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Friday 1 June 2007

जीवन डोर तुम्हीं संग बाँधी - पं. भरत व्यास

पंडित भरत व्यास हमारी हिन्दी फ़िल्मों के एक वरिष्ठ गीतकार रहे हैं । उनके गीतों में हमें हिन्दी के शब्दों की बहुतायत मिलती है और साथ ही उच्च कोटि की कविता का आनन्द भी । यह गीत उन्होंने फ़िल्म सती-सावित्री के लिये लिखा है, संगीतकार हैं लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल । यह गीत राग "यमन कल्याण" पर आधारित है, और गाया है स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने । पहले इस गीत की सुमधुर पंक्तियों पर नजर डाल लें....

जीवन डोर तुम्हीं संग बाँधी (२)
क्या तोडेंगे इस बन्धन को, जग के तूफ़ाँ-आँधी रे आँधी..

हों न सके न कभी हम तुम न्यारे
दो तन हैं एक प्राण हमारे...
चाहें मिले पथ में अन्धियारे
चाहे घिरे हों बादर कारे
फ़िर भी रहूँगी तुम्हारी तुम्हारी... जीवन डोर (१)

यूँ घुलमिल रहना जीवन में
जैसे रहे कजरा अँखियन में
तेरी छवि छाई रहे मन में
तेरा ही नाम रहे धडकन मे
तेरे दरस की मैं प्यासी से प्यासी... जीवन डोर (१)

ऐसा मुझे वरदान मिला है
तुम क्या मिले भगवान मिला है
अब तो जनम भर संग रहेगा
इस मेहन्दी का रंग रहेगा
तेरे चरण की मैं दासी रे दासी... जीवन डोर (१)

यह गीत हमे एक विशिष्ट "नॉस्टेल्जिया" में ले जाता है । उस वक्त में ले जाता है, जब स्त्री अपना सम्पूर्ण व्यक्तित्व अपने पति पर न्यौछावर कर देती थी । भरत व्यास जी के शब्दों में जो सरलता होती है वह हमें मुग्ध कर देती है, और उस पर लता की पवित्र आवाज, ऐसा लगता है मानो हम अकेले किसी बडी सी झील के किनारे बैठे हैं और एक हंस किनारे पर आकर हमसे बतियाना चाहता है । इस गीत में एक पतिव्रता स्त्री की भावनाओं को उकेरा गया है । वाकई में स्त्री में जो धैर्य, सहनशीलता और त्याग की भावना होती है, उसका मुकाबला पुरुष कभी नहीं कर सकता । स्त्री का समर्पण कोई कमजोरी नहीं होता, बल्कि वह एक अगाध प्रेम होता है । गीत में वह कहती भी है कि "यूँ घुलमिल रहना जीवन में, जैसे रहे कजरा अँखियन में", "अब तो जनम भर संग रहेगा, इस मेहन्दी का रंग रहेगा"... कितने लोगों ने अपनी अर्धांगिनी को छोटे-छोटे उपहारों पर खुश होते देखा है ? जिसने नहीं देखा, वह जीवन भर बडी खुशियाँ बटोरने के चक्कर में समय गँवा रहा है... यह गीत रेडियो पर कम ही सुनाई देता है, और मेरा हमेशा प्रयास रहा है कि लोगों का फ़िल्मी गीतों की ओर देखने का नजरिया बदले, इसलिये यह गीत... इसे यहाँ क्लिक करके भी सुना जा सकता है । आज के माहौल का प्रेम "पिज्जा" की तरह का है, जबकि मेरे अनुसार प्रेम अचार की तरह होना चाहिये, जो समय बीतने के साथ और-और मधुर होता जाता है.....और यह गीत हमें उस दौर की याद दिलाता है, जब अभावों और दर्जन भर बच्चों के बावजूद स्त्री निश्छल हँसी हँसने का माद्दा रखती थी.....

10 comments:

yogesh samdarshi said...

प्रयास अच्छा लगा.

पर मैं गीत न पढ सका मेरे कम्प्योटर पर स्पस्ट नहीं है बिंदू बन गये है

मैथिली said...

बहुत बहुत मधुर लिखा है सुरेश जी

काकेश said...

अच्छा है...पर प्रेम अचार की तरह .!!?ये बात हजम नहीं हुई... प्रेम तो बहती गंगा का जल है...प्रेम गूंगे का गुड़ है .. चन्दन की खुशबू है.. और भी बहुत कुछ ...

संजय बेंगाणी said...

सौन्दर प्रस्तुति. इस गीत से अनजान था.

संजय बेंगाणी said...

सुन्दर पढ़ें.

प्रियंकर said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति . बधाई!

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

... उस वक्त में ले जाता है, जब स्त्री अपना सम्पूर्ण व्यक्तित्व अपने पति पर न्यौछावर कर देती थी ।...
मेरी पत्नी तो इस वक्त में भी उस वक्त की है. भैया प्रेम पित्जा हो या अचार या गुड़ या चन्दन. उसमें जब तक प्रेम का इनग्रेडियेण्ट है - तर्क/मोलभाव नहीं समर्पण है तो प्रेम प्रेम है. कुटिलता या प्रेम तब भी थे और अब भी हैं.
बहरहाल गीत बहुत अच्छा है.

arun said...

अच्छा लिखे हो बढिया है

sajeev sarathie said...

सुरेश जी भरत व्यास जी कि इस सुन्दर रचना की याद ताज़ा कर आपने मन प्रस्सन कर दिया

sunita (shanoo) said...

सुरेश भाई बहुत अच्छा लगा गीत पढकर और सुनकर आनन्द आ गया...
धन्यवाद
सुनीता(शानू)