं और बहुत पीने लगे हैं । कुछ देर बाद मैनेजर साहब उठे और जोर-जोर से उन्होंने घोषणा की - इस कम्पनी का मालिक बेहद खूसट है और उसका लडका जो कि मेरा बॉस भी है बेहद निकम्मा और नालायक है । इस कम्पनी के सभी कर्मचारी कामचोर और चमचागिरी में माहिर हैं । मेरी सेक्रेटरी को मैं बहुत चाहता हूँ और उससे शादी करने वाला हूँ, इसलिये मेरी पत्नी सहित तुम सभी भाड़ में जाओ, मैं इस घटिया कम्पनी को लात मारता हूँ...
अगली सुबह न नौकरी थी, न बीवी, न सेक्रेटरी और जाहिर है कि न ही लॉटरी का पैसा भी ।
सबक : या तो किसी के साथ बुरा मजाक मत करो या फ़िर अपने साथ भी वैसा ही होने के लिये तैयार रहो ।

(२) गरीब पर एक शॉर्ट नोट
हाल ही में जारी आँकडों के मुताबिक भारत में अमीरों और करोडपतियों की संख्या तेजी से बढ रही है, कुछ कम्पनियों में कुछ लोगों के वेतन एक करोड रुपये से भी ऊपर निकल गये हैं... दस-पन्द्रह वर्षों में तो कई नौनिहाल पैदा होते ही करोडपति और युवा होते-होते अरबपति हो जायेंगे । गरीबी या अभाव क्या होता है वे कभी भी नहीं जान पायेंगे । ऐसे माहौल (?) सन २०४० में कक्षा पाँचवीं के एक बालक से "एक गरीब परिवार" पर "शॉर्ट नोट" लिखने को कहा गया, उसने लिखा - ..."एक बार एक बहुत ही गरीब फ़ैमिली थी, पति और पत्नी दोनों बहुत गरीब थे, दो बच्चे थे वे भी बहुत गरीब थे । उनके घर के सारे नौकर भी गरीब थे, माली, ड्रायवर और गार्ड भी बहुत गरीब थे । तीन मर्सिडीज में से दो की सर्विसिंग छः महीने से नहीं हुई थी और एक गाडी का एसी काम नहीं कर रहा था । पाँच कलर टीवी में से दो खराब पडे थे । उस गरीब फ़ैमिली ने दो साल से घर में फ़र्नीचर और "रेनोवेशन" नहीं करवाया था । यहाँ तक कि छुट्टियाँ बिताने सिंगापुर और मलेशिया तक गये एक साल से ऊपर हो गया था । दोनों बच्चे जो कि मेरी उम्र के हैं उनके पास क्रेडिट कार्ड तक नहीं है, उनके कुत्तों को चार दिन से चिकन खाने को नहीं मिला था । मतलब यह कि "ऑल-इन-ऑल" वह एक बहुत ही गरीब परिवार है ।...

Indivar : Nadiya Chale Chale re Dhara Chanda Chale

इन्दीवर : नदिया चले, चले रे धारा

यह गीत उन लोगों के लिये है जो हमेशा हिन्दी फ़िल्मी गीतों की यह कर आलोचना करते हैं कि "ये तो चलताऊ गीत होते हैं, इनमें रस-कविता कहाँ", कविता की बात ही कुछ और है, हिन्दी फ़िल्मी गाने तो भांडों - ठलुओं के लिये हैं", लेकिन इन्दीवर एक ऐसे गीतकार हुए हैं जो कविता और शब्दों को हमेशा प्रधानता देते रहे हैं, उनके गीतों में अधिकतर हिन्दी के शब्दों का प्रयोग हुआ है और साहिर, शकील और हसरत के वजनदार उर्दू लफ़्जों की शायरी के बीच भी इन्दीवर हमेशा खम ठोंक कर खडे रहे । इन्दीवर का जन्म झाँसी(उप्र) में हुआ उनका असली नाम था - श्यामलाल राय । इनका शुरुआती गीत "बडे अरमानों से रखा है बलम तेरी कसम" बहुत हिट रहा और कल्याणजी-आनन्दजी के साथ इनकी जोडी खूब जमी ।
हिन्दी फ़िल्मी गीतों को इन्दीवर ने कविता के रूप में लिखकर उन्हें एक नया आयाम दिया है, कविता भी ऐसी कि शब्द बहुत क्लिष्ट ना हों और आम आदमी कि जुबान पर आसानी से चढ़ जायें । फ़िर इस गीत में कल्याणजी भाई ने नाव, नदी और नाविक का जो माहौल तैयार किया है वह अद्वितीय है..और मन्ना डे साहब की आवाज उसमें चार चाँद लगा देती है.. परन्तु मुख्य बात हैं शब्द जो कि एक कैन्सर पीडित (राजेश खन्ना) के लिये एक सकारात्मक सन्देश लाते हैं...

नदिया चले, चले रे धारा
चन्दा चले, चले रे तारा
तुझको चलना होगा...

जीवन कहीं भी ठहरता नहीं है
आँधी से तूफ़ाँ से डरता नहीं है
नाव तो क्या, बह जाये किनारा
बडी ही तेज समय की है धारा
तुझको चलना होगा...

पार हुआ वो रहा जो सफ़र में
जो भी रुका, फ़िर गया वो भँवर में
तू ना चलेगा तो चल देंगी राहें
मंजिल को तरसेंगी तेरी निगाहें..
तुझको चलना होगा..

कितने आसान शब्दों में छोटी सी कविता में वे अपना सन्देश हम तक पहुँचा देते हैं और वह भी फ़िल्म की तमाम बन्दिशों के बावजूद । इन्दीवर साहब की हिन्दी कविताओं की कुछ बानगियाँ पेश हैं, ताकि पाठक समझ सकें कि उनमें कितनी "वेरायटी" थी, और यहाँ तक कि फ़िल्म "तोहफ़ा" में भी उन्होंने जंपिंग जैक (जीतेन्द्र) और थंडर थाईज़ (श्रीदेवी) के होते हुए भी हिन्दी कविता का साथ नहीं छोडा...

प्यार का तोहफ़ा तेरा, बना है जीवन मेरा,
दिल के सहारे मैने पा लिये, जीने को और क्या चाहिये


इसी तरह से फ़िल्मों के "मैचो मैन" सुनील शेट्टी पर फ़िल्माया गया "मोहरा" का गीत -

ना कजरे की धार ना मोतियों के हार
ना कोई किया सिंगार, फ़िर भी कितनी सुन्दर हो...


कुछ और विशुद्ध कवितायें -
"आओ मिल जायें हम सुगन्ध और सुमन की तरह" (फ़िल्म - प्रेमगीत)
"चन्दन सा बदन चंचल चितवन" (फ़िल्म - सरस्वतीचन्द्र)
"एक अंधेरा लाख सितारे, एक निराशा लाख सहारे" (फ़िल्म - आखिर क्यों)
"कोई जब तुम्हारा हृदय तोड दे, तडपता हुआ जब कोई छोड दे" (पूरब और पश्चिम)
"मधुबन खुशबू देता है, सागर सावन देता है" (साजन बिना सुहागन)

ऐसे सैकडों उदाहरण दिये जा सकते है इन्दीवर साहब सशक्त की लेखनी के लिये... ऐसे महान हिन्दी सेवक को हमारा सलाम...

Wednesday, May 16, 2007

है "चीट" जहाँ की रीत सदा...

गीतों पर लिखते-लिखते अचानक मन में पैरोडी का ख्याल आया और यह ब्लॉग लिखने की सूझी... आदरणीय मनोजकुमार और गीतकार (शायद इन्दीवर) से माफ़ी के साथ यह कुछ पंक्तियाँ पेश हैं... यह गीत लगभग तीस वर्ष पहले लिखा गया था, लेकिन यह पैरोडी आज के हालात बयाँ करती है....

है "चीट" जहाँ की रीत सदा
मैं गीत वहाँ के गाता हूँ
भारत का रहने वाला हूँ "इंडिया" की बात सुनाता हूँ...

काले-गोरे का भेद नहीं हर जेब से हमारा नाता है
कुछ और ना आता हो हमको हमें रिश्वत लेना आता है...
जिसे मान चुकी सारी दुनिया, मैं बात वही दोहराता हूँ...
भारत का रहने वाला हूँ "इंडिया" की बात सुनाता हूँ...

जीते हों किसी ने देश तो क्या, "कंधार-मसूद" तो भ्राता हैं
यहाँ हर्षद अब तो है नर में, नारी मे अब तो "एकता" है..
इतने "रावण" हैं लोग यहाँ... मैं नित-नित धोखे खाता हूँ..
भारत का रहने वाला हूँ "इंडिया" की बात सुनाता हूँ...

इतनी ममता, नदियों को भी जहाँ नाला मिलकर बनाते हैं
इतना आदर ढोर तो क्या नेता भी पूजे जाते हैं..
इस धरती पे मैने जनम लिया... ये सोच के मैं घबराता हूँ..
भारत का रहने वाला हूँ "इंडिया" की बात सुनाता हूँ...
---------------------------

अब कुछ तुकबन्दियाँ -

बुश (ब्लेयर से) - ऐ..क्या बोलती तू
ब्लेयर - ऐ.. क्या मैं बोलूँ..
बुश - सुन
ब्लेयर - सुना
बुश - आती क्या बगदाद को
ब्लेयर - क्या करूँ आ के मैं बगदाद को
बुश - बम गिरायेंगे, मिसाइल फ़ोडेंगे, हत्या करेंगे और क्या...
----------------
मोहम्मद अत्ता -
ओ मै निकला जहाज ले के
रस्ते में न्यूयॉर्क आया मैं उत्थे टावर तोड आया..
रब जाने कब गुजरा वाशिंगटन, कब जाने पेंटागन आया
मैं उत्थे जहाज फ़ोड़ आया.. ओ मै निकला जहाज ले के...
----------------

Tuesday, May 15, 2007

Hindustan ki Kasam - Har Taraf ab Yahi Afsane

हर तरफ़ अब यही अफ़साने हैं... 

यह गीत है फ़िल्म "हिन्दुस्तान की कसम" से, गाया है मन्ना दादा ने, बोल हैं कैफ़ी आजमी के और संगीत है मदनमोहन का... मन्ना डे साहब ने मदनमोहन के लिये काफ़ी कम गाया है, लेकिन यह गीत बेहतरीन बन पडा है । उल्लेखनीय है कि यह एक युद्ध आधारित फ़िल्म है, और इसमें संगीत का कोई खास स्कोप नहीं था, लेकिन मदनमोहन जी ने फ़िर भी अपना जलवा बिखेर ही दिया । कैफ़ी आजमी अपने गीतों में उर्दू शायरी और लफ़्जों का अधिक इस्तेमाल करते हैं, लेकिन इस गाने में उन्होंने कोशिश की है कि क्लिष्ट / कठिन उर्दू शब्दों से परहेज किया जाये, ताकि यह लगे कि गीत एक आम फ़ौजी गा रहा है, और कहने की जरूरत नहीं कि वे इसमें वे सफ़ल रहे हैं । गीत को फ़िल्माया गया है राजकुमार पर -

हर तरफ़ अब यही अफ़साने हैं
हम तेरी आँखों के दीवाने हैं (२)
कितनी सच्चाई है इन आँखों में
खोटे सिक्के भी खरे हो जायें
तू कभी प्यार से देखे जो इधर
सूखे जंगल भी हरे हो जायें
बाग बन जायें, जो वीराने हैं
हम तेरी आँखों के दीवाने हैं...

नीची नजरों में है कितना जादू
हो गये पल में कई ख्वाब जवाँ
कभी उठने, कभी झुकने की अदा
ले चली जाने किधर जाने कहाँ
रास्ते प्यार के अन्जाने हैं
हम तेरी आँखों के दीवाने हैं (२)
हर तरफ़ अब यही अफ़साने हैं...


शब्दों की खासियत यह है कि आँखों की सच्चाई की ताब की तुलना किसी शायर नें "खोटा सिक्का खरा हो जाये" अथवा "सूखे जंगल हरे हो जायें" ऐसी नहीं की है लेकिन यहीं पर कैफ़ी साहब महफ़िल लूट ले जाते हैं । चित्रीकरण की विडम्बना यह है कि फ़ौजी अपनी प्रेमिका के लिये यह गीत गा रहा होता है, और उधर उसकी प्रेमिका बेवफ़ाई कर रही होती है, इससे फ़िल्म में यह गीत अधिक मार्मिक बन पडता है ।
अब कुछ फ़िल्म के बारे में - शायद यह पहली फ़िल्म थी जिसमें भारतीय सेना के विभिन्न लडा़कू विमानों के फ़िल्मांकन की इजाजत दी गई थी । राजकुमार पर मन्ना डे की आवाज फ़िट बैठती है (फ़िल्म मेरे हुजूर में भी "झनक-झनक तोरी बाजे पायलिया" मन्ना दा का ही गीत है राजकुमार पर फ़िल्माया गया) और राजकुमार की अदाओं के तो क्या कहने । इस फ़िल्म में प्रिया राजवंश भी हैं जो कि चेतन आनन्द की फ़िल्मों का अनिवार्य हिस्सा होती थीं (हकीकत, हिन्दुस्तान की कसम, कुदरत, हीर-राँझा आदि)। प्रिया राजवंश ऑस्ट्रेलियाई मूल की थीं और उनका हिन्दी संवाद अदायगी का एक बडा़ ही अजीब तरीका था (और अभिनय के बारे में न ही कहा जाये तो बेहतर) लेकिन चेतन आनन्द चूँकि उन पर फ़िदा थे इसलिये उन्हें अपनी पत्नी ही एकमात्र हीरोईन नजर आती थी । सम्पत्ति विवाद के चलते प्रिया राजवंश की कुछ वर्षों पूर्व ही हत्या हो गई थी। बहरहाल विषयांतर को छोड दिया जाये तो यह गीत बहुत ही मधुर है, और एक समर्पित सैनिक प्रेमी के दिल की सच्ची पुकार जैसा प्रतीत होता है... जैसा कि मैने पहले भी कहा है कि मेरी कोशिश रहेगी कि कम सुनाई देने वाले लेकिन उम्दा गीतों पर मैं कुछ लिखूँगा, उन्हीं में से यह एक गीत है...

Friday, May 11, 2007

Jab Jab tu Mere Samne - Shyam Tere Kitne Naam

जब-जब तू मेरे सामने आये...

विविध भारती पर गीतकार "अंजान" के जीवन-वृत्त पर एक कार्यक्रम आ रहा है जिसमे उनके पुत्र गीतकार "समीर" अपनी कुछ यादें श्रोताओं के सामने रख रहे हैं...अंजान ने वैसे तो कई बढिया-बढिया गीत लिखे हैं, जैसे "छूकर मेरे मन को.. (याराना)", "ओ साथी से तेरे बिना भी क्या जीना (मुकद्दर का सिकन्दर)", "मंजिलें अपनी जगह हैं रास्ते अपनी जगह. (शराबी)" आदि बहुत से... लेकिन उनका एक गीत जिसने मुझे हमेशा से बहुत प्रभावित किया है वह गीत बहुत कम सुनने में आता है..वह है फ़िल्म "श्याम तेरे कितने नाम" से.. गीत गाया है जसपाल सिंह ने और संगीत है रवीन्द्र जैन का और शायद इसे फ़िल्माया गया है सचिन-सारिका पर... इस गीत की खासियत है इसमें हिन्दी के शब्दों का अधिकतम उपयोग और पवित्रता लिये हुए मादकता.. जी हाँ चौंक गये ना.. मादकता भी पवित्र हो सकती है और अश्लील हुए बिना भी अपने मन की बात बेहद उत्तेजक शब्दों में कही जा सकती है, इस गीत में अन्जान जी ने यह साबित किया है...

जब-जब तू मेरे सामने आये
मन का संयम टूटा जाये (२)...
बिखरी अलकें, झुकी-झुकी पलकें
आँचल में ये रूप छुपाये
ऐसे आये छुई-मुई सी (२)
नजर से छू लूँ तो मुरझाये...
मन का संयम टूटा जाये
जब-जब तू मेरे सामने आये...

कंचन सा तन, कलियों सा मन
अंग-अंग अमृत छलकाये
जाता बचपन, आता यौवन
जाने कैसी प्यास जगाये..
मन का संयम टूटा जाये..
जब-जब तू मेरे सामने आये..


देखी आपने शब्दों की जादूगरी, वयःसन्धि के एक विशेष मोड पर खडे "युवक बनने की ओर अग्रसर" लड़के के मन में उठते तूफ़ान को कैसे अन्जान ने व्यक्त किया है और वे कहीं भी अश्लील नहीं लगे । "अलकें" शब्द का उपयोग हिन्दी फ़िल्मी गीतों में काफ़ी कम हुआ है, इसी प्रकार जो बात "आता यौवन" में है, वह "कमसिन" शब्द में नहीं, और मुझे लगता है कि आजकल के कई लोगों ने "छुई-मुई" का पौधा सिर्फ़ सुना ही होगा (मैने देखा और छुआ भी है), मतलब यह कि हिन्दी के कुछ "अलग हट के" शब्दों का उपयोग इस गीत में किया गया है, हो सकता है कि यह रवीन्द्र जैन या राजश्री वालों का आग्रह हो । मेरे विचार में इस गीत को "मादक" कहना ही उचित है, दिक्कत तब पैदा होती है, जब कथित आधुनिक शब्दावली उपयोगकर्ता "सेक्सी" शब्द का उपयोग करते हैं, मुझे "सेक्सी" शब्द से हमेशा असहजता महसूस होती है, क्योंकि आजकल शर्ट, जूते और यहाँ तक कि थप्पड भी "सेक्सी" होने लगे हैं, जबकि जूता या शर्ट कभी मादक नहीं हो सकते । एक बात गायक जसपाल सिंह के बारे में भी, उन्हें रवीन्द्र जैन ने ही "गीत गाता चल" में भी गवाया था, आजकल शैलेन्द्र सिंह की तरह वे भी गुमनामी में खो गये लगते हैं । इस गीत की लिंक (ऑडियो) मैने महाजाल पर ढूँढने की कोशिश की परन्तु नहीं मिली, यदि किसी भाई को मिले तो मुझे भेजें, ताकि सभी लोग इस मधुर गीत का आनन्द ले सकें ।

Thursday, May 10, 2007

विज्ञापनों पर सेंसर / आचार संहिता क्यों नहीं ?

आजकल जमाना मीडिया और विज्ञापन का है, चाहे वह प्रिंट मीडिया हो अथवा इलेक्ट्रानिक मीडिया, चहुँओर विज्ञापनों की धूम है । इन विज्ञापनों ने सभी आय वर्गों के जीवन में अच्छा हो या बुरा, आमूलचूल परिवर्तन जरूर किया है । कई विज्ञापन ऐसे हैं जो बच्चों के अलावा बडों कि जुबान पा भी आ जाते हैं । शोध से यह ज्ञात हुआ है कि विज्ञापनों से बच्चे ही सर्वाधिक प्रभावित होते हैं, उसके बाद टीनएजर्स और फ़िर युवा । व्यवसाय की गलाकाट प्रतियोगिता ने विज्ञापनों का होना आवश्यक कर दिया है, और कम्पनियाँ, गैर-सरकारी संगठन और यहाँ तक कि सरकारें भी बगैर विज्ञापन के नहीं चल सकते । लेकिन इस आपाधापी में तमाम पक्ष एक महत्वपूर्ण बात भूल जाते हैं, वह है विज्ञापनों में नैतिकता का लोप, अश्लीलता, छिछोरेपन और उद्दण्डता का बढता स्तर । एक मामूली सा उदाहरण - दस वर्षीय एक बालक ने अपने साथ क्रिकेट देख रहे माता-पिता से पूछा - पापा कंडोम क्या होता है ? मम्मी-पापा एक दूसरे का मुँह देखने के अलावा क्या कर सकते थे... बच्चे ने यह सवाल क्यों पूछा, क्योंकि मैच के दौरान राहुल द्रविड और वीरेन्द्र सहवाग जनता को हेल्मेट और पैड पहनकर यह सन्देश देते हैं कि "एड्स से बचाव ही सर्वोत्तम उपाय है", सन्देश सही है लेकिन उसका सम्प्रेषण गलत समय और गलत तरीके से होता है, बच्चे को तो यही लगता है कि राहुल द्रविड या सहवाग जरूर किसी क्रिकेट की वस्तु का विज्ञापन कर रहे होंगे, और हेलमेट और पैड पहनने के बाद कंडोम भी पहनना जरूरी है, और वह सहजता से अपना सवाल पूछता है, इसमें गलती किस की है, जाहिर है विज्ञापन बनाने वाले और उसे प्रसारित करने वाले दोनों की । जब कंडोम के विज्ञापन मैच के बीच में आयेंगे, तो यही समझा जायेगा कि यह सभी आयु वर्ग के लोगों के उपयोग की वस्तु है, जैसे कि चॉकलेट, साबुन या कोक । सारा परिवार साथ बैठकर एक सीरियल देख रहा है, अचानक एक "सेनेटरी नैपकिन" का विज्ञापन आता है, जिसमें एक आकर्षक युवती उसके गुणों के बारे में "विस्तार" से बताती है, अब नर्सरी अथवा प्रायमरी में पढने वाले बच्चे को उसके बारे में आप क्या समझायेंगे ? उस बच्चे को तो एक ही नैपकिन मालूम है, जिससे नाक पोंछी जाती है, यदि उसने टीवी वाला नैपकिन लाने की जिद पकड ली तो आप क्या करेंगे ? तात्पर्य यह कि न तो विज्ञापन कंपनियों, न ही टीवी चैनलों और ना ही सरकार को इस बात की समझ है कि जिस विज्ञापन को वे दिखा रहे हैं, उस विज्ञापन का "टारगेट ऑडियन्स" क्या है ? कहीं विज्ञापन फ़ूहड तो नहीं (फ़ूहड और अश्लील तो कोई विज्ञापन होता ही नहीं ऐसा सभी कम्पनियाँ मानती हैं) ? उस विज्ञापन का समाज और दर्शक वर्ग पर क्या और कैसा असर हो रहा है, इस बात की चिन्ता भी किसी को नहीं होती । तथाकथित ऎड-गुरु और मैनेजमेंट के दिग्गज हमें यदाकदा ज्ञान बाँटते रहते हैं कि विज्ञापन तभी अधिक प्रभावी और शक्तिशाली होता है, जब वह सही समय और सही दर्शक या श्रोता तक पहुँचे । जैसे गाँव में मर्सिडीज का विज्ञापन करना बेकार है और एयरपोर्ट पर खाद-बीज का... फ़िर कंडोम, सेनेटरी नैपकिन, महिलाओं-पुरुषों के अन्तर्वस्त्रों के विज्ञापन के लिये क्रिकेट मैच क्यों ? क्या इसलिये कि दर्शक संख्या ज्यादा है, लेकिन इसके दुष्प्रभावों के बारे में क्या ? सरकार अपनी ओर से यदि कोई कदम उठाये तो महेश भट्ट नुमा "अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पक्षधर" लोगों की आजादी खतरे में पड़ जाती है, या प्रीतीश नन्दी टाईप कोई बुद्धिजीवी पानी पी-पीकर सरकार को कोसने लगता है, फ़िर इसका इलाज कैसे हो ? क्या विज्ञापन एजेंसियों और मीडिया को स्व-अनुशासन नहीं रखना चाहिये ? इसका सर्वमान्य और लोकतांत्रिक हल यही हो सकता है कि मीडिया, विज्ञापन जगत की हस्तियाँ और प्रेस काऊंसिल के लोग साथ बैठें और तय करें कि "एडल्ट" विज्ञापन क्या हैं, और उनके प्रसारण का समय और कार्यक्रम क्या-क्या होने चाहिये, ताकि परिवार के साथ बैठकर टीवी देखने वालों को असुविधा का सामना ना करना पडे़, क्योंकि बच्चों का कोई ठिकाना नहीं, पता नहीं कब, क्या पूछ बैठें ? और हर व्यक्ति महेश भट्ट भी नहीं बन सकता । एक मजेदार उदाहरण याद आ रहा है - एक डिटर्जेण्ट बनाने वाली कम्पनी का विज्ञापन सऊदी अरब में करने का ठेका एक विज्ञापन एजेन्सी को दिया गया, लेकिन दस दिनों में ही वहाँ कम्पनी की सेल में भारी गिरावट दर्ज की गई, कारणों का पता करने पर यह बात सामने आई कि भारत की तरह ही विज्ञापन एजेन्सी ने सऊदी अरब में भी तीन पोस्टरों वाला "ऐड-केम्पेन" किया था, जिसमें पहले पोस्टर में एक चमकती हुई महिला मुस्कराते हुए एक गन्दा शर्ट दिखाती है, दूसरे पोस्टर में वह उसे डिटर्जेण्ट की बालटी में डालते हुए दिखती है, और तीसरे पोस्टर में वह सफ़ेद शर्ट निकालती है...दिक्कत यह थी कि सऊदी अरब में जैसा कि उर्दू पढते हैं (दाँये से बाँई ओर) वैसा जनता ने पढा और मतलब निकाला कि सफ़ेद शर्ट को इसमें डालने पर यह गन्दा हो जाता है..मतलब यह कि विज्ञापन कहाँ, कैसा और किसके बीच किया जा रहा है, इसका ध्यान रखना बहुत जरूरी है...तो उम्मीद करता हूँ कि विज्ञापन जगत के कुछ लोग मेरे इस ब्लोग को पढेंगे और "ऊ...प्पर" तक मेरी बात पहुँचायेंगे, ताकि भौण्डे विज्ञापनों पर अंकुश लग सके । कहीं यह ब्लोग ज्यादा भारी ना हो जाये इसलिये अब कुछ मजेदार (?) विज्ञापन भी देख लें ...


इसमें "कोक" हमसे कह रहा है कि जमीन का सारा पानी तो हमने ले लिया, अब आप लोग कोक पियो और मजे में जियो....


नीम की दातून की जगह "कोलगेट" उपयोग करो तो ऐसे दिखोगे....


"नाईकी" के आदेश को मानते हुए बच्चा वही कर रहा है, जो उसे कहा गया है... यानी "जस्ट डू इट"...

तो भैया.. मजा आया हो तो टिपियायें और दूसरों को भी टिपियाने का मौका दें वरना पैसा वापस...

Wednesday, May 9, 2007

India Pakistan Atomic War

भारत-पाकिस्तान परमाणु युद्ध...

अब चूँकि अमेरिका की लाख कोशिशों के बावजूद भारत-पाकिस्तान दोनो के पास परमाणु मिसाईल तकनीक मौजूद है, ऐसे में यदि भारत-पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध छिड जाये तो क्या मंज़र होगा इसका अध्ययन किया गया, और चूंकि अध्ययन एक अमेरिकी एजेन्सी ने किया है, इसलिये वह सही ही होगा (ऐसा मानने वाले अमेरिका से भारत में ज्यादा हैं)। उक्त अध्ययन के निष्कर्ष इस प्रकार हैं -

एक बार पाकिस्तानी सेना ने निश्चय किया कि भारत पर परमाणु मिसाइलों से हमला किया जाये, उन्होंने उसे लांच-पैड पर लगा दिया, क्योंकि उन्हें पाक सरकार की इजाजत की आवश्यकता नहीं थी, और मिसाइल दागने के लिये उल्टी गिनती चालू कर दी । भारत की तकनीक इतनी उन्नत है कि मात्र अठारह सेकंड में भारत को पता चल गया कि हम पर परमाणु हमला होने वाला है, लेकिन भरतीय सेना को सरकार की मंजूरी लेना होती है इसलिये भारतीय सेना ने सरकार के सामने परमाणु हमले को विफ़ल करने के लिये स्वयं पहले हमला करने की अनुमति राष्ट्रपति से माँगी । राष्ट्रपति ने सेना की यह सिफ़ारिश मंत्रिमण्डल के सामने रखी । प्रधानमन्त्री ने तत्काल लोकसभा की एक आपात बैठक बुलाई । लोकसभा का वह विशेष सत्र बहिष्कार और नारेबाजी के कारण अनिश्चितकाल के लिये स्थगित कर दिया । राष्ट्रपति ने टीवी पर भाषण देकर तुरन्त निर्णय लेने की आवश्यकता पर जोर दिया। इस बीच पाकिस्तान की मिसाइल में कुछ तकनीकी खराबी आ गई, और उन्होंने दोबारा उलटी गिनती चालू की । लेकिन इधर भारत मे सरकार अल्पमत में आ गई, क्योंकि उसे समर्थन दे रही एक विशेष पार्टी ने समर्थन वापस ले लिया । राष्ट्रपति ने प्रधानमन्त्री को विश्वास मत हासिल करने के निर्देश दिया । सरकार विश्वास मत में पराजित हो गई और राष्ट्रपति ने अगली व्यवस्था होने तक कामचलाऊ प्रधानमन्त्री को बने रहने को कहा ।

कामचलाऊ प्रधानमन्त्री ने सेना को परमाणु मिसाइल छोडने के आदेश दिये, लेकिन चुनाव आयोग ने कहा कि कामचलाऊ सरकार नीतिगत फ़ैसले नहीं कर सकती, क्योंकि चुनाव आचार संहिता लागू हो गई है, चुनाव आयोग ने एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगाई । हालांकि उच्चतम न्यायालय ने सत्ता और शक्ति के दुरुपयोग को मान लिया लेकिन "इमरजेंसी" को देखते हुए कामचलाऊ प्रधानमन्त्री को मिसाइल के उपयोग के लिये अधिकृत कर दिया । उसी समय पाक मिसाइल सही ढंग से छूट तो गई, लेकिन अपने निशाने से चार सौ किलोमीटर दूर इस्लामबाद में पाकिस्तान की ही एक सरकारी इमारत पर ठीक बारह बजे गिरी, संयोग से कोई जनहानि नहीं हुई, क्योंकि भारत की ही तरह वहाँ भी सरकारी कर्मचारी इमारत से बाहर थे । साथ ही उस मिसाइल पर लगा परमाणु बम भी कहीं पास की झील में जा गिरा था । अब पाकिस्तान ने चीन से उच्च तकनीक आयात करने का फ़ैसला किया । इस दरम्यान, भारत में इस मुद्दे पर विचार करने के लिये एक सर्वदलीय बैठक बुलाई गई और सर्वसम्मति से फ़ैसला हुआ कि भारत को पाकिस्तान पर परमाणु हमला कर देना चाहिये, तब तक सेना को अनुमति माँगे तीन माह का समय बीत चुका था ।

इसी समय अचानक मीडिया में "मानवतावादी", "परमाणु विरोधी" आदि लोगों ने मानव-श्रंखला वगैरह बनाना शुरु कर दिया था, एक विपक्षी पार्टी ने "रास्ता-रोको" का आयोजन कर डाला था, कुछ लोग जो तेंडुलकर का पुतला नहीं जला सके थे, उन्होंने टीवी पर आने के लिये मुशर्रफ़ का पुतला हाथों-हाथ जला लिया और अपने चेहरे टीवी पर देख कर खुश हो लिये । आप्रवासी भारतीयों ने भी वॉशिंगटन और कैलिफ़ोर्निया से ई-मेल का ढेर लगा दिया, उन्हें अपने देश से ज्यादा निवेश की चिंता होने लगी थी । दूसरी तरफ़ पाकिस्तान की मिसाइलें एक के बाद एक फ़ेल होती गईं, कुछ मिसाइलें तेज राजस्थानी हवाओं के कारण अरब सागर में जा गिरीं तो कुछ पाक अधिकृत जंगलों में । आखिर में अमेरिका से तस्करी की हुई एक मिसाईल सही तरीके से चली, लेकिन चूँकि पाकिस्तानियों को उसका सॉफ़्टवेयर समझ में नहीं आया था और वे कोड नहीं बदल पाये थे, इसलिये मिसाइल उसके मूल निशाने अर्थात मास्को की तरफ़ बढ चली । रूसियों ने तत्काल उस मिसाइल को मार गिराया और अपनी ओर से एक मिसाइल इस्लामाबाद पर गिरा दी । बस फ़िर क्या था, अफ़रातफ़री मच गई ।

हजारों मौतों के कारण पाकिस्तान ने विश्व समुदाय से मदद की अपील की, भारत ने भी इस घटना पर गहरा अफ़सोस जाहिर किया और एक हवाई जहाज भरकर बिस्किट भेजने का प्रबन्ध किया, ताकि उनके "भाई" भूखे ना रहें । फ़िर एक बार भारत ने संयुक्त राष्ट्र में कसम खाई कि वह कभी भी अपनी ओर से परमाणु हमले की पहल नहीं करेगा, और खुशी-खुशी रहने लगा । पाकिस्तान की जनता में तो कभी भी सेना से जवाबतलब करने की हिम्मत नहीं थी, सो वह भी खुशी-खुशी रहने लगी, और इस तरह समूचे "तंत्र" की "जागरूकता" और "सक्रियता" के कारण भारत-पाकिस्तान के बीच का परमाणु युद्ध होते-होते रह गया और मानवता कलंकित होने से बच गई ।

Saturday, May 5, 2007

कुछ मजेदार फ़ोटो (It happens only in India)

भाईयों
आज ब्लोग लिखने का समय ही नहीं मिला, और नारद पर अपना नाम देखने की बहुतों की तरह मेरी भी "खुजली" है, तो उस खुजली ने जोर मारा, और कुछ नहीं मिला तो ये कुछ फ़ोटो आप लोगों के लिये... (कम से कम दो दिन तक नारद पर थोबडा दिखता रहेगा)..






अब देखूँ कैसे लोग दाढी में तिनका ढूँढते हैं ....


















क्या करें "पापी पेट का सवाल है"... जो काम नेताओं को करना चाहिये वह हम कर रहे हैं...








कौन कहता है टेक्नोलॉजी के जमाने में बैलगाडी काम की नहीं रही ?









जब मेरा ब्लोग करोडों डालर कमाने लगेगा तब बिल गेट्स यही काम करेगा...













येई..पीसी लेलो, पीसी.. बढिया, ताजा पीसी ले लो बाबू...













अभी तो छत खाली है, अगले स्टेशन पर वो भी...खुली हवा में बिना टिकट, और क्या चाहिये...










हाँ, हलो.. इस कुम्भ में तो कोई खास धन्धा नहीं हुआ, अब उज्जैन में देखते हैं..मोबाईल रीचार्ज जरूर करवा देना बच्चा..









और सबसे अन्त में हमारे प्यारे "चाचा नेहरू"...







(कितने लोग जानते हैं कि नेहरू "चेन स्मोकर" थे ?)





बस अब और कुछ फ़ोटो अगले ब्लोग में (जिस दिन लिखने का समय नहीं होगा, और छपास की खुजली तेज होगी)...

Friday, May 4, 2007

Marathi Actors and Characters in Hindi Films

हिन्दी फ़िल्मों में मराठी चरित्र : कितने वास्तविक ?

हिन्दी फ़िल्में हमारे यहाँ थोक में बनती हैं, और जाहिर है कि फ़िल्म है तो विभिन्न चरित्र और पात्र होंगे ही, और उन चरित्रों के नाम भी होंगे । हिन्दी फ़िल्मों पर हम जैसे फ़िल्म प्रेमियों ने अपने कई-कई घंटे बिताये हैं (हालांकि पिताजी कहते हैं कि मेरी आज की बरबादी के लिये हिन्दी फ़िल्में और क्रिकेट ही जिम्मेदार हैं), लेकिन कहते हैं ना प्यार तो अंधा होता है ना, तो अंधेपन के बावजूद फ़िल्में देखना और क्रिकेट खेलना नहीं छोडा तो नहीं छोडा, खैर...हिन्दी फ़िल्मों में वैसे तो काफ़ी नाम विभिन्न नायकों पर लगभग ट्रेण्ड बन चुके हैं, जैसे अमिताभ बच्चन के लिये "विजय", जीतेन्द्र के लिये "रवि", या महमूद के लिये "महेश" आदि और वे पसन्द भी किये गये, लेकिन जब फ़िल्म निर्माता किसी किरदार के साथ उसका उपनाम भी जोड देता है तब वह निपट अनाडी लगने लगता है, क्योंकि जो भी उपनाम वह हीरो या विलेन के आगे लगाता है, उस समाज या धर्म के लोग उससे अलग सा जुडाव महसूस करने लगते हैं (जाति व्यवस्था पर हजारों ब्लोग लिखे जा सकते हैं लेकिन यह एक सच्चाई है इससे कोई मुँह नहीं मोड सकता).

तो बात हो रही है, फ़िल्मों में चरित्रों के नाम के आगे उपनाम जोडने की, दुर्भाग्य से हमारे हिन्दी फ़िल्म निर्माता-निर्देशक इस मामले में फ़िसड्डी ही साबित हुए हैं । यदि अमिताभ का नाम सिर्फ़ विजय रखा जाये तो कोई आपत्ति नहीं है, और दर्शक एक बार भी नहीं पूछेगा कि इस "विजय" का सरनेम क्या है, लेकिन जब निर्माता "विजय" के आगे श्रीवास्तव, वर्मा या जैन लगा दिया जाता है तो बात कुछ अलग हो जाती है.... फ़िर उस निर्माता का यह दायित्व है कि वह उस उपनाम के साथ जुडी़ संस्कृति का भी प्रदर्शन करे...। ईसाईयों को हमेशा यह शिकायत रही है कि उनके समाज का सही चित्रण सच्चे अर्थों में अब तक फ़िल्मों में नहीं हो पाया है, इक्का-दुक्का "जूली" या "त्रिकाल" जैसी फ़िल्मों को छोड दिया जाये तो फ़िल्मों में अक्सर जूली, लिली, रोजी, डिसूजा, एन्थोनी, जोसेफ़ आदि जैसे बेहद घिसे-पिटे नाम ही दिये जाते हैं और वे भी उन चरित्रों को जो गले में क्रास लटकाये मामूली से गुंडे होते हैं, या फ़िर एकदम दरियादिल चर्च के फ़ादर, बस....।

ठीक इसी प्रकार मराठी (महाराष्ट्र समाज) लोगों के चरित्र चित्रण में भी ये हिन्दी फ़िल्म निर्माता लगभग अन्याय की हद तक चले जाते हैं, जबकि फ़िल्म निर्माण का श्रीगणेश ही दादा साहब फ़ाल्के ने किया था, और इस बात को अलग से लिखने की आवश्यकता नहीं है कि मराठी कलाकारों ने हिन्दी फ़िल्मों को क्या और कितना योगदान दिया है । शोभना समर्थ, लीला चिटणीस से लेकर माधुरी दीक्षित और उर्मिला तक, या फ़िर दादा साहेब फ़ालके से लेकर अमोल पालेकर और नाना तक, सब एक से बढकर एक । लेकिन जब हम हिन्दी फ़िल्मों पर नजर डालते हैं तो पाते हैं कि मराठी पात्रों का चित्रण या तो हवलदार, क्लर्क, या मुम्बई के सडक छाप गुण्डे के रूप में किया जाता है, बहुत अधिक मेहरबानी हुई तो किसी को अफ़सर बता दिया जाता है ।

चूँकि हिन्दी फ़िल्म निर्माताओं का पाला मुम्बई पुलिस से बहुत पडता है, इसलिये हवलदारों का नाम भोंसले, पाटिल या वागले रखे जाते हैं । शिकायत इस बात से नहीं है कि इस प्रकार के चरित्र क्यों दिखाये जाते हैं, बल्कि इस बात से है कि निर्माता उस समाज की छवि के बारे में जरा भी परवाह क्यों नहीं करता । जब निर्माता फ़िल्मों में उपनाम रखता है तो स्वतः ही उनकी बोली, भाषा, हावभाव और संस्कृति उस किरदार से जुड जाते हैं । जैसे कि फ़िल्म "गर्दिश" में अमरीश पुरी का नाम है पुरुषोत्तम साठे, क्या विसंगतिपूर्ण नाम रखा गया... मुम्बई में पला-बढा और वहीं नौकरी करने वाला एक हवलदार पंजाबी स्टाईल में डॉयलाग क्यों बोलता है ? अमरीश पुरी किसी भी कोण से मराठी लगते हैं उस फ़िल्म में ? किसी फ़िल्म में शक्ति कपूर (शायद "इंसाफ़" या "सत्यमेव जयते" में) "इन्स्पेक्टर भिण्डे" बने हैं (भेण्डे नहीं) और पूरी फ़िल्म में जोकर जैसी हरकतें करते हुए "मी आहे इंस्पेक्टर भिण्डे" जैसा कुछ बडबडाते रहते हैं । तेजाब में अनिल कपूर का नाम "देशमुख" रखा गया है, ये तो गनीमत है कि उसके बाप को बैंक में कैशियर बताया गया है, लेकिन पूरी फ़िल्म में कहीं भी अनिल कपूर "देशमुख" जैसे नहीं लगते । इसके उलट हाल ही की एक फ़िल्म "हेराफ़ेरी" में परेश रावल को बाबूराव नाम के चरित्र में पेश किया है, तो वह एक "टिपिकल" मुम्बईया मराठी टोन में बोलता तो है, वही परेश रावल "हंगामा" में बिहारी टोन में बोलते हैं, तो कम से कम प्रियदर्शन ने इस बात का तो ध्यान रखा ही, "कथा" फ़िल्म में सई परांजपे ने उम्दा तरीके से एक मुम्बई की एक मराठी चाल का चित्रण किया था, महेश मांजरेकर चूंकि मुम्बईया पृष्ठभूमि से हैं इसलिये उन्होंने "वास्तव" में थोडा मराठीपन का ठीकठाक चित्रण किया । इसी प्रकार अर्धसत्य फ़िल्म में इंस्पेक्टर वेलणकर और उनकी पत्नी के रोल में स्मिता पाटिल खूब जमते हैं, और बैकग्राऊँड में जो रेडियो बजता है वह मराठी माहौल पैदा करता है । जबकि किसी एक फ़िल्म में आशीष विद्यार्थी "आयेला-जायेला" टाईप की मराठी बोलते पाये जाते हैं ।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि हिन्दी फ़िल्मों में कोई तमिल पात्र आता है तो सबसे पहले तो उसे "मद्रासी" का तमगा लगा दिया जाता है, फ़िर उसे लुंगी पहनाकर "अई..अई...यो... टाईप के डायलाग देकर रोल की इतिश्री कर दी जाती है । दरअसल इसके मूल में है पैसा, अधिकतर निर्माता निर्देशक गैर मराठी हैं, उन्हें न तो मराठी संस्कृति का विशेष ज्ञान होता है (इतने वर्षों तक मुम्बई में रहने के बावजूद), न उससे जुडाव, और जाहिर है कि फ़िल्म बनाने के लिये पैसा लगता है... । महेश मांजरेकर ने एक बार कहा था कि उन्हें मराठी पृष्ठभूमि पर एक जोरदार कहानी पसन्द आई थी, लेकिन फ़ायनेंसर ने कहा "यदि बनाना ही है तो हिन्दी फ़िल्म बनाओ, मराठी नहीं चलेगा", अर्थात पंजाब की मिट्टी, सरसों का साग, खेत, राजपूती आन-बान-शान, गुजराती डांडिया सब चलेगा, लेकिन मराठी की पृष्ठभूमि नहीं चलेगी ! फ़ूलनदेवी की बाईस हत्याओं और बलात्कार की फ़िल्म के लिये निर्माता आसानी से मिल जायेगा, लेकिन वीर सावरकर की फ़िल्म के लिये सुधीर फ़डके साहब को जाने कितने पापड बेलने पडे ।

हिन्दी के अभिनेताओं को क्या दोष देना, मराठी के सुपर स्टार अशोक सराफ़ और लक्ष्मीकांत बेर्डे भी हिन्दी में नौकर, हीरो का दोस्त, या मुनीम जैसे दस मिनट के रोल से संतुष्ट हो जाते हैं, जबकि ये रोल उन जैसे उत्कृष्ट कलाकारों के लायक नहीं हैं । देखते हैं कब कोई चोपडा, खन्ना, कपूर या खान, मराठी माहौल और नामों को सही ढंग से चित्रित करता है... और यह शिकायत हिन्दी फ़िल्म निर्माताओं से सभी को रहेगी, जैसे किसी पारसी का चरित्र निभाते-निभाते दिनेश हिंगू बूढे हो गये, सिन्धी चरित्र "अडी... वडीं साईं" से आगे नहीं बढते, इसलिये सबसे अच्छा तरीका है कि फ़िल्मों में उपनाम रखे ही ना जायें, उससे कहानी और फ़िल्म पर कोई फ़र्क नहीं पडने वाला है...

मराठी लोग आमतौर पर मध्यमवर्गीय, अपने काम से काम रखने वाले, कानून, नैतिकता और अनुशासन का अधिकतम पालन करने वाले होते हैं (जरा अपने दोस्तों, रिश्तेदारों से मराठियों के बारे में अपने अनुभव पूछ कर देखिये, या फ़िर साक्षात किसी साठे, गोडबोले, पटवर्धन, परांजपे, देशपांडे और हाँ... चिपलूनकर से मिलकर देखिये कि हिन्दी फ़िल्मों में मराठी नामों के साथ कैसी "इमेज" दिखाई जाती है, और असल में वे कैसे हैं)...

Wednesday, May 2, 2007

Tu Chanda Mai Chandni - Reshma aur Shera (Bal Kavi Bairagi)

तू चंदा.. मैं चाँदनी (Reshma aur Shera) : बालकवि बैरागी

आज जिस गीत के बारे में मैं लिखने जा रहा हूँ, वह गीत लिखा है बालकवि बैरागी जी ने, फ़िल्म है "रेशमा और शेरा" (निर्माता - सुनील दत्त) । ये गीत रेडियो पर कम बजता है, और बजता भी है तो अधूरा (दो अन्तरे ही), इस गीत का तीसरा अंतरा बहुत कम सुनने को मिलता है, जाहिर है कि रेडियो की अपनी मजबूरियाँ हैं, वे इतना लम्बा गीत हमेशा नहीं सुनवा सकते (जैसे कि फ़िल्म "बरसात की रात" की मशहूर कव्वाली "ये इश्क-इश्क है इश्क-इश्क" भी हमें अक्सर अधूरी ही सुनने को मिलती है, जिसके बारे में अगली किसी पोस्ट में लिखूँगा)... बहरहाल... ये गीत राजस्थानी शैली में लिखा हुआ गीत है, गीत क्या है एक बहती हुई कविता ही है, जिसे सरल हृदय बालकवि जी ने अपने शब्दों के जादू से एक अनोखा टच तो दिया ही, लेकिन असली कमाल है संगीतकार जयदेव का । गीत के बीच-बीच में जो "इंटरल्यूड्स" उन्होंने दिये हैं वे चमत्कारिक हैं । जलतरंग और शहनाई का अदभुत उपयोग उन्होंने किया है और किसी कविता को सुरों में बाँधना वैसे भी मुश्किल ही होता है... जयदेव जी हमेशा इस बात के पक्षधर रहे हैं कि पहले गीत के बोल लिखे जायें और फ़िर उसकी धुन बनाई जाये... और बालकवि बैरागी जी के इन शब्दों को धुन में पिरोना वाकई मुश्किल रहा होगा, जबकि साथ में यह जिम्मेदारी भी हो कि फ़िल्म के साथ उसका तारतम्य ना टूटने पाये और उसी पृष्ठभूमि में वह फ़िट भी लगे...गीत शुरू होता है धीमी-धीमी धुन से.... फ़िर जैसे कहीं दूर रेगिस्तान से सुरदेवी लता की आवाज आना शुरू होती है....

तू चन्दा... मैं चाँदनी... चाँदनी...
तू तरुवर मैं शाख रे...
तू बादल मैं बिजुरी... तू बादल मैं बिजुरी...
तू पंछी मैं पाँख रे...
तू चन्दा मैं चाँदनी......

गीत अपनी शुरुआत के इस पहले हिस्से से ही पकड़ बना लेता है, खासकर लताजी जब ऊँचे सुरों से शुरुआत करके "तू चन्दा मैं चाँदनी" के बाद बेहद धीमे सुरों में "तू बादल मैं बिजुरी" गाती हैं और फ़िर पुनः ऊँचे सुर में "तू पंछी मैं पाँख रे" की तान छेडकर हमें हिंडोले का मजा देती हैं...
अगला अंतरा बेहद शांति से शुरु होता है और इसमें लता जी की आवाज हमें एक दूसरी ही दुनिया में ले जाती है... मुझे लगता है कि गीत के हिस्से में जयदेव जी ने जानबूझकर ही वाद्यों का प्रयोग नहीं के बराबर किया... ताकि वहीदा रहमान का सुनील दत्त के प्रति समर्पण भाव खुलकर सामने आ सके और रेगिस्तान की पृष्ठभूमि का सही आभास वे पैदा कर सकें....
ना....सरवर ना... बावडी़
ना... कोई ठंडी छाँव..
ना कोयल ना पपीहरा
ऐसा मेरा गाँव से
कहाँ बुझे तन की तपन, कहाँ बुझे तन की तपन
ओ सैँया सिरमोर, चन्द्र किरन को छोड़कर जाये कहाँ चकोर रे
जाग उठी है साँवरे, मेरी कुआँरी प्यास रे...
अंगारे से लगने लगे, पिया अंगारे से लगने लगे
आज मुझे मधुमास रे, मधुमास रे... आज मुझे मधुमास....


इस अंतरे में बालकवि जी ने रेगिस्तान के गाँवों का वर्णन करके उसे "तन की तपन" से जोड़ दिया है, जो कि अदभुत है...जैसा कि अपने पोस्ट में यूनुस भाई ने कहा था कि इतने कोमल शब्द किसी-किसी गीत में ही मिलते हैं, और एक समर्पित प्रेमिका की अपने प्रेमी के प्रति आसक्ति की अधिकता में शब्दों की अश्लीलता ना आने पाये, यह कमाल किया है बैरागी जी ने... हिन्दी के कुछ उम्दा शब्दों को उन्होंने लिया है ताकि भावना भी व्यक्त हो जाये और अश्लीलता का तो सवाल ही नहीं....इस अंतरे के शुरु में वाद्य नहीं हैं, फ़िर धीरे-धीरे चौथी पंक्ति तक वे आते हैं और पैरा के अन्तिम लाईन आते-आते तेज हो जाते हैं (जब लताजी "आज मुझे मधुमास रे.... खासकर मधुमास शब्द के बीच में जो मुरकियाँ लेती हैं तो कलेजा चीर कर रख देती हैं)....

दूसरा अंतरा भी उसी प्रकार से शुरू होता है, लेकिन इस बार वाद्य भी साथ होते हैं....
तुझे आँचल में रखूँगी ओ साँवरे...
काली अलकों से बाँधूंगी ये पाँव रे...
गलबहियाँ वो डालूँ के छूटे नहीं...
मेरा सपना सजन अब छूटे नहीं...
मेहंदी रची हथेलियाँ, मेहंदी रची हथेलियाँ..
मेरे काजर वारे नैन रे...
पल-पल तुझे पुकारते, पिया पल-पल तुझे पुकारते, हो-हो कर बेचैन रे...
हो-हो कर बेचैन रे...


यहाँ भी "बेचैन रे...." की तान ठीक वैसी ही रखी गई है जैसी "मधुमास" शब्द की रखी गई है....मंतव्य वही है... आपसी दुश्मनी वाले दो कबीलों के दो प्रेमियों के बीच "तन की तपन", "मधुमास", "बेचैन", "गलबहियाँ", "काली अलकों" जैसे रहस्यमयी शब्द वाकई में गहरे असरकारक हैं...
तीसरा अंतरा जो कि कम सुनने को मिलता है....
ओ मेरे सावन सजन, ओ मेरे सिन्दूर..
साजन संग सजनी बनी, मौसम संग मयूर..
चार पहर की चाँदनी, मेरे संग बिता...
अपने हाथों से पिया मुझे लाल चुनर उढा..
केसरिया धरती लगे, अम्बर लालम-लाल रे..
अंग लगाके सायबा... अंग लगा के सायबा...
कर दे मुझे निहाल रे....कर दे मुझे निहाल रे...
तू चन्दा मैं चाँदनी.... तू तरुवर मैं शाख रे...


फ़िल्म की सिचुएशन के हिसाब से प्रेमिका जानती है कि उनका मिलन होना आसान नहीं है "चार पहर की चाँदनी, मेरे संग बिता...." और "केसरिया धरती लगे, लेकिन भविष्य की कल्पना करके अम्बर लालम-लाल" ऐसा उच्च श्रेणी का मेलजोल है सिचुएशन और गीत के बोलों में...तो इस प्रकार एक अनोखे गीत का अंत होता है... जिसमें क्या नहीं है, हिन्दी कविता का झरना, जयदेव का संगीत, लताजी की दैवीय आवाज, रेगिस्तान की पृष्ठभूमि में फ़िल्मांकन, सब मिलाकर एक बेहतरीन गीत....

दो दर्जन से अधिक पुस्तकों के लेखक, सच्चे गाँधीवादी काँग्रेसी, बालकवि बैरागी जी मध्यप्रदेश से विधायक, सांसद, केन्द्रीय मन्त्री रह चुके हैं, लेकिन उनकी सादगी अचंभित कर देने वाली है, आज भी वे सैकडों पत्रों का उत्तर अपने हाथों से देते हैं, और कुछ दिन पहले ही एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि डाक की बढती दरों के कारण उन्हें काफ़ी मुश्किल होती है... जिस जमाने में एक अदना सा महापौर भी पाँच साल में इतना कमा लेता है कि उसे पूरे जीवन भर कुछ नहीं करना पडता, ऐसे में बालकवि जी एक चमकदार लैम्प पोस्ट का काम करते हैं जो रास्ता दिखाता है...खैर....

यूनुस भाई के रेडियोवाणी से प्रेरित होकर मैने सोचा कि फ़िल्मी गीतों की गहराई और हिन्दी फ़िल्मों पर भी कुछ लिखा जाये... जैसे "दिल ढूँढता है" और अब यह गीत, हालांकि मेरे शब्दों में अधिक मुलायमियत नहीं है (शायद इसलिये कि मैने अधिकतर लेखन राजनीति और समाज पर किया है..) लेकिन यदि पाठकों को पसन्द आया तो यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा... आमीन...