Tuesday, February 27, 2007

मैं और मेरा रूममेट

("सिलसिला" के अमिताभ की तर्ज पर)

मैं और मेरा रूममेट अक्सर ये बातें करते हैं..
घर साफ़ होता तो कैसा होता..
मैं किचन साफ़ करता, तुम बालकनी धोते
मैं हॉल साफ़ करता, तुम बाथरूम देखते
लोग इस बात पर हैरान होते
और उस बात पर कितना हँसते..
मैं और मेरा रूममेट अक्सर ये बातें करते हैं....

ये हरा-भरा 'सिंक" है, या बरतनों की जंग छिडी़ है
ये कलरफ़ुल किचन है, या मसालों से होली खेली है
है फ़र्श की नई डिजाईन, या दूध-बियर से धुली है...
ये सेलफ़ोन है या ढक्कन, बिस्तर है या किसी का आँचल
ये रूम फ़्रेशनर का नया फ़्लेवर है, या मोजे से आती बदबू...
ये पत्तियों की है सरसराहट, या हीटर फ़िर से खराब हुआ है..
ये सोचता हूँ कब से गुमसुम
कि जबकि उसको भी ये खबर है
कि मच्छर नहीं हैं, कहीं नहीं हैं
मगर ये दिल है कि कह रहा है
मच्छर यहीं हैं... यहीं कहीं हैं...

पेट की ये हालत मेरी भी है, उसकी भी
दिल में एक तस्वीर इधर भी है उधर भी
करने को बहुत कुछ है, मगर कब करें हम
कब तक यूँ ही इस तरह गन्दे रहें हम..
दिल कहता है कि कोई हमे वैक्यूम क्लीनर ला दे
ये कारपेट जो दरवाजे पर पडा है, फ़िंकवा दे
हम साफ़ रह सकते हैं, लोगों को बता दें
हाँ हम रूममेट हैं... रूममेट हैं... रूममेट हैं...
अब दिल मे यही बात इधर भी है, उधर भी....!

4 comments:

Shrish said...

ये वाला पहले भी पोस्ट किया था क्या। फिर भी दुबारा पढ़ना मजेदार रहा।

उडन तश्तरी said...

कहीं पढ़ा हुआ सा लगता है!! याद नहीं किसके ब्लाग पर-मगर था इसी तर्ज पर या यही.

Suresh Chiplunkar said...

जी हाँ दोस्तों पढा हुआ सा लग सकता है, क्योंकि यह matter मैने November 2003 से ही नेट पर डाला हुआ है और "नईदुनिया" (इन्दौर) में यह ११ नवम्बर २००३ को प्रकाशित भी हो चुका है.. लेकिन चूँकि इस अज्ञानी के हाथ बाराहा अब जाकर लगा है इसलिये इसे हिन्दी में अपने "भडास पेज" पर डाल दिया है.. फ़िलहाल तो मैं अपने पूर्व प्रकाशित लेखों / चुटकुलों आदि को अपने पेज पर डाल रहा हूँ...हो सकता है कि वह कुछ मित्रों को पढा-पढा सा लगे...

उडन तश्तरी said...

चलिये, जिज्ञासा शांत हुई. इतने पापुलर पोस्ट, जो जमाने से ईमेल के जरिये यहाँ वहाँ प्रेषित हो रहा है, के लिये बहुत बधाई स्विकारें.