Wednesday, November 30, 2016

Donald Trump and Nationalism Wave





ट्रंप की जीत : राष्ट्रवाद की “वैश्विक धमक”


दुनिया भर में खुद को स्वघोषित बुद्धिजीवी, तथाकथित रूप से प्रगतिशील और उदारवादी समझने वाले और वैसा कहलाने का शौक रखने वाले तमाम इंटेलेक्चुअल्स तथा मीडिया में बैठे धुरंधरों को लगातार एक के बाद एक झटके लगते जा रहे हैं, परन्तु उनकी बेशर्मी कहें या नादानी कहें वे लोग अभी भी अपनी स्वरचित आभासी मधुर दुनिया में न सिर्फ खोए हुए हैं, बल्कि उसी को पूरी दुनिया का प्रतिबिंब मानकर दूसरों को लगातार खारिज किए जा रहे हैं. वास्तव में हुआ यह है कि जिस प्रकार अफीम के नशे में व्यक्ति सारी दुनिया को पागल लेकिन स्वयं को खुदा समझता है, उसी प्रकार भारत सहित दुनिया भर में पसरा हुआ यह “बुद्धिजीवी और मीडियाई वर्ग” भी खुद को जमीन से चार इंच ऊपर समझता रहा है. इन कथित बुद्धिमानों को पता ही नहीं चल रहा है की दुनिया किस तरफ मुड़ चुकी है और ये लोग बिना स्टीयरिंग की गाडी लिए गर्त की दिशा में चले जा रहे हैं. वास्तव में इस “कथित प्रबुद्ध वर्ग” की सोच और मानसिक ढाँचे पर पहला सर्जिकल स्ट्राईक तो भारत की जनता ने 16 मई 2014 को ही कर दिया था, जब मीडियाई मुगलों और बौद्धिक कंगालों को धता बताते हुए दुनिया के सबसे बड़े, उदार और समझदार लोकतंत्र ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री चुन लिया था. पिछले ढाई वर्ष में मीडिया और बुद्धिजीवियों का यह वर्ग भारत में अब तक सदमे में है. उसकी अवस्था ऐसी हो गई है मानो कोई राह चलते कोई उन्हें तमाचा जड़ गया हो, वे समझ नहीं पा रहे हों कि आखिर यह तमाचा पड़ा तो क्यों पड़ा? नरेंद्र मोदी नामक शख्सियत से लगातार घृणा, असहमति और भेदभाव की इस भावना तथा स्वयं के श्रेष्ठ बुद्धिमान होने के अहंकार एवं झूठे स्वप्नदोष के कारण उनके दिलो-दिमाग में यह बात गहरे तक पैठ गई है कि हम तो कभी गलत हो ही नहीं सकते... तो आखिर नरेंद्र मोदी जीते तो जीते कैसे? नहीं... हम नहीं मानते... ना जी, हम दिल से उन्हें अपना प्रधानमंत्री नहीं मानते. यही सब कुछ अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की जीत के बाद हो रहा है.


असल में एक शब्द है “राष्ट्रवाद” अर्थात ऐसी विचारधारा जिसके लिए “राष्ट्र प्रथम” है, बाकी सब कुछ गौण है, पीछे है. भारत के अंग्रेजीदां लोग इसी को “नेशन फर्स्ट” कहते जरूर हैं, लेकिन हिकारत भरी जुबान और खुरदुरे दिल से. बुद्धिजीवियों और मीडिया में बैठे तथाकथित प्रगतिशीलों एवं उदारवादियों के लिए “राष्ट्रवाद” नाम का शब्द या तो मखौल उड़ाने के लिए होता है, अथवा घृणास्पद होता है. क्योंकि ऐसे लोगों की पश्चिमी और कान्वेंटी समझ उन्हें अपने वैचारिक कुँए से बाहर आने ही नहीं देती. ये लोग अपने ही समविचारी गिरोह के लोगों को स्टूडियो और अखबारों के प्रमुख कॉलमों में स्थान देकर एक-दुसरे की बात पर ताली बजाया करते हैं. ऐसा ही इन्होने नरेंद्र मोदी के समय 2002 से लेकर 2014 तक लगातार किया और इसी वर्ग के अंतर्राष्ट्रीय गिरोह ने डोनाल्ड ट्रंप को लेकर अमेरिका में किया... बीच में इसी “बौद्धिक”(??) वर्ग ने ब्रिटेन के यूरोप से अलग होने के लिए की जाने वाली वोटिंग (अर्थात ब्रेक्जिट) के समय भी अपनी “कालबाह्य सोच” को लगातार विश्व पर थोपे रखा. ब्रिटेन और यूरोप पर मंडराते इस्लामी खतरे को यह मीडियाई वर्ग कतई नहीं समझ सका, क्योंकि इनकी सोच में “राष्ट्रवाद” कहीं आता ही नहीं. परन्तु ब्रिटेन की जनता ने इस बुद्धिजीवी एवं प्रगतिशील गिरोह के मुंह पर लगातार दूसरा तमाचा जड़ दिया और अंततः ब्रिटेन की जनता ने बहुमत से इस्लामी काली छाया और शरणार्थियों के आर्थिक बोझ तले चरमराने की शुरुआत वाले यूरोप से अलग होने का फैसला कर लिया. यह “वैश्विक राष्ट्रवाद” की लहर की दूसरी बड़ी जीत थी और कथित उदारवादियों एवं मीडियाई मुगलों की मुसीबत का दूसरा चरण. हाल ही में अमेरिका में भी राष्ट्रपति के चुनाव संपन्न हुए. लगातार दो बार झटके खा चुके और जनता के मतदान में अपना हाथ-मुँह जला चुके मीडियाई/बुद्धिजीवी वर्ग को फिर से अपनी नकली समझदारी दिखाने का सुनहरा मौका दिखाई दिया. इस वर्ग ने अमेरिका की जमीनी स्थिति, वहां के मतदाताओं के मनोमस्तिष्क तथा वास्तविक समस्याओं को पूरी तरह नज़रंदाज़ करते हुए ओबामा की उत्तराधिकारी के रूप में हिलेरी क्लिंटन को परिणामों से पहले ही “अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति” तक घोषित कर दिया था. इन्हें ऐसा लगता था मानो चुनाव परिणाम केवल औपचारिकता भर हैं. भारत से भी बरखा दत्त समेत कई “पत्तलकार” अमेरिका चुनाव का कवरेज करने वहाँ गए थे. वास्तव में ये लोग निष्पक्ष पत्रकार की हैसियत से “कवरेज” करने नहीं गए थे, अपितु विश्व की तमाम दूसरी मीडियाई शख्सियतों के साथ मिलकर हिलेरी के पक्ष में चुनाव प्रचार करने गए थे. अमेरिका की एक प्रसिद्ध पत्रिका ने तो हिलेरी क्लिंटन के आमुख कवर वाली दस लाख पत्रिकाएँ भी छपवाकर रख ली थीं, ताकि परिणामों के तत्काल बाद उसे मार्केट में उतारा जा सके. लेकिन हा दुर्भाग्य!!! हाय रे फूटी किस्मत!!! दुनिया भर के बुद्धिजीवी और जमाने भर का मीडिया जिस व्यक्ति अर्थात डोनाल्ड ट्रंप को पागल, सनकी, हिटलर, स्त्री-विरोधी, मुस्लिमों का संहारक इत्यादि चित्रित करता रहा उसने बड़े आराम से चुनाव जीतकर इन सभी बुद्धिजीवियों के मुँह पर दो वर्ष के भीतर “तीसरा राष्ट्रवादी तमाचा” जड़ दिया. 


पिछले तीन वर्ष के दौरान भारत में जिस तरह से नरेंद्र मोदी के उभार और सीरिया-ईराक में आतंकी मुस्लिम संगठन आईसिस के घृणित कारनामों की वजह से समूचे विश्व में “राष्ट्रवाद” की लहर पैदा हुई है और लगातार बढ़ती जा रही है, उसे समझने में तथाकथित प्रगतिशील तबका पूरी तरह विफल रहा है. उन्हें समझ ही नहीं आ रहा है कि दुनिया अब इनके पक्षपाती रवैये तथा दोमुंही बातों एवं कथनों से न सिर्फ ऊब चुकी है, बल्कि इन्हें लगभग खारिज भी कर चुकी है. विश्व के अलग-अलग भागों (भारत, ब्रिटेन और अमेरिका) में लगातार तीन-तीन बड़ी मात खाने के बावजूद “राष्ट्रवाद” की अवधारणा को समझने ये लोग नाकाम रहे हैं. यह विषय इन्हें आज भी मजाक उड़ाने अथवा खुद की सड़ी हुई वैचारिक श्रेष्ठता को दर्शाने का अवसर प्रतीत होता है, जबकि विश्व भर में राष्ट्रवाद की लहर ही नहीं, तूफ़ान चल रहा है और इधर यह वर्ग शतुरमुर्ग की तरह रेत में अपना सिर गड़ाए इस नए वैचारिक आन्दोलन की तरफ अपना पिछवाड़ा किए हुए है. डोनाल्ड ट्रंप की जीत ने इस वर्ग की चूलें हिला दी हैं. जिस ट्रंप को ये लोग लगातार नस्लवादी, बददिमाग और हिटलर वगैरह कहते रहे, वह आज अमेरिका का राष्ट्रपति है और अगले चार वर्ष (या शायद आठ वर्ष) उन्हीं के साथ बिताना है, चाहे अच्छा लगे या बुरा, यही स्थिति भारत में नरेंद्र मोदी की भी है. संभवतः 2024 तक तो कथित बुद्धिजीवियों और नकली प्रगतिशीलों को नरेंद्र मोदी की सत्ता के साए तले जीना होगा. इन्हें यह चिंता खाए जा रही है कि आखिर हमारे अनुमान बारम्बार गलत क्यों सिद्ध हो रहे हैं? दुनिया राष्ट्रवाद की तरफ क्यों बढ़ रही है? हमारी बातें और “भीषण कुप्रचार” भी जनता को प्रभावित क्यों नहीं कर पा रहा है? यह सोच-सोचकर इन बुद्धिजीवियों के दिमाग का दही बनता जा रहा है. भारत में नरेंद्र मोदी ने नारा दिया था, “अबकी बार मोदी सरकार”. इसी की नकल करते हुए भारतीय समुदाय को लुभाने के लिए ब्रिटेन के चुनावों में भी डेविड कैमरन ने नारा दिया था “अबकी बार, कैमरन सरकार” और वे भी जीते. नरेंद्र मोदी की खिल्ली उड़ाने वाले गिरोह ने इस नारे की भी खिल्ली उडाई, लेकिन अमेरिका के हालिया चुनावों में जब डोनाल्ड ट्रंप के बेटे हिन्दू मंदिरों में आशीर्वाद ग्रहण करने गए और एक छोटी ही सही, लेकिन काफी प्रभावी शक्ति अर्थात भारतीय समुदाय में नरेंद्र मोदी की चमकदार छवि के मद्देनज़र जब डोनाल्ड ट्रंप ने भी “अबकी बार, ट्रंप सरकार” का नारा दिया, उस समय भी इस वैचारिक कंगाल गिरोह ने उनकी भी जमकर खिल्ली उड़ाई, लेकिन जब ट्रंप भी जीत गए तो इनकी बोलती बंद हो गई. 

इस समय अमेरिका की जो वित्तीय हालत है उसे देखते हुए ट्रंप की यह जीत बिलकुल उसके मनमाफिक है, यही कुछ नरेंद्र मोदी के समय भी हुआ था, जब भारत की जनता मनमोहन सिंह और सोनिया गाँधी की सरकार के भीषण भ्रष्टाचार एवं कुशासन से त्रस्त होकर एक नया ईमानदार एवं स्पष्ट वक्ता नेता खोज रही थी. उसी प्रकार आठ वर्ष के ओबामा प्रशासन के दौरान अमेरिका में बढ़ती गरीबी, बेरोजगारी, चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था इत्यादि ने अमेरिकी जनता को निराश कर दिया था. इन सारी समस्याओं के अतिरिक्त एक बात और थी जिससे आम अमेरिकी नागरिक चिढ़ा हुआ था, और वह थी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की घटती साख. जिसे हम भारत में “दबंगई” कहते हैं, वही मनोभाव अमेरिकी जनता में वैश्विक स्तर पर भी है की “हम अमेरिकी सर्वश्रेष्ठ हैं, हमसे कोई मुकाबला नहीं कर सकता, हम से कोई लड़ नहीं सकता... इत्यादि”. इस “साख” को ओबामा के शासनकाल में खासी चोट पहुँची थी. चीन ने जिस तरह अमेरिका को दो-तीन बार सम्पूर्ण विश्व के सामने शर्मसार किया और उसकी औकात दिखाई, उससे अमेरिकी “स्वाभिमान” को ठेस लगी, सीरिया में जिस तरह रूस ने अमेरिका की बातों पर कान नहीं दिया, उसने भी अमरीकियों को सोचने पर मजबूर किया, यही बात ट्रंप की जीत में मददगार साबित हुई, क्योंकि ट्रम्प का नारा था “लेट्स बिल्ड न्यू अमेरिका” (अर्थात आओ एक नया अमेरिका का निर्माण करें). जिस तरह से मैक्सिको से शरणार्थियों का बोझ अमेरिका पर बढ़ता जा रहा था और मैक्सिको के लोगों द्वारा अमेरिकी समाज के अन्दर अपराधों को बढ़ावा दिया जा रहा था, उसने सामान्य अमेरिकी को क्रोधित और निराश कर रखा था. ब्रिटेन में “ब्रेग्जिट” का नतीजों ने अमेरिकी जनमानस पर गहरा प्रभाव डाला. अमेरिकी नागरिकों को यह लगने लगा कि जिस प्रकार यूरोप में इस्लामिक शरणार्थी उनके संसाधनों पर बोझ बनते जा रहे हैं, नौकरियाँ हथिया रहे हैं, अपराध बढ़ा रहे हैं, वैसा ही हमारे यहाँ मैक्सिको के लाखों लोग कर रहे हैं, इन्हें यहाँ से हटाना अथवा दबाना बेहद जरूरी है, वर्ना अमेरिका का भविष्य खतरे में है. इसी बात को डोनाल्ड ट्रंप ने समय पर लपक लिया. जमीनी सच्चाई से दूर जिस कथित बुद्धिजीवी वर्ग ने डोनाल्ड ट्रंप के मुद्दों को “असंवेदनशीलता” और “हिटलरशाही” अथवा “पागलपन” कहते हुए अपने दिन गुज़ारे उन्हें पता ही नहीं था कि अमेरिकी जनता क्या सोच रही है. अमेरिकी समाज अन्दर ही अन्दर कैसा खदबदा रहा है. जिस मार्जिन से डोनाल्ड ट्रंप जीते हैं, वह इस बात को साबित करता है कि ट्रंप अमेरिकी लोगों की नब्ज को अच्छी तरह से पकड़ते हैं, जानते-समझते हैं. जहां तक डेमोक्रेट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन की राजनीति और प्रचार अभियान का सवाल है, यह आराम से कहा जा सकता है कि हिलेरी कभी भी “जमीनी अमेरिका” के साथ नहीं थीं, और इस बात को अमेरिकी जनता ने अच्छी तरह समझ लिया था. 


अमेरिकी परिणामों ने ज्यादातर चुनाव सर्वेक्षणों को गलत साबित कर दिया. 19 में से केवल दो अंतिम सर्वेक्षणों में डोनाल्ड ट्रंप को हिलेरी क्लिंटन से आगे बताया गया था. चुनाव से दो दिनों पहले सभी बड़े चुनाव सर्वेक्षणों पर नजर रखने वाली “रियल क्लियर पॉलिटिक्स” ने हिलेरी की औसत बढ़त को घटाया जरुर था लेकिन कहा था कि अभी भी ट्रंप पर उनकी 1.6 प्रतिशत की बढ़त है. न्यूयॉर्क टाइम्स ने नेट सिल्वर के पोल्स ओनली मॉडल से बताया कि हिलेरी के जीतने की संभावना 67.8 फीसद है. हफिंगटन पोस्ट तो ट्रंप से घृणा करने के मामले इतना आगे निकल गया की उसने हिलेरी की जीत की संभावना 97.9 फीसद बता डाली. भारत से भी बरखा दत्त ट्वीट पर ट्वीट मारे जा रहीं थी की हम एक इतिहास बनता हुआ देखने आए हैं, अमेरिका को पहली महिला राष्ट्रपति मिलने जा रही है आदि-आदि. ज़ाहिर है कि ये लोग अमेरिकी जनता से पूरी तरह कटे हुए थे. हिलेरी की पराजय एवं ट्रंप की विजय का अर्थ है कि अमेरिकी जनमानस में “व्यापक परिवर्तन” आ चुका है. स्वयं को विवेकशील मानने वाले ज्यादातर लोग मानते थे कि अमेरिका के लोग इतने समझदार हैं कि वे एक “अतिवादी” और नस्ली सोच रखने वाले डोनाल्ड ट्रंप को देश का सर्वोच्च पद और सेना का सर्वोच्च कमान नहीं दे सकते, ऐसा ही कुछ इन लोगों ने मई 2014 में भी भारत के बारे में कहा था. इन सब “कथित बुद्धिजीवियों” की सोच और अनुमान गलत साबित हुए हैं. 

वास्तव में देखा जाए तो हिलेरी क्लिंटन की पराजय एवं ट्रंप की विजय कोई सामान्य घटना नहीं है. कुछ लोग इसे इस दृष्टि से देखेंगे कि 1789 से शुरू हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के 227 वर्ष के इतिहास में पहली बार किसी पार्टी की प्रत्याशी बनी महिला सर्वोच्च पद पर पहुंचने से चूक गई, जबकि अमेरिका ने बराक ओबामा के रुप में एक “अश्वेत” को पहली बार राष्ट्रपति बनाकर इतिहास रचा था. अब उसके सामने एक महिला को निर्वाचित कर इतिहास बनाने का अवसर था. लेकिन अमेरिकी मतदाताओं का बहुमत दूसरी दिशा में ही सोच रहा था. इसीलिए जैसे-जैसे सर्वेक्षण एजेंसियां हिलेरी को आगे बताने लगीं अमेरिकी मतदाताओं का बड़ा वर्ग आक्रामक हो गया. जिस तरह से आरंभ में ही लोगों ने मतदान का रिकॉर्ड तोड़ा उससे साफ था कि अमेरिका नया करवट लेने वाला है, जो कईयों को हैरान कर देगा. मैं जानता हूँ कि पाठकों को यह सब भारत के चुनावों का “री-प्ले” जैसा लग रहा होगा, यहाँ भी यही खेल खेला गया था, लेकिन जैसे-जैसे कथित चुनाव “विश्लेषक”(??) नरेंद्र मोदी को बहुमत से पिछड़ता हुआ दिखाते थे, मोदी के खिलाफ आग उगलते थे, मोदी को बदनाम करने की कोशिश करते थे... भारत का जनमानस उतनी ही तेजी से मोदी के साथ आता जा रहा था. अमेरिका में भी ट्रंप को लेकर जनमानस के बीच भय पैदा करने की कोशिश की गई. 

दोनों उम्मीदवारों के बीच हुई तीनों बहस में “विचारकों”(??) द्वारा यह माना गया कि ट्रंप पराजित हो गए हैं. लेकिन यह निष्कर्ष सही नहीं था. भले ही ट्रंप की बातों से थोड़ी अशालीनता की बू आती थी. मसलन, उन्होंने हिलेरी पर निजी हमले तक किए. उनके विदेश मंत्री रहते समय निजी ईमेल का प्रश्न उठाकर कह दिया कि अगर वे राष्ट्रपति बने तो उनकी जगह जेल में होगी. अंततः हिलेरी को रक्षात्मक होना ही पड़ा. ऐसा नहीं था कि हिलेरी खेमे ने ट्रंप के खिलाफ महिला मुद्दों को प्रमुखता देने की कोशिश नहीं की. 40 महिलाएँ खोजकर लाई गईं जिन्होंने ट्रंप के चरित्र पर प्रश्न उठा दिया. इसे उनके खिलाफ मुद्दा बनाया गया. ट्रम्प के महिलाओं के खिलाफ सेक्सी कमेंट्स, महिलाओं से उनके रिश्ते और उनका बर्ताव मुद्दा बन गया था. महिलाओं को लुभाने के लिए हिलेरी का खास अभियान… “वुमन टू वुमन फोन बैंक” जैसे अभियान चलाए गए. अमेरिका में कुल 21 करोड़ 89 लाख 59 हजार मतदाता हैं. इसमें 14 करोड़ 63 लाख 11 हजार लोग रजिस्टर्ड हैं. रजिस्टर्ड मतदाताओं में 69.1 प्रतिशत पुरुष और 72.8 प्रतिशत महिलाएं हैं, यानी महिलाओं की संख्या ज्यादा है. वो किसी का समर्थन कर दें उसका जीतना निश्चित माना जाता है. स्वाभाविक है कि हिलेरी महिलाओं के खिलाफ ट्रंप की टिप्पणियों को अपने पक्ष में भुनाने में सफल नहीं रहीं. किंतु डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष में दो बातें प्रमुखता से छा गईं - आतंकवाद के खिलाफ खरी-खरी और स्पष्ट बात करना तथा अमेरिकियों के अंदर “महाशक्ति राष्ट्रवाद” का भाव पैदा करना. उन्होंने अमेरिकियों के दिल में नए सिरे से अमेरिकी राष्ट्रवाद का एक श्रेष्ठता बोध पैदा किया, जिसमें अमेरिका को फिर से दुनिया का ऐसा महान राष्ट्र बनाने का वायदा था जो वास्तविक महाशक्ति होगा, तथा दुनिया के देश जिसकी इज्जत करेंगे और टकराने अथवा विरोध करने की हिम्मत नहीं करेंगे. महाशक्ति की गिरती महिमा के बीच इस “राष्ट्रवादी भावना” ने अमेरिकियों के एक बड़े वर्ग को प्रभावित किया. इस समय जेहादी आतंकवाद ने जिस तरह दुनिया भर में भय पैदा किया हुआ है उससे अमेरिका भी अछूता नहीं है. कड़ी सुरक्षा के बावजूद वहां भी आए दिन कुछ न कुछ छिटपुट घटनाएँ हो ही रही हैं. 


इराक से लेकर अफगानिस्तान में अमेरिकियों को आतंकवाद की बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है. इस स्थिति में ट्रंप ने अभी तक के सभी अमेरिकी नेताओं से भिन्न अपना विशेष मत व्यक्त किया. जब वे रिपब्लिकन उम्मीदवार के रुप में जनता के सामने आए, और मुसलमानों के खिलाफ बोलना आरंभ किया तो शुरुआत में लोगों ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया. आतंकवाद की चर्चा करते हुए अमेरिका में मुसलमानों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने की बात की, तो लगा कि कोई फासिस्ट ताकत अमेरिका में उभार ले रही है, जिसे उसकी पार्टी ही अंदरूनी रूप से पराजित कर देगी. तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग वाले लोग ऐसा सोचते रहे, और उधर वो लगातार ऐसे बयान देकर ग्रामीण और रूढ़िवादी अमेरिकी मन में समर्थन पाते रहे. ट्रंप का रिपब्लिकन उम्मीदवार बन जाना ही “बदले हुए अमेरिका” का प्रतीक था. वही बदला हुआ अमेरिका परिणाम के रुप में भी दिखा. यह सामान्य बात नहीं है कि, ट्रंप के आक्रामक राष्ट्रवाद और स्थानीयों को नौकरी में प्राथमिकता के बावजूद अमेरिकी भारतीयों के बड़े समूह ने ट्रंप के पक्ष में मतदान किया है. हालांकि चुनाव परिणाम के पीछे कुछ विश्लेषक आर्थिक मुद्दों को भी महत्वपूर्ण मान रहे हैं. आर्थिक मुद्दे अमेरिकी चुनाव में हमेशा भूमिका निभाते हैं. यहां भी ट्रंप ने अमेरिका के लिए एक नए “आर्थिक राष्ट्रवाद” की उग्र वकालत की. मसलन, उन्होंने महाशक्ति अमेरिका को कमजोर करने के लिए ओबामा सरकार को जिम्मेवार ठहराया. उन्होंने कहा कि जब भारत जैसा देश 8 प्रतिशत की विकास दर हासिल कर सकता है, तो फिर अमेरिका क्यों नहीं कर सकता. उन्होंने आईबीएम जैसी कंपनियों को धमकी भी दी, कि उसने अपना काम भारत में ज्यादा स्थानांतरित कर दिया है, इसलिए अगर वो राष्ट्रपति बने तो उस पर भारी कर जुर्माना लगाएंगे. यह बात वहां के बेरोजगार या रोजगार तलाशते युवाओं के लिए आकर्षक साबित हुई. अमेरिका इस समय दो हिस्सों में बंटा हुआ है. एक हिस्सा पढ़े-लिखे, उदारवादी और सेक्युलर लोगों का है, तो दूसरा हिस्सा रूढ़िवादी, धार्मिक, श्रम वर्ग और शहर से दूर ग्रामीण क्षेत्रों में कम पढ़े-लिखे लोगों का है. दूसरे हिस्से की तादाद वहां ज्यादा है. रिपब्लिकन पार्टी ने इन्हीं के बीच अपने चुनाव प्रचार के जरिये अमेरिका को दोबारा से एक ‘ग्रेट नेशन’ बनाने का आंदोलन चलाया था और कहा कि दुनिया में ‘अमेरिका फर्स्ट’ होगा. इस आंदोलन का तमाम रूढ़िवादियों, धार्मिकों, श्रम वर्गों और कम पढ़े-लिखे अमेरिकियों ने समर्थन किया था, जिसे तथाकथित उच्च वर्गीय “क्लब छाप” बुद्धिजीवी समझ ही नहीं पाए. ट्रंप का यह चुनाव प्रचार कामयाब रहा और वे जीत की तरफ बढ़े. अमेरिकी लोगों को यह यकीन हो चला था कि वहां नौकरियाँ आएँगी. “बाहरी” (यानी मैक्सिकन) लोगों को निकाला जायेगा, विकास और वैश्विक व्यापार का नया आयाम स्थापित होगा, सड़कें और पुल बनेंगे, स्वास्थ्य सेवा में सुधार होगा, “ओबामा केयर” जैसी खर्चीली योजना को खारिज करके नई स्वास्थ्य बीमा योजना आएगी. ‘ग्रेट नेशन’ बनाने के लिए ये सारे वादे ट्रंप ने किये हैं. अमेरिका को ‘ग्रेट नेशन’ बनाने का ट्रंप का यही सपना अमेरिका के लिए बहुत मायने रखता है, क्योंकि ट्रंप के वायदे बड़े हैं और अब उन्हें पूरा करके दिखाना होगा. यही बात नरेंद्र मोदी पर लागू होती है कि जनता की उम्मीदें बहुत बड़ी हैं और समय कम है. अब तो यह समय ही बतायेगा, कि ये दोनों इसमें कितना सफल होते हैं. लेकिन “राष्ट्रवाद” और “नेशन फर्स्ट” की मनोभावना को दोनों ने पूरे विश्व में एक विशेष स्थान दिलवा दिया है. 

थोड़ी देर के लिए कहा जा सकता है कि ट्रंप की विजय ने हमें एक ऐसे अमेरिका का अहसास कराया है, जिससे किंचित भय एवं आशंका पैदा होती है, परन्तु ट्रंप की नीतियों के बारे में कोई भविष्यवाणी करना अभी जल्दबाजी होगी. हालांकि उन्होंने अपने पहले भाषण में कहा है कि मैं सभी अमेरिकियों का राष्ट्रपति होउंगा और “सबका साथ सबका विकास” करके हम अपने महान देश को और महान बनाएंगे. किंतु इसके लिए अभी हमें थोड़ा इंतजार करना होगा. ट्रंप ने सबसे पहले यूरोप के साथ अच्छे संबंध रखने की बात की है. उनका मानना है कि रक्षा मामलों में उसे यूरोप का काफी सहयोग जरूरी है, यह काम अमेरिका अकेले नहीं कर सकता. दोनों में काफी मतभेदों के साथ यह एक बड़ा बदलाव है अमेरिका की विदेश नीति में. दूसरी तरफ मध्य-पूर्व (मिडिल इस्ट) के लिए जो अमेरिकी नीति है, उससे मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ सकता है, क्योंकि उस नीति के तहत सेना के जरिये ही मसलों को हल करने के बारे में अमेरिका सोच रहा है. मिडिल इस्ट, सऊदी अरब और गल्फ के देश चाहते हैं कि उनके ऊपर से अमेरिकी निर्भरता कम हो, इसे लेकर भी अमेरिका को पुनर्विचार की जरूरत होगी. मेरे ख्याल में अमेरिका का यह सत्ता परिवर्तन अपनी नीतियों में थोड़ी सख्ती रखेगा, जैसा कि जॉर्ज बुश ने किया था. स्वाभाविक है कि दुनिया के लिए अमेरिकी सत्ता का परिवर्तन कुछ नया लेकर जरूर आयेगा, लेकिन उसका स्वरूप क्या होगा, यह देखनेवाली बात होगी. 



जहां तक ट्रंप की जीत का भारत के लिए मायने का सवाल है, तो अमेरिका कभी भी भारत को अनदेखा नहीं कर सकता, क्योंकि भारत एक बहुत बड़ा “मध्यमवर्गीय मार्केट” है. भारत में काफी तादाद में अंगरेजी बोलनेवाले, कंप्यूटर का इस्तेमाल करनेवाले लोग हैं और तकनीकी रूप से बहुत सक्षम हैं. भारत में सस्ता श्रम उपलब्ध है, इन सबका फायदा अमेरिका उठाता रहा है और आगे भी उठायेगा क्योंकि जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि अमेरिका एक विशुद्ध व्यापारी देश है, वह भारत को नाराज करने का खतरा मोल नहीं ले सकता. भारत और अमेरिका दोनों में लोकतांत्रिक व्यवस्था है. दोनों के बीच फिलहाल सौ बिलियन डॉलर का व्यापार है, जो आगामी वर्षों में पांच सौ बिलियन डॉलर होने की संभावना है. अमेरिका के अंदर जितने भी भारतीय हैं, वे सभी बहुत अच्छे काम कर रहे हैं, नौकरियों का सृजन कर रहे हैं और अच्छे-अच्छे पदों पर हैं. अमेरिका के आइटी सेक्टर में भारतीयों का बहुत बड़ा योगदान है. इन सबके चलते अमेरिका कभी भी भारत के साथ संबंधों को खराब नहीं होने देना चाहेगा. हालांकि, ट्रंप यह कह रहे हैं कि आइटी सेक्टर में अमेरिकी लोगों के लिए नौकरियों का सृजन करेंगे, लेकिन यह इतना आसान नहीं है, क्योंकि अमेरिका में श्रम महंगा है. इस क्षेत्र में भारत का मुकाबला करना अमेरिका के लिए फिलहाल संभव नहीं लगता. मल्टीनेशनल कॉरपोरेशन वहीं काम करते हैं, जहां फायदा होता है. अमेरिका में किसी चीज को बनाने में अगर दस डॉलर खर्च आता है, तो उसी चीज को दूसरे देशों में छह-आठ डॉलर में बनाया जा सकता है. डोनाल्ड ट्रंप का “आर्थिक राष्ट्रवाद” इन छोटी-मोटी कठिनाईयों के साथ भी भारत के साथ अच्छा संबंध बनाए रखेगा. ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान आउटसोर्सिंग और बाहरी लोगों की नौकरी के मुद्दे पर काफी जोर देते हुए भारत विरोधी बयान भी दिया था. आईटी सेक्टर की अमरीकी नौकरियों का बड़ा हिस्सा पहले ही भारतीयों के कब्जे में है. भारत का ज्यादातर आईटी निर्यात अमरीका को ही होता है. ऐसे में यदि ट्रंप का बयान सिर्फ चुनावी जुमला ना होकर, किसी नीतिगत कदम में तब्दील हुआ तो इन सेक्टरों की नौकरियों पर असर देखने को मिल सकता है. इन कदमों को उठाने के लिए उन पर स्थानीय कर्मचारी यूनियनों का भी दबाव रहेगा. इन आशंकाओं के चलते एक्सपर्ट्स ट्रंप की तुलना में हिलेरी को भारत के लिए बेहतर मान रहे थे. परन्तु मेरा अनुमान यह है कि डोनाल्ड ट्रंप स्वयं एक सफल व्यापारी रहे हैं, व्यापार उनके खून में है. इसलिए भारत के आईटी पेशेवरों को नाराज करके अथवा अमेरिका में महंगे श्रम को प्राथमिकता देकर वे अमेरिका का नुक्सान नहीं करना चाहेंगे. हाँ, अलबत्ता भारत के फार्मा सेक्टर पर ट्रंप की नीतियों का क्या असर पड़ेगा यह देखने वाली बात होगी, क्योंकि डेमोक्रेटिक ओबामा की “बदनाम हेल्थकेयर पॉलिसी” के चलते सन फार्मा, ल्यूपिन समेत तमाम भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए अमरीकी बाजार में अच्छी संभावनाएं बनी थीं. ट्रंप पहले ही इस पॉलिसी की समीक्षा की बात कह चुके हैं. ऐसे में USFDA से दवाओं को मंजूरी मिलने में समस्या आ सकती है, साथ ही विदेशी फार्मा कंपनियों पर ट्रंप सख्ती बरतते हैं तो राजस्व और फार्मा नौकरियों के मामले में भारत पर इसका बड़ा असर देखने को मिलेगा. हिलेरी क्लिंटन की “इन्वेस्टर-फ्रेंडली इमेज” के चलते दुनियाभर में उनकी जीत के लिए दुआएं की जा रही थीं. लेकिन तमाम अटकलों के बावजूद ट्रंप को अचानक मिली जीत का दुनियाभर के बाजारों पर नकारात्मक असर पड़ा है. वैश्विक अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ इसे दूरगामी समय के लिए इसे ब्रेक्जिट से भी ज्यादा खतरनाक मान रहे हैं. ट्रंप की जीत के संकेत मिलते ही डॉलर में येन और यूरो के मुकाबले गिरावट शुरू हो गई थी, परन्तु यह तात्कालिक भी हो सकता है. अभी हमें डोनाल्ड ट्रंप के शपथ ग्रहण, उनके मंत्रिमंडल और नीतियों की घोषणा का इंतज़ार करना चाहिए. 

अमेरिका के लिए भारत इसलिए भी बहुत मायने रखता है, क्योंकि चीन को लेकर अमेरिका के काफी मतभेद हैं. पाकिस्तान की नीतियां जैसी हैं, उसके चलते भी अमेरिका को भारत की जरूरत पड़ेगी, क्योंकि पाकिस्तान इस समय ग्वादर बंदरगाह और व्यापारिक कॉरीडोर के कारण पूरी तरह से चीन के साथ है. मैं समझता हूं कि आनेवाले समय में पाकिस्तान के ऊपर और भी दबाव बढ़ जायेगा कि वह अमेरिका या चीन में से किसी एक को अपना “मालिक” चुने. चूंकि अमेरिका ने ही पाकिस्तान को भीख देकर मजबूत बनाने की कोशिश की है, और अमेरिकी बैसाखियों पर ही पाकिस्तान अब तक जिंदा रहा है. साथ ही पाकिस्तान के सारे हथियार अमेरिका ने ही पाकिस्तान को दिए हुए हैं. अमेरिका की जो लड़ाई सीरिया और ईराक में कट्टरपंथी इस्लाम के साथ है, वह अपनी जगह पर है, लेकिन फिर भी अमेरिका चाहेगा कि दक्षिण एशिया में भारत के सिर पर एक लटकती हुई तलवार के रूप में पाकिस्तान का उपयोग बीच-बीच में किया जाता रहे. अतः अमेरिका का राष्ट्रपति कोई भी बने, भारत में इस बात को लेकर ना तो दुखी होने की जरूरत है कि ट्रंप आ गये, तो अब क्या होगा... ना ही इतना खुश होने की जरूरत थी कि हिलेरी आ जातीं तो भारत स्वर्ग बन जाता. अमेरिका एक पूंजीवादी देश है और वह अपनी सैन्य ताकत और उससे उत्पन्न होने वाले “रोज़गार” पर चलता है. दुनिया वाले कुछ भी सोचते रहें, अमरीकी जनता के मन में यह अवधारणा बहुत गहरे तक पैठ किए हुए है, कि पूरी दुनिया में अमेरिका ही अव्वल देश है और दुनिया का कोई भी देश अमेरिका का मुकाबला नहीं कर सकता. अपने फायदे के लिए अमेरिका कुछ भी करेगा, और उसकी यह नीति ट्रम्प के कारण नहीं है, बल्कि चार सौ वर्ष पुरानी है. 

डोनाल्ड ट्रंप की जीत से दुनियाभर के शेयर बाजारों में जबर्दस्त उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. जो कि एक स्वाभाविक घटनाक्रम है. अब आगे यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि ओबामा और बुश की तुलना में ट्रंप भारत के लिए कितने फायदेमंद साबित होंगे. उनके चुनावी भाषणों और बयानों के विश्लेषण के आधार पर विशेषज्ञ इंडो-यूएस ट्रेड के लिए बड़े झटके की आशंका जता रहे हैं. यदि आईटी क्षेत्र को छोड़ दें तो खासतौर से भारतीय फार्मा, और आईटीएस इंडस्ट्री पर ट्रंप की नीतियों का व्यापक असर हो सकता है. उल्लेखनीय बात यह है कि द्विपक्षीय व्यापार में आयात-निर्यात के मामले में फिलहाल भारत फायदे में है, जिसे ट्रम्प बदलना चाहेंगे. भारत-अमरीका के बीच करीब 4 लाख 29 हजार करोड़ से ज्यादा का द्विपक्षीय व्यापार है। इसमें से भारत करीब 2 लाख 83 हजार करोड़ रुपए का निर्यात, और एक लाख 46 हजार करोड़ रुपए का ही आयात करता है. ज़ाहिर है यह द्विपक्षीय व्यापार हमेशा से भारत के लिए फायदेमंद रहा है, लेकिन रिपब्लिकन नेताओं की “राष्ट्रवादी नीतियों” के अनुसार आयात घटाने पर उनका हमेशा से विशेष फोकस रहा है. तो कुछेक मामलों में ट्रंप की जीत द्विपक्षीय व्यापार में भारत के लिए हानिकारक भी हो सकती है. भारत अमरीका से सोना, एयरक्राफ्ट्स, मशीनरी, इलेक्ट्रिकल, ऑप्टिक्स, मेडिकल इंस्ट्रुमेंट्स आदि आयात करता है. जबकि अमरीका भारत से टेक्सटाइल, ऑर्गेनिक केमिकल, मिनरल फ्यूल, फार्मा प्रोडक्ट्स, मसाले, ट्री नट्स, वेज ऑयल और सॉफ्टवेयर खरीदता है. 



हालांकि रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने डोनाल्ड ट्रंप के बारे में बहुत सी अच्छी और सकारात्मक बातें कही हैं, लेकिन पुतिन जिस रूस का प्रतिनिधित्व करते हैं, उस रूस से “बुनियादी टकराव” अगर किसी के साथ है, तो वह अमेरिका ही है. परस्पर सहृदयता दिखाते हुए ट्रंप ने भी रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की एक मजबूत नेता के रूप में कई बार तारीफ़ की है और ख़ुफ़िया सूत्रों से मिली उन चेतावनियों को उन्होंने नजरंदाज कर दिया, जिसके अनुसार अमेरिका और पश्चिमी देशों में बड़े पैमाने पर होनेवाली साइबर-हैकिंग के पीछे रूस और चीन ही हैं. रूस ने जब यूक्रेन पर हमला किया था, उस समय भी ट्रंप ने खुद को रूस की आलोचना करने से बचा लिया था. अतः इस मामले में भी अब नया मोड़ सामने आ सकता है. इस समय सीरिया और पश्चिम एशिया तथा यूरोप में जैसा संघर्ष चल रहा है उसे देखते हुए यह माना जा सकता है कि रूस और अमेरिका के बीच जो मधुर सम्बन्ध बनते दिखाई दे रहे हैं वे स्थायी नहीं रहेंगे. दूसरी तरफ चीन भी है, जिससे अमेरिकी हितों का सीधा टकराव है. अब डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बन गए हैं तो इसका अर्थ यह है कि डोनाल्ड ट्रंप के “आर्थिक राष्ट्रवाद” की नीति के कारण चीन से उनका टकराव जारी रहेगा, बल्कि तेज़ भी हो सकता है. चुनाव प्रचार के दौरान पश्चिमी देशों को उन्होंने आगाह किया था कि अमेरिका नाटो गठबंधन को मदद देना बंद कर सकता है. अपने “राष्ट्रवाद” को परिभाषित करते हुए उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा था कि जब बात अमेरिकी सैन्य और आर्थिक हितों से जुड़ी होगी, तो वे अमेरिका का हित सबसे पहले देखेंगे, नाटो या ब्रिटेन का बाद में. इसीलिए ट्रंप के सत्ता में आने से ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे के सामने भी चुनौती पैदा हो गई है, क्योंकि पूर्व में वे सीधे तौर पर उनकी आलोचना कर चुकी हैं. ईरान के साथ की गयी न्यूक्लियर डील की भी ट्रंप कड़ी आलोचना कर चुके हैं, जिसे ब्रिटेन की मदद से अंजाम दिया गया था. इस डील को वे ‘किसी भी देश द्वारा ऐतिहासिक तौर पर अब तक का सबसे खराब समझौता’ करार दे चुके हैं. उन्होंने अमेरिका से वादा किया है कि वे उन सभी खर्चीले विदेशी संबंधों और व्यापारिक समझौतों से अलग हो जायेंगे जो अमेरिकियों के जीवन-यापन को छीन रहे हैं. ऐसे प्रस्तावित वाणिज्यिक रवैये से वे अमेरिका के वैश्विक वर्चस्व को बरकरार रखना चाहते हैं. खैर, फिलहाल शपथ ग्रहण से पहले ट्रंप की विदेश नीति को समझ पाना असंभव है. एक बात जरूर है की वे कम से कम एक बात पर लगातार कायम रहे हैं कि उनका प्रशासन महान होगा, और वे ही चुनौतियों का सामना करने के लिए सक्षम हैं, भले ही वे उन्हें अधिक समझते न हों. अमरीकी जनता के इस राष्ट्रवाद ने यहूदियों को भी खासा प्रभावित किया है. जैसा कि सभी जानते हैं, अमेरिका में यहूदी लॉबी बेहद सशक्त है और चुनावी फंडिंग से लेकर मतदान नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है. अमेरिकी यहूदियों ने भी हिलेरी को उनकी इस्लाम समर्थक नीतियों के कारण साफ़-साफ़ नापसंद किया. इसके अलावा हिलेरी क्लिंटन ने अमेरिका के “गन कल्चर” (बन्दूक संस्कृति) के खिलाफ बोलकर भी खुद को कमज़ोर किया. अमेरिका के लोग बन्दूक प्रेमी हैं, वहां पर छोटी-बड़ी बंदूकें आसानी से कोई भी खरीद सकता है, हिलेरी ने इसे बंद करने का वादा किया था जो स्थानीय अमरीकी को कतई पसंद नहीं आया, क्योंकि उसे अपनी और अपने घर की सुरक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण लगती है. जबकि डोनाल्ड ट्रम्प ने आतंकवाद के खिलाफ कड़े कदम उठाने के संकेत पहले ही दे दिए थे. अंततः हिलेरी का “सॉफ्ट अमेरिका” हार गया और ट्रम्प का “मजबूत राष्ट्रवाद” जीत गया. 

कहने का तात्पर्य यह है कि विगत तीन वर्षों से दुनिया भर में “राष्ट्रवाद” की भावना जोर पकड़ रही है, जिसे समझने में तथाकथित बुद्धिजीवी नितांत असफल रहे हैं. ISIS के खतरे, इस्लामिक कट्टरपंथ के विस्तार, यूरोप में इस्लामिक शरणार्थियों के प्रति नरम रुख, पाकिस्तान की अनदेखी करना, दुनिया भर में बेरोजगारी और गरीबी की संख्या में वृद्धि के कारण दुनिया भर के लोगों में या भाव मजबूत होता जा रहा है कि “हमें पहले अपने राष्ट्र को मजबूत बनाना है, पहले अपने राष्ट्र का फायदा देखना-सोचना है, पहले अपने देश के युवाओं को नौकरी मिलनी चाहिए, पहले अपने देश की सुरक्षा होनी चाहिए... दुनिया की चिंता हम बाद में करेंगे”. निश्चित रूप से अब आप सोच रहे होंगे कि नरेंद्र मोदी, ब्रेक्जिट और डोनाल्ड ट्रम्प के बाद अब किसका नंबर है, तो मेरा अनुमान है फ्रांस की धुर “दक्षिणपंथी नेता मेरी ली पेन”. जी हाँ!! इन पर निगाह बनाए रखियेगा. जिस तरह से फ़्रांस में लगातार इस्लामी आतंकी मजबूत होते जा रहे हैं, शार्ली हेब्दो अखबार जैसे हमले बढ़ रहे हैं, फ्रांस के कई शहरों में आए दिन स्थानीय लोगों और शरणार्थी मुस्लिमों के बीच दंगे-फसाद हो रहे हैं, उसे देखते हुए फ्रांस की जनता के मन में भी राष्ट्रपति ओलांद की “सॉफ्ट नीतियों” के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही है अतः संभव है कि फ्रांस के आगामी चुनावों में हमें पेरिस में भी एक नया “राष्ट्रवादी नेतृत्व” देखने को मिल जाए. भारत बदल रहा है, दुनिया बदल रही है... राष्ट्रवाद की अवधारणा मजबूत हो रही है. लेकिन “तथाकथित बुद्धिजीवी” और मीडिया के बिके हुए लोग इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं हैं. 

खैर... मुर्गा बांग नहीं देगा, तो क्या सवेरा ही नहीं होगा?? 

Friday, November 25, 2016

Benefits and Demerits of Demonetization




मोदी की आर्थिक क्रान्ति – प्रभाव और दुष्प्रभाव...  

कहावत है की मुसीबत कभी अकेले नहीं आती, वह दो-चार और बड़ी-बड़ी समस्याएँ साथ लेकर ही आती है. भारत में इस समय मोदी विरोधियों तथा समूचे विपक्ष पर यह कहावत पूरी तरह से लागू हो रही है. पाकिस्तान के खिलाफ की गई “सर्जिकल स्ट्राईक” के सदमे से विपक्षी दल उबर भी नहीं पाए थे कि नरेंद्र मोदी ने “तलाक-तलाक-तलाक” का मुद्दा छेड़कर न केवल कट्टरपंथी मुसलमानों में बल्कि पिछले साठ वर्ष में “मुस्लिम वोट बैंक” की राजनीति से पीड़ित विपक्ष को सकते में डाल दिया था. मोदी द्वारा तीन तलाक का मुद्दा उठाकर एक तीर से दो निशाने साधे गए हैं, पहला तो यह कि भारत की जनता के सामने समूचे विपक्ष को बेनकाब कर दिया गया है कि ये लोग न्यायालय का सम्मान नहीं करते, क्योंकि शाहबानो मुद्दा भले ही कितना भी पुराना हो चुका हो, देश की जनता उसका इतिहास जानती है और यह भी जानती है कि मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के बारे में कांग्रेस, वामपंथ या सपा-बसपा के क्या विचार हैं. दूसरा यह कि तीन तलाक के मुद्दे ने मुस्लिम समुदाय में ही दो-फाड़ कर दिया. जहाँ मुस्लिम महिलाएँ इस पहल से बेहद खुश हैं, वहीं कट्टरपंथी मुस्लिम गुट सब के सामने बेनकाब हो रहे हैं कि इन लोगों का भारतीय संविधान में कतई भरोसा नहीं है. इस प्रकार जो मुस्लिम वोट बैंक “एकजुट” होकर भाजपा के खिलाफ मतदान करता आया है, उसके आधे हिस्से में मोदी ने सेंध लगा दी है. अब कोई भी राजनैतिक दल इस बात का अंदाजा नहीं लगा सकता कि यूपी-पंजाब-गोवा के चुनावों में मुस्लिम महिलाएँ किस तरफ वोट करेंगी. 

“सर्जिकल स्ट्राईक” और “तीन तलाक” के दो झटकों से विपक्ष अभी सदमे की अवस्था में था, पाकिस्तान के समर्थन में इनके तमाम षड्यंत्र और सर्जिकल स्ट्राईक को लेकर झूठ फैलाने की सभी कोशिशें नाकाम हो चुकी थीं. देश की जनता के सामने लगातार बेनकाब होते हुए विपक्ष जब तक यह समझ पाता कि आगे क्या करना है, इसी बीच नरेंद्र मोदी ने उनके माथे पर “परमाणु बम” का हमला कर दिया. यह परमाणु बम इतना अप्रत्याशित और खतरनाक है कि खुद भाजपा सहित देश के तमाम राजनैतिक दल, आतंकी गुट, हवाला ऑपरेटर, ड्रग्स के नीच धंधे में लगे हुए माफिया तथा काला कारोबार करने वाले व्यापारी वर्ग, अफसर, बिल्डर, वकील और डॉक्टरों को भी इस परमाणु हमले ने अपनी चपेट में ले लिया. भारत के इतिहास में केवल दो ही प्रधानमंत्री ऐसे हुए हैं, जिन्होंने बड़े नोटों को बंद करने की हिम्मत दिखाई है. पहले थे एक गुजराती मोरारजी देसाई और अब एक दुसरे गुजराती हैं नरेंद्र मोदी. आठ नवम्बर की रात को आठ बजे जब देश के टीवी चैनलों पर यह फ्लैश चमका कि देश के प्रधानमंत्री देश के नाम विशेष सन्देश देंगे, उस समय 99% लोगों के मन में सबसे पहले पाकिस्तान से युद्ध की घोषणा का संशय आया. क्योंकि उसी दिन प्रधानमंत्री सेना के तीनों प्रमुखों तथा राष्ट्रपति से चर्चा कर चुके थे, इसलिए ऐसी अफवाहें थीं की शायद नरेंद्र मोदी युद्ध की आधिकारिक घोषणा करेंगे. लेकिन मात्र आधे घंटे बाद अर्थात साढ़े आठ बजे तक समूचा देश यह जानकर हैरान हो गया कि प्रधानमंत्री ने एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कदम उठा लिया है, और अब देश में 500 व 1000 के नोट तत्काल प्रभाव से बंद किए जाते हैं. यह सुनते ही पूरे देश में एक हडकंप सा मच गया. जिस प्रकार एक बड़े भूकंप के बाद छोटे-छोटे झटके आते हैं और जनता को संभलने में समय लगता है, ठीक वैसा ही इस साहसिक घोषणा के बाद हुआ. अपने घरों में बिस्तरों के नीचे और कोठियों में करोड़ों रूपए का काला धन छिपाए बैठे “धनपशु” जब तक समझ पाते की वास्तव में हुआ क्या है, इससे पहले ही रात के बारह बजे की समय सीमा आरम्भ हो गई और उनके वे करोड़ों रूपए रद्दी का टुकड़ा भर रह गए. 


प्रधानमंत्री द्वारा 500 और 1000 के नोटों को रद्द किए जाने का यह फैसला वास्तव में एक “राजनैतिक मास्टर-स्ट्रोक” है, विशेषकर उत्तरप्रदेश और पंजाब के आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए. भारत जैसे विशाल अर्थतंत्र में से लगभग 70% करंसी को एक झटके में बाहर करने से कई दूरगामी प्रभाव होंगे, लेकिन इसके कई तात्कालिक प्रभाव तो पहले दिन से ही दिखाई देने लगे हैं. चूँकि बड़े नोटों को स्थान लेने के लिए सौ-सौ रूपए के नोट आएँगे तथा 2000 रूपए का नया नोट भी अपना स्थान बनाने में थोड़ा समय लेगा, उससे पहले उत्तरप्रदेश-पंजाब के चुनाव निपट चुके होंगे. इस क्रांतिकारी फैसले का पहला प्रभाव तो यह पड़ेगा कि धनबल से लादे जाने वाले उत्तरप्रदेश के चुनावों में नरेंद्र मोदी ने अपने विपक्षियों की “सप्लाई चेन” पर तत्काल लगाम लगा दी है. इसके अलावा यूपी की जनता के बीच यह साफ़ सन्देश गया है की नरेंद्र मोदी काले धन को समाप्त करने के प्रति वास्तव में गंभीर हैं और ऐसे बड़े निर्णय लेने की उनमें हिम्मत और क्षमता है. प्रेस कांफ्रेंस में जिस तरह से मायावती और मुलायम सिंह के चेहरे लटके हुए थे, उसे देखकर सामान्य व्यक्ति भी समझ सकता है कि इन लोगों को यूपी का चुनाव लड़ने में कितनी दिक्कत आने वाली है. मुलायम सिंह लगभग रुआंसे स्वर में आठ दिन की मोहलत देने की माँग करते रहे, जबकि मायावती जिन्होंने अपने उम्मीदवारों से नगद में दो-दो करोड़ रूपए लिए हैं, वे भी परेशान हैं की अब इन नोटों को कैसे ठिकाने लगाया जाए और जिसने “टिकट का पेमेंट” कर दिया है, उसे मना कैसे करें? दूसरा बड़ा झटका महानगरों में बैठे हवाला ऑपरेटरों को लगा है, जिनका करोड़ों रूपए रोज का कारोबार तत्काल प्रभाव से बंद हो गया है. तीसरा प्रभाव यह है कि संभवतः सोने के दामों में भारी बढ़ोतरी होगी क्योंकि काले धन के मालिक अपना धन ठिकाने लगाने के लिए सबसे सुरक्षित मार्ग सोना ही मानेंगे, जो तत्काल उपलब्ध भी हो जाता है.  

लेकिन प्रधानमंत्री के इस निर्णय का देश को सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि पाकिस्तान से आने वाले नकली नोट और आतंकवादियों की हवाला फंडिंग तुरंत प्रभाव से बंद हो गई है. नकली नोट तस्करी के लिए पश्चिम बंगाल के सबसे बदनाम इलाके मालदा में जो सन्नाटा पसरा है, वह देखने लायक है. ममता बनर्जी आने “मुस्लिम वोट बैंक” की तरफदारी में जिस तरह लगातार इस निर्णय के खिलाफ गरज रही हैं, उससे यह बात सिद्ध होती है की “चोट” बिलकुल मर्मस्थल पर लगी है. जिस प्रकार केवल तीन दिनों के अन्दर मायावती-मुलायम सिंह और ममता बनर्जी देश की जनता के सामने बेनकाब हुए हैं उससे यह स्पष्ट है कि इनकी राजनैतिक जमीन में भारी उथल-पुथल होने वाली है. सूत्रों के अनुसार पंजाब चुनावों के लिए अरविन्द केजरीवाल ने भारी मात्रा में करोड़ों रूपए नगद का चन्दा प्राप्त किया है. इसीलिए प्रधानमंत्री का यह निर्णय आने के दो दिन बाद तक तो केजरीवाल की बोलती ही बंद थी. पूर्व आयकर अधिकारी होने के नाते वे इस निर्णय के “भूकम्पकारी असर” को अच्छे से समझ चुके थे. इसलिए दिन-रात मोदी-मोदी भजने वाले केजरीवाल को अपनी प्रतिक्रिया देने में दो दिन लग गए. ज़ाहिर है की इतना बड़ा निर्णय लेने से पहले प्रधानमंत्री और उनकी टीम ने कई जमीनी तैयारियाँ की थीं. एक नवम्बर से आठ नवम्बर के बीच सभी रिजर्व बैंकों के मैनेजरों और वित्त मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों के साथ बैठकें हुईं. उन्हें कैश तैयार रखने के निर्देश दिए गए. 2000 रूपए का नया नोट छापने के बाद उसे देश के अन्य भागों में में स्थित बैंकों तक पहुँचाने के इंतजाम किए गए. यह सब कार्य करते समय इस बात का पूरा ध्यान रखा गया कि यह बात किसी के ध्यान में नहीं आने पाए कि सरकार 500 और 1000 के पुराने नोट सिरे से बंद करने जा रही है. यहाँ तक कि मोदीजी की कैबिनेट तक को इस निर्णय के बारे में कतई जानकारी नहीं थी, और जिन्हें आशंका थी कि ऐसा कुछ हो सकता है उन्हें भी निश्चित तारीख नहीं पता थी कि ऐसी घोषणा किस दिन होगी? आठ नवम्बर के दिन भर में मोदीजी ने केवल तीनों सेनाध्यक्षों तथा राष्ट्रपति से भेंट करके उन्हें इस निर्णय की सूचना दी. इस प्रकार मोदीजी, अरुण जेटली, तीनों सेनाध्यक्ष तथा राष्ट्रपति अर्थात केवल छः व्यक्तियों को ही पता था की आठ नवम्बर को भारत में एक ऐतिहासिक और हिम्मती कदम उठने जा रहा है. 


प्रधानमंत्री के इस निर्णय का सबसे बड़ा फायदा पेटीएम जैसी ई-वालेट कंपनियों तथा क्रेडिट-डेबिट कार्ड से किए जाने वाले भुगतानों की संख्या को होगा. सभी बैंकों को इस ऐतिहासिक अवसर का लाभ उठाते हुए इलेक्ट्रॉनिक मनी के अधिकाधिक उपयोग तथा मोबाईल पेमेंट को बढ़ावा देने में करना चाहिए, ताकि उनकी शाखाओं पर ग्राहकों का बोझ कम हो तथा संसाधन की बचत हो. इस निर्णय का सबसे खराब असर पड़ेगा “रियल एस्टेट” क्षेत्र को. बड़े-बड़े बिल्डर और कालोनाईज़र आठ नवम्बर की रात से ही धराशायी हो गए हैं. जैसा कि सभी जानते हैं कि बड़े-बड़े अफसरों, अधिकारियों, नेताओं और उद्योगपतियों ने पिछले कुछ वर्षों में गृह निर्माण के क्षेत्र में काले धन का जमकर उपयोग और उपभोग किया है. इस कारण मकानों के दामों में अनावश्यक बढ़ोतरी हुई और सामान्य जनता एक सामान्य कीमत का मकान खरीदने के लिए तरस गई. रियल एस्टेट के मार्केट में कालेधन ने एक गुब्बारा फुला दिया था, जिसके कारण मकानों की कीमतें अवास्तविक स्तर तक चढीं जिसके कारण भ्रष्टाचारियों के पास चार से लेकर दस-दस फ्लैट्स हो गए. ये बात और है कि वे मकान बिक नहीं पाए क्योंकि उनकी कीमत ही अवास्तविक थी. अब समस्या यह आएगी की जब बिल्डरों और कालोनाईज़रों के पास धन की कमी हो जाएगी, तथा भ्रष्ट अधिकारियों एवं नेताओं का काला पैसा उन तक नहीं पहुँचेगा तो बैंकों के ऋण भी डूबत खाते में जाएँगे. परन्तु इससे आम जनता को फायदा यह होगा कि मकानों और जमीनों के दाम वास्तविक स्तर पर आ जाएँगे, क्योंकि बिल्डरों को भी नगदी की आवश्यकता होगी तो वे थोड़ा नुक्सान सहकर अपने फ्लैट्स बेचेंगे ही. प्रधानमंत्री जी के इस निर्णय से प्रभावित होने वाला एक और सेक्टर है “रिटेल” व्यवसाय. बड़े नोटों को बंद किए जाने और उसके स्थान पर दुसरे बड़े नोटों को अपनी जगह संभालने के बीच जो वक्त लगेगा, इस दौरान तात्कालिक रूप से कुछ सप्ताह के लिए ट्रांसपोर्टेशन तथा रिटेल व्यवसाय में मंदी आएगी, क्योंकि अभी भी व्यापारियों को “नगद” लेनदेन ही सुहाता है. व्यापारियों तथा उन्हें सामान बेचने वाली इंडस्ट्री को अभी चेक, NEFT तथा RTGS इत्यादि की “आदत” नहीं है. क्योंकि ऐसा करने पर उनका समूचा ट्रांजेक्शन सरकार की निगाह में आ जाता है, जिस पर उन्हें टैक्स भी देना होगा, आयकर विभाग को हिसाब-किताब भी देना होगा. लेकिन यह आज नहीं तो कल होकर ही रहेगा. प्रधानमंत्री की इस पहल का उद्देश्य ही यही है की व्यापारियों द्वारा अधिकाँश पैसा हवाला अथवा नगद की बजाय इलेक्ट्रॉनिक तरीके से पारदर्शी हो. जो ईमानदार व्यापारी हैं, उन्हें इस निर्णय से कोई कष्ट नहीं है, लेकिन जिन्हें दो नंबर के काम करने की लत लगी हुई है, वे बिलबिला रहे हैं. तात्पर्य यह है कि प्रधानमंत्री के इस “बोल्ड” कदम से उन्हें संभवतः कुछ राजनैतिक लाभ अवश्य मिल सकता है, परन्तु भारत की आर्थिक गतिविधियाँ अगले छः माह तक लड़खड़ा जाएँगी और उन पर नकारात्मक प्रभाव अवश्य पड़ेगा. आखिर इतने वर्षों की “बीमारी” जल्दी तो ठीक नहीं हो सकती. मोदीजी ने जिस व्यवस्थित और योजनाबद्ध तरीके से अपनी इस गुप्त योजना को अंजाम दिया, इसकी तारीफ़ तो करनी ही पड़ेगी. 500 और 1000 रूपए के नोट एक झटके में बंद नहीं हुए हैं, यह करने से पहले मोदीजी ने सबसे पहले गरीबों के लिए जन-धन योजना में उनके बैंक खाते खुलवाए. जब इन बैंक खातों की संख्या लगभग पच्चीस करोड़ पार कर गई, तब उन्होंने इन लोगों को उनके खाते में उपलब्ध राशि को देखते हुए “प्रोत्साहन” स्वरूप डेबिट कार्ड भी जारी कर दिए. आधार कार्ड को गैस कनेक्शनों तथा बैंक खातों से जोड़ने की प्रक्रिया तो पहले ही आरम्भ की जा चुकी थी, इसलिए सरकार के सामने देश की लगभग 70-80 प्रतिशत जनता के बैंक खातों, गैस कनेक्शन और आधार कार्ड की पुख्ता जानकारी आ चुकी थी. इसके बाद नंबर आया काला धन रखने वालों को अपनी संपत्ति घोषित करने के लिए दी जाने वाली छूट योजना का. जेटली और मोदी ने कालेधन वालों को प्रस्ताव दिया की तीस प्रतिशत जुर्माने के साथ वे अपना पूरा काला धन घोषित करें, और उसके पश्चात चैन की नींद सोएँ. इस योजना का काफी अच्छा प्रभाव भी पड़ा और सरकार के खाते में 66,000 करोड़ रूपए जुर्माने के रूप में एकत्रित हुए. इसके बाद भी प्रधानमंत्री ने एक अंतिम चेतावनी जारी करते हुए अपने संबोधन में कहा था कि कालाधन रखने वालों के लिए यह अंतिम मौका है, वे चाहें तो अभी भी संभल जाएँ और किसी भी हालत में तीस सितम्बर तक अपनी संपत्ति घोषित कर दें. ये बात और है कि अधिकाँश बड़े नेताओं-व्यापारियों-बिल्डरों और वकीलों-डॉक्टरों ने मोदीजी की इस चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया. बहुत से लोगों को यह लगा कि प्रत्येक प्रधानमंत्री तो ऐसा बोलते ही रहते हैं. कुछ नहीं होगा... परन्तु मोदीजी के मन में पहले से ही पक्का निश्चय था कि एक ही वार में काले धन वालों की गर्दन उड़ाना ही है. इसलिए एक अक्टूबर से ही इस घोषणा के लिए जमीन तैयार करने का काम शुरू हो गया, और ठीक एक माह आठ दिन बाद अंततः मोदीजी ने अपना बम धनपशुओं के सिर पर दे मारा. अब स्थिति ये है कि कोई अपने नोट जला रहा है, तो कोई टुकड़े करके गंगाजी में बहा रहा है. अपना काला पैसा बचाने के लिए नित नए हथकण्डे अपनाए जा रहे हैं, लेकिन सरकार भी “तू डाल-डाल, मैं पात-पात” की तर्ज पर सारे रास्ते ब्लॉक करती जा रही है. सरकार को यह कदम इसलिए भी उठाना पड़ा क्योंकि अभी भी भारत की अधिकाँश जनता आयकर के दायरे से बाहर ही है. आयकर विभाग द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार 2012-13 में भारत में 2.88 करोड़ आयकरदाता थे, जो 2013-14 में बढ़कर 3.35 करोड़ तथा 2014-15 में बढ़कर 3.65 करोड़ हो गए. भले ही यह दो वर्ष के भीतर 27% की बढ़ोतरी हो, लेकिन अभी भी देश की विशाल जनसँख्या और उनकी आय को देखते हुए यह बहुत कम है. आयकर विवरणी भरना और आयकर चुकाना दोनों अलग-अलग बातें हैं. अभी जो आंकड़े मैंने आपको बताए वे आयकर विवरणी दाखिल करने वालों के है, जबकि वास्तविक आयकर चुकाने वालों की संख्या केवल 1.91 करोड़ ही है, यानी जनसँख्या का केवल 1 प्रतिशत. ज़ाहिर सी बात है कि जिस प्रकार देश की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, लोगों की कमाई बढ़ रही है, वेतन बढ़ रहा है, व्यवसाय बढ़ रहा है, उसके अनुपात में आयकर नहीं भरा जा रहा. सीधा अर्थ है कि कालेधन में वृद्धि होती जा रही थी. जिसे तोड़ने के लिए सरकार ने यह क्रांतिकारी कदम उठाया

संक्षेप में ठीक से समझने के लिए दो मिनट के इस वीडियो को जरूर देखिये... 

https://www.youtube.com/watch?v=JSsF5DqYpCU


जनधन बैंक खाते, गैस कनेक्शन, आधार कार्ड, से सभी खातों को जोड़ने के अलावा सरकार ने GST वाले चैनल पर भी लगातार काम जारी रखा. विपक्ष का सहयोग लिया, राज्यों को समझाया और अंततः एक अप्रैल 2017 से GST के पूरी तरह से लागू होने की पूरी संभावना है, देश की अर्थव्यवस्था में यह एक और बड़ा कदम सिद्ध होगा. बड़े नोटों को बंद करने का तत्काल प्रभाव से किसानों और छोटे व्यापारियों पर काफी असर पड़ेगा. देश का मध्यम वर्ग काफी हद तक डिजिटल पेमेंट के युग में आरंभिक प्रवेश कर चूका है, इसलिए उसे अधिक फर्क नहीं पड़ेगा. परन्तु चूँकि अब नई फसल मंडियों में आने लगी है और किसानों को भी नगद में राशि लेने की आदत पड़ी हुई है, सो उन्हें शुरुआत में दिक्कत का सामना करना पड़ेगा. चूंकि कृषि पर आयकर नहीं लगता, इसलिए देश में अधिकाँश किसानों के पास PAN कार्ड भी नहीं है. परन्तु सौ-सौ के नोटों की विशाल संख्या को देखते हुए अब मजबूरी में किसानों को भी डिजिटल पैसे की तरफ अपना रुख करना ही होगा. मंडियों से व्यापारी सीधे उनके खाते में पैसा RTGS या NEFT करेगा. सरकार ने भी जनधन खाते और गैस कनेक्शन के बहाने बहुत से खातों को आधार कार्ड से जोड़कर जमीन तैयार कर दी है, इसके अलावा २२ बैंकों के संगठन ने ई-भुगतान हेतु जो UPI (यूनीफाईड पेमेंट इंटरफेस) आरम्भ किया है, उससे भी किसानों एवं छोटे व्यापारियों को जल्दी ही उसकी आदत पड़ जाएगी और भविष्य में धीरे-धीरे नगद भुगतान कालबाह्य होता चला जाएगा. देश में जितना ज्यादा “प्लास्टिक मनी” अर्थात डिजिटल मनी का उपयोग बढ़ता जाएगा, काले धन में उतनी ही कमी आती जाएगी. भ्रष्टाचार किसी भी देश के लिए “दीमक” के समान है, उसका निराकरण तभी होगा जब अधिकाधिक भुगतान नगद की बजाय डिजिटल हो. जैसा की वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा कहते हैं, कालेधन को समाप्त करने के लिए सरकार ने जो SIT (Special Investigation Team) बनाई थी, सरकार ने उसकी कई अनुशंसाओं को लागू करना आरम्भ कर दिया है. बड़े नोटों को बंद करना भी इसी श्रृंखला की एक कड़ी थी, आने वाले समय में मोदीजी ज्वेलर्स, बिल्डरों, कालोनाईजरों, डॉक्टरों, वकीलों के कालेधन पर नकेल कसने के लिए कुछ और नई घोषणाएं और उपाय अपना सकते हैं.

इस बात पर सवाल उठाए जाने लगे हैं कि बड़े नोटों को बंद करने के लिए भूकम्पकारी निर्णय का वास्तव में क्या कोई बड़ा फायदा हुआ है? क्योंकि बंद किए गए नोटों के बदले में सौ-सौ के तथा 500-2000 के नए नोट छापने का कुल खर्च लगभग 12,000 से 15000 करोड़ रूपए के बीच बैठेगा. इसके अलावा मानव संसाधन का समय जो लगेगा वह अलग ही है. तो क्या वास्तव में देश को इससे अधिक लाभ होगा? हम यह कैसे पता करें कि वास्तव में कालेधन वालों को इससे कोई बड़ा नुक्सान हुआ है? इसके लिए हमें कुछ मोटे-मोटे संक्षिप्त आंकड़े देखने होंगे. रिजर्व बैंक के अनुसार मार्च 2016 के अंत तक देश में 500 और 1000 के नोटों की कुल कीमत थी 14,28,000 करोड़ रूपए. अब सामान्य समझ कहती है कि प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद मार्च 2017 तक यदि इतना पैसा रिजर्व बैंक के पास वापस लौटकर नहीं आता, तो समझ लीजिए कि इसमें से जितना पैसा बचा रह गया, वह कालेधन वालों का वास्तविक नुक्सान ही है. पहले ही दिन बरेली में लाखों रूपए के जले हुए नोट सडक पर पाए गए हैं, ऐसी घटनाएँ अभी और बढेंगी. सरकार को चूना लगाने की प्रवृत्ति वाले कथित “चतुर सुजान” लोग येन-केन-प्रकारेण अपनी ब्लैक मनी को ठिकाने लगाने का प्रयास अवश्य करेंगे. आठ नवम्बर की रात को ज्वेलर्स के यहाँ रात दो बजे तक जुटी भीड़ साबित करती है की भारत में बहुत पैसा है, लेकिन हर कोई “नगद” से ही कारोबार करना चाहता है, न कि चेक से. सरकार ने ऐसे सभी ज्वेलर्स पर निगाह बनाए रखी है जिन्होंने 8-9-10 नवम्बर को कारोबार किया है. पिछली तारीखों में बिलिंग करके भी कुछ काला धन बचाया जाएगा, लेकिन वह राशि बहुत ही कम होगी. छापे के दौरान भ्रष्ट अधिकारियों के घर से जिस प्रकार करोड़-पांच करोड़ रूपए निकलते हैं उसे देखते हुए ये लोग कितना भी प्रयास कर लें, उनका बहुत सारा धन तो डूबने ही वाला है. वहीं सरकार इस बात पर भी निगाह बनाए रखेगी, कि आगामी दो-तीन माह में उद्योगों द्वारा निर्यात में “अचानक” बढ़ोतरी अथवा आयात में “अचानक” कमी तो नहीं हो गई है. क्योंकि उस रास्ते से भी काले धन को सफ़ेद करने की कोशिशें जारी रहेंगी. विरोधी दल आरोप लगा रहे हैं की इससे पहले भी दो बार (1946 और 1977) नोटबंदी लागू की गई थी, परन्तु उस समय इसके परिणाम कुछ ख़ास नहीं मिले. परन्तु ऐसा कहने वाले भूल जाते हैं कि उस समय सरकारों के पास प्रभावशाली निगरानी व्यवस्था नहीं थी, और ना ही आयकर विभाग के अधिकारी इतने चुस्त और आधुनिक थे. इस बार स्थिति दूसरी है, डिजिटल इण्डिया के कारण पैसों के लेनदेन पर निगाह रखना आसान हो गया है, साथ ही अधिकाँश बैंक खातों को आधार कार्ड से जोड़े जाने के कारण जासूसी सरल हो गई है. इसीलिए सरकार आठ नवम्बर के बाद जीरो बैलेंस के जन-धन खातों पर भी अपना ध्यान केन्द्रित करेगी और पिछले एक वर्ष के लेनदेन से तुलना करके तुरंत पता चल जाएगा कि “अचानक” इस गरीब के खाते में लाख-दो लाख रूपए कहाँ से आ गए?


रिजर्व बैंक के आँकड़ों के मुताबिक़ 500 और 1000 के नोटों की कुल संख्या 16.4 लाख करोड़ रूपए है, जो कि देश में उपलब्ध कुल मुद्रा का 86% है. साफ़ बात है कि अब नगद में लेनदेन और मुश्किल से मुश्किल होता जाएगा. स्वाभाविक रूप से मकानों के भावों में जबरदस्त गिरावट देखने को मिलेगी. वैसे भी इशारों-इशारों में मोदीजी पहले ही बता चुके हैं कि उनका अगला हमला “बेनामी संपत्तियों” के कारोबार पर होने वाला है. यानी भ्रष्टाचारियों को चैन की साँस फिलहाल तो नहीं मिलने वाली. वित्तमंत्री अरुण जेटली ने आशा जताई है कि यदि दबे पड़े काले धन में से आधा भी बैंकिंग सिस्टम में आ जाएगा तो बैंकों के पास नगदी बढ़ेगी और उन्हें ऋण देने में आसानी होगी, साथ ही आयकरदाताओं की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी. यदि इन सब तकनीकी बातों को छोड़ भी दिया जाए तो मेरे लिए इतना ही पर्याप्त है कि नकली नोटों का धंधा ठप पड़ गया... नशीली दवाओं के कारोबार की कमर टूट गई... हथियारों के दलाल बिलबिला रहे हैं... दाऊद इब्राहिम जैसों का हवाला कारोबार खत्म हो गया है... और क्या चाहिए?? 

सच तो यही है कि बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल्स, वातानुकूलित सब्जी मार्केट और क्रेडिट कार्ड अभी फ़िलहाल भारत के केवल 10% लोगों की ही पहुँच में हैं. भारत की बाकी 90% जनता निम्न-मध्यमवर्गीय लोग हैं जिनका वास्ता ठेले वाले, सब्जी वाले, प्रेस के लिये धोबी, सुबह-सुबह ब्रेडवाले आदि लोगों से पड़ता है, जिनके पास 100 का नोट “बड़ा” नोट माना जाता है. एक सामान्य आम आदमी को दैनिक “व्यवहारों” में 1000 और 500 के नोटों की कितनी आवश्यकता पड़ती होगी? सवाल वैसे कुछ मुश्किल नहीं है क्योंकि भारत की 70% जनता की रोज़ाना की आय 100 रुपये से भी कम है. अब दूसरा पक्ष देखिये कि वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था के “ट्रांज़ेक्शन” में 80% नोट 50 रुपये से ऊपर के हैं, यानी कि अधिकतम 20% करंसी नोट 100 रुपये से कम वाले ऐसे हैं जिनसे 70% से अधिक जनता को अपना रोज़मर्रा का काम करना है. अमेरिका में सबसे बड़ा नोट 100 डॉलर का है, जबकि ब्रिटेन में सबसे बड़ा नोट 50 पाउंड का है, लेकिन भारत में सबसे बड़ा नोट अभी तक 1000 का था, जो अब 2000 का हो जाएगा. अगले पाँच वर्ष में 2000 का नोट भी बन्द किए जाने की पूरी संभावना है. जैसे-जैसे जनता में वर्चुअल मनी और डिजिटल भुगतान की आदत बढ़ती जाएगी, वैसे-वैसे नगद नोट अप्रासंगिक होते चले जाएँगे. अंत में इतना ही कहना चाहूँगा कि यदि एक हजार रूपए के नोटों की रिश्वत देने के लिए एक करोड़ रूपए एकत्रित किए जाएँ तो उनका कुल वजन लगभग 12 किलो होगा, जबकि 100 रूपए के नोटों के बण्डल में यदि एक करोड़ की रिश्वत देनी हो तो उसका वजन लगभग 100 किलो हो जाएगा... तो बड़े नोटों की जरूरत किसे है?? मुझे तो नहीं है... क्या आपको है?

Friday, October 14, 2016

Hyderabad is Liberated, not merged



हैदराबाद की मुक्ति और ओवैसियों का काला इतिहास... 


इतिहास की पुस्तकों में अक्सर हमें पढ़ाया गया है कि हैदराबाद के निजाम ने सरदार पटेल की धमकी के बाद खुशी-खुशी अपनी रियासत को भारत में “विलय” कर लिया था. जबकि वास्तविकता यह है कि हैदराबाद के निजाम ने अंतिम समय तक पूरा जोर लगाया था कि हैदराबाद “स्वतन्त्र” ही रहे, या फिर तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की तरह पाकिस्तान का हिस्सा बना रहे. जबकि वास्तविकता यह है कि उस समय की सभी घटनाएँ स्पष्ट रूप से सिद्ध करती हैं कि हैदराबाद का भारत में “विलय” नहीं हुआ था, बल्कि उसे घुटनों के बल पर झुकाकर उसे “कट्टर मज़हबी रजाकारों” के अत्याचारों से मुक्त करवाया गया था... आईये सिलसिलेवार उन घटनाओं को एक बार पुनः अपनी यादों में सँजोते हैं... 

1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात लगभग 500 रियासतों ने भारत गणराज्य में विलय के प्रस्ताव को मंजूर कर लिया था और 1948 आते-आते भारत एक स्पष्ट आकार ग्रहण कर चुका था. केवल जूनागढ़ और हैदराबाद के निजाम इस बात पर अड़े हुए थे कि वे “स्वतन्त्र” ही रहेंगे, भारत में विलय नहीं करेंगे. प्रधानमंत्री नेहरू और गृहमंत्री सरदार पटेल लगातार इस बात की कोशिश में लगे हुए थे कि मामला सरलता से सुलझ जाए, बलप्रयोग न करना पड़े. पटेल का यह कहना था कि जब मैसूर, त्रावनकोर, बड़ौदा और इंदौर जैसी बड़ी-बड़ी रियासतों ने “भारत” के साथ एकाकार होने का फैसला कर लिया है तो देश के बीचोंबीच “हैदराबाद” नामक पाकिस्तानी नासूर कैसे बाकी रह सकता है? यही हाल जम्मू-कश्मीर रियासत का भी था, जब पाकिस्तान से आए हुए हमलावरों ने लगातार कश्मीर की जमीन हड़पना शुरू की, तब कहीं जाकर अंतिम समय पर कश्मीर के महाराजा ने भारत संघ के साथ विलय का प्रस्ताव स्वीकार किया और भारत ने वहाँ अपनी सेनाएँ भेजीं. 

हैदराबाद के निजाम ने पहले दिन से ही स्पष्ट कर दिया था कि वह स्वतन्त्र रहना चाहते हैं. निजाम ने 11 जून 1947 को एक फरमान जारी करते हुए कहा कि वह 15 अगस्त 1947 के दिन हैदराबाद को एक स्वतन्त्र देश के रूप में देखेंगे. निजाम भारत के साथ एक संधि करना चाहता था, न कि विलय. इस्लामी रजाकारों और इस्लामी प्रधानमंत्री मीर लईक अली ने निजाम पर अपनी पकड़ मजबूत बना रखी थी. जिन्ना, जो कि पाकिस्तान का निर्माण कर चुके थे, उन्होंने भी निजाम की इस इच्छा को हवा देना जारी रखा. जिन्ना ने निजाम को सैन्य मदद का भी आश्वासन दे रखा था, क्योंकि निजाम ने नवनिर्मित पाकिस्तान को “ऋण” के रूप में बीस करोड़ रूपए पहले ही दे दिए थे. 

1946-48 के बीच नालगोंडा, खम्मम और वारंगल जिलों के लगभग तीन हजार गाँवों को कम्युनिस्ट पार्टी के गुरिल्लाओं ने “मुक्त” करवा लिया. उस समय कम्युनिस्ट और रजाकारों के बीच लगातार संघर्ष चल रहे थे. चूंकि अंग्रेजों से आजादी के बारे में कोई पक्का निर्णय, समझौता और स्पष्ट आकलन नहीं हो पा रहा था, इसलिए पूरी तरह से निर्णय होने एवं संविधान निर्माण पूर्ण होने तक तत्कालीन भारत सरकार एवं निजाम के बीच 29 नवम्बर 1947 को एक “अस्थायी संधि” की गई. उस समय लॉर्ड माउंटबेटन भारत के गवर्न-जनरल थे. उनकी इच्छा थी कि भारत सरकार, निज़ाम को विशेष दर्जा देकर हैदराबाद का विलय अथवा अधिग्रहण करने की बजाय उनके साथ स्थायी संधि करे. जवाहरलाल नेहरू भी इसी पक्ष में थे की भारत की सेना और निजाम के बीच कोई खूनी संघर्ष न हो. तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल इस बात पर अड़े हुए थे की भारत के बीचोंबीच एक पाकिस्तान समर्थक इस्लामी देश वे नहीं बनने देंगे. लेकिन अंततः नेहरू एवं माउंटबेटन के निज़ाम प्रेम एवं दबाव में उन्हें झुकना पड़ा, जब तक कि जून 1948 में लॉर्ड माउंटबेटन वापस इंग्लैण्ड नहीं चले गए. 


इसके बाद तस्वीर में आए श्री केएम् मुंशी, जिन्हें समझौते के तहत भारत सरकार के एजेंट-जनरल के रूप में निज़ाम के राज्य में देखरेख करने भेजा गया. सरदार पटेल और मुंशी के बीच आपसी समझ बहुत बेहतर थी. हैदराबाद में रहकर केएम मुंशी ने इस्लामिक जेहादियों, रज़ाकारों और निज़ाम के शासन तले चल रहे हथियारों के एकत्रीकरण एवं उनके द्वारा किए जा रहे अत्याचारों को निकट से देखा और उसकी रिपोर्ट चुपके से सरदार पटेल को भेजते रहे. इस बीच निज़ाम ने अपनी तरफ से खामख्वाह ही संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में भारत की शिकायत कर दी कि भारत सरकार उनके खिलाफ हथियार एकत्रित कर रही है और आक्रामक रुख दिखा रही है. जबकि वास्तव में था इसका उलटा ही, क्योंकि निज़ाम स्वयं ही एक स्मगलर सिडनी कॉटन के माध्यम से अपने इस्लामी रज़ाकारों के लिए हथियार एकत्रित कर रहा था. निज़ाम की इच्छा यह भी थी की वह पुर्तगालियों से गोवा को खरीद ले, ताकि समुद्र के रास्ते हथियारों की आवक सुगम हो सके. 

फरवरी 1948 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया (CPI) ने नेहरू सरकार को एंग्लो-अमेरिकन पूंजीवाद का प्रतीक घोषित करते हुए उसे उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया. CPI की मंशा थी कि देश में एक पार्टी शासन बने जो चीन की तानाशाही वाली तर्ज पर स्थापित हो. CPI ने अपने मृदु नेता पीसी जोशी को बाहर का रास्ता दिखाते हुए, उनके स्थान पर बीटी रणदीवे को लाए, जिन्होंने स्टालिन को अपने आदर्श मानते हुए भारत सरकार को सशस्त्र संघर्ष के सहारे उखाड़ फेंकने का संकल्प दोहराया. CPI के नेताओं के अनुसार, निज़ाम राज्य के जिन 3000 गाँवों पर कम्युनिस्टों ने अपना प्रभुत्व जमा लिया था, वहीं से पहले वे निजाम की सेना को हराएँगे और उसके बाद उस इलाके को “एक स्वतन्त्र वामपंथी गणतंत्र” घोषित करके नेहरू सरकार के खिलाफ अपने सशस्त्र संघर्ष जारी रखेंगे. जल्दी ही निज़ाम और कम्युनिस्टों को समझ में आ गया कि यह उनके बस की बात नहीं है, इसलिए दोनों ने मई 1948 में समझौता कर लिया. वामपंथियों ने निजाम को घुट्टी पिला दी कि वह नेहरूवादी पूंजीवाद को खारिज करते हुए निजाम राज्य को एक स्वतन्त्र देश घोषित करें. कम्युनिस्टों ने निजाम का पूरा साथ देने की कसमें खाते हुए अपने कैडर से कह दिया था कि अगर भारतीय सेना निजाम राज्य में प्रवेश करती है तो उसका पूरा विरोध किया जाए. 

माउंटबेटन ने भारत और निजाम सरकार के बीच कई दौर की बातचीत में हिस्सा लिया. माउंटबेटन को लगा था कि यह मामला आसानी से सुलझ जाएगा, इसलिए अंततः उसने एक समझौता मसौदा तैयार किया, जिसमें निजाम राज्य का भारत में ना तो विलय था, और ना ही उसका अधिग्रहण किया जा सकता था. इस मसौदे के अनुसार निज़ाम को कई रियायतें दी गई थीं, और भारत के साथ युद्ध विराम हेतु मना लिया गया था. जून 1948 में यह समझौता मसौदा लेकर माउंटबेटन और नेहरू देहरादून में बीमार पड़े सरदार पटेल से मिलने पहुँचे ताकि उनकी भी सहमति ली जा सके. सरदार पटेल ने समझौता देखते ही उसे खारिज कर दिया. माउंटबेटन और नेहरू उस समय और भी निराश हो गए, जब इसकी खबर निजाम को लगी और उसने भी इस समझौते को रद्दी की टोकरी में डाल दिया. बस फिर क्या था, सरदार पटेल के लिए अब सारे रास्ते खुल चुके थे, कि वे अपनी पद्धति से निज़ाम और रजाकारों से निपटें. सरदार पटेल ने भारतीय सेना का बलप्रयोग करने का निश्चय किया, लेकिन नेहरू इसके लिए राजी नहीं थे. तत्कालीन गवर्नर जनरल सी.राजगोपालाचारी ने नेहरू और पटेल दोनों को एक साथ बैठक में बुलाया, ताकि दोनों आपस में बात करके किसी समझौते पर पहुँचें. बलप्रयोग संबंधी नेहरू का विरोध उस समय अचानक ठंडा पड़ गया, जब राजगोपालाचारी ने ब्रिटिश हाईकमिश्नर से आया हुआ एक टेलीग्राम नेहरू को दिखाया, जिसमें कहा गया था कि सिकंदराबाद में कई ब्रिटिश ननों का इस्लामी रजाकारों ने बलात्कार कर दिया है. इधर भारतीय सेना के ब्रिटिश कमाण्डर जनरल रॉय बुचर ने नेहरू से मदद माँगी तो नेहरू ने उसे सरदार पटेल से बात करने की सलाह दी. असल में रॉय बुचर का कहना था कि चूँकि अभी पाकिस्तान में मोहम्मद अली जिन्ना की मौत का शोक चल रहा है, इसलिए हमें हैदराबाद पर हमला नहीं करना चाहिए. साथ ही साथ रॉय बुचर पाकिस्तानी सेना के तत्कालीन अंग्रेज जनरल से भी मिलीभगत करने में लगा हुआ था. सरदार पटेल ने रॉय बुचर का फोन टेप करवाया और उसे रंगे हाथों पकड़ लिया. पकडे जाने पर बुचर ने इस्तीफ़ा दे दिया, ताकि गद्दारी के आरोपों से बर्खास्तगी से बच जाए. अब सरदार पटेल के लिए रास्ता पूरी तरह साफ़ था. 

13 सितम्बर को भारतीय सेनाओं ने तीन तरफ से हैदराबाद को घेरना शुरू किया. निज़ाम और रज़ाकारों को बड़ी सरलता से परास्त कर दिया गया. केवल पांच दिनों में अर्थात 18 सितम्बर 1948 को निज़ाम के जनरल सैयद अहमद इदरूस ने भारत के जनरल जेएन चौधरी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. लेकिन इतिहास की पुस्तकों पर काबिज वामपंथी इतिहासकारों ने लगातार इस झूठ को बनाए रखा की हैदराबाद का “विलय” हुआ है, जबकि वास्तव में निज़ाम को मजा चखाकर सरदार पटेल और केएम मुंशी ने हैदराबाद को “मुक्त” करवाया था. तेलंगाना और आंध्रप्रदेश के लोगों को सरदार पटेल का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उनकी दूरदृष्टि के कारण भारत के बीचोंबीच एक पाकिस्तान बनने से बच गया. अन्यथा निज़ाम का प्रधानमंत्री कासिम रिज़वी तत्कालीन निज़ाम शासन में हिन्दुओं की ऐसी दुर्गति करता कि हम कश्मीर के साथ-साथ हैदराबाद को भी याद रखते... निज़ाम की नीयत शुरू से भारत के साथ मिलने की नहीं थी, वह इतनी सरलता से अपना इस्लामी राज्य छोड़ने को तैयार नहीं था. लगभग दो लाख हत्यारे और लुटेरे इस्लामी रज़ाकारों ने उसे समझा दिया था कि चाहे खून की नदियाँ बहानी पड़ें, लेकिन हम केवल पाकिस्तान में शामिल होंगे, भारत में नहीं... परन्तु अंततः भारतीय सेना के सामने यह विरोध केवल पांच दिन ही टिक पाया. कासिम रिज़वी जो कि मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (MIM) का संस्थापक था, वह इस पराजय को कभी नहीं पचा पाया. 


आईये अब हम देखते हैं कि आखिर हैदराबाद के वर्तमान ओवैसी बन्धु हिन्दुओं के प्रति इतना ज़हर क्यों उगलते हैं? ओवैसियों के काले इतिहास को जानने-समझने के बाद आपके सामने तस्वीर पूरी तरह साफ़ हो जाएगी कि आखिर सरदार पटेल कितने दूरदृष्टि वाले नेता थे और नेहरू कितने कमज़ोर व अल्पदृष्टि वाले. अभी तक आपने भारत की आज़ादी और 1948 तक निज़ाम और रज़ाकारों की इस्लामी कट्टरता व पाकिस्तान प्रेम के बारे में जाना... अब आगे बढ़ते हैं... अंग्रेजों के जाने के बाद उस समय की अधिकाँश रियासतों, राजे-रजवाड़ों ने खुशी-खुशी भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार किया और आज जो भारत हम देखते हैं, वह इन्हीं विभिन्न रियासतों से मिलकर बना. उल्लेखनीय है कि उस समय कश्मीर को छोड़कर देश की बाकी रियासतों को भारत में मिलाने का काम सरदार पटेल को सौंपा गया था, जिसे उन्होंने बखूबी अंजाम दिया. नेहरू ने उस समय कहा था कि कश्मीर को मुझ पर छोड़ दो, मैं देख लूँगा. इस एकमात्र रियासत को भारत में मिलाने का काम अपने हाथ में लेने वाले नेहरू की बदौलत, पिछले साठ वर्ष में कश्मीर भारत की छाती पर नासूर ही बना हुआ है. ऐसा ही एक नासूर दक्षिण भारत में “निजाम राज्य” भी बनने जा रहा था. सरदार पटेल ने निजाम से आग्रह किया कि भारत में मिल जाईये, हम आपका पूरा ख़याल रखेंगे और आपका सम्मान बरकरार रहेगा. निजाम रियासत की बहुसंख्य जनता हिन्दू थी, जबकि शासन निजाम का ही होता था. लेकिन निजाम का दिल पाकिस्तान के लिए धड़क रहा था. वे ऊहापोह में थे कि क्या करें? चूँकि हैदराबाद की भौगोलिक स्थिति भी ऐसी नहीं थी, कि वे पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के साथ को जमीनी तालमेल बना सकें, क्योंकि बाकी चारों तरफ तो भारत नाम का गणराज्य अस्तित्व में आ ही चुका था. फिर निजाम ने ना भारत, ना पाकिस्तान अर्थात “स्वतन्त्र” रहने का फैसला किया. निजाम की सेना में फूट पड़ गई, और दो धड़े बन गए. पहला धड़ा जिसके नेता थे शोएबुल्लाह खान और इनका मानना था कि पाकिस्तान से दूरी को देखते हुए यह संभव नहीं है कि हम पाकिस्तानी बनें, इसलिए हमें भारत में विलय स्वीकार कर लेना चाहिए, लेकिन दूसरा गुट जो “रजाकार” के नाम से जाना जाता था वह कट्टर इस्लामी समूह था, और उसे यह गुमान था कि मुसलमान हिंदुओं पर शासन करने के लिए बने हैं और मुग़ल साम्राज्य फिर वापस आएगा. रजाकारों के बीच एक व्यक्ति बहुत लोकप्रिय था, जिसका नाम था कासिम रिज़वी. 

कासिम रिज़वी का स्पष्ट मानना था कि निजाम को दिल्ली से संचालित “हिंदुओं की सरकार” के अधीन रहने की बजाय एक स्वतन्त्र राज्य बने रहना चाहिए. अपनी बात मनवाने के लिए रिज़वी ने सरदार पटेल के साथ कई बैठकें की, परन्तु सरदार पटेल इस बात पर अड़े हुए थे कि भारत के बीचोंबीच एक “पाकिस्तान परस्त स्वतंत्र राज्य” मैं नहीं बनने दूँगा. कासिम रिज़वी धार्मिक रूप से एक बेहद कट्टर मुस्लिम था. सरदार पटेल के दृढ़ रुख से क्रोधित होकर उसने रजाकारों के साथ मिलकर निजाम रियासत में उस्मानाबाद, लातूर आदि कई ठिकानों पर हिन्दुओं की संपत्ति लूटना, हत्याएँ करना और हिन्दुओं को मुस्लिम बनाने जैसे “पसंदीदा” कार्य शुरू कर दिए. हालाँकि कासिम के इस कृत्य से निजाम सहमत नहीं थे, लेकिन उस समय तक सेना पर उनका नियंत्रण ख़त्म हो गया था. इसी बीच कासिम रिज़वी ने भारत में विलय की पैरवी कर रहे शोएबुल्ला खान की हत्या करवा दी. मजलिस इत्तेहादुल मुसलमीन (MIM) का गठन नवाब बहादुर यारजंग और कासिम रिजवी ने सन 1927 में किया था, जब हैदराबाद में उन्होंने इसे एक सामाजिक संगठन के रूप में शुरू किया था. लेकिन जल्दी ही इस संगठन पर कट्टरपंथियों का कब्ज़ा हो गया और यह सामाजिक की जगह धार्मिक-राजनैतिक संगठन में बदल गया. 1944 में नवाब जंग की असमय अचानक मौत के बाद कासिम रिज़वी MIM का मुखिया बना और अपने भाषणों की बदौलत उसने “रजाकारों” की अपनी फ़ौज खड़ी कर ली (हालाँकि आज भी हैदराबाद के पुराने बाशिंदे बताते हैं कि नवाब जंग कासिम के मुकाबले काफी लोकप्रिय और मृदुभाषी था, और कासिम रिजवी ने ही जहर देकर उसकी हत्या कर दी). MIM के कट्टर रुख और रजाकारों के अत्याचारों के कारण 1944 से 1948 तक निजाम राजशाही में हिंदुओं की काफी दुर्गति हुई. 

सरदार पटेल, MIM और कासिम की रग-रग से वाकिफ थे. October Coup – A Memoir of the Struggle for Hyderabad नामक पुस्तक के लेखक मोहम्मद हैदर ने कासिम रिजवी से इंटरव्यू लिया था उसमें रिजवी कहता है, “निजाम शासन में हम भले ही सिर्फ बीस प्रतिशत हों, लेकिन चूँकि निजाम ने 200 साल शासन किया है, इसका अर्थ है कि हम मुसलमान शासन करने के लिए ही बने हैं”, इसी पुस्तक में एक जगह कासिम कहता है, “फिर एक दिन आएगा, जब मुस्लिम इस देश पर और निजाम हैदराबाद पर राज करेंगे”. जब सरदार पटेल ने देखा कि ऐसे कट्टर व्यक्ति के कारण स्थिति हाथ से बाहर जा रही है, तब भारतीय फ़ौज ने “ऑपरेशन पोलो” के नाम से एक तगड़ी कार्रवाई की और रजाकारों को नेस्तनाबूद करके 18 सितम्बर 1948 को हैदराबाद जीतकर भारत द्वारा अधिगृहीत करवा दिया. सरदार पटेल ने MIM पर प्रतिबन्ध लगा दिया, और कासिम रिजवी को गिरफ्तार कर लिया गया. चूँकि उस पर कमज़ोर धाराएँ लगाई गईं थीं, और उसने भारत सरकार की यह शर्त मान ली थी कि रिहा किए जाने के 48 घंटे के भीतर वह भारत छोड़कर पाकिस्तान चला जाएगा, इसलिए सिर्फ सात वर्ष में अर्थात 1957 में ही वह जेल से बाहर आ गया. माफीनामे की शर्त के मुताबिक़ उसे 48 घंटे में भारत छोड़ना था. कासिम रिजवी ने ताबड़तोड़ अपने घर पर MIM की विशेष बैठक बुलाई. 

डेक्कन क्रॉनिकल में इतिहासकार मोहम्मद नूरुद्दीन खान लिखते हैं कि भारतीय फ़ौज के डर से कासिम रिजवी के निवास पर हुई इस आपात बैठक में MIM के 120 में से सिर्फ 40 प्रमुख पदाधिकारी उपस्थित हुए. इस बैठक में कासिम ने यह राज़ खोला कि वह भारत छोड़कर पाकिस्तान जा रहा है, और अब सभी लोग बताएँ कि “मजलिस” की कमान संभालने में किसकी रूचि है? उस बैठक में मजलिस (MIM) में भर्ती हुआ एक युवा भी उत्सुकतावश पहुँचा हुआ था, जिसका नाम था अब्दुल वाहिद ओवैसी (अर्थात वर्तमान असदउद्दीन ओवैसी के दादा). बैठक में मौजूद वरिष्ठ नवाब मीर खादर अली खान ने ओवैसी का नाम प्रस्तावित किया और रिजवी ने इस पर अपनी सहमति की मुहर लगाई और पाकिस्तान चला गया. वह दिन है, और आज का दिन है... तब से MIM अर्थात कट्टर “मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन” पर सिर्फ ओवैसी परिवार का पूरा कब्ज़ा है. 

ओवैसी परिवार का काला इतिहास जानने-समझने के लिए नीचे दी गई लिंक पर इस लेख का पूर्व प्रकाशित भाग अवश्य पढ़ें... 


धन्यवाद... 

Sunday, October 2, 2016

Ideological Shift or Power Hunger - Changed BJP



विचारधारा से भटकाव, और संघ से विमुखता... – बदली हुई भाजपा


कहावत है की “आधी छोड़, पूरी को धाए, न आधी मिले न पूरी पाए”. अर्थात हाथ में मौजूद आधी रोटी को छोड़कर पूरी रोटी लपकने के चक्कर में हमेशा ऐसा होता है की हाथ में जो आधी रोटी रखी है, वह भी छिन जाती है. जिस समय भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को गोवा में संघ के कार्यकर्ता काले झण्डे दिखा रहे थे, उस समय भाजपा और संघ के कई विचारकों के दिमाग में यही उक्ति कौंधी होगी. भाजपा जैसी “अनुशासित” कही जाने वाली पार्टी के अध्यक्ष को प्रोफ़ेसर सुभाष वेलिंगकर के नेतृत्व में संघ के ही कार्यकर्ता काले झण्डे दिखाएँ और नारेबाजी करें, तो कोई सामान्य गैर-राजनैतिक व्यक्ति भी बता सकता है की स्थिति वाकई गंभीर है. परन्तु इसके समाधान की दिशा में कदम बढ़ाना तो दूर, भाजपा नेतृत्व के दबाव में आकर संघ मुख्यालय से प्रोफ़ेसर सुभाष वेलिंगकर को उनकी संघ संबंधी सभी जिम्मेदारियों से मुक्त करने संबंधी आदेश आ गया. 


“...भाजपा जब भी विपक्ष में होती है तब उसके मुद्दे कुछ और होते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद उसके सुर बदल जाते हैं...” ऐसा आरोप अभी तक विपक्षी लगाते थे, परन्तु अब भाजपा और संघ के भीतर से ही आवाज़ें उठने लगी हैं कि “सत्ता प्रेम” (या कहें कि सत्ता का नशा) भाजपा पर ऐसा भारी हो चला है कि यह पार्टी तेजी से अपनी “वैचारिक जमीन” छोडती चली जा रही है. यानी जो पार्टी और संगठन अपनी विचारधारा से ही पहचाना जाता था, अब वही केवल सत्ता पाने और बचाए रखने के लिए जिस तरह अपनी मूल विचारधारा से कटता जा रहा है, वह दूसरों के लिए आश्चर्यजनक और पार्टी के समर्पित, निष्ठावान और जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए दुखद अनुभव लेकर आ रहा है. इस लेख में ऐसे ही कुछ “वैचारिक स्खलन” के उदाहरण संक्षेप में समझने की कोशिश करेंगे. ज़ाहिर है सबसे पहले गोवा और प्रोफ़ेसर सुभाष वेलिंगकर... चूंकि गोवा एक बहुत ही छोटा राज्य है, और फिलहाल “केवल दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र NCR” में विचरने वाले तथाकथित “राष्ट्रीय मीडिया” में इस राज्य के बारे में अधिक कवरेज नहीं दिया जाता, इसलिए अधिकाँश पाठकों को गोवा में चल रहे इस वैचारिक घमासान के बारे में पूरी जानकारी नहीं होगी. चलिए पहले इसी को समझ लेते हैं.... 

सुभाष वेलिंगकर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, फिर भी जो लोग नहीं जानते उनके लिए संक्षेप में यह जानना जरूरी है कि वेलिंगकर गोवा में संघ की ओर से नींव का पत्थर माने जाते हैं. जिस समय पूरे गोवा में संघ की केवल एक शाखा लगा करती थी, यानी लगभग पचास साल पहले, उसमें भी वेलिंगकर सहभागी हुआ करते थे. इन पचास-पचपन वर्षों में प्रोफ़ेसर सुभाष वेलिंगकर ने मनोहर पर्रीकर से लेकर पार्सेकर जैसे कई भाजपा नेताओं को सिखाया-पढ़ाया और परदे के पीछे रहकर उन्हें राजनैतिक रूप से खड़ा करने में मदद की. तो फिर ऐसा क्या हुआ कि सुभाष वेलिंगकर जैसे खाँटी संघी और जमीनी व्यक्ति को पदमुक्त करने की नौबत आ गई? इसकी जड़ में भाजपा को लगी सत्ता की लत और उनकी वादाखिलाफी. आईये देखते हैं कि आखिर हुआ क्या है... 


“वेटिकन पोषित” मीडिया ने हमें यह बताया है कि प्रोफ़ेसर वेलिंगकर अंग्रेजी माध्यम स्कूलों का विरोध कर रहे थे, इसलिए उन्हें हटा दिया गया... लेकिन यह अर्धसत्य” है. असल में सन 1990 से गोवा सरकार की यह नीति रही है कि सरकार केवल कोंकणी और मराठी भाषा में पढ़ाने वाले प्राथमिक विद्यालयों को अनुदान देगी. इसका मतलब यह नहीं था कि गोवा में अंग्रेजी स्कूल नहीं चलेंगे, वे भी चलते रहे, लेकिन उन्हें शासकीय अनुदान नहीं मिलता था, वे चर्च के अपने निजी स्रोतों से पैसा लाते और स्कूल चलाते थे. अर्थात 2011 तक स्थिति यह थी कि कोंकणी भाषा में पढ़ाने वाले 135 स्कूल, मराठी भाषा में पढ़ाने वाले 40 स्कूल शासकीय अनुदान प्राप्त करते थे, और अंग्रेजी माध्यम के किसी भी स्कूल को अनुदान नहीं दिया जाता था. सन 2011 के काँग्रेस शासन में यह नीति बदली गई. चर्च और अंग्रेजी प्रेमी पालकों के दबाव में गोवा की काँग्रेस सरकार ने अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को भी शासकीय अनुदान देने की घोषणा कर दी. इसका नतीजा यह हुआ कि लगभग 130 स्कूल रातोंरात इसका फायदा उठाकर “केवल अंग्रेजी माध्यम” के स्कूल बन गए, ताकि अंग्रेजी के दीवानों को आकर्षित भी कर सकें और सरकारी अनुदान भी ले सकें. ये सभी स्कूल चर्च संचालित थे, जो उस समय तक मजबूरी में कोंकणी और मराठी भाषा के माध्यम से पढ़ाते थे, लेकिन चूँकि पढ़ने वाले बच्चों की संख्या काफी मात्रा में थी, इसलिए फीस का लालच तो था ही, इसलिए बन्द करने का सवाल ही नहीं उठता था, परन्तु जैसे ही “अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को भी” शासकीय अनुदान मिलेगा, यह घोषित हुआ, इन्होंने कोंकणी और मराठी भाषा को तिलांजली दे दी. 

2012 में मनोहर पर्रीकर के नेतृत्त्व में गोवा विधानसभा का चुनाव लड़ा गया. इसमें पर्रीकर ने चर्च के साथ रणनीतिक गठबंधन किया लेकिन साथ ही संघ (यानी वेलिंगकर) को यह आश्वासन भी दिया कि अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को जो अनुदान दिया जा रहा है, वह बन्द कर देंगे. छः जून 2012 को पर्रीकर सरकार ने अधिसूचना जारी करके कहा कि सरकार अब पुनः कोंकणी और मराठी भाषा के स्कूलों को अनुदान देगी, लेकिन जो स्कूल 2011 में “केवल अंग्रेजी माध्यम” स्कूल में परिवर्तित हो गए हैं, उनकी सरकारी सहायता भी जारी रहेगी. यहाँ तक कि उस अधिसूचना में यह भी लिख दिया गया कि केवल वही अंग्रेजी माध्यम स्कूल, जो अल्पसंख्यकों द्वारा चलाए जाते हैं, उन्हीं को सरकारी पैसा मिलेगा. यह सरासर वेलिंगकर के “भारतीय भाषा बचाओ आंदोलन” और उनसे किए गए वादे के साथ धोखाधड़ी थी. इस निर्णय ने वेलिंगकर को बुरी तरह नाराज कर दिया, लेकिन चर्च के दबाव में पर्रीकर सरकार ने अपना निर्णय नहीं बदला. पर्रीकर के केन्द्र में जाने के बाद लक्ष्मीकांत पार्सेकर मुख्यमंत्री बने, और दस अगस्त को ही उन्होंने भी घोषणा कर दी कि अल्पसंख्यकों (यानी ईसाई) द्वारा संचालित अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को अनुदान जारी रहेगा. 


प्रोफ़ेसर सुभाष वेलिंगकर के क्रोध की मूल वजह यह भी है कि गोवा की भाजपा सरकार ने शासकीय अनुदान की यह मिठाई “केवल” अल्पसंख्यक संस्थानों द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों को ही दी है. यानी यदि कोई हिन्दू व्यक्ति अंग्रेजी माध्यम का स्कूल चलाए तो उसे शासकीय अनुदान नहीं मिलेगा. भारत में शिक्षा को लेकर भेदभाव निजी अथवा सरकारी से ज्यादा “बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक” का है. इसीलिए मध्यान्ह भोजन से लेकर शिक्षा का अधिकार तक जब भी कोई क़ानून अथवा नियम बनाया जाता है, तो वह केवल बहुसंख्यकों द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों पर सख्ती से लागू होता है, जबकि अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित स्कूलों को इसमें छूट मिलती है. वेलिंगकर के नाराज होने की असल वजह यही थी कि 1990 से लेकर 2011 तक जो नीति थी, उसी को भाजपा ने पुनः लागू क्यों नहीं किया? जबकि भाजपा खुद भी “भारतीय भाषाओं” और हिन्दी-मराठी-कोंकणी के प्रति अपना प्रेम जताती रही है, फिर सत्ता में आने के बाद चर्च के सामने घुटने टेकने की क्या जरूरत है? लेकिन चूँकि पर्रीकर को गोवा में जीत इसीलिए मिली थी कि चर्च ने उनका साथ दिया था, इसलिए वे चर्च के अहसानों तले दबे हुए थे. उधर केन्द्र में प्रकाश जावड़ेकर ने संसद में यह बयान देकर कि, “अल्पसंख्यक संस्थानों के शिक्षा व अनुदान नियमों के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की जाएगी...” वेलिंगकर को और भी भड़का दिया. 

प्रोफ़ेसर वेलिंगकर पिछले दस वर्ष से कोंकणी और मराठी भाषा को बचाने के लिए “भारतीय भाषा बचाओ आंदोलन” (BBSM) के नाम से आंदोलन चलाए हुए हैं. संघ के तपे-तपाए नेता होने के कारण जनता को समझाने व एकत्रित करने में वे माहिर हैं, इसीलिए सैकड़ों जमीनी संघ कार्यकर्ता भी उनके साथ हैं. इस समस्या का एकमात्र हल यही है कि केन्द्र सरकार संविधान के 93वें संशोधन पर पुनर्विचार करे और शिक्षा का अधिकार क़ानून की पुनः समीक्षा करके उसमें समुचित बदलाव लाए. अन्यथा यह समस्या पूरे देश में चलती ही रहेगी और अल्पसंख्यक संस्थानों को हमेशा “रक्षा कवच” मिला रहेगा, और वे अपनी मनमानी करते रहेंगे. ईसाई संस्थाएँ अपने अनुसार अंग्रेजी को प्राथमिकताएँ देंगी जबकि मदरसा संचालित स्कूल उर्दू को. इस बीच बहुसंख्यक संचालित संस्थाओं का हिन्दी (एवं क्षेत्रीय भाषाओं) के माध्यमों से चलने वाले स्कूल दुर्दशा का शिकार बनेंगे और अंग्रेजी का प्रभुत्व बढ़ता ही जाएगा. जापान, रूस, कोरिया व चीन जैसे कई देशों में यह सिद्ध हुआ है कि “प्राथमिक शिक्षा” केवल और केवल मातृभाषा में ही होना चाहिए, अन्यथा बच्चे के मानसिक विकास में बाधा आती है. अंग्रेजी को कक्षा आठ या दस के बाद लागू किया जा सकता है. 

बहरहाल, पिछले दो वर्ष से इस मुद्दे को लेकर वेलिंगकर लगातार पर्रीकर और पार्सेकर पर शाब्दिक हमले करते रहे हैं. चूँकि वेलिंगकर भाजपा में किसी पद पर नहीं थे, इसलिए उन्हें कोई गंभीरता से नहीं सुन रहा था, परन्तु इस मुद्दे को लेकर वेलिंगकर के सैकड़ों समर्थकों ने जिस तरह गोवा दौरे के समय भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को काले झण्डे दिखाए थे, उसने मामला और बिगाड़ दिया है. संघ मुख्यालय ने इसे गंभीरता से लेते हुए अंततः प्रोफ़ेसर सुभाष वेलिंगकर को बाहर का रास्ता दिखा ही दिया, और ऐसा लगता है कि आगे भी गोवा सरकार पर चर्च का दबाव एवं अंग्रेजी का प्रभुत्व बरकरार ही रहेगा.

इस घटनाक्रम की राजनैतिक परिणति कैसे होती है यह तो जल्दी ही होने वाले विधानसभा चुनावों में पता चल ही जाएगी, लेकिन जिस तरह से वेलिंगकर के समर्थन में शिवसेना, भाजपा, संघ और खासकर महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के सदस्य खुल्लमखुल्ला रूप में जुड़ रहे हैं, उसे देखते हुए भाजपा की राह आसान नहीं होगी. उल्लेखनीय है कि गोमांतक पार्टी का भी मुख्य मुद्दा “भाषा बचाओ, गोवा की मूल संस्कृति बचाओ” ही रहा है. जिस तरह वेलिंगकर खुलेआम मनोहर पर्रीकर और पार्सेकर पर विभिन्न आरोप लगा रहे हैं, इससे लगता है कि मामला बेहद गंभीर है, क्योंकि प्रोफ़ेसर वेलिंगकर ने कभी भी कोई राजनैतिक महत्वाकांक्षा नहीं दिखाई है. बताया जाता है कि वेलिंगकर के मुख्य मुद्दे के समर्थन में संघ के लगभग दस हजार कार्यकर्ता भी हैं जो फिलहाल खुलकर सामने नहीं आ रहे हैं. 

देखना होगा कि भाषा बचाओ आंदोलन और शिक्षा में चर्च के दखल का यह मुद्दा गोवा के निवासियों के दिल को कितना छूता है, लेकिन संघ और भाजपा ने जिस तरह से वेलिंगकर के मुद्दों को लटकाए रखा, उनसे वादाखिलाफी की और प्रकरण का बड़े ही भद्दे तरीके से समापन किया, वह पार्टी और खासकर विचारधारा के लिए निश्चित ही चिंताजनक बात है... जैसा कि पहले कहा गया, पिछले दो-ढाई वर्ष में ऐसे कुछ मुद्दे सामने आए हैं, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि भाजपा के सामने अब केवल “सत्ता पाना” और “सत्ता बचाए रखना” ये दो ही उद्देश्य रह गए हैं, जबकि पार्टी की मूल पहचान अर्थात “विचारधारा” से पिण्ड छुडाया जा रहा है. 


अब बात चर्च की चली ही है तो हाल ही में एक और मुद्दा सामने आया, जिसमें स्पष्ट रूप से दिखाई दिया कि केन्द्र की मोदी सरकार न सिर्फ संघ की विचारधारा को दरकिनार करने में लगी हुई है, बल्कि अपने “मूलभूत मतदाताओं” को भी नाराज करने की हद तक जाने को तैयार है. जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ कोलकाता की मदर टेरेसा को “संत” घोषित करने वाले कार्यक्रम की. संघ अथवा भाजपा से जुड़े हुए सभी सामान्य लोग जानते हैं, कि कोलकाता में “मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी” नामक संस्था, जिसकी कर्ता-धर्ता मदर टेरेसा थीं, वह पिछले कई वर्षों से भारत के विभिन्न राज्यों में ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में “सेवा” के नाम पर धर्मांतरण के काम में लगी हुई है. संघ से संबद्ध कई संस्थाओं जैसे वनवासी परिषद्, विश्व हिन्दू परिषद् अथवा सेवा भारती इत्यादि लगातार मदर टेरेसा के तथाकथित सेवा कार्यों की तीखी आलोचना करते रहे हैं. संघ से जुडी इन संस्थाओं की जमीनी रिपोर्ट बताती है कि वेटिकन ने मदर टेरेसा रूपी अपने इस “मोहरे” का चन्दा उगाहने तथा धर्मांतरण करने में बड़ा ही शानदार उपयोग किया है. पिछले कई वर्षों से संघ-भाजपा के सभी बड़े-छोटे नेता मदर टेरेसा के “तथाकथित चमत्कार” पर सवाल उठाते आए हैं, खिल्ली उड़ाते आए हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर मोदी सरकार की ऐसी कौन सी मजबूरी थी कि “संत” की उपाधि दिए जाने वाले भव्य कार्यक्रम में भारत सरकार सुषमा स्वराज जैसी कद्दावर नेता (और विदेश मंत्री) को आधिकारिक रूप से वहाँ भेजे? यदि मोदी सरकार “विचारधारा” पर ही अटल होती, तो वह संघ की चिर-परिचित लाईन पर ही टिकी रहती और विदेश सेवा के किसी कनिष्ठ अधिकारी को भी वहाँ भेज सकती थी. ऐसा करने से विदेशों में “मिशनरी” को कड़ा सन्देश भी मिल जाता और निमंत्रण मिलने पर प्रतिनिधिमंडल भेजे जाने की औपचारिकता भी पूरी हो जाती. लेकिन ऐसा नहीं किया गया, और मदर टेरेसा को “संत” बनाकर धर्मांतरण का जो नया “ब्राण्ड एम्बेसडर” गढा गया है, उस पर मोदी सरकार की “आधिकारिक” मुहर भी लग गई. 


इस बीच “संतत्व” के इस महिमामंडन और अंधविश्वास फैलाने के इस दुष्कृत्य के खिलाफ लिखने वाले राष्ट्रवादी विचारकों को, मीडिया और सोशल मीडिया पर कई तथाकथित “कूटनीतिज्ञ” और “रणनीतिज्ञ” बार-बार यह बताते रहे कि मदर टेरेसा के इस कार्यक्रम में जाना कितना जरूरी था. जबकि वास्तविकता यह है कि वेटिकन में आयोजित इस फूहड़ता का कई देशों ने बहिष्कार किया, भारत सरकार भी टाल सकती थी. परन्तु भारत की नई-नवेली “राष्ट्रवादी सरकार” इतनी हिम्मत भी न जुटा सकी, कि कार्यक्रम का पूर्ण बहिष्कार न सही, लेकिन कम से कम अपनी विचारधारा पर अटल रहते हुए मिशनरी की तथाकथित सेवा, उनके NGOs के धंधे, वेटिकन के कारनामों एवं धर्मांतरण के खिलाफ कोई कड़ा सन्देश दे पाती. क्योंकि गोवा, मिजोरम, नगालैंड और तमिलनाडु-आंध्र के ईसाई वोटों पर इनकी “गिद्ध-दृष्टि” लगी हुई है, जो भाजपा को मिलेंगे ही ऐसा कहना मुश्किल है. 

ऊपर जो दोनों मुद्दे (गोवा का भारतीय भाषा बचाओ और मदर टेरेसा के कथित चमत्कार का महिमामंडन), यह दोनों ही मुद्दे ऐसे थे जिन पर कोई “राष्ट्रवादी सरकार” चाहती तो आराम से अपनी मूल विचारधारा पर टिके रहकर निर्णय कर सकती थी. इसके लिए ना तो संसद के दोनों सदनों में पूर्ण बहुमत की आवश्यकता थी और ना ही कोई मजबूरी थी. परन्तु शायद हिम्मत नहीं जुट रही. ऐसा ही एक और मुद्दा है, जहाँ केन्द्र और राज्यों की भाजपा सरकारें बड़े आराम से अपने बहुमत के बल पर निर्णय कर सकती हैं... यह मुद्दा है “मंदिरों की संपत्ति” का मुद्दा. जैसा कि सभी जानते हैं, भारत में हिन्दू मंदिरों की संपत्ति पर शासकीय नियंत्रण होता है. मंदिरों का प्रबंधन, रखरखाव, इसके ट्रस्ट और धन-संपत्ति पर राज्य शासन का कब्ज़ा रहता है. मंदिरों को सरकारी अधिग्रहण से बाहर निकालने और मंदिरों की संपत्ति और जमीन के दुरुपयोग को रोकने के लिए पिछले कई वर्षों में तमाम धार्मिक संस्थाएँ कानूनी और जमीनी लड़ाई लड़ रही हैं. “कोढ़ में खाज” की स्थिति यह है कि सरकारी नियंत्रण केवल मंदिरों पर ही है, चर्च अथवा मस्जिदों पर नहीं है. जब आठ-नौ राज्यों और केन्द्र में भाजपा की बहुमत से सरकार बन गई, तो भगवान के भोलेभाले भक्तों तथा हिंदूवादी कार्यकर्ताओं को आशा बँधी थी कि शायद मोदी सरकार इस समस्या के हल की दिशा में तत्काल कुछ कदम उठाएगी, संसद में क़ानून पास करवाते हुए मंदिरों को सरकारी चंगुल से मुक्त करने की पहल करेगी. अभी तक तो ऐसा कुछ हुआ नहीं है. 


इसके उलट महाराष्ट्र के चिकित्सा मंत्री गिरीश महाजन ने राज्य सरकार को एक प्रस्ताव बनाकर भेजा है, जिसमें उन्होंने माँग की है कि सिद्धिविनायक, तुलजापुर, महालक्ष्मी, साईबाबा इत्यादि सभी धनवान मंदिरों के ट्रस्ट राज्य शासन को प्रतिमाह एक निश्चित शुल्क दें ताकि इस धन को शासकीय अस्पतालों में खर्च किया जा सके. गिरीश महाजन ने “नैतिकता के उच्च प्रतिमान” स्थापित करते हुए यह भी कहा कि हम चाहते हैं कि मंदिरों में जो पैसा दानस्वरूप आता है व गरीबों की भलाई के लिए खर्च हो. हालाँकि विरोध शुरू होने पर उन्होंने “बैलेंस” बनाने की फूहड़ कोशिश करते हुए “चर्च और मस्जिदों” से भी अपील की, कि वे भी अपने धन का कुछ हिस्सा अस्पतालों में दें (यानी हिन्दू मंदिरों के लिए बाकायदा “लिखित प्रस्ताव”, जबकि चर्च-मस्जिदों से केवल मौखिक अपील...). सिद्धिविनायक ट्रस्ट के अधिकारी नरेंद्र राणे ने तत्काल इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए आँकड़े पेश करते हुए लिखित में बताया कि सिद्धिविनायक मंदिर प्रतिवर्ष चालीस करोड़ रूपए स्वास्थ्य, सेवा एवं अन्य सामाजिक कार्यों के लिए खर्च करता ही है. इसके अलावा सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए इस वर्ष बारह करोड़ रूपए अलग से खर्च किए गए हैं. सरकार को इस मामले में दखल नहीं देना चाहिए. 


उल्लेखनीय है कि 1980 के दशक में केरल के मुख्यमंत्री के करुणाकरण ने गुरुवायूर मंदिर ट्रस्ट पर दबाव बनाकर राज्य कोषालय में दस करोड़ रूपए जमा करवाए थे, ताकि सरकारी राजकोषीय घाटा पूरा किया जा सके. इसी के साथ उन्होंने “भूमि सुधार क़ानून” लागू करके गुरुवायूर मंदिर की 13,000 एकड़ भूमि को केवल 230 एकड़ तक सीमित कर दिया, लेकिन चर्च (जो कि रेलवे के बाद सबसे बड़ा रियल एस्टेट मालिक है) की जमीन को हाथ तक नहीं लगाया. इसी प्रकार पूर्ववर्ती महाराष्ट्र सरकार ने मुम्बई हाईकोर्ट में 2004 में लिखित में स्वीकार किया है कि समाज कल्याण एवं कपड़ा मंत्री विलासराव पाटिल उन्दालकर ने मुम्बई के सिद्धिविनायक मंदिर से एक लाख नब्बे हजार डॉलर निकालकर, किसी ऐसी चैरिटी ट्रस्ट में डाल दिया जो कि नेताओं के परिजनों द्वारा संचालित है. ये तो केवल दो ही उदाहरण हैं, मंदिरों के धन की ऐसी लूट के दर्जनों किस्से हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि यदि भाजपा सरकार की नीयत वाकई में साफ़ है तो उसे गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की तर्ज पर अखिल भारतीय स्तर का “मंदिर प्रबंधन बोर्ड” अथवा “देवस्वम ट्रस्ट” बनाना चाहिए, उसे कानूनी रूप देना चाहिए एवं भारत के सभी मंदिरों की संपत्ति, जमीन, पशु, गहने, शेयर्स इत्यादि इस संस्था के हवाले करना चाहिए. देश के सभी मंदिरों का प्रबंधन, रखरखाव, मंदिर के स्टाफ की नियुक्तियाँ इत्यादि भी यही संस्था देखे, क्योंकि जब सरकार चर्च और मस्जिद के कामकाज में दखल नहीं देती तो फिर मंदिरों को भी उसे मुक्त्त करना ही चाहिए, ताकि मंदिरों के धन का सही सदुपयोग किया जा सके और यह पैसा भ्रष्ट नेताओं और ट्रस्टों में जमे बैठे उनके रिश्तेदारों की कमाई में न चला जाए. केन्द्र की भाजपा सरकार चाहे तो बड़े आराम से इसके लिए क़ानून बनवा सकती है, जिसे पास करवाना मुश्किल नहीं होगा... परन्तु इच्छाशक्ति की कमी साफ़ दिखाई दे रही है. भाजपा सरकार को केवल यह करना है कि संविधान की धारा 26 (जिसके अनुसार “सभी” धर्मों के लोग अपनी-अपनी धार्मिक संस्थाओं को चलाने व प्रबंधन के लिए स्वतन्त्र होंगे) को सही तरीके से लागू करवाना है. इसके अलावा विभिन्न राज्यों ने “हिन्दू धार्मिक एवं पारमार्थिक क़ानून” बना रखे हैं, उन्हें खारिज करते हुए, अखिल भारतीय स्तर का क़ानून बनाते हुए एक संस्था का गठन करना है. परन्तु वे इतना भी नहीं कर पा रहे हैं. इस बीच पिछले कई दशकों से मंदिरों के धन की अबाध लूट जारी है, और कोई सुध लेने वाला भी नहीं, क्योंकि इस खेल में काँग्रेस-भाजपा की मिलीभगत भी है. सवाल उठता है कि मंदिरों में दान करने वाले लोग कौन हैं? और इस पैसे पर किसका अधिकार होना चाहिए यह कैसे खर्च होगा? और “गिद्ध दृष्टि” केवल मंदिरों की आय पर ही क्यों? वह भी भाजपा सरकार के मंत्री द्वारा?? ये कैसी वैचारिक गिरावट है? 


क्या पाठकों को “स्वदेशी जागरण मंच” की याद है? जरूर याद होगा... संघ पोषित यह संगठन लगातार कई वर्षों तक “स्वदेशी वस्तुओं” के समर्थन में आन्दोलन चलाए हुए था. आज यह संगठन कहाँ है, किसी को नहीं पता. यदि बाबा रामदेव ने अपने पुरुषार्थ और ब्राण्ड मार्केटिंग से “पतंजलि” को नई ऊंचाईयों तक नहीं पहुंचाया होता, तो भारत में “स्वदेशी” का कोई नामलेवा तक नहीं बचता. बाबा रामदेव ने जो किया वह उनकी निजी हैसियत और रूचि के अनुसार किया, लेकिन संघ की राजनैतिक बाँह अर्थात भाजपा की राज्य सरकारों और केंद्र सरकार ने स्वदेशी बचाने के लिए अभी तक क्या और कितना किया, जनता को इसकी जानकारी केवल “मेक इन इण्डिया”” और “स्किल इण्डिया”” के नारों से ही पता चल रही है. वास्तविकता यह है की भाजपा के प्रत्येक राज्य का मुख्यमंत्री कम से कम दो बार अमेरिका अथवा चीन का दौरा करके उन देशों से आग्रह कर चूका है कि “हमारे यहाँ आईये, निवेश कीजिए, मुनाफ़ा कमाईये (और स्वदेशी उद्योगों को बर्बाद कर दीजिए...)”. कहाँ है विचारधारा?? या सत्ता मिलते ही गायब हो गई? या फिर विपक्ष में रहकर बतोले देने तथा सत्ता में रहकर शासन चलाने का फर्क समझ में आ गया? आज बाबा रामदेव ने जिस तरह से विदेशी कंपनियों की ईंट से ईंट बजा रखी है, वैसे आठ-दस प्रयास भाजपा की राज्य सरकारों ने अपने-अपने राज्यों में क्यों नहीं आरम्भ किए? “स्मार्ट सिटी” बनाना क्या इतना जरूरी है की हम पश्चिम की नक़ल करते हुए कांक्रीट के जंगल खड़े करते चले जाएँ? गाँवों में जो “असली स्किल” पड़ा हुआ है, उसे बढ़ावा देने की बजाय उन्हें शहरों में लाकर “स्मार्ट मजदूर” बना दें? जब तक ग्रामीण अर्थव्यवस्था और परम्परागत कारीगरी को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा, तब तक वास्तविक “स्वदेशी” कहीं दिखाई नहीं देगा, परन्तु क्या ऐसा हो रहा है? नहीं.. 


मूल विचारधारा से भटकाव का ऐसा ही और उदाहरण है, “इस्लामिक बैंकिंग”. जैसा कि पाठक जानते ही हैं, पिछले काफी समय से इस्लामिक बैंकिंग भारत में अपने पैर पसारने के लिए प्रयासरत है. केरल और पश्चिम बंगाल जैसे मुस्लिम बहुलता वाले राज्यों में “बिना ब्याज” वाली गैर-बैंकिंग आर्थिक संस्थाएँ काम कर ही रही हैं, परन्तु एक आधिकारिक बैंक के रूप में इस्लामिक बैंक की अवधारणा भारतीय संविधान के तहत संभव ही नहीं है. इस योजना के बारे में डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी पहले ही हाईकोर्ट में मुकदमा जीत चुके हैं कि भारत में इस्लामिक बैंकिंग नहीं की जा सकती. परन्तु सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी के विश्वस्त सलाहकार ज़फर सरेशवाला (जो कि उर्दू विश्वविद्यालय के चांसलर भी हैं) ने पिछले ढाई वर्ष में अपने प्रयासों से सऊदी अरब के “इस्लामिक डेवेलपमेंट बैंक” की शाखाएँ भारत में खोलने के लिए पूरा जोर लगाए हुए हैं. हाल ही में मोदी जी की सऊदी अरब यात्रा के दौरान भारत के EXIM बैंक और IDM के बीच 100 मिलियन डॉलर के ऋण लेनदेन संबंधी समझौता किया गया है. साथ ही इस्लामिक डेवेलपमेंट बैंक द्वारा भारत की राष्ट्रीय स्किल एंड एजुकेशन इंस्टीट्यूट (RISE) के साथ भी समझौता किया है, जिसके तहत बैंक गरीबों की मदद के लिए 350 एम्बुलेंस चलाएगी. इस सारी कवायद में पेंच यह है कि इस्लामिक बैंकिंग भारत में शुरू करने के लिए संसद में बिल लाना होगा, क़ानून पास करवाना होगा, संविधान संशोधन की भी जरूरत पड़ेगी. समाचार पत्रों में प्रकाशित ख़बरों के अनुसार यदि काँग्रेस इस पर राजी हो गई, तो निकट भविष्य में भारत में इस्लामिक बैंकिंग के कदम पड़ सकते हैं. कहा जाता है कि यदि ऐसा करना संभव नहीं हुआ, तो सऊदी अरब के इस बैंक को “पिछले दरवाजे” (NBFC, सहकारी समिति, इत्यादि) से प्रवेश करवाया जाएगा. अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि केन्द्र सरकार की “जन-धन योजना” वैसे तो काफी सफल मानी जा रही है, परन्तु सरकार इस बात से चिंतित है कि इसमें मुस्लिमों के खाते नहीं के बराबर खुले हैं. अतः मुस्लिमों के बैंक खाते अधिकाधिक खुलवाने के लिए, उन्हें बैंकिंग की तरफ रिझाने के लिए सरकार ने “इस्लामिक बैंकिंग” का चारा डालने की योजना बनाई है. परन्तु यहाँ मूल सवाल तो वही है कि यदि यह सब करना ही है, तो फिर संघ-भाजपा की उस “मूल विचारधारा” का क्या हुआ, जो इसी प्रस्ताव को लेकर मनमोहन-सोनिया की कड़ी आलोचना के समय दिखाई देती थी. क्या इस कदम से यह सन्देश नहीं जाता कि मोदी सरकार मुस्लिमों के सामने झुक गई है, उन्हें बैंकिंग की छतरी तले लाने की खातिर विचारधारा से “यू-टर्न” लेने लगी है. मदर टेरेसा वाले उदाहरण में भी ठीक यही हुआ है कि जब विपक्ष में थे, तब टेरेसा को कोसते थे, धर्मांतरण के खिलाफ आग उगलते थे, लेकिन सत्ता मिलने के बाद उन्हें “संत” मिलने की आधिकारिक खुशियाँ मनाई जा रही हैं. यह विचारधारा का भटकाव है, या “सत्ता का नशा”? क्या सत्ता से बाहर होने के बाद भाजपा अपने “मूल मतदाताओं” से आँखें मिलकर बात कर पाएगी? 

अभी तक आपने “भारतीय भाषा बचाओ”, “मदर टेरेसा के संतत्व”, “मंदिरों की संपत्ति”, “स्वदेशी जागरण” तथा “इस्लामिक बैंकिंग” जैसे कई विषयों पर भाजपा के “वैचारिक यू-टर्न” के बारे में पढ़ लिया... अब अंत में आप खुद से एक सवाल कीजिए, कि पिछले ढाई साल में लगभग पूरी दुनिया घूम चुके, हमारे प्रिय प्रधानमंत्री, वाराणसी से कुछ ही दूरी पर स्थित अयोध्या में फटे हुए तम्बू में बैठे रामलला के “अस्थायी” मंदिर में दर्शन करने क्यों नहीं गए? यह कदम उठाने से हिंदुओं में कम से कम एक “ठोस सन्देश” तो जाता. भाजपा के “स्थायी मतदाता” इतने समझदार तो हैं, कि वे भी जानते हैं राम मंदिर का मुद्दा केवल अदालत में अथवा संसद में ही सुलझ सकता है, परन्तु एक आम आदमी की हैसियत से उस अस्थायी “राम मंदिर” में दर्शन करने जाने से प्रधानमंत्री को कौन रोक रहा है? मुस्लिमों को खुश करने वाली काँग्रेसी स्टाईल वाली चुनावी राजनीति या “विचारधारा से भटकाव”?? उपरोक्त सभी मुद्दों सहित यह सवाल आज भाजपा के “कोर वोटर” तथा संघ के सभी स्वयंसेवकों के मन को मथ रहा है... अंदरखाने सवाल उठने लगे हैं, कि जब पूर्ण बहुमत की सत्ता है तब विचारधारा से समझौता क्यों किया जा रहा है?  

Thursday, September 22, 2016

Language Distortion due to Mobile and PC



मोबाईल, इंटरनेट के कारण भाषा और व्याकरण विकृत हो रहे हैं... 


आजकल तकनीक का ज़माना है. हर व्यक्ति के हाथ में मोबाईल है, स्मार्टफोन है, लैपटॉप है, इंटरनेट है. इन आधुनिक उपकरणों के कारण संवाद और सम्प्रेषण की गति बहुत तेज हो गई है. पलक झपकते कोई भी सन्देश दुनिया के दुसरे छोर पर पहुँच जाता है. लेकिन यह स्पष्ट रूप से देखने में आ रहा है कि मोबाईल अथवा स्मार्टफोन के जरिये भेजे जाने वाले संदेशों में भाषा और व्याकरण की गंभीर त्रुटियाँ हो रही हैं. इस कारण न सिर्फ हिन्दी, बल्कि अंगरेजी भाषा भी भ्रष्ट और विकृत हो रही है. इस बीमारी का प्रमुख कारण है “जल्दबाजी और अधूरा ज्ञान”. 




आधुनिक नई पीढ़ी हर बात जल्दी और त्वरित गति से चाहती है. उसे हर बात की जल्दी है, इसीलिए मोबाईल पर सन्देश टाईप करते समय भी उसे जल्दबाजी लगी रहती है. उसे यह ध्यान नहीं रहता की वह क्या टाईप कर रहा है, कैसे टाईप कर रहा है, किस भाषा में टाईप कर रहा है, कौन से शब्द उपयोग कर रहा है. सन्देश भेजने की जल्दी में वह How Are You? को भी h r u? टाईप कर रहा है. क्या ऐसा करने से वाकई में समय बच रहा है? नहीं. दस सेकण्ड का समय बचाकर अपनी भाषा भ्रष्ट करना उचित नहीं कहा जा सकता. Why को “Y”, Happy Birthday को HBD, यहाँ तक की Girls को भी Gals बना दिया गया है. यह हालत तो तब है, जबकि प्रत्येक स्मार्टफोन में टाईप करते समय Auto-Correction का विकल्प भी होता है. मोबाईल का एप्प ही आपको सुझाता है की Wat की बजाय What लिखना चाहिए, या goin की बजाय Going लिखें, परन्तु “तेज गति वाली पीढ़ी” के बच्चे उसकी ओर भी ध्यान नहीं देते और अपनी मनमर्जी से कुछ भी ऊटपटांग टाईप करती चली जाती है.... ऐसा करने से भले ही आधे या एक मिनट का समय बच रहा हो, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम बहुत खतरनाक होते हैं, क्योंकि धीरे-धीरे एक समय ऐसा आता है जब व्यक्ति को ऐसा विकृत और गलत लिखने की आदत पड़ जाती है. दिमाग में उन शब्दों का एक निश्चित चित्र बन जाता है और व्यक्ति हमेशा वैसा ही गलत टाईप करने लगता है. यह तो हुई अंगरेजी की बात. यही हालत हिन्दी की भी है. वैसे तो नई पीढ़ी में से अधिकांश बच्चे मोबाईल या पीसी पर हिन्दी में टाईप नहीं कर पाते, लेकिन जो भी कर पाते हैं वे अपने आधे-अधूरे हिन्दी ज्ञान के कारण सही शब्दों का चयन नहीं कर पाते और अर्थ का अनर्थ कर डालते हैं. कुछ ऐसे भी होते हैं जो हिन्दी शब्दों को रोमन में (अर्थात “मेरे को”, “तेरे को” शब्द Meko, Teko, तथा पड़ा को pada) लिखते हैं, जिससे पढने वाले के सामने उसकी स्थिति और भी हास्यास्पद हो जाती है. यह अधूरे ज्ञान की वजह से होता है. 

आजकल स्कूल के समय एवं पढ़ाई की गतिविधियों के कारण घरों में बच्चों द्वारा अंगरेजी/हिन्दी समाचार पत्र पढ़ना लगभग बंद ही हो गया है. इस कारण भाषा एवं व्याकरण के सही शब्द उन्हें पता ही नहीं चलते. स्कूल में भाषा और व्याकरण की जो पढ़ाई होती है, वह “मेकेनिकल” किस्म की होती है, बच्चा पढता है, रटता है और परीक्षा में जाकर उतार देता है. इसके अलावा भाषा और व्याकरण का सत्यानाश गूगल सर्च ने भी किया है. बच्चे अपने कोर्स के बाहर के किसी विषय पर अपने मन से अंगरेजी या हिन्दी में चार पेज भी नहीं लिख सकते. वे तुरंत गूगल बाबा की शरण में दौड़ लगाते हैं. इससे भाषा और व्याकरण कभी नहीं सुधरेगा. 

सबसे पहले घर में रोज सुबह कम से कम बीस मिनट कोई अंगरेजी या हिन्दी अखबार पढने की आदत डालें, सुबह पढ़े हुए अखबार में से उसी दिन रात को किसी भी विषय पर कम से कम एक पृष्ठ (जिसमें दस-पंद्रह मिनट लगेंगे) अपने दिमाग से लिखने की आदत डालें. सिर्फ इतना भर करने से मोबाईल और इंटरनेट के कारण जो भाषा विकृति आ रही है, उसे दूर किया जा सकता है.