Wednesday, March 30, 2016

Farmer Village Budget 2016 : Congress Free India Step 2


ग्रामीण एवं कृषि आधारित बजट 2016 :- “काँग्रेस मुक्त भारत” का दूसरा चरण 


जब कोई पहलवान अखाड़े में लड़ने उतरता है, तो वह सामने वाले पहलवान की शक्ति को आँकने के लिए शुरू में थोड़ी देर तक हलके-फुल्के दाँव आजमाता है, और जब उसे पूरा अंदाजा हो जाता है कि कौन सा दाँव लगाने से प्रतिद्वंद्वी चित हो जाएगा, तभी वह उसे पटखनी देने के लिए अपना पूरा जोर लगाता है. 2014 के आम चुनावों में नरेंद्र मोदी ने “काँग्रेस मुक्त भारत” का नारा दिया था. काँग्रेस के कुकर्मों की वजह से इस नारे में ऐसा आकर्षण पैदा हुआ कि देश की जनता ने मोदी को 282 सीटों से नवाज़ा और केन्द्र में पहली बार भाजपा बिना किसी की मदद के सत्तारूढ़ हुई. इसके बाद अगले एक वर्ष में जितने भी विधानसभा चुनाव हुए उनमें “मोदी लहर का हैंगओवर” ही काम करता रहा और भाजपा हरियाणा, महाराष्ट्र भी जीती. इसके बाद प्रतिद्वंद्वी पहलवान ने मोदी को दिल्ली और बिहार जैसे जोरदार दाँव लगाकर लगभग पटक ही दिया था... लेकिन ये पहलवान भी कच्ची गोलियाँ नहीं खेला हुआ है वह संभला और अब इस पहलवान ने शुरुआती कामकाज और विदेश यात्राओं द्वारा देश की छवि निर्माण करने के बाद “मूलभूत” मैदानी दाँव आजमाने का फैसला कर लिया है. 

2009 के आम चुनाव सभी को याद हैं, मनमोहन सिंह की सरकार इतनी भी लोकप्रिय नहीं थी कि उसे बहुमत मिल जाए, परन्तु काँग्रेस ने 2008 में 65,000 करोड़ रुपए का “मनरेगा” नामक ऐसा जोरदार दाँव मारा कि आडवानी चित हो गए. उन्हें समझ ही नहीं आया कि ये क्या हो गया. वह तो भला हो कलमाडी-राजा-बंसल-खुर्शीद जैसों का, तथा देश के युवाओं में काँग्रेसी भ्रष्टाचार के प्रति बढ़ते तीव्र क्रोध और सोशल मीडिया का, जिनकी वजह से नरेंद्र मोदी को उभरने और स्थापित होने का मौका मिला. मोदी ने इस मौके को बखूबी भुनाया भी और सीधे प्रधानमंत्री पद तक जा पहुँचे. संभवतः नरेंद्र मोदी ने सोचा था कि 44 सीटों पर सिमटने के बाद काँग्रेस को अक्ल आ जाएगी... संभवतः भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलने पर वामपंथी और अन्य जातिवादी दलों को भी विकास की महत्ता समझ में आ जाएगी, लेकिन देश के दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ. उधर मोदी आधारभूत संरचनाओं को तेजी से शुरू करने सहित विदेशों में देश की छवि निर्माण के काम में जुटे रहे, और इधर “नकारात्मक” विपक्ष अख़लाक़, रोहित वेमुला, कन्हैया, FTII, आईआईटी चेन्नै जैसे मामलों में न सिर्फ खुद उलझा रहा, बल्कि मीडिया की मदद से देश की जनता को भी भ्रमित करने में लगा रहा. इस बीच नरेंद्र मोदी दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनाव हार गए तो विरोधियों की तो मानो पौ-बारह हो गई. ऐसा अनुमान है कि इसी के बाद नरेंद्र मोदी ने काँग्रेस सहित समूचे विपक्ष को उन्हीं के खेल में, उन्हीं के दाँव से चित करने का मूड बना लिया. केन्द्र में सरकार होने के अपने लाभ होते हैं, जिसमें सबसे बड़ा लाभ होता है “बजट बनाने और उसके आवंटन” का. जैसा कि विशेषज्ञ मानते हैं कि नरेंद्र मोदी का असली वोट बैंक है शहरी माध्यम वर्ग एवं गैर-मुस्लिम युवा, जबकि माना जाता है कि विपक्ष का वोट बैंक है किसान, मजदूर और अल्पसंख्यक. 


जब वर्ष 2016-17 का बजट तैयार किया जा रहा था, जनता, उद्योगपतियों, किसान नेताओं एवं मजदूर संगठनों से विचार एवं सुझाव आमंत्रित किए जा रहे थे, उस समय विपक्षियों ने सोचा था कि इस बजट के बहाने वे नरेंद्र मोदी पर “चिपकाए गए उनके आरोप” अर्थात सूट-बूट की सरकार को एक बार पुनः ठोस तरीके से जनता के सामने रख सकेंगे, लेकिन जैसा कि ऊपर कहा गया कि लगता है नरेंद्र मोदी ने विपक्ष को उन्हीं के खेल में, उन्हीं के मैदान में और उन्हीं की चालों से मात देने का फैसला कर लिया है. इसीलिए जब अरुण जेटली ने लोकसभा में इस वर्ष का बजट पेश किया, उसके एक-एक बिंदु को जैसे-जैसे वे पढ़ते गए और समझाते गए वैसे-वैसे विपक्ष के हाथों से तोते उड़ने लगे. विपक्षी बेंच के सदस्यों के चेहरे देखने लायक हो रहे थे. विपक्ष ने सोचा भी नहीं था कि नरेंद्र मोदी उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसकाने वाला किसान समर्थक बजट पेश कर देंगे. हालाँकि “विपक्षी कर्मकांड” की परम्परा निभाते हुए काँग्रेस सहित समूचे विपक्ष ने केन्द्रीय बजट की आलोचना की, उसे हमेशा की तरह गरीब-किसान विरोधी बताने की कोशिश की, परन्तु जैसे-जैसे बजट के तमाम प्रावधान जनता के सामने आते गए वैसे-वैसे विपक्ष की आवाज़ दबती चली गई और वह पुनः अपने पुराने घिसेपिटे सेकुलरिज़्म, संघ की आलोचना, भारत माता की जय नहीं बोलेंगे जैसे बकवास मुद्दों पर लौट गया. भाजपा की सरकार ने अपने “पहले पूर्ण बजट” में जिस तरह से किसानों, माध्यम वर्गीय मतदाताओं तथा विशेषकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने एवं उसमें पैसा झोंकने के निर्णय लिए हैं, वह यदि अगले तीन वर्ष में धरातल पर उतर आएँ तो यह तय जानिये कि किसानों, ग्रामीणों और छोटे उद्यमियों की जेब में पैसा जाएगा. नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली की जोड़ी ने विपक्ष के पैरों के नीचे से दरी खींच ली है और अब बजट प्रस्तावों पर विरोध करने के लिए उनके पास कुछ बचा ही नहीं है. 

आईये पहले हम देखते हैं कि ग्रामीण विकास और कृषि को फोकस में लेकर इस “वास्तविक क्रान्तिकारी” बजट में मोदी सरकार ने ऐसा क्या कर दिया है, कि काँग्रेस और बाकी विपक्ष बजट के मुद्दों, अर्थव्यवस्था, आधारभूत संरचना एवं पानी-बिजली पर बात ही नहीं कर रहे और देश की जनता को फालतू के “अ”-मुद्दों पर भटकाने की असफल कोशिश कर रहे हैं. बजट को लेकर विपक्ष का सबसे पहला आरोप था कि यह बजट 2019 के आम चुनावों को ध्यान में रखकर बनाया गया “लॉलीपॉप” बजट है, इस बोदे आरोप से ही हमें समझ जाना चाहिए कि अपने बजट से नरेंद्र मोदी ने विपक्ष को किस तरह डरा दिया है. जब नरेंद्र मोदी ने अपने एक भाषण में कहा कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का उनका लक्ष्य है तो शुरू में हमेशा की तरह विपक्षियों एवं कथित बुद्धिजीवियों ने उनके इस बयान की खिल्ली उड़ाई. लेकिन अब जब हम बजट के प्रावधानों को देखते हैं तो साफ़-साफ़ दिखाई देता है कि अगले तीन वर्ष में जिस तरह मोदी सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि में पैसा और संसाधन झोंकने जा रही है, उससे किसान की आय दोगुनी करने का लक्ष्य असाध्य नहीं है. हम सभी जानते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है कृषि क्षेत्र एवं ग्रामीण विकास. पिछले साठ वर्षों में काँग्रेस की सरकारों ने पैसा ऊपर से नीचे की तरफ बहाया है और इस बहाव में अपने कैडर का “पूरा ख़याल” रखा है. दिल्ली से बहकर आने वाली पैसों की गंगा में निचले स्तर तक के लोगों ने जमकर हाथ धोए हैं, क्योंकि काँग्रेस की नीति है “बाँटो और राज करो”. काँग्रेस का यह “बाँटो” अभियान दोनों क्षेत्रों के लिए था अर्थात पहला समाज को धर्म एवं जाति के आधार पर “बाँटो”, तथा दूसरा जमकर पैसा “बाँटो” कि जनता को मुफ्तखोरी की आदत लग जाए. मोदी सरकार के आने के बाद इस पर अंकुश लगना शुरू हुआ है. मोदी सरकार ने बजट में सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि जब केन्द्र से पैसा बाँटा जाए तो उसका उसी कार्य में सदुपयोग हो, जिसके लिए यह आवंटित किया गया है. दिल्ली से आने वाले पैसे पर कड़ी निगरानी हो तथा तकनीक एवं सोशल मीडिया की मदद से भ्रष्टाचार पर नकेल कसी जाए क्योंकि जब ग्रामीण विकास और कृषि, यह दोनों प्रमुख क्षेत्र तीव्र विकास करेंगे, तो अपने-आप पैसा नीचे से ऊपर की तरफ भी आना शुरू हो जाएगा. यही देश को मजबूत बनाएगा. यानी काँग्रेस और विपक्ष के इस परम्परागत वोट बैंक को खुश करके एवं गाँवों में खुशहाली लाकर मोदी ने उनकी नींद उड़ाने का पूरा बंदोबस्त कर दिया है. ऐसे में यदि विपक्ष इन बजट प्रस्तावों की आलोचना करेगा अथवा उसमें मीनमेख निकालेगा तो ग्रामीणों और किसानों में उसका विपरीत सन्देश जाएगा. इसीलिए इस बार विपक्ष उलझ गया है और बजट छोड़कर बाकी के बेकार मुद्दों पर राजनीति में लग गया है. 


जब भी हम किसी किसान की आत्महत्या की खबर सुनते हैं तो मन विषाद से भर उठता है. जो अन्नदाता हमें अन्न प्रदान करता है, यदि वह पैसों की कमी अथवा संसाधनों की अल्पता के कारण फसल उगाने में असफल रहता है और कर्ज़दार बनकर आत्महत्या की तरफ उन्मुख होता है तो ज़ाहिर है कि इसका मतलब ये है कि देश की अर्थव्यवस्था के एक मजबूत स्तंभ में कीड़ा लग गया है, जिसे तत्काल प्रभाव से सही करने की आवश्यकता है. अब मूल सवाल उठता है कि किसान की स्थिति सुधारने के लिए क्या-क्या किया जाए? काँग्रेस शासित महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में सर्वाधिक किसानों ने आत्महत्याएँ की हैं, इससे कम से कम यह बात तो साफ़ हो जाती है कि काँग्रेस का जो विकास मॉडल है अथवा नीतियाँ हैं वे असफल सिद्ध हुई हैं. अर्थात काँग्रेस के शासनकाल ने किसानों को कृषि के लिए प्रोत्साहित करने, आधारभूत संरचनाओं जैसे सड़कों-नहरों का जाल बिछाने, बिजली की व्यवस्था सुधारने जैसे काम करने की बजाय उन्हें मजदूर बनाने में रूचि दिखाई और “मनरेगा” जैसी योजनाएँ चलाईं. मनरेगा में जितना पैसा 2009 से 2014 तक दिया गया, उतने में तो देश के गाँव-गाँव में तालाब और बिजली पहुँच सकती थी. अब नरेंद्र मोदी सरकार ने इन्हीं मूलभूत कार्यों पर ध्यान देना आरम्भ कर दिया है, ताकि किसान समृद्ध हो सके. 

सरकार ने एक स्पष्ट रोडमैप बनाकर बताया है कि पानी, बिजली, सड़क की समस्या कैसे दूर होगी, बाकायदा तारीख दी गई है कि इस समस्या का हल इस तारीख तक हो जाएगा. इस बजट में पानी की गंभीर समस्या को समझकर जमीन में पानी का स्तर बढ़ाने के लिए 60,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. अभी तक किसी भी पूर्ववर्ती बजट में किसी भी सरकार ने जमीन में पानी का स्तर बढ़ाने के लिए इतनी बड़ी रकम आवंटित नहीं की है. जमीन में पानी का स्तर उठाने के साथ ही सरकार ने सिंचाई पर भी ध्यान दिया है. इस बजट में अट्ठाइस लाख पचास हजार हेक्टेयर जमीन की सिंचाई को “प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना” के अंतर्गत सिंचित करने का लक्ष्य रखा गया है. एक अध्ययन के अनुसार भारत में कुल कृषि भूमि पर यदि सभी तरह के सिंचाई साधन जोड़ लें, तब भी देश के करीब दो-तिहाई खेत पानी का साधन न मिलने के कारण सिर्फ बारिश के भरोसे होते हैं. मोदी सरकार ने इस बजट में जमीन में पानी का लेवल उठाने तथा खेतों की सिंचाई पक्की करने का प्रावधान किया है. जेटली के अनुसार “नाबार्ड” बीस हजार करोड़ रुपये का सिंचाई फंड तैयार करेगा. किसान का नुक्सान कई बार खेत की मृत हो चुकी मिट्टी अथवा खराब बीजों के कारण भी होता है, इसके लिए इस बजट में “मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना” अधिक गंभीरता से लागू करने का संकल्प लिया गया है. इसके तहत मार्च 2017 तक चौदह करोड़ खेतों में मिट्टी एवं बीजों का परीक्षण करने का लक्ष्य रखा गया है. स्वाभाविक है कि जब मिट्टी उपजाऊ और बीज स्वस्थ होगा तो फसल अधिक होगी. साथ ही किसान का फायदा बढ़े और उसे ज्यादा उपज मिले, इस हेतु सरकार ऑर्गेनिक खेती को भी बढ़ावा दे रही है. अगले तीन वर्ष में पांच लाख एकड़ जमीन पर ऑर्गेनिक खेती का लक्ष्य रखा गया है, जो एक सराहनीय कदम कहा जाएगा. 


मैंने पिछले एक लेख में देश की बिजली समस्या हल करने के प्रति यह सरकार कितनी गंभीर है इस पर चर्चा की थी, और यह बताया था कि ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल मोदी जी द्वारा दिए गए लक्ष्य से भी आगे चल रहे हैं. चूँकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सभी गांवों तक एक हजार दिनों में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य तय किया था. इसलिए इस बजट में 1 मई 2018 का लक्ष्य घोषित किया गया है, जिसके बाद देश में ऐसा कोई गांव नहीं होगा, जहां बिजली नहीं हो. अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी इसके लिए ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल की तारीफ़ की. बिजली समस्या को लेकर यह सरकार जिस तरह से गंभीर दिखाई दे रही है, वह काँग्रेस के ग्रामीण वोट बैंक पर भीषण सेंधमारी साबित होने जा रही है. 

मोदी सरकार ने पानी और बिजली के साथ सड़क पर भी विशेष ध्यान देने का फैसला किया है. भाजपा की पिछली सरकार में वाजपेयी जी ने जो “स्वर्णिम चतुर्भुज” की योजना शुरू की थी और उस पर काफी काम भी किया था वैसे ही इस सरकार में भी नितिन गड़करी जैसे अनुभवी नेता हैं, जिन्होंने पिछले दो साल में लगातार तीस किलोमीटर प्रतिदिन राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने का लक्ष्य हासिल कर लिया है, जो कि काँग्रेस सरकार में बड़ी मुश्किल से अधिकतम बारह किमी प्रतिदिन तक पहुँच पाया था. जैसा कि लेख में मैंने ऊपर लिखा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जानते हैं कि अगर किसान अपने गाँव से जिला, और राज्य मुख्यालय तक अपनी उपज लेकर नहीं आ पाया, तो सन २०२२ में किसान की आमदनी दोगुनी करने का वादा पूरा नहीं हो पाएगा. इसीलिए इस बजट में विशेष रूप से ग्रामीण सड़कों के लिए उन्नीस हजार करोड़ रूपए रखे गए हैं. इनके अलावा दो हजार किलोमीटर के “स्टेट-हाईवे” को राष्ट्रीय राजमार्ग में बदलने का प्रस्ताव भी इस बजट में किया गया है. अन्य सड़कों के लिए 97000 करोड़ रुपये का प्रावधान इस बजट में है. अर्थात यदि रेलवे-सड़क दोनों को जोड़ें, तो इस बजट में करीब सवा दो लाख करोड़ रुपये का सिर्फ इसी काम के लिए रखे गए हैं, जो कि ऐतिहासिक है. स्वाभाविक है कि काँग्रेस सहित समूचे विपक्ष की बोलती बन्द होना ही है. नितिन गडकरी ने सभी सड़क परियोजनाओं को तेजी से लागू करने की अपनी छवि को और दुरुस्त किया है. पानी, बिजली और सड़क तीनों की सबसे ज्यादा मुश्किल देश के गांवों में ही है. अतः पहली बार किसी सरकार ने इन मुश्किलों की जड़ में जाकर समस्या को समझा है और उसी के अनुरूप बजट में योजनाएँ बनाई हैं. ज़ाहिर है कि यदि मानसून सामान्य रहा तो अगले तीन वर्ष में ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भारी उछाल आना ही है, और जब किसान और ग्रामीण की जेब में पैसा होगा, तो अंततः वह पैसा नीचे से ऊपर की ओर ही बहेगा तथा स्वाभाविक रूप से वोट में भी तब्दील होगा. 


इस बजट की एक और खास बात यह है कि मोदी सरकार ने गाँवों एवं नगरों की स्थानीय सरकारों को मजबूत करने का फैसला किया है. जेटली ने शहरी और ग्रामीण विकास के लिए इन संस्थाओं को दिए जाने वाले अनुदान में 228% की बम्पर बढ़ोतरी कर दी है. चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार यह राशि 2.87 लाख करोड़ रूपए होगी, जो अभी तक किसी सरकार ने कभी भी नहीं दी है. जबकि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के लिए 19,000 करोड़ रूपए अलग से रखे हैं. “मनरेगा” काँग्रेस का ड्रीम प्रोजेक्ट रहा है, इस योजना के जरिए ही काँग्रेस ने 2009 का आम चुनाव जीता था, लेकिन 2009-2014 के बीच यूपीए-२ के शासनकाल के दौरान इस योजना में इतना जमकर भ्रष्टाचार हुआ कि ग्रामीण मजदूर त्राहिमाम करने लगे. काँग्रेस के स्थानीय नेताओं और पंचों-सरपंचों ने इस योजना पर ऐसा कब्ज़ा जमाया कि कि निचले स्तर तक के सभी कार्यकर्ता मालामाल हो गए, जबकि वास्तविक गरीब मजदूरों को कोई फायदा नहीं पहुँचा और उन्हें रोजगार के लिए अपने गाँव से पलायन करना ही पड़ता था. स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा में “मनरेगा” को एक असफल स्मारक घोषित किया. मोदी जी के अनुसार, यदि वास्तव में मनरेगा योजना ईमानदारी से चलाई जाती, इसके तहत “उत्पादक” कार्यों को प्राथमिकता दी जाती और भ्रष्टाचार पर लगाम कस दी जाती तो ग्रामीण मजदूरों के लिए यह एक सुनहरी योजना होती. परन्तु काँग्रेस के शासनकाल में ऐसा होना संभव ही नहीं था, क्योंकि एक रिपोर्ट के अनुसार मनरेगा में अधिकाँश स्थानों पर बोगस रजिस्टर बनाए गए, कहीं-कहीं सिर्फ गढ्ढे खुदवाकर उसे तालाब दर्शा दिया गया, तो कहीं-कहीं मजदूरों को पूरे सौ दिन का रोजगार तक नहीं मिला और बजट में आया हुआ पैसा ताबड़तोड़ कागज़ों पर ही खत्म कर दिया गया. अब मोदी सरकार ने इस योजना को कसने और इसके भ्रष्टाचार पर नकेल डालने का फैसला कर लिया है. इस बार के बजट में मनरेगा के लिए 38500 करोड़ रूपए दिए गए हैं, जो अब तक के सर्वाधिक हैं. लेकिन साथ ही मोदी-जेटली की जोड़ी ने मनरेगा में मिलने वाली मजदूरी तथा बजट आवंटन को “जन-धन योजना” तथा “आधार कार्ड” एवं किए जाने वाले कार्यों की गुणवत्ता से जोड़ दिया है, ताकि पैसा नगद नहीं देकर सीधे मजदूरों के खाते में ही जाए, साथ ही गाँवों में इस मनरेगा के कारण कोई अच्छा निर्माण कार्य, तालाब, नहर, कुँवा जैसा स्थायी बुनियादी ढाँचा तैयार हो. स्वाभाविक है कि काँग्रेस नेताओं को इस कदम से बहुत तिलमिलाहट हुई है. 

हाल ही में सरकार ने लोकसभा में “राष्ट्रीय जलमार्ग विधेयक” भी पास करवा लिया है, जिसके तहत देश के सड़क और रेलमार्गों के अतिरिक्त अब नदी एवं समुद्री जलमार्गों को भी “राष्ट्रीय जलमार्ग” घोषित किया जाएगा तथा जहाज़ों के लिए नए “ग्रीनफील्ड” बंदरगाह बनाए जाएँगे. एक शोध के अनुसार देश में कम से कम 19 जलमार्ग ऐसे हैं जिन पर परिवहन किया जा सकता है, जो सड़क और रेलमार्ग दोनों के मुकाबले बेहद सस्ता सिद्ध होगा. इसके अलावा देश के कई छोटे शहरों में प्रयोग में नहीं आने वाली अथवा बहुत कम प्रयोग की जाने वाली हवाई पट्टियों के नवीनीकरण एवं उनका समुचित उपयोग आरम्भ करने के लिए प्रत्येक राज्य सरकार को 100 करोड़ रूपए उपलब्ध करवाए हैं, ताकि इन हवाई पट्टियों को भी काम में लिया जा सके. इन दोनों मार्गों के आरम्भ होने से रोजगार के नए रास्ते खुलेंगे तथा अर्ध-शहरी क्षेत्रों एवं नदी किनारे बसे नगरों में व्यावसायिक गतिविधियाँ तेज़ होंगी. इनके अलावा यूपीए-२ सरकार के दौरान धन की कमी एवं लेटलतीफी के कारण बन्द बड़े 138 बड़े प्रोजेक्ट्स को पुनः चालू करने का भी निर्देश दिया गया है. 

देश में काले धन और भ्रष्टाचार की समस्या आज से नहीं, बल्कि पिछले पचास साल से है. काँग्रेस की सरकारों ने इसे रोकने के लिए कोई कठोर कदम नहीं उठाए. काला धन उत्पन्न होने की सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा देश है, जहाँ सर्वाधिक नगद लेन-देन होता है. एक अध्ययन के अनुसार जितना अधिक नगद लेन-देन होगा, भ्रष्टाचार, कर चोरी तथा काले धन की समस्या उतनी अधिक बढ़ेगी. इसीलिए मोदी सरकार ने एक लाख से अधिक की किसी भी खरीदी के लिए PAN कार्ड अनिवार्य कर दिया है. इस प्रकार किसी भी बड़े लेन-देन पर सरकार के पास समुचित सूचना रहेगी. सरकार की योजना यह है कि नगद व्यवहार कम से कम हों तथा क्रेडिट कार्ड से लेन-देन अधिकाधिक हो ताकि काले धन पर थोड़ा सा अंकुश लगे. बड़े-बड़े उद्योगों एवं कंपनियों पर 15% की दर से डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स लगा दिया है, और इस धन का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के नाम पर लिए जाने वाले गैस कनेक्शन हेतु 2000 करोड़ रूपए की सब्सिडी में किया जाएगा. लंबे समय से बैंकों की यह माँग थी कि उनके पक्ष में एक मजबूत क़ानून बनाया जाए, ताकि ऋण लेकर नहीं चुकाने वाले लेनदारों द्वारा सख्ती से वसूली की जा सके. इस संसद सत्र में सरकार ने बैंकों को मजबूत करने के लिए एक क़ानून बना दिया है, और सभी सरकारी एवं निजी बैंक उनकी सुविधा एवं संसाधन के मुताबिक़ जानबूझकर ऋण नहीं चुकाने वालों के खिलाफ कई प्रकार की कानूनी कार्रवाई एवं कुर्की इत्यादि कर सकेंगी. 

बजट के बोझिल आँकड़ों में अधिक गहराई से न जाते हुए भी उपरोक्त बातों के आधार पर स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने काँग्रेस के परंपरागत वोट बैंक अर्थात किसानों एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सेंध लगाने की पूरी तैयारी कर ली है. काँग्रेस ने पिछले साठ वर्षों में किसानों और मजदूरों को विभिन्न प्रकार के लालच और झूठे आश्वासन देकर उन्हें अपने पाले में उलझाए रखा, परन्तु नरेंद्र मोदी की रणनीति दूरगामी है. नरेंद्र मोदी अगले तीन वर्ष में ग्रामीण क्षेत्रों हेतु सड़क-पानी और बिजली का ऐसा जाल बिछाने जा रहे हैं जिसके कारण किसान की आमदनी में अच्छा-ख़ासा इज़ाफ़ा होगा. काँग्रेस ने ऋण माफी दे-देकर किसानों को अपने पक्ष में किया था, लेकिन नरेंद्र मोदी “सकारात्मक” राजनीति करते हुए किसानों को ही इतना मजबूत बना देना चाहते हैं कि उन्हें ऋण लेने की जरूरत ही ना रहे, और यदि लेना भी पड़े तो वे साहूकारों की बजाय किसान क्रेडिट कार्ड से, अथवा “मुद्रा बैंक” से अथवा माईक्रो क्रेडिट बैंकों से ऋण लें और चुकाएँ. यह नीति थोड़ा समय जरूर लेगी, परन्तु इससे किसान आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनेगा, उसे किसी के आगे हाथ पसारने की जरूरत नहीं रहेगी, जबकि काँग्रेस यह चाहती थी कि किसान सदैव याचक बना रहे अथवा खेती छोड़कर मनरेगा में मजदूरी करने लगे. यदि जमीन की मिट्टी अच्छी हो जाए, बीज स्वस्थ मिलें, सिंचाई के लिए पानी और बिजली की व्यवस्था उत्तम हो जाए तथा फसलों को सही समय पर मंडी पहुँचाने के लिए अच्छी सड़कें मिल जाएँ तो किसान को और क्या चाहिए. भारत का किसान तो वैसे ही काफी जीवट वाला होता है, वह अत्यधिक विषम परिस्थिति से भी हार नहीं मानता. और अंत में, इतना सब कुछ करने के बावजूद, यदि फिर भी ईश्वर एवं प्रकृति नाराज़ हो जाएँ, तो मास्टर स्ट्रोक के रूप में NDA की सरकार ने “फसल बीमा योजना” भी लागू कर दी है, जिसके तहत खेत के आकार, उपज के प्रकार के आधार पर किसान को बीमे की प्रीमियम चुकानी होगी, लेकिन कम से कम उसकी मूल पूँजी सुरक्षित रहेगी. अर्थात ग्रामीण अर्थव्यवस्था का “शेर” अभी गरज भले ही न रहा हो, लेकिन उसने अंगड़ाई लेना शुरू कर दिया है. 

अधिक लंबा न खींचते हुए संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि पहले दो साल मोदी ने विदेश संबंधों, रक्षा उपकरणों, राजमार्गों एवं बिजली पर गंभीरता से काम किया... अब संभवतः अगले दो वर्ष नरेंद्र मोदी ग्रामीण विकास, कृषि अर्थव्यवस्था, किसान एवं ग्रामीण मजदूर के लिए जोरदार काम करेंगे, ताकि ये लोग आर्थिक रूप से थोड़े बहुत सुदृढ़ हो सकें. उसके बाद अंतिम वर्ष (अर्थात लोकसभा चुनावी वर्ष 2019) में नरेंद्र मोदी अपनी जेब से कौन सा जादू निकालेंगे यह अनुमान अभी से लगाना मुश्किल है... परन्तु इतना तो तय है कि जिस तरह 2016 के इस बजट में मोदी ने शहर छोड़कर गाँवों की तरफ रुख किया है, उसने काँग्रेस की बेचैनी बढ़ा दी है. इसके अलावा बाबा साहेब आंबेडकर से सम्बन्धित कार्यक्रमों में जिस तरह नरेंद्र मोदी अपनी उपस्थिति बढ़ा रहे हैं, आरक्षण के प्रति अपनी जोरदार प्रतिबद्धता दर्शा रहे हैं, उसके कारण अन्य छोटे दलों में भी बेचैनी है. स्वाभाविक है कि इस बजट में आलोचना के अधिक बिंदु नहीं मिलने के कारण ही विपक्ष द्वारा रोहित वेमुला और कन्हैया जैसे “पानी के बुलबुले” पैदा किए जा रहे हैं. लेकिन भाजपा के लिए असली चुनौती विपक्ष की तरफ से नहीं, बल्कि खुद भाजपा के “आलसी” सांसदों की तरफ से है. सरकार के विकास कार्यों, रक्षा संबंधी तैयारियों, सड़कों एवं बिजली के शानदार कार्यों को भाजपा के सांसद और राज्य सरकारें नीचे मतदाता तक ठीक से पहुँचा नहीं पा रहीं. उत्तरप्रदेश से भाजपा को सर्वाधिक सांसद मिले, लेकिन अधिकाँश सांसद नरेंद्र मोदी के नाम और जादू की आस में हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं, ना जमीन पर कोई संघर्ष दिखाई देता है और ना ही सक्रियता. नरेंद्र मोदी अकेले कहाँ-कहाँ तक, और क्या-क्या करेंगे? भाजपाई सांसदों के पक्ष में कम से कम ये अच्छी बात है कि काँग्रेस की तरफ से राहुल गाँधी मोर्चा संभाले हुए हैं, इसलिए मुकाबला आसान है, परन्तु राज्यों में यह स्थिति नहीं है, इसीलिए भाजपा को आगामी वर्ष के तमाम विधानसभा चुनावों जैसे असम, बंगाल, उत्तरप्रदेश, केरल, तमिलनाडु में अच्छा-ख़ासा संघर्ष करना पड़ेगा. विश्लेषकों के अनुसार असम छोड़कर बाकी चारों राज्यों में भाजपा पहले से ही मुकाबले में कहीं नहीं है, इसलिए वहाँ की हार-जीत से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन वास्तविकता तो यही है कि विपक्ष को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि मोदी का जादू खत्म हो गया है... और इसीलिए नरेंद्र मोदी ने समय से पहले ही किसानों एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का पाँसा फेंक दिया है, ताकि जब 2019 के लोकसभा चुनावों का समय आए, तब तक किसान-मजदूर की जेब में कुछ पैसा आ जाए और वोट देते समय वह काँग्रेस के बहकावे में ना आए... और हाँ!!! यदि नेशनल हेरल्ड और इशरत जहाँ जैसे मामलों को छोड़ भी दें, तब भी 2019 तक मध्यम वर्ग को लुभाने के लिए कोई न कोई “नया पैंतरा” आ ही जाएगा... काँग्रेस मुक्त भारत का दूसरा चरण आरम्भ हो चुका है... और पिछले पचास वर्ष के लोकतांत्रिक इतिहास को देखते हुए यह बात हम बिहार-उत्तरप्रदेश-तमिलनाडु-बंगाल-गुजरात-मध्यप्रदेश जैसे कई राज्यों में देख चुके हैं कि यदि काँग्रेस लगातार दस-पन्द्रह वर्ष तक सत्ता से बाहर रहे, तो वह पूरी तरह खत्म हो जाती है. आशा है कि काँग्रेस के खाँटी और घाघ नेता, राहुल बाबा के साथ जुड़े अपने भविष्य पर पुनः चिंतन-मनन करेंगे और मुँह खोलने की हिम्मत करेंगे... वर्ना खेती-सड़क और बिजली के जरिये नरेंद्र मोदी काँग्रेस के लंबे “बुरे दिनों” का इंतजाम करने के मूड में दिखाई दे रहे हैं. 

Saturday, March 19, 2016

Online Shopping Made Easy By this Start-up



ऑनलाइन खरीदी हेतु ग्राहक की समझ और विकल्प बढ़ाने वाली स्टार्ट-अप...


आधुनिक युग “ऑनलाइन” का युग है. प्रत्येक बच्चे-किशोर-युवा के हाथों में मोबाईल हैं, जिनके जरिये आज की नई पीढ़ी अपने बहुत से आवश्यक कार्य तेजी से निपटाती है. स्वाभाविक है कि आजकल समय की कमी के कारण, तथा ऑनलाइन खरीदी में ढेरों विकल्प मौजूद होने के कारण युवा पीढ़ी तेजी से इसी पद्धति की तरफ जा रही है. एक अनुमान के अनुसार सन 2020 तक भारत में ऑनलाइन शॉपिंग का बाज़ार लगभग सौ बिलियन डॉलर का हो जाएगा. ऑनलाइन शॉपिंग के क्षेत्र में कई स्थापित एवं जानी-मानी कम्पनियाँ बड़ी खिलाड़ी हैं, जिनकी वेबसाईटों से रोज़ाना लाखों भारतीय क्रय-विक्रय कर रहे हैं. चूँकि इस प्रतिद्वंद्वी बाज़ार में कई कम्पनियाँ हैं, इसलिए ग्राहक के सामने कई बार अच्छे, टिकाऊ एवं उचित दामों वाले उत्पाद की पहचान करके उन्हें छाँटना, ग्राहक की जेब, समय एवं पहुँच के अनुकूल उत्पाद को चुनना एक बेहद थकाऊ काम है. 

यदि हम मोबाईल का ही उदाहरण देखें, तो जब भी हमें कोई नया मोबाईल ऑनलाइन खरीदना हो, तो सबसे पहले हम Amazon, Flipkart, SnapDeal, PayTM जैसी कई वेबसाईटों को खंगालना शुरू करते हैं. अपनी पसंद का, मॉडल का, कम्पनी का, अपनी क्रय रेंज का, अपने दोस्तों से बेहतर चुनकर दिखाने का एक बेहद दुरूह कार्य आरम्भ होता है. विभिन्न वेबसाईटों के चक्कर लगाते-लगाते, उनके रेट्स एवं फीचर्स की तुलना करते-करते ग्राहक का दिमाग बुरी तरह पक जाता है, और इतना करने पर भी कोई जरूरी नहीं है कि “उपलब्ध उत्पादों में सबसे बेहतर” की तलाश पूरी हो ही जाए. ऐसा अनुभव सिर्फ मोबाईल ही नहीं, कपड़े, जूते, अन्य इलेक्ट्रॉनिक वस्तु अथवा सेवा के बारे में भी होता है, जब ग्राहक “सही उत्पाद” की तलाश करते-करते साईट-दर-साईट भटकते हुए बुरी तरह त्रस्त हो जाता है. 

इस समस्या का एक नवोन्मेषी एवं शानदार आईडिया लेकर आई है www.ReadyViews.com नाम की स्टार्ट-अप.. इस कम्पनी की वेबसाईट आपको “सबसे बेहतर” चुनने में मदद करती है, और इस चुनाव की प्रक्रिया गणितीय होते हुए भी ग्राहक के लिए बेहद सरल और सटीक रखी गई है, ताकि ग्राहक को वही मिले जो सबसे उत्तम हो. आईये संक्षेप में देखते हैं कि आखिर इस का नवोन्मेषी विचार क्या है और यह कैसे काम करती है. सामान्यतः हम भारतीय लोग “माउथ पब्लिसिटी” पर अधिक भरोसा करते हैं, अर्थात किसी उत्पाद या वस्तु अथवा सेवाप्रदाता के बारे में “लोग क्या कहते हैं”, इस बात को हम ध्यान से देखते-सुनते-पढ़ते हैं. यदि हमारा कोई मित्र हमें कहता है कि फलाँ मोबाईल बहुत शानदार है, अथवा हमारा कोई परिचित कहता है कि उस सेवाप्रदाता की सेवाएँ बहुत ही बेहतरीन हैं तो हम सरलता से मान जाते हैं और उस मोबाईल अथवा उत्पाद की तरफ आकर्षित हो जाते हैं, तथा उसके बारे में हमारी सकारात्मक राय पहले ही बन जाती है. तो हम लोग जब भी कोई वस्तु खरीदने निकलते हैं अथवा किसी सेवा का लाभ लेने के बारे में सोचते हैं तो सबसे पहले हम यह देखना चाहते हैं कि “लोग उसके बारे में क्या कह रहे हैं?” क्या मेरे दोस्त को फलाँ कम्पनी की वॉशिंग मशीन अच्छी लगी?? क्या मेरे रिश्तेदार के यहाँ फलाँ कम्पनी का फ्रिज इतने वर्षों बाद भी ठीक चल रहा है?? इस प्रकार किसी भी उत्पाद को खरीदने के सम्बन्ध में हमारी प्राथमिक समझ तथा लगभग 70% दृढ़ विचार इसी पद्धति से बनता है. इसलिए जब भी हम किसी वेबसाइट से ऑनलाइन खरीदी करने निकलते हैं तो वहाँ पर हम उस “प्रोडक्ट” को लेकर हमसे पहले के खरीदारों की प्रतिक्रियाएँ एवं विचार पढ़ते हैं. मोबाईल खरीदने से पहले हम इन सभी वेबसाईटों पर आने वाली ढेरों प्रतिक्रियाओं एवं तमाम विरोधी विचारों को एक साथ पढ़कर अपना मन बनाने की कोशिश करते हैं. परन्तु जैसा कि मैंने ऊपर कहा कि चूँकि कई-कई वेबसाईट हैं, कई प्रकार के उत्पाद हैं, विभिन्न उत्पादों के बीच ढेर सारे मानकों की तुलना करना एक बेहद थकाऊ और कठिन काम है. Readyviews.com यहीं आकर आपकी सहायता करती है. यह वेबसाईट आपके द्वारा इच्छित प्रोडक्ट के बारे में ढेरों वेबसाईटों पर उपलब्ध उपभोक्ता प्रतिक्रियाओं एवं विचारों को एकत्रित करके उस विशाल डाटाबेस का विवेचन करते हुए औसत निकालकर आपको बताती है कि आप जिस प्रोडक्ट के बारे में जानना-समझना और पसंद करना चाहते हैं, उस प्रोडक्ट के बारे में उन तमाम वेबसाईटों पर कितना सकारात्मक और कितना नकारात्मक लिखा अथवा कहा गया है... यह वेबसाईट आपको विश्लेषण करके बताती है कि आप जो खरीदना चाहते हैं, अथवा जो सेवा चाहते हैं, उपभोक्ता उस सेवा के बारे में क्या-क्या अच्छा-बुरा कहते हैं. आजकल लगभग सभी वेबसाईट्स पर “रेटिंग” की सुविधा भी दी जाती है, अधिकाँश ग्राहक कमेन्ट करने से बचते हैं तो वे चुपके से उस प्रोडक्ट के बारे में अपने अनुभवों के अनुसार एक स्टार, तीन स्टार या पाँच स्टार की रेटिंग दे देते हैं. Readyviews.com इन रेटिंग का भी विश्लेषण करती है, ताकि आपको एकदम सटीक जानकारी मिले और किसी उत्पाद को खरीदने से पहले उसके बारे में आप पूरा जान लें और ठगे न जाएँ. 

www.readyviews.com

इस वेबसाईट की कार्यपद्धति ऊपर दिए गए चित्र से स्पष्ट हो जाती है, जिसमें उदाहरण के रूप में हमने मोबाईल खरीदी संबंधी जानकारी चाही है.. – अब जैसा कि आप देख रहे हैं, पहले तो यह वेबसाइट विभिन्न शॉपिंग वेबसाइटों से “आधिकारिक” उपभोक्ताओं द्वारा दिए गए विचारों, प्रतिक्रियाओं को एकत्रित करती है. फिर उसके बाद उस प्रोडक्ट (अर्थात मोबाईल) के विभिन्न गुणधर्म (फीचर्स) के आधार पर उसके तीन भाग करती है , अर्थात मोबाईल की आवाज़, उसकी बैटरी एवं उसका कैमरा. फिर इन तीनों वर्गीकरणों को एक बार पुनः विश्लेषित किया जाता है और आपके सामने पेश किया जाता है, कि जिस उत्पाद के बारे में आपने जानना चाहा था, उसके बारे में लोगों की राय क्या-क्या हैं? तमाम वेबसाइटों पर संतुष्ट (या असंतुष्ट) ग्राहक उस मोबाईल की बैटरी, कैमरे एवं साउंड के बारे में कितने प्रतिशत की और कैसी राय रखते हैं. यह वेबसाईट उस प्रोडक्ट के विभिन्न फीचर्स के बारे में दूसरे संतुष्ट अथवा असंतुष्ट उपभोक्ताओं की “अच्छी", “बुरी" अथवा “तटस्थ" राय स्पष्ट रूप से बताती है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि आप ढेरों वेबसाईटों के चक्कर लगाने से बच जाते हैं, आपके समय की बचत भी होती है और सबसे बड़ी बात यह कि आप उस प्रोडक्ट को जानने के लिए अपना अत्यधिक दिमाग खपाने से भी बच जाते हैं, और तत्काल इस निर्णय पर पहुँच जाते हैं कि आपको यह उत्पाद खरीदना है या नहीं. शुरुआत में फिलहाल यह वेबसाईट सिर्फ डिजिटल उत्पादों, जैसे मोबाईल, पेन ड्राईव, पावर बैंक, टीवी, कंप्यूटर, लैपटॉप के बारे में अपनी सेवाएँ दे रही है, परन्तु जल्दी ही इसमें कई अन्य प्रोडक्ट्स एवं सेवाएँ जोड़ी जाएँगी. 

एक ही स्थान पर उपभोक्ताओं को शिक्षित एवं जानकारियों से लैस करने संबंधी अभी तक ऐसा विचार किसी भी कम्पनी के दिमाग में नहीं आया था. लेकिन भीलवाड़ा (राजस्थान) के युवा उद्यमी श्याम राठौर ने अपनी प्रतिभाशाली टीम के साथ शुरू की गई “स्टार्ट-अप” सॉफ्टवेयर कम्पनी www.ReadyViews.com में इस नवोन्मेषी आईडिया पर काम किया और उन्हें सफलता भी मिलने लगी है. 27 सितम्बर 2015 को अमेरिका में सम्पन्न Indo-US StartupConnect कार्यक्रम में भी “नैसकॉम” ने श्याम राठौर जी के इस नवोन्मेषी आईडिया को सराहा तथा मोदी जी ने अपने डिजिटल इण्डिया कार्यक्रम के तहत इनके स्टार्ट-अप को शुभकामनाएँ प्रदान कीं. 


अतः कोई भी प्रोडक्ट खरीदने से पहले यदि आप अपना समय, ऊर्जा एवं माथापच्ची बचाना चाहते हैं तो सीधे इस वेबसाइट पर पहुँचिये, जहाँ बड़े आराम से एक क्लिक पर आपको उस उत्पाद से सम्बन्धित तमाम जानकारियाँ बाकायदा छन-छनकर ठोस एवं विश्वसनीय स्वरूप तथा बाकायदा ग्राफिक्स में प्राप्त होंगी.

Tuesday, March 15, 2016

Difference between "Shahid" and "Hutatma"



शहीद और हुतात्मा शब्द का अंतर


जिस समय डेविड हेडली अमेरिका में पूछताछ के दौरान आतंकी इशरत जहाँ के नए-नए खुलासे कर रहा था, और यह साफ़ होता गया कि वह लड़की मासूम कतई नहीं थी, बल्कि चार मुस्टंडे आतंकियों के साथ अकेली अहमदाबाद एक आतंकी मिशन पर आई थी, उस समय मुम्बई के कुछ इलाकों में “शहीद” इशरत जहाँ के नाम से चलाई जा रही एम्बुलेंस पर जनता का माथा ठनका था. इसके बाद जब JNU जैसे विश्वविद्यालयों में “शहीद” अफज़ल गूरू के नारे लगाए गए, तब भी लोगों को अजीब सा लगा... इसी प्रकार सियाचिन में बर्फ में दबकर मारे गए लांसनायक हनुमंथप्पा के लिए भी अखबारों और जनता ने “शहीद” शब्द का उपयोग होते देखा... इससे कई लोगों का माथा चकरा गया. इशरत जहाँ भी “शहीद” और हनुमंथप्पा भी “शहीद”, ऐसा कैसे हो सकता है?? परन्तु वास्तव में देखा जाए तो इसमें अजीब कुछ भी नहीं था. शहीद शब्द को लेकर इस्लाम में एकदम स्पष्ट परिभाषा है, जबकि अज्ञानी एवं भोलेभाले हिंदुओं को जैसा पढ़ा-लिखा दिया जाता है, वे उसका पालन करने लग जाते हैं. ऐसा क्यों?? तो आईये पहले हम समझें “शहीद” और “हुतात्मा” शब्दों के बीच का अंतर... 



चाणक्य सीरियल का एक वाक्य है, “भय सिर्फ यवनों की दासता का नहीं, भय उनकी सांस्कृतिक दासता का भी है”  यह वाक्य (सिरियल से) इसलिए याद आया कि, हमें पता भी नहीं चला और हम अपने हुतात्माओं को “शहीद” कहने लगे. इसे समझने के लिए आप को तीन ऐसे लिंक्स दे रहा हूँ, जिसका काट देने की कोई मुसलमान हिम्मत नहीं कर सकता. इनमें शहीद शब्द की व्याख्या की गई है. 


सब से पहली लिंक है मुफ़्ती तकी उसमानी साहब की, जो कराची स्थित दारुल उलूम में फिकह और हदीथ के अध्येता हैं. इंग्लिश, अरबी और उर्दू में 66 किताबें उनके नाम पर हैं और अधिकारी व्यक्ति हैं, जिनका संदर्भ गंभीरता से लिया जाता है. देखते हैं वे क्या कहते हैं शहीद के बारे में : 

Shaheed in the real sense is a Muslim who has been killed during "Jihad" or has been killed by any person unjustly. Such a person has two characteristics different from common people who die on their bed. Firstly, he should be buried without giving him a ritual bath. However, the prayer of the Janazah shall be offered on him and he shall also be given a proper kafin (burial shroud). Secondly, he will deserve a great reward in the Hereafter and it is hoped that Allah Almighty shall forgive his sins and admit him to Jannah. It is also stated in some of the traditions that the body of such a person remains in the grave protected from contamination or dissolution.  

अर्थात सही मायने में “शहीद” वो मुसलमान होगा, जो जिहाद करते समय कत्ल होगा अथवा जिसकी अन्याय से हत्या हुई होगी. आम आदमी की सामान्य मौत से अलग इसके दो भिन्न लक्षण होंगे. पहली बात यह है कि, उसे गुसल (यानी स्नान) के बिना ही दफनाया जाएगा, लेकिन जनाजे की नमाज अता की जाएगी तथा उसे एक सही कफन ओढा जाएगा. दूसरी बात यह है कि वो (दूसरी दुनिया) में बड़े इनाम का हकदार होगा तथा यह उम्मीद है कि अल्लाह तआला उसके गुनाह माफ करके उसे जन्नत में आने की इजाजत देंगे.  कुछ जगहों में यह भी कहा गया है कि ऐसे व्यक्ति का शव सुरक्षित रहता है, उसमें सड़न नहीं होती. यह बात मजेदार है, सडन न होनेवाली. जबकि जिनको भी ये शहीद कहते आए हैं, जरा देखो तो आज उनकी लाशों का क्या हाल है? कीड़े केंचुओं ने खा कर खाक में मिला दिया होगा... तो शहादत कैन्सल हो जानी चाहिए, नहीं? इस लेख के अंत में मुफ़्ती साहब ये कहते हैं  

It is evident from the above discussion that the word "Shaheed" can only be used for a Muslim and cannot be applied to a non-Muslim at all. Similarly, the term cannot be used for a person who has been rightly killed as a punishment of his own offence. 

इस चर्चा से यह स्पष्ट होता है कि यह शब्द "शहीद" केवल एक मुसलमान के लिए ही प्रयुक्त किया जा सकता है, गैर-मुस्लिम के लिए कतई नहीं प्रयुक्त किया जा सकता. इसी तरह से, यह संज्ञा किसी ऐसे (मुस्लिम) व्यक्ति के लिए भी नहीं प्रयुक्त की जा सकती जिसे अपने गुनाहों के लिए न्यायोचित मृत्युदंड दिया गया हो. मुफ़्ती तकी उस्मानी साहब की बात को गौर से पढ़ें और समझें... "Shaheed in the real sense is a Muslim who has been killed during "Jihad" or has been killed by any person unjustly. यानी सही मायने में शहीद वो मुसलमान होगा, जो जिहाद करते समय कत्ल होगा या जिसकी अन्यायपूर्ण हत्या हुई होगी. अब जिहाद करते कत्ल क्यूँ होगा? अगर जिहाद केवल भाई से भाई को मिलाने की बात हो या केवल आत्मोन्नति वाला जिहाद हो (Jihad-al-Nafs) जैसे कि हमें बताया जाता है, जब हम जिहादी को आतंकी कहते हैं? भारत में काफिरों ने कभी किसी संत को नहीं मारा. हाँ, मोमिनों द्वारा सत्य की राह में जो लोग नहीं आए, उनको लाते लाते वे मर गए उसमें मोमीन बेकसूर ही हैं, क्या नहीं? मुसलमान पर कोई भी आरोप लगता है तो उसके बचाव में खड़े होनेवाले अपनी बात की शुरुआत ही "मासूम मुसलमान" से करते हैं. 

बात यह भी है कि मुफ़्ती साहब पाकिस्तान में रहते हैं, वहाँ हिन्दू सत्ता में नहीं । जहां काफिरों के देश में रहना नहीं है, वहाँ मुसलमान खुल कर बोलता है.  इस्लाम को ले कर भारत या अमेरिका में रहनेवाले किसी मुसलमान के मुकाबले ये मुफ़्ती साहब ज्यादा ईमानदार हैं. उसी वाक्य के आखरी हिस्से में वे कहते हैं कि वो मुसलमान भी शहीद है जिसकी अन्याय हत्या हुई होगी. अब न्याय क्या, और अन्याय क्या? जब केस दर्ज होता है तो उन्हें भारत की न्याय व्यवस्था और भारत के संविधान में विश्वास होता है. अगर फैसला विरोध में आए तो judicial killing. किसी को फुर्सत नहीं, और किसी के पास उतना धन भी नहीं इसलिए इनकी गर्जनाएँ चलती हैं कि इस कानून को हम कानून ही नहीं मानते. हमारे लिए कुरान / शरिया ही कानून है. अब ये लोग अपने शहीद की कैटेगरी स्पष्ट करें कि जिन्हें भारत की न्याय व्यवस्था ने मृत्युदंड दिया उन्हें ये शहीद कह रहे हैं, तो क्या उनके साथ जो हुआ वो न्याय नहीं था या फिर उनपर जो आरोप हैं वे काम इस्लाम में जायज और बिलकुल करने योग्य हैं? इतने सारे सबूतों और गवाहियों के बाद यह तो मानना मुमकिन नहीं कि आरोप ही झूठे थे. 

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं के साथ इनकी तुलना नहीं हो सकती. देशज जन और देशज सत्ता से आप इस देश को इस्लाम के लिए काबिज नहीं कर सकते, ना ही ऐसे गतिविधियों को आजादी की जंग का नाम दे सकते हैं. अर्थात इससे कुछ उजागर होता है तो वह जिहाद का असली चेहरा ही है.  

मुफ़्ती उस्मानी साहब की दूसरी बात को देखते हैं -  

1. इस चर्चा से यह स्पष्ट होता है कि यह शब्द "शहीद " केवल एक मुसलमान के लिए ही प्रयुक्त किया जा सकता है और गैर मुस्लिम के लिए कतई नहीं प्रयुक्त किया जा सकता. 

2. इसी तरह से, यह संज्ञा किसी ऐसे (मुस्लिम) व्यक्ति के लिए भी नहीं प्रयुक्त किया जा सकती जिसे अपने गुनाहों के लिए न्यायोचित मृत्युदंड दिया गया हो.

मुफ़्ती साहब साफ कह रहे हैं कि यह शब्द "शहीद" केवल मुसलमान के लिए ही प्रयुक्त किया जा सकता है और गैर मुस्लिम के लिए कतई नहीं प्रयुक्त किया जा सकता. मुफ्ती साहब द्वारा वर्णित परिभाषा के अनुसार इसका मतलब यह है कि यदि हम चंद्रशेखर आज़ाद अथवा भगत सिंह जैसे वीरों को शहीद कहते हैं, तो गलत है क्योंकि वे मुसलमान नहीं हैं. मुफ्ती साहब की इसी व्याख्या से अब बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या भारत के मुसलमान की नजर में अब्दुल हमीद “शहीद” है या नहीं ? अब्दुल हमीद पाकिस्तान से लड़ते हुए मारे गए थे, पाकिस्तानियों के हाथों. याने इस्लाम और अल्लाह के लिए सरजमीं-ए-हिन्द को फतेह करने निकले गाजी मुसलमान ने अपने काफिर आकाओं से वफादारी दिखाकर इस्लामी गाजियों को मारा था. युद्ध में पाकिस्तानी तो इस्लाम की फतेह के लिए मारे गए, यानी वे तो ऑटोमैटिक शहीद हो गए, लेकिन काफिरों की तरफ से गाजियों से लड़ते हुए अब्दुल हमीद को भारत के मुसलमान शहीद मानेंगे या नहीं? सवाल यही है कि क्या भारत का मुसलमान, पाकिस्तानी सैनिकों को इस देश का हमलावर मानता है या दस्तगीर (हाथ बढ़ाकर मदद करनेवाला) मानता है?  

सूरह 5:53 से 5:55 को संदर्भों के साथ देखें तो यह हिदायत है कि अगर गलत लोगों को अपने से दूर न रखा जाये और अपने साथ घुलने दिया जाये तो गेहूं के साथ घुन को पिसना ही है. बात हम शहीदों की कर रहे थे, और शहीद शब्द की व्याख्या कर दी गई है. तो हमारे भारत के वीर “शहीद” कब से कहलाने लगे? पोस्ट की शुरुआत मैंने चाणक्य सिरियल के एक वाक्य से की थी – “भय सिर्फ यवनों की दासता का नहीं, भय उनकी सांस्कृतिक दासता का भी है”. उसी के आगे चाणक्य यह भी कहते हैं कि – “अनुभव कहता है कि पराजित राष्ट्र, और पराजित मन प्राय: विजेताओं के संस्कार और संस्कृति को स्वीकार करते हैं. सैकड़ों वर्ष की इस्लामी हुकूमत से हिन्दू राज्यों की राजभाषा में भी उर्दू और फारसी शब्द प्रचुरता से पाये जाते हैं. वैसे हम शहीद कब से कहने लगे, इसका इतिहास थोड़े ही किसी ने लिख रखा है? कह दिया किसी ने शहीद, तो लग गए हम भी शहीद कहने. 1948 में फिल्म आई थी 'शहीद' जिसका अमर गाना 'वतन के राह में वतन के नौजवाँ शहीद हो' आज भी सभी के जुबान पर है. उसके बाद दूसरी शहीद फिल्म आ गयी, और यही शब्द मनोमस्तिष्क पर दृढ़ हो गया, किसी को कुछ अलग से सोचने की जरूरत ही नहीं महसूस हुई. 

विदेशी भाषा के शब्दों को हम किस तरह बिना सोचे-समझे उपयोग करने लगते हैं इसका शानदार उदाहरण है "RIP" नामक शब्द... "फैशन" की तरह उपयोग किए जाने वाले इस शब्द की असलियत जानना चाहते हों तो मेरे एक पुराने ब्लॉग पर पहुँचें... (http://blog.sureshchiplunkar.com/2015/04/what-is-rest-in-peace-rip.html)... खैर, आगे बढ़ते हैं... आज जब मुसलमानों ने हमें थप्पड़ मार कर जगाया कि शहीद तो अफजल गुरु है, याक़ूब मेमन है, इशरत जहां है, तब जा कर ये सोचना पड़ा कि आखिर शहीद होता क्या है. तब ही समझ में आया कि इस शब्द को ले कर मुसलमान तो एकदम स्पष्ट हैं कि एक मुसलमान ही शहीद कहला सकता है - क्यूँ और कब, यह हम ऊपर देख चुके. तो अब हमें भी यह सोचना चाहिए कि हमारे स्वतंत्रता वीर तथा राजा-महाराजा क्या थे, उनको किस शब्द से सम्मानित किया जाये? 

“हुतात्मा” - यह शब्द हमारे पास पहले से है, आज का नहीं है. बस हम भूल गए थे, या यूँ कहें कि शहीद कहने में हमें शहद की मिठास महसूस होती थी. लेकिन अब जागरूकता आ रही है और शहद खत्म हो गया, तो जहर की कड़वाहट भी समझ आने लगी है. हुतात्मा शब्द का संधि विच्छेद करने से पता चलता है, कि जिसने अपनी आत्मा की आहुति दे दी हो, उसे हुतात्मा कहेंगे. अर्थात जिस व्यक्ति ने किसी पवित्र कार्य के लिए अपनी आत्मा या अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया हो.  


जर्मन शेफर्ड जानते हैं आप? अल्सेशियन भी कहलाता है. जी हाँ, कुत्ते की ही बात कर रहा हूँ. कोई कहता है कि यह भेड़िये जैसा दिखता है. नहीं, गलत कहते हैं... भेडिये और अल्सेशियन में फर्क होता है. शक्ल में भी फर्क है और फितरत में तो बहुत ही ज्यादा फर्क है. अल्सेशियन अपने स्वामी के लिए जान भी देने से कतराता नहीं. जबकि भेड़िये में ऐसे गुण नहीं होते. भेडिये कि वफादारी उसकी “टोली” से या कहें कि उसके कबीले से होती है, उम्मत भी कहना चाहें तो मुझे एतराज नहीं. कुत्ते में एक गुण और भी होता है. वह अपने मालिक के दुश्मन को, मालिक से भी पहले पहचान जाता है. चोर या उठाईगीरों को भी कुत्ता छोड़ता नहीं. मालिक से वफादार रहता है, अपरिचित के हाथों से खाएगा नहीं. अगर आप को पता न हो तो बता दूँ, इस्लाम के नियमों के अनुसार घर में कुत्ते पालना मना है. हिकारत से किसी को कुत्ता कहकर गाली देना, यह भी हमारे लिए विजेताओं का स्वीकृत संस्कार है. अब लगता है कि “शहीद” और “हुतात्मा” के बीच का फर्क आप को स्पष्ट समझ में आया ही होगा.

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श्री आनंद राजाध्यक्ष जी की फेसबुक वाल से साभार... (मामूली संशोधन एवं साजसज्जा के साथ). 

Sunday, March 13, 2016

Sufism, Dargah and Islam in India



सूफीवाद, दरगाह-मज़ार और इस्लाम प्रचार


पिछले कुछ वर्षों में आपने हिन्दी फिल्मों एवं खासकर गीतों में अचानक तेजी से बढ़े कुछ खास शब्दों की तरफ ध्यान दिया होगा... जैसे “मौला”, “अल्ला” इत्यादि. फिल्मों में भी विजय अथवा राहुल नाम का कोई “हिन्दू” हीरो कई बार दरगाहों अथवा चर्चों में मत्था टेकते या सीने पर क्रास बनाए हुए दिखाई दे जाता है. इसी प्रकार अजमेर की ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर आए दिन बड़े-बड़े फ़िल्मी सितारों का जमघट लगा हुआ दीखता है, जो सिर पर गुलाबों के फूल की टोकरी और हाथ में हरी चादर लेकर “दुआ”(??) माँगने जाते हैं. क्या कभी आपने सोचा कि ऐसा क्यों होता है? वास्तव में यह एक प्रकार का “दृश्य-श्रव्य” धीमा ज़हर होता है, जिसके जरिये आपकी सांस्कृतिक चेतना एवं अवचेतन मन पर प्रभाव उत्पन्न किया जाता है. लगातार कई वर्षों तक विभिन्न माध्यमों के जरिये ऐसा करने से व्यक्ति के दिमाग के एक हिस्से में उन दृश्यों एवं उनमें दिखाए जाने वाले मौलाओं, कब्रों, दरगाहों के प्रति एक “सॉफ्ट कॉर्नर” उत्पन्न हो जाता है, जो धीरे-धीरे बढ़ते हुए पूर्ण ब्रेनवॉश का रूप ग्रहण कर लेता है. 

हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी ने अपनी ब्रिटेन यात्रा के दौरान बयान दिया, कि इस्लाम में यदि सूफ़ी मत प्रभावी स्वर होता, तो इतनी हत्याएं न होतीं... संसार में इस्लाम की केंद्रीय अवधारणा तौहीद के मानने वाले इतने नरसंहार न करते. इस्लामी इतिहास और इस्लामी वांग्मय के एक विद्यार्थी होने के नाते, यह मेरा दायित्व है कि मैं इस्लाम और सूफ़ीवाद पर इतिहास के आलोक में बात करूँ. और पाठकों को बताऊँ कि वास्तव में मोदी ने अनजाने में ही एक भीषण गलती कर दी है. आइये हम पहले जानें कि भारत के संदर्भ में सूफ़ी मत क्या है? 


सूफ़ीमत यानी भारत के अपने में ही डूबे रहने वाले बुद्धिजीवी वर्ग, अपने चश्मे से दुनिया को देखने एवं उसके बारे में राय बनाने वाले विशिष्ट वर्ग के लिये हिन्दू-मुस्लिम एकता का एक और गंगा-जमुनी काम भर है. इन सेकुलर बुद्धिजीवियों की इस “गंगा-जमनी”(??) तहज़ीब का प्रकटन पाकिस्तानी गजगामिनी क़व्वाला आबिदा परवीन की क़व्वाली का आनंद लेने, उसके कार्यक्रमों में जा कर ताली बजा-बजा कर सर धुनने-धुनवाने, वडाली बंधुओं के अबूझ-अजीब से गानों में रस लेना प्रदर्शित करने, अमीर ख़ुसरो, बुल्ले शाह जैसे शायरों, कवियों की निहायत फटीचर कविता को अद्भुत मानने इत्यादि में होता है. आईये पहले उदाहरण के रूप में हम सर्वाधिक चर्चित सूफ़ी शायरों की कविताओं के कुछ उद्धरण लेते हैं, ताकि बात आगे बढ़ने के लिये ये उपयोगी होंगे... 

रैनी चढ़ी रसूल की रंग मौला के हाथ
जिसकी चूँदर रंग दई धन-धन उसके भाग { अमीर ख़ुसरो }
मौला अली मौला मौला अली मौला
आज रंग है ए माँ रंग है जी रंग है {अमीर ख़ुसरो } 

छाप-तिलक सब छीनी मोसे नैना मिलाय के
प्रेमभटी का मधवा पिलाय के मतवाली कर लीनी रे मोसे नैना मिलाय के
गोरी-गोरी बहियाँ हरी-हरी चुरियां, बँहियां पाकर धर लीनी रे मोसे नैना मिलाय के
बल-बल जाऊं मैं तोरे रंगरेजवा अपनी सी कर लीनी रे मोसे नैना मिलाय के
ख़ुसरो निज़ाम के बल-बल जाइये मोहे सुहागन कीन्हीं रे मोसे नैना मिलाय के {अमीर ख़ुसरो) 

मोरा जोबना नवेलरा भयो है गुलाल 
कैसी धार दिनी विकास मोरी माल
मोरा जोबना नवेलरा......
निजामुद्दीन औलिया को कोई समझाये
ज्यों ज्यों मनाऊं वो तो रूठता ही जाये
मोरा जोबना नवेलरा......
चूड़ियाँ फोड़ पलंग पे डारूँ
इस चोली को दूँ मैं आग लगाय
सुनी सेज डरावन लागे
विरही अगन मोहे डंस-डंस जाये
मोरा जोबना नवेलरा......{अमीर ख़ुसरो ) 

बुल्ले शाह शौह तैनूं मिलसी दिल नूं देह दलेरी
प्रीतम पास ते टोलणा किस नूं भुलिओं सिखर दुपहरी { बुल्ले शाह }

ओ रंग रंगिया गूडा रंगिया मुरशद वाली लाली ओ यार { बुल्ले शाह) 


जिसे शायरी अथवा कविताओं की अधिक समझ नहीं है, उसे पहली नज़र में तो यही समझ में आता है कि इन क़व्वाली / कविताओं का उद्देश्य कपडे रंगवाना है, या होली में कपडे रंगवाना है और ये किसी मौला नाम के रंगरेज़ की बात कह रहे हैं. कई जगह ख़ुसरो या अन्य सूफ़ी नज़रें मिलते ही चेरी [दासी] बनने, अपने सुहागन होने, अपने नवल जोबन की अगन, अपनी चोली को जलाने की बात करते हैं. इसका तो मतलब ये लिया जा सकता है कि ये पठानी-ईरानी शौक़ { ग़िलमाँ} की बात कर रहे होंगे, मगर रंगरेज़ पर कविता लिखने का क्या मतलब? ये भी निश्चित है कि बुल्ले शाह, निज़ामुद्दीन, बख़्तियार काकी, ख़ुसरो इत्यादि लोग धोबी तो नहीं ही थे. विश्व की किसी भी भाषा में रंगरेज़ पर कवितायें मेरी जानकारी में तो नहीं मिलतीं. ये कविता का विषय ही नहीं है. तो फिर ये रंग क्या है? रसूल की चढ़ी रैनी में मौला के हाथ रंग होने का क्या मतलब? जिसकी चूनर रंग दी गयी, उसके धन-धन भाग का क्या अर्थ है? ये किसी सांकेतिक रंग की बात तो नहीं कर रहे? फिर ये छाप तिलक क्या है? ख़ुसरो अमीर सैफ़ुद्दीन मुहम्मद के बेटे थे जो तुर्क थे और निज़ामुद्दीन के शिष्य थे. न तो तुर्क लोग तिलक लगते हैं, और न ही निज़ामुद्दीन जिस चिश्ती परम्परा के सूफ़ी हैं उसमें तिलक लगाये जाते हैं. तो फिर ये किस छाप-तिलक का ज़िक्र किया जा रहा है? कहीं ये किसी अन्य की बात तो नहीं कर रहे, जिसकी छाप-तिलक नैना मिला कर छीन ली गयी हो? 

जी हाँ यही सच है, और ये मतलब खुलता है अमीर ख़ुसरो की एक रचना 'छाप-तिलक सब छीनी मोसे नैना मिलाय के' से. छाप-तिलक से अभिप्राय ब्रज के गोस्वामियों द्वारा कृष्ण भक्ति में 8 जगह लगाने वाली छाप से है. वास्तव में ख़ुसरो कह रहा है, कि मुझसे आँखें मिला कर मेरी छाप-तिलक सब छीन ली... यानी मुझे मुसलमान कर दिया. आज रंग है हे माँ... का अर्थ इस्लाम में लोगों के दीक्षित होने से है. धर्मबंधुओ! सूफ़ी मत इस्लाम फ़ैलाने का केवल एक उपकरण मात्र है और सूफ़ियों की हर बात का अर्थ प्रकारांतर में इस्लाम में दीक्षित हो जाना है. भारत में धर्मान्तरण के सबसे प्रमुख उपकरण सूफ़ी ही रहे हैं. अफ़ग़ानिस्तान से शुरू करके मुल्तान, पाकिस्तानी पंजाब, भारतीय पंजाब, हरियाणा, दिल्ली पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिमी बंगाल, बांग्लादेश से इंडोनेशिया से आगे जाता हुआ पूरा गलियारा इन्हीं सूफियों का शिकार हुआ है. उत्तर प्रदेश के “बौद्ध राजपथ” वाले सारे ज़िलों से बुद्ध मत गायब हो गया. यहाँ के बौद्ध इन्हीं सूफ़ियों के शिकार हुए हैं. बुल्ले शाह, मुईनुद्दीन, निजामुद्दीन, बख़्तियार काकी जैसे कुछ प्रमुख के अलावा भी सारे भारत में इनकी दरगाहें बिखरी पड़ी हैं. ये सब इस्लाम की लड़ाई लड़ने आये सैनिक थे. जिन्हें प्रतापी हिन्दू राजाओं ने काट डाला, वो “शहीद” कहला कर पूजे जा रहे हैं, बाक़ी पीर बाबा, ग़ाज़ी बाबा कहला रहे हैं. इनकी किताबें पढ़िये, सभी में इनके काफ़िरों या जादूगरों से संघर्ष की चतुराई से लिखी गयी कथाएं हैं. अजमेर के मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह या दिल्ली के निज़ामुद्दीन और अमीर ख़ुसरो की क़ब्रों पर जा कर देखिये, वहां आने वाले नब्बे प्रतिशत हिन्दू मिलते हैं, यानी आज भी न्यूनाधिक ये पापलीला चल रही है, क्योंकि एक सामान्य हिन्दू “लचीला” तो होता ही है, वह सामान्यतः दूसरे पंथों का अपमान भी नहीं करता और भोला तो इतना होता है कि पश्चिम से आए पंथों द्वारा रचे गए चतुराईपूर्ण षड्यंत्रों को समझ ही नहीं पाता. वर्तमान भारत से इतर वृहत्तर भारत का “सिल्क रूट” कहलाने वाला क्षेत्र इन्हीं कुचक्रों के कारण बौद्ध मत की जगह इस्लामी बना है. इसी का परिणाम आज चीन का सिंक्यांग, एवं रूस से अलग हुए इस्लामी देशों में दिखाई देता है. सब जगह खंडित बुद्ध मूर्तियां, ध्वस्त बौद्ध विहार मिलते हैं. 


ऑनलाइन विवाद की स्थिति में मोमिन पूछते हैं कि बौद्ध धर्म का सफाया हिन्दू राजाओं ने किया और नव बौद्ध के साथ मिलकर दोनों राजा पुष्यमित्र शुंग को कोसते हैं, कि उन्होंने मौर्य राजवंश का अंत कर सत्ता हथियाई. सच्चाई का दूसरा पहलू यह है कि बामियान के बुद्ध हों, तक्षशीला, नालंदा या साँची के स्तूप हों... तारीख के स्याह पन्नों पर बख्तियार ख़िलजी, होशंग शाह और तालिबानी ज्यादतियों की कहानी कभी मिटाई नहीं जा सकेगी. हिन्दू और उनके नेता इतने भोले (बल्कि मूर्ख) हैं कि वह अभी तक खूंखार जिहादियों के सूफी होने का नकाब ओढ़ने वालों के मोह जाल में फंसे हुए हैं. एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लंदन में सूफियों के गुणगान करते हैं, तो दूसरी तरफ भाजपा की सरकारें करोड़ों रुपये इन सूफी दरगाहों पर खर्च करती हैं. आज भी इन सूफी दरगाहों पर जाने वाले लोग मुसलमान नहीं, बल्कि हिन्दू हैं. दुःख की बात यह है, कि इन तथाकथित जिहादी सूफियों ने करोड़ों हिन्दुओं को तलवार के जोर से मुसलमान बनाया, और उनके उपासना स्थलों को जबरन मस्जिदों और दरगाहों में बदल डाला. इस्लाम के इन छिपे जिहादियों के खतरनाक घिनौने चेहरों का कई विद्वानों ने पर्दाफाश करने का प्रयास बारम्बार किया है, ताकि बुद्धिहीन हिन्दू उनके असली चेहरों को पहचान सकें और उनके दरगाहों पर नजराने देने का सिलसिला फौरन बंद कर दें. आजादी के बाद इस्लाम के खूँखार प्रचारकों को सूफी करार देकर उनको महिमामंडित करने का अभियान चल रहा है. इस दुष्प्रचार का शिकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी हो गए और उन्होंने लंदन में भाषण देते हुए फरमाया कि अगर सूफी होते तो कोई हत्याकांड नहीं होता. वर्ष 1992 में विख्यात् पत्रकार गिरीलाल जैन सूफी दरगाहों को इस्लाम में भर्ती करने वाली संस्थाओं की संज्ञा दी थी. गत कुछ दशकों से लम्बी-लम्बी दाढ़ियों वाले मौलवी, जगह-जगह हरी चादरें बिछाकर अपने पालतू संगठन बनाकर सूफीवाद की आड़ में अपनी दुकानें चला रहे हैं. यह दावा सरासर गलत है कि सूफी मौला, हिन्दू धर्म और इस्लाम के बीच पुल का काम करते थे. सच्चाई तो यह है कि अधिकांश सूफी इस्लाम के प्रचारक थे, जिन्होंने इस्लाम को फैलाने के लिए और हिन्दुओं का धर्मांतरण करने के लिए हर हथकंडा अपनाया. उनका हिन्दू धर्म या उनके दर्शन से कोई दूर-दर तक वास्ता नहीं था. यह बात दूसरी है कि उन्होंने हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के लिए हिन्दवी भाषा का सहारा लिया. उनके खरीदे हुए गुलामों ने उनकी करामात के बारे में झूठे वायदे करके आस्थावान हिन्दुओं को उनकी ओर आकर्षित किया. 

विडंबना यह भी है कि जिन सूफियों ने हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया और उनके पूजास्थलों को मिट्टी में मिलाया, उन्हीं की दरगाहों में हाजिरी देने वालों में 90 प्रतिशत मूर्ख हिन्दू होते हैं. इस तथ्य से कोई व्यक्ति इंकार नहीं कर सकता कि इन सूफियों ने जासूस के रूप में कार्य किया और मुस्लिम अक्रांताओं को हिन्दू राजाओं को पराजित करने के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाई. यदि यह सूफी भारत की बहुधर्मी संस्कृति में विश्वास करते थे, तो क्या उन्होंने एक भी मुसलमान को हिन्दू धर्म स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया? क्या उनमें से एक भी “कथित सन्त” ने मुस्लिम सुल्तानों द्वारा हिन्दू जनता के उत्पीड़न और उनके उपासना स्थलों को तबाह करने का कभी विरोध किया था? कभी नहीं... सच तो यह है कि इनकी दरगाहें इस्लाम के प्रचार का मुख्य केन्द्र बनीं रहीं. पंजाब में बाबा फरीदगंज शक्कर का नाम काफी श्रद्धा से लिया जाता है. गुरूग्रंथ साहिब तक में उनकी वाणी शामिल है. मगर नवीं शताब्दी की एक फारसी पुस्तक जिसका नाम है ‘मिरात-ए-फरीदी’ लेखक अहमद बुखारी में इस महान सूफी की पोल खोलकर रख दी गई है. लेखक के अनुसार इस सूफी ने पंजाब में 25 लाख हिन्दू जाटों का धर्मांतरण करवाया था। उनके दस हजार बुतखानों को ध्वस्त करवाया. इस पुस्तक में उनके इन कारनामों का बड़े विस्तृत रूप से जिक्र किया गया है. 


अजमेर के हजरत गरीब नवाज मोईनुद्दीन चिश्ती के बारे में कुछ वर्ष पूर्व लाहौर के एक समाचारपत्र कोहिस्तान में कुछ फारसी पत्र प्रकाशित हुए थे, जो कि उन्होंने शाहबुद्दीन गौरी को लिखे थे. इन पत्रों में मोईनुद्दीन चिश्ती ने अजमेर के किले तारागढ़ को कैसे जीता जाये, इसके बारे में गौरी को कई सुझाव दिए थे. इनकी चार पत्नियां थीं जिनमें से एक पत्नी राजपूत थीं, जिसे किसी युद्ध में बंदी बनाया गया था. इसका जबरन धर्म परिवर्तन किया गया. इस राजपूत औरत से चिश्ती की एक पुत्री का जन्म हुआ था, जिसका नाम बीबी जमाल है और उसकी कब्र आज भी अजमेर स्थित दरगाह के परिसर में है. तत्कालीन फारसी इतिहासकारों ने इनके बारे में यह दावा किया है, कि उन्होंने दस लाख काफिरों (हिन्दू) को कुफ्र की जहालत से निकालकर इस्लामी के नूर से रोशन किया, अर्थात् उनका धर्मांतरण करवाया. इस सूफी की प्रेरणा से अजमेर और नागौर में अनेक मंदिरों को ध्वस्त किया गया. अजेमर स्थित “ढाई दिन का झोपड़ा” इसका ज्वलंत उदाहरण है... लेकिन भारत की नई पीढ़ी जिसका “सेकुलर ब्रेनवॉश” हो चुका है वह इस दरगाह पर अमिताभ बच्चन को सिर पर गुलाबों की टोकरी उठाए देखता है तो गदगद हो जाता है. यह पीढ़ी इस दरगाह के पीछे का खूनी इतिहास जानने में रूचि नहीं रखती... अंग्रेजी में इसे “Deadly Ignorance” (घातक अज्ञान) कहा जाता है. इसी प्रकार बंगाल के खूंखार और लड़ाके सूफियों में एक मुख्य नाम सिलहट के शेख जलाल का भी है. गुलजार-ए-अबरार नामक ग्रंथ के अनुसार इस सूफी ने राजा गौढ़ गोविन्द को हराया. शेख जलाल का अपने अनुयायियों को स्पष्ट आदेश था कि वह हिन्दुओं को इस्लाम कबूल करने की दावत दें और जो उससे इंकार करे उसे फौरन कत्ल कर दें.

बहराइच के गाजी मियां उर्फ सलार मसूद गाजी का नाम भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय है. यह महमूद गजनवी का भांजा था, और इसी ने सोमनाथ के मंदिर को ध्वस्त करने के लिए अपने मामा को प्रेरित किया था. प्रारम्भ से ही उनका हिन्दुओं के सामने एक ही प्रस्ताव था - मौत या इस्लाम. बहराइच के समीप वीर हिन्दू महाराजा सोहेल देव की सेनाओं के हाथ वह अपने हजारों साथियों सहित मारा गया था, लेकिन सोहेल देव के हारने के पश्चात मोहम्मद तुगलक ने मसूद की मजार पर एक पक्का मकबरा बनवा दिया और ये “गाजी मियां” उर्फ बाले मियां उत्तर प्रदेश और बिहार में एक बेहद लोकप्रिय पीर के रूप में विख्यात् हो गए, जबकि इसे हराने और मारने वाले हिन्दू राजा सोहेलदेव इतिहास से गायब हो गए. “जिकर बाले मियां” नामक उर्दू पुस्तक के अनुसार, गाजी मसूद ने पांच लाख हिन्दुओं को मुसलमान बनाया और अपने अनुयायियों को यह आदेश दिया था कि वह हिन्दू महिलाओं से जबरन निकाह करें. इतिहासकारों के अनुसार मेरठ स्थित नवचंडी मंदिर को ध्वस्त करने वाले बाले मियां ही थे। बाले मियां के काले कारनामों का उल्लेख (ईलियट एण्ड डाउसनः हिस्ट्री आॅफ इण्डिया बाई इट्स ओन हिस्टोरियन्स, खण्ड-2, पेज-529-547) में विस्तृत रूप से किया गया है. कश्मीर का इस्लामीकरण करने में भी सूफियों का महत्वपूर्ण हाथ है. जाफर मिक्की ने “कश्मीर में इस्लाम” नामक फारसी पुस्तक में यह स्वीकार किया है, कि तुर्किस्तान से आने वाले 21 सूफियों ने नुरूद्दीन उर्फ नंदऋषि के नेतृत्व में कश्मीर के 12 लाख हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया था. इन सूफियों ने उन सभी पांच लाख हिन्दुओं का कत्ल कर दिया, जिन्होंने इस्लाम कबूल करने से इंकार कर दिया था. कश्मीर के कुख्यात् धर्मांध और कट्टरवादी मुस्लिम शासक सुल्तान सिकंदर बुतशिकन ने कश्मीर घाटी में स्थित सभी हिन्दू मंदिरों को तहस-नहस करवा दिया था। मार्तंड के विख्यात् सूर्य मंदिर के खंडहर आज भी इन सूफियों के जुल्मों की कहानी के साक्षी हैं. इस सुल्तान ने अवंतीपुर के विष्णु के भव्य मंदिर को भी तहस-नहस करवाया था, यह बात भी कश्मीर में बाकायदा लिखित स्वरूप में उपलब्ध है. वैसे तो सूफी शब्द के और भी दो तीन अर्थ निकलते हैं, लेकिन एक सर्वमान्य अर्थ है कि ऐसे सच्चे मुसलमान जो ऊन से बने वस्त्र पहनते थे. Suf से Sufi बनता है, और Suf का अर्थ Wool दिया गया है. (बहराईच के  इस सालार गाजी के बारे में और अधिक जानने के लिए सात वर्ष पूर्व मेरी लिखी हुई इस पोस्ट को भी जरूर पढ़िए...और सोचिए कि हिंदुओं को कैसे मूर्ख बनाया गया है... http://blog.sureshchiplunkar.com/2009/05/mughal-invader-defeated-by-hindu-kings.html)



वैसे आप को शायद पता ही होगा कि इंग्लिश में एक मुहावरा है – “pulling wool over someone's eyes” . इसका लौकिकार्थ होता है, “किसी का भरोसा जीतकर उसे मूर्ख बनाना...”. Suf = Wool होता है, ये हम इस लेख में विस्तार से देख चुके हैं. आँखों में धूल झोंककर, स्वयं को आध्यात्मिक एवं मौलवी टाईप के स्वांग में रचकर भोलेभाले हिंदुओं को इस्लाम की तरफ खींचने की चाल अभी तक काफी सफल रही है, परन्तु अब उम्मीद करता हूँ कि गाँव-गाँव में हरी चादरें फैलाकर खैरात माँगने वाली टोली अथवा हाईवे एवं महत्त्वपूर्ण सामरिक ठिकानों के आसपास अथवा सड़क के दोनों तरफ रातोंरात अचानक उग आईं दरगाहों, मज़ारों और चमत्कारों का दावा करने वाली इन “लाशों” के बारे में, आप लोग गहरे पड़ताल तो करेंगे ही... हिन्दू नाम वाले किसी फ़िल्मी हीरो को किसी दरगाह पर चादर चढ़ाते हुए देखकर लहालोट भी नहीं होंगे. वास्तव में सूफ़ी मत, “इस्लामी ऑक्टोपस” की ही एक बांह भर है

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(भाई तुफैल चतुर्वेदी जी की फेसबुक पोस्ट, एवं कमेंट्स में मामूली फेरबदल के साथ साभार). 

Monday, March 7, 2016

JNU, Anti-National Congress and Communists

कांग्रेस का हाथ... वामपंथ और देशविरोधियों के साथ 


गत नौ फरवरी को जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सियाचिन के बर्फीले तूफ़ान को हराकर वापस लौटे वीर सैनिक हनुमंथप्पा को देखने अस्पताल गए, ठीक उसी समय राजधानी दिल्ली के बीचोंबीच स्थित जवाहरलाल नेहरू विवि उर्फ़ JNU में छात्रों का एक गुट न सिर्फ भारत विरोधी नारे लगा रहा था, बल्कि भारत की न्याय व्यवस्था एवं राष्ट्रपति की खिल्ली उड़ाते हुए कश्मीरी अलगाववादी अफज़ल गूरू के समर्थन में तख्तियां लटकाए और उसे बेक़सूर बताते हुए प्रदर्शनों में लगा हुआ था. इस विश्वविद्यालय के छात्रों एवं प्रोफेसरों द्वारा ऐसे बौद्धिक कुकृत्यों में शामिल होने के इतिहास को देखते हुए जवाहरलाल नेहरू के नाम पर स्थापित इस विश्वविद्यालय के लिए यह कोई नई बात नहीं थी. जब छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के छिहत्तर जवानों को मौत के घाट उतारा था, उस समय जनेवि में ऐसे ही “तथाकथित छात्रों” द्वारा जश्न मनाया गया था. पिछले कई वर्षों से JNU में इस प्रकार की देशद्रोही एवं भारत के संविधान एवं न्याय व्यवस्था की आलोचना करने जैसे कृत्य लगातार होते आ रहे थे, परन्तु कांग्रेस की सरकारों द्वारा इस प्रश्रय दिया जाता रहा अथवा आँख मूँदी जाती रही. जब से नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में आई है काँग्रेस एवं वामपंथीयों की बेचैनी बढ़ने लगी है एवं मानसिक स्थिति बेहद मटमैली हो चली है. येन-केन-प्रकारेण मोदी सरकार को नित-नए मुद्दों में कैसे उलझाकर रखा जाए एवं देश को जाति-धर्म एवं भाषा में कैसे टुकड़े-टुकड़े किया जाए इसकी रोज़ाना योजनाएँ बनाई जा रही हैं... चूँकि मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही काँग्रेस और वामपंथियों के इस “मुफ्तखोरी वाले दुष्चक्र” को तोड़ने की शुरुआत की है, इसलिए स्वाभाविक है कि दोनों चोट खाए सांप की तरह अपने फन फैलाए लगातार फुँफकार रहे हैं, चाहे वह फिल्म एंड टीवी संस्थान का मामला हो, चाहे शनि शिंगणापुर का मामला हो, चाहे हैदराबाद के रोहित वेमुला की आत्महत्या का मामला हो... या फिर JNU में देशद्रोही नारों का ताज़ा मामला हो... सभी मामलों में काँग्रेस एवं वामपंथियों ने आग में घी डालने और भड़काने का ही काम किया है. चूँकि राहुल गाँधी के सलाहकार मणिशंकर अय्यर एवं दिग्विजयसिंह जैसे महानुभाव हैं, इसलिए राहुल बाबा तो मामले की गंभीरता समझे बिना ही उन उद्दंड एवं कश्मीरी अलगाववादियों के हाथों में खेलने वाले छात्रों के समर्थन में सीधे JNU भी पहुँच गए.



दरअसल स्वतंत्रता के पश्चात से ही कांग्रेस (यानी वामपंथ, रूस एवं सोशलिज्म की तरफ झुकाव रखने वाले जवाहरलाल नेहरू) एवं वामपंथी दलों में आपस में एक अलिखित समझौता था जिसके अनुसार शैक्षणिक संस्थाओं, शोध संस्थानों तथा अकादमिक, नाटक एवं फ़िल्म क्षेत्र में वामपंथियों की मनमर्जी चलेगी, उनके पैर पसारने का पूरा मौका दिया जाएगा, सेकुलर-वामपंथी विचारधारा वाले प्रोफेसरों, लेखकों, फिल्मकारों को इन सभी क्षेत्रों में घुसपैठ करवाने तथा उन्हें वहां स्थापित करने का पूरा मौका दिया जाएगा, कांग्रेस इसमें कोई दखलंदाजी नहीं करेगी. इसके बदले में वामपंथी दल, कांग्रेस को संसद में, संसद के बाहर तथा राजनैतिक क्षेत्र के भ्रष्टाचार व अनियमितताओं के खिलाफ या तो कुछ नहीं बोलेंगे अथवा मामला ज्यादा बढ़ा, तो दबे स्वरों में आलोचना करेंगे ताकि माहौल को भटकाने तथा मुद्दे को ठंडा करने में मदद हो सके. कांग्रेस और वामपंथियों ने इस अलिखित समझौते का अभी तक लगातार पालन किया है. जैसे वामपंथियों ने इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल का “अनुशासन पर्व” कहते हुए समर्थन किया, उसी प्रकार कांग्रेस ने भी सुभाषचंद्र बोस की फाईलों को साठ वर्षों तक दबाए रखा, ताकि सुभाष बाबू को “तोजो का कुत्ता” कहने वाले वामपंथी शर्मिन्दा ना हों. 

वामपंथ की विचारधारा तो खैर भारत से बाहर चीन-रूस-क्यूबा-वियतनाम जैसे तानाशाही ग्रस्त, एवं साम्यवादी हत्यारी विचारधारा से शासित देशों से आयातित की हुई है, इसलिए स्वाभाविक रूप से उनका भारतीय लोकतंत्र में तनिक भी विश्वास नहीं है, परन्तु काँग्रेस जैसी पार्टी जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम की विरासत को हथियाए बैठी है, देश की जनता को कम से कम उससे यह उम्मीद नहीं होती कि वह भी नरेंद्र मोदी से ईर्ष्या के चलते, देश को तोड़ने वाली ताकतों के साथ खड़ी हो जाए परन्तु ऐसा हुआ. JNU के देशद्रोही नारों वाले मामले को छोड़ भी दें तो यह पहली बार नहीं है कि काँग्रेस ने वामपंथ एवं देशद्रोहियों का साथ न दिया हो... सभी पाठकों को याद होगा कि 26/11 के नृशंस और भीषण आतंकवादी हमले के पश्चात जब हमारे सुरक्षाबलों ने बहादुरी दिखाते हुए सभी पाकिस्तानी आतंकवादियों को मार गिराया और अजमल कसाब जैसे दुर्दांत आतंकी को जीवित पकड़ लिया था, उसके बाद भी दिग्विजयसिंह जैसे वरिष्ठ काँग्रेसी सरेआम अज़ीज़ बर्नी जैसे विघटनकारी लेखक की पुस्तक “26/11 हमला – RSS की साज़िश” जैसी मूर्खतापूर्ण एवं तथ्यों से परे लिखी हुई किताब का विमोचन कर रहे थे. काँग्रेस के जो नेता सोनिया गाँधी की मर्जी और आदेश के बगैर पानी तक नहीं पी सकते हैं, उस काँग्रेस में ऐसा संभव ही नहीं कि दिग्विजयसिंह द्वारा ऐसी पुस्तक का विमोचन सोनिया-राहुल की जानकारी के बिना हुआ होगा. आगे चलकर यही दिग्विजयसिंह टीवी पर अन्तर्राष्ट्रीय आतंकी ओसामा बिन लादेन को “ओसामा जी” कहते हुए पाए गए. ताज़ा विवाद के बाद एक अन्य टीवी चैनल पर बहस के दौरान काँग्रेस के ही एक और वरिष्ठ नेता रणदीप सुरजेवाला ने “अफज़ल “गुरूजी” का संबोधन भी किया. तात्पर्य यह है कि जो कांग्रेसियों के मन में है, वही गाहे-बगाहे उनकी जुबां पर आ ही जाता है और ऐसा कुछ होने के बाद सोनिया की चुप्पी अथवा इन पर कार्रवाई नहीं करना क्या दर्शाता है?? 


यदि हम इतिहास पर नज़र घुमाएँ तो पाते हैं कि ऐसी कई घटनाएँ हुईं, जिनसे काँग्रेस का यह देशविरोधी रुख प्रदर्शित होता है. उदाहरण के लिए स्वतंत्रता से पूर्व काँग्रेस अधिवेशनों में वन्देमातरम गाया जाता था. लेकिन जब 1923 के अधिवेशन में काँग्रेस नेता पलुस्कर वन्देमातरम गाने के लिए खड़े हुए तो काँग्रेस के ही एक अन्य नेता मोहम्मद अली ने इसका विरोध किया और कहा कि “वन्देमातरम” गाना इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ है, इसे नहीं गाया जाना चाहिए. इस पर पलुस्कर ने कहा कि वे परंपरा को तोड़ेंगे नहीं और वन्देमातरम जारी रखा. इस पर मोहम्मद अली अधिवेशन छोड़कर निकल गए, उस समय मंच पर महात्मा गाँधी सहित लगभग सभी बड़े काँग्रेस नेता थे, लेकिन कोई भी नेता पलुस्कर (यानी वन्देमातरम) के समर्थन में खड़ा नहीं हुआ. यदि उसी समय मोहम्मद अली को उचित समझाईश दे दी गई होती तो ना ही उसके बाद हेडगेवार का काँग्रेस में दम घुटता, ना ही हेडगेवार काँग्रेस से बाहर निकलते और ना ही RSS का गठन हुआ होता. काँग्रेस का “वंदेमातरम” जैसे संस्कृतनिष्ठ एवं देशप्रेमी गीत पर यह ढुलमुल रवैया न सिर्फ आज भी जारी है बल्कि “सेकुलरों की मानसिक स्थिति” इतनी गिर गई है, कि “वन्देमातरम” बोलने वाले को तत्काल संघी घोषित कर दिया जाता है. 

काँग्रेस को अपने अध्यक्ष पद के लिए सदैव उच्चवर्गीय एवं गोरे साहबों के प्रति प्रेम रहा है. दूसरा उदाहरण स्वतंत्रता से तुरंत पहले का है, जब गाँधी और नेहरू अक्षरशः लॉर्ड माउंटबेटन के सामने गिडगिडा रहे थे कि वे स्वतंत्रता के बाद भी कुछ वर्ष तक भारत के गवर्नर बने रहें. 1948 में ही जब पाकिस्तान ने कबाईलियों को भेजकर भारत पर पहला हमला किया तो जवाहरलाल नेहरू ने सरदार पटेल, जनरल करिअप्पा एवं जनरल थिमैया की सलाह को ठुकराते हुए लॉर्ड माउंटबेटन की सलाह पर इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले गए, जिसका नतीजा भारत आज भी भुगत रहा है. लॉर्ड माउंटबेटन ने ही नेहरू को सलाह दी थी कि हैदराबाद के रजाकारों एवं निजाम का मामला भी संयुक्त राष्ट्र ले जाएँ और उन्हें “आत्मनिर्णय”(??) का अधिकार दें, परन्तु चूँकि तत्कालीन गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी ने नेहरू की एक ना सुनी और सरदार पटेल द्वारा निज़ाम और दंगाई रजाकारों पर की गई कठोर कार्रवाई को पूर्ण समर्थन दिया. यही देशविरोधी कहानी उस समय भारत के उत्तर-पूर्व में भी दोहराई गई थी. उत्तर-पूर्व के राज्यों की नाज़ुक सामरिक स्थिति को देखते हुए जनरल करिअप्पा ने नेहरू को सुझाव दिया था कि भारत को उस क्षेत्र में अपनी रक्षा तैयारियों तथा सड़क-बिजली-पानी-बाँधों जैसे मूल इंफ्रास्ट्रक्चर पर अधिक ध्यान देना चाहिए. परन्तु चूँकि नेहरू पर उस समय “चीन-प्रेम” हावी था, इसलिए उन्होंने उत्तर-पूर्व के राज्यों में सेना की अधिक उपस्थिति की बजाय विदेशी मिशनरी “वेरियर एल्विन” की सलाह को प्राथमिकता देते हुए आदिवासी एवं पहाड़ी क्षेत्रों को खुला छोड़ दिया. इसका नतीजा यह रहा कि चीन ने अरुणाचल का बड़ा हिस्सा हड़प लिया, नेहरू की पीठ में छुरा घोंपते हुए भारत पर एक युद्ध भी थोप दिया एवं ईसाई मिशनरियों ने समूचे उत्तर-पूर्व में अपना जाल मजबूत कर लिया. काँग्रेस की बदौलत आज की स्थिति यह है कि उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों में हिंदुओं-आदिवासियों की संख्या चिंताजनक स्तर तक घट गई है और कुछ राज्य ईसाई बहुल बन चुके हैं. संक्षेप में तात्पर्य यह है कि गोरी चमड़ी वाले देशी-विदेशी आकाओं की बातें मानना, काँग्रेस का प्रिय शगल रहा है, फिर चाहे वह माउंटबेटन हों अथवा सोनिया माईनो. 1885 में एक अंग्रेज ह्यूम द्वारा ही स्थापित काँग्रेस की देशविरोधी हरकतों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहले तो कांग्रेसियों ने सोनिया गाँधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने के लिए एक दलित अर्थात सीताराम केसरी की धोती फाड़कर उन्हें बाहर धकिया दिया, तो दूसरी तरफ गोरे साहब क्वात्रोच्ची को बचाने के लिए काँग्रेस के वरिष्ठ नेता हंसराज भारद्वाज बाकायदा विदेश जाकर उसका बचाव करके आए, लेकिन बिहार के जमीनी दलित नेता बाबू जगजीवनराम को कभी भी काँग्रेस का अध्यक्ष नहीं बनने दिया. विडम्बना यह कि सीताराम केसरी और जगजीवनराम का घोर अपमान करने वाली काँग्रेस के युवराज सीधे हैदराबाद जाकर रोहित वेमुला की लाश पर घडियाली आँसू बहा देते हैं, क्योंकि काँग्रेस के “सहोदर” वामपंथी भी इसी उच्चवर्णीय ग्रंथि से पीड़ित हैं. वामपंथियों की सर्वोच्च पोलित ब्यूरो में भी दलितों की संख्या नगण्य है, लेकिन फिर भी रोहित वेमुला जो कि एक OBC है, उसे “दलित” बनाकर गिद्धों की तरह लाश नोचने में वामपंथी दल ही सबसे आगे रहे. अर्थात देशविरोधी ताकतों का साथ देना तो एक प्रमुख मुद्दा है ही, लेकिन वास्तव में काँग्रेस और वामपंथी दलों की संस्थाओं में “घनघोर उच्चवर्गीय जातिवाद” भी फैला हुआ है. इन्हीं के षड्यंत्रों एवं तरुण तेजपाल जैसे रेपिस्ट पत्रकार की वजह से भाजपा के पहले दलित अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को झूठे मामले में फँसाया गया. 

बहरहाल, फिलहाल हम अपना फोकस काँग्रेस-वामपंथ के जातिवाद की बजाय देशद्रोही हरकतों एवं बयानों पर ही रखते हैं. देश की जनता उस घटनाक्रम को भी भूली नहीं है, जिसमें भारत के पश्चिमी इलाके में नौसेना ने पाकिस्तान से आने वाली एक नौका को उड़ा दिया था, जिसमें संदिग्ध गतिविधियाँ चल रही थीं तथा उस नौका में आतंकवादियों की मौजूदगी की पूरी संभावना थी, क्योंकि वह नौका मछली मारने वाले रूट पर नहीं थी, और ना ही उस नौका ने सुरक्षाबलों को संतोषजनक जवाब दिया था. स्वाभाविक रूप से एक संप्रभु राष्ट्र की सुरक्षा में जो किया जाना चाहिए, वह हमारे सुरक्षाबलों ने किया. कोई और देश होता तो ऐसी संभावित घुसपैठ को रोकने के लिए की गई कार्रवाई की सभी द्वारा प्रशंसा की जाती. लेकिन भारत की महान पार्टी उर्फ “देशविरोधी” काँग्रेस को यह रास नहीं आया. उस नौका को उड़ाते ही काँग्रेस का सनातन पाकिस्तान प्रेम अचानक जागृत हो गया. देश के सुरक्षाबलों की तारीफ़ करने की बजाय सबसे पहले तो काँग्रेस ने यह पूछा कि आखिर पाकिस्तान से आने वाली उस नौका को क्यों उड़ाया? नौसेना और कोस्टगार्ड के पास उनके आतंकवादी होने का क्या सबूत था? सरकार इस नतीजे पर कैसे पहुँची कि उसमें आतंकवादी ही थे? यानी पाकिस्तान सरकार द्वारा सवाल पूछे जाने की बजाय, भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ही यह जिम्मेदारी निभाती रही. क्या इसे देशविरोधी कृत्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए? काँग्रेस का यही देशद्रोही रुख दिल्ली के “बाटला हाउस मुठभेड़” के समय भी सामने आया था. सितम्बर 2008 में जबकि केन्द्र और दिल्ली दोनों स्थानों पर काँग्रेस की ही सरकार थी, उस समय दो आतंकियों के मारे जाने एवं मोहनचंद्र शर्मा नामक जाँबाज पुलिस अधिकारी के शहीद होने के बावजूद काँग्रेस की तरफ से कोई कठोर बयान आना तो दूर, हमेशा की तरह राहुल के राजनैतिक गुरु, अर्थात दिग्विजय सिंह मातमपुरसी करने उन आतंकियों के घर अर्थात आजमगढ़ पहुँच गए. मुस्लिमों के वोट लेने के चक्कर में पार्टी ने सीधे-सीधे दिल्ली पुलिस एवं शहीद शर्मा की शहादत पर अपरोक्ष सवाल उठा दिया था. अगला उदाहरण नरेन्द्र मोदी के अमेरिकी वीजा से सम्बन्धित है. भारत जैसे संघ गणराज्य के एक प्रमुख राज्य गुजरात में जनता द्वारा तीन-तीन बार चुने हुए एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री को जब काँग्रेस के ही पोषित NGOs एवं “बुद्धिजीवी गिरोह” के दुष्प्रचार से प्रेरित होकर अमेरिका द्वारा वीज़ा देने से इनकार किया गया उस समय काँग्रेस ने जमकर खुशियाँ मनाई गईं. नरेंद्र मोदी को 2002 के दंगों को लेकर भला-बुरा कहा गया. परन्तु खुद को एक राष्ट्रीय पार्टी कहने वाली काँग्रेस को इस बात का ख़याल नहीं आया कि मोदी को वीज़ा नहीं देना एक तरह से भारत का ही अपमान है. काँग्रेस अपनी मोदी-घृणा में इतनी अंधी हो गई थी कि उसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली भारत की फजीहत का भी अंदाजा नहीं था... फ्रांस के शार्ली हेब्दो अखबार पर हुए जेहादी हमले के समय काँग्रेस का ढुलमुल रुख हो या इसी पार्टी के मणिशंकर अय्यर का हास्यास्पद बयान हो... या फिर सलमान खुर्शीद द्वारा पाकिस्तान जाकर भारत के विरोध में ऊटपटांग बयानबाजी करना हो, काँग्रेस ने कभी भी देशहित और भारत के सम्मान को ऊपर नहीं रखा. इसके अलावा तीस्ता सीतलवाड एवं अरुंधती रॉय जैसे देशविरोधी लोगों के NGOs को प्रश्रय देकर भारत में ही विभिन्न परियोजनाओं में अड़ंगे लगवाना, उन परियोजनाओं की लागत बढ़ाकर उन्हें देरी से पूरा करना यह देशविरोधी कृत्य तो काँग्रेस ने बहुत बार किया है. कहने का मतलब यह है कि नेहरू के जमाने में वीके कृष्ण मेनन से लेकर सोनिया के युग में दिग्विजयसिंह तक काँग्रेस का इतिहास अपने राजनैतिक लाभ के लिए देशविरोधियों को पालने-पोसने एवं समर्थन देने का रहा है. अपने मुस्लिम वोट प्रेम में काँग्रेस इतनी गिर चुकी है कि उसे कश्मीरी पंडितों का दर्द कभी समझ में नहीं आया. घाटी में लगने वाले “यहाँ निजाम-ए-मुस्तफा चलेगा” जैसे नारों को दरकिनार करके काँग्रेस के नेता सरेआम यह बयान देते हैं कि पंडितों के निर्वासन का कारण राज्यपाल जगमोहन थे. “ज़लज़ला आया है कुफ्र के मैदान में, लो मुजाहिद आ गए मैदान में” जैसे जहरीले नारों के बावजूद अपने ही देश में परायों की तरह शरणार्थी बने बैठे पंडितों से काँग्रेस कहती है कि उन्होंने खामख्वाह ही घाटी छोड़ी. ऐसी सोच को क्या कहा जाए? 

काँग्रेस का देशविरोधी और वामपंथी-मित्रता भरा इतिहास तो हमने देख लिया अब हम आते हैं देश के मनोमस्तिष्क को आंदोलित करने वाले वर्तमान विवाद अर्थात जेएनयू में देशद्रोही नारे लगाने के विवाद पर... एक समय पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय शिक्षा एवं राजनैतिक बहस का एक प्रमुख केन्द्र हुआ करता था, परन्तु शुरू से ही वामपंथी विचारधारा की पकड़ वाला यह विवि धीरे-धीरे अपनी चमक खोता जा रहा है और इसकी विमर्श प्रक्रिया में ह्रास होकर अब यह विशुद्ध हिन्दू विरोधी, हिन्दू परंपरा विरोधी एवं राष्ट्रवादी भावनाओं को ठेस पहुँचाने का अड्डा भर बनकर रह गया है. जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, जिस समय छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने 76 CRPF जवानों का क़त्ल किया था, उस समय भी JNU में वामपंथी विचारधारा के छात्रों ने जश्न मनाया था. यदि उसी समय काँग्रेस सरकार उन छात्रों पर कोई एक्शन ले लेती तो आज शायद यह नौबत नहीं आती, परन्तु काँग्रेस और वामपंथ के उस अलिखित समझौते के तहत सैन्य बलों के इस अपमान पर इन उद्दंड और देशद्रोही छात्रों को कोई सबक नहीं सिखाया गया और ये छात्र अपने प्रोफेसरों की छत्रछाया में पलते-बढ़ते रहे, अपनी जहरीली विचारधारा का प्रसार विभिन्न कैम्पसों में करते रहे. भारतीय सैन्य बलों के प्रति फैलाई गई यह वामपंथी नफरत बढ़ते-बढ़ते अफज़ल और याकूब प्रेम तक कब पहुँच गई देश को पता ही नहीं चला. इसी जेएनयू में हिन्दू संस्कृति से घृणा करने वाले वामपंथी गुटों की शह पर, कुछ जातिवादी छात्रों के एक गुट ने “महिषासुर दिवस” मनाया, जिसमें हिंदुओं की आराध्य देवी माँ दुर्गा को “वेश्या” कहा गया. जो काँग्रेस पैगम्बर मोहम्मद के अपमान पर ठेठ फ्रांस और जर्मनी तक को उपदेश देने लग जाती है, उसी काँग्रेस ने इस महिषासुर दिवस मामले पर चुप्पी साध ली, क्योंकि काँग्रेस को हमेशा दोनों हाथों में लड्डू चाहिए होते हैं. अतः जिस प्रकार काँग्रेस ने पहले राम जन्मभूमि का ताला खुलवाकर हिंदुओं को खुश करने की कोशिश की, उसी प्रकार शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट को लतियाकर मुस्लिमों को खुश रखने की कोशिश की, भले ही इस्लामी अतिवादियों को शह मिले एवं देश जाए भाड़ में, काँग्रेस को क्या परवाह?? काँग्रेस का यह दोगला रवैया हमेशा सामने आता रहता है, इसीलिए “किस ऑफ लव”, “समलैंगिक विवाह की अनुमति” जैसे छिछोरे कार्यक्रम सरेआम सड़कों पर आयोजित करने वाले जेएनयू के छात्रों के खिलाफ कोई बयान देना तो दूर, काँग्रेस इनके समर्थन में ही लगी रही, और अब जैसे ही छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया को गिरफ्तार किया तो अचानक राहुल बाबा का “लोकतंत्र प्रेम” जागृत हो उठा और वे उन छात्रों के समर्थन में दो घंटे के “सांकेतिक धरने” पर जा बैठे. चूँकि बंगाल में भी विधानसभा चुनाव निकट ही हैं और काँग्रेस भी इस समय सिर्फ 44 सीटों पर सिमटने के बाद एकदम फुर्सत में है इसलिए अब ममता बनर्जी के खिलाफ काँग्रेस और वामपंथ में “नग्न गठबंधन” की तैयारियाँ भी चल रही हैं. लगता है कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद, अब काँग्रेस ने तय कर लिया है कि वह बुर्के में नहीं छिपेगी बल्कि खुलेआम वामपंथियों का साथ देगी, चाहे इसके लिए उसे देश के सैनिकों का अपमान ही क्यों ना करना पड़े. 


कुछ दिनों पहले ही कोलकाता में काँग्रेस ने वाम मोर्चा की पार्टियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर जेएनयू की घटना के खिलाफ प्रदर्शन किया तथा मोदी सरकार पर तानाशाही, अलोकतांत्रिक वगैरह होने के आरोप लगाए. लेकिन सवाल यह उठता है कि लेनिन-मार्क्स-माओ-स्टालिन एवं पोलपोट जैसे तानाशाहों ने जिस वामपंथी विचारधारा को पाला-पोसा और फैलाया, इस विचारधारा के तहत समूचे विश्व में करोड़ों हत्याएँ कीं, जब उनके भारत स्थित अनुयायी लोकतंत्र और मूल्यों की बात करते हैं बड़ी हँसी आती है. इसी प्रकार जब देश लोकतांत्रिक रूप से मजबूत हो रहा था, उस समय मात्र एक चुनावी हार की खीझ के चलते पूरे भारत पर आपातकाल थोपने वाली काँग्रेस की “आदर्श स्त्री” इंदिरा गाँधी के भक्तगण जब नरेंद्र मोदी पर तानाशाह होने का आरोप लगाते हैं तो सिर पीटने की इच्छा होती है. 1977 से लेकर 2011 तक पश्चिम बंगाल में वामपंथियों ने “आधिकारिक रूप से” 60,000 राजनैतिक विरोधियों की हत्याएं करवाई हैं (अर्थात औसतन पाँच हत्याएँ प्रतिदिन). ऐसा नहीं कि वामपंथियों ने सिर्फ अपने राजनैतिक विरोधियों की हत्याएँ करवाई हों, बल्कि बिना किसी राजनैतिक जुड़ाव वाले समूहों की भी हत्याएँ सिर्फ इसलिए करवाई गईं, क्योंकि वे लोग ज्योति बसु अथवा वामपंथी सरकार की बातों से सहमत नहीं थे. जनवरी 1979 में सुंदरबन के एक टापू पर बांग्लादेश से भागकर आए हिन्दू शरणार्थियों को ज्योति बसु की पुलिस ने चारों तरफ से घेर लिया, चार सप्ताह तक उस टापू को पूरी दुनिया से काट दिया और जब भूख-प्यास से परेशान शरणार्थी भागने लगे तो उन्हें गोलियों से भून दिया गया था. इसी प्रकार मार्च 1970 में सेनबाडी इलाके में कई काँग्रेस समर्थकों की हत्याएँ करवाई गईं तथा खून उनकी विधवा के माथे पर पोता गया जिसके कारण वह पागल हो गई. जबकि अप्रैल 1982 में आनंदमार्गी सन्यासियों एवं साध्वियों को वामपंथियों ने पीट-पीटकर मार डाला था. केरल में भी पिछले दो वर्षों के दौरान RSS के दो सौ स्वयंसेवकों की हत्याएँ वामपंथियों द्वारा हुई हैं, फिर भी इन्हें JNU के देशद्रोही नारे लगाने वाले वामपंथी छात्र मासूम, और नरेंद्र मोदी तानाशाह नज़र आते हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि जिनका खुद का इतिहास हत्याओं, तानाशाही और लोकतंत्र की गर्दन मरोड़ने का रहा हो, उस पार्टी के युवराज अपनी देशद्रोही हरकतों को छिपाने के लिए JNU में जाकर लोकतंत्र का नारा लगा रहे हैं और यह सोच रहे हैं कि जनता बेवकूफ बन जाएगी, अथवा इनके पापों को भारत भूल जाएगा? क्या राहुल गाँधी भूल चुके हैं कि उनकी दादी ने आपातकाल के इक्कीस महीनों के दौआर्ण सैकड़ों कलाकारों, नाट्यकर्मियों, निर्दोष संघ स्वयंसेवकों, विपक्षी नेताओं और पत्रकारों को बिना कारण जेल में ठूँस दिया था? और उस समय जेएनयू के छात्रों की प्रिय पार्टी भाकपा, इंदिरा गाँधी की तारीफें कर रही थी, और जेएनयू के देशद्रोही छात्रों के समर्थन में खड़े बेशर्म प्रोफेसरों को शायद यह याद नहीं कि उनके प्रियपात्र ज्योति बसु और बुद्धदेब भट्टाचार्य ने बंगाल में कितनी क्रूर हत्याएँ करवाई हैं. परन्तु जैसा कि ऊपर कहा गया कि काँग्रेस और वामपंथी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं, इनमें आपसे में एक अलिखित समझौता रहा है जिसके अनुसार ये दोनों एक दूसरे के “काले कारनामों” में दखल नहीं देते. 

काँग्रेसी देशद्रोह को पूरी तरह से नंगा करने वाला एक और सच हाल ही में दुनिया के सामने आया है, जिसमें 26/11 के मुम्बई धमाकों के प्रमुख मास्टरमाइंड डेविड हेडली ने अमेरिका की जेल से भारत के न्यायालय में सीधे वीडियो रिकॉर्डिंग के जरिए उस आतंकी हमले की दास्ताँ बयान की है. हेडली ने यह भी बताया कि कौन-कौन इस साज़िश में शामिल था. डेविड हेडली ने हाफ़िज़ सईद और मौलाना मसूद अजहर जैसे “परिचित आतंकियों” के नाम तो लिए ही, परन्तु उसका सबसे अधिक चौंकाने वाला खुलासा यह है कि थाणे जिले के मुम्ब्रा कस्बे की मुस्लिम लड़की इशरत जहाँ, वास्तव में लश्कर-ए-तोईबा की सुसाईड बोम्बर थी. इशरत जहाँ अपने तीन साथियों अर्थात प्राणेश पिल्लई (उर्फ जावेद गुलाम शेख), अमजद अली राणा और जीशान जौहर के साथ नरेंद्र मोदी की हत्या के इरादे से अहमदाबाद आई थी, जहाँ ATS पुलिस के दस्ते ने सूचना मिलने पर उन्हें मार गिराया. डेविड हेडली ने यही बयान अमेरिका में भी दिया है और फिलहाल उसे वहाँ के कानूनों के मुताबिक़ पैंतीस वर्ष की जेल हुई है. अब तक तो पाठक समझ ही गए होंगे कि नरेंद्र मोदी से भीषण घृणा करने वाली काँग्रेस, वामपंथी तथा अन्य पार्टियों के सेकुलर नेताओं ने भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह को फँसाने के लिए लगातार कई वर्षों तक झूठ बोला कि इशरत जहाँ मासूम लड़की थी और यह एनकाउंटर अमित शाह ने जानबूझकर करवाया है, उन सभी का मुँह काला हो गया. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो इशरत जहाँ को “बिहार की बेटी” बनाए घूम रहे थे, जबकि काँग्रेस के सहयोगी शरद पवार की पार्टी ने एक कदम आगे बढ़कर “शहीद इशरत जहाँ” के नाम पर एम्बुलेंस सेवा भी आरम्भ करवा दी थी. अपने देश के सुरक्षाबलों, ख़ुफ़िया एजेंसियों एवं आतंकवाद विरोधी दस्तों की बात पर भरोसा नहीं करते हुए, मुस्लिम वोटों के लिए पतन की निचली सीमा तक गिर जाने वाली काँग्रेस को देशद्रोही ना कहें तो क्या कहें? इशरत जहाँ पर हुए खुलासे के बावजूद अभी तक ना तो काँग्रेस की तरफ से, ना ही नीतीश कुमार की तरफ से और ना ही जितेन्द्र आव्हाड़ की तरफ से माफीनामा आना तो दूर कोई शर्मयुक्त बयान तक नहीं आया. 


काँग्रेस इतने पर ही नहीं रुकी, प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार यूपीए सरकार को भी 2012 में ही ख़ुफ़िया एजेंसियों से इनपुट मिल चुका था कि इशरत जहाँ एक आतंकी है, लेकिन उसने जानबूझकर अमित शाह और मोदी को फँसाने के चक्कर में उस रिपोर्ट को दबा दिया था. NIA के अफसरों ने अमेरिका में हेडली से पूछताछ की थी उसकी रिपोर्ट पहले सुशीलकुमार शिंदे ने और फिर चिदंबरम ने अपने पास दबाकर रखी और फिर यह मामला देख रहे जोइंट डायरेक्टर एवं ईमानदार वरिष्ठ अधिकारी लोकनाथ बेहरा को प्रताड़ित करके ट्रान्सफर कर दिया. इशरत जहाँ जैसी आतंकी के पक्ष में मोमबती लेकर मार्च करने वाले वामपंथी छात्र उस बेशर्मी को भूलकर, अब JNU में उमर खालिद और कन्हैया को बचाने में लगे हैं. भोंदू किस्म के राहुल बाबा और वामपंथी बुद्धिजीवियों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि इशरत जहाँ के साथ जो तीन घोषित और साबित आतंकी थे, वे वहाँ क्या कर रहे थे? ये तीनों इशरत के साथ क्यों थे? इशरत मुम्ब्रा से अहमदाबाद कैसे पहुँची? इन सब सवालों के जवाब हमारी ख़ुफ़िया एजेंसियों के पास हैं, अब तो इनके जवाब भी जनता तक पहुँच चुके हैं, परन्तु देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करते काँग्रेस और वामपंथियों को अपनी नरेंद्र मोदी घृणा एवं मुस्लिम वोटों के लालच में कुछ दिखाई नहीं दे रहा. 

वामपंथी तो खैर भारत के लोकतंत्र से चिढ़ते ही हैं और मजबूरी में ही उन्हें यहाँ की व्यवस्था के अनुसार चलना पड़ता है. इसीलिए गाहे-बगाहे उनकी यह भावना उफन-उफन कर आती है, चाहे वह नक्सलवाद के समर्थन में हो या अफज़ल गूरू के समर्थन में हो अथवा तमिलनाडु के अलगाववादियों के पक्ष में बयानबाजी हो. भारत के दिल अर्थात दिल्ली के बीचोंबीच स्थित जवाहरलाल नेहरू विवि वामपंथ का गढ़ माना जाता है और यहाँ बीच-बीच में इस प्रकार के देशविरोधी आयोजन होते रहते हैं. जब भारत के संविधान में धारा 19(1) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया हुआ है तो बाबासाहब आंबेडकर ने उसके साथ कुछ शर्तें भी लगाई हुई हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं लोकतांत्रिक अधिकारों का अर्थ यह नहीं होता कि नागरिक अपने ही देश की सेना के खिलाफ जहरीली भाषा बोलें, या अपने ही देश के टुकड़े करने की बात करें, नारेबाजी करें, भाषण और नाटक लिखें. किसी मित्र देश का अपमान अथवा किसी शत्रु देश की तरफदारी करना भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में नहीं आता. जब आपको कोई अधिकार दिए जाते हैं तो आपसे जिम्मेदारी की भी उम्मीद की जाती है, परन्तु वामपंथियों और कांग्रेसियों में उनके “अनुवांशिक गुणों” के कारण यह भावना है ही नहीं. कुछ उदाहरण इसकी गवाही देते हैं, जैसे 2013 में ही JNU में अफज़ल गूरू को सरेआम श्रद्धांजलि दी गई थी और उसे शहीद घोषित करते हुए, उसकी फाँसी को “न्यायिक हत्या” के रूप में चित्रित किया गया... यदि उस समय केन्द्र में सत्तारूढ़ यूपीए (अर्थात काँग्रेस) ने इन वामपंथियों पर लगाम लगाई होती तो आज यह दिन ना देखना पड़ता. उसी वर्ष JNU का एक छात्र हेम मिश्रा को महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित गढ़चिरोली जिले के घने जंगलों से रंगे हाथों पकड़ा था. सूत्रों के अनुसार हेम मिश्रा नक्सलियों के कोरियर के रूप में काम कर रहा था, परन्तु महाराष्ट्र और केन्द्र की काँग्रेस सरकारों ने चुप्पी साधे रखी. 26 जनवरी 2014 को भी JNU के कतिपय “छात्रों(??) ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर आयोजित फ़ूड फेस्टिवल में जानबूझकर फिलीस्तीन, तिब्बत और कश्मीरी खाद्य पदार्थों के स्टॉल लगाए, ताकि दुनिया को सन्देश दिया जा सके कि फिलीस्तीन के साथ-साथ कश्मीर भी “अलग” और “स्वायत्त” है, भारत का हिस्सा नहीं है. ABVP ने विरोध जताया, लेकिन तत्कालीन काँग्रेस सरकार ने तब भी कुछ नहीं किया. भारत के मिसाईल मैन अब्दुल कलाम की पुण्यतिथि और मुम्बई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन की फाँसी की दिनाँक एक ही हफ्ते के भीतर आती है. नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद 2015 में JNU के छात्रों ने एक बार पुनः भारत को लज्जित करते हुए एक सच्चे और देशभक्त मुसलमान अब्दुल कलाम को श्रध्दांजलि देने की बजाय याकूब मेमन को हीरो की तरह पेश किया. इसी से पता चलता है कि JNU में वामपंथ ने कैसी मानसिक सड़ांध भर दी है, और किस तरह पिछले साठ वर्ष में काँग्रेस ने इसे पाला-पोसा है. 1996 में ही तत्कालीन कुलपति ने रिपोर्ट दे दी थी कि JNU में पाकिस्तानी एजेंट वामपंथियों के साथ मिलकर देशविरोधी गतिविधियाँ चला रहे हैं, परन्तु काँग्रेस को तो इस मामले पर ध्यान देना ही नहीं था, सो नहीं दिया गया, नतीजा सामने है. 


(भगवान राम का पुतला जलाने संबंधी JNU छात्रों का विवाद) 

फिर भी जब JNU में स्पष्ट रूप देशद्रोह से भरे हुई नारे लगते हैं कि, “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्ला इंशा अल्ला...” अथवा “भारत की बर्बादी तक, जंग रहेगी, जंग रहेगी...”, “तुम कितने अफज़ल मारोगे, घर-घर अफज़ल निकलेगा...” तब भी बेशर्म वामपंथी-सेकुलर एवं काँग्रेसी इन दूषित छात्रों के बचाव में उतर आते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि जब JNU के ये तथाकथित छात्र नारे लगाते हैं कि “अफज़ल तेरा सपना अधूरा.. मिलकर करेंगे हम पूरा...” तो वे किस सपने की बात कर रहे हैं?? संसद पर हुए एक असफल हमले की? तो क्या राहुल गाँधी और तमाम वामपंथी नेता यह चाहते हैं, कि अगली बार जब संसद पर हमला हो, तो वह सफल हो जाए?? काँग्रेस की मुस्लिम वोट बैंक राजनीति का काला इतिहास, वामपंथियों से उनकी जुगलबंदी व समझौते तथा वामपंथ की देशद्रोही सोच को देखते हुए राहुल गाँधी का तत्काल JNU पहुँचना कोई आश्चर्य पैदा नहीं करता... लेकिन देश को युवराज के इस “स्टंट” की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी यह निश्चित है.