Wednesday, April 25, 2007

कुछ मजेदार...

नेटजाल पर चल रही ऊलजलूल की बहसों, थुक्का-फ़जीहत, जूतम-पैजार, तूतू-मैमै से दूर असली आनन्द है हास्य में....तो मजा लो....
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(१) एक बार एक सरकारी कर्मचारी बरसों से धूल खा रही फ़ाईलों की आलमारी को साफ़ कर रहा था, तभी अचानक उसके हाथ एक चिराग लगा, जो कि अलादीन का चिराग था । उत्सुकतावश उसने उसे घिसा तो उसमें से जिन्न प्रकट हुआ और बोला कि तीन वर माँगो, पूरे किये जायेंगे...सरकारी कर्मचारी खुश हो गया... उसने बोला सबसे पहला - व्हाईट हाऊस मेरा हो जाये....ज्ज्ज्जूम वह व्हाईट हाऊस पहुँच गया... फ़िर उसने कहा - अब नौकरों-चाकरों की फ़ौज और बढिया सा हवाई जहाज.... वह भी प्रकट हो गया... फ़िर उसने कहा कि अब कुछ ऐसी व्यवस्था करो कि मुझे जिन्दगी भर कोई काम ना करना पडे....ज्ज्ज्ज्ज्जूम..... वह पलक झपकते ही अपने उसी सरकारी ऑफ़िस में उसी कुर्सी पर पहुँच गया...
सबक - मुँह खोलने से पहले दस बार सोचो
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(२) ऐसा ही एक अलादीन का चिराग एक बार किसी कारपोरेट ऑफ़िस में तीन लोगों को एक साथ मिला...जिसमें से दो सेल्समैन थे और एक उनका मैनेजर.... घिसने पर जिन्न प्रकट हुआ और बोला कि तुम तीन लोग हो इसलिये एक-एक वरदान माँग लो.... पहले मैं... पहले मैं... करते हुए दोनो सेल्समैन जोर-जोर से बोल पडे... पहले ने कहा - मुझे स्विटजरलैण्ड की हसीन वादियाँ और ढेर सारी वोदका चाहिये... तत्काल वह गायब होकर स्विटजरलैण्ड पहुंच गया.... दूसरा सेल्समैन कहाँ पीछे रहने वाला था... जल्दी-जल्दी में वह भी बोला....मुझे भी एक शांत निर्जन द्वीप और दो-चार सुन्दरियों का साथ चाहिये... वह भी गायब हो गया... फ़िर मैनेजर का नम्बर आया.... वह बोला - मैं चाहता हूँ कि वे दोनों बेवकूफ़ वापस अपने काम पर आ जायें....
सबक - जैसे घोडे के पीछे नहीं चलना चाहिये वैसे ही बॉस के आगे भी नहीं.....
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शासन व्यवस्था :
एक बार एक बच्चे ने अपने पिता से पूछा कि पापा - शासन व्यवस्था किसे कहते हैं ? और यह कैसे चलती है ? पिता ने सोचा कि बच्चे को अच्छी तरह से उदाहरण देकर समझायें तो ज्यादा सही समझेगा... पिता बोले....देखो मैं कमा कर लाता हूँ तो मैं हुआ "उद्योगपति" या "व्यापारी", तुम्हारी माँ उस पैसे को कैसे खर्चा करना है यह देखती है इसलिये वह "सरकार" है... हमारे घर का नौकर रामू "श्रमिक या कामगार" है...तुम्हारा दो माह का भाई "देश की अगली पीढी" है और तुम "आम नागरिक" हो...आया समझ में... बालक को कुछ खास समझ में नहीं आया । उसी रात बालक की नींद खुली तो उसने पाया कि उसका भाई दूध के लिये रो रहा है, वह माँ के कमरे में गया तो वह सो रही थी, फ़िर उसने पिता को ढूँढा तो पाया कि वे ठीक से पैर नहीं दबाने के लिये रामू को पीट रहे हैं, वह चुपचाप अपने कमरे में आय और अपने भाई को दूध पिलाकर सो गया.... अगली सुबह पिता ने पूछा - अब तुम बताओ शासन व्यवस्था कैसे चलती है ? बालक बोला - अब मैं समझ गया....जब "सरकार" सो रही होती है, "उद्योगपति" बुरी तरह से "श्रमिक" का शोषण करता है, जबकि "देश की अगली पीढी" अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिये भी तरसती है और सबसे ज्यादा भुगतना पडता है "आम नागरिक" को.....

कैसी रही... और कुछ अगले अंकों में....

9 comments:

संजय बेंगाणी said...

वाह! बहुत खुब.

पहले वाले ने खुब हँसाया तो अंतिम वाला जबरदस्त रहा.

धुरविरोधी said...

वाकई में
"ऊलजलूल की बहसों, थुक्का-फ़जीहत, जूतम-पैजार, तूतू-मैमै से दूर असली आनन्द"

अतुल शर्मा said...

ये वाकई असली आनंद है।

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया. आखिरी परिभाषा में दम है. :)

Raj said...

Bahi Aap mey dham hay, Aap ki Shashan veywastha mey bhi dham hay bahut khub

Shrish said...

बहुत बढ़िया, मजा आ गया। आखिरी वाला तो बहुत धांसू था, लगे रहिए।

उन्मुक्त said...

:-)

yunus said...

प्रिय सुरेश भाई आप तो गजब ढा रहे हैं । कल नाईट शिफ्ट में था सबेरे सबेरे ही आपकी पोस्‍ट देखी । सुंदर है । पहला वाला मुझे सबसे अच्‍छा लगा । और हां पता नहीं, तीसरे वाले का इस्‍तेमाल तो हास्‍य टोली के अहमदाबादी पराग कंसारा कर रहे हैं । विविध भारती में भी सुना गये । पर कुछ भी हो, आप कर तो कमाल रहे हैं । महाकाल की नगरी से आप पटाखे फोड़े जा रहे हैं । और नज़ारा देख रहे हैं ।

notepad said...

बहुत सही जोकियाए हो।
आपके ब्लॉग का दर्शन बच्चो की स्ट्राबेरी टॉफी के रैपर जैसा आकर्षक है