Friday, October 19, 2007

एंड्र्य़ू सायमंड्स की धमकी के निहितार्थ...

Symmonds Australia Indian Cricket Team

क्रिकेट में “स्लेजिंग” का मतलब होता है कुछ बोलकर या हरकतों से विपक्षी खिलाड़ी को छेड़ना, जिससे कि वह गुस्से में आये, उसकी एकाग्रता भंग हो और वह गलती करे।

हाल की भारत-ऑस्ट्रेलिया सीरिज में खिलाड़ियों के बीच काफ़ी तूतू-मैंमैं हुई, जिसमें दर्शक भी शामिल हुए और मामले ने काफ़ी तूल पकड़ लिया, हालांकि ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों द्वारा यह करना एक आम बात है, लेकिन दरअसल वे क्रोधित (बल्कि भौंचक्के) इसलिये थे कि इस बार स्लेजिंग की शुरुआत की भारतीय युवा खिलाड़ियों ने। गोरी चमड़ी के देशों के खिलाड़ी (ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, द.अफ़्रीका और न्यूजीलैंड) स्लेजिंग के कार्य में माहिर माने जाते हैं (यह उनके संस्कारों मे ही है – कैसे भी हो...जीतो), लेकिन पिछले कुछ वर्षों से यह स्थिति धीरे-धीरे बदलती नजर आ रही है।

भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका और वेस्टईण्डीज के खिलाड़ी अब ताने, गालीगलौज और छींटाकशी सुनते-सुनते तंग आ चुके थे। इन देशों की युवा ब्रिगेड ने अब “जैसे को तैसा” का जवाब देने की ठान ली है, और हो भी क्यों नहीं? अब इस खेल पर गोरे देशों का एकतरफ़ा कब्जा नहीं रहा है। काले-सांवले देश भी उन्हें जब-तब हराने लगे हैं, उनके गेंदबाजों को धोने लगे हैं, दर्शक संख्या इन काले देशों में ही ज्यादा होती है, विश्व क्रिकेट प्रशासन का सबसे अधिक पैसा यहीं से आता है, फ़िर यहाँ के खिलाड़ी गोरों की बातें क्योंकर सुनें? और कोई माने या माने सबसे बड़ा बदलाव आया है देश की आर्थिक स्थिति और नई सदी में भारत के युवाओं की सोच में। गाँधी जिस सदी में मरे थे अब वह बीत चुकी है। इक्कीसवीं सदी में जो युवा भारत की क्रिकेट टीम में आ रहे हैं, वे महानगरों के कम हैं, कस्बों और छोटे शहरों के ज्यादा हैं। भले ही आरम्भ में इन खिलाडियों की आर्थिक स्थिति कमजोर हो, लेकिन अब भारत की तरक्की और बदली हुई परिस्थितियों में, वे कुछ भी चुपचाप सुन लेने वाले “मेमने” नहीं रहे, वे भी “मुँहजोरी” का जवाब “मुँहजोरी” से देना सीख गये हैं, और यह सही रवैया भी है। यह रवैया धीरे-धीरे हमें लगभग हरेक क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। जिस दिन युवाओं के यही विद्रोही तेवर भारत में फ़ैले भ्रष्टाचार के प्रति हो जायेंगे, उस दिन सही मायनों में बदलाव आयेगा।

बहरहाल, वे दिन अब लद गये जब भारत या पाकिस्तान या किसी अन्य देश के खिलाड़ी को कोई “गोरा” कुछ कहता था तो वे उसे हँसकर टाल देते थे, या “महान खेलभावना”(?) का परिचय देते हुए भूल जाते थे, लेकिन अब जमाना बदल गया है, हर कोई जीतना चाहता है, लाखों-करोड़ों रुपये दाँव पर लगे हुए हैं, खिलाड़ी के कैरियर का सवाल है, तनाव है, दबाव है, अब यह सब नहीं सहा जायेगा, यदि ताना मारा जाता है तो ताना मारा जायेगा, यदि गाली दी जाती है तो और बड़ी गाली दी जाती है। इसके पीछे गोरे देशों की मानसिकता “ठाकुरों-ब्राह्मणों” वाली सवर्ण मानसिकता है, कि- “ऐ साला, काला लोग, हम ही तुमको उठना-बैठना-खेलना सिखाया है और साला तुम हमारे सामने आँख उठाकर कैसे चलता है, कैसे हमें हरा सकता है... साले हम शासक लोग हैं और तुम गुलाम लोग हो, गालियाँ खाते रहना तुम्हारी नियति है”, इसी घटिया मानसिकता के चलते अधिकतर काले देशों के खिलाड़ियों के साथ अन्याय होता आया है। “चकर” होगा तो शोएब अख्तर या मुरलीधरन, ब्रेट ली नहीं.... “दूसरा” नामक गेंद यदि हरभजन या सकलैन फ़ेंकेगा तो “वह थ्रो करता है”, यदि सचिन, इंजमाम या रणतुंगा, क्रीज पर अधिक देर तक टिक गया तो गालीगलौज, छेड़छाड़ तो पक्की है ही ऊटपटांग अपीलों का दौर भी प्रारम्भ हो जायेगा।

लेकिन अब जबकि क्रिकेट के तथाकथित “दलित” तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, उन्हें जब-तब हराने लगे हैं, रिकॉर्ड बुक में काले-सांवले लोगों के नाम ही ज्यादा आगे आने लगे हैं तो “गोरों” के पेट में दुखने लगा है और जिस चीज में वे अधिक माहिर हैं वे करने पर उतारू हो गये, लेकिन जब पासा पलटता दिखाई देने लगा, तब “उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे” की तर्ज पर पोंटिंग और सायमंड्स हल्ला मचाने लगे। उन्हें गुमान है “गोरी चमड़ी” का और “शासक वर्ग के होने” का, और इस गुमान को मुँहतोड़ जवाब देना जरूरी है। (भले ही “भारत का क्रिकेट खेल के उत्थान में कोई योगदान नहीं है, लेकिन इतने भी गये-गुजरे हम नहीं हैं कि कोई भी ऐरा-गैरा हमें गाली देता फ़िरे”)

अब यह तो सायमंड्स की धमकी से स्पष्ट हो गया है कि आने वाला ऑस्ट्रेलिया दौरा भारत के लिये खतरनाक रहेगा, लेकिन यदि सकारात्मक मानसिकता और “शठे शाठ्यम समाचरेत” का जज्बा दिल में रखते हुए, अग्नि परीक्षा पार करके वहाँ से लौटेंगे तब यह टीम एकदम बदली हुई टीम नजर आयेगी (यह आमतौर पर देखा जाता है कि किसी टीम के किसी खिलाड़ी को यदि कोई दूसरा गाली देता है तो टीम में एकजुटता बढ़ती है)।

सन्देश साफ़ है, “कौन बेवकूफ़ कहता है कि क्रिकेट एक जेंटलमैन गेम है”, मुगालता दूर कीजिये, क्रिकेट में भी छिछोरापन बढ़ता जा रहा है और, और बढ़ेगा, और हमारे युवा खिलाड़ी उसी भाषा में उसका जवाब भी देंगे।

“लेख के अगले भाग में क्रिकेट के इतिहास में घटित कुछ बेहद घटिया दर्जे की “स्लेजिंग” और पीड़ित खिलाड़ी द्वारा चुटीले और व्यंग्यात्मक अन्दाज में दिये गये जवाबी हमले, आदि के बारे में....”

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4 comments:

राजेश कुमार said...

आप बहुत अच्छा लिखते हैं लेकिन घर आये दुश्मन से भी खराब व्यवहार नहीं किया जाता है।

anitakumar said...

क्रिकेट के बारे में कभी इस एंग्ल से सोचा नही था। एक नया दृष्टीकोण रखने के लिए धन्यवाद, आप के अगले लेख का इंतजार रहेगा

Shrish said...

समझ नहीं पा रहा कि क्या कहें, एक तरफ से तो लगता है कि जैसे को तैसा ठीक है दूसरी तरफ से लगता है कि यह व्यवहार भारतीय संस्कृति के अतिथि देवोभव से मेल नहीं खाता।

gg1234 said...

atithi devo bhava sirf kitabon mein hi achcha lagta hai aajkal....atithi agar ghar aa ke gaali dega to jawaab dena to ahem kartavya ho jaata hai...
bharatiya cricket ko zaroorat hai ki TRIMURTI ko kahe ki ab bahut ho gaya ab retire ho jaaiye...nahi to nikaal diye jaaoge....