Monday, July 16, 2007

हिन्दी फ़िल्मों का पहला "रैप" गाना - रेलगाडी...

इसे हिन्दी का पहला "रैप" गाना कहा जा सकता है... यूँ तो अशोक कुमार ने कई फ़िल्मों में कई गाने गाये हैं, बल्कि जब फ़िल्मों में अशोक कुमार का प्रवेश हुआ था तब देविका रानी के साथ उन्होंने कुछ गीत गाये । उस जमाने में हीरो को ही खुद का प्लेबैक देना होता था, जो कि शूटिंग के समय ही रिकॉर्ड कर लिया जाता था, उस परम्परा में के.एल.सहगल, सोहराब मोदी, चन्द्रमोहन आदि कई कलाकार उच्च कोटि के रहे... परन्तु यह गीत जो कि फ़िल्म आशीर्वाद का है, सन १९६८ का है, जब प्लेबैक गायन कोई नई बात नहीं रह गई थी, लेकिन संगीतकार वसन्त देसाई ने इस गाने को अशोक कुमार से ही गवाना उचित समझा... यह गाना यूँ तो एक बालगीत है, लेकिन बेहद तेज गति से गाया गया है, और यह कमाल कर दिखाया है अशोक कुमार ने.. गीत के कई शब्द पकड़ में नहीं आते, लेकिन ध्यान से सुनने पर मजा आ जाता है । इतना जरूर कह सकता हूँ कि "खांडवा-मांडवा" शब्द जरूर अशोक कुमार ने अपने आग्रह पर जोडा़ होगा । पूरे गांगुली परिवार का खंडवा (मप्र) से हमेशा विशेष प्रेम रहा है, यह गीत लिखा है हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने, जिन्होंने इस फ़िल्म में एक महत्वपूर्ण रोल भी किया । हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने फ़िल्म बावर्ची में भी एक अविस्मरणीय रोल किया था और एक गीत में पूरा अन्त्तरा भी गाया था... बहरहाल... इस "रैप" गाने का मजा लीजिये (नीचे दिये गये विजेट में प्ले पर चूहे का चटका लगायें)

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5 comments:

जोगलिखी संजय पटेल की said...

सुरेशभाई वाक़ई ये पहला रैप साँग होना चाहिये हिन्दी चित्रपट गीतों का. ख़ाकसार को दादा मुनि के साथ इस खा़स गीत पर तबला संगति का फ़ख्र हासिल है. एक चित्र भी है उस अवसर का लेकिन प्रतिक्रिया में वह जारी करना संभव नहीं तो कभी और के लिये उसे बचाए रख रहा हूं.जब मै इन्दौर में दादा मुनि के साथ बजाने बैठा तो ठगा सा रह गया जानकर कि उन्हे न केवल तीन ताल,रूपक,दीपचंदी,दादरा और कहरवा जैसी तालों के नाम याद थे बल्कि इन तालों में कितनी मात्राएं होतीं हैं ये भी उन्हे मालूम था. इस गीत से आपने मेरी युवावस्था के दिनों की याद दिला दी.

Manish said...

मजा आया इस गीत को बहुत दिनों बाद सुनकर ! एक इससे भी तेज रैप गीत किशोर कुमार ने सत्तर के दशक में गाया था। बचपन में बड़ा मजा आता था उसे सुनकर। वो भी बाल गीत ही था..आज बस इतना ही याद है कि उसमें...कमरे के अंदर निकलेगा बंदर... जेसे बोल थे। शायद यूनुस भाई को पूरा गीत पता हो।

विष्णु बैरागी said...

मैं तो 'रैप सांग' का मतलब भी नहीं जानता लेकिन दादा मुनि के इस गीत के जिक्र ने और लगे हाथों गीत के 'कर्ण-सुख' ने जो आनन्‍द दिया वह गूँगे के गुड खाने के बाद वाली हालत जैसा है । सुरेशजी ! धन्‍यवाद ।

yunus said...

सुरेश भाई, निजी तौर पर मुझे इस गाने को रैप कहना अच्‍छा नहीं लगता । ठीक वैसे ही जैसे कालिदास को पूर्व का शेक्‍सपियर कहना नहीं जमता । ये सच है कि ये गाना तीव्र गति वाले गानों की सीरीज़ में पहला ही है । गाना अद्भुत है । गुलज़ारी गाना है । दादामुनि से मेरी लं......बी मुलाक़ात और बात हुई थी । उन्‍हें खंडवा से कितना प्‍यार था, इन बातों में पल पल झलका । उन्‍होंने हमारे म.प्र. में पढ़ाया जाने वाला पंद्रह का कविताई पहाड़ा सुनाया और मैंने कहा ये तो मुझे भी याद है तो बच्‍चों की तरह ताली बजा बजाके हंस दिये । वो पहाड़ा बोलकर ही सुनाने में मज़ा है । फिर भी । पंद्रह एकम पंद्रह दूनी तीस तिया पैंतल्‍ला चौके साठ पन्‍ने पचहत्‍तर छक्‍के नब्‍बे, सत्‍ते बीसड़ अट्ठे बीसड़ नौ पैंतीसड़ धूम धड़क्‍कड़ डेढ़ सौ । क्‍या इसे बोलकर दिखाने के लिए पॉडकास्‍ट करना होगा ।

और हां मनीष जी जिस गाने की बात कर रहे हैं वो ‘कहते हैं मुझको राजा’ फिल्‍म का है । बोल थे—बाम चिक बाम चिक बम बम । ये गाना म्‍यूजिक इंडिया ऑन लाईन पर है शायद ।

Udan Tashtari said...

अच्छा लगा सुनकर