Wednesday, August 29, 2007

हम हैं मालवा के "खवैय्ये"

Pohe-Jalebi, Dal Bafla and Rabdi of Malwa Region

पश्चिमी मध्यप्रदेश का एक बड़ा भूभाग है जिसे कहते हैं “मालवा” जिसमें मुख्यतः इन्दौर, उज्जैन, देवास, रतलाम और मन्दसौर जिले आते हैं। “पग-पग रोटी, डग-डग नीर” यह कहावत पहले मालवा के लिये कही जाती थी (कही तो अब भी जाती हैं, लेकिन अब डग-डग नीर यहाँ मौजूद नहीं है)। लेकिन मौजूद है यहाँ की “खवैय्येगिरी” की परम्परा। दूध, सोयाबीन और हरी सब्जियों की बहुतायत वाला यह इलाका विभिन्न बेहतरीन व्यंजनों के लिये जाना जाता है। सुबह होती है नाश्ते हेतु पोहे-जलेबी से। कई लोगों को, जिन्होंने यह “कॉम्बिनेशन” नहीं खाया है वह आश्चर्य करेंगे, लेकिन भाप पर पके हुए (जी हाँ, भट्टी पर तपेले में गर्म पानी रखकर उसपर पोहे की कढाई रखी जाती है, और बिना तेल के सीधे हल्दी-मसाला-खड़े धने-अनारदाना- सेंव-प्याज मिलाकर दूर से ही लोगों की लार टपकाने हेतु सजाकर रख दिया जाता है) गरमागरम पोहे का स्वाद वही जान सकता है, जिसने खाया हो। साथ में होती हैं गरम और कड़क जलेबियाँ। एक कौर पोहे का जिसमें एक छोटा सा टुकड़ा जलेबी का, म्म्म्म्म्म मजा आ जाता है, कई बार गप्पें मारते हुए, या “जलेबी बच गई है इसलिये” एक की जगह पोहे की दो प्लेट हो जाती हैं। इतना भारी नाश्ता करने के बाद भोजन दो-तीन बजे के बाद ही होता है। भोजन के लिये हाजिर होते हैं “दाल-बाफ़ले”। दाल-बाफ़ले मालवा का शाही भोजन माना जाता है, जब कोई विशेष आयोजन (मुंडन, सूरज-पूजा, जन्मदिन पार्टी आदि) होता है तब मेजबान दाल-बाफ़ले का कार्यक्रम रखते हैं। संक्षेप में, “बाफ़ला” कहते हैं आटे के एक बड़े, घी में पके हुए गोले को, जिसे दाल में चूरा-चूरा करके खाया जाता है।

बाफ़ला बनाने के लिये रोटी के आटे से थोड़ा मोटा (दरदरा) आटा गूँथा जाता है, फ़िर उसमें नमक, हल्दी आदि मिलाकर उसके गोले बना लिये जाते हैं (आकार में टेनिस गेंद से थोड़े बड़े)। इन आटे के गोलों को कंडे के ढेर में दबा कर उन कंडों को सुलगा दिया जाता है, कंडों की धीमी-धीमी आँच से ये गोले भीतर तक पूरी तरह पक जाते हैं। फ़िर इन्हें बाहर निकालकर उस पर लगी राख आदि को कपड़े से साफ़ करके, शुद्ध घी से भरी हुई एक बड़ी परात में उन्हें हल्का सा “चीरा” लगाकर डुबाया जाता है, इससे गरम-गरम बाफ़ले अन्दर तक घी से पूरी तरह नहा जाते हैं। दाल तो जैसी आपकी मर्जी हो बना दी जाती है (आमतौर पर खट्टी-मीठी), लेकिन इन दोनो के साथ रवे-मावे के लड्डू भी होते हैं, जिसमें सूखा मेवा और मिश्री डाली जाती है, हरी मिर्ची की तीखी चटनी और गोभी या आलू की सब्जी, अब हुई पूरी “डिश” तैयार। पूरी थाली (एक बाफ़ला, दाल, एक लड्डू, चटनी और थोडी सी सब्जी) परोसने के बाद यदि कोई एक और पूरा बाफ़ला लेता है, तो मानना पड़ेगा कि उसकी खुराक बेहतरीन है। लेकिन इसकी नौबत कम ही आती है। इस शानदार और शाही भोजन के बाद शाम चार बजे से पाँच बजे तक एक नींद जरूरी हो जाती है। यह भोजन “एलीट” वर्ग के लिये नहीं है, और उन लोगों के लिये भी नहीं जो आजकल “घी” के नाम से ही चकरा जाते हैं। यह खाना खालिस देसी लोगों के लिये है (ना तो छुरी काँटे से खाया जा सकता है ना चम्मच से, सिर्फ़ भगवान के दिये हाथों से ही), पाचक भी तभी है जब आलथी-पालथी मार कर, पंगत में बैठकर, हाथ पर लगे शुद्ध घी को स्वाद लेकर खाया जाये।

इस असाधारण खाने के बाद शाम को भोजन करने की तो कोई गुंजाइश ही नहीं बनती है, इसलिये आठ-नौ बजे पैदल घूमने निकल जाईये, लम्बी-लम्बी गप्पें हाँकते जाईये, कोई बन्दिश नहीं है, उज्जैन में हों तो महाकाल का दर्शन करते हुए, इन्दौर में हों तो होलकरों के राजवाड़े आदि को देखते हुए, वापस मुख्य बाजार में आइये, जहाँ जवान होती हुई रात के दस बजे के लगभग “लच्छेदार रबड़ी” आपका इन्तजार कर रही है। ऐसी रबड़ी और कहीं नहीं खाई होगी आपने। “रबड़ी”, दूध से बना हुआ ही एक प्रकार है। एक बड़े कढ़ाव में शाम से ही दूध उबलने के लिये छोड़ दिया जाता है, आते-जाते एक हलवाई उस दूध पर एक के बाद एक आती जा रही मलाई की परतों को एक बारीक लोहे की सलाई से कढ़ाव के चारों तरफ़ इकठ्ठा करता जाता है, इससे धीरे-धीरे दूध अटते-अटते कम होता जाता है और तब तक कढ़ाव के चारों तरफ़ किनारों पर मलाई की एक मोटी परत जम चुकी होती है। बस, अन्त में थोड़े से बचे हुए दूध में (जो कि लगभग गुलाबी रंग का हो जाता है) में इस मलाई को काट-काट कर डाल दिया जाता है और उसमें थोड़ी सी शक्कर मिला दी जाती है, हो गई तैयार “रबड़ी”, बस बगल में ओटले पर बैठ जाइये (ना, ना पैंट की चिंता ना करें, ओटले पर बैठकर ही रबड़ी खाने का असली मजा आयेगा), दोने में सौ ग्राम रबड़ी मंगवाईये और (थोड़े ज्यादा हिम्मत वाले हों, तो) उंगली से धीरे-धीरे चाटकर खायें, ऐसा मजा ना मिला होगा, ना दोबारा कहीं मिलेगा। मालवा में आकर यदि आपने दाल-बाफ़ले और रबड़ी नहीं खाई तो यह ठीक वैसा ही होगा जैसे कोई आगरा जाकर ताजमहल ना देखे।

इन सब व्यंजनों के अलावा उज्जैन की एक खासियत और है, वह है भगवान शिव का प्रसाद यानी बूटी, या विजया, सीधी-सीधी भाषा में कहूँ तो “भाँग” (कृपया नाक-भौंह ना सिकोड़ें, क्योंकि जिसने यह “प्रसाद” चखा ही ना हो उसे कोई हक नहीं है इसकी बुराई करने का)। दिनचर्या के दो खास समय जिनका उल्लेख उपर करना रह गया वे हैं नाश्ते के बाद सुबह नौ बजे और दाल-बाफ़ले खाने के बाद शाम को, जी हाँ यही समय है “विजया” लेने का, और आपको कुछ भी नहीं करना है, मुख्य बाजार में कई भाँग-घोटे की दुकानें मिल जायेंगी, सिर्फ़ और सिर्फ़ दो रुपये की गोली घुटवा लीजिये, भोले बाबा का नाम लीजिये और गटक जाइये, बस आधे घंटे के भीतर ही आप “स्वर्गवासी” होंगे... बिलकुल... भाई जब आपको अपने आसपास मेनका, रंभा, उर्वशी नजर आने लगें तो आप “स्वर्गवासी” ही हुए ना! और सिर्फ़ दो रुपये इसलिये कहा कि एक तो सस्ता, सुन्दर और “टिकाऊ” सौदा, और साथ ही यह मात्रा इतनी होती है कि ना तो नाली में गिरने का खतरा होता है, ना ही बीबी को पता चलने का, यानी मौज ही मौज। एक बात और, कि शिवबूटी का सेवन करने पर आपकी भूख खुल जाएगी, तब या तो हँसते-हँसते आप आधा बाफ़ला ज्यादा खा जायेंगे, या फ़िर सौ ग्राम रबड़ी का एक दोना और पेट में खिसका देंगे.... राम कसम हम मालवा वाले तो खाने में ही लुट गये हैं... तो आप किस बात का इन्तजार कर रहे हैं हुजूर... चले आईये म्हारे मालवा मां...

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11 comments:

अरुण said...

तुरंत कोरियर वाले को बुलाये,अर्ली बर्ड वाला ठीक रहेगा,भेज दे हम इंतजार मे है..दाल यही बनवा रहे है,

Akhil Gokhale said...

So, when you are calling me to test all these items :)

Waiting for your invitation!!!!!

-akhil

Mired Mirage said...

बहुत ही बढ़िया लिखा है । जरा टूरिज्म वाले भी आपसे सीख लेते कि कैसे लोगों को ललचाया जाता है । यदि इसके साथ ही कहाँ रहें, क्या देखें भी हो तो फिर क्या बात !
घुघूती बासूती

Udan Tashtari said...

भोपाल-इन्दौर जाते समय सोनकछ्छ में रुक कर पोहे जलेबी खाने की याद दिला दी.

yunus said...

इसे कहते हैं सताना ।
अरे भाई क्‍यों दुखती रग पे हाथ रख रहे हो ।
मुंबई में हम उस तरह की रसीली जलेबियों और उन तमाम
चीजों के लिए तरस गये जिनका इतना लार टपकाऊ विवरण
आपने दिया है ।
जिस पर बीती वही जानता बात नहीं है कहने की ।

Sagar Chand Nahar said...

मजेदार जानकारी परन्तु कुछ जानकारियाँ में देना चाहता हूँ।

पोहे को पहले ही तेल ( बहुत कम) में पका लिया जाता है और खत्म होने तक गर्म रखने कि लिये उसे गरम पानी के उपर रखा जाता है, ना कि उसे बिना तेल पकाया जाता है।
बाफला दर असल राजस्थान का पारंपरिक खाना दाल बाटी है, बाफला को पानी में उबाला ( बाफा) जाता है और बाटी को कंडो की राख में बनाया जाता है।

विष्णु बैरागी said...

पूरी पोस्‍ट पढ कर पूरे मालवा की सैर कर ली और लगा कि किसी 'राजसी-रसोई' में आ बैठे हैं । तय कर पाना मुश्किल है कि वर्णित व्‍यंजन अधिक स्‍वादिष्‍ट हैं या आपका वर्णन ।

ऐसे लेखन में ही आपका सर्वोत्‍कृष्‍ट प्रकट होता है । पता नहीं, अनुवाद-फनुवाद के चक्‍कर में आप क्‍यों भटक-भटक जाते हैं ।

संजय तिवारी said...

मैं भोजनभट्ट नहीं हूं. ऊपर से दिल्ली में रहता हूं जहां दुर्भाग्य से भोजन की कोई संस्कृति ही नहीं है. सच कह रहा हूं दिल्ली में भोजन की कोई संस्कृति नहीं है. इस मामले में बंबई दिल्ली से बहुत समृद्ध है. इच्छा है एक बार मालवा घूमें और भोजनभट्ट बनने का प्रयास करें.

नितिन बागला said...

दिन में भारी भूख लगी थी..और ये लेख पढ लिया...समझ सकते हैं क्या हालत हुई होगी...
यम यम यम....(साथ में नींबू और ककडी टमाटर का सलाद भूल गये आप)

सागर भाई-विशेषरूप से इन्दौर में बिल्कुल बिना तेल के पोहे भी बनाते हैं..

संजय जी- है ना दिल्ली की पहचान - राजमा, छोले..और मैदा की तंदूरी रोटियां या भटूरे...२ दिन खा लें तो तीसरे दिन खाना नही मांगेंगे :)

P K Surya said...

majedar test bina khaye aa gaya Bhaiya kahin chupke se ap kono malwa me bhojnalya to nahi chalate hen, es website ka kharcha uthane k liye mujhe to yahi lagta he, apne desh me etni vivdhta he ki pure desh ka testy khana to hum deshwasiyon ko nasib hota nahi jo test me bhi lajwab he or helth me bhi lajwab he, lekin bhaiya ab to hume mcdonald, or narula ka basi khana jo garm kar khilaya jata he wahi achchha lagne laga he, es bahane doctor k pass jane ko jo bar bar mauka milta he baki umr bhar k liye pet kee sari bimari to umr k 5 sal se he suru ho jati he en bade sahro ka videshi khana kha k, jai bharat

Yash said...

भाई यह जरा विषय से हटकर है अगर एनडीटीवी का वामपंथी विनोद दुआ जायका इंडिया लेकर आपकी नागरी मे आए तो जूतो से स्वागत कीजियेगा जैसा हमने उसका उदयपुर मे किया था ! हा हा हा

शानदार ब्लॉग है आपका