Saturday, November 24, 2007

क्या ज्योतिषी उपभोक्ता संरक्षण कानून के दायरे में आते हैं?

Astrology Consumer Protection Act

जब मैंने ज्योतिष शास्त्र को विज्ञान बताने और ज्योतिषियों को परखने हेतु कुछ प्रयोगों पर पिछले कुछ लेख लिखे थे उस समय टिप्पणियों में तथा व्यक्तिगत ई-मेल में मुझे ज्योतिष समर्थकों के जो जवाब मिले थे उनमें से अधिकतर में ज्योतिष और चिकित्सा विज्ञान (मेडिकल साइंस) की तुलना करने की कोशिश की गई, मुझे लगातार यह बताया गया कि कोई भी विज्ञान पूरा नहीं होता, न ही डॉक्टरों द्वारा दी जाने वाली दवाईयाँ सुरक्षित होती हैं। इस तर्क के आधार पर समर्थकों का कहना था कि डॉक्टर भी गलती करते हैं, वे भी मरीज पर शोध करते रहते हैं, उनमें भी एकमत नहीं होता... आदि-आदि। वैसे तो इन दो बातों की तुलना करना ही सिरे से गलत है, क्योंकि चिकित्सा विज्ञान में लगातार शोध होते रहते हैं, तर्क-वितर्क होते हैं, बड़े-बड़े विद्वान भी गलत साबित होते हैं, वे अपनी गलती सुधार भी करते हैं, किसी मरीज को चार डॉक्टरों का एक पैनल देखेगा तो उनमें आपस में एकमत जल्दी से हो जायेगा, लेकिन ज्योतिष के साथ ऐसा कुछ भी नहीं है। यहाँ तो प्रश्न करते ही सामने वाले को नास्तिक, बेवकूफ़, नालायक, विधर्मी आदि साबित करने की होड़ लग जायेगी।

उसी समय से मेरे दिमाग में एक प्रश्न लगातार घूम रहा है कि “क्या ज्योतिषी भी उपभोक्ता संरक्षण कानून के अन्तर्गत आते हैं?” क्योंकि जब ज्योतिष समर्थक लगातार उसे विज्ञान कहते हैं और मेडिकल साइंस से तुलना करते हैं तब यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जिस प्रकार डॉक्टर और अस्पताल उपभोक्ता संरक्षण कानून के दायरे में आते हैं, उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है, उनकी डिग्री छीनी जा सकती है, क्या ऐसा ज्योतिषी के साथ किया जा सकता है? इस सम्बन्ध में कानूनी स्थिति की जानकारी चाहूँगा। ज्योतिष नामक “व्यवसाय” करने के लिये किसी को कोई डिग्री नहीं लेनी होती, किसी ज्योतिष महाविद्यालय (?) में पढ़ाई करने की आवश्यकता नहीं होती। अब मैं विद्वानों से जानना चाहता हूँ कि क्या भविष्यकथन गलत साबित होने पर किसी ज्योतिषी पर मुकदमा दायर किया जा सकता है? यदि हाँ, तो अगला प्रश्न उठता है कि कितने ज्योतिषी अपने यजमान को दक्षिणा की “रसीद” देते हैं, जिसके बल पर केस उपभोक्ता अदालत में टिके? दक्षिणा के अलावा ज्योतिषी छाता, जूते, छड़ी, कपड़ा, गाय, जमीन, आदि दान करने को कहते हैं क्या उसकी रसीद देते हैं? और यदि उसका उत्तर है “नहीं” तो फ़िर दूसरा प्रश्न खड़ा होता है कि – जब कोई व्यक्ति परिस्थितियों से परेशान हो जाता है तभी वह ज्योतिषी की शरण में जाता है। ऐसा माना जाता है कि ज्योतिषी उस बेचारे को मानसिक आधार देता है, और उसे समझा देता है कि आपका बुरा वक्त बस जाने ही वाला है, लेकिन इस प्रक्रिया के दौरान ज्योतिषी उसकी जेब भी काफ़ी हल्की कर देता है। ऐसे में पहले से ही पीड़ित व्यक्ति चुपचाप यह आर्थिक फ़टका भी सहन कर लेता है। लगभग इन्हीं परिस्थितियों में वह डॉक्टर के पास जाता है और यदि उस चिकित्सक से दवा देने में या उपचार में या “डायग्नोस” में गलती हो जाये तो उसे उपभोक्ता कानून के जरिये कोर्ट में घसीटने से बाज नहीं आता। फ़िर ज्योतिषी को भला क्यों छोड़ना चाहिये, क्या वे आसमान से उतरे हुए फ़रिश्ते हैं? या ज्योतिष किसी दैवीय कृपा से प्राप्त हुई कोई विद्या है, जिस पर प्रश्न उठाया ही नहीं जा सकता? सीधी सी बात तो यह है कि जहाँ दो व्यक्तियों या संस्था में पैसे का लेन-देन होता है, स्वतः ही वहाँ “उपभोक्ता” और “सेवा” का नियम लागू हो जाना चाहिये। यदि भविष्यकथन गलत हो जाये तो ज्योतिषी की गलती, लेकिन यदि तुक्के में भविष्यकथन सही बैठ जाये तो ज्योतिष विज्ञान महान है, ऐसी बात ज्योतिषियों ने ही फ़ैलाई है। यदि यजमान पर कोई संकट नहीं आया तो “मैंने फ़लाँ उपाय बताया था, इसलिये विघ्न टल गया” और यदि फ़िर भी संकट आ ही गया तो “मैंने तो पहले ही कहा था, कि तुम्हारे ग्रह खराब चल रहे हैं”....। वर्तमान के तनावग्रस्त और आपाधापी भरे अनिश्चित जीवन में व्यक्ति को मानसिक आधार चाहिये होता है, जिसके जीवन में जितनी अधिक अनिश्चितता होगी वह उतना ही ज्योतिष, वास्तु आदि बातों पर यकीन करेगा, जिसका साक्षात उदाहरण हैं फ़िल्म स्टार (जिनकी किस्मत हर शुक्रवार को बदलती रहती है) और राजनेता जिसे अगले पाँच साल की चिंता पहले दिन से ही खाये जाती है, या फ़िर कोई सट्टेबाज व्यवसायी जो रोज-ब-रोज बड़े-बड़े दाँव लगाता है, ये सारे लोग सुख में भी ज्योतिषियों के चक्कर काटते नजर आते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी समस्या के हल का आसान रास्ता खोजता है, मन्दिर जाना, व्रत करना, ज्योतिषियों को कुंडली दिखाना जैसे सैकडों उपाय वह करता है, लेकिन तर्कबुद्धि, व्यावहारिक उपाय या वैज्ञानिक सोच से वह बचता है। फ़िर बात आती है विश्वास और श्रद्धा पर, लेकिन यही विश्वास और श्रद्धा जब खंडित होती है, और बार-बार होती है, तब भी उस व्यक्ति की आँखें नहीं खुलतीं बल्कि उसका अंधविश्वास बढ़ता ही जाता है, और ज्योतिषियों की चांदी कटती रहती है। जिनके यहाँ पैसे की नदियाँ बह रही हैं, और ज्योतिष, न्युमरोलॉजी, वास्तु आदि जिनके लिये एक चोंचला और दिखावा मात्र है, उन्हें तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता, लेकिन एक सामान्य निम्न-मध्यमवर्गीय व्यक्ति जब ज्योतिषी के हाथों ठगा जाता है, तब क्या किया जा सकता है। इसलिये एक बार अन्त में पुनः मैं अपने प्रश्न दोहराना चाहूँगा और जनता की राय लेना चाहूँगा कि –
(१) क्या ज्योतिषी भी “उपभोक्ता संरक्षण कानून” के अन्तर्गत आते हैं?
(२) यदि हाँ, तो वह उपभोक्ता किस प्रकार से कानूनी मदद ले सकता है? क्या वह धोखाधड़ी का केस लगा सकता है?
(३) और यदि नहीं, तो क्यों नहीं? जब डॉक्टर, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, टेलीफ़ोन, बिजली, अन्य कम्पनियाँ, आदि सभी जो पैसे लेकर सेवा देते हैं इसके दायरे में आते हैं तो ज्योतिषी क्यों नहीं?
नोट : ज्योतिष समर्थक भी मुझ अज्ञानी को ज्ञान बाँटने की कृपा करें...
पुनश्च – बेनामी टिप्पणियों से भी बचें...


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8 comments:

संजय बेंगाणी said...

गलत बात है आप तो हाथ धोकर ही पीछे पड़ गये. :)

और उपभोक्ता कानून वाला सुझाव तो कमाल का है, कोई शुभ मुहर्त दिखा कर सरकार को प्रस्ताव भेजें. :)

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

सुरेशजी
मुझे ठीक-ठीक वह पूरा प्रकरण तो याद नहीं है, लेकिन यह baat san 2000 की है. में उन दिनों जालंधर के अमर उजाला अखबार में था. वहीं मुझे यह खबर मिली थी. पंजाब के एक उपभोक्ता फोरम ने एक ज्योतिषी के खिलाफ फैसला सुनाया था, जिसके तहत उस पर 70 हजार का जुर्माना लगा था. इसलिए कि उसकी बात गलत साबित हुई थी. किसी वकील से पूछेंगे तो हो सकता है कि वह बता दे. रही बात रसीद लेने की, तो वह बहुत लोग डाक्टर और दवा के दुकानदार से भी नहीं लेते हैं. यह उनकी गलती है. कायदे से जो ज्योतिष का व्यवसाय कर रहा है और फीस ले रहा है उसे रसीद देनी चाहिए और उसके ग्राहक यानी यजमान को रसीद की मांग करनी चाहिए.
रही बात चिकित्सा के पेशे से तुलना की, तो सवाल यह है कि यह क्यों नहीं किया जाना चाहिए? एक व्यवसाय की तुलना दूसरे व्यवसाय से क्यों नहीं की नानी चाहिए? आप जो शोध की बात कर रहे हैं, आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि भारत में ही कम से कम बीस ऐसे संस्थान हैं जो इस कार्य में बहुत गंभीरतापूर्वक लगे हुए हैं. यह अलग बात है यह कार्य वे पूरी तरह अपने संसाधनों से और अपनी रूचि के कारण ही कर रहे हैं. न तो उन्हें कोई सरकारी मदद मिली है और न वे इसकी उम्मीद ही करते हैं. इसीलिए उनका प्रचार-प्रसार भी उस गति से संभव नहीं है. यह बात तो आप जानते ही हैं की जिस चिकित्सा जगत में आप बता रहे हैं कि निरंतर शोध होते रहते हैं उन्हें सालाना हजारों अरब की ग्रांट मिलती है और अगर वहाँ वास्तव में शोध होते तो शायद यह दुर्दशा न होती. वैसे बिना जाने-समझे किसी भी विधा या व्यक्ति को गरियाना तो हम ब्लागरों का जन्मसिद्ध अधिकार है. यह कार्य आप करते रह सकते हैं. पर अगर जानना चाहें तो बताएँ, ज्योतिष के कुछ शोध संस्तानों के नाम-पते भी में आपको बता दूंगा और उनसे सम्पर्क भी करवा दूंगा. आगे जानना-समझना, विश्वास करना या न करना आपकी मर्जी.

दीपक भारतदीप said...

मुझे लगता है कि यह कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जिसे उपभोक्ता संरक्षण के दायरे में लाया जाये. दूसरा यह कि यह तो आदमी के भटकते मन की भावनाओं से जुडा विषय है और जिसका अपने लाभ के लिए हर धर्म के दलाल करते हैं आप केवल ज्योतिषियों को इससे नहीं जोड़ सकते.
दीपक भारतदीप

दीपक भारतदीप said...

मुझे लगता है कि यह कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जिसे उपभोक्ता संरक्षण के दायरे में लाया जाये. दूसरा यह कि यह तो आदमी के भटकते मन की भावनाओं से जुडा विषय है और जिसका अपने लाभ के लिए हर धर्म के दलाल करते हैं आप केवल ज्योतिषियों को इससे नहीं जोड़ सकते.
दीपक भारतदीप

दहाड़ said...

ज्योतिष तक तो ठीक है,लेकिन भगवान और मन्दिरो को तो छोड देना क्योकि कही कोई तीसरी शक्ति तो है इस दुनिया मॆ,जिसमें आस्था रखने से मन हल्का करने के लिये कोइ साथी मिल जाता है

Suresh Chiplunkar said...

@ इष्ट देव -
इन दोनों व्यवसायों की तुलना इसलिये नहीं की जा सकती क्योंकि चिकित्सा में डॉक्टरों पर एक जिम्मेदारी आयद होती है, उनके हाथों में एक मरीज की जान होती है, जबकि ज्योतिष एक नितांत गैर-जिम्मेदार धन्धा है, जिसमें ग्राहक के प्रति ज्योतिषी की कोई जवाबदारी नहीं होती, ना ही उसकी डिग्री छीनी जा सकती है, ना उसका धन्धा बन्द करवाया जा सकता है...

Suresh Chiplunkar said...

@ दीपक भारतदीप जी,
यह मुद्दा इसलिये उपभोक्ता कानून से जुड़ा है क्योंकि ज्योतिषी विज्ञापन भी करते हैं, फ़ीस भी लेते हैं, शायद (पता नहीं) प्रोफ़ेशनल टैक्स भी भरते होंगे, तो फ़िर उपभोक्ता कानून के दायरे में क्यों नहीं आना चाहिये? बल्कि यह कानून तो "वास्तु" की दुकानों पर भी लागू होना चाहिये..

shanpeter45 said...

Astrology is the science which determines the influence of the stars,especially of the five older planets on the fate of man.According to certain fixed rules the future can be predicted depending upon the position of stars at the time of consideration.Astrology believes in the existence of the 12 houses which are also known as the zodiac sign.The 12 houses or zodiac signs symbolize life,personal property,riches,children,health,marriage and course of life.