Thursday, July 19, 2007

काँच की बरनी और दो कप चाय - एक बोध कथा

जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होती है, सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है, और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं, उस समय ये बोध कथा, "काँच की बरनी और दो कप चाय" हमें याद आती है ।दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं...उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी (जार) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ... आवाज आई...फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये, धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी, समा गये, फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्या अब बरनी भर गई है, छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ.. कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई, अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ.. अब तो पूरी भर गई है.. सभी ने एक स्वर में कहा..सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली, चाय भी रेत के बीच में स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई...प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया - इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो... टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान, परिवार, बच्चे, मित्र, स्वास्थ्य और शौक हैं, छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बडा़ मकान आदि हैं, और रेत का मतलब और भी छोटी-छोटी बेकार सी बातें, मनमुटाव, झगडे़ है..अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती, या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते, रेत जरूर आ सकती थी...ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है...यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो, बगीचे में पानी डालो, सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ, घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको, मेडिकल चेक-अप करवाओ..टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो, वही महत्वपूर्ण है... पहले तय करो कि क्या जरूरी है... बाकी सब तो रेत है..छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे.. अचानक एक ने पूछा, सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि "चाय के दो कप" क्या हैं ?प्रोफ़ेसर मुस्कुराये, बोले.. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया... इसका उत्तर यह है कि, जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे, लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये । अपने खास मित्रों और निकट के व्यक्तियों को यह विचार तत्काल बाँट दो..मैंने अभी-अभी यही किया है.. :)

8 comments:

shanoo said...

बहुत ही सुन्दर और ज्ञानप्रद बातें है अच्छा लगा पढ़कर सुरेश भाई आज यही तो हो रहा है हम अपने जीवन को रेत से इस कदर भर लेते है की उसमे टेबल-टेनिस के लिये जगह ही नही बचती...दो कप चाय तो बहुत दूर की बात है...हाँ दोस्तो के साथ चाय का मज़ा तो वाकई बहुत अच्छा होता है मगर आज दोस्तों से दो बात करने का वक्त किसी के पास नही...

सुनीता(शानू)

tejas said...

सुन्दर, अति सुन्दर्…कहानी…धन्यवाद बांट्ने के लिये…

विष्णु बैरागी said...

बहुत ही सुन्‍दर बोध कथा है । कहॉं से ढूंढ कर लाते हैं आप ये कथाऍं ? सोच को बदल देती हैं । 'सतसैया के दोहरे' जैसा आनन्‍द है ।

जोगलिखी संजय पटेल की said...

सुरेश भाई मै ख़ुशनसीब हूँ कि मेरी ज़िन्दगी में दो कप चाय यानी दो प्यारे से मित्रों की मौजूदगी है जिसमें से एक से मामला ऐसा है कि मैने उसे याद किया तो उसके फ़ोन की घंटी बजती है.और वैसी ही आग उधर भी.कल ही की बात है मित्र की पत्नी और मेरी भाभी से चिढ़ कर वह कह रहा था कि पिछले दो घंटे से तुमने मुझे इसकी (पोते अद्वैत की) ड्यूटी में लगा रखा है अब मुझे सुख से ज़रा आधा घंटा सो लेने दो.ऐसा उसने कहा ही था फ़ोन की घंटी बजी...भाभी ने कहा लो आ गया आपका सुख...उसने कहा क्या मतलब...देखना संजय भैया का फ़ोन होगा..भाभी ने फ़ोन उठाया और मेरी दूसरे छोर पर मेरी आवाज़ सुनते ही ज़ोर से हँसने लगी..मैने कारण पूछा तो पूरा वाक़या बताया.ये सुरेशभाई दो प्याली चाय का निश्छ्ल प्रेम.आप यक़ीन माने मैं रात को दो बजे यदे किसी तकलीफ़ में हूं तो पिताजी को नींद से उठाने में संकोच करूंगा लेकिन दो प्याली चाय...हर वक़्त हाज़िर है.आपकी नीति कथा का भाव शब्द सृष्टि www.shabdsrishti.blogspot.comनाम के मेरे ब्लाँग पर एक आलेख में भी है.चलिये बात ख़त्म करता हूं..रात के साढे़ तीन बजा चाहते हैं ..कहीं चाय की प्याली के फ़ोन घंटी न बज जाए !

Udan Tashtari said...

बहुत सुंदर संदेश देती कथा, बहुत साधुवाद. कभी चाय पर पधारें.

शब्द-सृष्टी said...

आपकी बहुत प्यारी बोध कथा में टिप्पणी के रूप में मेरे ब्लाँग पर पूर्व में जारी एक आलेख का अंश यहाँ जारी करने का मोह संवरण नहीं कर पा रहा...उम्मीद है दो प्याली चाय का ज़ायका और बढे़गा.....मुलाहिज़ा फ़रमाएं....

अच्छे मित्र :
मित्रता दुनियाभर की तमाम प्रणालियों में सबसे कारगर सहयोग-प्रणाली है। इस सुख से कभी वंचित न हों। दोस्ती के लिए हमेशा समय निकालें। इसके लाभ ही लाभ हैं और यह हर तरह से बेजोड़ है। मित्र वो शानदार लोग हैं जो आपके बारे में सब जानते हुए भी आपको चाहते हैं। कुछ वर्ष पूर्व मेरे सबसे अज़ीज़ दोस्त की ५३ वर्ष की उम्र में हृदयाघात से मृत्यु हो गई। मित्र आज नहीं है किन्तु यकीन मानिए, वो मेरे लिए बहुत विशेष था। मैं उसके लिए यही कहा करता कि मैं विदेश की किसी जेल में झूठे इल्ज़ाम में क़ैद कर दिया जाता और मुझे सिर्फ़ एक फ़ोन करने की इजाज़त होती तो मैंअपने प्रिय मित्र को ही फ़ोन करता। क्यों? क्योंकि वो आता और मुझे छुड़ा ले जाता। ऐसी होती है दोस्ती। कोई आए और आपको थाम ले। हम सबके और मित्र भी होते हैं। उन्हें फ़ोन करते तो शायद जवाब मिलता, "अरे, जब तुम लौट आओ तो संपर्क करना, हम एक पार्टी करेंगे।' यह स्वाभाविक है कि आपके दो प्रकार के मित्र होंगे, गहराई रखने वाले सच्चे दोस्त या ऊपरी आवरण वाले कामचलाऊ दोस्त।

अरुण said...

बहुत अच्छी कथा ,राय,लेकिन भाइ अगर आप दो दिन पहले छापते तो जरूर किसी को फ़ायदा पहुच जाता,एक बंदा दिल्ली मे कई दिन से ड्रामे बाजी कर रहा था भेडिया आया भेडिया आया,वाले स्टाईल मे जब वो आया तो कोई नही आया.बेचारा भडभडाकर मै दिल्ली वालो को कई मौके दे चुका हू दरशन के बड्बडाता हुआ चला गया..:),अगर आपका लेख पहले देख लेते तो हम अवश्य दो तो नही पर एक घूट लगाने तो चले ही जाते,
गोल्फ़ किसी और दिन खेलेने चेले जाते..? :)

rajendra kadam said...

कुछ ख़ास नहीं लगा, साफ़ कहे और बुरा ना माने तो घटिया