Thursday, March 29, 2007

क्रिकेट का भविष्यवादी दुःस्वप्न

दिनांक 10 मार्च 2010
भारत की टीम पाँच देशों के टूर्नामेण्ट में खेल रही है, अन्य चार देश हैं सूडान, लीबिया, फ़िजी और आईसलैंड । आज भारत की क्रिकेट टीम का बहुत ही महत्वपूर्ण मैच है, उसे सूडान को हर हालत में हराना है, यदि वह आज का मैच जीत जाती है तो उसे 2011 में होने वाले विश्व कप में 35 वीं रैंक मिल जायेगी..मैच की सुबह गुरु ग्रेग और राहुल ने मैच की रणनीति बनाने के लिये टीम मीटिंग बुलाई । बहुत महत्वपूर्ण मैच था इसलिये गम्भीरता से टीम मीटिंग शुरु हुई... कमरे के एक कोने में ग्रेग और राहुल बैठे थे, धोनी एक तरफ़ अपने बालों में कंघी कर रहा था, सहवाग अपने गंजे सिर पर हाथ फ़ेर रहा था... तेंडुलकर अपने नये विज्ञापन का कॉन्ट्रेक्ट पढने में मशगूल था, सौरव सोच रहा था कि मुझे आज मीडिया में क्या बयान देना है... मतलब यह कि बहुत ही महत्वपूर्ण मीटिंग चल रही थी । गुरु ग्रेग सबसे पहले बोले - बॉयज.. आज हमारा एक खास मैच है, तो आओ हम बैटिंग लाइन-अप और गेंदबाजी के बारे में अपनी रणनीति बना लें... सौरव तुम ओपनिंग करोगे ?
सौरव - यह आप मुझे बता रहे हैं या मुझसे पूछ रहे हैं ? इसका जवाब मुझे पता नहीं है, लेकिन सूडान का एक गेंदबाज लगातार मेरी छाती और कमर को निशाना बना कर गेंदें फ़ेंकता है । अब इस उमर में मैं 50-60 मील प्रति घंटा की गेंदबाजी नहीं झेल सकता हूँ ।
ग्रेग - ठीक है कोई बात नहीं.. तुम हिट विकेट आऊट होकर आ जाना और बाद में मीडिया को कोई बयान दे देना, वैसे हमारी टीम की इमेज इतनी जोरदार है कि कोई भी बॉलर शॉर्टपिच गेंद नहीं फ़ेंकेगा... फ़िर भी..राहुल सौरव के साथ किसे भेजना चाहिये ओपनिंग के लिये ?
राहुल - मुझे लगता है सहवाग सही रहेगा, क्योंकि उसने बीस मैचों के बाद पिछले मैच में चार चौके लगाये थे, इससे लगता है कि वह अपने पुराने फ़ॉर्म में लौट आया है..क्यों सहवाग ?
सहवाग - जी सर
ग्रेग - चलो बढिया.. सचिन आप नम्बर चार पर जायेंगे ? मतलब आपकी जैसी मर्जी...
सचिन - मुझे 11 बजे शॉपिंग करने जाना है तो मैं दस ओवर के बाद ही जाऊँगा..
ग्रेग - ठीक है, सहवाग और सौरव छः ओवर तो निकाल ही लेंगे, फ़िर आप चले जाना..और अपना नैसर्गिक खेल खेलना..चलो धोनी तुम कीपिंग करोगे...
धोनी - मैं इस बार कीपिंग नहीं करूँगा, पिछले मैच में मैने चार घंटे कीपिंग की थी उसके कारण मेरे धूप से मेरे बाल खराब हो गये है और उसमें जूँए पड़ गई हैं.. मैं तो बल्लेबाज के तौर पर खेलूँगा..
ग्रेग - प्लीज एक बार आज के लिये कीपर बन जाओ.. यह हमारा बहुत महत्वपूर्ण मैच है..
धोनी - ठीक सिर्फ़ आज, लेकिन शाम को मुझे मॉडलिंग के लिये रैम्प पर भी उतरना है, इसलिये आगे से ध्यान रखना
इस बीच गुरु ग्रेग ने पिछले रिकॉर्ड के अनुसार देखा कि राहुल सबसे अधिक देर तक क्रीज पर टिका रहता है, तो ग्रेग चैपल ने कहा, राहुल तुम इन्हें बताओ कि कैसे तुम क्रीज पर टिके रहते हो...
राहुल - सच बात तो यह है कि मेरी बीबी बहुत ही बदसूरत है इसलिये मैं कोशिश करता हूँ कि अधिक से अधिक देर तक उससे दूर रह सकूँ और पिच ही वह जगह है जहाँ मैं सुकून से रह सकता हूँ, आपको याद होगा कि पिछले मैच में मैने ९३ गेंदों पर 4 रन बनाये थे और मैं बहुत खुश था... सभी खिलाडियों ने तालियाँ बजाईं..
ग्रेग ने कहा - चलो ठीक है.. गेंदबाजी की शुरुआत जहीर करेगा, क्योंकि वही सबसे कम वाईड फ़ेंकता है.. पिछले मैच में उसने सिर्फ़ 12 वाईड फ़ेंकी थीं । फ़िर गुरु ने कहा कि मैं देख रहा हूँ कि राहुल पर कप्तानी का बोझ कुछ ज्यादा ही पड़ रहा है, इसलिये मैने नया प्रयोग करने की सोची है, जिसके तहत टीम में अब तीन कप्तान होंगे, बैटिंग कप्तान, फ़ील्डिंग कप्तान और बॉलिंग कप्तान.. कैसा आईडिया है.. किसी ने कोई जवाब नहीं दिया..मैने देखा कि मुनाफ़ पटेल पिछले तीन मैचों से नॉट आऊट रहा है, इसलिये उसकी बैटिंग प्रतिभा को देखते हुए उसे मैं उसे बैटिंग कप्तान बनाता हूँ..सौरव लगभग १५० रन आऊट करवाने में शामिल रहा है, लेकिन खुद कभी रन आऊट नहीं हुआ, इसलिये मैं उसे फ़ील्डिंग कप्तान बनाता हूँ.. राहुल ने आपत्ति उठाई - लेकिन सौरव ने पिछले मैच में ही तीन कैच छोडे थे...गुरु ने कहा - लेकिन उसने बिलकुल सही दिशा में डाईव किया था, यही बहुत है । मैने देखा है कि पिछले तीन साल से अनिल कुम्बले लगातार टीम से बाहर रहा है, लेकिन उसने जम्हाई लेने के अलावा अपना मुँह कभी नहीं खोला, मैं उसकी खेल भावना की कद्र करते हुए उसे बॉलिंग कप्तान बनाता हूँ...
अन्त में गुरु ग्रेग ने टीम में जोश भरते हुए कहा - उठो लड़कों तुम्हें सूडान को हराना ही होगा.. बाहर लाखों लोग यज्ञ-हवन कर रहे हैं, बाल बढा रहे हैं, मन्दिरों में मत्था टेक रहे हैं.. चलो उठो..
वैसे मीडिया की जानकारी के लिये बता दूँ कि विश्व कप के बाद भारत के अगले चार अभ्यास मैच इस प्रकार से हैं -
12 अप्रैल - सरस्वती विद्या मन्दिर
15 अप्रैल - विक्रम हाई स्कूल
17 अप्रैल - स्टेन्फ़ोर्ड गर्ल्स कॉलेज
20 अप्रैल - सेंट मेरी कॉन्वेंट स्कूल...
इस सम्बन्ध में राहुल का कहना है कि हमारी पहली प्राथमिकता सरस्वती विद्या मन्दिर को हराने की होगी, क्योंकि मैने सुना है कि उनके पास कुछ युवा और जोशीले खिलाडी है... तो आईये हम भी हू..हा..इंडिया के लिये प्रार्थना करें...

Wednesday, March 28, 2007

मटुकनाथ और जूली कस्बा-ए-उज्जैन में

अभी कुछ सप्ताह पहले ही इन्दौर में एक समाचार पत्र के उदघाटन समारोह में मीडिया द्वारा बहुचर्चित "लव-गुरु" (?) मटुकनाथ और उनकी प्रेमिका जूली को आमंत्रित किया गया था, समाचार पत्र का नाम है "धर्मयुद्ध"...कैसा लगा नाम और उस नाम से "मैच" करता उनका उदघाटनकर्ता । अब यह सोचने की बात है कि मटुकनाथ और जूली को सामने रखकर किस प्रकार का "धर्मयुद्ध" लड़ने की तैयारी की जा रही है ? क्या अब समाचार-पत्र भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरह बेशर्म और समाज से कटे हुए होने लगे हैं ? यदि हाँ, तो यह एक राष्ट्रीय चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिये ? प्रेस काऊंसिल किस मर्ज की दवा है ? और यदि नहीं... तो फ़िर इस तरह के "आइकॉन" (? यदि वे हैं तो यह हमारा दुर्भाग्य है) को एक समाचार पत्र के उदघाटन के लिये बुलाने का क्या मकसद है ? उक्त समाचार पत्र किस तरह की खबरें अपने पाठकों को देना चाहेगा, क्या यह उसका पूर्वाभास मात्र था, या येन-केन प्रकारेण किसी भी भौंडे तरीके से क्यों ना हो...थोडा सा प्रचार हासिल करना या अपने "प्रोडक्ट" के बारे में ध्यान आकर्षित करवाना ? लेकिन जब कोई अखबार एक "प्रोडक्ट" बन जाता है तो वह आम जनता के सरोकारों से कट जाता है, उसका एकमात्र उद्देश्य अधिक से अधिक "बिकना" होता है, जैसा कि टीवी चैनलों के "टीआरपी" से सन्दर्भ में होता है, जिसके लिये वे किसी भी हद तक गिर सकते हैं... बहरहाल बात है मटुकनाथ और जूली की... चूँकि वे इन्दौर आये थे तो जैसा कि सभी लोग करते हैं वे हमारे उज्जैन भी पधारे...महाकाल के दर्शन करने और एक कार्यक्रम में भाग लेने । कार्यक्रम क्या था ?... अजी उनका सम्मान, और क्या ? चौंकिये नहीं.. उन जैसों का ही आजकल सम्मान होता है । तो वे इस कस्बानुमा, "टू बी शहर" और इन्दौर की भौंडी नकल में माहिर, स्थल पर पधारे । जैसा कि हरेक कस्बे या छोटी जगहों में होता है एक गुट विशेष के लोगों का मीडिया पर, उदघाटन समारोहों, सम्मान समारोहों आदि पर कब्जा होता है, उन्हीं मे से कुछ लोग फ़िर लायंस या रोटरी जैसे "स्टार" युक्त क्लबों के महानुभाव भी होते हैं, उनकी उपस्थिति में इन दोनों हस्तियों का सम्मान किया गया.. हँसी-ठिठोली की गई..खी-खी करके दाँत भी निपोरे गये, लोकल मीडिया ने उन्हें अच्छा कवरेज दिया (देना ही था, क्योंकि उनका 'इंतजाम' पूरा किया गया था)। इस पूरे तमाशे में सबसे अधिक खटकने वाली बात यह थी कि मटुकनाथ का सम्मान करने वालों में अधिकतर वे तथाकथित संभ्रांत लोग थे जो समाज के उच्च तबके के कहे जाते हैं, जिनसे उम्मीद (झूठी ही सही) की जाती है कि वे समाज में व्याप्त बुराईयों के खिलाफ़ आवाज उठायेंगे... इन्हीं लोगों ने सबसे पहले फ़िल्म "निःशब्द" की आलोचना की थी, शायद वह इसलिये होगी कि अमिताभ बाबा मन्दिरों के चक्कर लगाते-लगाते जिया खान से इश्क क्यों फ़रमाने लगे, कुछ ऐसे लोग भी उस सम्मान समारोह में थे, जिन्होंने "वाटर" का विरोध किया था, कुछ ऐसे लोग भी थे जो भारत की क्रिकेट टीम के हारने पर सर मुंडवा लेंगे, लेकिन परदे की झूठी छवियों का विरोध करने वाले ये खोखले लोग उस मटुकनाथ के सम्मान समारोह में खुशी-खुशी उपस्थित थे, जो अपनी ब्याहता पत्नी और बच्चों को छोडकर अपने से आधी उम्र की एक छोकरी के साथ सरेआम बेशर्मी से घूम रहा था, हँस रहा था । उन तथाकथित सज्जनों से एक सवाल करने को जी चाहता है कि यदि उनकी पुत्री को उनकी आँखों के सामने उसी का टीचर भगा ले जाये, तो वे क्या करेंगे ? क्या संस्कृति पर खतरे वाली बात उस समय वे भूल जायेंगे ? या इसे भी हँसकर टाल देंगे और बेटी से कहेंगे "कोई बात नहीं..तू एक शादीशुदा के साथ उसकी प्रेमिका बनकर रह, हमें कोई आपत्ति नहीं है" । और आज ही एक खबर पर नजर गई...कि बिहार में एक और "लव-गुरु" (?) ने अपनी पत्नी को त्यागकर अपनी शिष्या से प्रेम विवाह कर लिया है । लगता है कि ये तो अभी शुरुआत है, आगे-आगे देखिये होता है क्या...

Monday, March 26, 2007

गाँधीजी के तीन आधुनिक बन्दर

आपने गाँधीजी के तीन बन्दर तो देखे ही होंगे....

ये हैं "ओरिजिनल" वाले....







और अब देखिये आधुनिक बन्दर...


जो हमसे कह रहे हैं... "बुरा (भारत की हार) मत देखो, बुरा (प्रशंसक क्या कहते हैं) मत सुनो और बुरा (हार का स्पष्टीकरण) मत कहो"

Saturday, March 24, 2007

एण्ड नोबेल प्राईज गोज़ टू...इंडियन क्रिकेट टीम

चौंकिये नहीं... नोबेल पुरस्कार क्रिकेट टीम को भी मिल सकता है... अब देखिये ना जब से हमारी क्रिकेट टीम यहाँ से विश्व कप खेलने गई थी... तो वह कोई कप जीतने-वीतने नहीं गई थी...वह तो निकली थी एक महान और पवित्र उद्देश्य..."विश्व बन्धुत्व" का प्रचार करने । जब प्रैक्टिस मैच हुए तो भारत की टीम ने दिखा दिया कि क्रिकेट कैसे खेला जाता है... लेकिन जब असली मैच शुरू हुए तो भारत की टीम पहला मैच बांग्लादेश से हार गई... बांग्लादेश से वैसे भी भारत के बहुत मधुर सम्बन्ध हैं...वहाँ से हमारे यहाँ आना-जाना लगा रहता है... वह तो हमारा छोटा भाई है... इसलिये वहाँ क्रिकेट को बढावा देने के लिये बडे भाई को तो कुर्बानी देनी ही थी, सो दे दी । फ़िर बात आई पाकिस्तान की... अब आप सोचेंगे कि वह तो हमारे ग्रुप में ही नहीं था... लेकिन भई है तो हमारा पडोसी ही ना... जैसे ही वे मैच हारे और बाहर हुए... भारत की टीम का हाजमा भी खराब हो गया... फ़िर एक बार पडोसी धर्म निभाने की बारी थी "बडे़ भाई" की... सो फ़िर निभा दिया... रह गया था तीसरा पडोसी श्रीलंका... उससे भी हमने मैच हार कर उसे भी दिलासा दिया कि तुम अपने-आप को अकेला मत समझना... "बडे़ भाई" सभी का खयाल रखते हैं... सो श्रीलंका से भी मैच हार गये । अब सोचिये एक ऐसे महान देश की महान टीम जो कि विश्व बन्धुत्व की भावना से ही मैच खेलती है, क्या उसे शांति का नोबेल पुरस्कार नहीं मिलना चाहिये ? और यह तो मैने बताई सिर्फ़ एक बात जिससे नोबेल पुरस्कार मिल सकता है, मसलन...अर्थव्यवस्था की दृष्टि से भी इस महान टीम ने काम किया... अब ये लोग मैच जीतते रहते तो सट्टा चलता रहता, देशवासियों का करोडों रुपया बरबाद होने से इन वीरों ने बचाया... लोगबाग रात-बेरात जाग-जाग कर मैच देखते... अलसाये से ऑफ़िस जाते और काम-धाम नहीं करते... हमारी इस महान टीम ने अरबों घण्टों का मानव श्रम बचाया और लोगों को टीवी से दूर करने में सफ़लता हासिल की, इतना महान कार्य आज तक किसी ने किया है ? और रही बात कप की... तो ऐसे कप तो हमारे जयपुर में ही बनते हैं कभी भी जाकर ले आयेंगे... उसके लिये इतनी सारी टीमों से बुराई मोल लेना उचित नहीं है...क्या पता कल को उनमें से आडे़ वक्त पर कोई हमारे काम आ जाये... भाईचारा बनाये रखना चाहिये...
और भी ऐसी कई बातें हैं जो इसमें जोड़ दी जायें तो नोबेल पक्का... नोबेल वालों को घर पर आकर नोबेल देना पडे़गा... विश्व बन्धुत्व, अर्थव्यवस्था को एक बडा योगदान, करोडों मानव श्रम घण्टों की बचत, कोई भी एक टीम एक साथ इतने सारे क्षेत्रों में महान काम नहीं कर सकती... और तो और भारत की टीम से हमारे सदा नाराज रहने वाले वामपंथी भाई भी खुश होंगे, क्योंकि इन खिलाडियों ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से पैसे तो पूरे ले लिये लेकिन जब उनका माल बिकवाने की बारी आई तो घर बैठ गये... इसे कहते हैं "चूना लगाना"....तो भाई लोगों यदि आप भी ऐसा ही समझते हैं कि नोबेल पुरस्कार भारत की क्रिकेट टीम को ही मिलना चाहिये... तो अपने मोबाईल के बॉक्स में जाकर "मू" "र" "ख" टाईप करें और 9-2-11 पर एसएमएस करें... सही जवाबों में से किसी एक विजेता को मिलेगी धोनी के बालों की एक लट, जो उन्होंने वापस आते वक्त हवाई जहाज में कटवाई थी, ताकि कहीं लोग उन्हें पहचान ना लें... तो रणबाँकुरों उठो...मोबाईल उठाओ और शुरू हो जाओ...

Wednesday, March 21, 2007

Eclipse of Sun and Moon (World Water Day)

सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण और मान्यतायें (जल दिवस पर) 

अभी-अभी गत दिनों चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण दोनों आगे-पीछे ही पडे़ । उज्जैन में चूँकि धर्म का एक विशेष स्थान है और यह धार्मिक नगरी कहलाती है, इसलिये यहाँ के स्थानीय अखबारों और पंडे-पुजारियों से लेकर प्रशासन तक में एक बहस हुई, "शहर को जलप्रदाय किस समय किया जाये ?" भाई लोगों ने तमाम अखबार रंग डाले, हर ऐरे-गैरे का इंटरव्यू भी ले लिया... उसके पीछे का मंतव्य था कि चूँकि लोगों में यह मान्यता है कि ग्रहण के समय पानी नहीं पीना चाहिये ना ही भरना चाहिये, अब ग्रहण सुबह ६.०० बजे से ८.४० तक था, तो क्या पानी का सप्लाय उसके बाद किया जाये, या ६.०० बजे के पहले ही जलप्रदाय कर दिया जाये ? खेद की बात तो यह है कि जिस बात की आज तक कोई वैज्ञानिकता सिद्ध नहीं हुई (हुई हो तो कृपया मुझे लिंक भेजें) कि क्या वाकई ग्रहण के समय पानी में कोई खराबी आ जाती है ? और यदि आ जाती है तो क्या और कैसी खराबी आती है ? क्या इस पर कोई शोध हुआ है ?

मैं अवश्य ही जानना चाहूँगा.... ग्रहण के समय रखे हुए पानी के pH, BOD, COD, bacteria आदि के आँकडे यदि किसी के पास हों तो जरूर भेजें, कुछ प्रश्न सदा ही अनुत्तरित रहे हैं - जैसे :

१. क्या घरों मे रखा हुआ पानी ही ग्रहण के समय अशुद्ध हो जाता है ?
२. क्या सिर्फ़ पीने का पानी ही अशुद्ध होता है, या आम उपयोग वाला भी ?
३. यदि ग्रहण के दौरान पानी अशुद्ध ही हो जाता है तो फ़िर जिस बाँध से पानी आ रहा है, उसका पानी साफ़ क्यों रह पाता है ? और जिस पाईप लाईन से पानी आ रहा है और उसमें जो पानी बचा हुआ है क्या वह अशुद्ध नहीं होता ?
४. दूध वाला, ग्रहण के दौरान ही दूध लेकर आया, फ़िर सभी ने उससे दूध क्यों लिया ? क्या दूधवाले ने उस दिन पानी नहीं मिलाया होगा ?
५. रात को होटलों में जो पानी जमा था, अगले दिन सुबह लाखों लोगों ने वही पानी पिया होगा, उसका क्या ?
६. करोडों कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलें जो ग्रहण के दौरान खुले में रखी होंगी, क्या वे भी अशुद्ध हो गईं ?
आप लोगों को यकीन करना होगा कि.... ग्रहण के बाद जब नल आये तो हजारों लोगों ने घरों में रखा फ़ेंक दिया, और फ़िर बरतन धोकर नया पानी भरा, मतलब लाखों लीटर पानी ग्रहण की भेंट चढ़ गया...

मैं जानता हूँ कि राजस्थान के कई लोगों के दिल पर यह पढकर क्या गुजरी होगी, क्योंकि पानी का मोल सबसे ज्यादा वे ही जानते हैं । मजे की बात तो यह है कि सन २००४ में उज्जैन में भी ऐसा भीषण जल संकट आया था कि लोग अभी भी सोचकर काँप उठते हैं, लेकिन फ़िर भी जल का ऐसा अपव्यय ? लोगों की सोच पर तरस आता है । आज जल दिवस पर हमें यह संकल्प लेना होगा कि इस प्रकार की परम्पराओं का डटकर विरोध करेंगे । कहने का मतलब है कि हमारे यहाँ परम्पराओं को आँखें मूँदकर पाला जाता है, ना कोई तर्क, ना कोई वैज्ञानिक विश्लेषण... यदि कोई मान्यता वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो जाये तो उसे मानने में और भी मजा आयेगा और यह भी पता चलेगा कि ऐसा क्यों हो रहा है जिससे नई पीढी को हम और अधिक अच्छे से समझा सकेंगे, जैसे कि गर्भवती माता के गर्भ में भ्रूण को आठवें महीने से साफ़-साफ़ सुनाई देने लगता है, यह अभिमन्यु वाले केस में हमें पहले से मालूम था, जिसका वैज्ञानिक विश्लेषण बाद में हुआ, और वह भी हमें बाहर के वैज्ञानिकों ने बताया । जयद्रथ वध के दौरान जब वह रात्रि के भ्रम में बाहर आ गया था और अर्जुन ने उसका वध किया, उस समय की कालगणना के अनुसार उस दिन पूर्ण सूर्यग्रहण था, इसलिये हो सकता है कि उस वक्त कुरुक्षेत्र में अंधेरा छा गया हो....ऐसे और भी कई उदाहरण दिये जा सकते हैं... लेकिन प्रशासन भी जागरूकता बढाने की बजाय, पंडे-पुजारियों-प्रवचनकारों को अनावश्यक रूप से बढावा देने में लगा रहता है । मैने पहले भी यहाँ लिखा था कि बगैर किसी तर्क-वितर्क के हमें कई बातें गले उतार दी जाती हैं, जो कि गलत है, हरेक परम्परा का, मिथक का, किंवदंती का पूर्ण वैज्ञानिक आधार होना चाहिये । लेकिन "धर्म-इंडस्ट्री" (जी हाँ, यह एक विशाल इंडस्ट्री है जिसके द्वारा कईयों के पेट पल रहे हैं, कईयों के पेट कट रहे हैं, कईयों के पेट फ़ूल रहे हैं) के आगे हमारे यहाँ सभी नतमस्तक हैं ।

एक दिन सन २०२८ का

"स्व-आचार संहिता" : (यह लेख नईदुनिया इन्दौर में ३०.०४.२००६ को प्रकाशित हो चुका है) यह लेख / चुटकुला / घटना... एक ई-मेल पर आधारित / अनुवादित है, जिसके लेखक की मुझे जानकारी नहीं है । यदि कोई इसके मूलस्रोत के बारे में जानता हो तो कृपया मुझे सप्रमाण लिंक मेल करें, ताकि उसे इस लेख में जोडा़ जा सके ।
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जैसे-जैसे जीवन की गति तेज होती जा रही है, हमारे आसपास कम्प्यूटर का उपयोग बढने लगा है, ठीक इसी प्रकार प्रत्येक विभाग में कम्प्युटरीकरण द्वारा जानकारियाँ अथवा "डाटा" एकत्रित करने एवं उन जानकारियों को "प्लास्टिक कार्ड" में भरने का काम तेजी से हो रहा है, जिसे "कम्प्यूटराइज्ड रेकॉर्ड" कहा जाने लगा है, ताकि ग्राहकों, उपभोक्ताओं और आम जनता को कम से कम तकलीफ़ हो और समय की बचत हो, लेकिन यह कष्टदायी भी हो सकता है... कैसे आईये देखें....
कल्पना कीजिये कि सन २०२८ में एक ग्राहक किसी पिज्जा केन्द्र में फ़ोन करके पिज्जा मँगवाना चाहता है -
ऑपरेटर : पिज्जा के लिये फ़ोन करने का धन्यवाद, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ?
ग्राहक : क्या मैं पिज्जा का ऑर्डर....!
ऑपरेटर : कृपया पहले अपने बहुउपयोगी "स्मार्ट कार्ड" का नम्बर बतायें ।
ग्राहक : ओह... एक मिनट... नम्बर है ७८९७०९३४५-८९६७-९००८६३४ ।
ऑपरेटर :ओके, आप मि. सिंह हैं, जो कि १७, बडा़ कॉम्पलेक्स, आजाद नगर, उज्जैन से बोल रहे हैं । आपका फ़ोन नम्बर २५८७६९३, ऑफ़िस का २५६९८०० और मोबाईल ९८७६५३४५६० है ?
ग्राहक : ये सारे नम्बर आपको कैसे पता चले ?
ऑपरेटर : सर, हम शहर के मुख्य सर्वर से जुडे हुए हैं ।
ग्राहक : अच्छा, मैं एक चिकन पिज्जा का ऑर्डर देना चाहता हूँ...
ऑपरेटर : यह आपके लिये ठीक नहीं है ।
ग्राहक : कैसे ?
ऑपरेटर : आपके कम्प्यूटराइज्ड मेडिकल डाटा के अनुसार आपको ब्लड प्रेशर की शिकायत है और आपका कोलेस्ट्रोल भी बढा हुआ है ।
ग्राहक : ठीक है, ठीक है, फ़िर आप क्या सुझाव देते हैं ?
ऑपरेटर : आपको सलाद पिज्जा मँगवाना चाहिये, वह आप पसन्द करेंगे ।
ग्राहक : आपको कैसे मालूम ?
ऑपरेटर : अभी पिछले हफ़्ते आपने सेंट्रल लायब्रेरी से "सलाद पिज्जा कैसे बनायें" की किताब ली है ।
ग्राहक : (लगभग हार मानते हुए) ठीक है तीन फ़ैमिली साइज के सलाद पिज्जा भिजवा दीजिये, कितना पेमेंट हुआ ?
ऑपरेटर : हाँ यह ठीक है, आपकी नौ लोगों की फ़ैमिली के लिये । वैसे कुल कीमत होगी 5५0 रुपये ।
ग्राहक : क्या मैं क्रेडिट कार्ड से चुका सकता हूँ ?
ऑपरेटर : नहीं सॉरी सर, सिर्फ़ कैश, क्योंकि आपके क्रेडिट कार्ड की सीमा समाप्त हो चुकी है, और आप पर सत्रह हजार का क्रेडिट है ।
ग्राहक : फ़िर तो मुझे ATM तक जाना होगा और कैश लाना होगा ।
ऑपरेटर : आप वह भी नहीं कर सकते, क्योंकि कैश निकालने की प्रतिदिन की सीमा भी आप आज पार कर चुके हैं ।
ग्राहक : (मन ही मन @&*(&#(*^$(^&^) ठीक है आप पिज्जा तो भिजवाईये, मैं कैश ही पेमेंट करता हूँ, कितना समय लगेगा ।
ऑपरेटर : लगभग पैंतालीस मिनट, यदि आपको जल्दी हो तो आप अपनी लाल वाली बाईक से आ सकते हैं, क्योंकि आपकी कार तो आज रिपेरिंग को गई है ।
ग्राहक : ??????????
ऑपरेटर : और कुछ सर ?
ग्राहक : नहीं... वैसे आप मुझे कोक की तीन बोतलें तो मुफ़्त में देंगे ना, जो विज्ञापन में दिखाते हैं ।
ऑपरेटर : वैसे तो हम देते हैं लेकिन आपके इंश्योरेंस के मेडिकल रेकॉर्ड के मुताबिक आपको गैसेस की भी शिकायत है, इसलिये .....
ग्राहक : (अब तो पूरी तरह भड़क जाता है) अबे तेरी तो %^&&*&^%$
ऑपरेटर : सर अपनी भाषा पर कंट्रोल कीजिये, याद कीजिये अपनी जवानी में एक बार 15 जुलाई 2006 को एक पुलिसवाले को गाली देने के जुर्म में आप पर जुर्माना हो चुका है ।
अब तो ग्राहक बेहोश ही हो जाता है ।
तो मित्रों, यह नतीजा होगा... "सेंट्रली कम्प्यूटराइज्ड पर्सन रिकार्ड सिस्टम" का.....

ब्लोग आचार संहिता - समस्या (२)

साथियों... मेरे लेख "देश बनाने के लिये चाहिये क्रांतिकारी युवा" (जबकि यह लेख "नईदुनिया" इन्दौर में १५ अगस्त २००४ को प्रकाशित हो चुका है) पर मुझे प्रतिक्रियायें मिली उससे मुझे बहुत दुःख हुआ... एक सज्जन ने कहा कि ये विचार तो मेरे हैं पर समयाभाव के कारण मैं इसे कॉपीराईट नहीं करवा पाया... लीजिये साहब, अब विचारों का भी कॉपीराईट होने लगा... लगता है ब्लोगिंग बन्द करना पडेगा, कोई विचारों का कॉपीराईट बताता है, कोई चुटकुलों पर अपना हक जताता है, एक लताड़ मुझे इसलिये पडी़ थी कि मुझे लेखक के सोर्स का नाम पता नहीं था और मैने उसका उल्लेख नहीं किया । यदि कल मुझे बैंक हडताल पर कुछ लिखना होगा तो कोई भी आकर कहेगा कि ये तो मेरा विचार था... पत्र-पत्रिकाओं मे लिखते-लिखते १५ वर्ष (नईदुनिया, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका आदि) हो गये ऐसी स्थिति आज तक नहीं आई थी... समझ में नहीं आता क्या किया जाये....

Tuesday, March 20, 2007

बाजार की शक्तियों... जागो... भारत विश्व कप से बाहर हो जायेगा

बरमूडा को तथाकथित रूप से रौंदकर भारतवासियों ने थोडी चैन की साँस ली है... लेकिन अभी तो असली रण्संग्राम बाकी है... लेकिन यदि मेरी टेढी नजर से देखा जाये तो भारत सुपर-८ में जगह बना लेगा... आप पूछेंगे, कैसे ? तो भैये मुझे बाजार की शक्तियों और सट्टा बाजार पर पूरा भरोसा है... वे निश्चित रूप से कुछ जुगाड़ लगा लेंगे... श्रीलंका को "सेट" करेंगे, या बांग्लादेश को, पर हमारी टीम को सुपर-८ तक धक्का मारकर पहुँचायेंगे जरूर... आप पूछेंगे फ़िर भारत बांग्लादेश से क्यों हारा ? तो भैया बांग्लादेश में क्रिकेट को लोकप्रिय बनाने का समूचा ठेका भारत ने ले रखा है... हम पहले भी उनसे हार चुके हैं... डालमिया साहब ने आईसीसी वोट की खातिर उसे टेस्ट का दर्जा दिला दिया था.. अब हमें विश्व कप के बाद बांग्लादेश का दौरा करना है तो भाई वहाँ भी तो कुछ माहौल तैयार करना पडेगा ना...मुझे मालूम है आप फ़िर सोच रहे होंगे कि भारत कैसे सुपर-८ में पहुँचेगा ? तो हमारे रण-बाँकुरे सटोरिये वहाँ तमाम लैपटॉप और हथियारों के साथ पहुँच चुके हैं... वे श्रीलंका से कहेंगे कि तू तो बांग्लादेश को हराकर पहले ही आगे बढ गया है... हमने भी बांग्लादेश से हारकर पडोसी धर्म निभा दिया है... अब तू हमसे बडे अन्तर से हार जा फ़िर हम दोनों सुपर-८ में और बांग्लादेश विश्वकप जीतकर (भारत को हराने के बाद उनके कप्तान ने यही कहा था ना..) अपने घर... यदि श्रीलंकाई चीतों पर देशप्रेम कुछ ज्यादा ही चढ गया होगा तो फ़िर बांग्लादेश को "सेट" किया जायेगा... कि छोटे भाई तू तो पहले ही हमें हरा चुका है... बरमूडा से हार जा... फ़िर हम सुपर-८ में और तुम घर... रहा पैसा तो वह स्विस बैंकों में पहुँचाने का हमें बहुत अनुभव है... तुम लोगों के बांग्लादेश पहुँचने से पहले पैसा तुम्हारे अकाऊंट में होगा...
तो भाईयों... यदि श्रीलंका और बांग्लादेशी खिलाडियों पर "देशप्रेम" नाम का भूत सवार हो जाये तो और बात है वरना भारत का सुपर-८ में पहुँचना तय है, ऐसा मेरा दिल कहता है... जय सटोरिया नमः, जय बाजाराय नमः, जय विज्ञापनाय नमः...

ब्लोग लेख हेतु आचार संहिता - बहस

कल ही मैने एक ब्लोग लिखा था, जो कि किसी भाई का पहले से लिखा हुआ था... दरअसल हुआ यूँ कि बहुत पहले मैने एक लेख पढा था और मुझे बहुत अच्छा लगा था, उसे मैने ब्लोग पर डाला, परन्तु मुझे उसके लेखक के बारे में नहीं मालूम था.... इसलिये मैने उसमें उनका उल्लेख नहीं किया... हालांकि उसमें मैने यह लिखा था कि "यह लेख मेरा नहीं है..."
फ़िर भी यदि किसी की भावनाओं को चोट पहुँची हो तो मैं माफ़ी चाहता हूँ... आगे से ऐसे किसी लेख को ब्लोग पर डालते समय मैं उसमें यह भी लिख दूँगा कि "मुझे यह जानकारी नहीं है कि यह लेख किसका है, परन्तु यह मेरा नहीं है..."
एक और विषय इसी से जुडा हुआ - चुटकुलों पर क्या किसी का कॉपीराईट हो सकता है ? क्योंकि जब मैने एक चुटकुले को ब्लोग पर डाला तो भाई लोगों ने उसमें भी "आपने चुराया है" लिख मारा... अब बताईये क्या किया जाये ?

Sunday, March 18, 2007

Youth Power in India, Young Generation in India


 
देश बनाने के लिये चाहिये क्रांतिकारी युवा


देश, जितना व्यापक शब्द है, उससे भी अधिक व्यापक है यह सवाल कि देश कौन बनाता है ? नेता, सरकारी कर्मचारी, शिक्षक, मजदूर, वरिष्ठ नागरिक, साधारण नागरिक.... आखिर कौन ? शायद ये सब मिलकर देश बनाते होंगे... लेकिन फ़िर भी एक और प्रश्न है कि इनमें से सर्वाधिक भागीदारी किसकी ? तब तत्काल दिमाग में विचार आता है कि इनमें से कोई नहीं, बल्कि वह समूह जिसका ऊपर जिक्र तक नहीं हुआ... जी हाँ... आप सही समझे.. बात हो रही है युवाओं की... देश बनाने की जिम्मेदारी सर्वाधिक युवाओं पर है और वे बनाते भी हैं, अच्छा या बुरा, यह तो वक्त की बात होती है । इसलिये जहाँ एक तरफ़ भारत के लिये खुशी की बात यह है कि हमारी जनसंख्या का पचास प्रतिशत से अधिक हिस्सा पच्चीस से चालीस वर्ष आयु वर्ग का है.. जिसे हम "युवा" कह सकते हैं, जो वर्ग सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक, मानसिक सभी रूपों में सर्वाधिक सक्रिय रहता है, रहना चाहिये भी... क्योंकि यह तो उम्र का तकाजा है । वहीं दूसरी तरफ़ लगातार हिंसक, अशिष्ट, उच्छृंखल होते जा रहे... चौराहों पर खडे़ होकर फ़ब्तियाँ कसते... केतन पारिख और सलमान का आदर्श (?) मन में पाले तथाकथित युवाओं को देखकर मन वितृष्णा से भर उठता है । किसी भी देश को बनाने में सबसे महत्वपूर्ण इस समूह की आज भारत में जो हालत है वह कतई उत्साहजनक नहीं कही जा सकती और चूँकि संकेत ही उत्साहजनक नहीं हैं तो निष्कर्ष का अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है, लेकिन सभी बुराईयों को युवाओं पर थोप देना उचित नहीं है ।

क्या कभी किसी ने युवाओं के हालात पर गौर करने की ज़हमत उठाई है ? क्या कभी उनकी भावनाओं को समझने की कोशिश की है ? स्पष्ट तौर पर नहीं... आजकल के युवा ऐसे क्यों हैं ? क्यों यह युवा पीढी़ इतनी बेफ़िक्र और मनमानी करने वाली है । जाहिर है जब हम वर्तमान और भविष्य की बातें करते हैं तो हमें इतिहास की ओर भी देखना होगा । भूतकाल जैसा होगा, वर्तमान उसकी छाया मात्र है और भविष्य तो और भी खराब होगा । सुनने-पढ़ने में ये बातें भले ही निराशाजनक लगें, लेकिन ठंडे दिमाग से हम अपने आप से पूछें कि आज के युवा को पिछली पीढी़ ने 'विरासत' में क्या दिया है, कैसा समाज और संस्कार दिये हैं ? पिछली पीढी़ से यहाँ तात्पर्य है आजादी के बाद देश को बनाने (?) वाली पीढी़ । इन लगभग साठ वर्षों मे हमने क्या देखा है... तरीके से संगठित होता भ्रष्टाचार, अंधाधुंध साम्प्रदायिकता, चलने-फ़िरने में अक्षम लेकिन देश चलाने का दावा करने वाले नेता, घोर जातिवादी नेता और वातावरण, राजनीति का अपराधीकरण या कहें कि अपराधियों का राजनीतिकरण, नसबन्दी के नाम पर समझाने-बुझाने का नाटक और लड़के की चाहत में चार-पाँच-छः बच्चों की फ़ौज... अर्थात जो भी बुरा हो सकता था, वह सब पिछली पीढी कर चुकी । इसका अर्थ यह भी नहीं कि उस पीढी ने सब बुरा ही बुरा किया, लेकिन जब हम पीछे मुडकर देखते हैं तो पाते हैं कि कमियाँ, अच्छाईयों पर सरासर हावी हैं ।

अब ऐसा समाज विरासत में युवाओं को मिला है, तो उसके आदर्श भी वैसे ही होंगे । कल्पना करके भी सिहरन होती है कि यदि राजीव गाँधी कुछ समय के लिये (कुछ समय इसलिये क्योंकि पाँच वर्ष किसी देश की आयु में बहुत कम वक्फ़ा होता है) इस देश के प्रधानमन्त्री नहीं बने होते, तो हम आज भी बैलगाडी़-लालटेन (इसे प्रतीकात्मक रूप में लें) के युग में जी रहे होते । देश के उस एकमात्र युवा प्रधानमन्त्री ने देश की सोच में जिस प्रकार का जोश और उत्साह पैदा किया, उसी का नतीजा है कि आज हम कम्प्यूटर और सूचना तन्त्र के युग में जी रहे हैं (जो वामपंथी आज "सेज" बनाने के लिये लोगों को मार रहे हैं उस वक्त उन्होंने राजीव गाँधी की हँसी उडाई थी और बेरोजगारी-बेरोजगारी का हौवा दिखाकर विरोध किया था) । "दिल्ली से चलने वाला एक रुपया नीचे आते-आते पन्द्रह पैसे रह जाता है" यह वाक्य उसी पिछ्ली पीढी को उलाहना था, जिसकी जिम्मेदारी आजादी के बाद देश को बनाने की थी, और दुर्भाग्य से कहना पड़ता है कि, उसमें वह असफ़ल रही । यह तो सभी जानते हैं कि किसी को उपदेश देने से पहले अपनी तरफ़ स्वमेव उठने वाली चार अंगुलियों को भी देखना चाहिये, युवाओं को सबक और नसीहत देने वालों ने उनके सामने क्या आदर्श पेश किया है ? और जब आदर्श पेश ही नहीं किया तो उन्हें "आज के युवा भटक गये हैं" कहने का भी हक नहीं है । परिवार नियोजन और जनसंख्या को अनियंत्रित करने वाली पीढी़ बेरोजगारों को देखकर चिन्तित हो रही है, पर अब देर हो चुकी । भ्रष्टाचार को एक "सिस्टम" बना देने वाली पीढी युवाओं को ईमानदार रहने की नसीहत देती है । देश ऐसे नहीं बनता... अब तो क्रांतिकारी कदम उठाने का समय आ गया है... रोग इतना बढ चुका है कि कोई बडी "सर्जरी" किये बिना ठीक होने वाला नहीं है । विदेश जाते सॉफ़्टवेयर या आईआईटी इंजीनियरों तथा आईआईएम के मैनेजरों को देखकर आत्ममुग्ध मत होईये... उनमें से अधिकतर तभी वापस आयेंगे जब "वहाँ" उनपर कोई मुसीबत आयेगी, या यहाँ "माल" कमाने की जुगाड़ लग जायेगी ।

हमें ध्यान देना होगा देश में, कस्बे में, गाँव में रहने वाले युवा पर, वही असली देश बनायेंगे, लेकिन हम उन्हें बेरोजगारी भत्ता दे रहे हैं, आश्वासन दे रहे हैं, राजनैतिक रैलियाँ दे रहे हैं, अबू सलेम, सलमान खान और संजय दत्त को हीरो की तरह पेश कर रहे हैं, पान-गुटखे दे रहे हैं, मर्डर-हवस दे रहे हैं, "कैसे भी पैसा बनाओ" की सीख दे रहे हैं, कानून से ऊपर कैसे उठा जाता है, "भाई" कैसे बना जाता है बता रहे हैं....आज के ताजे-ताजे बने युवा को भी "म" से मोटरसायकल, "म" से मोबाईल और "म" से महिला चाहिये होती है, सिर्फ़ "म" से मेहनत के नाम पर वह जी चुराता है...अब बुर्जुआ नेताओं से दिली अपील है कि भगवान के लिये इस देश को बख्श दें, साठ पार होते ही राजनीति से रिटायरमेंट ले लीजिये, उपदेश देना बन्द कीजिये, कोई आदर्श पेश कीजिये... आप तो पूरा मौका मिलने के बावजूद देश को अच्छा नहीं बना सके... अब आगे देश को चलाने का मौका युवाओं को दीजिये... देश तो युवा ही बनाते हैं और बनायेंगे भी... बशर्ते कि सही वातावरण मिले, प्रोत्साहन मिले... और "म" से मटियामेट करने वाले ("म" से एक अप्रकाशनीय, असंसदीय शब्द) नेता ना हों.... आमीन...

Saturday, March 17, 2007

Save Water, Save Environment, Green Man in India

हरित मानव का पुनरागमन

लापोडिया (राजस्थान) में विगत वर्ष बहुत ही अल्प बारिश हुई । गाँव में वैसे तो तीन विशाल आकार के तालाब, जिनका नामकरण सौन्दर्यशास्त्र के आधार पर अन्नासागर, देवसागर और फ़ूलसागर... खाली पडे़ हुए थे । परन्तु, लापोडिया, जो सूरज की तीव्रता से झुलसता हुआ एक छोटी सी बस्ती वाला गाँव है और जयपुर से ८० किलोमीटर दूरी पर दक्षिण-पश्चिम मे स्थित है, में ना तो झुलसती हुई धरती को शांत करने के लिये कोई यज्ञ आयोजित किये गये और ना ही पानी के अतिरिक्त टैंकरों की जरूरत महसूस की गई । जो थोडे लोग गाँव छोडकर गये वे भी जयपुर में रोजगार की तलाश में गये थे ।

लेकिन आज अन्य गाँवों से भिन्न लापोडिया के कुँए पानी से लबालब भरे हुए हैं । खेत के किनारे हरी पत्तियों वाली साग-सब्जी, पालक, मैथी, आलू, मूली आदि से पटे हैं । हर परिवार के पास अलग से अतिरिक्त स्थान है, जिसमें उन्होंने पशु आहार के लिये ताजा हरा चारा उगा रखा है । गाँव से प्रतिदिन १६ हजार लीटर दूध का विक्रय होता है । यहाँ पर वृक्ष जैसे - नीम, पीपल, पान, खैर, देशी बबूल आदि की बहार है और पूरा गाँव सैकडों अजनबी पक्षियों की चहचहाहट से रोमांचित हो उठता है, जिसे एक पक्षी प्रेमी ही समझ सकता है । यह सारा दृश्य एक पक्षी अभयारण्य का रूप अख्तियार कर लेता है ।

लापोडिया को कोई दैवीय आशीर्वाद प्राप्त नहीं हो गया है, यह सब चमत्कार है श्री लक्ष्मण सिंह की बाजीगरी का । एक ऐसा ग्रामीण व्यक्ति, जो किसी महाविद्यालय में अध्ययन के लिये नहीं गया, किन्तु उसने दिन-प्रतिदिन के अपने अनुभवों एवं पारम्परिक ज्ञान को गूँथकर जल-संग्रहण की एक अनूठी पद्धति विकसित की । जिसका नाम उसने "चोका" रखा - जो एक छोटे बाँध के स्वरूप में जटिल ग्रिड वाली संरचना है, जिसमें पानी की हर बूँद जो धरा के ऊपर और भीतर मौजूद है, को संग्रहीत किया जाता है । पूर्व में जो पानी ऊपर मौजूद था, वह या तो खपत हो जाता था या सूख जाता था, किन्तु भूमिगत जल जो धरती के अन्दर है, छुपा ही रहता था । इस पानी में गाँव के १०३ कुँए कभी नहीं सूखने देने की क्षमता मौजूद थी । लक्ष्मणसिंह की इस ठेठ देशी सोच नेण दूर तक बसे लोगों का ध्यान आकर्षित किया । दो वर्ष पूर्व सूखे से झुलसते हुए अफ़गानिस्तान का एक प्रथिनिधिमण्डल पूर्वी राजस्थान के इस गाँव में लक्ष्मणसिंह से जल संग्रहण की इस तकनीक को करीब से जानने-समझने के उद्देश्य से आया था । मध्यप्रदेश शासन ने भी एक अध्ययन दल भेजा, राजस्थान सरकार भी लापोडिया के उदाहरण को लेकर एक "हैण्डबुक" निकालने जा रही है । किन्तु इन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अडोस-पडो़स के कई गाँवों जैसे जयपुर जिले के मेत, चापियाँ एवं ईटनखोई तथा टोंक जिले के बालापुरा, सेलसागर और केरिया में "चोका पद्धति" सफ़लतापूर्वक अंगीकार की गई है ।

५१ वर्षीय लक्ष्मणसिंह जो अपना स्वयं का एक एनजीओ "ग्राम विकास नवयुवक मण्डल" चलाते हैं, का कहना है कि अन्या गाँवों में भी इस काम को बखूबी अंजाम दे रहे हैं" । २०० परिवारों की बस्ती वाला यह गाँव पहले कभी ऐसा नहीं था । लापोडिया का शाब्दिक अर्थ है "झक्की लोग" जो एक सन्देहपूर्ण नाम इसके झगडालू प्रवृत्ति वाले लोगों के कारण मिला होगा । लक्ष्मण सिंह जी के पिता एक जमींदार थे, कहते हैं कि वे सब कुछ बदल देना चाहते है, जो लोग इस गाँव के बारे में धारणा बनाये हुए हैं । एक दिन टोंक जिले के समीप स्थित पारले गाँव का भ्रमण करते हुए वे एक "बुण्ड" (कच्ची मिट्टी की दीवारें) के सम्पर्क में आये । सिंह कहते हैं कि इनको देखकर ही उनके मस्तिष्क में "चोका पद्धति" को विकसित करने के बीज अंकुरित हुए । अगले पाँच वर्ष तक वे "बुण्ड" के आसपास के वातावरण का अवलोकन करते रहे और जल संरक्षण की इस तकनीक को विकसित करने में जुट गये ।

इसकी आधारभूत संरचना काफ़ी सरल है, इसमें बारिश का पानी जो धरती द्वारा सोख जाता है वाष्प बनकर उड़ता नहीं है और यदि रोका जाये तो इसका उपयोग जब जरूरत हो तब किया जा सकता है । इस तरह से धरती के भीतर मौजूद पानी की हर बूँद को संरक्षित किया जा सकता है । सिंह इस दिशा एवं विचार पर काम करना शुरू किया, और वे कहते हैं कि "मैं जिला अधिकारियों के पास सहायता के लिये गया, किन्तु वे मुझ पर हँसे और उन्होंने मुझसे कहा कि यह सम्भव नहीं है, और पूछा कि तुम किस महाविद्यालय मे अध्ययन के लिये गये हो ?" वर्ष १९९४ के लगभग सिंह ने एक "चोका मॉडल" विकसित कर लिया था । अब इसका लाभ स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, यह सब आँखों के सामने है । नंगी आँखों से चरागाह सूखे दिखाई पडते हैं, लेकिन यह छोटी घास से भरे पडे हैं, जिसमें पालतू पशु चरते हैं । विगत आठ वर्षों से बारिश नियमित नहीं है किन्तु कुँए भरे हुए हैं । गाँव वालों ने सामूहिक पद्धति और सहमति रखकर ५०% भूमि पर ही खेती-बाडी़ करने का निर्णय ले रखा है । इसी तरह कुँए भी सिंचाई के लिये सुबह के वक्त ही उपयोग में लिये जाते हैं ।
सिंह कहते हैं कि "हमें प्रकृति से वही लेना चाहिये जो वह हमें गर्व से और सहर्ष दे, यदि आप जोर-जबर्दस्ती से कुछ छीनना चाहेंगे तो प्रकृति स्वयं की संपूर्ति और आपकी आपूर्ति नहीं कर सकती" । 

परिणामस्वरूप आज लापोडिया में पक्षी बिना भय के चहचहाते हैं और खेत-खलिहान में हरियाली बिछी हुई है ।

Friday, March 16, 2007

तरकीब ...

एक बार चार युवक देर रात तक "बार" में मस्ती करते रहे और नशे में चूर होकर घर लौटे । अगले दिन उनकी एक महत्वपूर्ण परीक्षा थी । रात की मस्ती के कारण उन्हें अगली सुबह उठने में देर हो गई । उन्होंने सोचा कि परीक्षा में देर से पहुँचे तो प्रिन्सिपल डाँटेंगे और यदि अनुपस्थित रहे तो फ़ेल तो होना ही है, चारों ने एक तरकीब सोची..और अपने-अपने कपडे़ गन्दे कर लिये । कपडों पर मिट्टी और ऑईल रगड़ लिया, फ़िर चारों कॉलेज पहुँचे । उनकी पेशी प्राचार्य के सामने हुई, कारण पूछने पर उन्होंने बताया - सर... बहुत मुश्किल हो गई थी हम चारों साथ-साथ ही एक कार में परीक्षा देने निकले थे, लेकिन रास्ते में कार का टायर पंचर हो गया और कोई मदद नहीं मिली, इसलिये हमें आने में देर हो गई, देखिये सर हमारे कपडे अभी भी कितने गन्दे हो रहे हैं, इसलिये हम प्रार्थना करते हैं कि कृपया हमें फ़ेल ना किया जाये, बल्कि और किसी दिन हमारी परीक्षा ले ली जाये, हम उसके लिये तैयार हैं । प्राचार्य ने कहा - ठीक है तुम चारों परसों आ जाओ, तुम्हारी परीक्षा उस दिन ले लेते हैं । चारों युवक अपनी इस सफ़लता पर बहुत खुश हुए, उन्होंने सोचा कि चलो बच गये अब परसों तो परीक्षा दे ही देंगे, खूब बेवकूफ़ बनाया प्रिन्सिपल को... मजा आ गया । नियत दिन पर जब वे कॉलेज पहुँचे तो प्राचार्य ने कहा कि - तुम लोगों का मामला थोडा अलग है इसलिये तुम चारों अलग-अलग कमरों में बैठकर परीक्षा दोगे । युवक राजी हो गये । परीक्षा हुई, रिजल्ट आया और चारों युवक फ़ेल हो गये । दरअसल परीक्षा में सौ अंकों का सिर्फ़ एक सवाल पूछा गया था - कार का कौन सा टायर पंक्चर हुआ था ? इसलिये बूढों को कमतर नहीं आँकना चाहिये .... smile_teeth

वृद्धा और शर्त ...

शहर के सबसे बडे बैंक में एक बार एक बुढिया आई । उसने मैनेजर से कहा - "मुझे इस बैंक मे कुछ रुपये जमा करने हैं" । मैनेजर ने पूछा - कितने हैं, वृद्धा बोली - होंगे कोई दस लाख । मैनेजर बोला - वाह क्या बात है, आपके पास तो काफ़ी पैसा है, आप करती क्या हैं ? वृद्धा बोली - कुछ खास नहीं, बस शर्तें लगाती हूँ । मैनेजर बोला - शर्त लगा-लगा कर आपने इतना सारा पैसा कमाया है ? कमाल है... वृद्धा बोली - कमाल कुछ नहीं है बेटा, मैं अभी एक लाख रुपये की शर्त लगा सकती हूँ कि तुमने अपने सिर पर विग लगा रखा है । मैनेजर हँसते हुए बोला - नहीं माताजी मैं तो अभी जवान हूँ, और विग नहीं लगाता । तो शर्त क्यों नहीं लगाते ? वृद्धा बोली । मैनेजर ने सोचा यह पागल बुढिया खामख्वाह ही एक लाख रुपये गँवाने पर तुली है, तो क्यों न मैं इसका फ़ायदा उठाऊँ... मुझे तो मालूम ही है कि मैं विग नहीं लगाता । मैनेजर एक लाख की शर्त लगाने को तैयार हो गया । वृद्धा बोली - चूँकि मामला एक लाख रुपये का है इसलिये मैं कल सुबह ठीक दस बजे अपने वकील के साथ आऊँगी और उसी के सामने शर्त का फ़ैसला होगा । मैनेजर ने कहा - ठीक है बात पक्की... मैनेजर को रात भर नींद नहीं आई.. वह एक लाख रुपये और बुढिया के बारे में सोचता रहा । अगली सुबह ठीक दस बजे वह बुढिया अपने वकील के साथ मैनेजर के केबिन में पहुँची और कहा, क्या आप तैयार हैं ? मैनेजर ने कहा - बिलकुल, क्यों नहीं ? वृद्धा बोली- लेकिन चूँकि वकील साहब भी यहाँ मौजूद हैं और बात एक लाख की है अतः मैं तसल्ली करना चाहती हूँ कि सचमुच आप विग नहीं लगाते, इसलिये मैं अपने हाथों से आपके बाल नोचकर देखूँगी । मैनेजर ने पल भर सोचा और हाँ कर दी, आखिर मामला एक लाख का था । वृद्धा मैनेजर के नजदीक आई और धीर-धीरे आराम से मैनेजर के बाल नोचने लगी । उसी वक्त अचानक पता नहीं क्या हुआ, वकील साहब अपना माथा दीवार पर ठोंकने लगे । मैनेजर ने कहा - अरे.. अरे.. वकील साहब को क्या हुआ ? वृद्धा बोली - कुछ नहीं, इन्हें सदमा लगा है, मैंने इनसे पाँच लाख रुपये की शर्त लगाई थी कि आज सुबह दस बजे मैं शहर से सबसे बडे बैंक के मैनेजर के बाल दोस्ताना माहौल में नोचकर दिखाऊँगी । इसलिये बूढों को कभी कम ना समझें.....smile_teeth

Thursday, March 15, 2007

Beggers and Begging in India as Career




 

भीख और भिखारी : उम्दा व्यवसाय ? 

उक्त समाचार १५.०३.२००७ के "नईदुनिया" में छपा है....जरा सोचिये जब ३६ हजार की सिर्फ़ प्रीमियम है तो बीमा कितने का होगा और उसकी कमाई कितनी होगी ?
संभाजी काले और उनका चार सदस्यों वाला परिवार रोजाना एक हजार रुपये कमाता है, उनके बैंक खाते में कभी भी चालीस हजार रुपये से कम की रकम नहीं रही है । उन्होंने कई कम्पनियों में निवेश भी किया है, उनका एक फ़्लैट मुम्बई के उपनगर विरार में है और सोलापुर में पुश्तैनी जमीन तथा दो मकान हैं । आप सोच रहे होंगे, क्या यह परिवार शेयर ब्रोकर है ? या मध्यम वर्ग का कोई व्यापारी ? जी नहीं, संभाजी काले साहब अपने पूरे परिवार के साथ मुंबई में भीख माँगते हैं । चौंकिये नहीं, यह सच है और ऐसी ही चौंकाने वाली जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं जब "सोशल डेवलपमेंट सेंटर" (एसडीसी) मुम्बई के छात्रों नें डॉ.चन्द्रकान्त पुरी के निर्देशन में एक सामाजिक सर्वे किया । सर्वे के मुताबिक संभाजी काले जैसे कई और भिखारी (?) मुम्बई में मौजूद हैं । चूँकि सर्वे पूरी तरह से निजी था (सरकारी नहीं) इसलिये कुछ भिखारियों ने अपनी सही-सही जानकारी दे दी, लेकिन अधिकतर भिखारियों ने अपनी सम्पत्ति और आय के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बताया । फ़िर भी सर्वे करने वालों ने बडी मेहनत से कई चौंकाने वाले आँकडे खोज निकाले हैं । संभाजी काले के अनुसार वे पच्चीस साल पहले मुम्बई आये थे । कई छोटी-मोटी नौकरियाँ की, शादी की, कई सपने देखे, लेकिन पाया कि एक धोखाधडी के चलते वे सड़क पर आ गये हैं । फ़िर उन्होंने तय किया कि वे सपरिवार भीख माँगेंगे । ट्रैफ़िक सिअगनल के नीचे रखे लकडी के बडे खोके की ओर इशारा करते हुए वे कहते हैं "यही मेरा घर है" । काले का बाकी परिवार खार (मुम्बई का एक उपनगर) में रहता है, विरार में नहीं जहाँ उनका फ़्लैट है, क्योंकि खार से अपने "काम" की जगह पर पहुँचना आसान होता है । विरार तक आने जाने में समय भी खराब होता है । काले परिवार का सबसे बडा लडका सोमनाथ सबसे अधिक भीख कमाता है, क्योंकि वह अपनी एक टाँग खो चुका है (एक बार बचपन में भीख माँगते वक्त वह कार के नीचे आ गया था) । काले परिवार में तीन बच्चे और हैं - दो लड़कियाँ और एक लड़का । कुल जमा छः लोग भीख माँगकर आराम से एक हजार रुपये कमा लेते हैं । काले कहते हैं कि बुरे से बुरे दिनों में भी (अर्थात जब मुम्बई महानगरपालिका उन्हें अचानक खदेडने लग जाये, बन्द का ऐलान हो जाये, कर्फ़्यू लग जाये, लगातार दो-तीन दिन छुट्टी आ जाये आदि) वे तीन-चार सौ रुपये तो कमा ही लेते हैं । इस भिखारी परिवार को खार में बहुतेरे लोग जानते हैं और मजेदार बात यह है कि बैंक के कागजात या चिट्ठी-पत्री आदि भी उन तक पहुँच जाती हैं । उनका कहना है कि यह सब उनके अच्छे व्यवहार और पोस्टमैन से "सेटिंग" की वजह से हो पाता है । उक्त सर्वे के अनुसार प्रत्येक भिखारी औसतन प्रतिदिन दो-तीन सौ रुपये तो कमा ही लेता है और उनकी पसन्दीदा जगहें होती हैं ट्रैफ़िक सिग्नल और धार्मिक स्थान । पुरी साहब के अनुसार मात्र पन्द्रह प्रतिशत भिखारी ही असली भिखारी हैं, जिनमें से कुछ वाकई गरीब हैं । जिनमें से कुछ विकलांग हैं, कुछ ऐसे हैं जिन्हें उनके बेटों ने घर से निकाल दिया है, बाकी के पिचासी प्रतिशत भिखारी सिर्फ़ इसी "काम" के लिये अपने गाँव से मुम्बई आये हैं । वे बाकायदा छुट्टी मनाते हैं, अपने गाँव जाते हैं, होटलों में जाते हैं । उस वक्त वे अपनी "जगह" या "सिग्नल" दूसरे भिखारी को लीज पर दे देते हैं और प्रतिशत के हिसाब से उनसे पैसे वसूलते हैं । इच्छित जगह पाने के लिये कभी-कभी इनमें भयंकर खून-खराबा भी होता है और इनके गैंग लीडर (जो कि कोई स्थानीय दादा या किसी विख्यात नेता का गुर्गा होता है) बाकायदा मामले सुलझाते हैं, जाहिर है इसमें अंडरवर्ल्ड की भी भूमिका होती है । अपने-अपने इलाके पर कब्जे को लेकर इनमें गैंगवार भी होते रहते हैं । भिखारियों के अलग-अलग समूह बनाकर उनका वर्गीकरण किया जाता है, बच्चों को पहले चोरी करना, जेब काटना और ट्रेनों में सामान पार करना सिखाया जाता है, फ़िर उनमें से कुछ को भीख माँगने के काम में लिया जाता है । एक बार सरकार ने भिखारियों के पुनर्वास के लिये इन्हें काम दिलवाने की कोशिश की लेकिन कुछ दिनों के बाद वे पुनः भीख माँगने लगे । मुम्बई में लगभग एक लाख भिखारी हैं, इनके काम के घंटे बँधे होते हैं । शाम का समय सबसे अधिक कमाई का होता है । धार्मिक महत्व के दिनों के अनुसार वे अपनी जगहें बदलते रहते हैं । मंगलवार को सिद्धिविनायक मन्दिर के बाहर, बुधवार को संत माईकल चर्च, शुक्रवार को हाजी अली दरगाह और रविवार को महालक्ष्मी मन्दिर में उनका धन्धा चमकदार होता है । यह खबर भी अधिक पुरानी नहीं हुई है कि राजस्थान के पुष्कर में एक भिखारी करोडपति है और बाकायदा मोटरसायकल से भीख माँगने आता है । तिरुपति में एक भिखारी ब्याज पर पैसे देने काम करता है ।

इसलिये भविष्य में किसी भिखारी को झिडकने से पहले सोच लीजिये कि कहीं वह आपसे अधिक पैसे वाला तो नहीं है ? और सबसे बडी बात तो यह कि क्या आप उसे भीख देंगे ?

तो भाईयों सॉफ़्टवेयर इंजीनियर नहीं बन सकें, तो एक चमकदार कैरियर (वो भी टैक्स फ़्री) आपका इंतजार कर रहा है .... smile_teeth

Sunday, March 11, 2007

Hindi Language in India and Hindi Diwas

"सुद्ध" नहीं "शुद्ध" हिन्दी बोलो / लिखो

हमारी राष्ट्रभाषा अर्थात हिन्दी, जिसकी देश में स्थापना के लिये अब तक न जाने कितने ही व्यक्तियों, विद्यालयों और संस्थाओं ने लगातार संघर्ष किया, इसमें वे काफ़ी हद तक सफ़ल भी रहे हैं । अब तो दक्षिण से भी हिन्दी के समर्थन में आवाजें उठ रही हैं, और हमारी प्यारी हिन्दी धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रही है और अब इसे कोई रोक भी नहीं सकता । वैसे भी "बाजार"की ताकतें बहुत बडी हैं और हिन्दी में "माल" खींचने की काफ़ी सम्भावनायें हैं इसलिये कैसे भी हो हिन्दी का झंडा तो बुलन्द होकर रहेगा । तमाम चैनलों के चाकलेटी पत्रकार भी धन्धे की खातिर ही सही टूटी-फ़ूटी ही सही, लेकिन हमें "ईराक के इन्टेरिम प्रधानमन्त्री मिस्टर चलाबी ने यूएन के अध्यक्ष से अधिक ग्रांट की माँग की है" जैसी अंग्रेजी की बघार लगी हिन्दी हमें झिलाने लगे हैं, खैर कैसे भी हो हिन्दी का प्रसार तो हो रहा है ।

परन्तु हिन्दी बेल्ट (जी हाँ, जिसे अंग्रेजों और हमारे तथाकथित बुद्धिजीवियों की एक जमात ने "गोबर पट्टी" का नाम दे रखा है, पता नहीं क्यों ?) अर्थात उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्यप्रदेश के रहवासी शुद्ध हिन्दी लिखना तो दूर, ठीक से बोल भी नहीं पाते हैं, यह एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है । इन प्रदेशों को हिन्दी का हृदय-स्थल कहा गया है, अनेक महान साहित्यकारों की जन्मभूमि एवं कर्मभूमि यही चारों प्रदेश रहे हैं और इस पर गर्व भी किया जाता है । हिन्दी साहित्य को अतुलनीय योगदान इन्हीं प्रदेशों की विभूतियों ने दिया है । इन्हीं चारों प्रदेशों का गठन भाषा के आधार पर नहीं हुआ, इसलिये जहाँ बाकी राज्यों की हिन्दी के अलावा कम से कम अपनी एक आधिकारिक भाषा तो है, चाहे वह मराठी, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, उडिया, बंगाली, पंजाबी, मणिपुरी, कोंकणी आदि हों, वहीं दूसरी ओर से इन चारों हिन्दी प्रदेशों की आधिकारिक भाषा हिन्दी होते हुए भी आमजन में इसकी भीषण दुर्दशा साफ़ देखी जा सकती है । इन प्रदेशों में, मालवी है, बुन्देलखंडी है, बघेली, निमाडी़, भोजपुरी, अवधी और भी बहुत सी हैं.... गरज कि हिन्दी को छोडकर सभी अपनी-अपनी जगह हैं, और हिन्दी कहाँ है ? हिन्दी अर्थात जिसे हम साफ़, शुद्ध, भले ही अतिसाहित्यिक और आलंकारिक ना हो, लेकिन "सिरी बिस्वास" (श्री विश्वास) जैसी भी ना हो । ऐसी हिन्दी कहाँ है, क्या सिर्फ़ उपन्यासों में, सहायक वाचनों, बाल भारती, आओ सुलेख लिखें जैसी किताबों में । आम बोलचाल की भाषा में जो हिन्दी का रूप हमें देखने को मिलता है उससे लगता है कि कहीं ना कहीं बुनियादी गड़बडी है । यहाँ तक कि प्रायमरी और मिडिल स्कूलों में पढाने वाले कई अध्यापक / अध्यापिकायें स्नातक और स्नातकोत्तर होने के बावजूद सरेआम... "तीरंगा" और "आर्शीवाद" लिखते हैं, और यही संस्कार (?) वे नौनिहालों को भी दे रहे हैं, फ़िर उनके स्नातकोत्तर होने का क्या उपयोग है ? आम तौर पर देखा गया है कि 'श' को 'स' और 'व' को 'ब' तो ऐसे बोला जाता है मानो दोनों एक ही शब्द हों और उन्हें कैसे भी बोलने पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता । "अरे बिस्नू जी जे डीस तो बासेबल है" (विष्णु जी यह डिश वाशेबल है) सुनकर भला कौन अपना सिर नहीं पीट लेगा ?

लेकिन जैसा कि पहले ही कहा गया कि मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के कुछ हिस्सों में ऐसी हिन्दी बोलना कतई गलत नहीं माना जाता, बल्कि यह आम बोलचाल की भाषा बन गई है, लेकिन हिन्दी ही कहलाती है । कई स्थानीय चैनलों के समाचारों में 'चेनल' (चैनल), टावर चोक (चौक), बेट (बैट) और रेट (रैट) हमेशा सुनाई दे जाता है, जो कि बडा़ भद्दा लगता है । लेकिन जब "बिद्या" प्रदान करने वाले ही गलत-सलत पढायेंगे तो भविष्य में उसे ठीक करना मुश्किल हो जाता है । इसके मूल में है शुद्ध संस्कृत के अध्ययन का अभाव । जो अध्यापक या विद्यार्थी संस्कृत की तमाम क्रिया, लकारों के साथ शुद्ध बोल पायेंगे वे कभी भी हिन्दी में बोलते समय या लिखते समय "ब्योपारी", "बिबेक" या "संबिधान संसोधन" जैसी गलती कर ही नहीं सकते । रही-सही कसर हिन्दी को "हिंग्रेजी" बना देने की फ़ूहड़ कोशिश करने वालों के कारण हो रही है । खामख्वाह अपनी विद्वत्ता झाडने के लिये हिन्दी के बीच में अंग्रेजी शब्दों को घुसेड़ना एक फ़ैशन होता जा रहा है । यदि अंग्रेजी शब्द सही ढंग और परिप्रेक्ष्य में बोला जाये तो भी आपत्ति नहीं है, लेकिन "छत पर बाऊंड्री वॉल" (अर्थात पैराफ़िट वॉल), या "सिर में हेडेक", "सुबह मॉर्निंग में ही तो मिले थे", "उन्हें बचपन से बहुत लेबर करने की आदत है इसीलिये आज वे एक सेक्सीफ़ुल व्यक्ति हैं" सुनकर तो कोई भी कपडे़ फ़ाडने पर मजबूर हो जायेगा ।

जब किसी बडे अधिकारी या पढे-लिखे व्यक्ति के मुँह से ऐसा कुछ सुनने को मिलता है तो हैरत के साथ-साथ क्षोभ भी होता है, कि वर्षों से हिन्दी क्षेत्र में रहते हुए भी वे एक सामान्य सी साफ़ हिन्दी भी नहीं बोल पाते हैं और अपने अधीनस्थों को सरेआम "सांबास-सांबास" कहते रहते हैं, किसी अल्पशिक्षित व्यक्ति या सारी जिन्दगी गाँव में बिता देने वाले किसी वृद्ध के मुँह से ऐसी हिन्दी अस्वाभाविक नहीं लगती, लेकिन किसी आईएएस अधिकारी या प्रोफ़ेसर के मुँह से नहीं । इसलिये हमें "दुध" (दूध), "लोकि" (लौकी), "शितल" (शीतल) आदि लिखे पर ध्यान देने की आवश्यकता तो है ही, बल्कि क्या और कैसे बोला जा रहा है, क्या उच्चारण किया जा रहा है, इस पर भी विचार करने की आवश्यकता है । आईये प्रण करें कि भविष्य में जब कभी किसी से "पीछे का बैकग्राऊंड", "आगे का फ़्यूचर", "ओवरब्रिज वाला पुल", "मेरा तो बैडलक ही खराब है", जैसे वाक्य सुनाई दे जायें तो तत्काल उसमें सुधार करवायें, भले ही सामने वाला बुरा मान जाये...

Clap for 2 minutes and be Fit and Healthy

ताली बजाओ, स्वस्थ रहो चिकित्सा

वैसे तो इस विषय के बारे में बहुत से बन्धु जानते होंगे, परन्तु मुझे लगा कि यदि कोई नहीं जानता तो उसके लिये यह एक उपयोगी सामग्री होगी.... उज्जैन के ही एक शख्स श्री अरुण ऋषि का एक न्यास है जिसका नाम है "आरोग्यवान भवः न्यास"... तो अरुण जी के अनुसार यदि रोज प्रातः हम दो मिनट ताली बजायें तो हमारा शरीर स्वस्थ रह सकता है । ताली बजाने की विधि इस प्रकार है कि - हमारी दोनों हथेलियाँ पूरी खुली हों अर्थात दोनों हथेलियों के सभी बिन्दु आपस में अधिक से अधिक स्पर्श करें । खुली हवा में बैठें या खडे़ रहें...पूरी खुली हथेलियों को आपस में जोर से टकरायें... लेकिन शुरुआत में धीरे-धीरे कुछ सेकंड तक फ़िर उसे तेज करते जायें... लगभग एक मिनट तक लगातार ताली बजाने पर आपकी हथेलियों मे थोडी सी गर्मी आ जायेगी या हो सकता है कि किसी व्यक्ति की हथेलियों में हल्की सी जलन होने लगे... तब रुक जायें... दोनों हथेलियों को आपस में रगडें... और चेहरे पर मालिश करें... यही प्रक्रिया कुछ देर बाद जब हथेलियों की गर्मी, जलन खत्म हो जाये फ़िर से एक मिनट के लिये ताली बजायें... इस प्रकार कुल दो मिनट ताली रोज सुबह बजायें... इसके साथ ही रोज नहाते वक्त अपने पैरों के तलवे रगड़-रगड़ कर साफ़ करें... जैसे-जैसे आपके तलवे चमकदार होते जायेंगे, आपके चेहरे पर भी तेज बढता जायेगा... वैसे तो यह आजमाया हुआ तरीका है, लेकिन यदि किसी को इस पर विश्वास नहीं हो रहा हो तो वे कृपया इसे एक-दो महीने तक करके देखें, क्योंकि इसमे नुकसान कुछ भी नहीं है, सिर्फ़ फ़ायदा ही फ़ायदा है... उपरोक्त ताली चिकित्सा और कुछ नहीं बल्कि चीनी "एक्यूप्रेशर" का सरलतम रूप है... इसका वैज्ञानिक आधार यह है कि जब हम जोर-जोर से ताली बजाते हैं तो हमारे हथेलियों में स्थित सूक्ष्म बिन्दु जिनसे सारे शरीर को रक्त की आपूर्ति होती है वे सक्रिय हो जाते हैं । उन रक्त नलिकाओं पर दबाव बनता है और प्रातः की शुद्ध प्राणवायु के साथ मिलकर वह खराब रक्त को स्वच्छ करता है । साथ ही हृदय की धमनियों को जो रक्त जाता है वह भी अतिरिक्त शुद्ध होकर जाता है... जब आप एक मिनट तक लगातार ताली बजायेंगे तो आपको पसीना आयेगा, जिससे घबराने की आवश्यकता नहीं है... यदि एक मिनट तक लगातार नहीं बजा सकते हैं तो कोई बात नहीं जब हाथ में दर्द सा महसूस होने लगे, तत्काल रुक जायें... फ़िर कुछ देर बाद बजायें... धीरे-धीरे प्रैक्टिस से आप लगातार दो मिनट तक जोर-जोर से ताली बजा पायेंगे... यही एक्यूप्रेशर तकनीक तलुवों में भी काम करती है । हमारे शरीर के सभी अंगों के लिये हथेलियों और तलुवों में बिन्दु बने होते है सिर्फ़ उनपर दबाव देना होता है और सारी रक्त नलिकायें खुलती चली जाती हैं । ताली चिकित्सा का आधार हमारी आरतियों में भी समाहित है, जब सभी मिलकर ताली बजाते थे और आरती गाते थे । वैसे भी यह वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध हो चुका है कि घंटियों की आवाज से हवा में मौजूद सूक्ष्म कीटाणु और बैक्टीरिया मर जाते हैं । तो भाईयों... रोज दो मिनट ताली बजायें, नहाते वक्त तलवे रगडें और स्वस्थ रहें ।

Thursday, March 1, 2007

पौराणिक मान्यताओं पर प्रश्नचिन्ह क्यों ?

क्या किसी देश का इतिहास या उसकी पौराणिक मान्यतायें शर्म का विषय हो सकती हैं ? यदि हजारों वर्षों के इतिहास में कोई शर्म का विषय है भी, तो उसके मायने अलग-अलग समुदायों के लिये अलग-अलग क्यों होना चाहिये ? यह सवाल आजकल कई लोगों के मनोमस्तिष्क को झकझोर रहा है । इतिहास के साथ छेड़छाड़ करना शासकों का प्रिय शगल रहा है, लेकिन जब बुद्धिजीवी वर्ग भी उसी मुहिम में शामिल हो जाये तो फ़िर यह बहस का विषय हो जाता है । मंगल पांडे पर एक फ़िल्म बनती है और सारे देश में उसके बारे में चर्चा होने लगती है, पोस्टर फ़ाडे जाने लगते हैं, चाणक्य पर एक धारावाहिक बनता है, तत्काल उसे सांप्रदायिक घोषित करने की मुहिम चालू हो जाती है, ऐसा ही कुछ रामायण के बारे में भी करने की कोशिश की गई थी, लेकिन चूँकि रामायण जन-जन के दिल में बसा है, इसलिये विरोधियों को उस वक्त मौके की नजाकत देखते हुए चुप बैठना पडा़ । लेकिन जिस तरह की टिप्पणियाँ और विचार वाम समर्थकों द्वारा व्यक्त किये जा रहे हैं, वह भविष्य के एक खतरे की ओर संकेत करते हैं...
कभी हमें पाठ्यपुस्तकों में यह बताया जाता है कि राम और कृष्ण मात्र कल्पना है, इनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है । यदि इन लेखकों की चले तो इनके अनुसार वैज्ञानिक आधार ईसा के जन्म के बाद ही माना जाता है । उसके पहले का भारत कुछ कबीलों, साँप पकड़ने वालों, और छोटी-छोटी रियासतों के आपस मे लड़ मरने वाला एक भूभाग मात्र ही था । उसकी कोई संस्कृति थी ही नहीं । अब कोई उनसे पूछे कि यदि राम और कृष्ण काल्पनिक हैं तो सदियों से उनके नाम, कर्म, कथायें और आदर्श पीढियों से पीढियों तक कैसे चलते आये हैं ? "नासा" ने यह क्यों कहा कि भारत और श्रीलंका के मध्य वाकई में एक पुलनुमा "स्ट्रक्चर" था ! महाभारत में "कुरुक्षेत्र" का उल्लेख क्यों है, टिम्बकटू का क्यों नहीं ? रामायण में पंचवटी का उल्लेख क्यों है, कजाकिस्तान का क्यों नहीं ? यह सब क्या है, मात्र कल्पना या एक मुखारविन्द से दूसरे मुखारविन्द तक फ़ैलती गई अफ़वाहें ? यह माना जा सकता है कि इन चरित्रों से जुडे़ कथानक कहीं-कहीं अतिशयोक्तिपूर्ण हो गये हों, लेकिन जब किंवदंतियाँ होती हैं, तो ऐसी कहानियाँ जन्म ले ही लेती हैं । मैं खुद यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि गोवर्धन पर्वत सचमुच में एक ऊँगली पर उठाया गया होगा । हो सकता है यमुना नदी में एक भयंकर साँप को कृष्ण ने मारा होगा, जिसे अनेक लोगों ने कहानी सुनाते-सुनाते, दसियों फ़न वाले राक्षस का रूप दे दिया...अब जाहिर है कि अर्जुन के रथ पर हनुमान सवार नहीं हो सकते, लेकिन ऐसा कुछ तो हुआ ही होगा, जिसके कारण इस कथा को बल मिला, और हजारों वर्षों तक करोडों लोगों ने इस बात पर विश्वास किया । दरअसल इन घटनाओं के व्यापक विश्लेषण की आवश्यकता है, लेकिन सिरे से इनको काल्पनिक घोषित कर देना मानसिक दिवालियापन है.. ठीक उसी तरह जिस तरह से इन कहानियों पर आँख मूँद कर विश्वास कर लेना...अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं है, अब से मात्र सौ वर्ष पश्चात लोग इस बात पर यकीन ही नहीं करेंगे कि अहिंसा से भी कोई आन्दोलन खडा किया जा सकता है, और गाँधी नाम का कोई व्यक्ति इस धरती पर चलता-फ़िरता रहा होगा, उस समय भी गाँधी के बारे में कई तरह के मिथक पैदा हो जायेंगे... ये तो होता ही है, लेकिन प्रत्येक बात को आँख मूँद्कर मान लेना या हरेक बात का विरोध के लिये विरोध ठीक नहीं है.. इन वाम लेखकों का बस चले तो ये तुलसीदास को भी काल्पनिक घोषित कर दें । दरअसल यह सब हो रहा है एक विशेष अभियान के तहत और विशिष्ट मानसिकता का पोषण करने के लिये... किस तरह से हिन्दुओं के मन में हीनभावना को जगाया जाये, यह इस मुहिम का हिस्सा होता है । हमें बताया जाता है कि महाराणा प्रताप भगौडे़ थे, या असल में शिवाजी का राज्य कभी था ही नहीं । औरंगजेब से लड़ने वाले सिख गुरुओं की भी प्रशंसा नहीं की जाती, लेकिन अकबर के दीन-ए-इलाही के कसीदे काढे जाते हैं... और भी ऐसे अनेकों उदाहरण हैं... हो सकता है कि इन्होंने यह सब किया भी हो, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि बाकी के सारे हिन्दू राजा या लडाके निरे मूर्ख थे ? इसी विध्वंसक मानसिकता से ग्रसित होकर सतत वन्देमातरम का विरोध किया जाता है, सरस्वती वन्दना की हँसी उडाई जाती है, हिन्दी को हीन दृष्टि से देखने की परम्परा विकसित की जाती है... प्रेमचन्द कुछ नहीं थे, लेकिन शेक्सपीयर महान थे, निराला और महादेवी वर्मा को कोई खास महत्व नहीं लेकिन कीट्स का गुणगान, यह सब क्या है ? बार-बार यह अह्सास दिलाने की कोशिश की जाती है कि "भारत की संस्कृति" नाम की कोई चीज ही नहीं है । लेकिन उन "बाँये चलने वाले लेखकों" के लाख प्रयासों के बावजूद यह तथ्य एक सर्वेक्षण में उभरकर आया है कि लोगों में धार्मिकता बढी है, चाहे उसके कोई दूसरे कारण क्यों ना हो । इस स्थिति का फ़ायदा अंधविश्वास बढाने में लगे "दुकानदारों" ने भी उठाया है, और अधिक आक्रामक तरीके से अपनी "मार्केटिंग" करके जनता में धर्म को प्रचारित करने में लगे हैं । जबकि लोगों में अपने इतिहास का सच जानने की भूख है । आवश्यकता है उसे सही दिशा देने की, उन्हें वैज्ञानिक तरीके से समझाने की, तर्क-वितर्क से बात को दिमाग में बैठाने की,  न कि उनके दिमागों में गलत-सलत जानकारी भरने की । लेकिन दुर्भाग्य से यही हो रहा है, जिसमें दोनों पक्ष शामिल हैं....