Sunday, June 3, 2007

फ़िल्मी मौत : क्या सीन है !

हिन्दी फ़िल्मों से हम प्यार करते हैं वे कैसी भी हों, हम देखते हैं, तारीफ़ करते हैं, आलोचना करते हैं लेकिन देखना नहीं छोडते, इसी को तो प्यार कहते हैं । हमारी हिन्दी फ़िल्मों में मौत को जितना "ग्लैमराईज" किया गया है उतना शायद और कहीं नहीं किया गया होगा । यदि हीरो को कैन्सर है, तो फ़िर क्या कहने, वह तो ऐसे मरेगा कि सबकी मरने की इच्छा होने लगे और यदि उसे गोली लगी है (वैसे ऐसा कम ही होता है, क्योंकि हीरो कम से कम चार-छः गोलियाँ तो पिपरमेंट की गोली की तरह झेल जाता है, वो हाथ पर गोली रोक लेता है, पीठ या पैर में गोली लगने पर और तेज दौडने लगता है), खैर... यदि गोली खाकर मरना है तो वह अपनी माँ, महबूबा, दोस्त, जोकरनुमा कॉमेडियन, सदैव लेटलतीफ़ पुलिस आदि सबको एकत्रित करने के बाद ही मरता है । जितनी देर तक वो हिचकियाँ खा-खाकर अपने डॉयलॉग बोलता है और बाकी लोग मूर्खों की तरह उसका मुँह देखते रहते हैं, उतनी देर में तो उसे गौहाटी से मुम्बई के लीलावती तक पहुँचाया जा सकता है । हीरो गोली खाकर, कैन्सर से, कभी-कभार एक्सीडेंट में मरता तो है, लेकिन फ़िर उसकी जगह जुडवाँ-तिडवाँ भाई ले लेता है, यानी कैसे भी हो "फ़ुटेज" मैं ही खाऊँगा ! साला..कोई हीरो आज तक सीढी से गिरकर या प्लेग से नहीं मरा ।

चलो किसी तरह हीरो मरा या उसका कोई लगुआ-भगुआ मरा (हवा में फ़डफ़डाता दीपक अब बुझा कि तब बुझा..बच्चा भी समझने लगा है कि दीपक बुझा है मतलब बुढ्ढा चटकने वाला है...) फ़िर बारी आती है "चिता" की और अंतिम संस्कार की । उज्जैन में रहते हुए इतने बरस हो गये, लोग-बाग दूर-दूर से यहाँ अंतिम संस्कार करवाने आते हैं, आज तक सैकडों चितायें देखी हैं, लेकिन फ़िल्मों जैसी चिता... ना.. ना.. कभी नहीं देखी, क्या "सेक्सी" चिता होती है । बिलकुल एक जैसी लकडियाँ, एक जैसी जमी हुई, खासी संख्या में और एकदम गोल-गोल, "वाह" करने और तड़ से जा लेटने का मन करता है... फ़िर हीरो एक बढिया सी मशाल से चिता जलाता है, और माँ-बहन-भाई-दोस्त या किसी और की कसम जरूर खाता है, और इतनी जोर से चीखकर कसम खाता है कि लगता है कहीं मुर्दा चिता से उठकर न भाग खडा हो...।

यदि चिता हीरोईन की है, और वो भी सुहागन, फ़िर तो क्या कहने । चिता पर लेटी हीरोईन ऐसी लगती है मानो "स्टीम बाथ" लेने को लेटी हो और वह भी फ़ुल मेक-अप के साथ । हीरो उससे कितना भी लिपट-लिपट कर चिल्लाये, मजाल है कि विग का एक बाल भी इधर-उधर हो जाये, या "आई-ब्रो" बिगड़ जाये, चिता पूरी जलने तक मेक-अप वैसा का वैसा । शवयात्रा के बाद बारी आती है उठावने या शोकसभा की । हीरो-हीरोईन से लेकर दो सौ रुपये रोज वाले एक्स्ट्रा के कपडे भी एकदम झकाझक सफ़ेद..ऐसा लगता है कि ड्रेस-कोड बन गया हो कि यदि कोई रंगीन कपडे पहनकर आया तो उसे शवयात्रा में घुसने नहीं दिया जायेगा । तो साथियों आइये कसम खायें कि जब भी हमारी चिता जले ऐसी फ़िल्मी स्टाईल में जले, कि लोग देख-देखकर जलें । जोर से बोलो...हिन्दी फ़िल्मों का जयकारा...

5 comments:

arun said...

सुरेश भाइ दिल ना छौटा करो बस इत्ती सी बात,तुरंत कम से कम एक विडियो फ़िल्म तो शूट करवा लो राखी सांवत को लेकर,सारा सामान शानदार होगा और फ़िर आप शूटिंग के दौरान लेटने के चाहे जितने रिटेक कर सकते हो (भाइ डायरेक्टर,प्रोड्यूसर तो आप ही होगे ना) चाहो तो हमे भी बुला लेना हम भी हिरोईन से गले मिल कर जोर जोर से रोने के लिये तैयार है वो क्या है ना आप तो लेट कर फ़ोटो खिचव रहे होगे
:)

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

सुरेश जी इन पंगेबाज के चक्कर में मत पड़ना. फिल्म में गोली खा के आप का राम नाम होगा और हीरोइन ये ले उड़ेंगे!
और अब सीरियसली : बहुत अच्छा सटायर है बन्धु. आप तो हीरा हैं!

संजय बेंगाणी said...

क्या बात है, सेक्सी चिता.. हा हा हा
खुब लिखा है.
कमबख्त अब मरना है तो पूरे फिल्मी स्टाइल में मरना है.

Udan Tashtari said...

बहुत गजब लिखे हो, भाई!!

joglikhisanjaypatelki said...

सुरेश भाई...फ़िल्मों में मौत को जिला दिया आपने.दर-असल जिस तरह का छ्दम व्यवहार हमने शुरू कर दिया है अपनी निजी ज़िन्दगी में; समझ लीजिये वही सब-कुछ ग्लैमराइज़ होकर हमारी नज़रों के सामने आ रहा है.ये तो सुना था कि फ़िल्म एक मायाजाल है लेकिन आपने जिस विषय पर मुद्दा उठाया है उसे पढकर ऐसा लगता है कि मरना है तो फ़िल्म वालों की तरह मरो.हालाकि ये ख़तरनाक लक्षण है कि मौत नाम की सच्चाई में भी हम एक ड्रामा देखने का सुख ले रहे है.