Wednesday, May 2, 2007

Tu Chanda Mai Chandni - Reshma aur Shera (Bal Kavi Bairagi)

तू चंदा.. मैं चाँदनी (Reshma aur Shera) : बालकवि बैरागी

आज जिस गीत के बारे में मैं लिखने जा रहा हूँ, वह गीत लिखा है बालकवि बैरागी जी ने, फ़िल्म है "रेशमा और शेरा" (निर्माता - सुनील दत्त) । ये गीत रेडियो पर कम बजता है, और बजता भी है तो अधूरा (दो अन्तरे ही), इस गीत का तीसरा अंतरा बहुत कम सुनने को मिलता है, जाहिर है कि रेडियो की अपनी मजबूरियाँ हैं, वे इतना लम्बा गीत हमेशा नहीं सुनवा सकते (जैसे कि फ़िल्म "बरसात की रात" की मशहूर कव्वाली "ये इश्क-इश्क है इश्क-इश्क" भी हमें अक्सर अधूरी ही सुनने को मिलती है, जिसके बारे में अगली किसी पोस्ट में लिखूँगा)... बहरहाल... ये गीत राजस्थानी शैली में लिखा हुआ गीत है, गीत क्या है एक बहती हुई कविता ही है, जिसे सरल हृदय बालकवि जी ने अपने शब्दों के जादू से एक अनोखा टच तो दिया ही, लेकिन असली कमाल है संगीतकार जयदेव का । गीत के बीच-बीच में जो "इंटरल्यूड्स" उन्होंने दिये हैं वे चमत्कारिक हैं । जलतरंग और शहनाई का अदभुत उपयोग उन्होंने किया है और किसी कविता को सुरों में बाँधना वैसे भी मुश्किल ही होता है... जयदेव जी हमेशा इस बात के पक्षधर रहे हैं कि पहले गीत के बोल लिखे जायें और फ़िर उसकी धुन बनाई जाये... और बालकवि बैरागी जी के इन शब्दों को धुन में पिरोना वाकई मुश्किल रहा होगा, जबकि साथ में यह जिम्मेदारी भी हो कि फ़िल्म के साथ उसका तारतम्य ना टूटने पाये और उसी पृष्ठभूमि में वह फ़िट भी लगे...गीत शुरू होता है धीमी-धीमी धुन से.... फ़िर जैसे कहीं दूर रेगिस्तान से सुरदेवी लता की आवाज आना शुरू होती है....

तू चन्दा... मैं चाँदनी... चाँदनी...
तू तरुवर मैं शाख रे...
तू बादल मैं बिजुरी... तू बादल मैं बिजुरी...
तू पंछी मैं पाँख रे...
तू चन्दा मैं चाँदनी......

गीत अपनी शुरुआत के इस पहले हिस्से से ही पकड़ बना लेता है, खासकर लताजी जब ऊँचे सुरों से शुरुआत करके "तू चन्दा मैं चाँदनी" के बाद बेहद धीमे सुरों में "तू बादल मैं बिजुरी" गाती हैं और फ़िर पुनः ऊँचे सुर में "तू पंछी मैं पाँख रे" की तान छेडकर हमें हिंडोले का मजा देती हैं...
अगला अंतरा बेहद शांति से शुरु होता है और इसमें लता जी की आवाज हमें एक दूसरी ही दुनिया में ले जाती है... मुझे लगता है कि गीत के हिस्से में जयदेव जी ने जानबूझकर ही वाद्यों का प्रयोग नहीं के बराबर किया... ताकि वहीदा रहमान का सुनील दत्त के प्रति समर्पण भाव खुलकर सामने आ सके और रेगिस्तान की पृष्ठभूमि का सही आभास वे पैदा कर सकें....
ना....सरवर ना... बावडी़
ना... कोई ठंडी छाँव..
ना कोयल ना पपीहरा
ऐसा मेरा गाँव से
कहाँ बुझे तन की तपन, कहाँ बुझे तन की तपन
ओ सैँया सिरमोर, चन्द्र किरन को छोड़कर जाये कहाँ चकोर रे
जाग उठी है साँवरे, मेरी कुआँरी प्यास रे...
अंगारे से लगने लगे, पिया अंगारे से लगने लगे
आज मुझे मधुमास रे, मधुमास रे... आज मुझे मधुमास....


इस अंतरे में बालकवि जी ने रेगिस्तान के गाँवों का वर्णन करके उसे "तन की तपन" से जोड़ दिया है, जो कि अदभुत है...जैसा कि अपने पोस्ट में यूनुस भाई ने कहा था कि इतने कोमल शब्द किसी-किसी गीत में ही मिलते हैं, और एक समर्पित प्रेमिका की अपने प्रेमी के प्रति आसक्ति की अधिकता में शब्दों की अश्लीलता ना आने पाये, यह कमाल किया है बैरागी जी ने... हिन्दी के कुछ उम्दा शब्दों को उन्होंने लिया है ताकि भावना भी व्यक्त हो जाये और अश्लीलता का तो सवाल ही नहीं....इस अंतरे के शुरु में वाद्य नहीं हैं, फ़िर धीरे-धीरे चौथी पंक्ति तक वे आते हैं और पैरा के अन्तिम लाईन आते-आते तेज हो जाते हैं (जब लताजी "आज मुझे मधुमास रे.... खासकर मधुमास शब्द के बीच में जो मुरकियाँ लेती हैं तो कलेजा चीर कर रख देती हैं)....

दूसरा अंतरा भी उसी प्रकार से शुरू होता है, लेकिन इस बार वाद्य भी साथ होते हैं....
तुझे आँचल में रखूँगी ओ साँवरे...
काली अलकों से बाँधूंगी ये पाँव रे...
गलबहियाँ वो डालूँ के छूटे नहीं...
मेरा सपना सजन अब छूटे नहीं...
मेहंदी रची हथेलियाँ, मेहंदी रची हथेलियाँ..
मेरे काजर वारे नैन रे...
पल-पल तुझे पुकारते, पिया पल-पल तुझे पुकारते, हो-हो कर बेचैन रे...
हो-हो कर बेचैन रे...


यहाँ भी "बेचैन रे...." की तान ठीक वैसी ही रखी गई है जैसी "मधुमास" शब्द की रखी गई है....मंतव्य वही है... आपसी दुश्मनी वाले दो कबीलों के दो प्रेमियों के बीच "तन की तपन", "मधुमास", "बेचैन", "गलबहियाँ", "काली अलकों" जैसे रहस्यमयी शब्द वाकई में गहरे असरकारक हैं...
तीसरा अंतरा जो कि कम सुनने को मिलता है....
ओ मेरे सावन सजन, ओ मेरे सिन्दूर..
साजन संग सजनी बनी, मौसम संग मयूर..
चार पहर की चाँदनी, मेरे संग बिता...
अपने हाथों से पिया मुझे लाल चुनर उढा..
केसरिया धरती लगे, अम्बर लालम-लाल रे..
अंग लगाके सायबा... अंग लगा के सायबा...
कर दे मुझे निहाल रे....कर दे मुझे निहाल रे...
तू चन्दा मैं चाँदनी.... तू तरुवर मैं शाख रे...


फ़िल्म की सिचुएशन के हिसाब से प्रेमिका जानती है कि उनका मिलन होना आसान नहीं है "चार पहर की चाँदनी, मेरे संग बिता...." और "केसरिया धरती लगे, लेकिन भविष्य की कल्पना करके अम्बर लालम-लाल" ऐसा उच्च श्रेणी का मेलजोल है सिचुएशन और गीत के बोलों में...तो इस प्रकार एक अनोखे गीत का अंत होता है... जिसमें क्या नहीं है, हिन्दी कविता का झरना, जयदेव का संगीत, लताजी की दैवीय आवाज, रेगिस्तान की पृष्ठभूमि में फ़िल्मांकन, सब मिलाकर एक बेहतरीन गीत....

दो दर्जन से अधिक पुस्तकों के लेखक, सच्चे गाँधीवादी काँग्रेसी, बालकवि बैरागी जी मध्यप्रदेश से विधायक, सांसद, केन्द्रीय मन्त्री रह चुके हैं, लेकिन उनकी सादगी अचंभित कर देने वाली है, आज भी वे सैकडों पत्रों का उत्तर अपने हाथों से देते हैं, और कुछ दिन पहले ही एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि डाक की बढती दरों के कारण उन्हें काफ़ी मुश्किल होती है... जिस जमाने में एक अदना सा महापौर भी पाँच साल में इतना कमा लेता है कि उसे पूरे जीवन भर कुछ नहीं करना पडता, ऐसे में बालकवि जी एक चमकदार लैम्प पोस्ट का काम करते हैं जो रास्ता दिखाता है...खैर....

यूनुस भाई के रेडियोवाणी से प्रेरित होकर मैने सोचा कि फ़िल्मी गीतों की गहराई और हिन्दी फ़िल्मों पर भी कुछ लिखा जाये... जैसे "दिल ढूँढता है" और अब यह गीत, हालांकि मेरे शब्दों में अधिक मुलायमियत नहीं है (शायद इसलिये कि मैने अधिकतर लेखन राजनीति और समाज पर किया है..) लेकिन यदि पाठकों को पसन्द आया तो यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा... आमीन...

10 comments:

avdhesh said...

saral suruchipurna bahut achcha

धुरविरोधी said...

सुरेश जी;
आज बहुत माधुर्य दिया आपने, धन्यवाद.
ये मेरा भी पसंददीदा गीत है

PRABHAKAR PANDEY said...

bahut badhiya.

राकेश खंडेलवाल said...

बहुत दिनों के बाद पढ़ा यह गीत. आपसे अनुरोध है कि ब्वैरागी जी का गीत
नवा नवा कजरा, नवा नवा गज्रा नवा पिया की नव प्यारी
अगर आपके पास उपलब्ध हो तो पोस्ट करें.

eSwami said...

ye meraa bhee pasandeeda geet hai.

Dhanyawaad!

yunus said...

सुरेश भाई अच्‍छा लगा कि आपने बैरागी जी के इस गीत का चुनाव किया ।
दरअसल पिछले दिनों मनीष ने अपने चिट्ठे में बैरागी जी की एक कविता को उठाया था और तब मैंने मनीष से कहा था कि वो ये गीत भी सुनें । चार पांच बातें कहना चाहता हूं । ये राग मांड पर आधारित गीत है । मुझे शास्‍त्रीय संगीत का उतना ज्ञान नहीं है, किंतु रूचि है इसलिये पता है । जयदेव बहुत कम वाद्यों के इस्‍तेमाल पर जोर देते रहे, उनके तमाम गानों में आपको कम वाद्य सुनाई देंगे । वो स्‍वयं बेहतरीन सितार बजाते थे, बहरहाल, आपने इस गाने का बहुत सुंदर विवरण दिया है । मज़ा आ गया । एक सुझाव है, किसी गीत पर लिखते हुए उसकी हाईपर लिंक दें ताकि उसे सुनकर आपका विवरण पढ़ा जा सके । ये गाना होगा कहीं ना कहीं इंटरनेट पर । मुझे मिला तो आपको ज़रूर बताऊंगा । केसरिया धरती लगे, अंबर लालम लाल रे, मेरी प्रिय पंक्तियां हैं ये । आप उज्‍जैन में हैं । बैरागी जी के निकट । उनकी कुछ और कविताएं उपलब्‍ध कराएं या उनकी आवाज़ तो आनंद आ जाए । मुंबई में एक ही बार उन्‍हें सुनने का मौक़ा मिला था, आज तक याद है वो दिन ।
आखिरी बात, सचमुच ये गीत अधूरे बजाए जाते हैं रेडियो पर । कई बार समयसीमा आड़े आ जाती है । लेकिन मैं स्‍वयं इन्‍हें पूरा बजाने का प्रयास अवश्‍य करूंगा । मजा आया आपका लिखा पढ़कर ।

राकेश खंडेलवाल जी आप जिस गाने का जिक्र कर रहे हैं क्‍या उसका विवरण देंगे । अगर फिल्‍मी है तो जरा सा और ब्‍यौरा दीजिये । फिर देखिये हम कैसे उसे ढूंढकर लाते हैं, बशर्ते वो वक्‍त की धुंध में खो ना गया हो ।

Manish said...

अच्छा विश्लेषण रहा इस गीत का ! लिंक ये रही
http://www.musicindiaonline.com/music/hindi_bollywood/s/movie_name.8880/year.7/

Udan Tashtari said...

मजा आ गया भाई!! बहुत खूब. बैरागी जी के और गीत लाये जायें.

joglikhisanjaypatelki said...

सुरेश भाई;
क्या प्यारा गीत चुना आपने.बालकविजी मालवा के वरेण्य गीतकार हैं..ये मालवी का दुर्भाग्य है कि बालकविजी अब मालवी में नहीं लिखते.उनका वतन नीमच राजस्थान से भौगोलिक रूप से और सांस्कृतिक रूप से बहुत नज़दीक है.इसलिये बालकविजी के गीतों मे एक अदभुत माधुर्य सुनाई देता है...युनुस भाई (आदाब..हम भी पडे़ हैं राहों में)ने ठीक फ़रमाया कि जयदेव जी ने ये बन्दिश मांड में रची है लेकिन जैसा चित्रपट संगीत में होता है अन्य कई रागों की छ्टा भी इसमें बिखरी है..इस गीत में बांसुरी के साथ संतूर भी लाजवाब बजा है..जो पं शिवकुमार शर्मा ने बजाया है....ऐसा लगता है जैसे जम्मू से बर्फ़ पिघलकर जैसलमेर के रेगिस्तान में आकर बहने लगी है एक प्यारी सी झेलम बन कर हमारे दिल-दिमाग़ को एक अलौकिक सुख से लबालब कर रही है

..जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है बालकविजी मालवा के उस इलाक़े से ताल्लुक़ रखते है जो राजस्थान के निकट है सो उनकी ज़ुबान और कविता में शब-ए-मालवा झरता है.सायबा और अंबर लालम लाल जैसे शब्द मालव की थाती रहे है....लिकिन हाय ! अब कवि शिवमंगल सिंह सुमन,बालकवि बैरागी,नरेश मेहता,प्रभाकर माचवे,श्याम व्यास,श्याम परमार , अमीर ख़ां साहब , पं कुमार गंधर्व वाला मालवा कहां ? बंजर होती जा रही है मालवा की शस्य-श्यामला धरती.....पर्यावरण ... तहज़ीब और ज़ुबान ...सब रूखे होते जा रहे हैं.... ऐसे आलम में इन गीतों का ही तो आसरा है...विविध भारती ऐसे अनमोल मोती सहेज भी रही है और उन्हे परिवेश में गुंजायमान भी बना रही है... तू चंदा मैं चांदनी जैसी गीतों की गोद मे झूलते-झूलते हमेशा की नींद सो जाने को जी चाहता ह.

अतुल शर्मा said...

सुरेशजी ऐसे ही रस बरसाते रहें। इस पोस्ट के लिए शब्द नहीं हैं मेरे पास।