Tuesday, February 27, 2007

बिल गेट्स को शिकायती पत्र (Complaint to Bill Gates)

आदरणीय बिल्लू भिया को,
इंडिया से मुंगेरीलाल सरपंच का सलाम कबूल हो... आपके देश के एक और बिल्लू भिया (बतावत रहें कि प्रेसीडेंटवा रहे) ऊ भी इस पंचायत को एक ठो कम्प्यूटर दे गये हैं । अब हमरे गाँव में थोडा-बहुत हमही पढे-लिखे हैं तो कम्प्यूटर को हम घर पर ही रख लिये हैं । ई चिट्ठी हम आपको इसलिये लिख रहे हैं कि उसमें बहुत सी खराबी हैं (लगता है खराब सा कम्प्यूटर हमें पकडा़ई दिये हैं), ढेर सारी "प्राबलम" में से कुछ नीचे लिख रहे हैं, उसका उपाय बताईये -
१. जब भी हम इंटरनेट चालू करने के लिये पासवर्ड डालते हैं तो हमेशा ******** यही लिखा आता है, जबकि हमारा पासवर्ड तो "चमेली" है... बहुत अच्छी लडकी है...।
२. जब हम shut down का बटन दबाते हैं, तो कोई बटन काम नही करता है ।
३. आपने start नाम का बटन रखा है, Stop नाम का कोई बटन नही है.... रखवाईये...
४. क्या इस कम्प्यूटर में re-scooter नाम का बटन है ? आपने तो recycle बटन रखा है, जबकि हमारी सायकल तो दो महीने से खराब पडी है...
५. Run नाम के बटन दबा कर हम गाँव के बाहर तक दौड़कर आये, लेकिन कुछ नही हुआ, कृपया इसे भी चेक करवायें या फ़िर Sit नाम का बटन बनायें...
६. कल हमारी चाबियाँ खो गई थीं, Find का बटन दबाया, लेकिन नहीं मिली, क्या किया जाये ?
७. Out-Look का बटन दबा कर छोरे को बहुत देर तक बाहर देखने को बोला,,, भैंस और चमेली के अलावा कुछ नहीं दिखा....
८. programs तो आपने बहुत दिये हैं लेकिन हमरे काम का कुछ नहीं, इसलिये प्रार्थना है कि... जीटीवी, एमटीवी भी चालू करवा दें... मजा आ जायेगा....
९. Paste की भी कोई जरूरत नहीं है... हम तो नीम की दातौन करते हैं...
१०. सिर्फ़ एक बात तारीफ़ की है... कि आपने ये कैसे जाना कि यह "My Computer" है ?
जल्दी से जल्दी कम्प्यूटर ठीक करवाने की कृपा करें... ताकि पंचायत का काम "सई-साट" चले...

हस्ताक्षर / अंगूठा
सरपंच मुंगेरीलाल

गाय पर निबन्ध (सन २०४०)

समय तेजी से बदल रहा है । भारतीय संस्कृति व उससे जुडे़ प्रतीक पार्श्व में चले जा रहे हैं । गोवंश धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है... जगह-जगह गौवंश के वध हेतु (Slaughter Houses) बनते जा रहे हैं... ऐसे में आज से तीस-चालीस साल बाद सन २०४०-२०५० में कक्षा दूसरी-तीसरी के बच्चे को "गाय" पर दस वाक्य लिखने को कहा जाये तो वह क्या लिखेगा...
१. गाय एक जानवर होता है, जो गाँव में कहीं-कहीं पाया जाता है ।
२. गाय शहर में नहीं रह सकती, क्योंकि हमारी कालोनी में घास नहीं है ।
३. गाय दूध भी देती है, लेकिन हम दूध "डेरी" से ही लेते हैं ।
४. अमेरिका में लड़के को "गाय" कहते हैं ।
५. मेरी "ग्रैण्डमा" के पास गाँव में गाय थी, हम यहाँ नहीं रख सकते, "लायसेंस" नहीं है ।
६. गाय के गोबर को हम "शिट" कहते हैं ।
७. गाय के दो सींग होते हैं, जो मारने के काम आते हैं ।
८. गाय का चेहरा मेरे दोस्त की "मॉम" से मिलता है ।
९. पुराने जमाने में गाय को माता कहते थे, पता नहीं क्यों ?
१०. "डैड" कहते हैं कि गाय और जंगल बहुत काम के हैं... लेकिन मैने दोनों नहीं देखे ।

मैं और मेरा रूममेट

("सिलसिला" के अमिताभ की तर्ज पर)

मैं और मेरा रूममेट अक्सर ये बातें करते हैं..
घर साफ़ होता तो कैसा होता..
मैं किचन साफ़ करता, तुम बालकनी धोते
मैं हॉल साफ़ करता, तुम बाथरूम देखते
लोग इस बात पर हैरान होते
और उस बात पर कितना हँसते..
मैं और मेरा रूममेट अक्सर ये बातें करते हैं....

ये हरा-भरा 'सिंक" है, या बरतनों की जंग छिडी़ है
ये कलरफ़ुल किचन है, या मसालों से होली खेली है
है फ़र्श की नई डिजाईन, या दूध-बियर से धुली है...
ये सेलफ़ोन है या ढक्कन, बिस्तर है या किसी का आँचल
ये रूम फ़्रेशनर का नया फ़्लेवर है, या मोजे से आती बदबू...
ये पत्तियों की है सरसराहट, या हीटर फ़िर से खराब हुआ है..
ये सोचता हूँ कब से गुमसुम
कि जबकि उसको भी ये खबर है
कि मच्छर नहीं हैं, कहीं नहीं हैं
मगर ये दिल है कि कह रहा है
मच्छर यहीं हैं... यहीं कहीं हैं...

पेट की ये हालत मेरी भी है, उसकी भी
दिल में एक तस्वीर इधर भी है उधर भी
करने को बहुत कुछ है, मगर कब करें हम
कब तक यूँ ही इस तरह गन्दे रहें हम..
दिल कहता है कि कोई हमे वैक्यूम क्लीनर ला दे
ये कारपेट जो दरवाजे पर पडा है, फ़िंकवा दे
हम साफ़ रह सकते हैं, लोगों को बता दें
हाँ हम रूममेट हैं... रूममेट हैं... रूममेट हैं...
अब दिल मे यही बात इधर भी है, उधर भी....!

ऑफ़िशियल प्रेम पत्र का उसी भाषा में जवाब (Reply of Official Love Letter)

प्रिय सुरेश,
कृपया अपने आज के पत्र को सन्दर्भित करें । मुझे आपका यह "ऑफ़र" स्वीकृत करने में खुशी होगी । हालाँकि आपकी "प्रमोशन" सम्बन्धी शर्त आकर्षक है, लेकिन आपके पत्र में सेवा शर्तों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, अतः कुछ बिन्दुओं पर जानकारी एवं स्पष्टीकरण भेजने का कष्ट करें । जैसे आपकी कम्पनी में सेवानिवृत्ति पश्चात मिलने वाले लाभ, "ग्रेच्युटी" की राशि आदि की जानकारी । साथ ही सुरक्षित भविष्य के लिये कृपया आप मुझे लिखित आश्वासन दें कि कोई "छँटनी या तालाबन्दी" आदि नहीं होगी, इसी प्रकार ट्रांसपोर्टेशन एवं रसोई शुल्क आदि की दरें भी केन्द्र सरकार की अनुशंसाओं के अनुसार होना चाहिये ।
यदि इन शर्तों के साथ आप फ़िर भी मुझे अपनी प्रेमिका नियुक्त करना चाहें तो कृपया अतिशीघ्र विस्तृत सूचना के साथ उत्तर भेजने का कष्ट करें, क्योंकि इसी प्रकार के कई ऑफ़र एवं अनुबन्ध मेरे समक्ष लम्बित हैं, उन्हें भी यथासमय उत्तर देना आवश्यक है । साथ ही यह सूचना भी दी जाती है कि मेरी बहन काफ़ी समय पहले "अनुबन्धित" हो चुकी है, और उसके दो बच्चे भी हैं...
तत्काल प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा में
सधन्यवाद
आपकी सम्भावित प्रेमिका
सारिका

ऑफ़िशियल प्रेम पत्र (Official Love Letter)

प्रिय सारिका,
आपको यह सूचित करते हुए हमें अत्यंत हर्ष होता है कि मैं दिनांक १४ फ़रवरी दोपहर १.०० बजे से आपके प्यार में गिरफ़्तार हो गया हूँ । संयोगवश यह दिन महान संत, विचारक एवं पथप्रदर्शक श्री श्री वेलेंटाईन बाबा से भी जुडा़ हुआ है । आपके संभावित प्रेमी के पद हेतु अपने-आपको प्रस्तुत करने में मुझे बेहद खुशी हो रही है । आपको सूचित किया जाता है कि हमारा प्यार प्रारंभ में तीन महीने के लिये प्रोबेशन पर रहेगा, एवं आपके "परफ़ॉर्मेंस" के आधार पर भविष्य में आपको स्थायी किये जाने पर विचार किया जायेगा । तीन महीने के प्रोबेशन पीरियड की समाप्ति के पश्चात हमारे जिस रिश्ते की शुरुआत होगी उसमें "बोनस" एवं विभिन्न मूल्यांकनों के पश्चात आपको प्रेमिका से पत्नी का "प्रमोशन" दिया जायेगा । इस दौरान होने वाले कॉफ़ी हाऊस और फ़िल्मों का खर्च दोनों में बराबर-बराबर बाँटा जायेगा । आपके प्रमोशन के बाद तमाम खर्चे मेरे द्वारा उठाये जायेंगे ।
अतः अनुरोध किया जाता है कि यदि यह प्रस्ताव आपको उचित लगता है, तो कृपया पत्र प्राप्ति के १० दिनों के अन्दर सूचित करें, अन्यथा यह प्रस्ताव स्वतः रद्द समझा जायेगा एवं यह 'कॉल लेटर' किसी अन्य योग्य उम्मीदवार को प्रेषित कर दिया जायेगा । आप चाहें तो यह प्रस्ताव अपनी छोटी बहन को भी प्रेषित कर सकती हैं ।
सधन्यवाद, अनुकूल उत्तर की आशा में......
कई जन्मों से तुम्हारा
सुरेश

Tuesday, February 20, 2007

शाणे बनो.... लेकिन सही जगह पर... (Money Minded and Over Smart People)

"शाणा", इस शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई, कहाँ से हुई यह तो शोध का विषय हो सकता है, क्योंकि मराठी भाषा में "शहाणा" शब्द बुद्धिमान और चतुर व्यक्ति के लिये उपयोग किया जाता है । लगभग यही भाव हिन्दी में "सयाना" से उधृत होता है और हो सकता है कि यह शब्द भी मराठी भाषा से ही प्रेरित हो । लेकिन इस शब्द का अपभ्रंश होते-होते अब यह "सयाना" से "शाणा" हो गया है । यह शब्द पिछले कुछ समय से ही आम प्रचलन में आया है, लेकिन जब से आया है, चारों तरफ़ छा गया है । हर ओर आपको यह शब्द सुनाई दे जायेगा । लेकिन अब यह शब्द बुद्धिमान और चतुर व्यक्ति के लिये नहीं बल्कि "परले दर्जे के कंजूस और बिना कारण के अत्यधिक मोलभाव करने वाले" व्यक्ति के लिये उपयोग किया जाने लगा है । मुम्बई के अंडरवर्ल्ड (Underworld of Mumbai) में इसका और अपभ्रंश हुआ और यह "श्याने" में परिवर्तित हो गया, जहाँ "भाई" लोग - "ए श्याने ज्यास्ती बात करने का नईं, दूँ क्या कान के नीचे खर्चा-पानी" आदि बोलते रहते हैं, हालांकि यहाँ भी भाई लोग का मतलब लगभग वही होता है... मतलब कंजूस और जरूरत से ज्यादा समझदार, परन्तु यह लेख "शाणों" की पहली प्रजाति के बारे में है, अर्थात अव्वल दर्जे के कृपण व्यक्तियों के लिये.... जरा गौर फ़रमायें...

यूँ तो "शाणपती" के विभिन्न प्रकार होते हैं... मेरे आधुनिक बाजार-शोध से ज्ञात हुआ है कि "शाणपती" गुण या अवगुण से परे एक "हेरिडिटी" (अनुवांशिक गुण) है, अर्थात यदि पिता शाणा है तो उसका बेटा उससे भी शाणा निकलेगा और यह तय है कि दादाजी तो जाहिर है कि शाणपती के "अर्क" होंगे । यह गुण सिखाया नही जाता, अपने आप आ जाता है । कहा जा सकता है कि यह "जीन्स" में शामिल हो जाता है । परन्तु शाणपती कहाँ, कैसे और किससे दिखाई जानी चाहिये यह तमीज शाणों में नहीं होती, और यदि होती.. तो वे शाणे कहलाते ही क्यों, और यह लेख लिखने की नौबत आती ही क्यों ? जब शाणे लोग किसी दुकानदार या गुमटी वाले से हुज्जत करते हैं तो अपनी हँसी ही उड़वाते हैं । यह बात और है कि बेचारा दुकानदार अपना मन मसोसकर मन-ही-मन हजारों गालियाँ देकर भी शाणे के प्रति अपना अनुराग प्रदर्शित करता है, क्योंकि यह उसका व्यावसायिक फ़र्ज होता है । लेकिन शाणों का जोर, या कहें हरकतें या करतब कहें...सभी कुछ छोटे दुकानदारों, कम पूँजी वाले व्यवसायियों, ठेलेवालों, रेहडी़वालों, फ़ुटपाथ पर धन्धा करने वालों, मजदूरों, नौकरों.... गरज यह कि कमजोरों पर ही चलती है... जबकि बडी़ दुकानों, संस्थानों, चमक-दमक से भरपूर शो-रूमों, सुपर बाजारों, मॉल्स आदि में इन शाणों की दाल नहीं गलती । अब जरा गौर करें इनकी विसंगतिपूर्ण हरकतों पर । शाणा जब किराने का सामान उधारी में खरीदने जाता है तो आवश्यकता न होने पर भी शैम्पू की पूरी बोतल खरीद लेता है, लेकिन वही शाणा जब बडे जनरल स्टोर में जाता है और वहाँ नकद में शैम्पू का एक पाऊच ही खरीदता है । शाणा जब फ़ोटोकॉपी करवाता है तो पचास पैसे की फ़ोटोकॉपी (जो कि कई वर्षों से पचास पैसे ही है) के बिल में भी दो-चार रुपये कम देने की कोशिश करता है, जबकि यही शाणा कोर्ट केस में लाखों रुपये फ़ूँक देता है, तब वह कुछ नहीं सोचता । शाणा बेटा, पिता के पदचिन्हों पर चलकर मास्टर की फ़ीस तो उसे लटका-लटकाकर देता है, जबकि डॉक्टर की फ़ीस से सौ-दोसौ रुपये में चूँ भी नहीं करता । ठेले पर सब्जी बेचने वाले से शाणा ऐसी घिस-घिस करता है कि सब्जी वाला पनाह माँग जाता है और मजबूर होकर दो-चार रुपये कम कर देता है लेकिन उस शाणे को मेडिकल स्टोर्स पर दवाई के दो-चार सौ रुपये ज्यादा नहीं लगते । कोई गढ्ढा खोदने वाला मजदूर जब शाम को शाणे से पैसे माँगता है तो वह उसे एक घंटा खडा रखकर और अहसान जताते हुए पैसे देता है, जबकि सीमेंट की बोरी या इस्पात के भाव रातोंरात बढ़ जायें तो हजारों का "फ़टका" वह हँसते-हँसते सह लेता है । किसी छोटे से गैरेज में गाडी़ ठीक करवाने पर यदि उसे "छोटू" मेकैनिक ने दस रुपये माँग लिये तो शाणा आगबबूला हो जाता है, लेकिन वही शाणा पेट्रोल के भाव को न सिर्फ़ निरपेक्ष भाव से लेता है, बल्कि गाडी में भरवाते समय पंप वाले ने क्या "कलाकारी" की है, उससे भी अन्जान रहता है । शहर के बाहरी हिस्से में स्थित किसी छोटे से ढाबे में खाना खाते वक्त शाणे को दाल-मखानी बहुत महँगी लगती है, लेकिन जब वह किसी बडी होटल मे जाता है तो वहाँ न सिर्फ़ वह सर्विस टैक्स चुकाता है, बल्कि वेटर को टिप भी देता है, बगैर किसी चूँ-चपड़ के... ऐसे सैकडों उदाहरण दिये जा सकते हैं ।

इतने सारे उदाहरणों का तात्पर्य यही है कि शाणे लोग, जो या तो अपने-आप को भावताव करने में उस्ताद मानते हैं, या तथाकथित रूप से "अति-जागरूक उपभोक्ता" का नकली चोला ओढे़ रहते हैं । उन्हें यह समझना चाहिये कि वे अपनी "शाणपती" कहाँ कर रहे हैं, किससे कर रहे हैं, और सबसे बडी़ बात कि कितने रुपये के लिये कर रहे हैं ? कहीं उनकी शाणपती मानवीयता की हद तो नही पार कर रही (जैसा कि मजदूर के उदाहरण में), या कहीं यह शाणपती उनकी हँसी तो नहीं उड़वा रही (जैसे मास्टर की ट्यूशन फ़ीस या फ़ोटोकॉपी के उदाहरण में) । इस पर जरा विचार करने की आवश्यकता है । "शाणा" होना कोई बुरी बात नहीं है, प्रत्येक व्यक्ति को अपना पैसा सोच-समझ कर खर्च करने का हक है, लेकिन इस समझ का सही जगह पर उपयोग होना चाहिये, ना कि किसी कमजोर या गरीब पर जोर चलाने में । शाणा होने, मितव्ययी होने और जागरूक उपभोक्ता होने.. तीनों में फ़र्क है । शाणे को हमेशा यह लगता है कि फ़लाँ व्यक्ति उसे लूट रहा है, जबकि तथ्य यह है कि बडी-बडी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ हमे लूट रही हैं, और हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं... दो रुपये की लागत वाला कोल्ड्रिन्क जब शाणा दस रुपये में आसानी से पी लेता है तो उसे जूते पॉलिश करवाने के तीन रुपये ज्यादा क्यों लगते हैं ? पानी के पाऊच या बोतल खरीदते समय शाणा पूरे बीस रुपये देता है, लेकिन मटर, गाजर या मूँगफ़ली खरीदते समय तौल के अलावा उसके बाद और पहले ठेले से उठा-उठाकर खाता रहता है, क्यों ? शाणे व्यक्ति खुद से सवाल करें कि क्या कभी उन्होंने किसी सुपर बाजार में भाव कम करने को कहा ? क्या कभी किसी बडे अस्पताल के बिल को देखकर वहाँ से मुख्य सर्जन से हुज्जत की ? किसी "स्टार" युक्त होटल में मैनेजर से पूछा कि यह पालक पनीर इतना महँगा क्यों है, जबकि पालक तीन रुपये किलो मिल रहा है ? यही मुख्य अन्तर है जिसे समझना होगा और अमल में लाना होगा, तभी शाणे "शाणे" ना कहलाकर समझदार ग्राहक की पात्रता हासिल करेंगे । कोई ठेले वाला, मजदूर, सब्जीवाला, छोटा मेकैनिक किसी व्यक्ति से अधिक से अधिक कितना ले सकता है... लगभग नगण्य, बिल्डर, भू-माफ़िया, पेट्रोल माफ़िया, भ्रष्ट अफ़सर आदि हमें-आपको जितना लूटते हैं उसकी तुलना में.... फ़िर क्यों किसी गरीब और छोटे दुकानदार पर अपनी "शाणपती" झाडना ? शाणे बनो... मगर सही जगह पर...

Thursday, February 15, 2007

Save Paper for Better Environment

कागज : एक राष्ट्रीय सम्पत्ति

सन २००४ के आम चुनाव भारत के लिये बेहद महत्वपूर्ण साबित हुए हैं, राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं बल्कि पर्यावरणीय दृष्टिकोण से, क्योंकि विश्व के इन सबसे बडे चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (Electronic Voting Machines) का देशव्यापी उपयोग किया गया, जिसके कारण लाखों टन कागज की बचत हुई । जाहिर है लाखों टन कागज की बचत अर्थात लाखों पेड़ कटने से बच गये, पर्यावरण (Environment) की नजर से यह एक असाधारण उपलब्धि मानी जा सकती है । हम सभी जानते हैं कि कागज बनाने का सीधा सम्बन्ध वनों की कटाई से होता है, और कागज का दुरुपयोग, मतलब हमारे और खराब होते हुए पर्यावरण को एक और धक्का । हमारे दैनिक जीवन में, रोजमर्रा के कामकाज में, ऑफ़िसों (Offices) में, कॉलेजों (Colleges), न्यायालयों (Courts), तात्पर्य यह कि लगभग सभी क्षेत्रों में कागज का सतत उपयोग होता रहता है, होता रहेगा, क्योंकि वह जरूरी भी है । लेकिन यहाँ बात हो रही है कागज के बेरहम दुरुपयोग की । क्या कभी किसी ने इस ओर ध्यान दिया है कि हम कागज का कितना दुरुपयोग करते हैं ? कई बार तो ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ लोगों को कागज मुफ़्त में मिल रहा है, या भारत में कागज की अधिकता हो गई है । कुछ उदाहरणों से इस विकराल समस्या को समझने और उसका निराकरण करने में सहायता मिलेगी ।

सबसे पहले बात न्यायालयों की, न्यायालयों में परम्परा के तौर पर "लीगल" कागज का उपयोग होता है । इस कागज का नाम "लीगल" पडा़ ही इसीलिये कि यह न्यायिक प्रक्रिया में उपयोग होने वाला कागज है । अनजान लोगों के लिये यह बताना जरूरी है कि "लीगल" कागज, एक सामान्य "ए४" कागज से थोड़ा सा लम्बा (दो सेमी अधिक) होता है । प्रायः देखा गया है कि लम्बी-लम्बी कानूनी प्रक्रिया के दौरान, हजारों, लाखों रुपये के कागज लग जाते हैं, जो कि गवाही, सबूत, शपथपत्र आदि तमाम न्यायिक गतिविधि को देखते हुए सामान्य और स्वाभाविक है, परन्तु क्या ऐसा नहीं किया जा सकता कि कोर्ट का सारा काम "लीगल" पेपर के बजाय, "ए४" कागज पर हो, जबकि ऐसा बगैर किसी परेशानी के किया जा सकता है । कल्पना ही की जा सकती है कि लाखों-करोड़ों कागज यदि दो-दो से.मी. कम हो जायेंगे तो कितने टन कागज की बचत होगी । कोई भी माननीय न्यायाधीश अपनी ओर से पहल करके अपने वकीलों से कह सकता है कि मेरे द्वारा सुनवाई किये जाने वाले कागज "लीगल" नहीं बल्कि "ए४" होंगे, तो अपने-आप धीरे-धीरे सभी लोग इसे अपना लेंगे, और कागज की लम्बाई कम हो जाने से कानून पर कोई फ़र्क नहीं पडे़गा, कानून तो अपना काम आगे भी करता रहेगा । तमाम स्टाम्प पेपर, ग्रीन पेपर, शपथ-पत्र, करारनामे आदि "लीगल" पेपर पर ही क्यों, और कोढ़ मे खाज यह कि अधिकतर कागज (रजिस्ट्री वगैरह छोड़कर) पीछे तरफ़ से कोरे होते हैं, अर्थात उस कीमती कागज की एक बाजू तो बेकार ही छोड़ दी जाती है । ऐसा क्यों ? क्या कागज के दोनों तरफ़ टाईप करने या फ़ोटोकॉपी करने से कानूनी दलील कमजोर हो जायेगी ? या किसी धारा का उल्लंघन हो जायेगा ? फ़िर यह राष्ट्रीय अपव्यय क्यों ? उच्चतम न्यायालय इस बात की व्यवस्था कर सकते हैं कि जो भी न्यायालयीन कागज एक तरफ़ से कोरा हो उस पर अगला पृष्ठ लगातार टाईप किया जाये, जरा सोचिये हमारी अदालतों मे लाखों केस लम्बित हैं उनमें कितना कागज बेकार गया होगा और इस विधि से भविष्य में हम कितना कागज बचा सकते हैं ।

ठीक इसी प्रकार का मामला अकादमिक क्षेत्रों में कागज के दुरुपयोग का है । भारत के तमाम विश्वविद्यालयों, संस्थानों, शोध प्रतिष्ठानों, महविद्यालयों आदि में पीएच.डी., एम.फ़िल., एम.एससी., लघु शोध प्रबन्ध आदि ऐसे हजारों अकादमिक कार्य चलते रहते हैं जिसमें छात्र को अपनी रिपोर्ट या थेसिस या संक्षेपिका जमा करानी होती है वह भी एक नहीं चार-पाँच बल्कि सात-सात प्रतियों में (वह शोध कितना उपयोगी होता है, यह बहस का एक अलग विषय है)... मेरा सुझाव है कि सभी रिपोर्टों और थेसिस (Reports and Thesis) को कागज के दोनों ओर टाईप किया जाये, जाहिर है कि उनकी फ़ोटोकॉपी भी वैसी ही की जायेगी । अमूमन एक पीएच.डी. थेसिस कम से कम दो सौ पृष्ठों की तो होती ही है, उसकी सात प्रतियाँ अर्थात चौदह सौ कागज, यदि यही थेसिस दोनों ओर टाईप की जाये तो हम सीधे-सीधे सात सौ कागज एक थेसिस पर बचा लेते हैं... कल्पना करें कि देश भर में चल रहे सभी थेसिस एवं रिपोर्टों को कागज के दोनो ओर टाईप करने से कितना कागज बचेगा (मतलब कितने पेड़ बचेंगे) । थेसिस को एक ही तरफ़ प्रिन्ट करने की शाही और अंग्रेजी प्रथा / परम्परा को तत्काल बन्द किया जाना चाहिये, क्योंकि अन्ततः मतलब तो उस थेसिस के निष्कर्षों से है, यदि शोध कार्य उत्कृष्ट है तो फ़िर इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वह कागज के एक ओर है या दोनों ओर । साथ ही यदि शोध कार्य घटिया है तो वह कितने भी चिकने और उम्दा कागज पर प्रिन्ट किया गया हो, घटिया ही रहेगा । सभी बडे़ विश्वविद्यालयों के कुलपति, कुलसचिव मिलबैठ कर तय कर लें कि सभी थेसिस एवं रिपोर्ट कागज के दोनों ओर टाईप की जायेंगी और स्वीकार की जायेंगी । उनका यह कार्य राष्ट्रीय कर्तव्य के रूप में याद किया जायेगा ।
देश में भयानक बेरोजगारी है, यह एक स्थापित तथ्य है, नौकरी के एक-एक पद के लिये सैकड़ों आवेदन दिये जाते हैं, जो कि समस्या को देखते हुए स्वाभाविक भी है, परन्तु कागज के अपव्यय का यह भी एक विडम्बनापूर्ण उदाहरण है, - एक समाचार पत्र में किसी पद का विज्ञापन प्रकाशित होता है, युवक अपनी सारी डिग्रियों की फ़ोटोकॉपी प्रत्येक आवेदन के साथ लगाते हैं (हाईस्कूल से लेकर पीएच.डी. और नेट/स्लेट तक की) ऐसा वह प्रत्येक आवेदन के साथ करता है, अर्थात कागज के अनावश्यक दुरुपयोग के साथ ही बेरोजगार पर फ़ोटोकॉपी के ढेर का आर्थिक बोझ भी । मेरा सुझाव है कि सरकारें (केन्द्र और राज्य) प्रत्येक जिले, तहसील, गाँव में सक्षम प्राधिकारी को अधिकृत करें, जो कि बेरोजगारों के सभी मूल प्रमाणपत्रों को एक बार देखकर, उनकी जाँच करके एक "कार्ड" जारी करें, जिसमें उस युवक की तमाम उपाधियों का उल्लेख हो, जिस प्रकार परिवहन विभाग सारे कागज जाँच कर "यलो कार्ड" जारी करता है, उसी तर्ज पर । युवक आवेदन पत्र के साथ सिर्फ़ वह कार्ड या उसकी छायाप्रति लगाये, जब उसका चयन इंटरव्यू के लिये हो जाये तभी वह नियोक्ता के समक्ष अपने मूल प्रमाणपत्रों के साथ हाजिर हो जाये । आवेदक वैसे भी अपनी सभी शैक्षणिक गतिविधियों का उल्लेख अपने बायो-डाटा में तो करता ही है, फ़िर सभी की फ़ोटोकॉपी लगाने की क्या आवश्यकता है ? क्योंकि एक पद के लिये चार-पाँच सौ आवेदन आना तो मामूली बात है, उनमें से चार-पाँच उम्मीदवार जो कि इंटरव्यू के लिये चुने जाने हैं, के अलावा बाकी के सारे कागज तो रद्दी की टोकरी में ही जाने हैं, यह कागज का भीषण अपव्यय तो है ही, बेरोजगारों के साथ अमानवीयता भी है ।
कम्प्यूटरीकरण के पश्चात अलबत्ता कागजों के उपयोग में कमी आई है, लेकिन उसे उल्लेखनीय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि बैंकों में भी कम्प्यूटरीकरण के बावजूद सभी रिकॉर्ड के प्रिन्ट आऊट कागजों पर भी लेने की परम्परा (सुरक्षा की दृष्टि से) जारी है, फ़िर क्या विशेष फ़ायदा हुआ ? रोज शाम को दिन भर के "ट्रांजेक्शन" का प्रिन्ट आऊट लो, उसे सम्भालकर रखो, उसका बैक-अप कैसेट भी बनाओ फ़िर और सुरक्षा के लिये उसकी एक कॉपी भी रखो... यह सब क्या है ? क्या तकनीक बढने से कागज के उपभोग में कमी आई है ? जर्मनी में बडे़ से बड़ा अफ़सर भी कागज की छोटी-छोटी पर्चियों पर अपना सन्देश लिखकर देते हैं । हमारे यहाँ चार पंक्ति की मामूली सी "नोटशीट" के लिये पूरा का पूरा "ए४" कागजक्यों लिया जाये ? लेकिन क्या सरकारी कर्मचारी (दामाद) और क्या प्राईवेट सभी जगह क्लर्क हों या अफ़सर "माले-मुफ़्त दिल-ए-बेरहम" की तर्ज पर कागज का दुरुपयोग करते फ़िरते हैं, क्या यह राष्ट्रीय अपराध की श्रेणी में नहीं आता ?
इसीलिये अब समय आ गया है कि हम कागज को भी "राष्ट्रीय सम्पत्ति" घोषित कर दें, और उसके सही इस्तेमाल हेतु एक जनजागरण अभियान चलाया जाये । लोगों को शिक्षित किया जाये कि किस तरह से कम से कम कागज में अपना काम निकाला जाये, इसके लिये सरकार के साथ सामाजिक संगठनों, प्रिन्ट मीडिया और महत्वपूर्ण व्यक्तियों को आगे आकर उदाहरण पेश करना होगा ।
"अलबत्ता प्रेमियों को इसमें छूट मिलना चाहिये, क्योंकि दिल का हाल बयाँ करने के लिये कई कागज खराब करने पडते हैं"....

Sunday, February 11, 2007

आई टी "दीवार" (Film Deewar of IT Industry)

सीन - १
रवि (शशिकपूर) अपने भाई विजय (अमिताभ) के घर पहुँचता है -
रवि - आज मुझे "आईटी" थाने वालों ने एक लिस्ट दी है, जिसमें उन लोगों के नाम हैं, जो वायरस लिखते हैं, "साईट हैकिंग" करते हैं, और भी ऐसे कई काम जो कानून की नजर में गुनाह हैं, और उस लिस्ट में एक नाम तुम्हारा भी है भा...ई...। लो इस पर साइन कर दो ।
विजय - क्या है ये ?
रवि - इसमे लिखा है कि तुम अपने सारे गुनाह कबूल करने को तैयार हो... तुम अपने उन सभी साथियों के नाम पुलिस को बताने को तैयार हो, जो "हैकिंग" करते हैं, तुम पुलिस को यह भी बताओगे कि तुमने कौन-कौन से वायरस बनाये हैं, उनका कोड क्या है... सब बताओगे...
विजय - मैं इस पर साइन करूँगा, लेकिन मैं अकेले साइन नहीं करूँगा, मैं सबसे पहले साइन नहीं करूँगा । जाओ जाकर पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ, जिसने मेरे बाप पर "पासवर्ड" चोरी करने का साइन लिया था, जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ जिसने मेरे "मदर बोर्ड" को "रिसायकल बिन" में डाल दिया था । जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ जिसने मेरी "वेबसाईट" को हैक करके उस पर लिख दिया था कि "इसका बाप चोर है", उसके बाद, उसके बाद मेरे भाई तुम जिस "document" पर कहोगे मैं उस पर साइन करने को तैयार हूँ...
रवि - दूसरों के पाप गिनाने से तुम्हारे अपने पाप कम नहीं होंगे... ये सच्चाई नहीं बदल सकती कि तुम भी एक हैकर हो और जब तक ये दीवार हम दोनों के बीच है भाई... हम एक छत के नीचे नहीं रह सकते... मैं यहाँ से जा रहा हूँ...चलो माँ..
विजय - तुम जाना चहते हो तो जाओ... लेकिन माँ नहीं जायेगी (वो तो मेन सर्वर है)
माँ (निरुपा रॉय) - माँ जायेगी...
विजय - नहीं माँ तुम नहीं जा सकती, मैं जानता हूँ कि तुम मुझसे बहुत प्यार करती हो... सारी साईट्स मैनें तुम्हें खुश रखने के लिये ही हैक की थीं...
माँ - वो आदमी तेरा कौन था, जिसने तेरे बाप पर पासवर्ड चोरी का इल्जाम लगाया था, कोई नहीं.... वो आदमी तेरा कौन था जिसने तेरे मदर बोर्ड को रिसायकल बिन में डाल दिया था, कोई नही... वो आदमी तेरा कौन था जिसने तेरी साईट पर लिख दिया था कि "तेरा बाप चोर है", कोई नही... लेकिन तू तो मेरा अपना क्लाईंट था, तूने अपने प्रोसेसर पर कैसे लिख दिया कि "ये फ़ाईल करप्ट है"...
(माँ गुस्से में लॉग आऊट कर जाती है, और विजय देखता रह जाता है)....

सीन - २
विजय (अमिताभ) अपने भाई रवि (शशिकपूर) को मिलने एक जगह पहुँचता है... (वही पुल के नीचे)
विजय - मुझे यहाँ मिलने क्यों बुलाया है ?
रवि - तुम्हारी कम्पनी में मुझे कोई घुसने नही देता है, और मेरे घर आना तुम जैसे सॉफ़्टवेयर इंजीनियर की शान के खिलाफ़ है, इसलिये हम कहीं और ही मिल सकते थे । इस इंटरनेट पार्लर में जहाँ हमारा बचपन साथ-साथ बीता, यही ठीक जगह है...
विजय - पहले मुझे ये बताओ कि इस समय मुझे सुनने वाला कौन है, एक "डाटा एन्ट्री ऑपरेटर" या एक "आईटी पुलिसवाला"...
रवि - जब तक सॉफ़्टवेयर इंजीनियर बोलेगा, एक डाटा एन्ट्री ऑपरेटर सुनेगा, और जब एक हैकर बोलेगा तो "आईटी पुलिसवाला" सुनेगा...
विजय - रवि तुम नही जानते तुमने सारे हैकरों को अपना दुश्मन बना लिया है, तुम ये शहर छोडकर चले जाओ...
रवि - मेरे कम्प्यूटर आदर्श मुझे इसकी इजाजत नहीं देते...
विजय - उफ़्फ़, तुम्हारे उसूल, तुम्हारे आदर्श, क्या दिया है तुम्हारे इन उसूलों ने तुम्हें.... एक ४८६ कम्प्यूटर, एक सडा सा डॉस, एक मामूली सा अकाउंटिंग सॉफ़्टवेयर... देखो, देखो, देखो... ये वही मैं हूँ और ये वही तुम हो... हम दोनों एक साथ इस इंटरनेट पार्लर से निकले थे... लेकिन आज तुम कहाँ रह गये और मैं कहाँ आ गया... आज मेरे पास वेब साईट है, पेंटियम ४ है, ओरेकल, पावर बिल्डर है, बैंक बैलेन्स है... क्या है,,, क्या है तुम्हारे पास... ?
रवि - मेरे पास "परमानेंट सरकारी जॉब" और सर्वर का मदरबोर्ड है...
(टूँ..टूँ..टूँ... कम्प्यूटर हैंग होने की आवाज आती है... और विजय देखता रह जाता है)

Saturday, February 10, 2007

आई टी शोले (Sholay of IT Industry)

गब्बर सिंह अपने आदमियों को "लूटमार" नाम का सॉफ़्ट्वेयर लेने के लिये रामगढ भेजता है, जिसका ऑर्डर उसने पहले से दे रखा है । कालिया और उसके साथी रामगढ पहुँचते हैं । गाँव में पहुँचते ही कालिया चिल्लाता है - 'अबे ओ ठाकुर, बाहर निकल, कहाँ है वो "लूटमार" सॉफ़्टवेयर जो हमने ऑर्डर किया था.... धनिया !!!!
एक बूढा आदमी एक हाथ में फ़्लॉपी लेकर बाहर निकलता है...
कालिया - क्या लाये हो धनिया ?
धनिया - फ़ाईनेंशियल अकाऊंटिंग का सॉफ़्टवेयर है सरकार ।
कालिया - सूअर के बच्चे, ये बेकार सा सॉफ़्टवेयर हमारे लिये लाया है, और वो ''लूटमार" वाला सॉफ़्टवेयर क्या अपनी बेटी के बारातियों के लिये "जिप फ़ाईल" में छुपा रखा है, वाइरसजादा ।
ठाकुर गुस्से से बाहर निकलता है, और कहता है - चिल्लाओ मत कालिया, जाकर गब्बर से कहना "ठाकुर सॉफ़्टवेयर वालों ने पागल कुत्तों के लिये सॉफ़्टवेयर बनाना बन्द कर दिया है ।
कालिया - बहुत गर्मी दिखा रहे हो ठाकुर, क्या कोई नये "प्रोग्रामर्स" हायर किये हो ।
ठाकुर - नजर उठा कर देख लो कालिया, "पावर बिल्डर" तेरे सिर पर चल रहा है....
कालिया सिर उठाकर देखता है, तो एक पानी की टंकी पर वीरू (धर्मेन्द्र) अपने "पीसी" पर "चैटिंग" कर रहा होता है और दूसरी तरफ़ एक चट्टान पर जय (अमिताभ) अपने लैपटॉप लेकर खडा है..
कालिया - दो... बस, हा हा हा हा हा, ये लोग प्रोग्रामिंग करेंगे... इनको तो DOS कमाण्ड भी नही आते... सुनो गाँववालो... ठाकुर ने इन जोकरों को सॉफ़्टवेयर कम्पनी बनाई है...
वीरू चिल्लाता है.. - चुपचाप चला जा कालिया, हम लोग consultants हैं.. कुछ भी कर सकते हैं...
जय अपने लैपटॉप पर कोई कमाण्ड लगाता है और कहता है... जाओ कालिया, गब्बर से कहना उसका "सर्वर" डाऊन हो गया है...
कालिया - जाता हूँ ठाकुर, जाता हूँ... लेकिन याद रखना यदि गब्बर को पता चला कि ठाकुर सॉफ़्टवेयर वालों ने उसके लिये "लूटमार" सॉफ़्टवेयर नहीं बनाया... तो वह सारे नेटवर्क में वायरस डाल देगा...
अब.. गब्बर के अड्डे पर....
गब्बर - कितने बग्स थे ?
कालिया - सरदार.. दो
गब्बर - वो दो थे और तुम तीन.. फ़िर भी "फ़िक्स" नहीं कर सके, क्या सोच कर आये थे कि सरदार बहुत खुश होगा... नया "असाइनमेण्ट" देगा, प्रमोशन देगा, क्यों ? इसकी सजा मिलेगी, बराबर मिलेगी..
(गब्बर, सांभा के पास से एक "एक्स टर्मिनल" खीचता है)
गब्बर - कितना "सेशंस" है इसका अन्दर..
सांभा - छ्ह सेशन
गब्बर - सेशन छह और प्रोग्रामर तीन... बहुत बेईंसाफ़ी है ये । (लॉग आऊट...लॉग आऊट...लॉग आऊट...)
गब्बर - हाँ, अब ठीक है, तेरा क्या होगा कालिया....?
कालिया - सरदार, मैनें आपका "बार कोड" लिखा था सरदार...
गब्बर - तो अब documentation लिख....ढिच्क्याऊँ... ढिच्क्याऊँ... ढिच्क्याऊँ...
सेशन समाप्त, नेटवर्क error....

Sunday, February 4, 2007

कारपोरेट गीता-सार (Corporate Geeta)

Corporate Geeta

आज के गलाकाट जमाने में किसी निजी कम्पनी में कार्यरत "अर्जुन" के लिये गीता-सार -

हे पार्थ,
वेतनवृद्धि नहीं मिली, बुरा हुआ
तनख्वाह में कटौती हो रही है, बुरा हो रहा है
कर्मचारियों की छँटनी होगी, वह भी बुरा ही होगा...
तुम पिछली वेतनवृद्धि न होने का पश्चाताप ना करो
तुम आने वाली वेतनवृद्धि के न होने की भी चिंता ना करो
तालाबन्दी होने वाली है... जो होना है वह होकर रहेगा...
तुम्हारी जेब से क्या गया जो तुम रोते हो ?
तुम कम्पनी के लिये क्या लाये थे, जो तुमने खो दिया ?
तुम कोई "एक्स्पीरियंस" लेकर नहीं लेकर आये थे...
जो अनुभव लिया कम्पनी से लिया, जो काम किया कम्पनी के लिये किया
डिग्री लेकर आये थे, अनुभव लेकर चले जाओगे....
जो काम आज तुम्हारा है
वह कल किसी और का होगा, परसों किसी और का होगा...
तुम इसे अपना समझकर क्यों मगन हो रहे हो...
यही "खुशी" तुम्हारे दुःख का कारण है वत्स
क्यों व्यर्थ चिन्ता करते हो, किससे व्यर्थ डरते हो...
कौन तुम्हें निकाल सकता है ?
"पालिसी चेंज" कम्पनी का नियम है...
जिसे तुम "पालिसी चेंज" कहते हो, वह मैनेजमेण्ट की चाल है
एक पल में तुम सुपरवाइजर बन जाते हो...
दूसरे ही पल में "डेली वेजेस" वाले बन जाते हो...
समीक्षा, वेतनवृद्धि, प्रमोशन आदि-आदि से मन को हटा दो.....
विचार से मिटा दो, फ़िर कम्पनी तुम्हारी है, तुम कम्पनी के हो....
ना ये वेतनवृद्धि वगैरह तुम्हारे लिये है, ना तुम इसके काबिल हो
परन्तु नौकरी बरकरार है, फ़िर तुम्हें "टेंशन" क्यों है ?
तुम अपने आपको कम्पनी को अर्पित कर दो
यही सबसे उत्तम नियम है, जो इस उत्तम नियम को जान जाता है,
वह "असेसमेण्ट", पुरस्कार, वेतनवृद्धि, प्रमोशन, छँटनी, तालाबन्दी...
आदि समस्त चिन्ताओं से मुक्त हो जाता है...।
सिर्फ़ अपना कर्म करो पार्थ... फ़ल मैनेजमेण्ट पर छोड दो...
ओम शांति...