Tuesday, September 4, 2007

शादी की अंगूठी “अनामिका” में ही क्यों पहनी जाती है?

Wedding Ring Finger

शायद वर्षों से यह परम्परा चली आ रही है कि सगाई या शादी की अंगूठी हमेशा “अनामिका” उंगली में ही पहनी जाती है। हालांकि इस परम्परा के बारे में अधिक जानकारी का अभाव है, लेकिन अब चूँकि परम्परा है तो लोग लगातार निभाये जाते हैं। हाल ही में एक ई-मेल में यह रोचक जानकारी मिली, जिसमें अनूठे “लॉजिक” के जरिये यह सिद्ध किया गया है कि अंगूठी उसी उंगली में क्यों पहनना चाहिये, आप भी मुलाहिजा फ़रमाईये –

सर्वप्रथम माना कि सबसे मजबूत होते हैं अंगूठे अर्थात उन्हें हम माता-पिता की संज्ञा दें –
फ़िर अगली उंगली “तर्जनी” को माना जाये हमारे भाई-बहन –
फ़िर आती है बीच की उंगली “मध्यमा” ये हैं हम स्वयं (परिवार का केन्द्रबिन्दु) –
उसके बाद रिंग फ़िंगर “अनामिका” जिसे हम मान लेते हैं, पत्नी –
सबसे अन्त में “कनिष्ठा” उंगली को हम मानते हैं, हमारे बच्चे –

अब चित्र में दिखाये अनुसार अपनी दोनों हथेलियाँ पूरी फ़ैलाकर उनके पोर आपस में मिला लीजिये और बीच की दोनो उंगलियाँ “मध्यमा” (ऊपर माना गया है कि जो आप स्वयं हैं) को अपनी तरफ़ मोड़ लीजिये, हथेलियों को जोड़े रखिये –



अब दोनो अंगूठों (जिन्हें हमने माता पिता माना है) को अलग-अलग कीजिये, क्योंकि अनचाहे ही सही माता-पिता जीवन भर हमारे साथ नहीं रह सकते। फ़िर अंगूठों को साथ मिला लीजिये।
अब दोनों तर्जनी (जिन्हें हमारे भाई-बहन, रिश्तेदार माना है) को अलग-अलग करके देखिये, क्योंकि भाई-बहन और रिश्तेदार भी उम्र भर साथ नहीं रहने वाले, उनके भी अपने परिवार हैं। फ़िर वापस तर्जनी अपनी पूर्व स्थिति में ले आईये।
अब सबसे छोटी कनिष्ठा (हमारे बच्चे) को भी अलग कर देखिये, वे भी जीवन भर हमारे साथ नहीं रहने वाले हैं, बड़े होकर कहीं दूर निकल जायेंगे। पुनः दोनो उंगलियों को वापस पूर्वस्थान पर रख लें।
अब सबसे अन्त में “अनामिका” को अलग-अलग करने की कोशिश कीजिये, नहीं होंगी, क्योंकि पति-पत्नी को आजीवन साथ रहना होता है, तमाम खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ, इसीलिये “अनामिका” में शादी की अंगूठी पहनाई जाती है। एक बार यह करके देखिये....

7 comments:

अरुण said...

क्या बात है ..नई कहानिया ढूढकर लाने और उन्हे कपडे पहनाने मे आपका जवाब नही ;)

Shastri JC Philip said...

सुरेश,

इस प्रथा का आरंभ किसी भी तरह से हुआ हो, लेकिने आपने यह जो व्याख्यान प्रस्तुत किया है यह विवाह नामक पवित्र एवं दैवी संस्था को एक अनोखे प्रतीक के द्वारा एक नये तरीके से प्रस्तुत करता है. इस कालजयी सत्य के लिए आभार -- शास्त्री जे सी फिलिप

मेरा स्वप्न: सन 2010 तक 50,000 हिन्दी चिट्ठाकार एवं,
2020 में 50 लाख, एवं 2025 मे एक करोड हिन्दी चिट्ठाकार !!

Sanjeet Tripathi said...

बहुत बढ़िया!!

gatyatmak jyotish said...

बड़े ही मजेदार तरीके से आपने यह लेख लिखा है .

Udan Tashtari said...

वाह सुरेश भाई, रोचक प्रस्तुति.

Anurag Thakur said...

Maan gaye bhai, waah kya reason diya hai, dil khush ho gaya

faridabad.sunil@gmail.com said...

बहुत बढ़िया श्रीमान जी क्या बात है दिल खुश हो गया पढ़कर और प्रक्टिकल करके