Saturday, September 15, 2007

क्या “अंकल” सुनना इतना बुरा लगता है?

Pepsi, Shahrukh, John, Uncle

हाल ही में पेप्सी का नया विज्ञापन जारी हुआ है जिसमें जॉन अब्राहम और शाहरुख को एक बच्चे द्वारा “अंकल” कहे जाने पर चुहलबाजी करते दिखाया गया है, लेकिन इस विज्ञापन के मूल में सन्देश यही है कि दोनों ही व्यक्ति (जॉन थोड़े युवा, लेकिन अधेड़ावस्था की उम्र पर खड़े शाहरुख भी) उस बालक द्वारा “अंकल” कहे जाने पर आहत होते हैं या एक-दूसरे की हँसी उड़ाते हैं। सहज ही प्रश्न उठता है कि क्या “अंकल” सुना जाना इतना बुरा लगता है? खासकर यदि “सही” उम्र के व्यक्ति द्वारा “सही” व्यक्ति को बोला गया हो। मतलब जैसा कि उस विज्ञापन से परिलक्षित होता है, वह बालक शायद दसवीं-बारहवीं का लगता है (अर्थात सोलह-सत्रह वर्ष का), ऐसे में यदि वह शाहरुख (जो कि चालीस पार हो चुके हैं) को अंकल कहता है तो उन्हें बुरा क्यों लगना चाहिये? यह दृष्टांत एक विशाल “बाजार” (चिरयुवा दिखाई देने के लिये बने उत्पादों का) के खेल का अहम हिस्सा है, जिसमें सतत हमारे दिमाग में ठसाया जाता है, “सफ़ेद बाल बहुत बुरे हैं”, “थोड़ी सी भी तोंद निकलना खतरे का संकेत है”, “लड़कियों वाली क्रीम नहीं बल्कि जवान दिखने के लिये मर्दों वाली क्रीम वापरना चाहिये” और तो और “सिगरेट पीने से बहादुरी और जवानी आती है” आदि-आदि-आदि। जबकि देखा जाये तो आजकल के किशोरों और युवाओं में “अंकल” बोलना एक फ़ैशन बन चुका है। फ़ैशन का मतलब होता है कि “ऐसी कोई बात जिसकी आपको कोई समझ नहीं है लेकिन सिर्फ़ भेड़चाल के लिये या किसी हीरो-हीरोइन की नकल करनी है, उसे फ़ैशन कहते हैं” जो कि युवाओं की स्वाभाविक हरकत होती है, लेकिन आश्चर्य तो तब होता है कि “अनुभव” और “अध्ययन” के कारण कनपटी पर पके बालों को भी अधेड़ लोग छुपाने के लिये विभिन्न उपाय करते पाये जाते हैं।

यदि अपने से आधी उम्र का कोई बालक-बालिका अंकल कहे तो उसमें बुरा मानने वाली क्या बात है (औरतों को उनके स्त्रीत्व की एक विशेष भावना के चलने “आंटी” सुनना बुरा लग सकता है, बल्कि लगता भी है)। लेकिन तथाकथित “फ़ैशन” की नकल के चलते कई बार “कमर पर चर्बी का टायर चढ़ाये” नवयौवनायें भी अपने से सिर्फ़ दो-पाँच साल बड़े व्यक्ति को अंकल कहती फ़िरती हैं, और स्थिति तब अधिक हास्यास्पद हो जाती है, जबकि आमतौर पर दिखने-चलने-फ़िरने में वह व्यक्ति उससे अधिक जवान दिखाई देता है। एक चीज होती है “कॉमन सेंस” (सामान्य बोध), जो कि आजकल “अनकॉमन” हो गया है, (यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है - जब एक “स्लीवलेस” पहनी हुई “युवती” जिसकी बाँहें, दो लटकी हुई बड़ी लौकियों की तरह दिखाई दे रही थीं, वह मुझे अंकल संबोधित कर रही थी, और तब मजबूरन मुझे, उन्हें “हाँ, बोलो बेटी...” कहना पड़ा था)।

सवाल फ़िर यही खड़ा होता है कि क्यों लोग उम्र को सही सन्दर्भों में नहीं लेते? (खुद की भी और दूसरों की भी), क्यों वे आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते कि अब नौजवानी का दामन छूटने को है और अधेड़ावस्था की आहट आ गई है? क्यों आजकल “सफ़ेद बालों” को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है? अक्षय खन्ना, सलमान खान, संजय दत्त या शाहरुख को “अंकल” सुनना क्यों बुरा लगता है? क्यों अमिताभ ने आज तक सार्वजनिक तौर पर अपनी “विग” नहीं उतारी, जबकि रजनीकान्त आमतौर पर सभाओं में बिना मेक-अप के, सफ़ेद बालों, गंजे सिर और सादी सी लुंगी में दिखाई दे जाते हैं (और फ़िर भी वे अपनी नाती की उम्र के साथ हीरो के रूप में अमिताभ से अधिक सुपरहिट हो जाते हैं), ऐसी हिम्मत अन्य कथित “स्टार”(?) क्यों नहीं दिखा पाते? आपका क्या कहना है?

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7 comments:

दिनेश शुक्ल said...

बहुत अच्छा लिखा है सुरेश भाई

Sagar Chand Nahar said...

अंकल अंकल... आप लेख बहुत अच्छा लिखते हो।
॥दस्तक॥
गीतों की महफिल

राजीव said...

रुचिकर लेख है। इस सन्दर्भ में सुनील दीपक जी ने भी अपने चिट्ठे पर एकाधिक बार लिखा है, बहुत सहज और सरल रूप में भी -
मेरे विचार से इन लेखों की कड़ियाँ देना इस टिप्पणी में सम्यक होगा।

बाहर से बुढ़ऊ, भीतर से हृतिक रोशन
बदलते हम (आंशिक रूप से इस संदर्भ में)

Debashish said...

सुरेश सच्ची सच्ची बोलूं तो बुरा तो लगता था यार कोई अंकल बोले तो। मुझे याद है कि पहली बार मुझे अंकल पुकारा गया तो बहुत ही ज्यादा बुरा लगा था। आपने ज़िक्र किया ही कि लोग अक्सर बिना उम्र देखे पुकार लेते हैं अंकल पर मुझे लगता है कि अंकल आंटी शब्द को अंग्रेज़ों से ग्रहण कर जिस खूबी से इसका स्थानीयकरण किया है वो अंग्रेज़ों को भी दंग कर दे। मुझे याद है कि जब हम भेल, भोपाल के क्वार्टर में रहते थे तो टॉयलेट चोक वगैरह हो जाने की समस्या पर भेल सिविल मेन्टेनेंस विभाग से जमादार आते थे, माताजी उन्हें प्रथा के मुताबिक एक अलग रखे स्टील के गिलास में पानी देती थी पीने को। एक दफा मैं पानी देने गया तो बोल बैठा "अंकल, ये लो पानी", बाद में मेरी माताजी बड़ी खफा हुईं "जमादार है वो, अंकल नहीं कहते उसे"। बच्चे को क्या पता अंकल क्या है, अपने से बड़े सभी वयस्क पुरुष अंकल हैं। तो अंकल, आंटी सार्वभौमिक संबोधन बन गये हैं, और एक तरह से ये सारे भेदभाव हटा देते हैं।

राजीव ने भी अच्छी कड़ियाँ दीं। ऐसे अनुभवों पर सुनील को पढ़ना हमेशा सुखद होता है।

Shrish said...

वाकई मजेदार लिखा आपने अंकल। :)

अरुण said...

वैसे तो उपर कै सारे अंकल टिपिया चुके है..पर सच ये है अंकल जी बुरा तब लगता है जब कोई मुझ ३०/३५ साल के बंदे को ४५/५० साल का बंदा/या बंदी अंकल कहे..कसम से खुन खोल जाता है उन बाबाजी की हरकत पर..:)

Rohit A Chandwaskar said...

Dada,
main aapko uncle nahi kahunga..kyonki main Debashish sahab ke vicharon se sahmat hunh ki Yeh Uncle Aunty shabd angrezo ki anek deno me se ek hai jise humne hamesha ki tarah aatmasaat kar liya hai...khair aapne ek kamal ki baat kahi ki Kyon humare 'stars' me itni himmat nahi jo Rajnikaant me hai..Halanki Amitabh lagbhag har interview me kahte phirte hain ki ab unki hero ki umra nahi rahi aur vo ek kirdaar nibha rahe hain vagaira..lekin is sadi ke mahanayak me bhi vo himmat nahi jo 'Sivaji- Rajnikant' me hai...Rahi baat Shahrukh ki to mujhe nahi lagta itni safalta ke baavajood vo is layak hain ki un par tippani karke apna vakt zaya karen..vo filhaal media ke ladley putra hain...unhe vahi bane rahne de..
aaj ke liye itna kaafi hai..dhanyavaad.