मध्यप्रदेश में उच्च शिक्षा और अर्जुन सिंह
Higher Education in MP & Arjun Singh
प्रसिद्ध उपन्यास “राग दरबारी” में पंडित श्रीलाल शुक्ल लिख गये हैं कि “भारत में शिक्षा व्यवस्था, चौराहे पर पड़ी हुई उस कुतिया के समान है, जिसे हर आता-जाता और ऐरा-गैरा लतियाता रहता है”। भारत में उच्च शिक्षा के क्या हालात हैं यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। विश्वविद्यालयों में जिस प्रकार की अराजकता, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और बन्दरबाँट है, वह लगभग सरेआम जब-तब उजागर होती ही रहती है। लेकिन यह किस्सा है “ओबीसी के मसीहा”, “मध्यप्रदेश के वरिष्ठतम”, प्रशासनिक चुस्ती(?) के लिये पहचाने जाने वाले, मप्र में झुग्गीवासियों को पट्टे देने वाले, शिक्षा जगत में “जनरल प्रमोशन” नाम का नायाब “आइडिया” लाने वाले.... (अब क्या नाम भी बताना पड़ेगा...?) अर्थात कई बार प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गये अर्जुनसिंह के गृहराज्य यानी हमारे मध्यप्रदेश का।
यूँ तो मध्यप्रदेश का नाम उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कोई खास सम्मान के साथ नहीं लिया जाता, लेकिन कुछ संस्थान भोपाल, ग्वालियर और इन्दौर में हैं जो सतत अच्छे क्रियाकलाप और शानदार शैक्षणिक रिकॉर्ड के लिये जाने जाते हैं, वरना अधिकतर नामी-गिरामी शिक्षा संस्थान, आईआईटी और आईआईएम तो अन्य राज्यों में हैं। यहाँ तक कि कोचिंग को एक इंडस्ट्री का रूप देने वाला कोटा भी राजस्थान में है।
बहरहाल बात हो रही है मध्यप्रदेश की, यहाँ की राजधानी भोपाल में एक राष्ट्रीय स्तर का तकनीकी शिक्षा संस्थान है मौलाना आजाद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (MANIT)। इस संस्थान में देश के श्रेष्ठ छात्रों को प्रवेश AIEEE की परीक्षा देने के बाद ही मिलता है। इस संस्थान के बारे में पिछले दो-तीन वर्षों से कई शिकायतें मिल रही थीं, कुछ मीडिया में आती रहीं, कुछ पर छात्रों के पालकों ने कार्रवाई के लिये लिखा। आखिर दबाव के आगे झुकते हुए माननीय अर्जुन सिंह ने मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा एक जाँच करवाई, दुर्भाग्य से जिसके जाँचकर्ता थे मप्र के ही एक वरिष्ट रिटायर्ड आईएएस डॉ.एम.एन.बुच। “दुर्भाग्य” इसलिये कहा, क्योंकि इन ईमानदार अधिकारी ने संस्थान की जाँच के बाद जो रिपोर्ट पेश की उसमें उन्होंने सब कुछ सच-सच उजागर कर दिया, और अब श्री अर्जुन सिंह के समक्ष इस खलबली मचाने वाली रिपोर्ट पर कुछ कार्रवाई करने के अलावा कोई चारा ही नहीं है। जरा एक नजर डालिये रिपोर्ट के कुछ खास बिन्दुओं पर, जिससे आपको पता चलेगा कि “जब बागड़ ही खेत खाने लगे, तो खेत का क्या हाल होता है”, या फ़िर ऐसे कहूँ कि यदि “चोर को ही खजाने की चाबी सौंप दी जाये तो क्या होता है”....
(१) नियुक्तियाँ – इस सम्मानित(?) संस्था में मौजूदा डीन और प्रभारी निदेशक डॉ. आशुतोष शर्मा की पदोन्नति नियमों के विपरीत है, वे प्रोफ़ेसर के रूप में पदोन्नत होने की न्य़ूनतम योग्यता भी नहीं रखते और इसीलिये उनकी नियुक्ति अवैध है। आशुतोष शर्मा के भाई अभय शर्मा को १४ जुलाई २००५ को सिविल इंजीनियरिंग विभाग में असि.प्रोफ़ेसर बनाया गया, बताया गया कि उन्हें “उद्योग” का अनुभव है, जबकि प्रदेश के लोक निर्माण विभाग को उद्योग नहीं माना जा सकता, न ही यह पीएचडी के समकक्ष है। बुच साहब ने लिखा है कि पिछले दो साल में (अर्थात जब से यूपीए सरकार आई और अर्जुन सिंह HRD मंत्री बने) इस संस्थान में हुई नियुक्तियों में 49 फ़ैकल्टी सदस्य आपस में रिश्तेदार हैं। इनकी नियुक्ति के लिये जिम्मेदार निदेशक, फ़ैकल्टी मेम्बर और चेयरमैन पर कार्रवाई होना चाहिये और जिनकी मिलीभगत से यह सब हुआ उन्हें गिरफ़्तार किया जाना चाहिये। अब कम से कम भारत में तो यह सम्भव ही नहीं है कि किसी केन्द्रीय शिक्षा संस्थान में एक पत्ता भी मंत्रीजी की मर्जी के बिना हिल जाये।
(२) ठेके – वर्ष 2006 में संस्थान में कुल साढ़े सात करोड़ के काम हुए जिसमें से साढ़े छः करोड़ के काम एक ही कम्पनी एसएस कंस्ट्रक्शन को दिये गये, जिसकी जाँच(?) जारी है।
असल में “डीम्ड यूनिवर्सिटी” बनाकर इसका कबाड़ा कर दिया गया है। अब यहाँ कोई बाहरी नियंत्रण नहीं है, पढ़ाना, परीक्षा लेना, पास करना, नियुक्तियाँ करना, सब कुछ स्थानीय स्तर पर ही होता है। इन सबका लाभ एक खास “गिरोह” उठा रहा है, जिसके खास राजनैतिक संपर्क हैं। जो भी नया निदेशक नियुक्त होता है, उसके खिलाफ़ खबरें छपवाना, उसे दबाव में लाना और फ़िर अपना सिक्का चलाना इस गिरोह के काम हैं। संस्थान के अंदरूनी हालात बदतर हो चुके हैं। डायरेक्टर कोई भी आदेश निकाले, कोई भी उसे नहीं मानता। संस्थान से सम्बन्धित कानूनी मामलों की लगभग 70 फ़ाईलें गायब हो चुकी हैं। शिक्षा प्रेमियों, प्राध्यापकों, विद्यार्थियों और पालकों ने जब-जब भी कोई शिकायत की वे सीधे कचरे के डिब्बे में जा पहुँची। तीन साल पहले अर्जुनसिंह ने देश के सारे एनआईटी निदेशकों को बिना सोचे-समझे बदल दिया (उनका मानना था कि सभी निदेशक मुरलीमनोहर जोशी के करीबी हैं और भाजपा के हैं)। इस क्रम में देश के एक बड़े वैज्ञानिक डीडी भवालकर के स्थान पर एक पूर्व विधायक को संस्थान का अध्यक्ष बना दिया गया, इसी से पता चलता है कि मानव संसाधन मंत्रालय की क्या इच्छा(!) थी। इसी प्रकार डॉ.पी.के.चांदे भी कोई आरएसएस के सदस्य नहीं है, बल्कि मप्र के तकनीकी शिक्षा जगत का एक जाना-माना नाम है, लेकिन उन्हें भी हटा दिया गया। चांदे साहब एक पुस्तक लिखने वाले हैं जिसमें सन 2003 से 2005 के बीच जिस शिक्षा माफ़िया का उन्होंने “अनुभव” किया उसकी जानकारी देंगे। भवालकर कहते हैं कि इतने बड़े तकनीकी संस्थान के रहते मप्र में उच्च शिक्षा का स्तर बहुत आगे जाना चाहिये था, लेकिन यह राजनीति में कुछ ऐसा उलझा कि अपना स्तर ही खो बैठा है।
यह रिपोर्ट गत जून में मंत्रालय में भेजी गई थी, और शायद आज तक इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, कारण खोजने की जरूरत नहीं है। मैनिट मप्र की नाक है, पूरे देश में ऐसे मात्र 20 संस्थान हैं लेकिन उसमें भोपाल का यह संस्थान शायद अन्तिम क्रम पर है। मप्र वालों को उम्मीद थी कि कम से कम अर्जुन सिंह के रहते इसका नाम त्रिची या वारंगल जैसे नामी तकनीकी शिक्षण संस्थाओं के साथ लिया जायेगा, लेकिन किसी ने सही कहा है कि राजनेता आजीवन राजनेता ही रहता है, चाहे वह किसी भी उम्र का हो।
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