Wednesday, January 31, 2007

क्या आप भगवान को मानते हैं ?

Does GOD Exists? What is GOD? How he looks? What he is Doing?

शीर्षक पढकर आप चौंक गये होंगे... क्या मैं नास्तिक हूँ... बिलकुल नहीं... फ़िर मैं क्यों ऐसी बात कह रहा हूँ ? लेकिन जरा आगे तो पढिये जनाब, कई सवाल हैं जो मेरे दिलो-दिमाग को मथते हैं और जिनका कोई तर्कपूर्ण जवाब मुझे नहीं मिलता, एक विशिष्ट प्रकार का "कन्फ़्यूजन" (Confusion) है..., इन विषयों पर हमेशा मैनें प्रत्येक बहस में सामने वाले से जवाब माँगा है, लेकिन नतीजा सिफ़र... वही गोल-मोल जवाब... वही ऊटपटाँग तर्क... लेकिन मेरी बात कोई मानने को तैयार नहीं... सोचा कि ब्लोग पर इन प्रश्नों को डालकर देखूँ, शायद कोई विद्वान मेरी शंकाओं का समाधान कर सके... और नहीं तो मुझ से सहमत हो सके... खैर बहुत हुई प्रस्तावना....
क्या आप भगवान को मानते हैं.... क्यों मानते हैं ? ... क्या आपको विश्वास है कि भगवान कहीं है ? ...यदि है तो वह क्या किसी को दिखाई दिया है ? ये सवाल सबसे पहले हमारे मन में आते हैं लेकिन बाल्यकाल से हमारे मनोमस्तिष्क पर जो संस्कार कर दिये जाते हैं उनके कारण हम मानते हैं कि भगवान नाम की कोई हस्ती इस दुनिया में है जो सर्वशक्तिमान है और इस फ़ानी दुनिया को चलाती है... चलो मान लिया... हमें सिखाया जाता है कि भगवान सभी पापियों का नाश करते हैं... भगवान की मर्जी के बिना इस दुनिया में पत्ता तक नहीं हिलता... जो प्राणी सच्चे मन से भगवान की प्रार्थना करते हैं उनको सुफ़ल अवश्य मिलता है... लेकिन ईश्वर मौजूद है तो फ़िर इस दुनिया में अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार, गरीबी, बीमारी आदि क्यों बनी हुई है ? शैतान (Satan) क्या है और नरक का निर्माण किसने किया ? क्या भगवान ने ? यदि हाँ तो क्यों ? यदि कोई व्यक्ति अपराध करता है तो क्यों ना उसे ईश्वर की लीला समझकर माफ़ कर दिया जाये, क्योंकि उसकी मर्जी के बिना तो कुछ हो ही नहीं सकता । बाढ, सूखा, सुनामी, भूकम्प, ज्वालामुखी सभी ईश्वर की ही देन हैं, मतलब इन्सान को प्रकृति बिगाडने का दोषी नहीं माना जाना चाहिये. कहा जाता है कि मनुष्य, भगवान की सर्वोत्तम कृति है, फ़िर यह "सर्वोत्तम कृति" क्यों इस संसार को मिटाने पर तुली है... ? इसके जवाब में लोग कहते हैं कि यह तो मनुष्य के पूर्वजन्म के कर्मों का फ़ल है... लेकिन हमें तो बताया गया था कि चौरासी लाख योनियों के पश्चात ही मनुष्य जन्म प्राप्त होता है, फ़िर इस मनुष्य ने पाप किस जन्म में किये होंगे.. जब वह गाय-बकरी या कीडे-मकोडे के जन्म में होगा तब...? लेकिन मूक प्राणी तो कोई पाप नहीं करते... फ़िर ? और मनुष्य के पाप-पुण्य का हिसाब भी बडा मजेदार है... अब देखिये.... भगवान पापी, दुराचारी, पाखण्डी को अवश्य सजा देते हैं... लेकिन कब ? भगवान की बनाई हुई दुनिया उजडी जा रही है... लेकिन वह चुप है... अन्याय, लूट-खसोट चरम पर है, लेकिन वह कुछ नहीं करता...ईश्वर के नाम पर तमाम पाखण्ड और ढोंग चल रहा है... लेकिन वह चुप है... बडे-बडे लुटेरे, कालाबाजारिये, घूसखोर अफ़सर आदि लाखों रुपये चन्दा देकर विशाल भण्डारे और प्रवचन आयोजित कर रहे हैं... लेकिन भगवान को वह भी मंजूर है... दिन भर पसीना बहाने वाला एक ठेलाचालक भी उतना ही धार्मिक है लेकिन वह ताजिन्दगी पिसता और चूसा जाता रहेगा धनवानों द्वारा, ऐसा क्यों... ? धनवान व्यक्ति के लिये हर बडे मंदिर में एक वीआईपी कतार है, जबकि आम आदमी (जो भगवान की प्रार्थना सच्चे मन से करता है) वह लम्बी-लम्बी लाईनों में खडा रहता है....क्या उसकी भक्ति उस धनवान से कम है ? या भगवान को यह अन्याय मंजूर है... नहीं... तो फ़िर वह कुछ करता क्यों नहीं ? खैर... बहुत बडा ब्लोग ना हो जाये कहीं... और पाठक मुझे कोसने लगें, इसलिये यहीं खत्म करता हूँ... अगले ब्लोग में बाबाओं, साधुओं, चमत्कारों पर कुछ लिखूँगा... क्योंकि उज्जैन में रहकर और दो-दो सिंहस्थ होशोहवास में देखकर धर्म-कर्मकांड, गुरु-घंटालों, प्रवचनकारों के बारे में कुछ तो सच्चा (जाहिर है कि कडवा) लिखने का हक तो बनता है... अन्त में एक हल्का-फ़ुल्का मजाक... बताइये भगवान दिखाई क्यों नहीं देता ? तो भईये... जैसे इन्सान उसने बनाये हैं.. उसके कारण वह किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहा....
बाकी अगले ब्लोग में... किसी की भावनाओं को चोट पहुँचती हो तो माफ़ करें... तर्कपूर्ण जवाब जरूर दें...

Monday, January 29, 2007

CV of Munnabhai MBBS

मुन्ना भाई का बायो-डाटा

मुन्नाभाई का बायो-डाटा पढें....

http://www.naidunia.com/articles.asp?article_no=11905091505&yy=2005&mm=9&dd=15&title=bwàltCtRo+fUt+ctgtu-zuxt&author=mwhuN+rav˜qlfUh

"नईदुनिया" (इन्दौर) के 15th September 2005 के अंक में प्रकाशित...

पिता का रूपांतरण

Father's Day Special

अपने जीवनकाल में विभिन्न पडावों पर पिता की ओर देखने का नजरिया बदलता रहता है...
चार वर्ष की आयु में - मेरे पिता महान हैं..
छह वर्ष की आयु में - मेरे पिता तो सब कुछ जानते हैं..
दस वर्ष की आयु में - मेरे पिता बहुत अच्छे हैं लेकिन गुस्सा बहुत जल्दी हो जाते हैं..
तेरह वर्ष (टीनएज) की आयु में - मेरे पिता बहुत अच्छे थे, जब मैं छोटा था...
चौदहवें वर्ष में - पिताजी तो बहुत तुनकमिजाज होते जा रहे हैं...
सोलहवें वर्ष में - पिताजी तो बहुत पुराने खयालात के हैं, नये जमाने के साथ चल ही नहीं पाते..
अठारहवें वर्ष में - पिताजी तो लगभग सनकी हो चले हैं..
बीसवें वर्ष में - हे भगवान अब तो पिताजी को झेलना बहुत मुश्किल होता जा रहा है.. पता नहीं माँ उन्हें कैसे सहन करती है...
पच्चीसवें वर्ष में - पिताजी तो मेरी हर बात का विरोध करते हैं...
तीसवें वर्ष में - मेरे बच्चे को समझाना बहुत मुश्किल होता जा रहा है... जबकि मैं अपने पिताजी से बहुत डरता था...
चालीसवें वर्ष में - मेरे पिता ने मुझे बहुत अनुशासन के साथ पाला, मुझे भी अपने बच्चे के साथ ऐसा ही व्यवहार करना चाहिये...
पैंतालीसवें वर्ष में - मैं आश्चर्यचकित हूँ कि मेरे पिता ने हमें कैसे बडा किया होगा...
पचासवें वर्ष में - मेरे पिता ने हमें यहाँ तक पहुँचाने के लिये बहुत कष्ट उठाये... जबकि मैं अपने इकलौते बेटे की ठीक से देखभाल नहीं कर पाता...
पचपनवें वर्ष में - मेरे पिता ने हमारे लिये बहुत अच्छी योजनायें बनाईं और निवेश किया...वे एक उच्च कोटि के इन्सान थे... जबकि मेरा बेटा मुझे सनकी समझता है...
साठवें वर्ष में - मेरे पिता वाकई महान थे...
अर्थात "पिता महान हैं" यह समझने में व्यक्ति को पूरे छ्प्पन वर्ष लग जाते हैं....

What is a Love Letter?

लव लेटर क्या होता है ....
लव-लेटर, लव-लेटर मतलब लव-लेटर होता है..
सीधे-सीधे बोलने की बजाय आसान और better होता है...
गुलाबी मीठी ठण्ड के मौसम का sweater होता है...
अच्छी तरह से मथा हुआ नरम butter होता है...
लव-लेटर तो लव-लेटर होता है.......

लव लेटर मतलब एक song होता है..
जिसमें भाषा तो सही लेकिन व्याकरण wrong होता है..
जब कुछ नही सूझता तो दिल में pain होता है...
और जब कुछ सूझता है तो जेब में pen नहीं होता है..
लव लेटर तो लव लेटर होता है.......

लव लेटर मतलब एक dream होता है..
जीवन की पेस्ट्री का cream होता है..
आधा-आधा पीने लायक नारियल water होता है..
सिर्फ़ दो के लिये बना हुआ 70mm theater होता है...
लव लेटर तो लव लेटर होता है.......

लव लेटर एक habbit होता है..
बाहर से शेर लेकिन भीतर से rabbit होता है...
जमीन के टुकडे से भी महंगा agreement होता है...
50% पक्का और 50% judgement होता है...
लव लेटर तो लव लेटर होता है.......

लव लेटर तो शराब का पहला sip होता है...
बीयर से भरे मग को छूने को बेताब lip होता है...
तीसरे के लिये बिलकुल नहीं ऐसा matter होता है...
जिसमें दम हो.. वही नीट पिये ऐसा quarter होता है...
लव लेटर तो लव लेटर होता है......

लव-लेटर, लव-लेटर मतलब लव-लेटर होता है..

Sunday, January 28, 2007

Republic Day of India and Media Cooverage

गणतन्त्र और मीडिया (२) 

मेरे पिछले चिट्ठे के जवाब में मुझे बहुत सारे ई-पत्र प्राप्त हुए. जिसमें से भाई सत्यम रविन्द्र नें कहा कि सिर्फ़ आलोचना नहीं करें, उसका समाधान भी सुझायें... बिलकुल सही कहा... तो मेरी निगाह में मीडिया (Media) को सुधारने के लिये जनता को ही आगे आना होगा... उदाहरण के तौर पर म.प्र. के मालवा (Malwa) क्षेत्र में एक अखबार है "नईदुनिया"... इस अखबार ने एक नई पहल शुरू की है, कि प्रत्येक सोमवार को "सकारात्मक सोमवार" के नाम से अखबार का मुख्पृष्ठ सिर्फ़ सकारात्मक समाचारों से भरा होता है... पर्यावरण, जनचेतना, समाजसेवा आदि, ना कोई खून-खराबे, बलात्कार, अपहरण, नेतागिरी आदि की खबरों से सप्ताह का आरम्भ नहीं किया जाता... यह एक उम्दा पहल है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिये... तडक-भडक वाले, मिर्च-मसाले वाले, समाचार पत्रों का बहिष्कार करके उन्हें सीधे रास्ते पर लाने की कोशिश की जानी चाहिये.. उन चैनलों को लोगों को देखने से हतोत्साहित करना चाहिये (शुरुआत अपने परिवार से करें... हमारे परिवार ने भी लगभग सारे समाचार चैनल देखना बन्द कर दिया है सिर्फ़ दूरदर्शन पर दस मिनट खबरें देख लेते हैं बस... हमें अभिषेक की शादी से क्या लेना-देना, या सौरव गांगुली टीम में रहें या नहीं हम क्यों दुबले हों)... सिर्फ़ सकारात्मक चैनल / कार्यक्रम (डिस्कवरी, अंताक्षरी, सारेगामा, सब टीवी के कुछ कार्यक्रम आदि) और सकारात्मक समाचार पत्र पढने की आदत डालनी होगी... और सिर्फ़ बहिष्कार से काम चलने वाला नहीं है... गाहे-बगाहे इन प्रतिकूल चैनलों की कडी से कडी आलोचना भी करना होगा... (Mouth Publicity is the Best Publicity)... अपने मिलने-जुलने वालों, रिश्तेदारों के साथ चर्चा में ऐसे चैनलों और अखबारों की आलोचना करें... लोगों को उन्हें ऐसे कार्यक्रम देखने से हतोत्साहित करें... धीरे-धीरे ही सही माहौल बनेगा... सरकार इस मामले में कुछ नहीं करने वाली... लोगों को अपना नजरिया बदलना होगा (टेस्ट बदलना होगा).... तभी कुछ हो सकता है...

Saturday, January 27, 2007

Republic Day of India 26th January

गणतन्त्र और हमारा मीडिया

प्रिय भाईयों रवि जी एवं संजय भाई,
हौसला-अफ़जाई के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद.
सबसे पहले ब्लोग के तौर पर मैं अपने विचार हमारे भारत के तथाकथित "सबसे तेज" और "जागरूक" इलेक्ट्रानिक मीडिया को साष्टांग दण्डवत करते हुए करता हूँ....
कल ही गणतन्त्र दिवस (Republic Day of India) था और मै सोच रहा था कि लोगों, मित्रों को बधाई दूँ या उनसे शोक व्यक्त करूँ.... आज से पचास-साठ वर्ष पूर्व जिस आम आदमी को बाहर धकियाकर विशिष्टजनों के जिस गणतन्त्र का निर्माण किया गया, देखते-देखते कब वह "गनतन्त्र" बन गया आम आदमी जान भी नहीं सका... और जिन मूलभूत अधिकारों की गाथा हमें सुनाई गई थी वे तो शुरू से ही आम आदमी के लिये नही थे, ना कभी मिलने थे, ना आगे भी मिलेंगे... जो थोडी-बहुत आशा एक जमाने में उन्मुक्त और खुले प्रेस (Free Press) से थी अब वह भी धीरे-धीरे क्षीण होती नजर आ रही है... मैं अपने भाईयों से पूछना चाहता हूँ कि क्या वे आज के हमारे मीडिया कवरेज से संतुष्ट हैं, क्या उन्हें लगता है कि हमारा प्रिन्ट (Print Media in India) और इलेक्ट्रानिक मीडिया (Electronic Media) अपनी भूमिका का सही निर्वहन कर रहा है ? क्या हमारा मीडिया बाहुबलियों, धनवानों, सेलेब्रिटीयों (??), और छिछोरे दो-कौडी के नेताओं का पिछ्लग्गू बन कर नहीं रह गया है ? आये दिन हम मीडिया में इन लोगों के तमाशे देखते रहते हैं... चलो माना कि मीडिया का सेलेब्रिटी के पीछे भागना उनके धन्धे का एक हिस्सा है... लेकिन उन तथाकथित सेलेब्रिटीयों के काले-पीले कारनामों को बढा-चढाकर पेश करना मानो किसी ने फ़ुट्पाथ के गरीब मजदूरों पर गाडी चढाकर हम पर या इस देश पर कोई बहुत बडा अहसान कर दिया हो.... या फ़िर किसी भूतपूर्व नशेडी ने गांधीगिरी का अभिनय करके अपना कोई कर्ज उतार दिया हो... हमे बताया जाता है कि उस बिगडैल नवाब ने कौन सी शर्ट पहन रखी थी जब वह फ़लाने मन्दिर में गया था.... उसने कैसे न्यायपालिका को मूर्ख बनाया... कैसे उसके यह कहने से कि "वह परिवार का इकलौता कमाने वाला है, और उसकी एक लडकी है, जिसकी देखभाल के लिये उसे जेल से बाहर रहना आवश्यक है" मानो यदि वह जेल चला गया तो वह लड्की सडक पर आ जायेगी... जबकि जिस दिन संजू बाबा रिहा (शुक्र है अभी पूरी तरह से रिहा नहीं ) हुए उसी दिन हमारे कश्मीर (Kashmir) में एक जवान मेजर मनीष पिताम्बरे भी शहीद हुए, लेकिन शहीद होने से पहले उसने हिजबुल मुजाहिदीन के एक सुप्रीम कमाण्डर को मार गिराया.... और हमला करने से पहले मेजर पिताम्बरे ने कभी भी यह नहीं कहा कि... "मै अपने परिवार का इकलौता कमाने वाला सपूत हूँ और मेरी एक बेटी (डेढ वर्ष की) है जो अमेरिका में नहीं भारत में ही पढती है".... लेकिन मेजर पिताम्बरे का जिक्र तो दूर... उसकी अन्त्येष्टि को भी हमारा "सबसे तेज" मीडिया कवर नहीं कर पाया, जो मीडिया एक बालक के बोरिंग के गढ्ढे में गिर जाने पर... उसका लाइव टेलीकास्ट (Live Telecast) करके पैसा कूटने और अपनी "टीआरपी" (??) बढाने में लगा था... सेंसेक्स (Sensex) के जरा सा ऊपर-नीचे हो जाने पर हाय-तौबा मचाने वाला हमारा मीडिया विदर्भ और आन्ध्र के किसानों की मौत नहीं दिखाता, क्योंकि वहाँ जाने से पहले (यदि उसकी सही और सच्ची रिपोर्टिंग करनी हो) उस चाकलेटी पत्रकार को "होमवर्क" करना होगा... लेकिन यदि अमिताभ यदि उसे रात को दो बजे साथ में मन्दिर चलने को कहेगा तो वह तत्काल चल देगा... क्योंकि वहाँ तो उसे और उसके चैनल को "माल" मिलने वाला है... ये पत्रकारिता है ? ये है हमारे मजबूत गणतन्त्र (?) का मीडिया ? जिस मीडिया को आटे-दाल के बढते भावों से अभिषेक-एश्वर्या की शादी की चिन्ता ज्यादा हो... वह मीडिया किस काम का ? कम से कम प्रिन्ट मीडिया कुछ हद तक इस मानसिक बीमारी से बचा हुआ है... (हालाँकि प्रिन्ट मीडिया भी धनकुबेरों के हाथ की कठ्पुतली ही है, जो उनका भोंपू बजाता रहता है) लेकिन फ़िर भी प्रतिस्पर्धा के कारण कोई अखबार कांग्रेसी है, कोई भाजपाई (ऊपरी तौर पर दिखाने के लिये), कोई सांप्रदायिक है, कोई धर्मनिरपेक्ष (??)... (हाँ.. जब जमीनों पर कब्जा करने की बात हो, कागज का कोटा बढवाना हो... सरकारी विग्यापनों की जुगाड लगानी हो, तब "हम सब एक है" वाली तर्ज पर आ जाते हैं).. फ़िर भी इनकी हालत इलेक्ट्रानिक मीडिया से कुछ बेहतर है (फ़िलहाल)... फ़िर वही सवाल जेहन में कौन्धता है... ये हम कहाँ जा रहे हैं... क्या वाकई हमारा प्रजातन्त्र (?) मजबूत हो रहा है (जबकि देश के लगभग १५ प्रतिशत हिस्से पर नक्सलियों का अघोषित कब्जा हो चुका है) (हो सकता है कुछ लोगों को यह आँकडा ज्यादा लगे... लेकिन सच्चाई यही है)...लिखने को तो बहुत कुछ है भाईयों.... बाकी अगले चिट्ठे में... पहला ही चिट्ठा है... हो सकता है कुछ गलतियाँ हुई हों... आलोचनात्मक प्रतिक्रिया के इन्तजार में... यह कच्चा चिट्ठा आपके नाम....

Friday, January 26, 2007

२६ जनवरी

भाईयों और बहनों,
२६ जनवरी के इस पावन मौके पर मैने भी श्री रवि रतलामी और अन्य ब्लोगरों से प्रेरणा लेकर अपना एक ब्लोग पेज आरम्भ करने की कोशिश की है. मुझ अग्यानी को फ़ूलने / पकने और टपकने मे अभी थोडा वक्त लगेगा... लेकिन मुझे विश्वास है कि मैं शीघ्र ही इस विधा को जानने - समझने लगूँगा... आखिर आप विद्वान लोगों का साथ भी तो मुझे मिलेगा ना....फ़िर डरने की क्या बात है... बस दिल की भडास निकालने का इससे अच्छा और क्या साधन हो सकता है.... अभी इतना ही... देखूँ तो सही ब्लोग पर यह कैसा दिखता है....