Wednesday, April 4, 2007

Lord Mcaulay and Britishers in India

लॉर्ड मैकाले के भाषण का एक अंश

आईये देखें कि सन 1835 में मैकाले भारत के बारे में क्या सोचते थे...



इसी नीति के तहत अंग्रेजों ने भारतीयों विशेषकर हिन्दुओं के मन में उनकी संस्कृति, उनके आचार-विचार, उनके रहन-सहन आदि के बारे में हीनभावना भरने की शुरुआत की और इसमें वे काफ़ी हद तक सफ़ल भी रहे । भारतीय इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करना, हिन्दुओं के भगवानों, उनके चिन्हों का मखौल उडाना, हिन्दू राजाओं को नाकारा बताना आदि इसी कडी़ का हिस्सा हैं..और अब राम जन्मभूमि पर प्रश्न उठाना, भारत-श्रीलंका के बीच बने राम-सेतु को तोडना, क्रॉस के चिन्ह वाले सिक्कों का प्रचलन शुरु करवाना आदि कई कदम उठाये जा रहे हैं...अंग्रेजों के ही मानस पुत्र "वामपन्थी" भी भारत, भारतीय संस्कृति, हिन्दुत्व के बारे में दुष्प्रचार करने में लगे हुए हैं...लेकिन वे कभी सफ़ल नहीं होंगे..
(यदि चित्र साफ़ और बडा नहीं दिख रहा हो तो कृपया मुझसे सम्पर्क करें, मैं ई-मेल भेज दूँगा)

9 comments:

Mired Mirage said...

धन्यवाद पढ़ तो लिया किन्तु बहुत कठिन लगा पढ़ना।
किसी को भी दबाना है तो पहला काम यह करना होता है कि उसका आत्मसम्मान खत्म कर दो। अंग्रेजों ने भी यही किया। और वे यहाँ धन कमाने, साम्राज्य करने आये थे कोई हमसे मिलने या हमारी सभ्यता सीखने तो नहीं। सो कोई आश्चर्य नहीं।
घुघूती बासूती

Srijan Shilpi said...

बंधु, यदि आप उक्त दस्तावेज का स्रोत भी बता सकें तो इस पोस्ट का महत्व कुछ और बढ़ जाएगा।

संजय बेंगाणी said...

राम सेतु मानवता की धरोधर है. इसका महत्व धर्म विवेश से कहीं अधिक है.
अपनी धरोहर बचानी होगी.

अनुनाद सिंह said...

हिन्दुस्तान भी धीरे-धीरे आत्मसम्मान एवं अन्य प्रकार के 'साफ़्ट पावर' का महत्व समझ जायेगा।

मैकाले के सपनो को असफल बनाने का कार्य हर हिन्दुस्तानी के लिये पवित्र कार्य है।

आपने इस दस्तावेज को सबके सामने लाने का प्रयत्न किया, इसके लिये साधुवाद। और भी अच्छा होता यदि इसका सरल हिन्दी अनुवाद भी साथ में लगा देते।

अरुण said...

सुरेश जी मैकाले का तो पता नही क्योकी तब मै था नही पर ये अब वाले तो मैकाले से ज्यादा काले है जनता दल की सरकार मे दुरदर्शन पर आने वाला "सत्यम शिवंम सुन्दरम" सत्यम प्रियम सुन्दरम मे बदल गया था कि यह धर्म निरपेक्ष देश है जब एक धर्म को धार्मिक यात्रा के लिये धन देते है तो धर्म निरपेक्ष ही रहते है

अरुण said...

धन्यवाद पढ़ तो लिया किन्तु बहुत कठिन लगा पढ़ना।
किसी को भी दबाना है तो पहला काम यह करना होता है कि उसका आत्मसम्मान खत्म कर दो। अंग्रेजों ने भी यही किया। और वे यहाँ धन कमाने, साम्राज्य करने आये थे कोई हमसे मिलने या हमारी सभ्यता सीखने तो नहीं। सो कोई आश्चर्य नहीं।
घुघूती बासूती
आपकी इस सोच का मै पुर्ण समर्थन करता हू
बासुति जी कभी आपने सोचा है कि यह सिर पर मैला उठाने की प्रथा कब से शुरु हुई ये हिन्दुओ को पददलित करने का उनके मनो बल को तोडने का एक ढंग था मुस्लिम आतातायियो द्वारा

शशि सिंह said...

सुरेश भाई सबसे पहले आपको साधुवाद।


मैं अनुनाद भाए से पूरी तरह सहमत हूं... हम अपने स्तर पर इस तरह के कार्य के लगे हैं... आइये आपभी हाथ मिलाइये।
: शशि सिंह
www.lokmanch.com

मिर्ची सेठ said...

सुरेश भाई

हिन्दी एवं भारतीयता से प्यार मुझे भी बहुत है। लेकिन मैं उक्त भाषण के अंश को मैकाले द्वारा होने को सिद्द नहीं कर पाया।

फरवरी 2, 1935 के भाषण की प्रति यहाँ पड़ी है

http://projectsouthasia.sdstate.edu/docs/history/primarydocs/education/Macaulay001.htm

हालांकि यहाँ पर सब से चुभती बात यह है

"a single shelf of a good European library was worth the whole native literature of India and Arabia"

आप के द्वारा दिए गए भाषण अंश के बारे में यही प्रश्न एक और व्यक्ति के मन में उठा था व गूगल आन्सर्स का इस बारे में कहना यह है

http://answers.google.com/answers/threadview?id=296771

Neeraj Rohilla said...

सुरेशजी,
आपकी इस पोस्ट से प्रभावित होकर मैने मैकाले पर एक पोस्ट लिखी है । इस पोस्ट में मैने मैकाले के बारे में फ़ैली हुयी कुछ भ्रान्तियों को दूर करने का प्रयास किया है ।

इतने उपयुक्त विषय पर एक पोस्ट लिखने के लिये साधुवाद स्वीकार करें ।

मेरी पोस्ट की कडी नीचे दे रहा हूँ,
http://antardhwani.blogspot.com/2007/04/blog-post.html