Wednesday, January 31, 2007

क्या आप भगवान को मानते हैं ?

Does GOD Exists? What is GOD? How he looks? What he is Doing?

शीर्षक पढकर आप चौंक गये होंगे... क्या मैं नास्तिक हूँ... बिलकुल नहीं... फ़िर मैं क्यों ऐसी बात कह रहा हूँ ? लेकिन जरा आगे तो पढिये जनाब, कई सवाल हैं जो मेरे दिलो-दिमाग को मथते हैं और जिनका कोई तर्कपूर्ण जवाब मुझे नहीं मिलता, एक विशिष्ट प्रकार का "कन्फ़्यूजन" (Confusion) है..., इन विषयों पर हमेशा मैनें प्रत्येक बहस में सामने वाले से जवाब माँगा है, लेकिन नतीजा सिफ़र... वही गोल-मोल जवाब... वही ऊटपटाँग तर्क... लेकिन मेरी बात कोई मानने को तैयार नहीं... सोचा कि ब्लोग पर इन प्रश्नों को डालकर देखूँ, शायद कोई विद्वान मेरी शंकाओं का समाधान कर सके... और नहीं तो मुझ से सहमत हो सके... खैर बहुत हुई प्रस्तावना....
क्या आप भगवान को मानते हैं.... क्यों मानते हैं ? ... क्या आपको विश्वास है कि भगवान कहीं है ? ...यदि है तो वह क्या किसी को दिखाई दिया है ? ये सवाल सबसे पहले हमारे मन में आते हैं लेकिन बाल्यकाल से हमारे मनोमस्तिष्क पर जो संस्कार कर दिये जाते हैं उनके कारण हम मानते हैं कि भगवान नाम की कोई हस्ती इस दुनिया में है जो सर्वशक्तिमान है और इस फ़ानी दुनिया को चलाती है... चलो मान लिया... हमें सिखाया जाता है कि भगवान सभी पापियों का नाश करते हैं... भगवान की मर्जी के बिना इस दुनिया में पत्ता तक नहीं हिलता... जो प्राणी सच्चे मन से भगवान की प्रार्थना करते हैं उनको सुफ़ल अवश्य मिलता है... लेकिन ईश्वर मौजूद है तो फ़िर इस दुनिया में अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार, गरीबी, बीमारी आदि क्यों बनी हुई है ? शैतान (Satan) क्या है और नरक का निर्माण किसने किया ? क्या भगवान ने ? यदि हाँ तो क्यों ? यदि कोई व्यक्ति अपराध करता है तो क्यों ना उसे ईश्वर की लीला समझकर माफ़ कर दिया जाये, क्योंकि उसकी मर्जी के बिना तो कुछ हो ही नहीं सकता । बाढ, सूखा, सुनामी, भूकम्प, ज्वालामुखी सभी ईश्वर की ही देन हैं, मतलब इन्सान को प्रकृति बिगाडने का दोषी नहीं माना जाना चाहिये. कहा जाता है कि मनुष्य, भगवान की सर्वोत्तम कृति है, फ़िर यह "सर्वोत्तम कृति" क्यों इस संसार को मिटाने पर तुली है... ? इसके जवाब में लोग कहते हैं कि यह तो मनुष्य के पूर्वजन्म के कर्मों का फ़ल है... लेकिन हमें तो बताया गया था कि चौरासी लाख योनियों के पश्चात ही मनुष्य जन्म प्राप्त होता है, फ़िर इस मनुष्य ने पाप किस जन्म में किये होंगे.. जब वह गाय-बकरी या कीडे-मकोडे के जन्म में होगा तब...? लेकिन मूक प्राणी तो कोई पाप नहीं करते... फ़िर ? और मनुष्य के पाप-पुण्य का हिसाब भी बडा मजेदार है... अब देखिये.... भगवान पापी, दुराचारी, पाखण्डी को अवश्य सजा देते हैं... लेकिन कब ? भगवान की बनाई हुई दुनिया उजडी जा रही है... लेकिन वह चुप है... अन्याय, लूट-खसोट चरम पर है, लेकिन वह कुछ नहीं करता...ईश्वर के नाम पर तमाम पाखण्ड और ढोंग चल रहा है... लेकिन वह चुप है... बडे-बडे लुटेरे, कालाबाजारिये, घूसखोर अफ़सर आदि लाखों रुपये चन्दा देकर विशाल भण्डारे और प्रवचन आयोजित कर रहे हैं... लेकिन भगवान को वह भी मंजूर है... दिन भर पसीना बहाने वाला एक ठेलाचालक भी उतना ही धार्मिक है लेकिन वह ताजिन्दगी पिसता और चूसा जाता रहेगा धनवानों द्वारा, ऐसा क्यों... ? धनवान व्यक्ति के लिये हर बडे मंदिर में एक वीआईपी कतार है, जबकि आम आदमी (जो भगवान की प्रार्थना सच्चे मन से करता है) वह लम्बी-लम्बी लाईनों में खडा रहता है....क्या उसकी भक्ति उस धनवान से कम है ? या भगवान को यह अन्याय मंजूर है... नहीं... तो फ़िर वह कुछ करता क्यों नहीं ? खैर... बहुत बडा ब्लोग ना हो जाये कहीं... और पाठक मुझे कोसने लगें, इसलिये यहीं खत्म करता हूँ... अगले ब्लोग में बाबाओं, साधुओं, चमत्कारों पर कुछ लिखूँगा... क्योंकि उज्जैन में रहकर और दो-दो सिंहस्थ होशोहवास में देखकर धर्म-कर्मकांड, गुरु-घंटालों, प्रवचनकारों के बारे में कुछ तो सच्चा (जाहिर है कि कडवा) लिखने का हक तो बनता है... अन्त में एक हल्का-फ़ुल्का मजाक... बताइये भगवान दिखाई क्यों नहीं देता ? तो भईये... जैसे इन्सान उसने बनाये हैं.. उसके कारण वह किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहा....
बाकी अगले ब्लोग में... किसी की भावनाओं को चोट पहुँचती हो तो माफ़ करें... तर्कपूर्ण जवाब जरूर दें...

41 comments:

Jitendra Chaudhary said...

अच्छा लेख है, इस पर काफी चर्चा हो चुकी है।

मै प्रकृति को ही ईश्वर मानता हूँ, किसी भी प्रकार के धार्मिक ढकोसलों के खिलाफ हूँ।

धुरविरोधी said...

बन्धुवर, आप चाहे नास्तिक न हों, मैं तो हूं. अभी आप जिस पड़ाव से गुज़र रहें हैं उसे अंग्रेजी में Agnosticism कहतें हैं. चलिये अपने धर्म पर शक तो करना शुरु किया. बन्धु, अगर हो सके तो अपने कम्प्युटर में stumbleupon डालिये, और इसमें Religion->Atheist/Agnostic नामक केटेगरि देखिये.

नास्तिकता कोइ पाप नहीं है गुरुजी. कभी फ़ेन्स के इस पार भी आ के देखिये, विधर्मी होना, एक बड़ी ही मज़ेदार अनुभूति है. दिल का डर चला जाता है.

इसे पढ़ें
http://www.freethoughtdebater.com/FBurdenOfProof.htm

करगिल said...

ये भगवान शब्द कुछ नही बल्कि ईंनसान के अपने "डर" को भगाने का एक तरिका है! आप ये सोचिये, ईंसान भगवान को तभी याद करता है जब वह किसी समस्या या दुख मे होता है! और ईन दोनो चीज़ो मे एक ही चीज़ समांन्य है और वो है “डर”

ये प्राकृतिक दुर्घटनाए प्राकृतिक ही है, जिंन्हे, ईंसान अपना पूरा दम लगाकर बढाते ही चले जा रहा हैं! पृथ्वी को अपनी माता नही बल्की अपनी पत्नी समझो, शादी के बाद अगर आप अपनी पत्नी को करते ही रहेगें हर वक्त तो वह क्या करेगी? वो आप्के पेट में चक्कु मार के चली जाएगी वापस अपने माईके। पृथ्वी ईसी प्रकार है, ईस ग्रह पर हम भार बढाते ही चले जा रहे है बढाते ही चले जा रहे है, अगर ईंसान रीप्रोड्यूज़ होने पर एक नियंत्रण नही लगाएगा तो ये ग्रह एक बम के गोले कि तरह फट जाएगा।

हमारे देश मे जितना पैसा जनता बेकार की पूजाओं मे खर्च करती है अगर वे वो पैसा पूजा के बजाए गरिब किसानो के लिए लगा दें, तो सरकार की कितनी मदद हो जाएगी? एक देश विकसित बनता है लोगो के अंदर की विकसित सोच से नाकि स्वाहा करने से।

तुसनामी एक प्राकृतिक तोहफा था या ईंसानो के लिए एक छोटी सी चेतावनी। गिलोबल वार्मिग का कहर टुट्ने वाला है, भारत में समुद्री तटीय शहर डुबेगे पानी में और हम लोग सिर्फ टीवी देखते रह जाएंगे बैठ के। भगवान टगवान कुछ नही है , सिर्फ एक वहम है बेवकूफ लोगों का, अगर अग्रेज़ लोग ईडियन लोगो की तरह भगवान भगवान करते तो वे भी सारी ज़िन्दगी मंदिर मे घंटा बजाते रह जाते। हम पैदा हुए है ईस जगह को सुधारने के लिए, नाकि ईसे छोडकर कही और कलम हिलाने के लिए।

Prafull said...

Dear One,
You are cordially invited to visit:
http;//thephilosophicalpoint.blogspot.com

The best starting point --- is the point of doubt.
Regards,
Prafull

श्री. स्वर्गवासी................ said...

सही है साहब,

हरीवंश राय जी ने भी लिखा है..!!!


प्रार्थना मत कर, मत कर......!!!!!!
मनुज पराजय के स्मारक हैं........ मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर....!!!
प्रार्थना मत कर, मत कर

pandit visnugupta said...

jai shree radhe jai jai shree radhe.......

priy mitra ,

miane aapake kafi lekh padhe.bahut hi sunadar or satyaaradhit bate likhi aapane. parantu mujhe aapke is lekh se badi nirahsa hui.

adharm kyo badhata hai ,rachas privriti kyo aati hai,

agar bhagaban hi ye karata hai to kyo?????

mitra bat yah hai ki jab shree bhagban ne is sristi ka udgar kiya
tab unhone nahi chaha tha ki isaka kya parinam hoga......atah bo iswar bo pita to karta hote hue bhi akarta hai ...or sristi main jiv ka niyam karm hai na ki fal yahi najah hai ki yaha atyachar or adharm badhata hai ......dharm ki hani hoti hai ......or jo vyati ise samajhe bahi is sansar ka niayam samajh sakata hai.....

socho........mahabharat ke yudh ki kya awasyakata thi.....yadi shree bhagban chahate to adharm to ese hi nast ho jata .....parantu prabhu ne jivo main srestha manusya ko karm ka marg dikhaya....arjun veer tha parantu usaki veerata ke peeche swayam shree narayan swaroop param pita bhagban shree krishna ki hi to shakti thi......arthat yadi koi us shakti ke bina hi yadi samajhata hai ki purusharth kar sakata hai to ye asambhav hai......

kadachit mitra apane aap ko us mahashakti ko samrpit kar ke dharm ke lie yudh karo ki yahi manusya ka jeevan kartavya hai..........

socho......... mata dropadi ke sath ashista vyabhaar par maha bharat hua.....to aajhazaro hindu matao or bahano ke sath balatkar jaise nich kary hone par bhi ye kayar hindu samaz so raha hai.....dhikkar hai e kayar hindu putro........dhikkar hai.......

sushil said...

Priya Mitra,Namaskaar!

Aapke vichar padhkar aisa laga ki maano aapke bhitar parmeshwar ko jaanane ki tadap aur kulbulahat hai. accha laga.Jeev, Jagat aur Jagdish ke sambandho ko jaannane ke liye sabse pahle jaroori hai khudd ko samajhana. Ab aap sar khujane lagoge ki ye khudd ko bhala kaise samjhoge? Bhai Tum itna to manoge ki tum ek Jeev ho. aur tumse alag ye jagat hai.isme to tumhe koi shanka nahi honi chahiye. Ab baat jagdish ki karte hain- chalo maan liya is sansaar me ishwar naam ki koi satta nahi hai; lekin is brahmand ka koi to sanchalak manoge , ya phir wahaan tak tumhaari buddhi ka dayra nahi pahuunch pata.Yadi koi andha surya ko na dekh sake ya phir koi jaanbujh kar bhari dopahariya chadar taan ke pada rahe aur dhindhora pit de ki suraj ko usne nahi dekha hai, isliye suraj naam ki koi chij nahi hai...to ye sirf mansik divaliyepan ke aur kya kaha jaye?
Asal me ishwar ko samjhane ke liye tumhe bhitar se saral hona padega.Pahle khudd ko samjho, phir jagat ko....uske baad jagdish ko samajhne ki buddhi khudd ba khudd mil jayegi.Isse jyada aaplogo ke liye aur waqt nahi nikaal sakta......parmeshwar aap ko aur aap jaise lord klive ke vanshajo ko saddbudhhi de....
Jai shri Hari!!!


Swadhin

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

ईश्वर है तो देखाई क्यों नहीं देता?

ईश्वर कोई हमारे और आप के जैसे नहीं कि जिसे मानव का देख लेना सम्भव हो, वह तो सम्पूर्ण संसार का रचयिता और पालनकर्ता है, उसके सम्बन्ध में कल्पना भी नहीं की जा सकती कि वह देखाई दे बल्कि जो देखाई दे वह तो सीमित हो गया और ईश्वर की महिमा असीमित है। अन्तिम ग्रन्थ क़ुरआन में बताया गया है कि मूसा नामक एक संदेष्टा (ईश्वर की उन पर दया हो) ने जब ईश्वर से प्रार्थना किया कि “हे ईश्वर हमें अपना रूप देखा दीजिए” तो उत्तर आया कि तुम हमें देख नहीं सकते परन्तु तुम इस पहाड़ पर देखो यदि वह अपने स्थान पर स्थित रहा तो तेरे लिए हमे देखना सम्भव है। जब ईश्वर ने अपना प्रकाश प्रकट किया तो पड़ार टूकड़े टूकड़े हो गया और मूसा बेहोश हो कर गिर पड़े।(सूरः आराफ 143) मानव अपनी सीमित बुद्धि से जब सोचता है तो समझने लगता है कि ईश्वर कोई मानव के समान है जो देखाई देना चाहिए।यह तो एक रहा! फिर संसार में विभिन्न चीज़ें हैं जो देखाई नहीं देतीं पर इंसान को उनके वजूद पर पूरा विश्वास होता है।

एक व्यक्ति जब तक बात करता होता है हमें उसके अन्दर आत्मा के वजूद का पूरा विश्वास होता है लेकिन जब ही वह धरती पर गिर जाता है,आवाज़ बन्द हो जाती है और शरीर ढीला पड़ जाता है तो हमें उसके अन्दर से आत्मा के निकल जाने का पूरा विश्वास हो जाता है हालाँकि हमने उसके अन्दर से आत्मा को निकलते हुए देखा नहीं।
जब हम घर में बिजली की स्विच आन करते हैं तो पूरा घर प्रकाशमान हो जाता है और हमें घर में प्रकाश के वजूद का पूरा विश्वास हो जाता है फिर जब उसी स्विच को आफ करते हैं तो प्रकाश चला जाता है हालाँकि हमने उसे आते और जाते हुए अपनी आँखों से नहीं देखा।
उसी प्रकार जब हवा बहती है तो हम उसे देखते नहीं पर उसका अनुभव करके उसके बहने पर पूरा विश्वास प्राप्त कर लेते हैं।
तो जिस प्रकार आत्मा, बिजली और हवा के वजूद पर उसे देखे बिना हमारा पूरा विश्वास होता है उसी प्रकार ईश्वर के वजूद की निशानियाँ पृथ्वी और आकाश स्वयं मानव के अन्दर स्पष्ट रूप में विधमान है और संसार का कण कण ईश्वर का परिचय कराता है क्योंकि किसी चीज़ का वजूद बनाने वाले की माँग करता है, अब आप कल्पना कीजिए कि यह धरती, यह आकाश, यह नदी, यह पहाड़, यह पशु और यह पक्षी क्या यह सब एक ईश्वर के वजूद हेतु प्रमाण नहीं? प्रति दिन सूर्य निकलता है और अपने निश्चित समय पर डूबता है, स्वयं इनसान का एक एक अंग अपना अपना काम कर रहा है यदि अपना काम करना बन्द कर दे तो इनसान का वजूद ही स्माप्त हो जाए। यह सारे तथ्य इस बात के प्रमाण हैं कि ईश्वर है पर उसे देखना इनसान के बस की बात नहीं।
जब हम ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास कर लेते हैं तो हमें यह भी मानना पड़ेगा कि ईश्वर यदि है तो वह एक है अनेक नहीं। क्योंकि हम अपने दैनिक जीवन में देखते हैं कि एक देश का दो प्रधान मंत्री नहीं होता, एक स्कूल का दो अध्यक्ष नहीं होता, एक सेना का दो कमानडर नहीं होता, एक घर का दो गारजियन नहीं होता। यदि हुआ तो क्या आप समझते हैं कि नियम ठीक ठाक से चल सकेगा? अब आप कल्पना कीजिए कि इतनी बड़ी सृष्टि का प्रबंध एक से ज्यादा ईश्वर से कैसे चल सकता है?
क़रआन जो ईश्वाणी है जो सम्पूर्ण संसार के मार्गदर्शन हेतू अवतरित हुआ है उसने अपने अवतरित काल में मानव को चुनौती दी कि यदि किसी को क़ुरआन के ईश्वाणी होने में संदेह है या वह समझता हो कि मुहम्मद सल्ल0 ने इसकी रचना की है हालांकि वह न पढना जानते हैं न लिखना तो तुम में बड़े बड़े विद्वान पाए जाते हैं ( इस जैसी एक सूरः (छोटा अध्याय) ही बनाकर देखाओ और ईश्वर के सिवा पूरे संसार को अपनी सहायता के लिए बुला लो यदि तुम सच्चे हो)
(सूरः बक़रा 23)
लेकिन इतिहास गवाह है कि चौदह सौ साल से आज तक संसार के बसने वाले इसके समान एक श्लोक भी पेश न कर सके हैं और कोई भी आज तक प्रमाण न दे सका कि यह ईश्वर की वाणी नहीं है।
इस पवित्र ग्रन्थ में हमें ईश्वर ने यह प्रमाण दिया है कि (यदि धरती और आकाश में अनेक पूज्य होते तो खराबी और फसाद मच जाता) बात बिल्कुल स्पष्ट है कि यदि संसार में दो ईश्वर होते तो संसार का नियम नष्ट भ्रष्ट हो जाता, एक कहता कि आज बारिश होगी तो दूसरा कहता कि आज बारिश नहीं होगी।एक राम दास को किसी पद कर आसीन करना चाहता तो दूसरा चाहता कि राम दास उस पद पर आसीन न हो ।
यदि देवी देवता का यह अधिकार सत्य होता तथा वह ईश्वर के कार्यों में शरीक भी होते तो कभी ऐसा होता कि एक दास ने पूजा अर्चना कर के वर्षा के देवता से अपने बात स्वीकार करा ली, तो बड़े मालिक की ओर से आदेश आता कि आज बारिश नहीं होगी। फिर नीचे वाले हड़ताल कर देते ।

अगर दो ख़ुदा होते संसार में
तो दोनों बला होते संसार में
इधर एक कहता कि मेरी सुनो
उधर एक कहता कि मियाँ चुप रहो।

स्वयं आप कल्पना कीजिए कि यदि दो ड्राईवर एक गाड़ी पर बैठा दिया जाए तो गाड़ी अवश्य एक्सिडेन्ट कर जाएगी। ईसी लिए मानना पड़ेगा कि इस संसार का सृष्टिकर्ता केवल एक है।

हाँ ईश्वर है... और 100 प्रतिशत है।

यदि हम कहें कि ईश्वर नहीं है तो हमें स्वयं को कहना होगा कि हम भी नहीं हैं, यदि हम हैं तो हमारा कोई बनाने वाला अवश्य होना चाहिए क्योंकि कोई भी चीज़ बिना बनाए नहीं बनती,और न ही वह स्वयं बनती है
मैं अभी कम्प्यूटर पर लिख रहा हूं, यदि मैं कहूं कि कम्प्यूटर को किसी ने नहीं बनाया, स्वयं बन कर हमारे सामने आ गया है तो आप हमें पागल कहेंगे।
उसी प्रकार यदि मैं आपसे कहूं कि एक कम्पनी है जिसका न कोई मालिक है, न कोई इन्जीनियर, न मिस्त्री । सारी पम्पनी आप से आप बन गई, सारी मशीनें स्वंय बन गईं, खूद सारे पूर्ज़े अपनी अपनी जगह लग गए और स्वयं ही अजीब अजीब चीज़े बन बन कर निकल रही हैं, सच बताईए यदि में यह बात आप से कहूं तो क्या आप मेरी बात पर विश्वास करेंगे ? क्यों ? इस लिए कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि बिना बनाए कम्पनी या कम्प्यूटर बन जाए।

अब हमें उत्तर दीजिए कि क्या यह संसार तथा धरती और आकाश का यह ज़बरदस्त कारख़ाना जो आपके सामने चल रहा है, जिसमें चाँद, सूरज और बड़े बड़े नक्षत्र घड़ी के पुर्ज़ों के समान चल रहे हैं क्या यह बिना बनाए बन गए?
स्वयं हम तुच्छ वीर्य थे, नौ महीना की अवधि में विभिन्न परिस्थितियों से गुज़र कर अत्यंत तंग स्थान से निकले,हमारे लिए माँ के स्तन में दूध उत्पन्न हो गया,कुछ समय के बाद हमें बुद्धि ज्ञान प्रदान किया गया, हमारा फिंगर प्रिंट सब से अलग अलग रखा गया, इन सब परिस्थितियों में माँ का भी हस्तक्षेप न रहा, क्योंकि हर माँ की इच्छा होती है कि होने वाला बच्चा गोरा हो लेकिन काला हो जाता है, लड़का हो लेकिन लड़की हो जाती है। अब सोचिए कि जब कोई चीज़ बिना बनाए नहीं बना करती जैसा कि आप भी मान रहे हैं तथा यह भी स्पष्ट हो गया कि उस में माँ का भी हस्तक्षेप नहीं होता तो अब सोचें कि क्या हम बिना बनाए बन गए ???????
कभी हम संकट में फंसते हैं तो हमारा सर प्राकृतिक रूप में ऊपर की ओर उठने लगता है शायद आपको भी इसका अनुभव होगा—ऐसा क्यों होता है ? इसलिए कि ईश्वर की कल्पना मानव के हृदय में पाई जाती है, पर अधिकांश लोग अपने ईश्वर को पहचान नहीं रहे हैं।
फलसफी बास्काल कहता है “ईश्वर को छोड़ कर कोई चीज़ हमारी प्यास बुझा नहीं सकती” शातोबरीन लिखता है “ईश्वर के इनकार की साहस मानव के अतिरिक्त किसी ने नहीं की”
लायतीह यहाँ तक कहता है कि “जो शब्द सृष्टा का इनकार करे उसके प्रयोग करने वाले के होंट आग में जलाए जाने योग्य हैं”
इस्लाम के सम्बन्ध में सब से बड़ा संदेह जो लोगों में पाया जाता हैं यह है कि इस्लाम एक नया धर्म है जिसे सब से पहले मुहम्मद साहिब ने सातवीं शताब्दी में मानव के समक्ष प्रस्तुत किया-
हालांकि यह बात सत्य के बिल्कुल विरोद्ध है, मुहम्मद सल्ल0 अवश्य सातवीं शताब्दी में पैदा हुए परन्तु उन्होंने इस्लाम की स्थापना नहीं किया बल्कि उसी संदेश की ओर लोगों को आमंत्रित किया जो सारे संदेष्टाओं के संदेशों का सार रहा।
ईश्वर ने मानव को पैदा किया तो एसा नहीं है कि उसने उनका मार्गदर्शन न किया जिस प्रकार कोई कम्पनी जब कोई सामान तैयार करती हैं तो उसके प्रयोग का नियम भी बताती है उसी प्रकार ईश्वर ने मानव का संसार में बसाया तो अपने बसाने के उद्देश्य ने अवगत करने के लिए हर युग में मानव ही में से कुछ पवित्र लोगों का चयन किया ताकि वह मानव मार्गदर्शन कर सकें परन्तु सब से अन्त में ईश्वर ने मुहम्मद सल्ल0 को भेजा।
अब आप पूछ सकते हैं कि मुहम्मद सल्ल0 ने किस चीज़ की ओर बुलाया ? तो इसका उत्तर यह है कि उन्होंने मानव को यह ईश्वरीय संदेश पहुंचाया कि
(1) ईश्वर केवल एक है केवल उसी ईश्वर की पूजा होनी चाहिए उसके अतिरिक्त कोई शक्ति लाभ अथवा हान का अधिकार नहीं रखती
(2) सारे मानव एक ही ईश्वर की रचना हैं क्योंकि उनकी रचना एक ही माता पिता से हुई अर्थात आदि पुरुष जिनसको कुछ लोग मनु कहते हैं और सतरोपा कहते हैं तो कुछ लोग आदम और हव्वा, वह प्रथम मनुष्य ने जो धरती पर बसाए गए, उनका जो धर्म था उसी को हम इस्लाम अथवा सनातन धर्म कहते हैं ।
(3) मुहम्मद सल्ल0 ने शताब्दियों से मन में बैठी हुई जातिवाद का खण्डन किया जो लोगों के हृदय में बैठ चुका था और प्रत्येक मनुष्य को समान क़रार दिया।
और जब मुहम्मद सल्ल0 ने वही संदेश दिया जो संदेश हर युग में संदेष्टा देते रहे थे। इस लिए इस्लाम को नया धर्म कहना ग़लत होगा।
फिर यह भी याद रखें कि इस्लाम में 6 बोतों पर विश्वास रखने का आदेश दिया गया है जिस पर सारे मुसलमानों का विश्वास रखना आवश्यक है। उसे हम ईमान के स्तम्भ कहते हैं यदि कोई मुसलमान उनमें से किसी एक का इनकार कर देता है तो वह इस्लाम की सीमा से निकल जाएगा उनमें से एक है ईश्वर के भेजे हुए संदेष्टाओं पर विश्वास करना – अर्थात इस बात पर विश्वास करना कि ईश्वर ने हर युग तथा देश में मानव मार्गदर्शन हेतु संदेष्टाओं को भेजा जिन्होंने मानव को एक ईश्वर की पूजा की ओर बोलाया और मूर्ति जूजा से दूर रखा, पर उनका संदेश उन्हीं की जाति तक सीमित होता था क्योंकि मानव ने इतनी प्रगति न की थी तथा एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध नहीं था।
जब सातवी शताब्दी में मानव बुद्धि प्रगति कर गई और एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध बढ़ने लगा को ईश्वर ने अलग अलग हर देश में संदेश भेजने के नियम को समाप्त करते हुए विश्वनायक का चयन किया।
वह विश्व नायक कौन हैं इस सम्बन्ध में आप जानना चाहते हैं तो आपको डा0 वेद प्रकाश उपाध्याय की पुस्तक कल्की अवतार और मुहम्मद सल्ल0 तथा डा0 एम ए श्री वास्तव की पुस्तक ( मुहम्मद सल0 और भारतीय धर्म ग्रन्थ) का अध्ययन करना होगा जिसमें इन महान विद्वानों ने सत्य को स्वीकार करते हुए हिन्दुओं को आमंत्रन दिया है कि हिन्दू धर्म में जिस कल्कि अवतार तथा नराशंस के आने की प्रतीक्षा हो रही है वह सातवीं शताब्दी में आ गए और वही मुहम्मद सल्ल0 हैं । डॉ ज़ाकिर नायक के उन पुस्तकों को पढ़े जिन्होंने एक क्रन्तिकारी क़दम उठाते हुए सभी धर्मों ख़ासकर के हिन्दुज़्म और इस्लाम के बीच यकसानियत (समानताओं) के बारे में बहुत बड़े पैमाने पर लिखा है.
अंततः ईश्वर ने अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 को सम्पूर्ण मानव जाति का मार्गदर्शक बना कर भेजा, आप पर अन्तिम ग्रन्थ क़ुरआन अवतरित किया जिसका संदेश सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है ।
मुहम्मद सल्ल0 ने कभी यह दावा नहीं किया कि वह कोई नया धर्म लेकर आए हैं, वही इस्लाम जिसकी शिक्षा आदि पुरुष आदम (मनू ) ने दिया था उसी को पूर्ण करने के लिए मुहम्मद सल्ल0 भेजे गए। आज मानव का कल्याण इस्लाम धर्म ही में है क्यों कि इस्लाम उन्हीं का है, क़ुरआन उन्हीं का है तथा मुहम्मद सल्ल0 उन्हीं के लिए आए हैं। लेकिन अज्ञानता का बुरा हो कि लोग आज उन्हीं का विरोद्ध कर रहे हैं जो उनके कल्याण हेतु भेजे गए। मैं इस बात को भी स्वीकार करता हूँ कि ग़लती हमारी हैं कि हम हिन्दू मुस्लिम भारत में शताब्दियों से रह रहे हैं पर हमने सत्य को आप से छुपाए रखा। और ज्ञात है कि यदि इनसान किसी चीज़ की सत्यता को नहीं जानता है तो उसका विरोद्ध करता ही है। अतः आप से निवेदन है कि मेरी बातों पर विशाल हृदय से निष्पक्ष हो कर चिंतन मनन करेंगे। तथा इस्लाम का अध्ययन आरम्भ करें।

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

yah lekh mere blog (swachchhsandesh.blogspot.com) par swistaar padhen aur bahas ke liye aap saadar aamatrit hain, aap yaadonkaaaina.blogspot.com par bahas kar sakta hoon.

RAJ said...

I have doubt on some views given by Swachchsandesh.

1. First thing is on what behalf you are saying that Manu and satrupa were first on the earth to start human generation.

In sanatan dharm before 5000 yrs. ago when our only written philosophy was Vedas It is mentioned that there were Many Persons involved in the starting of earth.(Not only two)

Vedas were not written by anyone they were given by God to four Rishis by internal inspiration.

2. You have mentioned "Kalki Avtar"
that is also not a sanatan dharm philosophy .This philosophy is given by brahmins to give a direction that someone will come to help and revoke our Culture and humanity.
According to Kalki Avtar phenomena a child with some different looking will take birth in a brahmins family in the last round of Kaliyug....then according to you Pagambar was also a brahmin
If this story is true.

If the Kuran's rules are given by god then why in todays world the 100% rule follower(Talibans) are the biggest sufferer in todays scenario and a big threat to humanity.They never like any religion to live cooperatively with them.

I think you should rethink on your views some are totally wrong.

pls sorry if it hurts you.

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

यह बहुत पुराना चुटकुला है।


एक आदमी कटिंग कराने नाई की दुकान जाता है। अपनी मन्‍नत पूरी नहीं होने से खिन्‍न नाई बड़बड़ाता है कि दुनिया में भगवान नहीं है। आदमी हैरान हो जाता है लेकिन चुप रहता है। नाई जितनी देर तक कटिंग करता है लगातार बोलता रहता है कि भगवान कहीं नहीं है। आखिर वह आदमी नाई से पूछता है कि आपको क्‍यों लगता है कि दुनिया में भगवान नही है। तो नाई कहता है कि अगर भगवान होते तो दुनिया में दुख और कष्‍ट नहीं होते।

आदमी चुप रह जाता है। वह पैसे देकर बाहर निकलता है वह बाहर से ही चिल्‍लाकर नाई से कहता है दुनिया में एक भी नाई नहीं है। नाई बाहर आकर पूछता है कैसे नहीं है मैं क्‍या आपको खड़ा दिखाई नहीं देता। इस पर वह आदमी कहता है अगर दुनिया में नाई होते तो सामने जा रहे आदमी के चेहरे पर दाढ़ी नहीं होती। :)

Manoj Bijnori said...

Yes thir article is very very Ok. But Suresh ji God is Great.He is not an ordinary He will Punish who are wrong and Give kushi to those who are right.This is a internal process.This is rrue.

सौरभ आत्रेय said...

क्या आप भगवान को मानते हैं.... क्यों मानते हैं ?
स्वच्छ सन्देश हिंदुस्तान की आवाज़ ने कुछ सही पॉइंट्स दिए हैं किन्तु पूर्ण नहीं दिए और उसका वास्तविक उद्देश्य कुरान को ईश्वरीय पुस्तक सिद्ध करने के लिए है न की प्रश्नकर्ता की तर्कपूर्ण जिज्ञासा शांत करने का.
ये संभव है बल्कि थोडा सत्य भी है की कुरान में कुछ सत्य भी लिखा है किन्तु अधिकतर उसमें अतार्किक और असत्य ही लिखा है. यदि किसी पुस्तक में ५% सत्य बातें लिखी हों जोकि उससे पूर्व सत्य ग्रंथो में पहले
से ही विद्यमान है और बाकी ९५% बातें असत्य और अतार्किक हों तो वो पुस्तक विद्वान और बुद्धिमान लोगो के मध्य अमान्य है जैसे की कुरान, पुराण, बाइबल आदि अनेक पुस्तकें, इन पुस्तकों में कितनी सारी
अतार्किक और मुर्खता भरी बातें लिखी हैं किन्तु कुछ बातें सत्य भी हैं तो ये नहीं हो सकता उन कुछ चंद सत्य बातों के बल पर उन पुस्तकों को सत्य सिद्ध करने लग जाओ और अपनी अनाप-शनाप गाने लगो.
स्वच्छ सन्देश हिंदुस्तान की आवाज़ यदि तुम सत्य का समर्थन देने वाले होते तो अपने ब्लॉग से मेरी नियोग विषय पर टिपण्णी को डिलीट नहीं करते. खैर मैं जभी समझ चुका था तुम लोगो से तर्क-वितर्क करना ही मुर्खता है क्योंकि
यह कहावत तुम कूपमंडूक लोगो के लिए ही बनी है मुल्ला कि दौड़ मस्जिद तक.

अब बात आती है तो कौन सी पुस्तक सत्य है, तो इसका सीधा सा उत्तर है जो पुस्तक सत्य को प्रमाण के साथ रखती है वही सत्य पुस्तक है, अब बात आती है प्रमाण किसे माना जाये, जो इन्द्रियों द्वारा
ग्रहण होता है और ज्ञानपूर्वक मनन होता है वही सत्य है जैसे की आँखों ने गाय को एक मैदान में देखा और और व्यक्ति ने कहा मैदान में गाय है या किसी ने कोयल की आवाज़ को सुना और कहा की जंगल में कोयल बोल रही है
इसी प्रकार से इनी इन्द्रियों द्वारा ज्ञान का होना प्रमाण होता है, अब इसमें भी कई दोष देखे जा सकते हैं जैसे यदि शाम के कम उजाले में कोई मैदान में किसी गाय जैसे जानवर को देखता है और कहता है मैदान में गाय है किन्तु पास जाकर देखने पर ज्ञात हुआ वो तो कोई और प्राणी है तो वो व्यभिचारी प्रमाण कहलाता है उसी प्रकार से मृग मरीचिका आदि जैसे प्रमाण सत्य का बोध कराने में असक्षम होते हैं. इन उदाहरणों में जब मैदान में निकट जाकर देखा गाय नहीं है और मृग मरीचिका में निकट जाकर देखा की जल नहीं है और हमें सत्य का बोध हुआ ऐसा ज्ञान अव्यभिचारी प्रमाण कहलाता है और सत्य के सही स्वरुप का बोध कराता है. व्यभिचारी ज्ञान में अनेक कारण हो सकते जैसे यहाँ प्रकाश की कमी, अत्यधिक निकटता या दूर होना आदि और भी बहुत से कारण होते हैं. प्रमाण क्या है, उसका स्वरूप क्या है, क्यों है और कितने प्रकार का है यह भी एक पूर्ण तार्किक और दीर्घ विषय है जिसका मैं यहाँ पूर्ण वर्णन देने में असमर्थ हूँ, सक्षिप्त में फिलहाल मैं यही कहना चाहता हूँ की प्रत्यक्ष (अव्यभिचारी) , अनुमान और शब्द ३ प्रकार का प्रमाण होता है. प्रत्यक्ष -इन्द्रियों के सन्निकर्ष द्वारा प्राप्त ज्ञान, अनुमान - जैसे धुएं को देख कर अग्नि का अनुमान होना, शब्द - किसी मान्य आप्त पुरुष या पुस्तक द्वारा ज्ञान, मैं यहाँ मान्य सत्य पुस्तकों का नाम लिखूंगा तो लोग कहेंगे तुम तो अपनी पुस्तकों को सत्य मानोगे जबकि सत्य को जानना एक आत्मीय अनुभूति होती है जोकि बुद्दिमान व्यक्ति को प्रमाणों द्वारा अंतर्द्रष्टि से होती है,

सौरभ आत्रेय said...

मात्र किसी का विरोध करने के लिए किसी पुस्तक का विरोध करना सही नहीं होता. जैसे मैंने शुरू में कुरान आदि पुस्तकों को असत्य उनका केवल बिना मतलब विरोध करने के लिए नहीं कहा है क्योंकि मैंने उनको पढ़ा है और उनमें लिखित अतार्किक और अप्रमाणित बातों को भला कोई कैसे सत्य मान सकता है.
खैर बात यहाँ भगवान् कि चल रही है तो मैं यह कहना चाहूँगा कि यहाँ इस टिपण्णी द्वारा इस दीर्घ और गूढ़ विषय को समझाना कठिन है क्योंकि यदि किसी को सत्य जानने कि वास्तविक जिज्ञासा है तो उसको संक्षिप्त में नहीं समझा सकते क्योंकि इस विषय में एक-२ वाक्य को तर्क-वितर्क से जांच-परख कर समझाया जाता है अन्यथा बुद्दिमान जिज्ञासु व्यक्ति को उस सत्य कि अनुभूति नहीं हो पायेगी जिसको वो जानना चाह रहा है. सुरेश जी आज ईश्वर के स्वरुप के बारे में बहुत लोग भ्रमित हैं मैंने अभी जितना जाना है उसके आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि आज लोगो का उद्देश्य ईश्वर के सत्य स्वरुप को बताना कम है वरन अपने वर्चस्व की लड़ाई अधिक है, मैं प्रयास करूंगा जल्द ही इस दीर्घ विषय को संक्षित करके एक लेख में डालने का हलाकि यह मुश्किल है पर मैं प्रयास करूंगा जितना भी लिखूंगा उसको वादी-प्रतिवादी के हर तार्किक द्रष्टिकोण के आधार पर ही लिखूंगा.
अभी के लिए मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि ईश्वर के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता उसको सप्रमाणित सिद्ध किया जा सकता है और जितना भी यह ब्रह्माण्ड में और इस पृथ्वी पर है उसका भी कारण है. मैं कोई पूर्ण ज्ञानी पुरुष नहीं हूँ किन्तु आप जैसे बुद्दिजीवी को सत्य का बोध होना आवश्यक है, मैं आपकी और आप जैसे कई भाईओं कि शंका के निवारण का प्रयास करूंगा क्योंकि आप एक अच्छे कार्य में सलंग्न है.

K. S. Dwivedi said...

First of all wish you all a happy new year!!

Please excuse me, as I dare to reply.
As I think, before coming to any conclusion (e.g. The GOD exists or not? etc.), we should check our own limits.
If someone says "High Power Microwaves are there in atmosphere". Even though, none of us can sense, feel, see or touch them, neither we have any evidence of it. Still we'll not argue. Because we know, radars are there, they might be using those signals. And this is out of scope for us, so we don't bother about.

Rajesh said...

yadi aap iska jwab ki "Bhagwan hai ya nahi" chahte hai to Ved Padhe, kyonki Ishwar ka Banaya hua Sawidhan Ved hai, jiski Koi Bhi Bat Kat Nahi Sakti. Usme Aap ko jwab Mil Jayga.

Om Nameste Ji.

Indian said...

दिखते तो आप भी नहीं हो .सिर्फ आपका शरीर ही दिखता है .और जो पांच तत्वों से परे हो वोह इन आँखों से कैसे दिखेगा ? इन आँखों से तो सिर्फ पांच तत्व (प्रकृति ) ही दिखगें .

nitin tyagi said...

वेद में लिखा है की पूरा ब्रह्माण्ड परमात्मा का ही काया (शरीर) है ,ब्रह्माण्ड का जो भी स्वरूप है वही ब्रह्म का रूप या शरीर है । वह अनादि है, अनन्त है । जैसे प्राण का शरीर में निवास है वैसे ही ब्रह्म का अपने शरीर या ब्रह्माण्ड में निवास है । इसलिए हम प्रकृति की पूजा करते हैं |
परमात्मा हमारे कर्मो के सग्भागी नहीं होते |अगर कोई चोर है ,डाकू है तो वो उसके कर्म हैं ईस्वर के नहीं |गलत व्यक्ति को सजा देना भी ईस्वर की देन है लेकिन अगर पूरा समाज ही चोर हो और चोर को सजा न दे तो इसमें ईस्वर का कोई दोष नहीं |

nitin tyagi said...

well saID सिद्धार्थ जोशी

MAHESH said...

pranam ji lekin aap ye bataye ki aap jo bol rahe hai bhagwan hai to aisa apradh kyo , isko aap samajhe ki bhagwan,atma,aur is duniya ka kabhi nirman nahi hua aisa koi samay nahi tha jab ye tino maujoud ho aap ko ye jankar hairani hogi ki duniya bhagwan ne nahi banayi aur ye duniya na kabhi khatam hogi sirf recyclebin hoti rahegi duniya ki koi cheez poori tarike se khatam nahi hoti cahe to aap azma le aur jo kehte hai ki bhagwan nahi hai us logo se main poochna cahounga ki 1) mare hue insan aur jinda insan ke sarir main kya diffrence hai aap vigyan ko aajma kar dekhe ki jinda insan ke sarir main kya hai jo mare hue insan ke sarir main nahi sirf aatma ya aap chetna keh sakte hai 2) jab bhagwan hi nahi to jab purush apne wife ke sath sambhog karta hai to sirf virya uske ghrbh main jata hai aur virya main shukranu hota hai kya ek mamuli shukranu aisa sarir de sakta hai agar aap ha kahenge to main kahoonga aap vigyan se aisi koi cheez nahi bana sakte jisme virya aur raj ko sath rakhe to insan banega 3)

aman said...

jai ram ji ki suresh ji

is prashn main sabhi ulajh jate hain kyonki aap bhagwan ji ke dikhne ki baat kar rahe ho jo is lok ki baat hai ..hum 2 prakar se jeevan jeete hai .1.loukik.2.parloukik lokik vastu nahi hai bhagwan unhen dekhne ke kiye aapko aaken band karni hogi .aapne andar jana hoga .jo aapke man main hain unhen aap khulli aakhon se kabhi nahi dekh sakte .hamari sakaratmak urja hi bhagwan hai jo sakaratmak parinam deti hai .jo accha hi hota hai ...................................agar manishiyon ki mane tho tulsi das ji kahte hai "NIRMAL MAN JO SO MOHI PAWA MOHI KAPAT CHAL CHIDRA NA BHAVA ..bhagwan ki anubhuti hi unka darshan hai jo bina aatma ke aadyayan se sambhav nahi .man ki nirmalta hi bhagwan ke hone ka ehsas kara sakti hai ....jai ram ji ki jai hind jai maa bharti

Anonymous said...

I BELIVE GOD BECUSE GOOGLE NOT GIVE THIS Q aNSWEA

ASHISH said...

jis tarah ullu ko nahi samjhaya ja sakta ki surya hai, thik usi tarah aap ko nahi samjhaya ja sakta ki bhgwan hai...........

deepa biswas said...

MURKH LOGO BHAGWAN NE INSANO KO PANGU ANDHA BAHRA NAHI BANAYA HE...USKI GANDI KHOPDI ME SOCHNE SAMAJHNE KI AKAL DI HE..TAKI APNI AKAL KA ISTMAL KARE..INSAN KARAM KARNE KE LIYE SWATANTRA HE..
DUNIYA ME JO ANYAY AUR SHOSHAN HOTA HE ..ISKA ZIMMEDAR BHAGWAN NAHI HE..MURKHO..
APNA PAP BHAGWAN PAR KIO MADTE HO???
PRAKRITI KA SHOSHAN KAROGE TO USKI LAT BHI KHANI PADEGI..
GAREEBO AUR KISANO KO PESE DENE WALE KI BAT KARNE WALA..KHUD KITNA YOGDAN KARTA HE..??
MURKHO ??? ISWAR TUMARI TARAH PANCH TAVO KE BANE HE KIYA ???
KIYA MURKHO KO HAWA DIKHAI DETI HE ??
KIYA MURKHO KO KHUSHBO DIKHTI HE ??
RAT KE VAKT BINA LIGHT KE APNA HATH TO DEKH NAHI PATA..BAT KARTA HE BHAGWAN KO DEKHNE KI

swami rupeshwaranand said...

सुरेश जी,
आपके तर्क अच्छे लगे। मै भी किसी समय इस अवस्था से गुजरा हुं। जिन शंकाओ का आपने उल्लेख किया है, किसी समय मेरे मन मे भी थी। मै अंधश्रध्दा निर्मुलन समिति का सदस्य भी था। आपमे और मुझमे फ़र्क इतना है कि, मै विचार तक सिमित नही रहा। मै ईश्वर को खोजने के लिये के लिये चल पढा। स्वामी विवेकानद जी के साहित्य ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया। मै उनका भक्त हुं। लेकिन शब्दो से प्यास नही बुझती। उसके किये प्रत्यक्ष अनुभव जरुरी होता है। उसके लिये मैने अनेक गुरुओ की शरण ली परन्तु कही मन स्थिर नही हुआ। अन्त मे मुझे मार्ग मिला और गुरु भी मिले। साधना भी की। आज मै कह सकता हुं कि, हां ईश्वर है। मै कोरी किताब पढकर नही कह रहा हुं और न ही मै किसी प्रकार क नशा करता हुं। रही बात आपके प्रश्नो की तो मै कोई ईश्वर नही हुं लेकिन जिसे ईश्वर की वाणी कहा जाता है, उस भगवत गीता को पढिये और समझ कर पढिये। अगर समझ मे नही आये और फ़िर शंकाएं उत्पन्न हो जाये तो मुझसे प्रश्न करे मै आपके उत्तर देने प्रयास करुंगा।
मै अन्त मे इतना ही कहुंगा कि, ईश्वर को प्रसन्न करने के लिये आस्तिक होने या ना होने से कोई फ़र्क नही पडता। सिर्फ़ हमारे कर्म सत्कर्म होने चाहीये।
अपनी एक और बात कह रहा हुं, इस पर गौर किजिएगा। '' बंदगी का था कसुर बंदा मुझे बना दिया, मै खुद से था बेखबर तभी तो सिर झुका दिया, वो न थे मुझसे दुर उ मै उनसे दुर था ,आता न था नजर तो नजर का कसुर था।
हर हर महादेव

Anonymous said...

शुक्र कर खुदाया मैने तुझे बनाया

तुझे कौन पुजता थ मेरि बन्दगी से पहले

शाकिर खान said...

जब भी हम भगवान् या ईश्वर की बात करते हैं तो लोग भाग जाते हैं . कुछ पीटने के लिए दोड़ पड़ते हैं . कुछ हमेशा के लिए नाराज़ हो जाते हैं कुछ गाली देते हैं .
इन सभी सवालों का जवाब इस्लामी सिधान्तों में है .
आप से अनुरोध है के आप इस्लाम में इश्वर के अश्तित्व और पुनर्जन्म के सिधांत को अच्छी तरह समझें .
मुसलमान भारत में हजारों साल से बसे हैं लेकिन आज तक दूसरी कोमों को यह पता ही नहीं चला के उनका सिधांत क्या है . उन्होंने शायद कोशिस ही नहीं की बस आँख बंद करके एक कट्टर पांति सम्प्रदाय मान लिया .
धन्यवाद .

Suraj said...

Suresh ji maine aapke bauhat se lekh parhe hai , achhe bhi lage.
Par pata nahi aapka yeh lekh parh kar jo aapki chhabi mere mann me doosre lekh parh kar bani thi , hilti nazar aayi. Bhagwan hai ya nahi............. yeh ek bekar ka prashan hai, aap jaise budhi jeevi jo hindutav ki baat karte hai , uski agar aisi soch hogi to ho chuka parivartan. So bhagwan koi dekhne ki cheez nahi hai, aankhe bandh karo aur apna aap usko smarpit karo, aapko bhagwan ki shakti ka ehsas ho jayega.

So be calm , try for some time to be thought less for some time , certainly you will feel the POWER OF GOD

JAI HIND JAI SHREE RAM

Manish Dixit (Your Facebook Friend) said...

Bhagwan (Pramatma, Khuda ya God) Kya Hai?
Ek Power.. Jise Logo ne apni Samajh ke mutabik Naam diya hai.. (God, Bhagwan, Pramaatma, Khuda..) Bhagwan shabd Sanskrit ka shabd hai.. Jo Bhgg + Vaan se mil kar banaa hai.. Bhgg ka hindi mein arth hai.. Yoni (Vagina) aur Vaan ka arth purush ling(Penis) se juda huya hai.. Jahan dono ka milan hota hai.. Wahan Creation hoti hai.. Aur wahin "Wo Power" Kaam karti hai... Dusre shabdon ke meaning samajhne bhi asaan hain.. Lekin main Seedhe Seedhe Power shabd pe aata hoon...
Ek hi Power hai.. Wo hai Surya (Sun).. Wahi hai jo Center mein hai.. Aur baaki sabhi planets uske ird-gird ghoom rahe hain.. Yadi Surya(Sun) na rahe.. to koi bhi doosri Power kisi bhi planet ko.. ya hum sabko bachaa nahi sakti... Lekin Surya (Sun) to hamesha rahega.. aur ek din sabhi planet uss mein Samaa jaayenge.. Kyun ki wahin se Sabhi Planets bane hain.. Hamari prithvi (Earth) bhi.
Ab yadi samajh sako to prithvi bhi ek Power hai.. jo Surya se Nikli hai.. Aur Hum?
Hum Sabhi Jaante hain ki Hamara Shareer (Body) 5 tattvon (Elements) se bana hai.. Prithvi(Sahi Shabdon mein Mitti), Jal (Water), Vayu (Air), Agni aur Akaash. Kya Aap Jaante hain.. ki prithvi bhi inhi 5 Tattvon se bani hai.. Aur yeh 5 Tattav Prithvi ko Surya se Mile.. Kaise? Hum Jaante hain ki Surya Gason ka ek gola hai.. Phir Jal(Water) tattav kaise Surya se mil sakta hai? Simple H2O = Water
Prithvi mein bhi 70% Water hai.. Aur Hamari Body mein bhi.. Apni body ko Zinda rakhne ke liye hum jo bhi khate-peete hain.. Wo Sab hamein Prithvi se mil raha hai.. to kya aapko yeh nahi lagta ki hum iss Prithvi ka hi ek hissa hain..issi se paida huye hain aur ek din issi me mil jaayenge.. Aur Prithvi ek din Surya mein.
Hamari Body humse chal rahi hai.. Yani Hum bhi ek chhoti si power hain.. jo khud ko chalaa rahe hain.
Thoda deep jayen.. to pataa chalta hai ki yeh chhoti si power bhi Surya ka ek hissa hai.. Jise hum Aatma kehte hain.(Isko Jaan'ne ke liye Meditation mein jaana zaroori hai)
Aur bhi bahut kuchh hai kehne ko.. lekin aakhir mein sirf itna hi.. ki Jitne bhi Dharm bane huye hain.. Wo sab Aadmi ne banaye huye hain.. doosre shabdon mein apni-apni Dukane(Shops) khol rakhi hain.. Har Koi yehi kehta hai.. ki Mera Dharm badaa... Sirf ek "Ego". Yeh Dharmik Log Hamare Raj Netaon se bhi jayada chalaak hain.. Aam Admi(Jo Abhi tak Soya huya hai.. Usi ko Aam Aadmi kehte hain) ko lootne ke liye. Aur yehi Aam Aadmi apne saath-saath Jaage huye logo ke bhi dukh dard ka karan banaa huya hai... kyun ki Inki Sankhya (percentage) bahut jayaada hai.
Koi inko batao ki kya kabhi Surya ne kaha hai.. ki Meri Pooja karo... Kya Prithvi ne kabhi kuchh manga hai..Jiski wajeh se hum sab zinda hain.. Aadmi ne Dharm banaye.. aur kaha ki inki pooja karo...Kyun? Simple.. lootne ke liye... na ki jagane ke liye.
Aakhir Mein ek Sawaal .. Jisko bhi dharmik log Pramatma, Khuda ya God kehte hain... Wo kaun si bhasha samajhta hai? Kam se kam yeh to maan lo ki Bhasha bhi Insaan ki banayi huyi hai... Aur Jitni bhi dharm ki kitabein hain wo kisi na kisi bhasha mein hi hain. Jo dharmik log hi samajh sakte hain.. Kisi ka Pramatma, Khuda ya God Nahi.
Ab Shayad kuchh samajhdar log yeh bhi sawaal karen.. ki Surya ko bhi to kisi ne banayaa hoga. Hum Sab Surya ke karan hain.. Hamein Oxygen bhi mil rahi hai.. toh Surya ke karan.. Pehle apne pramatma ko to pehchaan lo.. yedi Surya ko bhi kisi ne banaya hai.. to Simple yaar... Har Pramatma ko kisi na kisi ne banaya hai.

Manish (Sirf ek Naam)

lalit said...

Please see www.vedmandir.com, www.darshanyog.org. In the second website go to download-hindi books-paravidya part 1.
You can also get in touch with the Swamis of these ashrams.

vikash kumar singh said...

KYA APP KE PASS DIMAAG HAI TO KITNA HAI ? KYA SOCHTE HAI TO KITNA SOCHTE HAI USKI KITANI LIMIT HAI KYA APP USE BATA SAKTE .AUR APP KE DIMAG KA SIZE KYA HAI ? USKO KABHI APP NE DEKHA HAI? APP KITNE BUDDIMAN HAI ISKO SAHI TARIKE SE BATA SAKTE HAI KYA ? HAI DO APP ISKA JABAB DE HAME AUR AGR YE SAB NAHI HAI TO KYA HAM MAAN LE APP KE PASS DIMAG NAHI HAI APP NAHI SOCHTE HAI APP BUDDIMAAN NAHI HAI ?
AUR APP KE APSS DIMAG HAI LEKIN DEKH NAHI SAKTE CHU NAHI SAKTE HAI USI TARH BHAGVAN HAI LEKIN DEKH NAHI SAKTE HAI .

Gita's blogs said...

Bhai sahab is vishay par to aamne samne baat ho to hi kuchh nishkarsh nikal sakta hai. Vastav me jo bhi prashn aapne poochhe hain vah ek tarkik buddhi ki upaj hain. Yah bahut achchha hai. Kintu Ishvar ke hone ka sabse achchha saboot to hum apni roz marra ke jeevan me hi dekh lete hain. Sabse pratham mai kahna chahoongi ke Ishvar hai or iska sabse bada prman hai vah theory jo kahti hai ki bina karan ke koi bhi karya hona sambhav nahi. Jab koi patta bhi hilta hai to uske peechhe bahut se karan ho sakte hain jaise hava, koi prani ya anya koi or karan. Ab apni tarkik buddhi se sochiye ki jab ek patta bhi bina karan ke nahi hilta to yah brahmand kaise or kyukar ban sakta hai iska matlab koi to karan ya shakti hai is sab ke peeche. Isi shakti ko Ishvar ya Brahm ka naam diya gaya hai. Ab rahi baat iski ke yadi ishvar hai to vah dikhta kyo nahi. Yah bilkul aisa hi hai jaise hava to hai kintu dikhti nahi mahsoos hoti hai. Ishvar ke hone ko bhi aap kadam kadam par mahsoos kar sakte hain. Vah aapki antaratma ke dvara aapko samay samay par sahi galat karne ki prerna deta rahta hai.

Baat yadi papiyo ke vinash ki aati hai to koi bhi manushya na poori tarah paapi hota hai or na poori tarah dharmatma. Or sabko yathayogya hi phal milta hai. Vastav me galat kaam ham karte hain or dosh Ishvar ko de dete hain jabki yadi poori tarah se socha jaye to usne hame karm karne me poori tarah svatantr chhora hai. Yadi uski marji se hi sab hota to doshi bhi vahi hota koi bhi manushya nahi ye hi siddh karta hai ki hum karm karne ko poori tarah svatantr hain tatha jaise hum karya karte hai vaise hi hamari buddhi or sanskar ban jate hain or hum apni buddhi dvara sadaiv usi prakar ke karm karte rahte hain or vaisa hi bhogte rahte hain. Dekhiye kisi ke gareeb ya ameer hone se hi uske achchha ya bura, sukhi ya dukhi ka andaja nahi lagaya ja sakta. Koi manushya galat tareeke se paisa kamata hai tatha ek badi gari or bangle aadi ka swami ban jata hai to yah uske us karm ka phal hai jo usne paisa kamane ke liye kiye kyoki uski mati paisa hi sochti hai to vah sahi galat kaise bhi paisa kamata hai kintu yah siddh nahi hota ki jo ameer hai vah sukhi hai. Na jane kitne rog, dar, aatmglani or avhelna ka jeevan jeete hain aise log or jab inka bhanda photata hai to???? Yadi in ameeron ko sada hi aage ki line milti hai to isse bhi yah sabit nahi hota ki yah Bhagvan dvara kiya hua bhed hai. Yah bhed to pujari ne kiya kintu agar aap yah dekhe ki tap kiska adhik hai to aap samajh jayenge ki paise vala jaha sirf apne paiso dvara pujari ko hi khush kar paya vahin gareeb aadmi ne apne tap dvara Ishvar ko prassan kiya. Us Ishvar ne manushya ko sarvottam kriti banaya kintu yah manushya ki mati hi hai jo ise bigad rahi hai. Or aap yah bhi mahsoos karenge ki jaha hum use bigad rahen hai vahin hami ise sudharne ke liye bhi fikr mand hain. Or jab achchhe or bure ka final sangharsh hota hai to achchhai ki takat adhik ho jati hai arthat burai ke peechhe ve log hote hain jo svarthi hote hai tatha achchhai ke peechhe log bina svarth chalte hain. Is prithvi or is par upasthit vatavaran ka yadi apni agyanta or svarth me humne vinash kiya to ab iske liye bhi hum hi khade ho rahe hai koi aya janvar nahi. Jo bhi prakrtik aapdayen aati hai unka bahut bara karan manushya dvara prakriti se chher chhaar hi hai. To aap nahi kah sakte ki ye prakritik aapdayen kyo aati hain. Iske janak hum svayam hi hain. Ishvar jis prakar manushya ko apne karmo me svatantr chhorta hai usi prakar vah nyay kari bhi hai yadi humne is prakriti ko bigara to nyay hoga or uska dand bhi hame hi bhogna hoga.

Suna bhi hoga Bhagvan Sri Krishna ne kaha bhi hai
Karmanye Vadhikaraste...
Arthat karm karna hamare adhikar me hai. Chipnoor ji mai koi vidvan to nahi par poorn aastik jaroor hoon or jab bhi koi prashn uthta hai to uska javaab dhoondne me lagna mera svabhav hai or ab tak jitna bhi khoja hai jitna adhik khojti jaati hoon ishvar par vishvas gaharata jata hai.
Dhanyavaad
Gitanjali Sharma

Abhishek said...

सुरेश भैया से नम्र निवेदन है की वेदों और पुराणों का अध्यन करें| और सबसे बड़ा तर्क ये है की अगर इश्वर नहीं होता तो उसका नाम भी नहीं होता|

क्यों की किसी भी कार्य के लिए कारन आवश्यक है|

सिर्फ तीन मॉस पहले तक मैं भी परम नास्तिक था|और यही सरे प्रश्न मुझे भी परेशां करते थे| किन्तु मुझे स्वयम आत्म ज्ञान हुआ है| और ये इश्वर की कृपा ही है|

और स्वच्छ सन्देश से मेरा आग्रह है की कुरान और हदीस फिर से पढ़े और हमें इस्लाम के बारे में न ही बताये तो अच्छा है क्यों की मैं मोहम्मद सल्ल. और इस्लाम के बारे में अच्छी तरह से जानता हूँ|

जवाहर जैन said...

भय की कोख से भगवान का जन्म होता है हिंदुस्तान मे आस्था को ही भगवान मान लिया जाता है धर्म समझ लिया जाता है और धार्मिक ढकोसला शुरू हो जाता है जिसका वास्तविक धर्म से कोई लेना देना नहीं होता

Ravinder Jayalwal said...

धर्म और भगवान् को जानने के लिए विवेकानंद और वेद और उपनिषद को पढ़ें , ये सबसे अच्छे स्त्रोत हैं . चार वेदों को समझने के लिए उपनिषदों की रचना की गए और उपनिषदों को समझने के लिए डॉ चंद्रप्रकाश दिव्वेदी ( चाणक्य धारावाहिक के निर्माता ) ने उपनिषद गंगा नामक सीरियल की रचना की हैं , जहाँ आप जान पाएंगे मैं कोन हूँ , इस संसार को किसने बनाया, जीवन का उद्देश्य क्या है, संघर्ष के लिए तैयार कैसे हों, . प्रेम क्या है, कर्म क्या है, आदमी खुश क्यों नहीं है, जिस सच्ची खुशी की मुझे तलाश है वो कहाँ मिलेगी, जीवन की अस्पष्ट गुत्थी को सुलझाने के लिए मार्गदर्शन और जीवन के हर दिन के सवालों के जवाबो को जानने के लिए देखे उपनिषद गंगा खासतोर पर युवाओं के लिए 11 मार्च 2012 से हर रविवार को सुबहे 10 बजे DD1 पर. यहाँ आप उपनिषदों के रूप में लिखा गया हजारों वर्षों के ऋषियों के ज्ञान को सरल व् रोचक रूप में समझ पायंगे. ये सभी एपीसोड़े youtube पर भी उपलब्ध हैं see all episode from http://www.socialservicefromhome.com/2012/03/best-tv-serials-for-kids.html

Anonymous said...

ऊपर बहुत से भद्र लोगों की टिप्पणियों को मैंने अत्याधिक तनमन्यता से अधध्यन किया तत्पश्चात निष्कर्षतः मुझे यही प्रतीत हुआ की शिक्छित लोगों के लिए ही ईश्वर शुलभ है परंतु भद्रजन कहेंगे की सत्संग करो ज्ञान प्राप्त होगा सही है ज्ञान प्राप्त होगा परंतु किसका परमात्मा का या फिर उक्त ज्ञानी की अवधारणा को पुषट करने वाला एक क्लोन तैयार होगा एक नए ज्ञानी के रूप मे
मनुष्य ही नही पशुवों को भी सूर्य की उषणता का अनुभव हो जाता है बिना किसी ज्ञान के यहाँ तक की पेंड पौधों को भी किसी ज्ञान की आवश्यकता नही पड़ती
फिर ईश्वर या जो भी कहें को हम क्यों नही अनुभव कर पाते कुछ लोग कहेंगे की पात्रता होनी चाहिए या अनेकों तरह के तर्क प्रस्तुत करेंगे जो हमे संतुष्ट तो नही कर पाएंगे पराजित अवश्य करेंगे या शायद हम इन तर्कों से ऊब कर विवाद से बचने हेतु उनके तर्कों को स्वीकार कर लेंगे परंतु अंगीकार नही कर पाएंगे
अभी अभी मेरे मन मे एक विचार पनपा की घोड़े का ईश्वर कैसा होगा क्या हमारे विचार के अनुरूप ..... आगे फिर कभी अनेकों प्रश्न हैं

Anonymous said...

अभी अभी मेरे मन मे एक विचार पनपा की घोड़े का ईश्वर कैसा होगा क्या हमारे विचार के अनुरूप या फिर उक्त घोड़े के अनुरूप और अगर उक्त घोड़े के अनुरूप तो शायद ही कोई घोडा किसी मानवीय आकृति को ईश्वर के रूप मे स्वीकार कर पाएगा और जहां तक रही बात अमूर्तिपूजकों की तो घोडा शायद अमूर्त रूप नामक इस शब्द से भी अंजान होगा
परंतु इसका कदापि यह अर्थ नही है की मै ईश्वर की सत्ता को नकार रहा हूँ वह हो सकता है एक संभावना है की वह हो सकता है परंतु जरूरी नही की वह हमारी सोचों के अनुरूप हो या यूं कहें जैसा भाई चिपलूंकर जी ने जिन मुद्दो या फिर तमाम बाकी बचे मानवीय मुद्दों से उसका कोई रिश्ता हो या फिर वह रिश्ता रखना चाहता हो हो सकता है वह सम्पूर्ण प्राणी जगत को निरपेक्ष भाव से देख रहा हो या फिर इसमे उसकी कोई रुचि न हो होने को कुछ भी हो सकता है लेकिन वह अकर्मण्य नही हो सकता अगर वह है तो और इसे शायद सभी लोग बखूबी जानते होंगे क्योंकि प्रकृति वही वस्तु अस्तित्वमान है जो गतिशील है परंतु अगर ईश्वर है तो किन क्रियाओं मे क्रियाशील है मुख्यतया यही विवाद का विषय है
और यही पर सारे पंथों (मै केवल सनातन धर्म को धर्म मानता हूँ बाकी सभी धर्मों को पंथ से ही संबोधित करना मेरी आदत है परंतु किसी धर्म की आलोचना करना मेरा स्वभाव नही है और न ही खुद के धर्म को दूसरे के पंथ से श्रेष्ठ कहना मेरी आदत )
बहुत से इस्लामिक तथा हिन्दू भाइयों ने अपने पंथों के नजरिए से ईश्वर को सिद्ध करने का प्रयाश किया है हो सकता है की वह खुद के प्रयाश मे खुद को सफल समझ रहे हों लेकिन अगर वह सफल हो गए होते तो मेरे मन मे कुछ लिखने की जिज्ञासा ही शेष न होती जिज्ञाशा का तात्पर्य ही यह है की वह सफल नही हुए
किसी पंथ विशेष की जीवन शैली या उसके आधिकारिक लेखों / ग्रन्थों को पढ़ कर उनके जीवन के सिद्धांतो को अपना कर ईश्वर को जाना जा सकता तो आज तक इस विषय पर कुछ लिखने को शेष ही न बचता यह जिजीविषा यह खोजने की प्रबल जिज्ञासा ही सिद्ध करती है जिसे हम खोज रहे हैं उसे हमने नही पाया और शायद जिसने पा लिया होगा वह हमारे बीच इस विषय पर बहस करने के सिर नही फोड़ेगा
यदि किसी पंथ ने गनितीय समीकरण की तरह ईश्वर को सिद्ध कर लिया होता तो आज केवल और केवल वही पंथ अस्तित्व मे होता ,,आसमान मे दो चमकती चीजें हैं दोनों का अपना महत्त्व है चाँद और सूर्य ,,लेकिन आज तक इस विषय पर बहस नही हुआ की ये नही वो सही या वो नही वह सभी लोग सूर्य को सूर्य मानते हैं और चंद्रमा को चंद्रमा वियाद नही होता कभी फिर ईश्वर को लेकर ही क्यों की यह सच्चा है या फिर वह या की यह मार्ग सही है या फिर वह
नदियां आखिरकार समंदर मे ही मिला करती हैं और वही खारा जल पुनः मीठे जल मे परिवर्तित होकर हमारे लिए सुलभ हो जाता है ,,
और अगर ईश्वर नही होता तो इस विषय पर विवाद ही नही होता (बस सोचने का विषय यह है की हमारी सोचों के अनुरूप है या उससे परे ???????

Gajendra said...

kafi accha sawal h aapka, or kuch logo k comments bhi padhe h maine, sabke apne apne vichar h. ok pahle hum vichar karte h ki bhagwan nahi h or jitne bhi jeevatma is dharti par h wo sirf or sirf science h ya yu kaho ki wo kuch minerals k aapas me milne se utpann huye h, science ne proove bhi kiya h ki saare manusyo k DNA me 1 nischeet sankhya me cromosom hote h to fir aisa kyo h ki kisi bhi 2 aadmi k vichar ya aachran 1 jaisa nahi h. kyo ? agar hum 1 hi cheej se bane h to hum me itni visamtaye kyo ? so its proves that we are under control of someone, who directs us to do things in different ways. or bhagwan par viswas nahi hone ki sthiti waisi hi h jaise hum apne janm dene wale ko bhool jate h unke budhape me kyoki hume ab unki kamai nahi milti wo sirf kharcha karwate h.... ab aate h k agar bhagwan h to fir is duniya me itni burai kyo h ? jara socho 1 insaan ko apna jivan jeene k liye kya chahiye ? kya motor car ? jahaj ? nahi use chahiye khana or rahna. lekin agar aadmi itne tak hi simit rahe to kya jeevan chal sakta h ? nahi kyoki koi bacche paida hi nahi karta. to ye baat clear h ki jeevan chalta rahe to aadmi ko jeende rahne k alawa bhi kuch karna padega. or jub koi kuch karega to ye nischeet h ki wo kuch galtiya bhi karega. or dheere dheere burai suru. ab bhagwaan ki sthiti bilkul hamare jaisi h, jaise hum apne baccho ki bahut si galtiyo ko muaf kar dete h to bhagwan bhi karte h. lekin jub hamare baccho ki galtiya hadd se jyada badhti h to hume unko chanta bhi marna padta h, usi tarah bhagwan bhi avtar lete h or chanta marte h....ab aap kafi gyani purus h khud samajh sakte ho or mere likhe me koi khami ho to use thik bhi kar sakte ho.....

shivam said...

mai bhagwan ko manta hu. bhagwan dikhai kyo nahi dete ye ek accha saval hai mai v ek saval puchta hu kya koi aisa aadmi hai jiske dimak na ho yadi nahi to dimak dikhai kyo nahi deta.. yadi ishwar ko shradha ki najar sw dekhoge to vo hai lekin yadi use shradha ki nazar se nahi dekhte ho yo vo kanhi nahi hai

Dr.Adhura said...

lekh thik likha hai. bhagwan ko mante hai jante nahi . jante is liye nahi kyo ki bhagwan hota hi nahi kewal ek tark hai.

Anonymous said...

MAI MANTA HU SURESH JI