Tuesday, June 12, 2007

एक फ़ुसफ़ुसाता सा मधुर गीत...

यह गीत कुछ अलग हट कर है, क्योंकि इस गीत में संवादों की अधिकता तो है ही, लेकिन संगीत भी बहुत ही मद्धिम है और संवादों के अलावा जो गीत के बोल हैं वे भी लगभग बोलचाल के अन्दाज में ही हैं । यह गीत इतने धीमे स्वरों में गाया गया है कि आश्चर्य होता है कि इतने नीचे सुरों में भी रफ़ी साहब इतने सुरीले और मधुर कैसे हो सकते हैं (यही तो रफ़ी-लता की महानता है)। यह गीत एक तो कम बजता है और जब भी बजता है तो बहुत ध्यान से सुनना पडता है...। गीत लिखा है कैफ़ी आजमी ने, संगीत है मदनमोहन साहब का और फ़िल्म है "हीर-रांझा" (राजकुमार-प्रिया राजवंश वाली)। उल्लेखनीय है कि फ़िल्म हीर-रांझा ही आधुनिक भारत (आजादी के बाद) की सम्भवतः एकमात्र फ़िल्म है जिसमे पूरी फ़िल्म के संवाद पद्य शैली में हैं, अर्थात तुकबन्दी में । गीत कुछ इस प्रकार से है -

रफ़ी - मेरी दुनिया में तुम आईं
क्या-क्या अपने साथ लिये
तन की चांदी, मन का सोना
सपनों वाली रात लिये...
तनहा-तनहा, खोया-खोया,
दिल में दिल की बात लिये
कब से यूँ ही फ़िरता था मैं
अरमाँ की बारात लिये..
(संवाद शुरु होते हैं - )
राजकुमार - अंधेरे का इशारा समझो, आज दिया दिल का जलाना होगा
प्रिया - तुम बडे़ वो हो मुझे जाने दो
राजकुमार - जा सकोगी
प्रिया - मुझे जाना होगा
राजकुमार - आज की रात तो दिल तोडो़ ना..
अब लता की आवाज शुरु होती है ..
ढलका आँचल फ़ैला काजल
आँखों मे ये रात लिये
कैसे जाऊँ सखियों में अब
तेरी ये सौगात लिये..
रफ़ी - मेरी दुनिया में तुम आईं..
लता - सीने की ये धडकन सुन ले ना कोई
हाय-हाय अब देखे ना कोई

रफ़ी - ना जाओ, न जाओ..
लता - हटो, हटो डर लगता है
रफ़ी - सुनो, सुनो.
लता - डर लगता है
रफ़ी - दिल में कितनी कलियाँ महकीं
कैसे कैसे फ़ूल खिले
नाजुक-नाजुक मीठे मीठे होठों की खैरात लिये
मेरी दुनिया में तुम आईं...

लता - चाँद से कैसे आँख मिलाऊँ..
रफ़ी - बाँहों में आओ तुमको बताऊँ..
लता - बस भी करो
रफ़ी - अब ना डरो, रात है ये अपनी
लता - पायल छनके, कंगना खनके, बदली जाये चाँदनी
मंजिल-मंजिल चलना होगा, हाथों में ये हाथ लिये
रफ़ी - मेरी दुनिया में तुम आईं...
और हौले से गीत समाप्त हो जाता है...
कैफ़ी आजमी ने छुप-छुप कर मिलने वाले प्रेमी जोडे़ की स्वाभाविक बातचीत को एक रोमांटिक गीत का स्वरूप दिया, पूरे गीत में एक व्याकुल प्रेमी और जमाने से डरी हुई और लाज से सिमटी प्रेमिका के दिल की आवाज हमें सुनाई देती है... हम पुरानी यादों में खो जाते हैं, और मदनमोहन साहब ने भी उतने ही मादक अन्दाज की लय और धुन तैयार की है...
यह गीत यहाँ क्लिक करके सुना जा सकता है...

4 comments:

mahashakti said...

बहुत ही सुन्‍दर गीत है,

maithilysg said...

बहुत मधुर लिखा है सुरेश जी

yunus said...

अच्‍छा लिखा है भाई । कुछ और फुसफसाते हुए गाने हैं । उन पर भी लिखें

sajeev sarathie said...

फुस्फुसता हुआ गीत अच्छा लगा सुरेश भाई