Monday, October 29, 2007

ज्योतिषियों को चुनौती और अनसुलझे जवाब

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ज्योतिष के सिद्धांतों और उनकी अप्रासंगिकता तथा अवैज्ञानिकता को लेकर पिछले दो लेखों के अभी तक मुझे सन्तोषजनक जवाब प्राप्त नहीं हुए हैं। संतोषजनक मतलब तार्किक और वैज्ञानिक जवाब। जो प्रतिक्रियायें अभी तक मुझे मिली हैं, उनमें से अधिकतर का सार यही हैं कि “ज्योतिष तो एक महान शास्त्र है”, “हमारे पूर्वजों और ऋषि-मुनियों ने जिस पद्धति को विकसित किया, वह जरूर अच्छी ही होगी”, “जानकारी तो नहीं है, लेकिन ज्योतिष सत्य ही होगा”... आदि... तात्पर्य यह कि मेरे प्रश्नों का सोच-विचार कर तर्कसम्मत जवाब देने की बजाय अधिकतर लोगों ने “ज्योतिष तो सच ही है, हमारा विश्वास (या अंधविश्वास?) है, हमारे बुजुर्ग कभी गलत नहीं होते....” आदि-आदि की टेक ही लगाये रखी। एक ज्योतिषी महोदय ने समस्त ज्योतिष विरोधियों को नास्तिक ठहराते हुए तमाम चुनौतियाँ ही दे डालीं.... अस्तु। अब पुनः एक बार विद्वान ज्योतिषियों की सुविधा (या असुविधा?) के लिये मैं अपने सवाल दोहरा देता हूँ-

प्रश्न १ – यदि दूरस्थ ग्रहों का प्रभाव मानव पर पड़ता है, तो कैसे पड़ता है? क्या इस सम्बन्ध में ज्योतिषियों ने कोई अध्ययन किये हैं, यदि हाँ तो इन्हें किस जर्नल में प्रकाशित किया है? किस ग्रह का असर कितना होता है, क्या यह विस्तार से बताया गया है?

प्रश्न २ – क्या राहु-केतु नामक ग्रह होते हैं? या यह काल्पनिक हैं? यदि होते हैं, तो सौरमंडल में उनकी सही स्थिति और कोण आदि क्या है? और यदि काल्पनिक हैं, तो उनका असर कुंडलियों और जीवन पर कैसे पड़ता है? क्यों राहु और केतु का दशा काल 18 और 7 वर्ष रखा गया है? कोई अध्ययन या वैज्ञानिक ग्रन्थ हो तो “रेफ़रेन्स” दें।

प्रश्न ३ – एक ही स्थान, एक ही समय, एक ही परिवार, एक ही पृष्ठभूमि में जन्म लेने वाले दो जुड़वाँ बच्चों के कर्म, आचरण, शिक्षा, विवाह, बच्चों का जन्म और मृत्यु आदि में अन्तर क्यों आना चाहिये? (“भाग्य में लिखा है” नामक जवाब छोड़कर)

फ़लज्योतिष या भविष्यवक्ताओं को असुविधा में डालने के लिये कई ऐसे विषय हैं, जिन पर ज्योतिषी सीधे तौर कुछ भी बोलने से बचते रहते हैं, इसीलिये कई लोग अब यह मानने लगे हैं कि ज्योतिष या भविष्यकथन आदि के जो दावे किये जाते हैं वह दरअसल Law of Probability (संभाव्यता के सिद्धांत) पर आधारित होते हैं। यदि मेरे पास दस व्यक्ति प्रश्न पूछते हैं कि गुरुजी मेरी भैंस खो गई है, कहाँ मिलेगी? और मैं उन दसों व्यक्तियों को कहूँ कि जाओ बच्चा, तुम्हारी भैंस पूर्व दिशा में मिलेगी... तो इस बात की संभावना 40% से भी अधिक है कि सच में भैंस पूर्व दिशा में ही मिले, अर्थात मेरे चार भगत तो पक्के बन गये, बाकी के छः लोग भी अपने मन को किसी कारण से समझा लेंगे, लेकिन “बाबा” को दोष कतई नहीं देंगे। यदि भविष्यकथन इतना ही सही होता तो तमाम ज्योतिषी शेयर मार्केट में पैसा लगाकर रातोंरात अरबपति हो जाते, लेकिन ऐसा है नहीं, वरना मुकेश अम्बानी की जन्मपत्रिका देखकर कोई महान ज्योतिषी आसानी से बता सकता है कि “रिलायंस पेट्रोलियम” का शेयर अगले तीन साल में कितना “रिटर्न” देगा, ऐसा दावा अभी तक किसी ज्योतिषी से सुनने में तो नहीं आया है।

ज्योतिष के मूल सिद्धांत अर्थात “जन्म समय” जिस पर सारा ज्योतिष टिका हुआ है, जब वही विवादों के घेरे में हो तब सही भविष्यवाणी कैसे की जा सकती है। जन्म समय किसे माना जाये? जब गर्भ में पहली बार कोई जीव जन्म लेता है तब (यह तो खुद माँ-बाप भी नहीं बता सकते)...यदि यह समय जीवात्मा के जीवन का नहीं माना जाता तो फ़िर कम से कम गर्भधारण का आठवाँ महीना तो माना ही जाना चाहिये, क्योंकि तब तक बच्चे की सुनने-समझने की शक्ति विकसित हो चुकी होती है (वरना अभिमन्यु के चक्रव्यूह भेद वाली “थ्योरी” धराशायी हो जायेगी)... या उस समय को माना जाये जब वह गर्भाशय से बाहर आता है तब... या फ़िर उस समय को जब उसकी नाल काटी जाती है और पहली बार उसके मुँह से आवाज निकलती है तब... ज्योतिषियों में इस पर मतभेद हैं, तो पहले यह बात तो स्पष्ट हो, फ़िर बाकी की बातें... क्योंकि इन सभी समय में कहीं नौ माह का, कहीं दो चार मिनट का तो कहीं-कहीं दस पन्द्रह मिनट का अन्तर भी आना स्वाभाविक है। जब हमारे ज्योतिषी बन्धु इस बात पर जोर देते हैं कि हर पन्द्रह मिनट में ग्रहों की स्थिति बदल जाती है, तब इतने बड़े अन्तर से तो कुछ का कुछ हो सकता है। और इस बात की भी क्या गारंटी है कि नर्स ने प्रसूतिगृह से बाहर आकर जो समय बताया वही सही हो, उसमें भी हेर-फ़ेर हो ही सकता है... फ़िर कैसे सही भविष्य देखा जायेगा?

अब बात आती है चुनौतियों की, डॉ.अब्राहम कोवूर (भारत में जन्मे और फ़िलहाल श्रीलंका में स्थाई निवासरत) नामक एक वैज्ञानिक ने वर्षों पहले भारत में चल रहे अंधविश्वासों और “बाबागिरी” के चमत्कारों(?) को लेकर कुछ चुनौतियाँ दी थीं, जैसे बन्द कमरे में कथित चमत्कार दिखाना, कम से कम कपड़ों में चमत्कार दिखाना, अंगूठी, भभूत जैसी छोटी चीजों की बजाय हवा में से कद्दू, गन्ना जैसी वस्तुयें प्रकट करना आदि शामिल थीं (इन चुनौतियों को स्वीकार करने और करके दिखाने पर इनाम राशि उस वक्त एक लाख रखी थी, जो अब बढ़कर पाँच लाख कर दी गई है)। आज तक इन चुनौतियों को किसी ने स्वीकार नहीं किया है। १ से ३ दिसम्बर १९८५ को तीसरे अखिल भारतीय ज्योतिष सम्मेलन में इन्हीं डॉ.कोवूर ने ज्योतिषियों को भी निम्नलिखित चुनौतियाँ दी थीं-

(१) ज्योतिषियों को दस अचूक जन्मसमय की कुंडलियाँ दी जायेंगी और साथ ही दस हाथों के निशान कागज पर दिये जायेंगे, उन्हें सिर्फ़ यह बताना होगा कि सम्बन्धित व्यक्ति जीवित है या मृत? तथा स्त्री है या पुरुष?

(२) इसी प्रकार दूसरे दस कुंडलियों और अंगूठे के निशान के समूह के आधार पर सम्बन्धित व्यक्ति के शिक्षण, विवाह, दुर्घटनायें, नौकरी/व्यवसाय और मृत्यु की बाबत भविष्यवाणियाँ करना हैं, यदि अस्सी प्रतिशत भी सही निकल जायें तो हम (अर्थात महाराष्ट्र अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति) इसे विज्ञान मान लेंगे।

(३) ऊपर दी गई पद्धति के अनुसार विख्यात ज्योतिषियों (जिनका चयन भी ज्योतिषियों की महासमिति ही करे) को अलग-अलग कमरों में बैठाकर भविष्यकथन करवाया जायेगा। इससे यह सिद्ध होगा कि भारत के नामचीन ज्योतिषियों द्वारा एक जैसी कुंडलियों और समय के आधार पर किया गया कथन सत्य से कितना दूर होगा और उन्हीं महानुभावों के आपस में एक-दूसरे के विरोधी कथन आने पर समाज के सामने असलियत आ सकेगी।

लेकिन इस चुनौती को स्वीकार करने के लिये आज तक कोई तैयार नहीं हुआ है...फ़िर वे इसे विज्ञान कैसे कह सकते हैं? अभी तो मेरे पास कई प्रश्न हैं, फ़िलहाल लेख के शुरुआत में दिये हुए तीन प्रश्नों का उत्तर जान लूँ, और इन चुनौतियों के बारे में महान लोगों के विचार देखूँ, फ़िर आगे और सवाल होंगे... ज्योतिषीगण कृपया इनके जवाब दें, चाहे तो अपने ब्लॉग पर ही दें, या मुझे व्यक्तिगत मेल करें...
(सन्दर्भ : महाराष्ट्र अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति एवं प्रकाश घाटपांडे, पुणे)

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5 comments:

Anonymous said...

aatmamugdhata ki parakashtha he aapke lekh.mere kuch chote chote aur tuccha prashno ka uttar dijiye taki mujhe aapka mansik star samajh aaye jyotish k vishay me ....
1.aap khud kitna jante he jyotish k bare me?
2.kitne jyotish k granth aapne khud padh liye he ?
3.sanskrit ka kitna gyan he aapko ki aap yeh granth padh paye?
4.aapne jo bhi likha he usme aapke khud k anubhav,ya shodh kiye huye kitne tatthya he ?
....pahle khud ko tatoliye janab aur fir aage ki baatein kijiye .....pahle us star par to aaiye ki aapko kuch samjhaya jaye....fir aapke tathakathit adhunik vaigyanik prashno k uttar aapko jaroor diye jayenge.....

Shrish said...

अगर असली ज्योतिषी (ठग नहीं) के पास दस आदमी भैंस खोने सम्बंधी प्रश्न पूछने आएगा तो वह सभी को तुक्के से पूर्व दिशा नहीं बताएगा बल्कि गणना करके बताएगा।

आपके ज्योतिष सम्बंधी शंकाओं का उत्तर देने के लिए तो मैं उपयुक्त व्यक्ति नहीं हूँ लेकिन यह अवश्य कहूँगा कि किसी भी चीज की आलोचना करने से पहले उसे सीखना चाहिए। एक बार सीखने के उपरान्त ही कोई उसको सही गलत कहने का अधिकारी हो सकता है।

बहुत से लोग जिन्होंने साइंस नहीं पढ़ी इसे पागल और सनकी वैज्ञानिकों के दिमाग की उपज बताते हैं। तो बात वही है विषय का ज्ञान न होने पर सभी शास्त्र काल्पनिक ही लगते हैं।

gatyatmak jyotish said...

मैं बस इतना ही कह सकती हूं कि योगा और आयुर्वेदा की तरह ही जबतक ज्योतिष ज्योतिशा के रुप में हमारे देश में वापस नहीं लौटेगा , हम इसके महRव को स्वीकार कर ही नहीं पाएंगे। मेरी चुनौती आप भी स्वीकार करें mere blog पर .

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...
This comment has been removed by the author.
Sagar said...

Dear friend, I liked your article. But i find certain errors regarding Dr Kavoor. He died in 1978, hence he couldn't have attended Jyotish conf of 1985. You should also edit his bio where you have said that filhal vah Sri Lanka me rah rahe hain. As said above, he is no more alive.
Tks,