Saturday, January 27, 2007

Republic Day of India 26th January

गणतन्त्र और हमारा मीडिया

प्रिय भाईयों रवि जी एवं संजय भाई,
हौसला-अफ़जाई के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद.
सबसे पहले ब्लोग के तौर पर मैं अपने विचार हमारे भारत के तथाकथित "सबसे तेज" और "जागरूक" इलेक्ट्रानिक मीडिया को साष्टांग दण्डवत करते हुए करता हूँ....
कल ही गणतन्त्र दिवस (Republic Day of India) था और मै सोच रहा था कि लोगों, मित्रों को बधाई दूँ या उनसे शोक व्यक्त करूँ.... आज से पचास-साठ वर्ष पूर्व जिस आम आदमी को बाहर धकियाकर विशिष्टजनों के जिस गणतन्त्र का निर्माण किया गया, देखते-देखते कब वह "गनतन्त्र" बन गया आम आदमी जान भी नहीं सका... और जिन मूलभूत अधिकारों की गाथा हमें सुनाई गई थी वे तो शुरू से ही आम आदमी के लिये नही थे, ना कभी मिलने थे, ना आगे भी मिलेंगे... जो थोडी-बहुत आशा एक जमाने में उन्मुक्त और खुले प्रेस (Free Press) से थी अब वह भी धीरे-धीरे क्षीण होती नजर आ रही है... मैं अपने भाईयों से पूछना चाहता हूँ कि क्या वे आज के हमारे मीडिया कवरेज से संतुष्ट हैं, क्या उन्हें लगता है कि हमारा प्रिन्ट (Print Media in India) और इलेक्ट्रानिक मीडिया (Electronic Media) अपनी भूमिका का सही निर्वहन कर रहा है ? क्या हमारा मीडिया बाहुबलियों, धनवानों, सेलेब्रिटीयों (??), और छिछोरे दो-कौडी के नेताओं का पिछ्लग्गू बन कर नहीं रह गया है ? आये दिन हम मीडिया में इन लोगों के तमाशे देखते रहते हैं... चलो माना कि मीडिया का सेलेब्रिटी के पीछे भागना उनके धन्धे का एक हिस्सा है... लेकिन उन तथाकथित सेलेब्रिटीयों के काले-पीले कारनामों को बढा-चढाकर पेश करना मानो किसी ने फ़ुट्पाथ के गरीब मजदूरों पर गाडी चढाकर हम पर या इस देश पर कोई बहुत बडा अहसान कर दिया हो.... या फ़िर किसी भूतपूर्व नशेडी ने गांधीगिरी का अभिनय करके अपना कोई कर्ज उतार दिया हो... हमे बताया जाता है कि उस बिगडैल नवाब ने कौन सी शर्ट पहन रखी थी जब वह फ़लाने मन्दिर में गया था.... उसने कैसे न्यायपालिका को मूर्ख बनाया... कैसे उसके यह कहने से कि "वह परिवार का इकलौता कमाने वाला है, और उसकी एक लडकी है, जिसकी देखभाल के लिये उसे जेल से बाहर रहना आवश्यक है" मानो यदि वह जेल चला गया तो वह लड्की सडक पर आ जायेगी... जबकि जिस दिन संजू बाबा रिहा (शुक्र है अभी पूरी तरह से रिहा नहीं ) हुए उसी दिन हमारे कश्मीर (Kashmir) में एक जवान मेजर मनीष पिताम्बरे भी शहीद हुए, लेकिन शहीद होने से पहले उसने हिजबुल मुजाहिदीन के एक सुप्रीम कमाण्डर को मार गिराया.... और हमला करने से पहले मेजर पिताम्बरे ने कभी भी यह नहीं कहा कि... "मै अपने परिवार का इकलौता कमाने वाला सपूत हूँ और मेरी एक बेटी (डेढ वर्ष की) है जो अमेरिका में नहीं भारत में ही पढती है".... लेकिन मेजर पिताम्बरे का जिक्र तो दूर... उसकी अन्त्येष्टि को भी हमारा "सबसे तेज" मीडिया कवर नहीं कर पाया, जो मीडिया एक बालक के बोरिंग के गढ्ढे में गिर जाने पर... उसका लाइव टेलीकास्ट (Live Telecast) करके पैसा कूटने और अपनी "टीआरपी" (??) बढाने में लगा था... सेंसेक्स (Sensex) के जरा सा ऊपर-नीचे हो जाने पर हाय-तौबा मचाने वाला हमारा मीडिया विदर्भ और आन्ध्र के किसानों की मौत नहीं दिखाता, क्योंकि वहाँ जाने से पहले (यदि उसकी सही और सच्ची रिपोर्टिंग करनी हो) उस चाकलेटी पत्रकार को "होमवर्क" करना होगा... लेकिन यदि अमिताभ यदि उसे रात को दो बजे साथ में मन्दिर चलने को कहेगा तो वह तत्काल चल देगा... क्योंकि वहाँ तो उसे और उसके चैनल को "माल" मिलने वाला है... ये पत्रकारिता है ? ये है हमारे मजबूत गणतन्त्र (?) का मीडिया ? जिस मीडिया को आटे-दाल के बढते भावों से अभिषेक-एश्वर्या की शादी की चिन्ता ज्यादा हो... वह मीडिया किस काम का ? कम से कम प्रिन्ट मीडिया कुछ हद तक इस मानसिक बीमारी से बचा हुआ है... (हालाँकि प्रिन्ट मीडिया भी धनकुबेरों के हाथ की कठ्पुतली ही है, जो उनका भोंपू बजाता रहता है) लेकिन फ़िर भी प्रतिस्पर्धा के कारण कोई अखबार कांग्रेसी है, कोई भाजपाई (ऊपरी तौर पर दिखाने के लिये), कोई सांप्रदायिक है, कोई धर्मनिरपेक्ष (??)... (हाँ.. जब जमीनों पर कब्जा करने की बात हो, कागज का कोटा बढवाना हो... सरकारी विग्यापनों की जुगाड लगानी हो, तब "हम सब एक है" वाली तर्ज पर आ जाते हैं).. फ़िर भी इनकी हालत इलेक्ट्रानिक मीडिया से कुछ बेहतर है (फ़िलहाल)... फ़िर वही सवाल जेहन में कौन्धता है... ये हम कहाँ जा रहे हैं... क्या वाकई हमारा प्रजातन्त्र (?) मजबूत हो रहा है (जबकि देश के लगभग १५ प्रतिशत हिस्से पर नक्सलियों का अघोषित कब्जा हो चुका है) (हो सकता है कुछ लोगों को यह आँकडा ज्यादा लगे... लेकिन सच्चाई यही है)...लिखने को तो बहुत कुछ है भाईयों.... बाकी अगले चिट्ठे में... पहला ही चिट्ठा है... हो सकता है कुछ गलतियाँ हुई हों... आलोचनात्मक प्रतिक्रिया के इन्तजार में... यह कच्चा चिट्ठा आपके नाम....

4 comments:

Upasthit said...

आपसे इस बात मे पुरी तरह से सहमत हूं की, मिडिया , जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा, और अब तो जनता की खबरों के प्रति उपेक्षा का एक विशेष कारण भी मीडिया ही बनता जा रहा है । गणतंत्र के चोथे पयदान का इस प्रकार भ्रामक ही नहीं उदासीन भी होना निराशाजनक है । जिनसे और जिनके राज से लड़ हमने कभी गणतंत्र ही आधारशिला रखी थी, आज उनका ही एक बदला रूप हावी है, समाज पर ही नहीं, मीडिया पर भी ।
पर मात्र कमियां गिनाने भर से हम मुक्त नहीं हो जाते, समस्या से परे नहीं जा सकते । मीडिया की भी लाचारियां है, बाजार सब पर हावी है, अभी हाल ही मे हुये एक मत संग्रह मे देश की जनता ने, सेना के जवानो को अपना सच्चा नायक कहा..... जन अभी भी सोये नहीं । आपके लेख के आगामी अंक से ऐसी ही आशायें है, कि आप मात्र पर्छिद्रान्वेशण ही नहीं करेंगे, अपने अनुभव, ज्ञान और भाषाधिकार से समाधानों को भी सामने लायेंगे.....

सागर चन्द नाहर said...

बहुत सही कहा आपने, मीडिया के लिये आज कोई मुख्य समाचार है तो राखी सावंत का प्रेम का इकरार और ऐश-अभिषेक का विवाह ही है।
एक चैनल ने राखी के अपने बॉय फ़्रेन्ड अभिषेक से प्यार के इकरार को ही मुख्य समाचार बना कर आधे घंटे का एपिसोड दर्शको के माथे मार दिया। जिसमें मीका- चुंबन प्रकरण से लेकर बिग बॉस तक शामिल था।
हिन्दी चिठ्ठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है।

rupesh mishra said...

aj se apke saare purane post padna chalu kar diya hai. sab par ek comment to bad hi jayegi, jai shri ram.

P K SURYA said...

MAI 2010 SE SARE COMMENT PADHTE HUE APKE FIRST COMMENT KO BHI PADHA HE SATYA JAN KE ANAND BHI ATA HE OR KHOON BHI KHOLTA HE AP TO APNE ANDAR KA UBAL NIKAL RAHEN HEN SURUAT ME APKA SATH DE KE ME BHI NIKAL RAHAN HUN APNE SABHI DOSTO KO RISTEDARO KA APKE SITE K BARE ME BATAYA HE Pr TIME LAGEGA SAB KO PADHNE ME BECHARE KAHI SABO KO BIZLI KA JOR KA JHATKA LAGNE WALA HE SATYA JAN KAR PROOF KE SATH, JAY BHARAT