Saturday, September 8, 2007

हिन्दी दिवस (भाग-३) हिन्दी को “भ्रष्ट” होने से भी बचायें

Corrupt Hindi Language & Education

“लफ़ड़ा”, “हटेले”, “खाली-पीली”, “बोम मत मार”, “निकल पड़ी”..... क्या कहा, इन शब्दों का मतलब क्या है? मत पूछिये, क्योंकि यह एक नई भाषा है, जिसका विस्तार (?) तेजी से हो रहा है, स्रोत है मायानगरी मुम्बई की हिन्दी फ़िल्में। दृश्य मीडिया की भाषा की एक बानगी – “श्रीलंकन गवर्नमेंट ने इस बात से डिनाय किया है कि उसने जफ़ना अपने ट्रूप्स को डिप्लॉय करने का प्लान बनाया है”, हाल ही में हिन्दी के सबसे ज्यादा प्रसार संख्या वाले “भास्कर” में छपा एक विज्ञापन- “कृतिकार भास्कर क्रिएटिव अवार्ड्स में एंट्री भेजने की लास्ट डेट है 31 अगस्त“... ऐसी भाषा का स्रोत हैं नये-नवेले भर्ती हुए तथाकथित चॉकलेटी पत्रकार जो कैमरा और माईक हाथ में आते ही अपने-आप को सभी विषयों का ज्ञाता और जमीन से दो-चार इंच ऊपर समझने लगते हैं। जिन्हें न तो भाषा से कोई मतलब है, ना हिन्दी से कोई वास्ता है, ना इस बात से कि इस प्रकार की भाषा का संप्रेषण करके वे किसके दिलो-दिमाग तक पहुँचना चाहते हैं।

किसी भी भाषा का विस्तार, उसका लगातार समृद्ध होना एवं उस भाषा के शब्दकोष का विराटतर होते जाना एक सतत प्रक्रिया है, जो वर्षों, सदियों तक चलती है। इसमें हिन्दी या अंग्रेजी भी कोई अपवाद नहीं है, परन्तु उपरोक्त उदाहरण हमारे सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा करते हैं कि आने वाले दस-बीस वर्षों मे आम बोलचाल की भाषा क्या होगी? उसका स्वरूप कैसा होगा? क्या इस “हिंग्लिश” को ही हम धीरे-धीरे मान्यता प्रदान कर देंगे (यह हमारी मातृभाषा कहलायेगी?), न सिर्फ़ हिंग्लिश बल्कि मुम्बईया टपोरी भाषा भी तेजी से फ़ैल रही है और प्रचलित भाषा को भ्रष्ट किये दे रही है।

आमतौर पर इस बात पर बहस चलती रहती है कि समाज में जो घटित होता उसका असर फ़िल्मों पर होता है या फ़िल्मों मे जो दिखाया जाता है उसका असर समाज पर होता है, लेकिन जिस तेजी से जनता “पेटी” और “खोके” का मतलब समझने लगी है वह निश्चित तौर पर फ़िल्मों का ही असर है। इस बहस में न पड़ते हुए यदि हम गहराई से भाषा के भ्रष्टाचार पर ही विचार करें तो हम पायेंगे कि बोली को सबसे अधिक प्रभावित किया है फ़िल्मों और टीवी ने, और अब यह तथाकथित भाषा केबल और डिश के जरिये गाँवों तक भी पहुँचने लगी है। हालांकि आज भी गाँव का कोई युवक जब महानगर जाता है तो उसके आसपास के युवक जिस तरह की अजीब-अजीब भाषा और शब्द बोलते हैं तो उसे लगता है कि वह फ़िनलैंड या वियतनाम पहुँच गया है। महानगरीय नवयुवकों द्वारा बोले जाने वाले कुछ शब्दों का उदाहरण- “सत्संग में चलें” का मतलब होता है दारू पार्टी, झकास मतलब बहुत बढिया, बैटरी मतलब चश्मेवाला, खंभा मतलब बीयर की पूरी बोतल... ऐसे अनेकों शब्द सुनकर आप कभी समझ नहीं सकते कि असल में क्या कहा जा रहा है।

जनमानस पर समाचार-पत्र, फ़िल्में और टीवी गहरा असर डालते हैं। यह प्रभाव सिर्फ़ पहनावे, आचार-विचार तक ही सीमित नहीं होता, भाषा पर भी होता है। इसमें सर्वाधिक नुकसान हो रहा है उर्दू का, नुकसान तो हिन्दी का भी हो ही रहा है लेकिन अब आम बोलचाल में उर्दू शब्दों का स्थान अंग्रेजी ने ले लिया है। जैसे फ़िल्मी गीत भी धीरे-धीरे “शबनम”, “नूर” “हुस्न” से हटकर “खल्लास”, “कम्बख्त” और “कमीना” पर आ गये हैं उसी तरह संवाद भी “मुलाहिजा”, “अदब”, “तशरीफ़” से हटकर “कायको”, “चल बे”, “फ़ोकट में” पर उतर आये हैं। रही-सही कसर कम्प्यूटर के बढ़ते प्रचलन और ई-मेल ने पूरी कर दी है, जिसमें फ़िलहाल अंग्रेजी की ही बहुतायत है। भाई लोगों ने यहाँ पर भी “how are you” को “h r U” तथा “Respected Sir” को “R/sir” बना डाला है। पता नहीं इससे समय की बचत होती है या “गलत आदत” मजबूत होती है। हिन्दी में भी “ङ्” का प्रयोग लगभग समाप्त हो चला है, “ञ” तथा “ण” का प्रयोग भी खात्मे की ओर है, अब हमें “मयङ्क” या “रञ्ज”, “झण्डा” या “मन्दिर” कम ही देखने को मिलते हैं ये सभी सीधे-सीधे बिन्दु सिर पर लेकर “मयंक, रंज, झंडा और मंदिर” बन गये हैं। हमे बताया गया है कि प्रकाशन की सुविधा के कारण यह समाचार पत्रों आदि ने भी इन बीच के अक्षरों को बिन्दु में बदल दिया है, लेकिन इससे तो ये अक्षर सिर्फ़ पुस्तकों में ही रह जायेंगे। यही बात अंकों के साथ भी हो रही है, अंतरराष्ट्रीय और बाजार की ताकतों के आगे झुकते हुए “१,२,३,४,५,६,७,८,९” को “1,2,3,4,5,6,7,8,9” में बदल दिया गया है। माना कि भाषा को लचीला होना चाहिये, लेकिन लचीला होने और भ्रष्ट होने में फ़र्क होना चाहिये। ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोष ने भी “पराठा”, “अचार” और “लस्सी” आदि को शामिल कर लिया है, तो हमने भी “स्टेशन”, “पेन”, “ट्रेन” आदि को सरलता से अपना लिया है, लेकिन “हटेले” को आप कैसे परिभाषित करेंगे?

अब बात करते हैं समस्या की जड़ की और उसके निवारण की। अकेले मीडिया के दुष्प्रभाव को दोषी ठहराना एकतरफ़ा होगा, अन्य दो मुख्य कारण जो तत्काल नजर आते हैं वे प्राथमिक शिक्षा से जुड़े हुए हैं। हम सभी जानते हैं कि हमारे देश में प्राथमिक स्कूलों की क्या दशा है। पहला कारण है, हिन्दी को गंभीरता से न लेना और दूसरा कारण है हिन्दी शिक्षक और शिक्षण को भी गंभीरता से न लेना। आजकल टीवी, कम्प्यूटर, वीडियो गेम के जमाने में युवा वर्ग में पठन-पाठन की रुचि में कमी आई है (सात सौ रुपये की हैरी पॉटर वह पढ लेगा, लेकिन चालीस रुपये की प्रेमचन्द की कहानियाँ पढने का समय उसके पास नहीं होगा)। हिन्दी पढने का मकसद सिर्फ़ पास होना या रट कर अच्छे अंक लाना भर होता है, उसका ज्ञान अर्जित करने या साहित्य सेवन करने से कोई लेना-देना नहीं होता। इस कारण युवाओं में हिन्दी के प्रति जो “अपनत्व” की भावना पैदा होनी चाहिये वह नहीं होती। भावनाओं को व्यक्त करते समय हिन्दी और अंग्रेजी दोनो पर समान अधिकार की चाहत में वे “न घर के रहते हैं न घाट के” और इस प्रकार “हिंग्लिश” का जन्म होता है। प्राथमिक स्कूलों में (जब बच्चे की नींव पड़ रही होती है) हिन्दी के शिक्षकों द्वारा भाषा को गंभीरता से नहीं लिया जाता। “हिन्दी तो कोई भी पढ़ा सकता है” वाली मानसिकता आज भी प्राचार्यों पर हावी है, ऐसे में जबकि आमतौर पर विज्ञान अथवा गणित विषय को उनके विशेषज्ञ ही पढ़ाते हैं, लेकिन हिन्दी की कक्षा में कोई भी आकर पढ़ाने लगता है। और यदि वह तथाकथित रूप से “हिन्दी” का ही शिक्षक है तब भी वह बच्चों की कॉपी जाँचते समय मात्राओं, बिन्दु, अनुस्वारों, अल्पविराम आदि पर बिलकुल ध्यान नहीं देता। बच्चे तो बच्चे हैं, वे उसी गलत-सलत लिखे शब्द या वाक्य को सही मानकर उसकी पुनरावृत्ति करते चलते हैं, धीरे-धीरे अशुद्ध लेखन उसकी आदत बन जाती है, जिसे बड़े होने के बाद सुधारना लगभग नामुमकिन होता है (कई बड़े अफ़सरों और डिग्रीधारियों को मैंने “दुध”, “लोकी”, “कुर्सि” जैसी भयानक गलतियाँ करते देखा है), यह स्थिति बदलनी चाहिये। प्रायवेट स्कूलों मे “लायब्रेरी फ़ीस” के नाम पर जो भारी-भरकम वसूली की जाती है, उसमें से कम से कम बीस प्रतिशत खर्च हिन्दी के महान साहित्यकारों की कृतियों, उपन्यासों, कहानियों के संकलन में होना चाहिये, ताकि बच्चे उन्हें एक बार तो पढ़ें और जानें कि हिन्दी साहित्य कितना समृद्ध है, वरना वे तो यही समझते रहेंगे कि शेक्सपीयर और कीट्स ही महान लेखक हैं, कालिदास, प्रेमचन्द, महादेवी वर्मा आदि तो “बस यूँ ही” हैं। बच्चों की “भाषा” की समझ विकसित होना आवश्यक है, जाहिर है कि इसके लिये शुरुआत घर से होनी चाहिये, फ़िर दायित्व है हिन्दी के शिक्षक का, वरना उस निजी चैनल के कर्मचारी को दोष देने से क्या होगा, जो प्रेमचन्द की कहानियों पर धारावाहिक बनाने के लिये “बायोडाटा और फ़ोटो लेकर प्रेमचन्द को भेजो” जैसी शर्त रख देता है। सवाल यही है खुद हमने, पिछली बार हिन्दी में पत्र कब लिखा था? या अपने बच्चे की गलत हिन्दी या अंग्रेजी पर उसे कितनी बार टोका है?

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4 comments:

Shrish said...

सुरेश भाई यही तो विडंबना है कि हिन्दी का स्वरुप बिगड़ता जा रहा है चाहे वो लिखित हिन्दी हो या मौखिक। लिखित में खासकर वर्तनी की अशुद्धियों को नजरअंदाज किए जाने के नियम बन गया है। अंग्रेजी में कोई एक Letter भी गलत लिख दे तो सब का ध्यान उस पर चला जाता है लेकिन हिन्दी में जितना मर्जी गलत लिखा हो कोई कुछ नहीं कहता। वर्तनी की अशुद्धियाँ मुझे बहुत नापसंद हैं।

इसी तरह अखबारों तथा टीवी के द्वारा जिस तरह की भ्रष्ट हिन्दी प्रचलित करने की कोशिश की जा रही है वो भी चिंतनीय है।

Shastri JC Philip said...

"माना कि भाषा को लचीला होना चाहिये, लेकिन लचीला होने और भ्रष्ट होने में फ़र्क होना चाहिये।"

सुरेश, बहुत सही कहा है.

आगे से हर लेखन परंपरा में उसके पहले के लेखों की कडी दे देना तो लोग पिछले लेख आसानी से पा लेंगे, पढ लेंगे -- शास्त्री जे सी फिलिप

मेरा स्वप्न: सन 2010 तक 50,000 हिन्दी चिट्ठाकार एवं,
2020 में 50 लाख, एवं 2025 मे एक करोड हिन्दी चिट्ठाकार!!

gg1234 said...

dada...main jab school mein padhta tha, tab hamien hindi padati thi mala teacher. Jaise shikshakon ka aapne zikra kiya hai...usse bilkul ulat...hamari hindi ki ek ek trutiyon ko bade hi pyaar se sudharti aur bol-chal ki bhasha mein bhi koi galti na hone deti...hum log apne pathyakram se jude hue athva kisi aur vishay mein be-jhijhak charcha kar sakte the aur woh apne vichar hum par thopti nahi thi, balki hamein sochne ke liye prerit karti thi....aaj jo bhi bhasha-gyan hai, usme unka bahut bada haath hai....achche shikshak aaj bhi hain...sirf "lafde" karne wale nahi...balki aise logon ki sankhya kam hi hai...bas media ne unhe hi dikhaya hai...yahi hamare desh ki trasadi hai...

RAJENDRA said...

sureshji apne blog par kripya aisi vyavastha to karen jisase devnagari men tippani kee ja sake