Monday, April 30, 2007

Soharabuddin Encounter Case and Gujarat Police

सोहराबुद्दीन एनकाउंटर और "गंगाजल"

सोहराब के फ़र्जी एनकाऊँटर पर बडा बावेला मचा हुआ है और गुजरात पुलिस के कुछ अधिकारियों पर केस भी चालू हो गया है (हालाँकि सोहराब पर हल्ला ज्यादा इसलिये मचा है क्योंकि एक तो वह मुसलमान है और फ़िर गुजरात में मारा गया है, तो फ़िर क्या कहने... सेकुलरवादियों और मानवाधिकारवादियों के पास काम ही काम)... बहरहाल यह बहस का अलग विषय है... मेरा फ़ोकस है सोहराब पर हुई कार्रवाई । शायद कुछ लोग ना जानते हों, लेकिन उज्जैन के लोग जानते हैं कि सोहराब का सपना था मालवा का डॉन बनना, उसके घर के कुँए से एके ५६ और पिस्तौलें भी बरामद हुई थीं और पहले से उस पर कई आपराधिक मामले चल रहे थे, कुल मिलाकर सोहराब कोई संत-महात्मा या पीर-फ़कीर नहीं था, ना ही कोई आम सीधा-सादा इन्सान...कुछ समय पहले आई थी फ़िल्म गंगाजल । जैसा कि सब जानते हैं फ़िल्म की पृष्ठभूमि भागलपुर (बिहार) के आँखफ़ोडवा कांड पर आधारित थी, जिसमें पुलिस ने जेल में बन्द विचाराधीन कैदियों की आँखों में तेजाब डालकर उन्हें अन्धा कर दिया था और उसे "गंगाजल" नाम दिया था । बाद में उस घटना की जाँच भी हुई थी, लेकिन तत्कालीन सरकार को जनता के विरोध के कारण मामले को रफ़ा-दफ़ा करना पडा । जनता यह समझती थी कि उन अपराधियों के साथ पुलिस ने ठीक किया है । उनमें से अधिकतर आरोपी हत्या और बलात्कार के आरोपी थे ।

यह घटना वैसे तो साफ़-साफ़ कानून को अपने हाथ में लेने की थी, लेकिन जनता के खुले समर्थन के कारण स्थिति अजीब सी हो गई थी । एक और फ़िल्म है जिसका नाम है "अब तक छप्पन" । फ़िल्म मुम्बई पुलिस के इंस्पेक्टर दया नायक के जीवन पर आधारित थी, जिन्होंने अब तक छप्पन खूँखार अपराधियों को मौत के घाट उतार दिया है, उन्हें मुम्बई पुलिस एन्काउण्टर विशेषज्ञ मानती है (हालाँकि दया नायक फ़िलहाल कई आरोपों से घिरे हुए हैं, जिसके पीछे भी राजनैतिक या उनके आला अफ़सरों का हाथ हो सकता है).... ऐसे ही कुछ वर्षों पहले एक फ़िल्म आई थी "यशवन्त", जिसमें नाना पाटेकर ने ही पुलिस इंस्पेक्टर का रोल निभाया था, उस फ़िल्म के एक दृश्य में एक पत्रकार अपने अखबार में इंस्पेक्टर यशवन्त की कार्यशैली की कडी आलोचना करता है, कि यह इंस्पेक्टर अपराधियों के साथ बहुत मारपीट करता है, जानवरों की तरह से पेश आता है, इसे मानवाधिकारों का कोई खयाल नहीं है आदि-आदि । उसी पत्रकार का बैग एक बार चोरी हो जाता है, वह पत्रकार यशवन्त के थाने में रिपोर्ट लिखाने जाता है, यशवन्त उससे वारदात का इलाका पूछता है और बैठने को कहता है, फ़िर हवलदार को आदेश देता है कि फ़लाँ व्यक्ति को पकड़कर लाओ । एक गुण्डे को थाने में लाया जाता है, यशवन्त उससे बडे प्यार से पूछता है कि पत्रकार साहब का बैग तूने चुराया है, उन्हें वापस कर दे, जैसा कि उसे अपेक्षित होता है, गुण्डा मना करता है कि मैने कोई बैग नहीं चुराया है । फ़िर भी यशवन्त उस गुण्डे को ठंडा पिलाता है और बिरयानी भी खिलाता है और फ़िर एक बार प्यार से पूछता है, गुण्डा फ़िर इनकार करता है । फ़िर यशवन्त अपने पुलिसिया अन्दाज में गुण्डे को जोरदार तमाचे रसीद करता है, और गुण्डा तत्काल उस पत्रकार का बैग का पता बता देता है । यह तो हुई फ़िल्मों की बात, लेकिन सामान्य जनजीवन में भी हमारे सामने जे.एफ़.रिबेरो, केपीएस गिल और किरण बेदी जैसे साक्षात उदाहरण हैं, जिन्होने अपराधियों, आतंकवादियों और कानून तोडने वालों के खिलाफ़ जंग सफ़लतापूर्वक जीती है ।


उपरोक्त उदाहरण देने का मकसद सिर्फ़ यही सवाल उठाना है, कि अपराधियों के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिये ? क्या मानवाधिकार सिर्फ़ गुण्डे-बदमाशों के लिये हैं, जान पर खेलने वाले और चौबीस घण्टे "ऑन ड्यूटी" रहने वाले पुलिस वालों के लिये नहीं ? अपराधियों के साथ मानवीय व्यवहार किया जाना चाहिये, परन्तु उसकी सीमा क्या हो, यह कौन तय करेगा, और कैसे ? इस बात की क्या गारण्टी है कि बिहार की उन जेलों में बन्द वे हत्यारे और बलात्कारी (जिनको सजा भी हो पाती या नहीं यह कहना मुश्किल है) मानवीय व्यवहार पाकर वे सुधर जाते ? क्या जेल से बाहर आकर वे पुनः वैसा ही घृणित अपराध नहीं करते ? ऐसे आदतन अपराधियों को यदि कतिपय पुलिसकर्मियों ने अन्धा करके भविष्य के लिये निष्क्रिय कर दिया, तो इससे समाज का भला हुआ या नहीं ? मुम्बई पुलिस के नायाब इंस्पेक्टर दया नायक को रोज नया रास्ता बदलकर ऑफ़िस जाना पडता है, वे अपने परिवार के साथ सहज रूप से समय नहीं बिता सकते, चौराहे पर खडे होकर चाट-पकौडी नहीं खा सकते, भरा हुआ रिवाल्वर हरदम (सोते समय भी) उनके पास होता है चाहे वे ड्यूटी पर हों या नहीं । ऐसे में सवाल उठता है कि क्या उनके कोई मानवाधिकार नहीं हैं ? क्या उन्हें आम जिन्दगी जीने का हक नहीं है ? या उनका यह कसूर है कि उन्होंने पुलिस की नौकरी करके कुछ गुण्डों को खत्म कर दिया ? जबकि तथाकथित "ए" क्लास कैदी (?) (मुझे तो यह अवधारणा भी हास्यास्पद लगती है... "ए" क्लास कैदी क्या होता है और क्यों होता है, पता नहीं) को घर से लाया खाना, टीवी, मोबाईल की सुविधा उपलब्ध है, यह भेदभाव क्यों ? अपराधी को पकडने वाले ईमानदार पुलिस अफ़सर पर सदा तलवार लटकती रहे और अपराधी जेल में चिकन उडाये ? जैसा कि "यशवन्त" फ़िल्म के उदाहरण से स्पष्ट है कि अपराधी को पुलिस से डरना चाहिये, यदि पुलिस अफ़सर को यकीन है और उसके पास पुख्ता जानकारी है कि फ़लाँ व्यक्ति अपराधी है, तो अपराधी से सच उगलवाने की पूरी छूट उसे मिलनी चाहिये, जबकि हकीकत में आज उलटा हो रहा है ।

पुलिसवाले डरने लगे हैं कि कहीं अपने ऊपर केस न बन जाये, विभागीय जाँच न प्रारम्भ हो जाये, कहीं लॉक-अप में मर गया तो जिन्दगी बीत जायेगी कोर्ट के चक्कर खाते-खाते, कोई रसूखदार गुण्डा (लगभग सभी रसूखदार ही होते हैं) प्रेस के सामने मानवाधिकार की गुहार ना लगाने लग जाये । इस सबसे बचने के बाद सबूत इकठ्ठा करना, लम्बी कागजी और अदालती कार्रवाईयों को झेलना और फ़िर उसके बाद उसी गुण्डे को बाइज्जत बरी होते देखना, फ़िर कुछ वर्षों बाद उसी गुण्डे को विधायक या मंत्री बने देखकर उसे सेल्यूट करना, किसी भी पुलिस वाले के लिये यह एक भयानक दुःस्वप्न के समान है, जिसे केवल और केवल भुक्तभोगी ही जान सकता है । ऐसे में दबाव अब पुलिस पर बनने लगा है और गुण्डे ऐश करते हैं । पुलिस का "जलवा" अब कम होने लगा है । पंजाब में जब आतंकवाद अपने चरम पर था, तब केपीएस गिल ने उसपर काबू पाया, परन्तु जैसे ही आतंकवाद खत्म हुआ मानवाधिकारवादी सक्रिय हुए, कई पुलिस वालों को प्रताडित किया गया, कई पर मुकदमे चलाये गये, एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने रेल से कटकर आत्महत्या तक कर ली । कहा गया कि उन्होंने मासूम लोगों को पूछताछ के नाम पर यातनायें दीं, हत्यायें कीं आतंकवाद को रोकने के नाम पर कई युवाओं को गायब करवा दिया... लेकिन परिणाम किसी ने नहीं देखा... अपनी जान हथेली पर लेकर आतंकवाद को खत्म करने वाले पुलिस अधिकारियों को यह इनाम, ऐसा सलूक । माना कि उनसे भी गलतियाँ हुई होंगी हो सकता है कि गेहूँ के साथ घुन भी पिस गया हो... लेकिन ऐसा तो युद्धकाल में होता ही है, तत्कालीन पंजाब के हालात शांतिकाल के नहीं थे ऐसी स्थिति में उस पुलिस अधिकारी के खिलाफ़ सुनवाई करते वक्त यह बात ध्यान में रखना चाहिये । काँटे को निकालने के लिये सुई का इस्तेमाल करना ही पडता है, एक फ़ूल की पत्ती से काँटा नहीं निकाला जा सकता । तात्पर्य यह कि एक सीमा तक तो दया, नरमी, मानवता आदि ठीक है, लेकिन जब पानी सर से ऊपर हो जाये अथवा गुण्डे पुलिस पर भारी पडने लगें तब दया नायक वाला तरीका ही ठीक है । किसी मामले में यदि सन्देह है तब तो शुरुआत में नर्मी दिखाई जा सकती है, लेकिन किसी के पास से एके ४७, लाखों की नोटों की गड्डियाँ, दारू की बोतलों के क्रेट बरामद हो रहे हों तब तो उससे पुलिसिया अंदाज में ही "व्यवहार" होना चाहिये । उस व्यक्ति की मंशा तो साफ़ दिख रही है, उसके साथ रियायत बरतना तो मूर्खता ही है । ऐसे में आतंकवादियों को पहले तो मुश्किल से पकडना, भारी सुरक्षा व्यवस्था बनाये रखकर उन्हें वर्षों तक जेल में रखना आदि कितने खर्चे का काम है ।

यदि कल्पना के लिये मान लिया जाये कि कंधार प्रकरण के वक्त भारत सरकार स्पष्ट कह देती कि यदि सभी यात्रियों को नहीं छोडा तो जिन आतंकवादियों को छोडने की माँग कर रहे हो सबसे पहले उन्हें ही चौराहे पर लाकर गोली से उडा देंगे... तो कैसा सन्देश जाता...और ये तो बाद की बात है, वर्षों पहले यदि रूबिया सईद के बदले में आतंकवादियों को मार दिया जाता भले ही रुबिया शहीद हो जातीं तो आज कश्मीर और भारत में आतंकवाद का इतिहास ही कुछ और ही होता, लेकिन हमारी लोकतंत्री (?) शासन व्यवस्था इतनी लुंजपुंज है कि चाहे जो आकर सरकारों को झुकने को कहता है और झुकने की बजाय सरकारें लेट जाती हैं । क्या कभी हम इतने कठोर बनेंगे कि गुण्डे बदमाश, बलात्कारी, आतंकवादी अपराध करने से पहले दस बार अपने अंजाम के बारे में सोचे । आज चारों तरफ़ अफ़जल को माफ़ी देने की बात की जा रही है, सिर्फ़ कल्पना ही की जा सकती है कि उन सैन्य परिवारों पर क्या गुजरती होगी जो उस हमले में शहीद हुए । लेकिन राजनीति इतने नीचे गिर चुकी है कि उसके बारे में कुछ कहना ही बेकार है । लेकिन समस्या का हल तो ढूँढना ही होगा, और मेरे अनुसार आज का समय भी युद्ध काल ही है इसलिये अब "ऑपरेशन गंगाजल - भाग २" का वक्त आ गया है । यदि हरेक शहर में दो-चार ईमानदार पुलिस वाले भी मिल जायें, जो दया नायक वाले तरीके में विश्वास रखते हों, तो देखते- देखते असामाजिक तत्वों में खौफ़ फ़ैलते देर नहीं लगेगी । "ईमानदार पुलिस वाले" शब्द का उपयोग इसलिये किया, क्योंकि यह पूरी तरह से उन्हीं पर निर्भर होगा, कि वे किस गुण्डे-बदमाश को "निष्क्रिय" करना चाहते हैं, इसलिये यह उनकी नैतिक जिम्मेदारी है कि पहले वे पूरी तरह से आश्वस्त हो जायें कि वाकई यह व्यक्ति समाज के लिये एक खतरा बन चुका है और आगे भी न तो आम जनता को और ना ही पुलिस को यह चैन से रहने देगा, उस व्यक्ति को किसी ऐसे तरीके से समाप्त किया जाये कि "साँप भी मर जाये और लाठी भी ना टूटे" ।

अब ये तो पुलिस वालों को बताने की जरूरत नहीं है कि ऐसे "सुरक्षित तरीके" क्या और कैसे होने चाहिये...."गंगाजल" या किसी ऐसे जहर का इंजेक्शन जिससे वे धीरे-धीरे २-४ महीनों में एडि़याँ रगड-रगड कर घर में ही मर जायें (यह काम आधुनिक "टॉक्सिकोलॉजी" के जरिये आसानी से हो सकता है) (उन्हें आसान मौत मिलना भी नहीं चाहिये), या फ़िर ऐसी कोई दवाई, जिससे उन्हें "पैरेलिसिस" हो जाये... या कुछ और । मतलब तो सिर्फ़ यही है कि पुलिस का काम है समाज की गंदगी की सफ़ाई करना, चाहे जैसे भी हो आम जनता का भला होना चाहिये बस.... हो सकता है कि ऐसे काम करते वक्त एकाध गलत केस भी हो जाये, लेकिन जैसा कि मैने पहले ही कहा है कि "पूरी तरह से आश्वस्त होने के बाद ही" ऐसा किया जाना उचित होगा । मानवाधिकारवादियों से घबराने की कोई जरूरत नहीं है, हमारे देश में तो जब अफ़जल को भी माफ़ करने की बात की जा रही है, हो सकता है कि कल अब्दुल करीम तेलगी, अबू सलेम और दाऊद को भी मानवीयता (?) के नाते आम माफ़ी देने की माँग उठने लगे.... हाँ... इस मामले में मैं पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष हूँ और चाहता हूँ कि तेलगी, सलेम, दाऊद के साथ-साथ बबलू श्रीवास्तव, छोटा राजन आदि को भी उसी तरीके से निपटाया जाये...ताकि सेकुलरवादियों (???) को शिकायत का मौका ना मिले....

11 comments:

Sanjeet Tripathi said...

सामान्य अपराधियों से निपटना पुलिस के लिए उतना मुश्किल नही है जितना कि राजनैतिक अपराधियों से।
सवाल यह है कि राजनीति का अपराधीकरण या अपराधियों का राजनीतिकरण कैसे रोका जा सकता है।
कहीं ना कहीं से आपने इस लेख में आम आदमी को जुबान देने की कोशिश की है। साधुवाद
आशा है कि आपने मेरे पन्ने से पराशर लाईट अब डाउनलोड कर लिया होगा

Shrish said...

सही लिखा है। इन तथाकथित मानवाधिकारवादियों के सब मानवाधिकार अपराधियों के लिए ही हैं। पुलिसियों और पीड़ितों के लिए नहीं।

अनुनाद सिंह said...

जो देश जेहादी आतंक का सदियों से शिकार है, उस देश में जेहादियों को मारने पर विधवा विलाप करना समझ में नहीं आता।

शठे शाठ्यं समाचरेत!

चैतन्य said...

सही कहा, गुरु !

Mired Mirage said...

शायद आप सही हों किन्तु आशा है कि घुन बनकर शहीद होने को भी तैयार होंगे ।
घुघूती बासूती

अतुल शर्मा said...

आपने बिलकुल सही लिखा है। मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के कारण ही कई बार पुलिस अपने काम को अंजाम नहीं दे पाती है।

Noor Khan said...

मुझे भी समझ नहीं आया की शहाबुद्दीन जैसे गुंडे के लिए इतना हल्ला क्यूं मचाया जा रहा है, पर उसकी पत्नी की हत्या अनुचित थी

Jeet Bhargava said...

भाई सोराबुद्दीन के साथ ही उदयपुर का तुलसी राम भी एन्काउन्टर में मारा गया था. लेकिन आज तक किसी भी मीडिया ने उसकी सुध लेने की कोशिश नहीं की! बेचारे का दोष यही था कि वह किसी वोट बैंक वाली जात-जमात से नहीं था. सोराबुद्दीन क्या मारा गया, मीडिया ने ऐसा उछाला मानो वह शहीद भगतसिंह के बराबर हो. जे हो सेकुलरिज्म !

sisir chandra said...

चिपूलकर जी आप ने सही मुद्दा चुना है. सोहराबुद्दीन का बचाओ उचित नहीं. लेकिन मैं पुलिस को दूध का धुला नहीं समझता. पुलिस प्रारंभ में ऐसी ही छुट मांगती है और जब मिल जाये तो निर्दोषों पर ऐसे हथकंडे उपयोग करती है. मेरा स्पष्ट मानना है कि पुलिस को किसी भी प्रकार के ऐसे टार्चर करने के अधिकार खतरनाक होगा. आज भी पुलिस का आम लोगों से व्यवहार काफी ख़राब होता है और रसूखदार से बिन बिके गुलाम कि तरह पेश आते हैं. ऐसे भ्रष्ट पुलिस व्यवस्था में विश्वास करके आप कहीं और गहरे दलदल में तो नहीं फसने जा रहे हैं? क्योंकि उँगलियों में गिने जा सकने लायक ईमानदार पुलिस हैं. सिर्फ इनको देखकर अतिरिक्त अधिकार पुलिस को नहीं दिए जा सकते.

वैसे तो अंसार बरनी पाकिस्तान के जाने माने मानवाधिकारवादी हैं, लेकिन सिर्फ उनके होने भर से पाक को पाकसाफ होने का प्रमाणपत्र नहीं दिया जा सकता. आपके द्वारा लिखे गए वाई पी सिंह साहब का interview देखा था, जिसको देखकर पुलिस को अधिकार हरगिज़ नहीं दिया जा सकता? आपको पता ही होगा कि पुलिस ने बहुत ज्यदा फर्जी मुठभेड़ शांत राज्यों में किये हैं और पुलिस तो सरकार कि भोंपू होती है, ऐसे अधिकार मिलने से ये चुन चुन कर सरकार विरोधियों का सफाया शुरू कर सकते हैं? जब तक हम पुलिस से आश्वस्त नहीं हो जाते इन्हें कोई अधिकार नहीं जाना चाहिए. ऐसे अधिकार मिलने से पुलिस लोगों से पैसा ऐंठना भी शुरू कर सकती है. इसलिए इन पुलिस वालों से दूर ही रहो.

JANARDAN MISHRA said...

एक कहावत है "गरीब कि बीबी पुरे गाँव कि भाभी" सायद गुजरात को भी कुछ निकम्मे और धूर्त सेक्युलर वादियो ने गुजरात को गरीब कि बीबी समज लिया हैं.

Anonymous said...

jabtak is desh me congress tathaa is gandhi neharu gharane ki sarkaar rahegi tabtak yeh chalta hi rahegaa,soharabuddin ke sath jo Tulsiram maara gayaa isapar manavadhikar vale chup hain.congress ko Sohrabuddin kes ho yaa batala muthbhed sab farji lagate hain.inhe sirf apani vote bank ki chintaa hain,jis modi ki ye nindaa karte hain us gujarath rajya me pichhale 10 saal se yek baar bhi karfu nahi lagaa hain,jab ki congress shasit rajyome kai baar dange huye hain.sabhi hindu samaj ne sangathit hokar ispar vichar karnaa chahiye.