Tuesday, October 30, 2007

अंधविश्वासों की लहरें और पढ़ा-लिखा तबका

Superstitions, Education and Urban Community

मध्यप्रदेश के मालवा निमाड़ अंचल में इन दिनों “हरे काँच की चूड़ियाँ पहनो” नामक अंधविश्वास चल रहा है। एक अफ़वाह के अनुसार यदि महिलायें हाथों में हरे काँच की चूड़ियाँ पहनेंगी तो उनके सुहाग, बच्चे और घर-द्वार सुरक्षित रहेगा। यदि किसी महिला ने यह नहीं पहनीं तो भारी अनिष्ट हो जायेगा। मजे की बात तो यह है कि गाँवों की अनपढ़ महिलाओं के साथ-साथ पढ़ी-लिखी, शहरी और कम्प्यूटर का उपयोग करने वाली मूर्ख महिलायें भी इस अंधविश्वास के चक्कर में पड़ रही हैं। “नारी शक्ति” और अबला-सबला आंदोलन चलाने वाली, सिन्दूर और मंगलसूत्र को गुलामी की निशानी मानने वाली कई महिलायें भी इसकी चपेट में हैं। चूड़ी निर्माता और विक्रेता जमकर माल कूट रहे हैं।

इसी प्रकार कुछ माह पहले इसी अंचल में “जलेबी” नामक अंधविश्वास चला था, जिसके अनुसार ढाई सौ ग्राम जलेबी को पूजा करके नर्मदा में विसर्जित करना था, जिससे कि महिलाओं/लड़कियों के भाईयों के जीवन पर आया संकट टल जाये। हालत यह हो गई थी कि नर्मदा नदी में जलेबी की चाशनी और मैदे की लुगदी के कारण घोर प्रदूषण के चलते प्रशासन को अन्त में यह चेतावनी देना पड़ी कि इस प्रकार की “जलेबी विसर्जन” ना किया जाये अन्यथा कड़ी कार्रवाई की जायेगी। भाई लोगों ने जमी-जमाई दुकानदारी छोड़कर नर्मदा किनारे जलेबी की दुकानें खोल ली थीं, अफ़वाह चलाई, महिलाओं को बेवकूफ़ बनाया, और अच्छा कमाया। नर्मदा नदी प्रदूषित होती है तो होती रहे, उनकी बला से, यूँ भी साल में दो बार गणेश और दुर्गा पूजा की लाखों मूर्तियाँ प्रवाहित करके पानी गन्दा करते ही हैं।

इसी प्रकार उज्जैन या आसपास के नगरों में धर्मप्राण(?) जनता को मूक प्राणियों, गाय-ढोर को चारा खिलाने का शौक होता है, उनका मानना है कि इससे पुण्य(?) मिलता है। अब यहाँ गणित यह खेला जाता है कि आवारा पशु, गाय-बैल आदि सड़क पर छोड़ दिये जाते हैं, फ़िर वही व्यक्ति खुद एक ठेला लेकर घास बेचने बैठ जाता है, घास बेच कर भी कमा लेता है, और अपने आवारा पशु को फ़ोकट में चारा भी खिलवा लेता है, सड़क पर गाय-बैल गोबर करते रहें, लोग टकरा-टकरा कर गिरते रहें, न प्रशासन को कोई मतलब होता है, ना ही धर्मालुओं(?) को, आखिर “धर्म” का मामला जो ठहरा। एक बात तो सिद्ध है, कि शिक्षा प्रसार का अंधविश्वास से कोई लेना-देना नहीं होता। हमारे एक पड़ोसी जो Ph.D. वाले डॉक्टर हैं, मुहूर्त देखकर घर से निकलते हैं, इसी प्रकार एक और MD डॉक्टर हैं जो पंचांग देखकर महत्वपूर्ण ऑपरेशन करते हैं, अब इसे क्या कहा जाये?

इस लगातार जारी मूर्खता का एक और प्रमाण हैं इंटरनेट पर सतत जारी ई-मेल अंधविश्वास अभियान, जिसमें आपसे कहा जाता है कि यह मेल जादू और चमत्कार भरी है, इसे आप बीस लोगों को Forward करेंगे तो आपको खजाना और सुख-समृद्धि प्राप्त होगी, पढ़े-लिखे लोग बगैर सोचे-समझे इसे Forward कर भी देते हैं। मेरे पास जब ऐसी कोई मेल आती है तो सबसे पहले उसे “कचरा पेटी” (Delete) का रास्ता दिखाता हूँ (वह भी Shift दबाकर)| लेकिन सिवाय माथा पीटने के या फ़िर हँसने के और क्या चारा रह जाता है? जब शिक्षित होकर भी लोगबाग इस तरह की हरकतें करते हैं तो गुस्सा भी आता है, शर्म भी आती है, और कभी-कभी लगता है कि क्यों हम खामख्वाह गाँव वालों और अनपढ़ों के पीछे पड़े रहते हैं, पहले शहरों में तो लोग छींकने और बिल्ली के रास्ता काटने जैसे घटियातम अंधविश्वासों से बाहर निकलें। लेकिन इसका कोई इलाज नहीं है।

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6 comments:

दीपक भारतदीप said...

अपने अन्दर आत्मविश्वास की कमी ही मनुष्य में अंधविश्वास पैदा करती हैं और उसी को धर्म का प्रतीक मान लिया जाता है. विश्व में जो संघर्ष हैं वह किसी धर्म का नहीं बल्कि अंधविश्वासों का संघर्ष है.
दीपक भारतदीप

Udan Tashtari said...

आत्मविश्वास की कमी ही इन मान्यताओं को बढ़ावा देती है.

anitakumar said...

एकदम सही कहा आपने॥हम भी जीवन भर इन अंधविश्वासों से निजाद पाने का प्रयतन्न करते रहे हैं , काफ़ी हद्द तक सफ़ल है इस प्रयास में- कोई उपवास नहीं, कोई दान नहीं, इत्यादी , इत्यादी, फ़िर भी अभी भी कुछ न कुछ तो बचे ही होगें जिन से जुझना होगा। कौशिश जारी है

जोगलिखी संजय पटेल की said...

सुरेश भाई टोटकों और अंधविश्वासों की दुनिया बड़ी निराली है. मज़ा ये है कि ज़्यादा पढ़े लिखे और पैसे वाले इसकी गिरफ़्त में ज़्यादा हैं.मुझे माइग्रेन रहता है ...मेरी एक परिचित भाभी ने कहा संजय भैया ..एक छोटे से टोटके से ये प्रॉबलम हमेशा के लिये फ़ुर्र हो सकती है . मैने समाधान पूछा. बोलीं बस कुछ नहीं करना है...एक किलो जलेबी किसी चौराहे पर खिला दो ...तमारो माथो दुखणो बंद (आपका सर दुखना बंद) मैने सोचा माथा दुखना बंद हो न हो गधे की बुध्दि मुझमें प्रविष्ट कर गई तो.....सुरेश भाई किसको मुँह दिखाएँगे.फ़िर एक विचार और आया कि मेरा सर दर्द ग़ायब हो न हो और मेरी थोड़ी बहुत बुध्दि गर्दभराज में चली गई और उन्होने www.gardabhraj.blogspot.com शुरू कर दिया तो ?

ये तो हुई मज़ाक़ की बात ..लेकिन सोचिये सुरेशभाई कहीं माइग्रेन का दर्द निवारण गधा कर सकता है.इस मामले में हो सके तो एक बार भूल-भुलैया फ़िम्ल ज़रूर देखियेगा ..एक नये अंदाज़ से मनुष्य के अवचेतन मन और उसमें घर करने वाले विकारों की सुंदर दास्तान है ये फ़िल्म.

जोगलिखी संजय पटेल की said...

भैया
भाभी द्वारा सुझाए गए टोटके में गधा USP है.
वह हड़बड़ी में लिखना रह गया...जलेबी..गधा और चौराहा...सही बताना ठीक रहेगा न...कभी कोई आज़माना चाहे तो.

आशीष said...

is desh ka aur yahan ke logon ka bhagwan hi maalik hain....