Monday, September 3, 2007

जीवटता की जीती-जागती मिसाल शिक्षक “सिद्धनाथ जी” (5 सितम्बर–शिक्षक दिवस)

Teacher’s Day Siddhanath Verma

“एक पैर से उचक-उचक कर चलना मजबूरी, दो हाथ नहीं, सिर्फ़ एक पैर विकसित है”

मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में शाजापुर नामक जिले में एक जिजीविषा की साक्षात मिसाल हैं श्री सिद्धनाथ वर्मा जी। शिक्षक दिवस पर राष्ट्रपति पुरस्कार से उन्हें सम्मानित किया जायेगा। सिद्धनाथ जी स्थानीय शासकीय नवीन कन्या माध्यमिक विद्यालय में सहायक शिक्षक हैं। वर्मा जी सम्भवतः देश के ऐसे पहले शिक्षक हैं जो पैर से बोर्ड पर लिखकर पढाते हैं, क्योंकि जन्म से ही उनके दोनो हाथ नहीं है और दाहिना पैर अविकसित है। इस महान व्यक्ति ने पैर से ही लिखकर बी.कॉम, एम.कॉम., बी.एड., एलएलबी की परीक्षायें प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। दोनो बाहें ना होने के कारण वे बैसाखी का उपयोग भी नहीं कर सकते। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी गई-गुजरी रही कि ट्रायसिकल खरीदने के पैसे ही नहीं थे। अतः एक ही पैर से उचक-उचक कर अपने गाँव “करजू” से छः किमी दूर बड़ोदिया परीक्षा देने जाते थे, बाद में जब इनकी नौकरी लगी तब कहीं जाकर ट्रायसिकल खरीद पाये।

वे बताते हैं कि कुदरत के इस क्रूर मजाक को उन्होंने एक चुनौती के रूप में लिया, एक पैर से उचककर चलना सीखा, हाथों का काम पैर से लिये, लिखना सीखा, प्राथमिक स्तर तक की पढाई गाँव में, माध्यमिक स्तर की मो.बड़ोदिया में और महाविद्यालयीन स्तर की पढ़ाई शाजापुर में सम्पन्न की। वर्मा जी ने कई वर्षों तक इलेक्ट्रॉनिक घड़ियों के सेल्समैन के रूप में काम किया, क्योंकि नौकरी के लिये इन्हें काफ़ी भटकना पड़ा (किसी नेता के भतीजे नहीं हैं, और ना ही रिश्वत देने के लिये हराम के रुपये थे)। सामाजिक न्याय अधिकारिता मंत्रालय द्वारा उन्हें 1998 में पुरस्कृत किया जा चुका है। कई स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा भी उन्हें अलंकृत किया गया है (उस समय ये सभी एनजीओ और तमाम “क्लब” पता नहीं कहाँ थे, जब वे ट्रायसिकल के लिये संघर्षरत थे)। और अब राष्ट्रपति द्वारा आगामी शिक्षक दिवस पर इन्हें सम्मानित किया जायेगा। आइये सलाम करें जीवट के धनी इस महान व्यक्ति को, जिसे मीडिया का कवरेज शायद कभी नहीं मिलेगा, क्योंकि हमारा मीडिया सुबह से इस खबर की खोज (?) में जुट जाता है कि “कहाँ, किस शिक्षक या शिक्षिका ने बच्चों के साथ यौन कुंठा व्यक्त की”, या “कहाँ, किस शिक्षक का मुँह उन लाड़लों द्वारा काला किया गया, जो कनपटी पर मोबाईल और पिछवाड़े के नीचे “बाइक” लिये घूमते रहते हैं, और दो-दो हाथ और पैर होने के बावजूद एक डिग्री भी ईमानदारी से नहीं पा सकते”।

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7 comments:

Gyandutt Pandey said...

सिद्धनाथ वर्मा जी पर लेख प्रेरणादायक है. वे शाजापुर के हैं जो कभी मेरे रेल कार्य क्षेत्र में हुआ करता था यह पढ़ कर वहां की बीस वर्ष पूर्व की यादें हो आयीं.
वर्माजी को नमन!

Mired Mirage said...

श्री सिद्धनाथ वर्मा जी को हमारा सलाम । हम साबुत हाथ पैर वाले काम न करने के इतने बहाने बनाते हैं । वे प्रशंसनीय हैं । आशा है कि वे अपने छात्रों के लिए एक प्रेरणा हैं ।
घुघूती बासूती

अनूप शुक्ला said...

अद्भुत हैं सिद्धनाथजी। उनको हमारा नमन!

Anonymous said...

बहुत बङिया. आजकल ऎसे लोग होते है विशवास नही होता है. लिखना तो बहुत चाहता हूं लेकिन हिन्दी जल्दी लिख नही पाता हुं. क्या आप इस व्यकित का पता दे सकते है या फिर फ़ोन नम्बर ताकि हम भी इस व्यकित से मिल सके.

संजय शर्मा
sanjaysharma71@gmail.com
www.sanjaysharma71.blogspot.como

परमजीत बाली said...

बहुत खूब! ऐसे जीवट इन्सान सचमुच एक मिसाल हैं...श्री सिद्धनाथ वर्मा जी को हमारा सलाम ।

अरुण said...

ये मिसाल है जीने की..जो मिला उसी मे काम चलाकर जीने की अदम्य इच्छा शक्ती बहुत कम लोगो मे होती है..वही बनाते है अपना मार्ग दूसरो के लिये अनुकरणीय...वरना यहा तो लोग सब होते हुये भी हाथ फ़ैला कर जीवन गुजार लेते है..

Sagar Chand Nahar said...

आदरणीय सिद्धनाथजी को प्रणाम