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Thursday 5 April 2007

पुणेरी साईनबोर्ड

क्या आप कभी पूना गये हैं ? यदि जायें तो उस पूना में ना जायें जहाँ ऊँचे-ऊँचे, भव्य और चमकदार कम्पनियों के ऑफ़िस मौजूद हैं, वह पूना आम आदमी के लिये नहीं है. पूना की तस्वीर विगत दस वर्षों में आमूलचूल बदल गई है. बाहरी लोग (सॉफ़्टवेयर इंजीनियर) बहुतायत में पाये जाने लगे हैं, गले में अपनी-अपनी कम्पनी का "पट्टा" लटकाये हुए, अनाप-शनाप तनख्वाहें पाते हुए, दिन को रात और रात को दिन समझते और बनाते हुए...परन्तु यह असली पूना नहीं है... असली पूना बसता है.. पुणेरी लोगों में, उनके व्यवहार में, उनके आचार-विचार में, और यह असली पूना बसता है... पुराने पूना में, इस पुराने पूना के लोगों (खाँटी मराठियों) का एक विशिष्ट स्वभाव है, जो कि आप इन साईनबोर्डों को पढकर समझ ही जायेंगे, लेकिन जरा सा संक्षेप में समझाना आवश्यक है, ताकि आप इस पोस्ट का असली आनन्द ले सकें ।
"पुणेरी" यह शब्द आमतौर पर मराठी परिवारों में, पूना में रहने वाले और एक खास तरह का व्यवहार करने वाले के बारे में उपयोग किया जाता है. पूना के मूल महाराष्ट्रियन (चितपावन कोंकणस्थ ब्राह्मण) एक ईमानदार, अपने काम से काम रखने वाले, जितनी जरूरत होगी उतना ही बोलने वाले, अपने सिद्धांतों पर टिके और अडे़ रहने वाले, खामख्वाह ना किसी से पंगा लेने वाले ना आसानी से दोस्ती गाँठने वाले, आमतौर पर समय के पक्के पाबन्द, स्वावलम्बी आदि-आदि ऐसी "विशिष्ट" आदतों वाले लोग होते हैं (चितपावन कोकणस्थ ब्राह्मणों की खासियतों पर अलग से एक पोस्ट लिखूँगा) । अब जब ऐसे लोगों से भरे शहर में आम जनता के लिये कुछ साईनबोर्ड उनके द्वारा लगाये जाते हैं तो वे भी मजेदार और "हटकर" ही होंगे ना...वैसे तो मराठी कोई कठिन भाषा नहीं है (और मुम्बई और पूना के 'ग्लोबल विलेज' बन जाने के बाद तो काफ़ी लोगों को मराठी आती है) लेकिन फ़िर भी मैं उन साईनबोर्डों का हिन्दी अनुवाद करता चलूँगा ताकि अधिक से अधिक लोग इसका मजा ले सकें...



"बिल्डिंग को रंग करने की जिम्मेदारी किसी को नहीं सौंपी गई है, इसलिये दीवारों पर थूक कर यह जिम्मेदारी उठाने का कष्ट ना करें" (अब भला ऐसा तगडा साहित्यिक जूता पडने के बाद किसकी हिम्मत है जो दीवारों पर थूके)


"दरवाजे के बीच में खडे होकर फ़ालतू बातें नहीं करें, यह जगह बिजनेस के लिये है, कोई गप्पें मारने की जगह नहीं" (है कोई बेशर्म, जो वहाँ खडे़ होने की भी सोचे, बातें करना तो दूर)


यह एक लकडी की सीढी का चित्र है, लिखा है "कृपया पैर पटक-पटक नहीं चढें" (पहली सीढी चढते समय ही व्यक्ति बिल्ली बन जायेगा)


यह एक शादी के हॉल मे आमतौर पर पाया जाने वाला साईनबोर्ड है, जो बारातियों और घरातियों पर समान रूप से लागू होता है..सूचनायें (सूचना काहे की, एक तरह का आदेश ही होता है) इस प्रकार से हैं -
"पंगत समाप्ति के पश्चात सफ़ाई होने तक कुर्सियों पर नहीं बैठें"
"यदि भीड़ के कारण कुर्सी पकड़नी भी पडे़ तो सफ़ाई वालों का ख्याल रखें"
"आमतौर पर दो पंगतों के बीच १५ मिनट का अन्तर लगेगा"
"आपके जल्दबाजी करने से समय की बचत नहीं होने वाली"
"कृपया बीच में थाली छोड-छोडकर नहीं बैठें (अर्थात लाईन से ही बैठें)"
"पंगत पूरी भर जाने के बाद ही परोसगारी की जायेगी" (खाने से पहले ही जेल की याद आ गई ना..)


एक और शादी का हॉल - "शादी के दिन हॉल पूरी तरह से शाम पाँच बजे खाली करना होगा, यह सोच-समझ कर ही हॉल बुक करें"
"लक्ष्मीपूजन अथवा अन्य कोई भी कार्यक्रम तीन बजे के बाद नहीं किया जा सकेगा"
"केटरिंग सर्विस रात्रि के दस बजे बन्द करना होगा"


"यह कार्यालय है, अन्दर देखने जैसा कुछ भी नहीं है, अन्दर नहीं आयें" (इसे कहते हैं ईंट मारना)


"यहाँ वाहन खडे ना करें, किया तो हवा निकाली जायेगी"
"हम शाकाहारी हैं, लेकिन हमारा कुत्ता शाकाहारी नहीं है"
"डोरबेल सिर्फ़ तीन बार बजायें, हम बिजली का बिल भरते हैं"
"थूकें नहीं, सफ़ाई रखें, इन्सानों जैसा बर्ताव करें"
कुछ और बानगियाँ पेश हैं -
"वेटर को टिप नहीं दें, हम उसे तनख्वाह देते हैं"
"यहाँ पेशाब नहीं करें, अन्यथा 'परमानेंट इलाज' कर दिया जायेगा"
"वेदान्त होटल - लाईट जाने पर हमारे यहाँ केण्डल-लाईट डिनर की व्यवस्था की जाती है"
कार पर जमी धूल में ऊँगली से लिखा वाक्य - "अब तो पोंछो"
मन्दिर में एक बोर्ड - "कृपया ज्यादा देर नहीं बैठें, आप फ़ालतू होंगे, लेकिन यह बगीचा नहीं"
"बाहर जाते वक्त गेट बन्द करके जायें, नहीं करने पर अगली बार अन्दर नहीं आने दिया जायेगा"
एक दुकान पर - "कृपया उधार नहीं माँगें, अपमान हो सकता है"
शादी के एक और हॉल में - "पानी की व्यवस्था उधर की गई है, बच्चों को उधर ही ले जायें"
"ऊँची आवाज में टेप, ढोल बजाना मना है" (भाई शादी हो रही है या मय्यत)
तो भाईयों ऐसे अनेकों बोर्ड आपको आमतौर पर पूना में देखने को मिल जायेंगे । हम उत्तर भारत में रहने वालों को भले ही यह अजीब लगें, लेकिन इन सूचनाओं (आदेशों) से एक प्रकार का अनुशासन बना रहता है, जब सारे व्यक्ति अनुशासन का पालन करते हैं तो बाहरी व्यक्ति के लिये भी यह लाजमी हो जाता है कि वह भी उसका पालन करे, और ऐसे ही उस समाज की इमेज बनती है । अब यदि कोई "पुणेरी" अपनी वेबसाईट बनायेगा तो उसपर क्या सूचना लिखेगा -

"यह जोशी की वेबसाईट है, कृपया खामख्वाह इधर-उधर क्लिक करते ना बैठें" (मतलब वही है..अपने काम से काम रखें और फ़ालतू ना बैठें, साईट पर जरूरी काम करें और पतली गली से निकल लें)...कैसी रही ?
और एक अन्तिम सूचना एक NRP (Non Resident Puneri) की ओर से...
"यह पोस्ट पढने के बाद comment जरूर करें और अपने अन्य मित्रों को भी भेजें, अन्यथा आगे से आपको इस पेज पर झाँकने भी नहीं दिया जायेगा" (आखिर सभ्यता और अनुशासन भी कोई चीज है)

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