"बडा़" आदमी दिखना है ? तीन नुस्खे नोट करें...
जब भी सामने वाले सिन्हा जी सुबह घूमने निकलते तो आने-जाने वाले लोग उन्हें "विश" करते थे, मैं भी उन्हीं के साथ घूमने निकलता था, मुझे कोई विश तो क्या "हुश" भी नहीं करता था। ये सिलसिला काफ़ी समय चला तो मैं अवसाद में घिर गया, मुझे लगने लगा कि मैं बेहद दीन-हीन हूँ। आखिर में मैंने हिम्मत बटोरी और सोचा कि आखिर क्या कारण है कि सिन्हा से बडे़ ओहदे पर होने के बावजूद शिक्षाकर्मी तो क्या सफ़ाईकर्मी भी मुझे सलाम नहीं करते और वो सिन्हा एक मामूली सा "बाबुडा़" है, फ़िर भी! इस मामले में "रिसर्च" करना ही होगा... चारों तरफ़ नजर दौडा़ई तब जाकर कहीं ज्ञानचक्षु खुले। बडा़ आदमी दिखने के तीन राज़ समझ में आये, जिस किसी को भी मोहल्ले और आसपास में बडा़ आदमी बनना हो नोट कर लें । सबसे पहला राज़ यह था कि सिन्हा "चड्डी" पहनने लगा था.. ना, ना, ऐसी बात नहीं थी कि पहले नहीं पहनता था, अवश्य पहनता होगा, लेकिन अब वह थोडी़ बडी़ "चड्डी" पहनने लगा था जिसे लोग "बरमूडा" कहा करते हैं। सुबह घूमते वक्त जब वह अपनी बालों भरी टाँगों का खुला प्रदर्शन करता शान से चलता था, तो लोगबाग खुद-ब-खुद रास्ता छोड़ देते थे। बरमूडा में उसे देखकर यह भ्रम दूर हो जाता था कि जंगली भालू बरमूडा में कैसा दिखता होगा? अमीरी और गरीबी दोनो ही कपड़े उतारती है और फ़ाड़ती है, यह सत्य भी उजागर हो गया (भई, हमारी काम वाली बाई भी चिथडे़ पहनती है और मल्लिका भी)। ऑफ़िस का चपरासी भी रात-दिन चड्डी में ही घूमता था, क्योंकि उसके पास एक ही पैंट थी। पहला सबक हमने याद कर लिया कि "बडे़" आदमी बनना है, कुछ इज्जत कमाना है, तो घुटने तक आने वाला रंग-बिरंगा चड्डा पहनो (रंग-बिरंगा इसलिये, कि "खाकी" चड्डे के नाम से कुछ लोग वैसे ही बिदकते हैं, जैसे लाल रंग को देखकर सांड), उसमें नाडा़-वाडा़ लटकता हो या दो-चार पट्टियाँ इधर-उधर झूलती हुई हों तो सोने पर सुहागा। दूसरा राज़ था एक अदद कुत्ता, जी हाँ... जैसे ही आपने कुत्ता पाला, तड़ से आपकी इज्जत बढी़ ही समझो! शर्त सिर्फ़ इतनी सी है कि कुत्त्ता या तो एकदम छोटा सा, मरियल और चर्बी से ज्यादा बालों के वजन वाला हो, या फ़िर एकदम नंगा (पूँछ कटा हुआ)... बीच वाली कोई "रेंज" नहीं चलेगी। क्योंकि यदि आपने "बुलडॉग" पाल लिया तो रोज उसे मटन और दूध देने की औकात भी तो बनानी पडे़गी। कल ही बाजार से एक-दो "बरमूडा" और एक कुत्ता लाना ही पडे़गा, फ़िर उस कुत्ते की चेन पकड़ कर जब मैं सुबह उसे हगाता हुआ चलूँगा तो क्या नजारा होगा, आगे-आगे कुत्ता और पीछे-पीछे मैं...। ना तो युधिष्ठिर ना वह कुत्ता सशरीर स्वर्ग में जाते वक्त इतने खुश हुए होंगे... यह सोच-सोचकर ही मन पुलकित हो रहा है। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण गुर यह सीखा कि आपके घर पर जो भी आये उसे दरवाजे पर टँगा हुआ छोड़कर आप आराम से नहाने-धोने को चले जायें (या कम से कम "साहब बाथरूम में हैं" यह तो बाहर कहलवा ही दें)। भारत के जितने बडे़ आदमी होते हैं वे कम से कम दिन में चार बार तो बाथरूम में होते ही हैं और वह भी कम-से-कम एक घंटे के लिये। कई बार विचार आया कि सचिवालयों में एक सार्वजनिक बाथरूम बना दिया जाये जिससे वहीं पर साहब लोग अपना काम निपटा लेंगे, सरकार की काम की गति बढेगी। बहरहाल... जब आपके घर के बाहर के मच्छर उसके खून का पूरा नमूना ले लें, आपका नया-नवेला टॉमी भी उसका परिचय प्राप्त कर ले, सामने वाला व्यक्ति लगभग जाने को उद्यत हो, तभी दरवाजे पर आप प्रकट हों... ये नहीं कि दरवाजे की घंटी बजी और पजामे का लटकता नाडा़ लिये आप ही दरवाजा खोलने चल पडे़। नौकर, बाई, चौकीदार.. कोई नहीं हो तो बच्चे से ही कहलवा दें कि "साहब आ रहे हैं", वरना लोग आपको फ़ालतू समझेंगे। ये तीन दाँव तो आज से ही आजमाता हूँ, फ़िर देखता हूँ लोग कैसे मुझे सलाम नहीं करते?


