Wednesday, July 25, 2007

घनघोर चिल्लर संकट...

हाल ही में एक समाचार आया था कि उत्तरप्रदेश के एक शहर से लाखों रुपये की चिल्लर (१ और २ रुपये के सिक्के) बरामद किये गये,वहाँ उन्हें गलाया जा रहा था और उसकी सिल्लियाँ बनाकर बांग्लादेश भेजा जा रहा था । बांग्लादेश में भारत के एक रुपये के सिक्के की चार-पाँच ब्लेड (रेजर) बनाई जाती हैं । हालांकि इस खबर में कुछ नया नहीं है, लेकिन यह बताता है कि हमारा प्रशासन किस कदर बेखबर, और सोया हुआ रहता है । बडे़ महानगरों के बारे में तो नहीं पता, लेकिन हमारे मालवा क्षेत्र में पिछले २-३ महीने से चिल्लर संकट बहुत बढ गया है, उज्जैन, रतलाम, देवास, शाजापुर जैसे छोटे कस्बों में यह समस्या कुछ अधिक है । इसके कारण सबसे अधिक तकलीफ़ में हैं वे लोग या वे छोटे व्यापारी जिनका अधिकतर काम चिल्लर से ही चलता है । सब्जी बेचने वाले, पान वाले, बूट-पॉलिश वाले, हार-फ़ूल बेचने वाले, फ़ोटोकॉपी वाले, पीसीओ चलाने वाले, मतलब हजारों-हजार लोग इस समस्या से पीडि़त हैं, परन्तु सरकारी मशीनरी कान में तेल डाले बैठी है । जनरल स्टोर वाले या किराना वाले या सब्जी वाले तो इसका सामना कर लेते हैं, क्योंकि उनके पास एक रुपये या दो रुपये वाले कई आईटम होते हैं, माचिस, आलपिन, लिफ़ाफ़े, टॉफ़ियाँ वे कुछ भी दे सकते हैं, सब्जी वाले भी आजकल "राउंड फ़िगर" में सब्जी तौलते हैं, लेकिन मैं / हम (यानी फ़ोटोकॉपी का बिजनेस करने वाले) क्या करें, क्योंकि यदि किसी व्यक्ति को चार फ़ोटोकॉपी करवानी हैं तो दो रुपये हुए (जी हाँ फ़ोटोकॉपी आज भी पचास पैसे ही है, जो दस-पन्द्रह साल पहले थी), तो क्या मैं उसे राउंड फ़िगर करने के लिये उसकी दस कॉपी कर सकता हूँ, नहीं कर सकता... कुछ दुकान वालों ने अपनी "व्यक्तिगत मुद्रा" चलन में ला दी है, कागज के एक टुकडे़ के एक-दो रुपये / आठ आने के कूपन बना दिये हैं वे कूपन उसी दुकान पर चल जायेंगे, क्या करें कुछ ना कुछ तो करना ही होगा न ! और ये आज की पीढी के नौजवानों का क्या कहना... "कॉमन सेंस" इन लोगों में बहुत "अनकॉमन" हो चला है, मुलाहिजा फ़रमायें.. घर से मार्कशीट की फ़ोटोकॉपी करवाने निकले हैं, जेब में है सौ रुपये का नोट, जैसे कि माने बैठे हैं कि दुकानदार तो चिल्लर की टकसाल खोले बैठा है...समस्या को बढाने में ATM ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसमें से पचास, बीस या दस के नोट नहीं निकलते... अब शाम को मजदूरों को पेमेंट करना है, किसी को चालीस, किसी को साठ, तो साला ATM कार्ड क्या करेगा ? क्रेडिट कार्ड का उपयोग करने वालों का प्रतिशत कितना है ? सरकार कहती है कि बैंकों में चिल्लर की कोई कमी नहीं है, बैंक वालों को खुल्ले पैसे लेना होंगे... सरकार तो यह कह कर मुक्त हो गई, जरा जमीन पर उतर कर देखो अर्थशास्त्रियों.. बैंके साफ़-साफ़ मना कर देती हैं, खुल्ले के लेन-देन से, जो बन पडे़ सो कर लो... एकाध बैंक चिल्लर बाँटती भी है तो अहसान जता कर "एक हजार रुपये के सिक्के लेने होंगे कम से कम, जिसमें पाँच-पाँच के सौ सिक्के भी शामिल हैं".. अब बताईये पाँच के सौ सिक्के लेकर मैं क्या करूँ जबकि मुझे असली आवश्यकता एक रुपये के सिक्के की है...असल समस्या है भारतीयों की रग-रग में समाया हुआ भ्रष्टाचार.. यहाँ "चिता की लकडियों" में भी कमीशन खाया जाता है तो चिल्लर (राष्ट्रीय मुद्रा) की जमाखोरी और उसे बरबाद करने में कैसी शर्म... और जो पुलिसवेश्याओं के अड्डे जानती है, सटोरियों के ठीये जानती है, अवैध शराब की भट्टियाँ जानती है, वह सिक्कों को गलाने वाले माफ़िया के बारे में अन्जान होगी.. यह बात गले उतरने वाली नहीं है । राष्ट्रीय मुद्रा का हम कितना सम्मान करते हैं यह तो नोटों पर लिखे प्रेम संदेशों, गुणा-भाग या फ़िर महिलाओं की विशिष्ट जगह पर मुडे़-तुडे़, खुँसे हुए देखकर हो जाती है..अब सरकार कह रही है कि "हम प्लास्टिक के नोट छापेंगे"... चलिये इंतजार करें उन नोटों का, "भाई लोगों" ने पहले ही उसको ठिकाने लगाने का इंतजाम सोच रखा होगा...

7 comments:

Sanjeet Tripathi said...

सच है!!
वाकई में यह एक बड़ी समस्या बनती जा रही है!
यह दिक्कत हिन्दी बेल्ट में कुछ ज्यादा है !

sanjay tiwari said...

खामख्याली से अलग बहुत अच्छा विषय और यथार्थपरक लेखन.
मेरे लिए यह नई जानकारी है कि सिक्कों को गलाकर बेचा जाता है. जहां तक अपनी मुद्रा चलानेवाली बात है वह सही है. दिल्ली भी इससे दो-चार हो रही है. संकट कुछ लोग पैदा करते हैं तो कुछ लोग अपने स्तर पर उससे निपटने का हल भी खोज लेते हैं.
अच्छा विषय, उठाने के लिए फिर से बधाई.

Udan Tashtari said...

यह तो बड़ी विकट समस्या लग रही है. इसकी रोकथाम के लिये कड़े कदम उठाये जाना चाहिये.

Sagar Chand Nahar said...

आपने बिल्कुल मेरी तकलीफ का वर्णन किया है। मैं खुद आपके ही पेशे से हूँ और हर दिन इस चिल्लर की समस्या से जूझता रहता हूँ।
एक बात आपने बिल्कुल सही कही जो आता है दो चार कॉपी जेरॉक्स करवाने के लिये और सौ रुपये की नोट पकड़ाता देता है। अब या तो दो चार रुपये का नुकसान भुगतो या फिर बाजार से कमीशन पर चिल्लर ले कर आओ।
कई बार चिल्लर इस तरह कमीशन पर लाने के बाद वह मुश्किल से तीन चार दिन चलती है।

परमजीत बाली said...

बिल्कुल सही बात है आज बिना चिल्लर के बहुत परेशानी होती है।

Rohit Tripathi said...

Suresh ji aapne biluk sahi kaha, chutte paiso ka sankat bahut teji se badh raha hai

Shrish said...

बिल्कुल स‌ही मुद्दा उठाया स‌ुरेश भाई। मैं खुद रोज इस स‌मस्या स‌े जूझता हूँ। बस स‌े स‌्कूल जाने का एक तरफ का किराया होता है 7 रुपए। रोज कंडक्टर स‌े खुल्ले पैंस‌ों का चक्कर पड़ता है।