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Tuesday 21 August 2007

नोकिया वालों लगे रहो....

जब से नोकिया वालों ने “ईमानदारी” दिखाई है और फ़ोकट में बैटरी बदलने की बात कर दी है, मेरे कस्बे में मानो उफ़ान ही आ गया है। जमाने के साथ चलते हुए हमारे कस्बे में भी अब हजारों-हजार मोबाइल और मोबाइलधारी पैदा हो गये हैं, जाहिर है कि उसमें “नोकिया” वालों की संख्या ही सबसे ज्यादा है। अब भले ही नोकिया वाले गला फ़ाड़-फ़ाड़कर चिल्लाते रहे हों कि “सिर्फ़ नवम्बर 2005 से दिसम्बर 2006 के बीच बनी कुछ बैटरियाँ, और वो भी मात्सुशिता कम्पनी की, ही खराब हैं, लेकिन यहाँ पर भाई लोगों को हरेक फ़ोन में खराबी दिखाई देने लगी है, लेकिन अपने तो मजे ही मजे हैं, आप सोचेंगे कि क्या बात कर रहा है यार, यहाँ जान पर आ बनी है, पता नहीं कब मोबाइल कान के पास ही फ़ट जाये और दिमाग की पाव-भाजी बन जाये या पैंट की जेब में रखे-रखे फ़ूट जाये और जनसंख्या बढाने का साधन ही समाप्त हो जाये और ये साला मजे की बात कर रहा है, तो भाईयों मैं समझाता हूँ कि बात क्या है, दरअसल अपन भी एक छोटा सा इंटरनेट पार्लर चलाते हैं, तो पिछले दस दिनों में ही बैटरी का नम्बर चेक करने के बहाने अपन ने पाँच-सात सौ रुपये कूट लिये। हर ऐरा-गैरा चला आ रहा है, भाई साहब जरा चेक तो करना कहीं मेरा मोबाइल फ़टने वाला तो नहीं है....लाओ पाँच रुपये अभी चेक कर देता हूँ (अभी तक मैंने चेक की हुई डेढ सौ बैटरियों में से सिर्फ़ एक ने ही खराब वाला “स्टेटस” दिखाया है नेट पर)। सबसे ज्यादा मजे तो आ रहे हैं देसी लोगों के “कमेंट्स” सुनने में, जरा मुलाहिजा फ़रमाईये – “ये सब नोकिया वालों की चाल है, अपनी मार्केटिंग करने की” (मुझे पता ही नहीं था कि नोकिया की भारत में बिक्री कम हो गई), “जापान की बैटरियाँ खराब बता रहे हैं ये लोग चाइना की घटिया बैटरियाँ लगवाना चाहते होंगे” (जॉर्ज फ़र्नांडीस के मुरीद होंगे), एक पहलवान तो दो महीने पहले खरीदे हुए मोबाईल की बैटरी भी बदलवा लाये। तो नोकिया के ऑफ़िस में माराकूटी हो ही रही है, बहती गंगा में हमने भी हाथ धो लिये, ठीक वैसे ही जैसे “ताज” के समय धोये थे, हमारे पार्लर से ठेले वाले, पान वाले, पंचर वाले, चाय पहुँचाने वाले, सभी ने “ताज” को वोट किया था (मतलब हमारे द्वारा करवाया था), तो भैया नोकिया हो या ताज वाले हों, ऐसे ही लगे रहो, हर दो महीने में कुछ नया लेकर आओ, ताकि हम गरीबों की दाल-रोटी भी चलती रहे। जय नोकिया...
विशेष नोट : तमाम मित्रों की पहले “हिकारत” भरी और अब “रश्क और तारीफ़” भरी निगाहों के बावजूद मैंने अभी तक मोबाइल नाम की बीमारी को बुलावा नहीं दिया है


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