Monday, December 3, 2007

मलेशिया संकट : हिन्दुओं के लिये सबक

Malaysia Crisis and Indians

वही पुरानी कहानी एक बार फ़िर दोहराई गई, एक “तथाकथित” सेकुलर देश ने, एक दूसरे तथाकथित “महाशक्ति” को दुरदुराये हुए कुत्ते की तरह हड़का दिया। करुणानिधि ने तो अपना “वोट-बैंक” पक्का कर लिया, लेकिन हमारी सेकुलर(?) सरकार की जैसी घिग्घी बँधना थी, ठीक वैसी ही बँधी, क्योंकि मलेशिया भले ही कहने को सेकुलर हो, उसकी रगों में खून तो “वही” दौड़ रहा है, और हम ठहरे “स्वघोषित महाशक्ति”, सो किसी को नाराज भी नहीं कर सकते। और मानो गलती से कभी दहाड़ लगा भी दी, तो सुनेगा कौन हमारी? एक अहसानफ़रामोश पड़ोसी तक तो हमें जब-तब गरियाता-लतियाता रहता है। अपने आदमी देश के कोने-कोने में भेज कर डकैतियाँ डलवा रहा है, हमारे यहाँ की चिल्लर गायब करवा रहा है, ये हैं कि “वार्ता” का ढोंग कर रहे हैं।

खैर, मलेशिया पर वापस लौटते हैं... इस समस्या से उत्पन्न तीन पहलू तुरन्त नजर आते हैं- पहला है, क्यों भारतवंशियों पर ही लगातार समूचे संसार में हमले बढ़ते जा रहे हैं? कारण (मेरी नजर से) – शायद वहाँ के स्थानीय लोग भारतीयों की तरक्की से जलते होंगे, या फ़िर खुद भारत से गये हुए लोग वहाँ के समाज में घुल-मिल नहीं पाते होंगे, जिससे संवादहीनता की स्थिति बनती है। इससे एक सवाल सहज ही उत्पन्न होता है कि किसी दूसरे देश में गये भारतीयों को जब वहाँ की नागरिकता मिल गई हो, तब उन लोगों का भारत की तरफ़ मदद को ताकना क्या उचित है? ब्रिटेन या कनाडा जहाँ कहीं भारतीयों को उस देश की नागरिकता मिल गई, तो फ़िर क्यों वे हर बार भारत-भारत भजते रहते हैं, क्या यह देशद्रोह नहीं है? ठीक वैसे ही जैसे विभाजन के समय पाकिस्तान बनने पर जो मुसलमान भारत में ही रह गये यदि वे पाकिस्तान का झंडा उठाये घूमते हैं तब उन्हें देशद्रोही ही करार दिया जाता है। भले ही उनके कई रिश्तेदार पाकिस्तान में हों, लेकिन जब वे स्वयं भारत के नागरिक हैं तो उन्हें पाकिस्तान की ओर क्यों ताकना चाहिये? क्यों हर बात में पाक का गुणगान करना चाहिये? और मुसलमानों का केस तो इस केस से अलग इसलिये है क्योंकि विभाजन तो एक मानवनिर्मित त्रासदी थी, लेकिन जब कोई भारतीय अपनी स्वेच्छा से देश छोड़कर जाता है और दूसरे देश की नागरिकता ले लेता है, तब उसे वहीं के समाज में घुल-मिल जाना चाहिये, उसी देश का गुणगान करना चाहिये, उसी देश के भले के बारे सोचना चाहिये, इसलिये यदि पीड़ित तमिल मलेशिया के नागरिक हैं, तो उन्हें वहाँ के कानून के हिसाब से चलना चाहिये (मलेशिया कोई भारत थोड़े ही है कि अबू सलेम को लाने में करोड़ों खर्चा कर दिया, अब उसे संभालने में कर रहे हैं, ताकि वह सांसद बनकर और करोड़ों चरता फ़िरे)। और जो भारतीय मलेशिया के नागरिक नहीं बने हैं, उन्हें तो शिकायत करनी ही नहीं चाहिये, सीधे वापस आ जाना चाहिये (वैसे भी वह एक मुस्लिम देश है, वहाँ कोई सुनवाई तो होगी नहीं, जैसे अभी कुछ समय पहले मलयालियों के साथ अरब देशों में हुआ था)। रही बात मार खाने की, पिटने की, तो भैया जब हिन्दुस्तान में ही हिन्दू पिटता रहता है, तो बाहर उसकी क्या औकात है? चाहे फ़िजी हो, चाहे जर्मनी, चाहे अरब हो या फ़्रांस, हिन्दू कुटने के लिये ही पैदा हुआ है (दूसरा गाल सतत आगे जो करता रहा है)।

दूसरा पक्ष है सरकार- चाहे वह कथित हिन्दू समर्थक भाजपा की ही सरकार क्यों ना हो, विदेशों में हमारी सरकारों की एक नहीं चलती, कोई इनकी “चिंताओं” पर कान नहीं देता, और दे भी क्यों? हमने किया क्या है आज तक ईमानदारी से जनसंख्या बढ़ाने, जन्म से लेकर मृत्यु तक भ्रष्टाचार करने और जाति-धर्म के नाम पर लड़ने के अलावा। हाँ एक बात हमने जरूर की है...जमाने भर से हथियार पूरे पैसे एडवांस देकर खरीदे हैं और उन्हें कभी उपयोग नहीं किया। “भारतवंशी-भारतवंशी” नाम की बंसी जरूर हम यदा-कदा बजाते रहते हैं, बेशर्मी से ये भी कभी नहीं सोचते कि ना तो सुनीता विलियम्स, न तो बॉबी जिन्दल, ना स्वराज पॉल, ना ही वीएस नायपॉल कोई भी भारत का नागरिक नहीं है, ना इन्हें भारत से कोई खास लगाव है।

तीसरा पक्ष है, भारतीयों की हीनभावना से ग्रस्त मानसिकता। हमारे दिमाग में यह भर दिया गया है कि हमारा कोई गौरवशाली इतिहास था ही नहीं, शिवाजी, पृथ्वीराज चौहान वगैरह भगौड़े थे, सिर्फ़ अकबर ने या फ़िर डलहौजी साहब ने ही कुछ किया है, वरना हम तो साँपों से ही खेल रहे होते अब तक! आत्मसम्मान नाम की चीज एक खास मानसिकता के लोगों ने षडयन्त्रपूर्वक समाप्त कर दी। जहाँ किसी ने “गर्व” की बात की, तड़ से उसे सांप्रदायिक ठहरा दो।

तो भाईयों और बहनों, चादर तानकर सो जाईये, जैसे रामभरोसे देश चल रहा है वैसे ही आगे भी चलता रहेगा, करना ही है तो पहले अपने देशवासियों की फ़िक्र करो, फ़िर उनके बारे में सोचना जो दूसरे देशों के नागरिक हैं।

प्राप्त सबक :
(१) किसी भी दूसरे देश में खासकर जब वह मुस्लिम बहुल हो, भारतीयों को किसी भी प्रकार की हमदर्दी की अपेक्षा नहीं रखना चाहिये। (लोकतंत्र और निरपेक्ष न्याय प्रणाली मुस्लिम देशों के लिये अभी भी अजूबा हैं)
(२) जिस देश के नागरिक बन चुके हो उसी देश का गुणगान करो (कहावत- जिसकी खाओ, उसकी बजाओ)
(३) यदि विपरीत परिस्थिति हो भी जाये तो “भारत सरकार” नाम की लुंजपुंज संस्था से किसी मदद की उम्मीद मत करो।
(४) इसराइलियों की तरह आत्मसम्मान से जीने की कोशिश करना चाहिये।


, , , , , , , , , , , , ,

AddThis Social Bookmark Button

8 comments:

महेंद्र मिश्रा said...

बहुत बढ़िया

शास्त्री जे सी फिलिप् said...

प्रिय सुरेश

आपकी कलम दिन प्रति दिन सशक्त होती जा रही है. आपके विश्लेषणों में इतना दम है कि शायद आपका विरोधी भी कायल हो जाये. लिखते रहें. मेरी टिप्पणी न दिखे तो भी याद रखें कि मैं यहा आता रहता हूँ एवं आजकल यात्रा के कारण अपने विचार टिपिया नहीं पाता -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
हर महीने कम से कम एक हिन्दी पुस्तक खरीदें !
मैं और आप नहीं तो क्या विदेशी लोग हिन्दी
लेखकों को प्रोत्साहन देंगे ??

रजनीश मंगला said...

एकदम स्टीक लेख लिखा है। ऐसा ही कुछ सोचकर मैंने भी भारत को घटिया देश कहा था। तो गलत कहा?

Raj said...

गुरु मान गये आप को,एक माछर आदमी को....? बना सकता हे, तो भाई आप जेसे महान लेखको का लेख उसी आदमी को आत्मसम्मान से जीना सिखा सकता हे,खुब लिखो ओर ऎसा ही सच लिखो.
आप को प्रणाम

Pratik said...

सुरेशजी बहुत ही बढि‍या लि‍खा आपने। इजराइल की बात भी क्‍या खूब कही आपने। पर क्‍या गंदी घ्‍ि‍नौनी कांग्रेस सरकार जो र्सि‍फ वोट की राजनीति‍ के दम पर टि‍की हुइ है, देश को कभी आगे बढने देगी।

Pratik said...

सुरेशजी बहुत ही बढि‍या लि‍खा आपने। इजराइल की बात भी क्‍या खूब कही आपने। पर क्‍या गंदी घ्‍ि‍नौनी कांग्रेस सरकार जो र्सि‍फ वोट की राजनीति‍ के दम पर टि‍की हुइ है, देश को कभी आगे बढने देगी।

अरुण said...

काश की ऐसा हो पाता,पर हम लिजलिजे गलीच कीडो की तरह जीने वाले कभी भी किसी बात का विरोध ना करने वाले हमेशा हर समय दूसरो का मुंह तकने वाले ..कि वोह हमारे लिये खडे हो..हर समय सच बोलने और गलत बात का विरोध करने से पहले कि अगला बुरा ना मान जाये सोचने लगे रहने वालो के साथ और हो भी क्या सकता है

सागर चन्द नाहर said...

सुरेश भाई आपकी और गुजराती के सुप्रसिद्ध लेखक गुणवंत शाह की एक जैसी शैली है.. शाह गुजरात समाचार में डेली कॉलम लिखते हैं
लेख के बीच में इधर उधर की सैर करवाना, लोगों को एकाद लात लगा देना, वापस मूल विषय पर ले आना.....
आप की लेखनी में दिन दिन निखार आता जा रहा है। बधाई स्वीकार करें।