Saturday, October 6, 2007

कुमारस्वामी ने भाजपा को दिया चाँटा

Kumaraswami, BJP, Karnatak, Power sharing

जो काम मायावती एक जमाने में करते-करते रह गईं थी, वह बाप-बेटे की जुगलबन्दी और काँग्रेस की पिछवाड़े से की गई “उँगली” ने कर दिखाया। कर्नाटक में सत्ता की बन्दरबाँट में जब माल देने की बारी आई तो बिल्ली सारा माल अकेले हजम करने की जिद कर बैठी, और “बन्दर” देखते ही रह गये। इसे कहते हैं “चोरों को पड़ गये मोर”...। इन भाजपा वालों के साथ कम से कम एक बार यह चोट होना जरूरी था, सत्ता के लिये “यहाँ-वहाँ-जहाँ-तहाँ, मत पूछो कहाँ-कहाँ” मुँह मारते भाजपाईयों को यह चमाट कुछ ज्यादा ही जोरदार लगा है (जोर का झटका धीरे से)। आश्चर्य सिर्फ़ इस बात का है कि जनता को ठगने वाले दो चोर आपस में ही एक दूसरे को ठग लिये और जनता को मजा आ गया। इसे कहते हैं “बिन पैसे का तमाशा”, क्या-क्या नहीं किया भाजपा ने इनके लिये, लग्जरी बस से गुजरात और मध्यप्रदेश घुमाने ले गये, पहले सत्ता भी दी, मुख्यमंत्री पद भी नहीं माँगा, इतने सारे “त्याग” के बदले मिला क्या... ठेंगा...। कम से कम अब तो भाजपा वालों को अकल आ जानी चाहिये कि “धर्मनिरपेक्ष दल” (हा हा हा हा) अपने बाप के भी सगे नहीं है, तो इनके क्या होंगे। मजे की बात तो यह है कि तमाम विचार मंथन, शिविर और जाने क्या-क्या आयोजित करने वाले इनके आका इन्हें समझाते क्यों नहीं कि भाजपा को अकेले ही चलना चाहिये, जब तक पूर्ण सत्ता ना मिले (चाहे वह पचास साल बाद मिले)। भानुमति का जो पिटारा वाजपेयी जी किसी तरह पाँच साल चला ले गये, उस वक्त ने ही इनकी खटिया खड़ी की है। कल्पना करें कि भाजपा कह देती कि जब तक हमारे तीन मुद्दे – राम मन्दिर, धारा ३७० और समान नागरिकता कानून नहीं माने जायेंगे, हमे किसी से गठबन्धन नहीं करना, सब जाओ भाड़ में। उस वक्त ये सारे चूहे जैसे दल कहाँ जाते, निश्चित रूप से कांग्रेस की गोद में तो नहीं, क्योंकि अपने-अपने राज्यों में तो ये कांग्रेस के खिलाफ़ ही जीत कर आये थे, लेकिन भाजपा वालों को अपने मुद्दे या अपनी पहचान या सौदेबाजी करने से ज्यादा सत्ता की मलाई चाटने की जल्दी थी और ताबड़तोड़ “एनडीए” नाम का जमूरा खड़ा किया (ठीक वैसा ही जैसा की अभी “यूपीए” नाम का है), अंततः हुआ क्या, कन्धार का दाग सदा के लिये माथे पर लग गया, नायडू साहब, जयललिता और ममता केन्द्र को चूस कर अपने-अपने रास्ते निकल लिये, ये “राम के बन्दर” बैठे रह गये हाथ में फ़टा हुआ भगवा लिये। अब भी वक्त हाथ से नहीं निकला है, मोदी को आगे करो, हिन्दुत्व की राजनीति खुलकर करो, कम से कम इतनी सीटें लाओ (और मिल भी जायेंगी) कि मजबूत सौदेबाजी की स्थिति में आ जाओ, फ़िर अपना मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनवाओ.... राम मन्दिर पर जोरदार काम करो, सरकार गिर जाती है तो गिर जाने दो, अगली बार, उसकी अगली बार, नहीं तो और अगली बार... कभी न कभी ये “धर्मनिरपेक्ष”(?) दल भाजपा को उनकी शर्तों पर समर्थन जरूर देंगे, लेकिन उसके लिये सत्ता का त्याग करना पड़ेगा, जो कि भाजपा के लिये एक मुश्किल भरा काम है... आगे “राम” जाने....


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2 comments:

Gyandutt Pandey said...

बहुत सुन्दर लिखा चिपलुनकर जी। सत्ता के मोह को छोड़ना चाहिये भाजपा को। जो दुश्कर कार्य है।

P K Surya said...

मोह को छोड़ना चाहिये भाजपा को। or kewal desh kee bhalae k liye jo ban sake karna chahiye, BJP sada yaad rakhi jaye ge, han BJP Ka karndhar Bhai Narendra Modi hee hen,