Saturday, August 4, 2007

"सैंडी" का फ़्रेण्डशिप बैंड

उस दिन शाम को "सैंडी" बहुत दुःखी दिख रहा था, ना.. ना.. "सैंडी" कोई अमेरिकन नहीं है बल्कि कल तक नाक पोंछने वाला हमारा सन्दीप ही है । मेरे पूछते ही मानो उसका दुःख फ़ूट पडा़, बोला - भाई साहब, सारे शहर में ढूँढ कर आ रहा हूँ, "फ़्रेंडशिप बैंड" कहीं नहीं मिल रहा है । यदि मैं पूछता कि यह फ़्रेंडशिप बैंड क्या है, तो निश्चित ही वह मुझे ऐसे देखता जैसे वह अपने पिता को देखता है जब वह सुबह उसे जल्दी उठाने की कोशिश करते हैं, प्रत्यक्ष में मैने सहानुभूति जताते हुए कहा - हाँ भाई ये छोटे नगर में रहने का एक घाटा तो यही है, यहाँ के दुकानदारों को जब मालूम है कि आजकल कोई ना कोई "डे" गाहे-बगाहे होने लगा है तो उन्हें इस प्रकार के आईटम थोक में रखना चाहिये ताकि मासूम बच्चों (?) को इधर-उधर ज्यादा भटकना नहीं पडे़गा । संदीप बोला - हाँ भाई साहब, देखिये ना दो दिन बीत गये फ़्रेंडशिप डे को, लेकिन मैंने अभी तक अपने फ़्रेंड को फ़्रेंडशिप बैंड नहीं बाँधा, उसे कितना बुरा लग रहा होगा...। मैने कहा - लेकिन वह तो वर्षों से तुम्हारा दोस्त है, फ़िर उसे यह बैंड-वैंड बाँधने की क्या जरूरत है ? यदि तुमने उसे फ़्रेंडशिप बैंड नहीं बाँधा तो क्या वह दोस्ती तोड़ देगा ? या मित्रता कोई आवारा गाय-ढोर है, जो कि बैंड से ही बँधती है और नहीं बाँधा तो उसके इधर-उधर चरने चले जाने की संभावना होती है । अब देखो ना मायावती ने भी तो भाजपा के लालजी भय्या को फ़्रेंडशिप बैंड बाँधा था, एक बार जयललिता और ममता दीदी भी बाँध चुकी हैं, देखा नहीं क्या हुआ... फ़्रेंडशिप तो रही नहीं, "बैंड" अलग से बज गया, इसलिये कहाँ इन चक्करों में पडे़ हो... (मन में कहा - वैसे भी पिछले दो दिनों में अपने बाप का सौ-दो सौ रुपया एसएमएस में बरबाद कर ही चुके हो) । सैंडी बोला - अरे आप समझते नहीं है, अब वह जमाना नहीं रहा, वक्त के साथ बदलना सीखिये भाई साहब... पता है मेरे बाकी दोस्त कितना मजाक उडा़ रहे होंगे कि मैं एक फ़्रेंडशिप बैंड तक नहीं ला सका (फ़िर से मेरा नालायक मन सैंडी से बोला - जा पेप्सी में डूब मर) । फ़िर मैने सोचा कि अब इसका दुःख बढाना ठीक नहीं, उसे एक आईडिया दिया...ऐसा करो सैंडी... तुमने बचपन में स्कूल में बहुत सारा "क्राफ़्ट" किया है, एक राखी खरीदो, उसके ऊपर लगा हुआ फ़ुन्दा-वुन्दा जो भी हो उसे नोच फ़ेंको, उस पट्टी को बीच में से काटकर कोकाकोला के एक ढक्कन को चपटा करके उसमें पिरो दो, उस पर एक तरफ़ माइकल जैक्सन और मैडोना का और दूसरी तरफ़ संजू बाबा और मल्लिका के स्टीकर लगा दो, हो गया तुम्हारा आधुनिक फ़्रेंडशिप बैंड तैयार ! आइडिया सुनकर सैंडी वैसा ही खुश हुआ जैसे एक सांसद वाली पार्टी मन्त्री पद पाकर होती है... मेरा मन भी प्रफ़ुल्लित (?) था कि चलो मैने एक नौजवान को शर्मिन्दा (!) होने से बचा लिया ।

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10 comments:

mahashakti said...

भई मजा आ गया, मानना पडे़गा आप अच्‍छा लिखते है।

bhuvnesh sharma said...

पश्चिमी सभ्यता की यही पहचान है. यदि आप पैसा खर्च नहीं कर सकते तो कोई आपके प्रेम को स्वीकार नहीं करेगा.

Shrish said...

स‌ैंडी जैसे मासूम बच्चे की स‌मस्या दूर कर आपने बहुत पुण्य का काम किया है। स‌ाधुवाद!

"फ़िर से मेरा नालायक मन सैंडी से बोला - जा पेप्सी में डूब मर"।

हा हा।

Neeraj Rohilla said...

आपके विचार पढकर अच्छा लगा, आपका किशोरकुमार जी के जन्मदिवस पर लिखा लेख भी बहुत अच्छा था, एक ही टिप्पणी कर रहा हूँ, अन्यथा न लीजियेगा ।

जहाँ वैसे भी भारत में सात वार दस त्यौहार होते हैं, दस बारह डे और बढ जायें तो क्या बुरा है :-)

बस अब इन डे पर सरकारी छुट्टी की माँग न उठने लगे..:-)

साभार,

mamta said...

मजा आ गया। क्या ख़ूब लिखा है।
सबसे मजेदार लाइन जा पेप्सी मे डूब मर !!!

उन्मुक्त said...

:-) :-)

उन्मुक्त said...

:-) :-)

Akhil Gokhale said...

Appriciate your writing skills.:)
-Akhil

Vaidehi said...

खुप छान लिहिले आहे. तुमचे हिन्दीसुद्धा खुप शुद्ध आहे. माझ्यासारख्या "बम्बईया हिन्दी" बोलणार्या व्यक्तिसाठी तुमचे लिखाण म्हणजे हिन्दी सुधारण्यासाठी सन्धीच म्हटली पाहिजे. :-)

Yogesh said...

वा सुरेशराव सही लिहिले आहे. :)