Thursday, October 25, 2007

“ज्योतिष” विज्ञान नहीं, कोरी कल्पना और अनुमान है

Astrology, Science, Fiction and Predictions

मेरे एक लेख “क्या आप भगवान को मानते हैं?” के जवाब में कुछ ज्योतिषी बन्धु बहुत लाल-पीले हुए थे और मुझे अधर्मी, अज्ञानी का खिताब दिया था। अक्सर अपने धन्धे की मार्केटिंग के लिये ज्योतिष को “विज्ञान” बताया जाता है, ताकि शिक्षित लोग भी उसके झाँसे में आ जायें इसी विषय को लेकर मैंने कुछे मुद्दे उठाने की कोशिश इस लेखमाला में की है, जिस पर विचार किया जाना, बहस-मुबाहिसा किया जाना, नये-नये तर्क दिया जाना आवश्यक है ताकि भ्रम छँटे और वास्तविक स्थिति लोगों के सामने आ सके।

यह बात तो सभी मानेंगे कि जब तक ज्योतिष और ग्रहों के तथाकथित असर जब तक साबित नहीं हो जाते, कम से कम तब तक तो ज्योतिष विद्या एक “अप्रायोगिक विश्वास” ही है, लेकिन सिर्फ़ यही आधार ज्योतिष को विज्ञान नहीं होना सिद्ध नहीं करता, कुछ और भी आधार हैं जिन पर विचार किया जाना आवश्यक है ताकि साबित किया जा सके कि ज्योतिष विज्ञान नहीं है, बल्कि कोरे अनुमान, ऊटपटाँग कल्पनायें और खोखला अंधविश्वास है।

सिर्फ़ यह कह देने भर से कि रोजाना हजारों ज्योतिषियों के लाखों अनुमान गलत साबित होते हैं, इसलिये ज्योतिष विज्ञान नहीं है, भी काफ़ी नहीं होगा। ज्योतिष-भाग्य-पूर्वजन्म आदि को मानना न मानना हरेक का व्यक्तिगत मामला है, लेकिन जब ज्योतिष को “विज्ञान” बताया जाता है तब असली आपत्ति शुरु होती है। सबसे पहला प्रश्न तो उठता है- विज्ञान क्या है? ऑक्सफ़ोर्ड के एक शब्दकोष के अनुसार – “ज्ञान की एक शाखा, विशेषकर वह जो वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित हो, एक संगठित संस्था द्वारा एकत्रित प्रयोग आधारित जानकारी पर आधारित सूचनाओं का भंडार”। विज्ञान की इस परिभाषा को यदि ‘ज्योतिष’ पर लागू किया जाये तो इनमें से कोई भी सिद्धांत ज्योतिर्विज्ञान पर लागू नहीं होता है, न तो वैज्ञानिक परिभाषायें ना ही भौतिक अवस्थायें, कैसे? आगे देखते हैं

“इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका” के अनुसार, “ग्रहों के काल्पनिक वृत्त (या निशान) अथवा कोई काल्पनिक गोलाकार (जैसे- राशियाँ आदि) किसी प्रकार की “शक्ति” से लैस होते हैं या उनके कोई विशेष प्रभाव होते हैं, यह सिद्धांत विज्ञान को मान्य नहीं हैं”। इसमें एक और बात भ्रम पैदा करने वाली यह है कि भारतीय ज्योतिषियों और पश्चिमी “एस्ट्रोलॉजी” के सिद्धांतकारों में भी इन “शक्तिशाली ग्रहों” के स्थान आदि पर भारी मतभेद हैं, इसी से ज्योतिष सम्बन्धी सारे अनुमान विसंगतिपूर्ण हो जाते हैं। ज्योतिष का मूल सिद्धांत यह है कि तमाम ग्रह या नक्षत्र अपने-अपने स्थान (घर) में स्थित होकर उसी के अनुसार व्यक्ति को फ़ल या कुफ़ल देते हैं, पूरी तरह से काल्पनिक और मात्र पूर्व अनुमानों पर आधारित होता है। ये कल्पनायें भी इस प्रकार हैं- “ग्रहों को अपना खुद का ज्ञान होता है”, “सारे ग्रह ज्योतिषियों की तरह जानकारी रखते हैं और जिस ‘घर’ में वे होते हैं उसी के अनुरूप वे सदा पवित्र या अपवित्र शक्तियाँ मानवों को देते चलते हैं”, जो कि ज्योतिषी तमाम गणनायें करके बताते हैं। इस प्रकार की अनोखी और अलौकिक कल्पनायें विज्ञान की कसौटी पर कहीं से कहीं तक खरी नहीं उतरतीं। इस तर्क का ज्योतिष विज्ञानी(?) कभी भी खंडन नहीं करते, इसलिये “ज्योतिष विज्ञान नहीं है, सिर्फ़ कल्पना है” इस बात को बल मिलता है।

क्या मनुष्य के जीवन को ग्रह प्रभावित करते हैं?
“स्वर्गीय” या ग्रहों के प्रभाव पृथ्वी पर दो तरह से असर डाल सकते हैं- पहला है प्राकृतिक या भौतिक और दूसरा है ज्योतिष के सिद्धांत के अनुसार।
(१) भौतिक रूप – सूर्य और चन्द्रमा मनुष्य जीवन को प्रभावित करते हैं, भौतिक स्वरूप में। मनुष्य जीवन ऊर्जा से चलता है, और सूर्य हमें अपनी भौतिक किरणों से हमें ऊर्जा और ऊष्मा प्रदान करता है। सूर्य के कारण ही भिन्न-भिन्न मौसम, वर्षा, ठंड आदि आते-जाते हैं। सूर्य और चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय बलों के कारण धरती पर समुद्र में ज्वार-भाटा आदि आते हैं, इससे सिद्ध होता है कि सूर्य और चन्द्रमा मानव जीवन पर अपना भौतिक असर डालते हैं। इन प्रभावों को हम तमाम वैज्ञानिक विधियों और उपकरणों से नाप सकते हैं, प्रभाव को कम-ज्यादा कर सकते हैं। लेकिन क्या बाकी के सारे ग्रह भी इसी प्रकार हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं? इसका उत्तर है कि- यदि मान लिया जाये कि उन सभी ग्रहों का कुछ असर होता भी है तो उनकी दूरी के कारण वह बेहद अप्रभावी और लगभग उपेक्षा करने योग्य होता होगा। क्योंकि आज तक किसी ज्योतिषी ने किसी उपकरण द्वारा यह नहीं बताया है कि किसी ग्रह विशेष की किरणों(?) से मनुष्य को कितना नुकसान हुआ है? एक खास बात ध्यान देने वाली यह है कि सूर्य और चन्द्रमा के जो भी प्रभाव मनुष्य पर पड़ते हैं, वे सार्वजनिक और समानुपात से सभी पर पड़ते हैं, ना कि ज्योतिष के सिद्धांत के अनुसार, जिसमें “मंगल” चुन-चुनकर लड़कियों या लड़कों को अपना निशाना बनाता है। सीधी बात है कि किसी ग्रह का असर सभी मनुष्यों पर समान रूप से पड़ना चाहिये, न कि व्यक्तिगत रूप से (यदि यह विज्ञान है, तो)।
(२) दूसरा रूप विशुद्ध ज्योतिष के अनुसार- कि प्रत्येक ग्रह मनुष्य जीवन पर प्रभाव डालता है। ये और बात है कि आज तक प्रायोगिक रूप से इस बात को किसी महान ज्योतिषी ने साबित नहीं किया है, न कोई वैज्ञानिक उपकरण से मापा गया है, ना ही किसी अन्य विधि से सर्वमान्य रूप से इसे सिद्ध किया गया है, बस मान्यता है कि ऐसा होता है, कैसे और क्यों होता है, इसके बारे में पूछना बेकार है और ग्रहों का प्रभाव व्यक्ति विशेष पर ही क्यों पड़ता है, समूची धरती पर एक साथ नहीं? कार्ल ई.कोपेन्शर ने तथाकथित “मंगल प्रभाव” को सिरे से गलत साबित कर दिया है, साथ ही इस बात को भी गलत साबित कर दिया कि ग्रहों का प्रभाव अनुवांशिकी भी होता है (जैसी कि मान्यता है कि पिता और पुत्रों की कुंडलियों में काफ़ी समानतायें पाई जाती हैं)। इसलिये अब तक इस बारे में कोई पक्का सबूत पेश नहीं किया गया है कि ग्रहों और नक्षत्रों का प्रभाव होता है, या मनुष्य पर पड़ता है।

खगोल विज्ञान और ज्योतिष का घालमेल करना-
प्रत्येक ज्योतिषी और भारत में ज्योतिष को मानने वाले सदा जपते रहते हैं कि पृथ्वी और अन्य दूरस्थ ग्रहों का आपस में कुछ सम्बन्ध होता है। वे यह बात जन्म से ही मानकर चलते हैं और जमाने भर को घुट्टी में पिलाते रहते हैं, कि तारे और ग्रह कोई विशेष प्रकार की किरणें छोड़ते हैं जो धरती पर इन्सानों और यहाँ तक कि घटनाओं को भी प्रभावित करती है। तत्काल यह प्रश्न उठना चाहिये कि ये ज्योतिषीय प्रभाव या किरणें या असर (या जो भी कुछ है), वह पृथ्वी तक पहुँचता कैसे है? विज्ञान ने यह सिद्ध किया है कि किसी भी प्रकार के बल या तरंगों को दूर तक प्रवास करने और वहाँ कुछ असर डालने के लिये तीन प्रकार के बलों की आवश्यकता होगी ही –

(१) इलेक्ट्रोमैग्नेटिक विकिरण (Electromagnetic Radiation)
(२) गुरुत्वाकर्षण (Gravitational Attraction) या
(३) चुम्बकीय तरंगे (Magnetic Fields)

अब कम से कम विज्ञान तो इन तीन कारणों के अलावा और कोई कारण नहीं जानता, जिससे कि सुदूर स्थित कोई पिंड अपना प्रभाव धरती तक पहुँचा सके। अब कुछ क्षणों के लिये मान भी लिया जाये कि इनमें से किसी एक कारण से कोई ग्रह हमें प्रभावित करता है तो यह देखना होगा कि ज्योतिषीय सिद्धांत इनमें से किसमें “फ़िट” बैठता है। ... जारी रहेगा भाग-२ में भी....

अगले भाग में इन्हीं सिद्धांतों पर जरा विस्तार से चर्चा करूँगा और साथ ही कुछ और तर्क...

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18 comments:

दीपक भारतदीप said...

मुझे लगता है कि ज्योतिषियों द्वारा लोगों को गुमराह करना एक अलग मामला है और ज्योतिष को केवल मनुष्य के भविष्य से जोड़ना गलत होगा. आपके लेख के अनुसार ग्रहों को मनुष्य पर प्रभाव नहीं पड़ता है. आपकी बाट मान ली प्रथ्वी पर पड़ता है अगर नहीं तो वैज्ञानिक यह क्यों कहते हैं कि अगर चंद्रमा उस दूरी से आगे-पीछे होता जहाँ आज है तो प्रथ्वी पर जीवन नहीं होता. उनका तो यह कहना है कि जो अन्य ग्रह भी हैं अगर वह अपनी वर्त्तमान दूरी पर नहीं होते तो भी प्रथ्वी पर जीवन नहीं होता. अगर प्रथ्वी पर उन सबका प्रभाव होता है तो उस पर मौजूद जीवन पर नहीं पड़ता होगा जमता नहीं है.

ज्योतिष केवल भाग्य बताने की विधा नहीं है बल्कि समय और तिथियों की गणना भी उसका एक हिस्सा है. आज शरद पूर्णिमा है और चंद्रमा प्रथ्वी से सबसे नजदीक है. हर पूर्णिमा पर चन्द्रमा पूरा दिखता और अमावस्या के दिन तो दिखाई नहीं देता. आखिर इस गणना को कौनसी विधा कहा जा सकता है. समय काल की गणना भी ज्योतिष का ही हिस्सा कुछ लोग मानते हैं. ग्रहों का धरती पर असर नहीं पड़ता तो आप इस बात पर प्रकाश जरूर अगले लेख में डालें कि अगर यह नहीं होते तो क्या प्रथ्वी पर जीवन होता? साथ ही यह भी स्पष्ट करें कि ज्योतिष विज्ञान से आपका आशय क्या है. ज्योतिषियों पर मेरा यकीन नहीं है पर ज्योतिष को एक ज्ञान तो में मानता हूँ, यह अलग बात है कि उसके जानकार अब मुझे भी दिखते नहीं.

दीपक भारतदीप

संजय बेंगाणी said...

हमारी जन्म कुण्डली में तमाम ग्रह नक्षत्र है बस हमारा निकटतम ग्रह पृथ्वी नहीं है. अजीब नहीं लगता?

ज्योतिष विज्ञान की परिभाषा में "फीट" नहीं होता.

gg1234 said...

dekhiye, main aap ki baaton se purnarupen sehamat nahi hoon. tathakathit vigyaan bhi kai anumanon (assumptions) par aadharit hota hai. kisi bhi vagyanik paribhasha/avishkaar ke peeche kafi assumptions hote hain... usi tarah jyotish vigyaan bhi kuch assumptions pe adhaareet hai. Aaj to khair bhaari takneek hai anya grahon aur saurya mandal ko dekhne ke liye, lekin sekadon saal pehle to yeh sab nahi tha, phir bhi hamare vidwanon ne grahon ki stithi, unki sankhya ityaadi jaan liye aur kisi wajah se woh is nateeje par pahuche ki unka maanav jeevan par prabhaav padta hi hai. main yeh nahi kehta ki chunki yeh hazaaron saalon se chal raha hai isiliye sahi hai, lekin chunki anya kai gyan-shakhaon jaise aayurved, ganeet jab itne samay se maujood hain aur prabhavi hain...ayurved se jo araam milta hai woh homeopathy/alopathy se nahi mil sakta (mera apna anubhav hai)...usi tarah jyotish bhi kisi thos neev par aadhaarit hai...yeh aur baat hai ki swarthi log uska durupyog karte hain...aur main is shastra mein wishwas rakhta hoon kyonki mera anubhav hai....

Sagar Chand Nahar said...

इस विषय पर टिप्पणी करने जितना दिमाग तो ग्रहों ने हमें दिया नहीं पर इतना जरूर कहेंगे कि जोतिषको आपके विज्ञान ना मानने के तर्क है तो उसे मानने वाले लोगों के पास भी अपने अपने तर्क हैं।

Shrish said...

ऊपर सागर भाई से सहमत हूँ।

और भी कई मुद्दे हैं, विज्ञान शब्द को अगर आप संकुचित अर्थ में ले रहे हैं यानि कि विज्ञान माने फिजिक्स, कैमिस्ट्री आदि वाला विज्ञान तो ज्योतिष विज्ञान नहीं। लेकिन यदि आप व्यापक अर्थ में लेकर चलें यानि तो ज्योतिष बिलकुल विज्ञान है।

ज्योतिष को व्यर्थ वही लोग बताते हैं जिसने इसे पढ़ा नहीं। यदि कोई एक बार इसका अध्ययन करके देखे तो उसे मालूम पड़ेगा कि यह विज्ञान और गणित का मिला-जुला रुप है। मैं भी पहले इसे तुक्का ही समझता था लेकिन जब मैंने खुद इसे सीखना आरम्भ किया तो मालूम पड़ा कि यह गणित और विज्ञान की तरह ही सूत्रों, नियमों तथा सिद्धान्तों पर आधारित है। मुझे खेद है कि मैं सीखना जारी नहीं रख सका।

दरअसल ज्योतिष को बदनाम किया है ज्योतिष के नाम पर दुकानदारी चलाने वाले ठगों ने। असली ज्योतिष का ज्ञान तो बहुत कम लोगों के पास है।

इसके अलावा असली, प्रामाणिक तथा प्रभावी तो पुराना गणित एवं फलित ज्योतिष ही है। आजकल जो सौ तरह की एस्ट्रॉलॉजियाँ चल पड़ी हैं, सब तुक्काशास्त्र हैं।

Anonymous said...

आप लोग किस विज्ञान की बात कर रहे हैं। असल में तो विज्ञान शब्द का प्रयोग लोगों को ग़लत तरीके से निरुत्तर करने के लिए किया जा रहा है। जिस प्रकार प्राच्य विद्याओं के नाम पर उन विद्याओं का क ख ग भी न जानने वाले लोग ठगी कर रहे है उसी प्रकार विज्ञान शब्द का सहारा ले कर कुतर्कों का प्रयोग करके विरोधी उनसे भी बड़ी ठगी कर रहे हैं।
ज्योतिष के विरोधियों की मांग है कि ज्योतिष को विज्ञान तब माना जाए जब प्रत्येक भविष्यवाणी अक्षरशः सही निकले। एक ही समय में जन्में दो लोगों का भविष्य पूर्णतया एक जैसा होना चाहिए। तो पूरी पृथ्वी पर कभी भी कहीं भी एक ही समय पर मनुष्य तो क्या कोई अन्य जीव भी जन्म नहीं लेता। चाहे क्षणांश का ही अन्तर क्यों न हो अन्तर रहता अवश्य है। जुड़वां संतानों में तो काफ़ी अंतर होता है। जुङवां लोगों की शक्लें एक जैसी होती हैं किन्तु फिंगर प्रिन्ट्स एक जैसे नहीं होते। आपके कुतर्कों को मानें तो फिंगर प्रिन्ट्स भी एक जैसे होने चाहिएं। जिस पूर्णता की मांग ज्योतिष से की जा रही है उस तरह की पूर्णता आप किस आधुनिक विद्या में प्रमाणित कर पाएंगे जिसे आप विज्ञान समझते हों या मानते हों।
एलोपैथी को आप विज्ञान मानते हैं तो बताइये एलोपैथी की शरण में आने वाला हर रोगी बच जाता है क्या। इस तथाकथित विज्ञान ने असंख्य महंगे उपकरण व टैस्ट विकसित कर रखे है। इन टैस्टों का बार बार प्रयोग करके के भी यह तथाकथित विज्ञान रोग का सही निर्धारण नहीं कर पाता है फिर इलाज का तो कहना ही क्या है। यदि यह वैज्ञानिक है तो एक बार के ही टैस्ट में अन्तिम निश्चय क्यों नहीं कर लिया जाता, एक ही रोगी के वही टैस्ट बार बार क्यों करवाए जाते हैं। यदि यह पद्यति वैज्ञानिक है तो क्यों रोगी रोगमुक्त होने के स्थान पर जीवन भर दवाएं खाता रहता है। क्यों ऐसा होता है कि आज एक औषधि का आविष्कार किया जाता है और बड़े जोर शोर से उसका बखान व प्रचार किया जाता है और पांच या दस वर्षों के बाद बताया जाता है कि यह औषधि हानिकारक प्रभावों के कारण बन्द की जा रही है। आपका यह विज्ञान प्रारम्भ में ही क्यों नहीं बता देता कि यह हानिकारक है। क्यों कैंसर के विशेषज्ञ कैंसर से मरते पाए गए हैं। चिकित्सा के दौरान सर्वाधिक रोगी एलोपैथी से ही मरते है किन्तु फिर भी यह चल रही है और लोगों की आस्था इस में है। ऐसी ही और भी हज़ारों कमियों का वर्णन किया जा सकता है।
पूर्णरूपेण निराधार व निष्प्रभावी कोई भी कला, विद्या या परम्परा लंबे समय तक चलन में नहीं रह सकती स्वयं ही नष्ट हो जाया करती है। ज्योतिष विज्ञान के योग्य जानकारों की कमी का अर्थ यह नहीं है कि ज्योतिष कोई पाखण्ड है। किसी नेत्र सर्जन के पास थोङे दिन नौकरी करके कोई मैट्रिक पास व्यक्ति आखों के आपरेशन करने लग जाए और रोगियों की आंखे फोड़ने लगे तो नेत्र विज्ञान ठगी या ढकोसला सिद्ध नहीं हो जाएगा। ज्योतिष के समान ही एलोपैथी से किसी रोगी को लाभ मिलने और किसी को लाभ नहीं मिलने से एलोपैथी समाप्त नही हो जाएगी।
एलोपैथी का नाम तो मैंने उदाहरणस्वरूप लिया था, इस प्रकार की कमियां सभी विधाओं में हैं। मैं स्वयं कैमिकल कंसलटेंट हूं और आज भी प्रतिदिन कई घंटे विज्ञान का अध्ययन करता हूं और हर विज्ञान की सीमाओं और विज्ञान के नाम पर होने वाले पाखण्डों से भली भांति परिचित हूं।

manoj agarwal rewa(m.p.) said...

koi bhi prakriya aniyamit nahi hoti
prakriti mai sabkuch niyamit aur niyam anusar chalta hai. jiske bare main hum nahi jante use andha vishwas kah dete hai. lakin unhi chijo main jab koi kram dhundh liya jata hai to use vigyan kah dete hai.
agar hum adhunik vigyan ki bat kare to wo bhi ak observation hai.observation ke dwara vibhin process main niyamitata duhdhi gai.
jyotish bhi ak din main nahi aya hai.iske samay ka nahi pata ya kabse chalu hua aur kisne ise khoja.kai warsho ke satat parishram
aur observation se rishiyou ne yah niyamitta khoji.

Anonymous said...

kewal bahas karke hum kisi bhi nirnay par tarkik rup se nahi phuch sakte jyotish ek science hai ya kewal kori manyata ishka nirnay kewal vyapak anushandhan se hi ho sakta hai awshyakata bahas ki nahi balki khoj ki hai jab tak jyotish ka vaigyanik rup se vishleshan khoj karke iski pramadikta shidhh nahi ki jayegi tab tak ye bhahas samapt nahi ho sakti.

Ratan Singh Shekhawat said...

आप ज्योतिष विद्या को भविष्य फल से जोड़ने के बजाय खगोल विद्या से जोड़े आपको ज्योतिष विज्ञानं ही नजर आएगा | और आप इसे भविष्य बताने वाली विद्या से जोड़ते है तो ये अंध विश्वास हो सकता |
यदि ज्योतिषी जनता को ज्योतिष के नाम पर गुमराह कर रहे है तो इसमे ज्योतिष का क्या दोष | ज्योतिष अपने आप में एक विज्ञानं है इसमे कोई शक नही है |

सौरभ आत्रेय said...

सुरेश जी आप से ऐसी उम्मीद नहीं थी की बिना पूर्ण बात जाने आपने एक विज्ञान को आज-कल के मुर्ख पंडों के कारण अविज्ञान घोषित किया है. ज्योतिष विद्या ग्रहों, नक्षत्रों, काल गणना, ब्रह्मांडीय गति के नियमों का एक पूर्ण विज्ञान है किन्तु आज तथाकथित फलित ज्योतिष विद्या एक निश्चित तौर पर अंधविश्वास है और मन गढ़ंत है. चंद्रमा आदि उपग्रह पृथ्वी आदि ग्रहों का चक्कर लगते हैं, ये ग्रह सूर्य का चक्कर लगाते है , सूर्य अपनी धुरी पर घूमते हुए ब्रह्माण्ड में चक्कर लगाता है, ऋतु परिवर्तन, दिन-रात इत्यादि अनेक क्यों, कैसे और कब सभी बातों का उत्तर ज्योतिष विद्या देती है.

जिस प्रकार का ग्रहों का प्रभाव मनुष्य पर आज के तथाकथित ज्योतिष शास्त्री बताते हैं वो ज्योतिष शास्त्र में है ही नहीं जिस प्रकार मूर्ति पूजा हमारे किसी भी प्रमणित शास्त्र में नहीं है किन्तु फिर भी आज लोग इसमें अत्यंत विश्वास रखते हैं और अनेकों पुस्तकें भी हैं इसके समर्थन में ऐसे ही काफी सारे अवैज्ञानिक और मिथ्या ग्रन्थ ज्योतिष विद्या के भी लिखे गए हैं जिनके आधार पर आज-कल के पंडे लोगो का भविष्य बताते फिरते हैं जबकि ये कोरी बकवास है. ज्योतिष शास्त्र के अध्यन से पूरे मानव समाज, पृथ्वी और सौरमंडल पर पड़ने वाले प्रभाव के गणितीय गणना से अनुमान का अध्यन होता है नकि किस पर शनि चढा है और किस पर नहीं. ज्योतिष शास्त्र से किसी भी व्यक्ति का भविष्य नहीं बताया जा सकता है और न ही बदला जा सकता है. आदमी का वर्तमान और भविष्य उसके कर्मों से निर्धारित होता है न कि ग्रहों के प्रभाव से.

आपके लेख का शीर्षक ये होना चाहिये था "आज की कथित फलित ज्योतिष विज्ञान नहीं कोरी कल्पना मात्र है"

यदि आप मेरी बातों से संतुष्ट नहीं है तो और वार्तालाप किया जा सकता है.
यदि संतुष्ट हैं तो आप इसको अपने किसी लेख में सुधार करके भविष्य में लिखेंगे. क्योंकि हमें अपने वास्तविक विज्ञान को झूठे आवरणों से बचाना है न कि उसको झूठा घोषित करना है.

आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी

सलीम ख़ान said...

धन्धे की मार्केटिंग के लिये ज्योतिष को “विज्ञान” बताया जाता है, ताकि शिक्षित लोग भी उसके झाँसे में आ जायें...

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हमारी जन्म कुण्डली में तमाम ग्रह नक्षत्र है बस हमारा निकटतम ग्रह पृथ्वी नहीं है. अजीब नहीं लगता?

d k tiwari said...

ji jyotish 1 vigyan hai .. abhi isame koi vaigyanik prayog nahi huye to ye .. kya hua .. purane hrishi dwara ye prayog karke hi likhe gaye hai .. jab tak aap jyotish ki adhyayn nahi kiya hai tab tak aap isko sndh vishwas manoge .. kyoki aaj kal ke dongi vyktio ke pas jane aur unake dwara phlit batane aur usake na phalit hone par aap jyotish ko jhuta sabit karate ho .. aaj kal koi bhi vykti thoda sa jyotish ka gyan parapt kar apne aap ko jyotish kahane lagata hai aur utptang .. bhavishya vani karata hai .. lekin jab jyotish shashtra adhyayan kiya jata hai to ishpsht rup se graho ka prabhav dikhata hai .. agar aap mujha se mil sakate hai to mai .. aapko in sab me vishvas dila sakata hu .. ki ye kori klpana matra nahi hai .. apne ye lekh likha hai to kya aapne is lekh likhane se pahale jyotish shashtra ko padakar aur kuch garnaye ki jisase aap santusht na huye ho ... ya sirf klalam utaya aur likhe pade .. samay bitane ke liye .... thodi si stdy kar ke dekho phir khud hi pata chal jayega .. ye jyotish shashtra ka nahi ye falit batane wale ka dosh hai..jisake unke dwara bataye falit falit nahi hotre hai

Raj said...

agur jyotish paisa leke ullu banaty hy to gulat hy pur jyosh yane bhavishya dekhna hi nahi hy,agur graho ka prabha nahi hota to samandur me pani punam pe or ammavasya pe antar ku hota hy agur chandra ka gurutva karsan na hota to kitane ulak pruthvi pe aati,or ek baat aap pata karo azadi ke pehle jyotis logo ne bhavisya vani ki thi ki agur hum raat ko azadi lety hy to humara desh tukde ho jaye gy us vakat ka time kharab chul raha tha ye british ko pata tha isliye unhone rat ko azadi de varna subh kaam to subha hoty hy or dekhlo desh ke tukdy hue,1-pak,2-kasmir,3-bangladesh or list me or bhi hy gorkhaland,ise kya kahy science ke paas vi nazar hi nahi to vo kese batayega,jyotish kya hy

Raj said...

or kans ke vath ki bhavishya vani kya bhul gaye,devki ka putra tera kaal hoga ye sab janty hy

Anonymous said...

मैं ज्यादा तो नहीं जनता लेकिन itna जनता हूँ की sury १२ वर्ष में अपनी राशी बदलता है तब हम पर इसका प्रभाव पड़ता है
विज्ञानं कहता की की महिलाओ का खून महीने में एक बार पतला हो जाता है पुरुष का नहीं होता लेकिन इस १२ वर्ष में आने वाली इस घटना से प्रभाव पड़ता है ये खुद वैज्ञानिक कहते है....
दूसरा यह की पृथ्वी लगन राशी में होती है और उसके चारो और गृह होते है इस लिए हमारे ज्योतिष में इसका वर्णन नहीं है या यह कह सकते है की दूसरे नाम से है

चाष्‍टा said...

सबसे पहले ज्‍योतिष की खोज हुई या विज्ञान की? उसके बाद ही ज्‍योतिष को विज्ञान है या नहीं पर बहस उचित रहेगी?

Gajender Yadav said...

dekhiye mai aapki baato se bilkul bhi sahmat nahi hu aap chahe ise kalpana kahe ya jhuth. asli baat ye hai ki aajkal koi bhi jyotis ka gyan nahi rakhta sab log(jo jyotish hone ka dam bharte hai) thik 1 medico company ki tarah kaam karte hai jaise ki koi medicine babane k liye sirf kuch din tests karte hai or medicine taiyar, aap dekhiye kitne hi medicines ko ban kiya hai, sab adhure tests ka natija h usi prakar ye jyotishi bhi 2-4 books padhke hi ban jate hai mahan jyotish, mere itne lambe lacture ka sidha sa matlab ye hi hai k hum apni kamiyo ko nahi dekhte jyotish shastr ko galat mante hai. nastredum ki bhavishyavaniya yaad hai aapko ??? mera maana hai k ye vidhaye aise hi nahi aati inke liye tapashaya karni padti h, abhi mai jyotishi ka kaam bhi karu or sath me ghar ki chinta fir samaj k our bhi anya kaam karu ??? aise hi hoti hai kya tapashaya ??? or ha rahi jyotish ko vigyan batane ki baat to 1 baat kahna chahunga k har ghatna ka 1 karan/way hota hai k wo ghatna kaise ghati ya ghategi, abhi aap aag ka example lo aag kaise jalti hai ??? sidhi si baat h k hum 2 vastuwo me gharshan karte hai or wo jal jati h, apna science sirf isi baat ko samajh saka h jo hume pata h lekin aap pura sochiye k wo aag kya kya kar sakti h or uski upasthiti kaise or kyo hai hamare jivan me. mujhe Deepak Bharatdeep ji k comments bilkul satik lage, maaf karna mai jyada comments nahi padh paya.

mohit shah said...

i ll prove that jotish is a science,, contact me. way2mokshaa@gmail.com