Sunday, September 2, 2007

(हिन्दी दिवस-भाग १) हिन्दी हेतु आईटी इंडस्ट्री और “इन्फ़ोसिस” का क्या योगदान है?

“बाराहा” के वासु, “अक्षरमाला” के श्रीनिवास अन्नम, “कैफ़े-हिन्दी” के मैथिली गुप्त, लिनक्स हिन्दीकरण के महारथी रवि रतलामी, “गमभन” के ओंकार जोशी, प्रभासाक्षी के बालेन्दु शुक्ल, “वेबदुनिया” के विनय छजलानी, हिन्दी ब्लॉगिंग और हिन्दी कम्प्यूटिंग को आसान बनाने वाली हस्तियाँ अविनाश चोपड़े, रमण कौल, आलोक कुमार, हरिराम जी, देबाशीष, ई-स्वामी, हिमांशु सिंह, श्रीश शर्मा....और इन जैसे कई लोग हैं... ये लोग कौन हैं? क्या करते हैं? कितने लोगों ने इनका नाम सुना है?....मैं कहता हूँ, ये लोग “हिन्दी” भाषा को कम्प्यूटर पर स्थापित करने के महायज्ञ में दिन-रात प्राणपण से आहुति देने में जुटे हुए “साधक” हैं, मौन साधक।

अब एक और “हिन्दी दिवस” आने वाला है, सरकारी गोष्ठियाँ, सेमिनार, शोधपत्र आदि की बरसात होने ही वाली है, हिन्दी की महिमा का बखान किया जायेगा, फ़ाईव स्टार होटलों में सभायें की जायेंगी, हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग करने की सनातन कसमें खाई जायेंगी, फ़िर अगली १४ सितम्बर तक सभी चादर ओढ़कर सो जायेंगे। अगले ही दिन से भारत की तरक्की, आईटी ज्ञान, दस फ़ीसदी की विकास दर, सॉफ़्टवेयर निर्यात करने के डॉलरों की गिनती, छलांग मारता हुआ सेंसेक्स, यह सब प्रपंच चालू हो जायेगा। सरकार यह कहते नहीं अघाती कि भारत ने आईटी में सबको पीछे छोड़ दिया है, हमारी सॉफ़्टवेयर कम्पनियाँ और इंजीनियर दुनिया भर में अपना परचम लहरा रहे हैं। इन्फ़ोसिस, टीसीएस, विप्रो और सत्यम की कुल आमदनी कई अफ़्रीकी देशों के कुल बजट से भी अधिक होगी। इस सारी चकाचौंध में एक सवाल रह-रहकर उठता है कि इन “महान” भारतीय आईटी कम्पनियों ने भारतीय भाषाओं के उत्थान के लिये अब तक क्या योगदान दिया है? डॉलरों मे कमाने वाली और अपने कर्मचारियों को लाखों के पैकेज देकर समाज में एक असंतुलन पैदा करने वाली इन कम्पनियों ने सरकार से जमीनें लीं, पानी-बिजली में सबसिडी ली, टैक्स में छूट ली, हार्डवेयर आयात करने के लिये ड्यूटी कम करवाई, यहाँ तक कि जब रुपया मजबूत होने लगा और घाटा (?) बढने लगा तो वहाँ भी वित्तमंत्री ने दखल देकर उनका नुकसान होने से उन्हें बचाया। तात्पर्य यही कि इतनी “महान” कम्पनियों ने क्या आज तक भारत के आम लोगों के लिये एक भी मुफ़्त वितरित करने वाला हिन्दी सॉफ़्टवेयर बनाया है? या किसी अन्य भारतीय भाषा को बढ़ावा देने के लिये कुछ किया है? याद तो नहीं पड़ता.... जबकि ऊपर जिन व्यक्तियों का उल्लेख किया गया है, उनमें से शायद ही कोई करोड़पति या अरबपति हो, किसी एकाध-दो नें कुछेक हजार डॉलर कमा भी लिये होंगे तो वह इन्फ़ोसिस आदि के सामने नगण्य ही है। जबकि ये सभी और इन जैसे कई लोग आम आदमी को कम्प्यूटर पर हिन्दी से परिचित करवाने के लिये संघर्षरत हैं, एक अथक साधना में लगे हुए हैं, कईयों ने तो अपनी जेब से रुपये खर्चा करके हिन्दी सॉफ़्टवेयर बनाये, और उन्हें मुफ़्त में लोगों को बाँटा, क्यों? क्योंकि व्यक्ति या संस्था के ज्ञान का उपयोग समाज को होना चाहिये, यह एक प्रकार की समाजसेवा ही है। क्या ये लोग डॉलर नहीं कमा सकते थे? क्या ये सभी लोग अमेरिका जाकर ऐशो-आराम की जिन्दगी नहीं बिता सकते थे? सरासर कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, इनमें से कई ने भारत में ही रहकर हिन्दी की असली सेवा की, कुछ लोगों ने विदेश में रहकर भी हिन्दी की लौ को दिल से बुझने नहीं दिया, बिना किसी स्वार्थ के। आज धीरे-धीरे हिन्दी और यूनिकोड का संसार बड़ा होता जा रहा है उसके पीछे इन लोगों की मेहनत छुपी हुई है।

बाराहा और वेबदुनिया पिछले आठ-दस वर्षों से हिन्दी पर काम कर रहे हैं, मैथिली गुप्त जी के बनाये हुए “कृतिदेव” फ़ॉट का उपयोग तो शायद भारत में हिन्दी टाइप करने वाला प्रत्येक व्यक्ति करता है, बालेन्दु शुक्ल और रवि रतलामी को माइक्रोसॉफ़्ट का विशेष पुरस्कार/प्रशस्ति मिल चुकी है (बाकी सभी हस्तियों पर अगले लेख “हिन्दी दिवस-भाग २” में चर्चा करूँगा ही), लेकिन फ़िर वही सवाल, क्या आम भारतवासी को हिन्दी में काम करने, उसे बढ़ावा देने, दैनंदिन जीवन में उपयोग करने लायक एक आसान सा सॉफ़्टवेयर किसी भारतीय कम्पनी ने बनाया? भारतीयों को हमेशा प्रत्येक बात के लिये माइक्रोसॉफ़्ट या गूगल का मुँह क्यों ताकना पड़ता है? ये विदेशी कम्पनियाँ भारतीय भाषाओं को जब अपने सॉफ़्टवेयरों में लायेंगी, जब सभी कम्प्यूटरों में ये आ जायेंगी, ज्यादा से ज्यादा लोग इनका उपयोग करने लगेंगे तब हिन्दी और अन्य भाषायें फ़ैलेंगी, इसमें नया क्या होगा? ये तो हमेशा से होता आया है, और इन कम्पनियों को भी मालूम है कि अब अंग्रेजी जानने वाले तबके (अर्थात भारत की जनसंख्या का लगभग बीस प्रतिशत) में कम्प्यूटरों की खपत का “सेचुरेशन” बिन्दु लगभग करीब आ चुका है, अब बारी है नये-नवेले पैदा हुए मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग की, जो कि हिन्दी कम्प्यूटरों को हाथोंहाथ लेगा (सुना है कि “विस्टा” में हिन्दी “इन-बिल्ट” ही कर दिया गया है), सब ठीक है, बढिया है, लेकिन इस सबमें करोड़ों डॉलर का मुनाफ़ा कमाने वाली भारतीय कम्पनियों का क्या योगदान है? और यदि “बैक-ऑफ़िस” (इसका हिन्दी अनुवाद तो “पिछवाड़े” में काम करने वाला/वाली होता है) में इन्होंने बैंक, एयरलाइंस या किसी अन्य सॉफ़्टवेयर के लिये हिन्दी में योगदान दिया भी हो, तो वह उनके प्रिय “डॉलर” के लिये है, ना कि किसी भाषा-प्रेम के कारण। इन्फ़ोसिस में लगभग पन्द्रह प्रतिशत कर्मचारी “बेंच-स्ट्रेन्थ” के नाम पर फ़ालतू बिठाकर रखे जाते हैं, ऐसे सॉफ़्टवेयर इंजीनियर रोज सुबह कार्यालय आते हैं, कोक-पेप्सी पीते हैं, गेम खेलते हैं, किसी नये प्रोजेक्ट के इन्तजार में बेकार बैठे-बैठे इनकी क्षमतायें कुन्द हो जाती हैं, शाम को ये घर चले जाते हैं, वह भी एक मोटी तनख्वाह लेकर। क्या इन कर्मचारियों से, जो कि फ़िलहाल “फ़ालतू” ही हैं, भारतीय भाषाओं पर सॉफ़्टवेयर तैयार करने को नहीं कहा जा सकता? उन्हें भी एक नया अनुभव मिलेगा, और जब भी कोई नया प्रोजेक्ट मिले उन्हें वहाँ काम पर लगाया जा सकता है, तब तक नये “फ़ालतू” भर्ती हो ही जायेंगे, उन्हें ये काम सौंपा जाये।

हर काम “कमाई” के लिये नहीं किया जाता, समाज के लिये भी कुछ किया जाना चाहिये। वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम ने विकलांगों के लिये वरदान साबित हुए “जयपुर फ़ुट” में कुछ संशोधन करके उसमें टाइटेनियम धातु का मिश्रण किया जिससे उनका वजन कम हो गया, और विकलांगों को एक नई ऊर्जा मिली, उन्होंने यह काम “पेटेंट” के लालच में या “डॉलर” कमाने के लिये नहीं किया (शायद इसीलिये वह “कलाम साहब” हैं)। माना कि इन कम्पनियों ने भी स्कूल खोले हैं, गरीबों को मुफ़्त शिक्षा का अवसर दिया है, कई सरकारी स्कूलों में नये/पुराने कम्प्यूटर मुफ़्त में दिये हैं, स्कॉलरशिप दी हैं, लेकिन क्या इतना पर्याप्त है?

क्या एक आम भारतवासी को यह गर्व नहीं होना चाहिये कि वह जिस सॉफ़्टवेयर पर “निजभाषा” में काम करता है, वह उसी के देश की सबसे बड़ी कम्पनी ने बनाया है, और भारत में रहने वाले लोग बिल गेट्स पर निर्भर नहीं हैं? कब तक हम लोग चोरी के, पायरेटेड, आधे-अधूरे से और वह भी माइक्रोसॉफ़्ट के, सॉफ़्टवेयरों पर काम करते रहेंगे? लेकिन क्या मेरे जैसे अदना से व्यक्ति की यह आवाज “वहाँ” तक पहुँच पाएगी? क्या ये बड़े लोग, विदेशों में कम्पनियाँ अधिग्रहण करते-करते, कुछ करोड़ डॉलर हिन्दी के लिये भी छोड़ देंगे?

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11 comments:

अरुण said...

मतलब आप आज हिंदी मे लिखने वाले पहले तकनीकी बंदे हो गये जी.. बधाई हो

Shrish said...

सही कहा जी आपने, विभिन्न कम्पनियों के पास इतने संसाधन हैं, पर्याप्त मानव संसाधन और प्रौद्योगिकी है, ये आईटी कंपनियाँ चाहें तो हिन्दी कंप्यूटिंग की सभी समस्याएँ कुछ महीनों में ही खत्म हो जाएँ लेकिन इच्छाशक्ति की कमी है।

हिन्दी के लिए बहुत से लोग बहुत कुछ करना चाहते हैं पर उन के पास संसाधन नहीं। जगदीप डांगी जी जैसे लोग इसके उदाहरण हैं जो कि आज मौत से लड़ रहे हैं।

Anonymous said...

आपने मेरे दिल की बात कह दी है. सारा सोफ़ट्वेयर हम ही बनाते है लेकिन दुसरो के लिये. पता नही क्यों हम कब खुद सोफ़ट्वेयर अपने नाम से बना कर बाजार में उतारेगें. शायद अभी भी हम अपने आप को विदेशियौ से कम समझते है.

लेकिन यह ज्यादा दिन नही चलने वाला है. जो यह नयी पीङी है जिसका जिकर आपने किया है उसमें और लोग जुङेगे और यह जरुर करेगे.

संजय शर्मा
www.sanjaysharma71.blogspot.com

Gyandutt Pandey said...

बहुत अच्छा लिखा आपने और यह लेखन सोचने को बहुत बाध्य करता है.

Dard Hindustani said...

खरी-खरी बात लिख दी आपने। पर थोडा रूकिये। जिस तेजी से चिठ्ठाकार आगे आ रहे है, वह दिन दूर नही जब इस क्षेत्र मे हिन्दी की तूती बोलेगी। हाँ, उस समय नये चेहरे सामने आ जायेंगे और असली लोगो को, उनके योगदान को हाशिये मे डाल दिया जायेगा, जैसा कि सदा से होता रहा है। यदि इसे हम रोक पाये तो अच्छा होगा।


बधाई।

Manish said...

सही प्रश्न उठाए हैं आपने .

Ravi said...

सुरेश जी,

अच्छी पोस्ट। बस फिर को फिर ही रहने दें, फ़िर न बनाएँ। वो अशुद्ध है। शुक्रिया

रविकान्त

तपन शर्मा said...

ये पोस्ट आपने पिछले साल लिखी थी पर आज भी सही है...
हिन्दी के लिये सॉफ्टवेयर तो नहीं पर काम करने वाली कुछ साइटों में से एक है हिन्दयुग्म जो पिछले १.५-२ वर्षों से इंटेरनेट पर काम कर रही है..
यदि समय मिले तो देखें..
www.hindyugm.com

naveen said...

Suresh ji

I feel u r communist. In this world everybody have right to make money. Even you have. I don't believe that these companies have ever established to PROMOTE or STRENTHEN hindi.

They are getting subsidies or other facilities are a different issue & can be discussed that way, PAR HINDI BEECH ME KAHA SE AAYI?

अंकुर गुप्ता said...

इस पोस्ट में आपने मेरे दिल की बात कह दी. अगर भारतीय कंपनियां समाजसेवा ना सही मुनाफ़ा ही सही, किसी के लिये भी हिंदी में शुरुआत करें तो हमे भाषाई गुलामी से काफ़ी आजादी मिल सकती है.

Adhokshaj Mishra said...

मैं पिछले कुछ वर्षों से हिंदी में संगणक प्रोग्रामिंग (?) हेतु प्रयासरत हूँ | जल्दी ही यह सोफ्टवेयर हिंदी प्रेमियों हेतु निःशुल्क उपलब्ध होगा|