Wednesday, April 11, 2007

पूरा दृश्य देखिये अधूरा नहीं...

एक गाँव में एक बूढा़ किसान रहता था । वह बहुत गरीब था, लेकिन फ़िर भी उसके पडोसी उससे बहुत जलते थे, क्योंकि उस बूढे के पास एक शानदार सफ़ेद घोडा था । अनेक बार वहाँ के राजा ने किसान को उस घोडे को खरीदने के लिये आकर्षक कीमत देने की पेशकश की थी, लेकिन हमेशा ही उसने राजा को मना कर दिया था । किसान का कहना था, "यह घोडा मात्र एक जानवर नहीं है, यह मेरा मित्र है, भला मित्र को कोई बेचता है ?" उस किसान ने बेहद गरीबी के बावजूद घोडे को नहीं बेचा । एक दिन सुबह उसने देखा कि घोडा अपने अस्तबल से गायब हो गया था । सब गाँव वाले उसके घर एकत्रित हुए और शोक संवेदना व्यक्त करते हुए कहा, 'तुम बहुत मूर्ख हो, हम जानते थे कि इतना शानदार घोडा एक ना एक दिन चोरी हो जायेगा । तुम इतने गरीब हो, भला इतने कीमती घोडे की रखवाली कैसे कर सकते थे ? अब घोडा चला गया, यह दैवीय श्राप और तुम्हारा दुर्भाग्य है"... बूढे ने जवाब दिया, 'कृपया भविष्य की बात ना करें, सिर्फ़ यह कहें कि घोडा अपने अस्तबल में नहीं है, क्योंकि यही सच है, बाकी की सारी बातें और वचन आपके अपने स्वघोषित निर्णय हैं, आपको कैसे मालूम कि यह मेरे लिये दुर्भाग्य है ? आपको क्या मालूम कि भविष्य में क्या होने वाला है ?.. सारे गाँव वाले खूब हँसे, और उन्होंने सोचा बूढा पागल हो गया है । लगभग पन्द्रह दिनों के बाद वह घोडा अचानक वापस आ गया, वह चोरी नहीं हुआ था, बल्कि जंगल की तरफ़ भाग गया था, और जब वह वापस आया तो अपने साथा १०-१२ जंगली घोडों को भी ले आया । फ़िर सारे गाँव वाले एकत्रित हुए और बोले,, महाशय हमें माफ़ कर दीजिये, आप ही सही थे..वह आपक दुर्भाग्य नहीं था, बल्कि सौभाग्य था । बूढा फ़िर वही बोला, आप लोग फ़िर गलती कर रहे हैं, हकीकत सिर्फ़ यही है कि मेरे घोडे के वापस आने से मैं खुश हूँ, बस । भीड़ शांत हो गई, लेकिन मन ही मन सभी सोचते रहे कि यह वाकई बूढे का सौभाग्य है । उस बूढे किसान का एक जवान पुत्र था, उसने सोचा कि मैं इन जंगली घोडों को प्रशिक्षित करूँ । एक दिन उसका बेटा घोडों को प्रशिक्षित करते समय गिर गया और उसके पैर टूट गये । एक बार फ़िर गाँव वाले उसके घर गये और बोले, भाई तुम सही कहते हो, यह दुर्भाग्य ही था, तुम्हारा एकमात्र जवान बेटा जो कि बुढापे का सहारा था, अब विकलांग हो गया... तुम तो अब और भी गरीब हो गये हो । बूढा बोला, क्या आप लोग वर्तमान में नहीं रह सकते ? आप लोगों को वास्तविकता देखनी चाहिये, सिर्फ़ एक घटना हुई है और उसे उसी तरह से देखना चाहिये...। कुछ महीनों के पश्चात उस देश में युद्ध प्रारम्भ हो गया और राजा ने सभी नौजवानों को जबरदस्ती सेना में भरती कर लिया, लोग-बाग बडे निराश हो गये, उनके पुत्रों के वापस आने की सम्भावनायें क्षीण हो गईं । वे फ़िर उस किसान से बोले..तुम्हारा पुत्र भले विकलांग हो, लेकिन कम से कम बुढापे में वह तुम्हारे पास ही रहेगा । उसकी टाँग का टूटना भी एक सौभाग्य ही रहा... किसान ने अपना माथा ठोंक लिया और बोला.. आप लोगों को समझाना बहुत मुश्किल है । आप लोग किसी भी घटना का एक ही अंश ही देखते हैं और उसे सौभाग्य या दुर्भाग्य से जोडकर भविष्य की बातें करने लगते हैं ।
इस कहानी को कहने का तात्पर्य यही है कि हमेशा देखा गया है कि हम बातों को सम्पूर्णता में ना लेकर उन्हें एक खण्ड विशेष में देखते हैं । किसी भी घटना या व्यक्ति के बारे में निर्णय लेते वक्त या उसके बारे में सोचते समत हमें समग्रता से विचार करना चाहिये । इस सिद्धांत को एक बार आप अपने जीवन में उतार लें तो आपके दृष्टिकोण में परिवर्तन आ जायेगा. आप महसूस करेंगे कि आपके सापेक्ष अनुभव बदल गये हैं । आपका गुस्सा या भय, सहानुभूति में परिवर्तित हो गया है । कोई भी घटना या दुर्घटना अपने आप में सम्पूर्ण नहीं होती । वह मात्र होनी का एक अंश या खंड है, लेकिन हम लोग अक्सर किसी भी व्यक्ति को या घटना को सम्पूर्ण मानकर तत्काल उस पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर कर देते हैं । व्यक्ति, दूसरे के या अपने साथ हुई किसी भी बात को लेकर भविष्यवादी टिप्पणियाँ करने लगता है, जबकि असल में वह समूचा घटनाक्रम मात्र एक अंश ही होता है । जरा इस बात पर गौर करें कि आप किसी अच्छे होटल में खाना खाने गये हैं । वहाँ पर वेटर आपकी ओर पूरा ध्यान नहीं देता, ना ही आपका ऑर्डर ठीक से परोसता है और तो और आपके कपडों पर दाल गिरा देता है । आप बेहद गुस्सा होते हैं, तत्काल मैनेजर को बुलाकर उस वेटर को ज़लील करते हैं, और उसे टिप दिये बगैर तमतमाते हुए वापस आ जाते हैं... यह घटना का मात्र एक टुकडा था, एक पहलू । इसी घटनाक्रम को जब आप निरपेक्ष होकर सम्पूर्णता के साथ देखते हैं, तो पाते हैं कि उस वेटर की पत्नी की हाल ही में मौत हुई है और अपने तीन बच्चों की खातिर वह कडी मेहनत कर रहा है । इसी विचार के साथ ही आपका दृष्टिकोण बदल जाता है, वह वेटर आपको निकम्मा और नालायक लगने की बजाय दया और सहानुभूति का पात्र लगने लगता है । आप उसकी खराब सर्विस और दाल गिराने की घटना को भूलकर उसे माफ़ कर देते हैं, लेकिन यह तभी होगा जब आप किसी घटना को उसके बाहरी रूप में न देखें बल्कि सम्पूर्णता के साथ और अपने दिमाग में प्रेम के रोशनदान से झाँककर देखें ।
हममें से अधिकतर लोग प्रत्येक बात को एक विशेष साँचे में रखकर देखते हैं और बगैर सोचे-समझे कुछ भी बोल देते हैं । हम व्यक्ति का आकलन समग्रता में नहीं करते । फ़लाँ व्यक्ति बहुत गुस्सैल है, या बहुत भ्रष्ट है, या वह बहुत पैसे वाला है, या एकदम निकम्मा है आदि-आदि का निर्णय हम स्वयं ही तत्काल कर लेते हैं, जबकि परिस्थितियों, पालन-पोषण, क्रियाकलाप, बुद्धि आदि सभी बातों को साथ में रखकर हम जब व्यक्ति को तौलेंगे, तभी हम किसी व्यक्ति का आकलन सही तरीके से कर सकेंगे । तात्पर्य यह कि हम यदि खामख्वाह अनुमानित विचार न बनायें तो ज्यादा खुश रहेंगे । अनुमान नहीं लगाने से आप सामने वाले को जैसा का तैसा ग्रहण करते हैं, साथ ही साथ आप अपने अन्दर भी झाँकते हैं और सुधार करते हैं । हम जो भी करते हैं या कहते हैं, वह हमें लगभग उसी रूप में वापस मिलता है । आप आलोचना करेंगे या गालियाँ देंगे, तो वे आप पर पलटकर आयेंगी । जबकि प्रातः भ्रमण के वक्त सामने वाले से जब हम राम-राम, अस्सलाम अलैकुम या गुड मॉर्निंग कहते हैं, तो बदले में हमें राम-राम, हरिओम, वालेकुम-अस्सलाम और मॉर्निंग-मॉर्निंग ही सुनाई देता है ।

1 comment:

Akhil said...

This is true. If you read book by Stephen R Covey “The Seven Habbits of highly effective people”, he explained about “The power of a Paradigm Shift” though the story is different but message is same.