Sunday, July 29, 2007

रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर दो अलबेले गीतों से पुष्पांजलि

रफ़ी साहब की पुण्यतिथि (31 जुलाई) के अवसर पर उनके बारे में कुछ लिखने की शुरुआत करूँ तो कहाँ से करूँ, क्योंकि उनके बारे में सब कुछ तो कहा जा चुका है, फ़िर भी कम लगता है, रफ़ी साहब की आवाज, उनकी गीतों की अदायगी, उनकी भलमनसाहत के बारे में काफ़ी कुछ पहले ही लिखा जा चुका है, अब और कुछ लिखना तो मात्र सूरज को दीपक दिखाने जैसा होगा । रफ़ी साहब के हजारों खूबसूरत गीतों में से एक या दो को चुनना ठीक वैसा ही है, जैसे खिलौने की दुकान में भ्रमित सा एक बच्चा... जो सोच-सोच कर हैरान है कि "क्या चुनूँ" ! फ़िर भी रफ़ी साहब को पुष्पांजलि पेश करते हुए मैने उनके दो गीतों का चुनाव किया है । और इन गीतों का चुनाव इसलिये किया कि ये हीरो की छवि के विपरीत स्वभाव वाले गीत हैं । अक्सर कहा जाता है (और यह सच भी है) कि रफ़ी साहब हों या लता या आशा अथवा किशोर कुमार... गीत गाने से पहले फ़िल्म में यह किस हीरो पर फ़िल्माया जाना है उसके बारे में जरूर पता करते थे, फ़िर उस हीरो या हीरोईन के अन्दाजे-बयाँ और अदाओं के हिसाब से वे अपनी आवाज को ढालते थे । प्रस्तुत दोनों गीतों का चयन मैने इसी आधार पर किया है कि जिससे श्रोताओं को रफ़ी साहब की " वाईड रेंज" के बारे में जानकारी मिल सके । नृत्य करते हुए दिलीप कुमार और बेहद गंभीर मुद्राओं में शम्मी कपूर की कल्पना करना कितना मुश्किल होता है ना... जबकि अधिकतर लोगों के दिमाग में "ट्रेजेडी किंग" और "याहू" की छवियाँ ऐसी कैद हैं कि चाहकर भी उन्हें नहीं भुलाया जा सकता । अब सोचिये कि मोहम्मद रफ़ी साहब को जब ये विपरीत स्वभाव वाले गीत गाने को कहा गया होगा तब गीत गाने से पहले उन्होंने "माइंड-सेट" कैसे किया होगा, क्योंकि वे इन गीतों को गाने से पहले इन अभिनेताओं की छवि के अनुरूप यूसुफ़ साहब के लिये बेहद दर्द भरे और शम्मी जी के लिए जोरदार उछलकूद वाले और कमर-हिलाऊ गीत गा चुके थे, लेकिन यहीं पर उनकी "मास्टरी" उभरकर सामने आती है...
पहला गीत मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ फ़िल्म "गंगा-जमुना" का लिखा है शकील बदायूँनी ने और धुन बनाई है नौशाद ने । इस फ़िल्म को पहली "अनऑफ़िशियल" भोजपुरी फ़िल्म कहा जा सकता है, क्योंकि इस फ़िल्म के नब्बे प्रतिशत संवादों और गीतों में भोजपुरी का उपयोग किया गया है । बोल हैं... "नैन लड़ जइहैं तो मनवा मा कसक होईबे करी..." यदि किसी को पता न हो कि ये गीत किस पर फ़िल्माया गया है तो उसके जेहन में दिलीप कुमार कतई नहीं आयेगा... इतनी मस्ती में यह गीत रफ़ी साहब ने गाया है कि यह सीधे आपको गाँव के मेले में ले जाता है और छेड़छाड़ भरे मासूम भोजपुरी शब्दों से आपको सराबोर कर देता है । नौशाद ने रफ़ी साहब से काफ़ी गीत गवाये हैं (अधिकतर दर्द भरे और गंभीर किस्म के), लेकिन इस गीत में दिलीप कुमार नृत्य भी करेंगे और गीत भोजपुरी में भी होगा यह रफ़ी साहब ने भी नहीं सोचा होगा... बहरहाल आप इस गीत को "यहाँ क्लिक करके" भी सुन सकते हैं और नीचे दिये विजेट में प्ले करके भी । मस्ती में खो जाईये और रफ़ी साहब को याद कीजिये.... इस बार मैं शब्दों को नहीं लिख रहा हूँ ना ही धुन पर कुछ लिख रहा हूँ, आज बात होगी सिर्फ़ रफ़ी साहब की आवाज की ।
nain lad jai re to...


इसी प्रकार जो दूसरा गीत मैने चुना है वह है "मैं गाऊँ तुम सो जाओ..." फ़िल्म है ब्रह्मचारी, लिखा है हसरत जयपुरी ने, संगीत दिया है शंकर-जयकिशन ने और यह दर्दीली लोरी फ़िल्माई गई है शम्मी कपूर पर... शम्मी कपूर की जैसी खिलन्दड़ और याहू छवि है यह गीत उससे अलग हटकर है, फ़िल्म में अनाथ बच्चे भूखे हैं और सोने का प्रयत्न कर रहे हैं तथा शम्मी कपूर जो कि बेहद दुखी हैं, उन्हें यह लोरी गाकर सुलाने का प्रयास करते हैं । हालांकि शंकर-जयकिशन जो कि ऑर्केस्ट्रा के प्रयोग के मोह से बच नहीं पाते, इस गीत में भी साजों की काफ़ी आवाज है, फ़िर भी रफ़ी साहब ने बेहद कोमल अन्दाज और नीचे सुरों में उम्दा गीत गाया है (जैसे यह "फ़ुसफ़ुसाता सा यह गीत", या फ़िर "यह गीत") । इस लोरीनुमा गीत को आप "यहाँ क्लिक करके" सुन सकते हैं या विजेट में प्ले करके । आईये आवाज के इस देवदूत को सलाम करें, उनकी यादों में खो जायें और हमारी पीढी को रफ़ी-लता-आशा-किशोर-मुकेश आदि का तोहफ़ा देने के लिये ईश्वर को धन्यवाद दें ।
Main Gaaon Tum So ...


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3 comments:

Sanjeet Tripathi said...

दोनो ही गाने शानदार हैं।
रफ़ी साहब की बात ही निराली है, उनसा कोई दूजा हो पाना मुश्किल है!
हमारी भी श्रद्धांजलि उन्हें

विष्णु बैरागी said...

दो सर्वथा विपरीत मनस्थितियों वाले इन गीतों के बारे में आपने जिस कलात्‍मकता से बताया है उस पर बलिहारी ।

mamta said...

रफी साहब के गानों मे हमेशा उनका एक अलग ही अंदाज दिखता था।
रफी साब को हमारी श्रद्धांजलि ।