Sunday, January 28, 2007

Republic Day of India and Media Cooverage

गणतन्त्र और मीडिया (२) 

मेरे पिछले चिट्ठे के जवाब में मुझे बहुत सारे ई-पत्र प्राप्त हुए. जिसमें से भाई सत्यम रविन्द्र नें कहा कि सिर्फ़ आलोचना नहीं करें, उसका समाधान भी सुझायें... बिलकुल सही कहा... तो मेरी निगाह में मीडिया (Media) को सुधारने के लिये जनता को ही आगे आना होगा... उदाहरण के तौर पर म.प्र. के मालवा (Malwa) क्षेत्र में एक अखबार है "नईदुनिया"... इस अखबार ने एक नई पहल शुरू की है, कि प्रत्येक सोमवार को "सकारात्मक सोमवार" के नाम से अखबार का मुख्पृष्ठ सिर्फ़ सकारात्मक समाचारों से भरा होता है... पर्यावरण, जनचेतना, समाजसेवा आदि, ना कोई खून-खराबे, बलात्कार, अपहरण, नेतागिरी आदि की खबरों से सप्ताह का आरम्भ नहीं किया जाता... यह एक उम्दा पहल है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिये... तडक-भडक वाले, मिर्च-मसाले वाले, समाचार पत्रों का बहिष्कार करके उन्हें सीधे रास्ते पर लाने की कोशिश की जानी चाहिये.. उन चैनलों को लोगों को देखने से हतोत्साहित करना चाहिये (शुरुआत अपने परिवार से करें... हमारे परिवार ने भी लगभग सारे समाचार चैनल देखना बन्द कर दिया है सिर्फ़ दूरदर्शन पर दस मिनट खबरें देख लेते हैं बस... हमें अभिषेक की शादी से क्या लेना-देना, या सौरव गांगुली टीम में रहें या नहीं हम क्यों दुबले हों)... सिर्फ़ सकारात्मक चैनल / कार्यक्रम (डिस्कवरी, अंताक्षरी, सारेगामा, सब टीवी के कुछ कार्यक्रम आदि) और सकारात्मक समाचार पत्र पढने की आदत डालनी होगी... और सिर्फ़ बहिष्कार से काम चलने वाला नहीं है... गाहे-बगाहे इन प्रतिकूल चैनलों की कडी से कडी आलोचना भी करना होगा... (Mouth Publicity is the Best Publicity)... अपने मिलने-जुलने वालों, रिश्तेदारों के साथ चर्चा में ऐसे चैनलों और अखबारों की आलोचना करें... लोगों को उन्हें ऐसे कार्यक्रम देखने से हतोत्साहित करें... धीरे-धीरे ही सही माहौल बनेगा... सरकार इस मामले में कुछ नहीं करने वाली... लोगों को अपना नजरिया बदलना होगा (टेस्ट बदलना होगा).... तभी कुछ हो सकता है...

5 comments:

Divine India said...
This comment has been removed by the author.
Divine India said...

यह बिल्कुल अव्यवहारिक है…हर व्यक्ति का समाचार देखने का अपना नजरिया होता है…अनपढ़ व्यक्ति को क्या पड़ी है कि सामाजिक व राजनैतिक मुद्दों को देखेगें उनकी भुख इन सिद्धांतो से विकट होती है…एक बात मैं अवश्य कहना चाहुँगा…हमें बड़े रुप में जागरण करना होगा लोगों को रोक-2 कर बताना होगा…सबसे पहले भ्रष्टाचार को अपने आस-पास या यूँ कहें अपने 'घर' से दूर करने की मुहिम छेड़नी होगी तभी बद्लाव उभरेगा…

Shrish said...

ठीक कहा दिव्याभ ने आखिर इस तरफ से आंखें मूँद लेने से समस्याएं खत्म तो न हो जाएंगी। समझदारी उनका समाधान करने में है न कि उनसे बचने में।

संजय बेंगाणी said...

अपनी समझ के हिसाब से बलाव के लिए प्रयत्न करें, सरकार को न अवसर दें, न ही अपेक्षा रखे. आखिर हम लोकतंत्र है. सरकार का हस्तक्षेप कम से कम हो यही अच्छा है.

टिप्पणी के लिए वर्ड वेरीफिकेशन या केवल ब्लोगर जैसी बाधाएं न रख कर आपने अच्छा किया है.

Raag said...

सकारात्मक सोमवार वाला तरीका बेहकरीन लगा। नारद पर भी एसा प्रयास किया जा सकता है।