Wednesday, October 3, 2007

भाषा, उच्चारण और वर्णमाला (भाग-२)

Phonetics, Language, Alphabets in Hindi

(भाग-१ से जारी...)
हमारी सृष्टि अक्षर से उत्पन्न होती है, इनका क्षरण नहीं होता इसलिये ये अक्षर कहलाते हैं। हमारी भाषा भी अक्षरों पर आधारित होती है, इन अक्षरों का भी क्षरण नहीं होता। अक्षर में स्वर और व्यंजन दोनों आते हैं, इन्हें वर्ण भी कहा जाता है। ये सारे वर्ण ध्वनि पर आधारित हैं, ध्वनि ही नाद है, और यह नाद सम्पूर्ण आकाश में व्याप्त रहता है - सूक्ष्म रूप में। इसीलिये आज वैज्ञानिक, कृष्ण द्वारा कही गई गीता को अंतरिक्ष से प्राप्त करने के प्रयास में जुटे हैं।

वर्णमाला के भी कुछ निश्चित सिद्धान्त हैं। वर्णमाला अ से ह तक होती है। पाँच-पाँच वर्णों की एक-एक पंक्ति की भी निश्चित भूमिका है, निश्चित स्थान है, निर्धारित पाँचों अक्षरों के निर्माण का भी एक क्रम है, वर्णमाला क्रम ऐसे ही नहीं बना दिया गया है, और इसीलिये प्रत्येक वर्ण का अपना-अपना अर्थ और स्थान होता है।

ऋग्वेद के अनुसार “स्वर्यन्त शब्द्यन्त अति स्वराः” अर्थात अन्य वर्ण की सहायता के बिना उच्चारित होने वाले वर्ण ‘स्वर’ कहलाते हैं। जबकि अर्थों को प्रकट करने वाले, व्यंजना करने वाले और स्वरों को मिलाकर उच्चारित होने वाले वर्णों को व्यंजन कहा जाता है। इस विस्तृत लेख की पृष्ठभूमि बताना अत्यंत आवश्यक था, जिससे कि पाठकों को इस विषय के बारे में थोड़ा विचार करने और एक भिन्न दृष्टिकोण रखने में मदद मिले, साथ ही भाषा विज्ञान से सम्बन्ध रखने वाले अन्य हिन्दी, संस्कृत के लेखक इसमें मदद कर सकें, क्योंकि मैं कोई भाषा विज्ञानी नहीं हूँ, सिर्फ़ अध्ययन की रुचि के कारण तथा हिन्दी पाठक समुदाय को इसका लाभ मिले इसलिये यह लेखमाला प्रस्तुत कर रहा हूँ।

मूलतः देखा जाये तो स्वर १२ ही हैं अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ, ॠ। इसमें के आठ अक्षरों (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ) को समानाक्षर और बाकी चार (ए, ऐ, ओ, औ) को सन्ध्याक्षर कहा जाता है। समानाक्षर मूल प्रवृत्ति के होते हैं, जबकि सन्ध्याक्षर स्वरों के योग से बने हैं, जैसे अ+इ=ए, अ+उ=ओ। हमारी वर्णमाला आमतौर पर हमें पूरी तरह याद होती ही है, कुछ लोगों को “दन्त्य”, “तालव्य” आदि शब्दों के अर्थ भी पता होंगे, लेकिन इस वर्णमाला की रचना ऐसी ही क्यों की गई? या इसके पीछे कोई तर्कसंगत कारण है? त्‌ थ्‌ द्‌ ध्‌ न्‌ ये सभी दन्त्य उच्चार हैं, यह तो पता है, लेकिन इसे इसी क्रम से क्यों लिया गया? थ्‌, त्‌, ध्‌, द्‌, न्‌ अथवा थ्‌, ध्‌, न्‌, त्‌, द्‌ इस क्रम से क्यों नहीं लिया गया? ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है। ऋ और लृ को स्वर क्यों माना जाता है? श्‌ और ष्‌ में क्या फ़र्क है? इन सभी प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास इस लेखमाला में किया गया है।

इस लेखमाला को पढते समय जब कभी मैं थ्‌, द्‌ अथवा “आ” आदि अक्षर लिखूँ तो पाठक उसे मात्र एक अक्षर के तौर पर ना देखें। हमारे मुँह से बाहर निकलने वाले उच्चार कैसे हो रहे हैं, यह दृष्टिकोण होना चाहिये। व्यंजन लिखते समय अक्षरों को हलन्त के साथ ही लिखा गया है, जिससे कि व्यंजन की शुद्धता बरकरार रहे, उसमें स्वर की मिलावट नहीं हो, जैसे कि ‘ण’ उच्चार में “ण्‌” और “अ” का मिश्रण है, एक व्यंजन है, दूसरा स्वर है। यह मिलावट रोकने और भ्रम से बचने के लिये व्यंजनों को हलन्त के साथ लिखा गया है। इसे और स्पष्ट तौर पर समझने के लिये हम साइंस के विद्यार्थियों की तरह परमाणु-अणु का सिद्धांत वापरेंगे – “ण्‌” एक परमाणु और “अ” दूसरा परमाणु है, जिससे मिलकर “ण” अणु बनता है, जैसे कि ‘क्ष’ नामक अणु ‘क्‌’, ‘ष्‌’ और ‘अ’ इन परमाणुओं से बना है, लेकिन वर्णमाला में अन्य स्वर-व्यंजनों के साथ-साथ ‘क्ष’ और ‘ज्ञ’ को भी रखा जाता है।

लेखमाला के अगले भाग (भाग-३) में हम देखेंगे कि उच्चार करने वाले हमारे शरीर के विभिन्न अवयवों (Vocal tract) के बारे में, तब तक यहाँ मैं वर्णमाला प्रस्तुत करता हूँ, ताकि यदि किसी को मालूम ना हो तो एक बार इन अक्षरों पर नज़रे-इनायत करे, मनन करे, कंठस्थ करे, जिससे कि वह इस लेखमाला का और अधिक आनन्द उठा सके –

स्वर - अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ, ॠ, लृ
व्यंजन वर्ग –
क वर्ग - क्‌, ख्‌, ग्‌, घ्‌, ङ्‌
च वर्ग - च्‌, छ्‌, ज्‌, झ्‌, ञ्‌
ट वर्ग - ट्‌, ठ्‌, ड्‌, ढ्‌, ण्‌
त वर्ग - त्‌, थ्‌, द्‌, ध्‌, न्‌
प वर्ग - प्‌, फ़्‌, ब्‌, भ्‌, म्‌

य्‌, र्‌, ल्‌, व्‌
स्‌, श्‌, ष्‌, ह्‌, ळ्‌
(विद्वान पाठक जरूर सोच रहे होंगे कि इसमें ‘अं’ और ‘अः’ का तथा ‘क्ष’ ‘त्र’, ‘ज्ञ’ का समावेश क्यों नहीं है? इसका जवाब आगे की सम्पूर्ण लेखमाला पढकर मिल जायेगा)।

अगले भाग में हम देखेंगे स्वर और व्यंजन का उच्चार, उच्चारित होने वाले शब्दों के लिये शरीर के ध्वनि तंत्र का अध्ययन, कण्ठ्य, तालव्य, दन्त्य उच्चार आदि के बारे में जानकारी....

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5 comments:

Shastri JC Philip said...

प्रिय सुरेश

दूसरा भाग पढा. बहुत अच्छा, एवं आधिकारिक !



-- शास्त्री जे सी फिलिप



प्रोत्साहन की जरूरत हरेक् को होती है. ऐसा कोई आभूषण
नहीं है जिसे चमकाने पर शोभा न बढे. चिट्ठाकार भी
ऐसे ही है. आपका एक वाक्य, एक टिप्पणी, एक छोटा
सा प्रोत्साहन, उसके चिट्ठाजीवन की एक बहुत बडी कडी
बन सकती है.

आप ने आज कम से कम दस हिन्दी चिट्ठाकरों को
प्रोत्साहित किया क्या ? यदि नहीं तो क्यो नहीं ??

संजय बेंगाणी said...

सही कहा. मैं अं तथा अः के बारे में ही सोच रहा था. तो अगली कड़ी का इंतजार है.

Srijan Shilpi said...

अरे वाह, यह तो अदभुत श्रृंखला शुरू की आपने। सरल हिन्दी में इस तरह भाषाविज्ञान को समझाना वाकई अत्यंत सराहनीय प्रयास है।

जिसने केवल वर्णमाला और अंकों को भी गहनता से सीख लिया हो, वह परम ज्ञान और परम धाम तक को सहजता से प्राप्त कर सकता है।

Shrish said...

बहुत अच्छा सुरेश भाई। आपके लेख से कई नई जानकारियाँ मिली। अगली कड़ी का इन्तजार है।

तपन शर्मा said...

सुरेश जी, मैं तो ये भी सोच रहा हूँ कि
स्‌, श्‌, ष्‌, ह्‌,
क्यों लिखा...
श्‌, ष्‌,स् , ह्‌, क्यों नहीं.. :)
चलिये अगला अंक पढ़ता हूँ...