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Wednesday 17 March 2010

नित्यानन्द स्वामी के बहाने नरेन्द्र मोदी पर हमला :- NDTV की चालबाजियाँ और "मिशनरी" की भूमिका… ... Nityanand Swami, Narendra Modi, Anti-Hindu Media Bias

दक्षिण भारत में फ़िलहाल एक हंगामा मचा हुआ है, नित्यानन्द स्वामी को चेन्नई पुलिस ने एक सीडी और शिकायत के आधार पर गिरफ़्तार किया है। ऐसा आरोप हैं कि नित्यानन्द स्वामी के कई महिलाओं से सम्बन्ध रहे हैं और एक तमिल अभिनेत्री के साथ उनकी अश्लील सीडी उन्हीं के आश्रम में उनके शिष्य रह चुके एक व्यक्ति ने बनाई है। यह तो हुआ मूलरूप से बना हुआ केस, लेकिन जैसा कि हमेशा होता आया है, भारतीय मीडिया ने इस कहानी में प्रारम्भ से ही “हिन्दुत्व विरोधी रंग” भरना शुरु कर दिया था।

प्रणव “जेम्स” रॉय के चैनल NDTV ने सबसे पहले नित्यानन्द स्वामी के साथ नरेन्द्र मोदी की तस्वीरें दिखाईं और चिल्ला-चिल्लाकर नरेन्द्र मोदी को इस मामले में लपेटने की कोशिश की (गुजरात के दो-दो चुनावों में बुरी तरह से जूते खाने के बाद NDTV और चमचों के पास अब यही एक रास्ता रह गया है मोदी को पछाड़ने के लिये)। लेकिन जैसे ही अगले दिन से “ट्विटर” पर स्वामी नित्यानन्द की तस्वीरें गाँधी परिवार के चहेते एसएम कृष्णा और एपीजे अब्दुल कलाम के साथ भी दिखाई दीं, तुरन्त NDTV का मोदी विरोधी सुर धीमा पड़ गया (हालांकि ढेर सारे “हिन्दू विरोधी पत्रकार” अभी भी लगे हुए हैं इसे चबाने में)। नित्यानन्द के स्टिंग ऑपरेशन मामले को सही ठहराने के लिये NDTV ने नारायणदत्त तिवारी वाले मामले का सहारा लिया और दोनों को एक ही पलड़े पर रखने की कोशिश की। जबकि तिवारी एक संवैधानिक पद पर थे, उन्होंने राजभवन और अपने पद का दुरुपयोग किया और तो और होली के दिन भी वह लड़कियों से घिरे नृत्य कर रहे थे। नित्यानन्द जो भी कर रहे थे अपने आश्रम के बेडरूम में कर रहे थे, बगैर किसी प्रलोभन या दबाव के, इसलिये इन दोनों मामलों की तुलना तो हो ही नहीं सकती। नित्यानन्द अगर दोषी है तो सजा मिलनी ही चाहिये…  (हालांकि जैसे-जैसे धागे सुलझ रहे हैं मामला संदिग्ध होता जा रहा है, क्योंकि पता चला है कि पुलिस को सीडी देकर आरोप लगाने वाला व्यक्ति “कुरुप्पन लेनिन” एक धर्म-परिवर्तित ईसाई है और यह व्यक्ति पहले एक फ़िल्म स्टूडियो में काम कर चुका है तथा "वीडियो मॉर्फ़िंग" में एक्सपर्ट है)।

अब आते हैं मुख्य मामले पर, 6M (मार्क्स, मुल्ला, मिशनरी, मैकाले, माइनो और मार्केट) के हाथों बिके हुए भारतीय मीडिया ने स्वामी नित्यानन्द को सीडी सामने आते ही तड़ से अपराधी घोषित कर दिया है, ठीक उसी तरह जिस तरह कभी संजय जोशी को किया था (हालांकि बाद में सीडी फ़र्जी पाई गई), या जिस तरह से  कांची के वयोवृद्ध शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती को तमिलनाडु की DMK सरकार ने गिरफ़्तार करके सरेआम बेइज्जत किया था। जब भी कोई हिन्दू “आईकॉन” किसी भी सच्चे-झूठे मामले में फ़ँसे तो मीडिया उन्हें “अपराधी” घोषित करने में देर नहीं करता… और इस समय किसी मानवाधिकारवादी के आगे-पीछे कहीं से भी “कानून अपना काम करेगा…” वाला सुर नहीं निकलता। जैसे ही मीडिया में आया कि मालेगाँव धमाके में पाई गई मोटरसाईकिल साध्वी प्रज्ञा की थी (जो काफ़ी पहले उन्होंने बेच दी थी), कि तड़ से “हिन्दू आतंकवाद” नामक शब्द गढ़कर हिन्दुओं पर हमले शुरु…। फ़िर चाहे जेल में कसाब और अफ़ज़ल ऐश कर रहे हों, लेकिन साध्वी प्रज्ञा को अण्डे खिलाने की कोशिश या गन्दी-गन्दी गालियाँ देना हो… महिला आयोग, नारीवादी संगठन सब कहीं दुबक कर बैठ जाते हैं, क्योंकि मीडिया ने तो पहले ही उन्हें अपराधी घोषित कर दिया है। भारत के कितने अखबारों और चैनलों ने वेटिकन और अन्य पश्चिमी देशों में चर्च की आड़ में चल रहे देह शोषण के मामलों को उजागर किया है? चलिये वेटिकन को छोड़िये, केरल में ही सैकड़ों मामले सामने आ चुके हैं कितने लोगों को पता है… और वेटिकन तो अब इस तरफ़ काफ़ी आगे बढ़ चुका है, उधर सिर्फ़ महिलाओं के ही साथ यौन शोषण नहीं होता बल्कि पुरुषों के साथ भी “गे-सेक्स” के मामले सामने आ रहे हैं… द गार्जियन की खबर पढ़िये…

http://www.guardian.co.uk/world/2010/mar/04/vatican-gay-sex-scandal

बेंगलूरु के मठ वाले नित्यानन्द दोषी हैं या नहीं यह बाद में पता चलेगा, लेकिन उनके बहाने नरेन्द्र मोदी पर हमला करने का सुख(?) प्राप्त कर लिया गया, और यदि नित्यानन्द वाकई दोषी है तो उसे फ़ाँसी की सजा मिलनी चाहिये, यह माँग करने वालों की भीड़ भी जुट गई है, परन्तु इस बात पर कोई ध्यान नहीं देना चाहता कि जिस प्रकार कांची के शंकराचार्य और उड़ीसा के स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती धर्म परिवर्तन और ईसाई एवेंजेलिस्टों के खिलाफ़ मुहिम चलाये हुए थे, ठीक वैसे ही नित्यानन्द भी धर्म परिवर्तन की राह में रोड़ा बने हुए हैं, ऊपर से वह पिछड़ी जाति से भी आते हैं, ऐसे में भला करुणानिधि कैसे उन्हें सहन कर सकते थे। अरे भाई जब करुणानिधि हिन्दुओं के प्रतिष्ठित गुरु शंकराचार्य से नहीं डरे तो नित्यानन्द किस खेत की मूली हैं? जब मीडिया मेहरबान तो गधा पहलवान। अब रही बात सीडी की, तो कम्प्यूटर तकनीक के इस आधुनिक युग में कुछ भी सम्भव है… क्योंकि ऐसी भी खबर है कि जिस समय नित्यानन्द की यह सीडी बनाई गई उन्हें खाने में कोई ड्रग दिया गया था, परन्तु हिन्दुओं पर हमले करते समय चैनल/अखबार किसी बात का तटस्थ या तथ्यपूर्ण विचार नहीं करते, सिर्फ़ अपने “6M आकाओं” के आदेश का पालन करते हैं।

लेकिन किसी ऐसे पादरी की खबर “जेम्स” रॉय का चैनल नहीं दिखायेगा, जिसने एक अल्पवयस्क लड़की के साथ ज्यादती की और उसकी हत्या करवा दी (जबकि नित्यानन्द ने रंजीता के साथ उसकी मर्जी से सम्बन्ध बनाया होगा, उसकी हत्या नहीं की)। खबरों के अनुसार कोझीकोड के नीलाम्बर स्थित एक क्रिश्चियन होस्टल की स्कूली छात्रा अनु का शव पाया गया था जिस सम्बन्ध में पथनापुरम माउंट टबोर के फ़ादर(?) केजे जोसफ़ की गिरफ़्तारी हुई है। होस्टल की सहेली के बयानों के मुताबिक अनु के साथ बलात्कार और यौन शोषण की पुष्टि हो चुकी है, उसकी मौत चूहामार दवा खाने से हुई, लेकिन पुलिस को शक है कि यह विष उसे जबरदस्ती खिलाया गया है।

http://www.keralanext.com/news/2010/03/05/article104.asp

अनु की बहन ने दो पादरियों पर उसके यौन शोषण का आरोप लगाया है, इस पर पुलिस ने कहा है कि मामले में और भी गिरफ़्तारियाँ हो सकती हैं।

अरे रे रे रे रे, क्या कहा, आपको केरल के सिस्टर अभया हत्याकाण्ड की याद आ गई? स्वाभाविक बात है। उस केस में भी तो ऐसा ही कुछ हुआ था… 1992 में सिस्टर अभया की हत्या हुई थी, उसका भी यौन शोषण हुआ था, चर्च की ताकत द्वारा मामले को दबाने और उलझाने की वजह से 18 साल बाद भी अभया के परिजनों को न्याय नहीं मिल पाया है, ज्यादा जानना चाहते हैं तो इसे पढ़िये… (क्योंकि ऐसी खबरें “जेम्स” रॉय का NDTV आपको नहीं देगा…)

http://en.wikipedia.org/wiki/Sister_Abhaya_murder_case

और इसे पढ़िये…

http://www.rediff.com/news/2008/nov/19sister-abhaya-case-kerala-two-priests-held.htm

दिल्ली की जामा मस्जिद का अतिक्रमण हटाने के हाईकोर्ट के निर्णय की धज्जियाँ देखी हैं कभी किसी चैनल पर?

http://www.encyclopedia.com/doc/1P3-1134197141.html


प्रारम्भिक सदमे के बाद नित्यानन्द स्वामी के भक्तों ने भी मोर्चा संभाल लिया है और सन टीवी के कर्ताधर्ताओं से पूछा है कि क्या सन टीवी ने यह वीडियो टेप प्रदर्शन से पहले जाँच लिया था कि यह सही है या नहीं? क्या सन टीवी ने इस टेप को लेकर पुलिस में कोई औपचारिक शिकायत दर्ज की? क्या चैनल ने कभी इस बात की पुष्टि करने की कोशिश की है कि आश्रम की जिस ज़मीन को लेकर वह हंगामा खड़ा कर रहा है, वह ज़मीन स्वामी के बंगलुरू स्थित एक भक्त ने दान में दी है? क्या चैनल ने स्वामी अथवा आश्रम के नाम पर ज़मीन के आधिकारिक रिकॉर्ड देखे हैं? वह वीडियो जिस कमरे में शूट किया गया है, वैसा कोई कमरा आश्रम में है ही नहीं, फ़िर इसकी शूटिंग कहाँ हुई? क्या वीडियो में दिखाया गया व्यक्ति स्वामी नित्यानन्द ही है? चैनलों ने सबसे पहले दिन अभिनेत्री रंजीता का चेहरा छिपा क्यों दिया था? यदि यह सब प्रायोजित नहीं था तो चैनल पर इस खबर के प्रसारित होने के 5 मिनट के अन्दर ही आक्रोशित लोगों(?) की भीड़ ने आश्रम पर हमला कैसे कर दिया? भीड़ ने हमले के दौरान आश्रम में रह रहे हिन्दू भक्तों और महिलाओं से बदतमीजी क्यों की? उल्लेखनीय है कि चैनल सन टीवी और नक्कीरन अखबार में हेडलाइन यही थी कि फ़र्जी स्वामी नित्यानन्द सेक्स स्कैण्डल में फ़ँसे, यानी इन्होंने बगैर किसी जाँच या मुकदमे के स्वामी को तुरन्त दोषी ठहरा दिया और हल्ला मचा दिया… असल में यह चाल काउण्टर बैलेंसिंग कही जाती है। पिछले एक वर्ष में अमेरिका में चर्च ने ननों के शारीरिक और मानसिक शोषण और बच्चों के साथ पादरियों के यौन मामलों में लगभग 6 करोड़ डालर का मुआवज़ा चुकाया है तथा पोप सतत देश-दर-देश उनके द्वारा नियुक्त पादरियों के कुकर्मों की माफ़ी माँगते घूम रहे हैं। इसलिये भारत में हिन्दू धर्मगुरुओं को खासकर निशाना बनाया जा रहा है ताकि बैलेंस बना रहे, लेकिन भारत का मीडिया चर्च के कुकर्मों को सामने लाने में हमेशा पीछे ही रहा है।

इस बात को काफ़ी पहले ही साबित किया जा चुका है कि जहाँ एक ओर भारत में इस्लाम का प्रसार जेहाद, जोर-जबरदस्ती और आतंक के जरिये किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर चर्च का प्रसार, चालबाजियों, दुष्प्रचार, पैसों के लालच पर धर्म-परिवर्तन और मीडिया के उपयोग द्वारा किया जा रहा है, ऐसे खतरनाक हालातों में सभी हिन्दू धर्मगुरुओं और खासकर बाबा रामदेव को अत्यधिक सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि वे तो लुटेरी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का भी भारी नुकसान कर चुके हैं और उनके निशाने पर हैं… सो आने वाले दिनों में हमें हिन्दू धर्म के अन्य प्रतीकों और धर्माचार्यों के किस्से-कहानियाँ-स्कैण्डल सुनने को मिलें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये…

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक भारत में मिशनरी संस्थाओं का सबसे अधिक ज़मीन पर कब्जा है कभी मीडिया ने हल्ला मचाया? माओवादियों और नक्सलवादियों के कैम्पों में महिला कैडर के साथ यौन शोषण और कण्डोम मिलने की खबरें कितने चैनल दिखाते हैं? लेकिन चूंकि हिन्दू धर्मगुरु के आश्रम में हादसा हुआ है तो मीडिया ऐसे सवालों को सुविधानुसार भुला देता है, और कोशिश की जाती है कि येन-केन-प्रकारेण नरेन्द्र मोदी या संघ या भाजपा का नाम इसमें जोड़ दिया जाये, या और कुछ नहीं मिले तो हिन्दू संस्कृति-परम्पराओं को ही गरिया दिया जाये। मीडिया और सेकुलरों के लगातार जारी इस दुष्प्रचार और दोगलेपन को समय-समय पर प्रकाशित और प्रचारित किया ही जाना चाहिये, जनता को बताना होगा कि ये लोग किस तरह से पक्षपाती हैं, पक्के हिन्दू-विरोधी हैं। इस काम के लिये बड़ी मात्रा में विदेशों से हवाला और NGOs के जरिये पैसा आता है (एक हम हैं जो अपने ब्लॉग पर "डोनेट" का बटन लगाये बैठे हैं फ़िर भी कोई पैसा ही नहीं देता)।

लेख का सार यह है कि नित्यानन्द जो भी है, जैसा भी है अगर दोषी पाया गया तो (कानून के मुताबिक) सजा मिलनी ही चाहिये (उसी कानून? के मुताबिक जिसने सिस्टर अभया के हत्यारों को 18 साल बचाये रखा, उसी कानून? के मुताबिक, जिसने अफ़ज़ल की फ़ाँसी अब तक रोक रखी है), लेकिन इस बहाने हिन्दुओं और सनातन धर्म को बदनाम करने की साजिश का मुँहतोड़ जवाब दिया जायेगा। मीडिया की एकतरफ़ा चालबाजियों का एक उदाहरण हाल में देखा जा चुका है जब चैनलों के बीच कृपालु महाराज को दोषी और भगोड़ा ठहराने की होड़ सी लगी थी, कृपालु महाराज चाहे जैसे भी हों अपने किये की सजा भुगतेंगे ही। लेकिन किसी चैनल ने यह पूछने की ज़हमत नहीं उठाई कि कांग्रेस द्वारा 55 साल तक राज करने के बाद, उत्तरप्रदेश से अधिकतम प्रधानमंत्री होने के बावजूद, दलितों की मसीहा मायावती और विप्र सिंह के अवतरित होने के बावजूद, वहाँ के दलित इतने गरीब क्यों हैं कि सिर्फ़ एक थाली, लड्डू और कुछ रुपयों के लिये हजारों की संख्या में जमा हो जाते हैं?

“दीवार” फ़िल्म का एक डायलॉग याद आता है, इंस्पेक्टर रवि कहता है “दूसरों के पाप गिनाने से तुम्हारे अपने पाप कम नहीं हो सकते, दूसरों के जुर्म बताने से ये सच्चाई नहीं बदल जाती कि तुम भी एक मुजरिम हो…”। जी हाँ, बिलकुल सही बात है…… लेकिन जब एक ही पक्ष (हिन्दू) के जुर्म बार-बार बताये जायेंगे, एक ही पक्ष (हिन्दू धर्म) को बार-बार प्रताड़ित किया जायेगा, हिन्दू प्रतीकों-त्योहारों-संस्कारों-संतों को बार-बार अपमानित किया जायेगा, सिर्फ़ इसलिये कि तुम्हारे पास “चैनल” और “अखबार” की ताकत है, तब हम जैसे आम आदमी ब्लॉग ही तो लिखेंगे ना… (भले ही आलोक मेहता और मृणाल पाण्डे जैसे तथाकथित बड़े पत्रकार ब्लॉग को कचरा लेखन मानते हों)… क्योंकि अभी हमारे दिमागों में ऐसे संस्कार नहीं आ पाये हैं कि “धर्म खतरे में है…” कहते ही हम पत्थर और तलवारें लेकर सड़कों पर निकल पड़ें…। हाँ, एक बात तो तय है कि मीडिया लगातार ऐसी ही हिन्दू विरोधी खबरें दिखाता रहे तो कभी न कभी ऐसे “संस्कार” भी आ आयेंगे, और फ़िर उस दिन क्या होगा, कहना मुश्किल है…

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Monday 15 March 2010

कीड़े-मकोड़ों (भारत की जनता) को विदेशी परमाणु संयंत्र सप्लायरों के भरोसे छोड़ने की बेशर्म तैयारी… Nuclear Liability Bill, Atomic Energy Companies

जैसा कि सभी जानते हैं, भारत के नेताओं-अफ़सरों-उद्योगपतियों की “कुटिल त्रिमूर्ति” भारत की जनता को हमेशा से कीड़ा-मकोड़ा समझती आई है, आज़ादी के पहले से ही इन्होंने कभी भी आम जनता को रेंगने वाले गंदे प्राणियों से अधिक कुछ समझा नहीं है। अब एक बार फ़िर से भोपाल गैस काण्ड की तरह बरसों तक उनके ज़ख्मों पर नमक मलने और भारत की आम जनता (जिसे अपने वोट की ताकत पर कुछ ज्यादा ही गुमान है) को लूटने के लिये लोकसभा में सोमवार को मनमोहन-सोनिया एक बिल पेश करने जा रहे हैं, जिसका नाम है “असैनिक परमाणु क्षति दायित्व विधेयक” (Civil Liability for Nuclear Damage Bill)।


इस विधेयक के प्रावधानों के अनुसार भारत में लगने वाले किसी भी परमाणु संयंत्र (या बिजलीघर) से आम जनता को होने वाले नुकसान की भरपाई की सीमा न्यूनतम 300 करोड़ तथा अधिकतम 2300 करोड़ रखी गई है, यह राशि परमाणु संयंत्र चलाने वाली कम्पनी देगी, सरकार चाहे तो बाद में इस मुआवज़ा राशि को बढ़ा सकती है। केन्द्रीय मंत्रिमण्डल ने गत 20 नवम्बर को ही इस विधेयक को मंजूरी दे दी है और अब इसे लोकसभा में पेश किया जाना है। इस विधेयक में सबसे खतरनाक बात यह है कि न्यूक्लियर प्लाण्ट में किसी प्राकृतिक कारणों से (भूकम्प, ज्वालामुखी आदि) होने वाले, किसी आतंकवादी हमले से होने वाले, अथवा किसी कर्मचारी की मानवीय भूल से होने वाले किसी भी विकिरण या नुकसान के लिये उस कम्पनी (या कम्पनी मालिक) को दोषी नहीं माना जायेगा (वारेन एण्डरसन मामले से सबक लेकर अमेरिकियों ने यह पेंच डाला है)। भारत जैसे देश में, जहाँ अफ़सरशाही और नेता कम्पनियों के हाथों बिके हुए हों, किसी भी औद्योगिक दुर्घटना को “आतंकवादी हमला” या “मानवीय भूल” साबित करना कौन सा बड़ा काम है? लेकिन सरकार परमाणु बिजली को लेकर इतनी उतावली है कि वह “कीड़े-मकोड़ों” की परवाह नहीं करना चाहती जबकि इन्हीं कीड़े-मकोड़ों से उसे हर 5 साल में वोट लेना है।

http://news.rediff.com/report/2010/mar/14/nuke-liability-bill-to-be-tabled-in-ls-on-monday.htm

लोकसभा में भाजपा और वामदलों ने मिलकर इसका विरोध करने का फ़ैसला किया है और सरकार से माँग की है कि इसे संसद की स्थायी समिति को सौंप दिया जाये और इसे पास करने की जल्दबाजी न की जाये, लेकिन मनमोहन सिंह अपने बॉस “हुसैन” ओबामा (जो शायद जून 2010 में भारत दौरे पर आने वाले हैं) को खुश करने के लिये एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं (मनमोहन वैसे भी अमेरिका, विश्व बैंक और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को खुश रखने में माहिर माने जाते हैं, और इसीलिये बतौर प्रधानमंत्री अमेरिका की पहली पसन्द भी हैं)। उनके खासमखास व्यक्ति शिवशंकर मेनन ने भाजपा के अरुण जेटली और सुषमा स्वराज से मुलाकात करके इन्हें इस विधेयक का समर्थन करने के लिये मनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन स्वराज और जेटली के साथ सीताराम येचुरी भी इस विधेयक को इसके वर्तमान स्वरूप में पास करने के खिलाफ़ हैं।

यहाँ तक कि केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी इस विधेयक पर कुछ आपत्तियाँ जताई थीं, लेकिन उन्हें दरकिनार कर दिया गया। पर्यावरण मंत्रालय की मुख्य आपत्ति यह थी कि किसी भी परमाणु दुर्घटना की स्थिति में मुआवज़ा राशि को न्यूनतम या अधिकतम तय करना सही नहीं है, क्योंकि जब परमाणु विकिरण या दुर्घटना होगी तब मानव जीवन के साथ-साथ उस परमाणु संयंत्र के आसपास के इलाके के पेड़-पौधों, प्राणियों और जलवायु पर भी भयानक असर होगा। कई मामलों में परमाणु दुर्घटना के दुष्प्रभाव कई साल बाद तक उभरते हैं (जैसा कि भोपाल गैस काण्ड में भी हम देख चुके हैं) इसलिये उसे भी इस मुआवज़ा राशि में शामिल किया जाना चाहिये।

इसी प्रकार स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी कहा है कि विधेयक में “दुर्घटना के दस वर्ष बाद तक ही” मुआवज़े की मांग की जा सकती है इस बिन्दु को भी हटाया जाये, क्योंकि परमाणु विकिरण फ़ैलने के 50 साल बाद जापान में आज भी बच्चे अपंग पैदा हो रहे हैं और परमाणु दुर्घटना के जहरीले असर की वजह से DNA और Genes में भी बदलाव के संकेत मिले हैं…। ऐसे में कहीं ऐसा न हो कि परमाणु बिजलीघर बनाने वाली कम्पनी या “एण्डरसन टाइप का कोई डकैत” आसानी से 500 करोड़ का मुआवज़ा चुकाकर चलता बने और हमारी आने वाली पीढ़ियाँ इसे भुगतती रहें, क्योंकि विधेयक यह भी कहता है कि यह मुआवज़ा “अन्तिम” (Final) है, “अन्तरिम” (Interim) नहीं…।

सरकार के “एक और भोंपू” वैज्ञानिक अनिल काकोडकर कहते हैं कि, 300 करोड़ (बिजलीघर ऑपरेटर कम्पनी की जिम्मेदारी 500 करोड़ तक) की न्यूनतम राशि बिलकुल उचित है, क्योंकि परमाणु बिजलीघर अत्यधिक सुरक्षा वाले होंगे और इनमें दुर्घटना की सम्भावना न के बराबर होगी। अब इन्हें कौन समझाये कि इस दुनिया में “फ़ुलप्रूफ़” कुछ भी नहीं। काकोड़कर जी, भारत की जनता को भीख में मिलने वाले इस 500 करोड़ के मुआवज़े की तुलना अमेरिका के कानून से करें

1) अमेरिका में प्रत्येक परमाणु संयंत्र ऑपरेटर को प्रतिवर्ष “वर्तमान बाज़ार भाव” से उपलब्ध दुर्घटना इंश्योरेंस करवाना पड़ता है।

2) किसी भी सम्भावित परमाणु दुर्घटना की स्थिति में यदि मुआवज़ा राशि इंश्योरेंस की रकम से अधिक हो तब बाकी की रकम “प्राइस एण्डरसन फ़ण्ड” से ली जायेगी। इस सामूहिक फ़ण्ड की स्थापना अमेरिका में कार्यरत सभी परमाणु बिजलीघर (संयंत्र) कम्पनियों द्वारा की गई है, जिसमें सभी मिलकर वार्षिक अनुदान देते हैं और यह फ़ण्ड वर्तमान में लगभग 10 अरब डालर का हो चुका है।

3) कोई सा भी मुआवज़ा दावा नुकसान के उभरने के तीन साल बाद तक भी किया जा सकता है, न कि दुर्घटना दिनांक के दस साल तक ही।

4) कोई भी व्यक्ति, समूह, कम्पनी, संस्थान अथवा सरकार उस कम्पनी के खिलाफ़ कभी भी मुआवज़ा दावा पेश कर सकती है।

इन प्रावधानों की तुलना में मात्र 500 करोड़ रुपये देकर छुटकारा पाने के लिये भारत की निरीह-गरीब जनता ही मिली थी क्या? यहाँ तक कि अमेरिका के कानून में सैनिक, असैनिक, व्यावसायिक और अन्य सभी प्रकार के परमाणु संयंत्र इसमें शामिल हैं, जबकि भारत में ऐसा कुछ नहीं है… यह भेदभाव क्यों? माना कि परमाणु बिजली हमारे लिये जरूरी है, लेकिन दुर्घटना से बचावों के उपाय और मिलने वाले मुआवज़े पर उचित सौदेबाजी करना भी उतना ही जरूरी है। कांग्रेस ने यूनियन कार्बाइड और एण्डरसन के खिलाफ़ आज तक कोई प्रभावशाली कदम नहीं उठाया तो वह अमेरिका और फ़्रांस की दिग्गज परमाणु कम्पनियों का क्या बिगाड़ लेगी?

बिल पास करवाने के लिये मरे जा रहे कांग्रेसियों को यह भी पता नहीं होगा कि अमेरिका में हुई एक परमाणु दुर्घटना (जिसमें एक भी व्यक्ति की मौत नहीं हुई थी) के बाद इलाके की “वैज्ञानिक और जैविक साफ़-सफ़ाई” करने मे ही 4500 करोड़ रुपये खर्च हो गये थे, रूस में चेरनोबिल में हुई दुर्घटना के बाद प्लाण्ट के आसपास के इलाके में अभी भी विकिरण मौजूद है, और इधर 500 करोड़ के मुआवज़े का लॉलीपॉप देकर भारत की जनता और विपक्ष को बेवकूफ़ बनाया जा रहा है?



जबकि होना यह चाहिये कि किसी भी सम्भावित परमाणु दुर्घटना की स्थिति में भविष्य का आकलन के मुताबिक, अर्थात उस समय की रुपये-डॉलर का विनिमय दर, मुआवज़े की राशि में मुद्रास्फ़ीति की दर, कम्पनी द्वारा लगाये जा रहे परमाणु बिजलीघर की ज़मीन का उस समय का भाव आदि को जोड़कर मुआवज़ा तय होना चाहिये… इससे उन कम्पनियों को भी इंश्योरेंस की रकम तय करने में मदद मिलेगी। यदि प्राकृतिक आपदा (भूकम्प आदि) को छोड़ भी दिया जाये तो किसी आतंकवादी हमले तथा कर्मचारी की लापरवाही से हुई दुर्घटना में कम्पनी और सरकार दोनो को मिलजुलकर जिम्मेदारी उठाना चाहिये, क्योंकि प्लाण्ट की आन्तरिक और बाहरी सुरक्षा दोनों की जिम्मेदारी है।

समस्या यह है कि इन मुद्दों पर बात करने, बहस करने के लिये किसी के पास वक्त नहीं है। आप बताईये, कितने प्रमुख राष्ट्रीय चैनलों और हिन्दी के मुख्य अखबारों ने इन मुद्दों पर जनता को बताने या जागरूक करने की कोशिश की है? चलिये माना कि देश की 70-75% जनता तो महंगाई और रोज़ाना की दाल-रोटी से ही जूझ रही है, लेकिन IPL के तमाशे में डूबे और उपभोक्तावाद की आँधी में बही जा रही बाकी की 20% जनता को भी कहाँ मालूम है कि उनका भविष्य बाले-बाले ही बेचा जा रहा है… लेकिन जब उनके घर के पिछवाड़े में कोई परमाणु दुर्घटना होगी तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

अन्त में एक भयानक सा काल्पनिक चित्र – मान लीजिये पुणे से 50-60 किमी दूर किसी परमाणु बिजलीघर में दुर्घटना होती है, और ऑपरेटर कम्पनी तथा सरकार मिलकर 2500 करोड़ का मुआवज़ा देकर पल्ला झाड़ने की तैयारी में है, जबकि यदि आज का ही भाव लिया जाये तो मेरा मोटा अनुमान है कि पुणे शहर के सिर्फ़ 5000 मकानों /व्यक्तियों का मुआवज़ा ही 2500 करोड़ हो जायेगा… बाकी लोगों का क्या? भोपाल मामले में तो फ़िर भी काफ़ी मुआवज़ा मिल गया जबकि गैस दुर्घटना और परमाणु दुर्घटना में ज़मीन-आसमान का अन्तर है…। 60 साल से पैसा खा रहे कांग्रेसी तो अपना बोरिया-बिस्तर बाँधकर स्विटज़रलैण्ड निकल लेंगे, लेकिन हमारा क्या?

http://www.greenpeace.org/india/stop-the-vote2

खैर, ग्रीनपीस की इस ऑनलाइन याचिका पर दस्तखत करें और अपना विरोध दर्ज करें, शायद बहुत सारे कीड़े-मकोड़े मिलकर कुछ शोर पैदा कर सकें, और सोनिया-मनमोहन-मोंटेक के कानों पर जूं रेंगे…

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Friday 12 March 2010

क्या अब अमेरिका में भी सच्चर और रंगनाथ मिश्र आयोग की जरूरत है??? Sachchar Rangnath Mishra Commission, Muslims in USA

भारत अथवा विश्व के किसी भी देश में जब भी कोई सामाजिक स्थिति सम्बन्धी अध्ययन किये जाते हैं, तब इस बात पर मुख्य जोर दिया जाता है कि विभिन्न धर्मों और जातियों में देश के विकास और अर्थव्यवस्था से होने वाले फ़ायदे बराबर पहुँच रहे हैं या नहीं। सामान्यतः यह माना जाता है कि खुली अर्थव्यवस्था और पूंजीवाद एक शिक्षित समाज में सबको बराबरी से धन कमाने का मौका देते हैं।

पूंजीवाद का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है अमेरिका। हाल ही में अमेरिका के सामान प्रशासन विभाग द्वारा अमेरिका में रहने वाले विभिन्न धर्मों और जातियों की आर्थिक स्थिति का एक लेखाजोखा पेश किया गया है। अमेरिका में बसने वाले सभी धर्मों के लोगों की वार्षिक आय का विस्तृत सर्वे है यह रिपोर्ट। इस रिपोर्ट की सबसे आश्चर्यजनक किन्तु सत्य बात (जो हमें पहले से ही पता थी) यह निकलकर सामने आई है कि अमेरिका में रहने वाले “हिन्दुओं” और यहूदियों की आमदनी, वहाँ के वार्षिक औसत आय से काफ़ी आगे हैं। अलग-अलग समूहों में हिन्दुओं ने वहाँ अपनी मेहनत, काबिलियत और दिमाग का लोहा मनवाया है, और यह बात इस सर्वे से जाहिर होती है।



इस सर्वे में हिन्दू, मुस्लिम, यहूदी, रोमन कैथोलिक, अश्वेत, बौद्ध आदि समूहों को शामिल किया गया। आधार अध्ययन के रूप में अमेरिका की वार्षिक औसत आय को पैमाना रखा गया और देखा गया कि कौन से समूह इस आधार रेखा से कितनी नीचे और कितने ऊपर हैं। एक लाख डालर वार्षिक से लेकर 30000 डालर वार्षिक तक के समूहों में वार्षिक आय को 5 समूहों में बाँटा गया। सर्वे में यह बात उभरकर सामने आई कि एक लाख डालर वार्षिक से अधिक आय रखने में यहूदी 46% तथा हिन्दू 43% हैं। जबकि 75 हजार डालर से लेकर एक लाख डालर के आय वर्ग में भी हिन्दू सबसे अधिक 22% पाये गये। यदि नीचे से शुरु किया जाये तो 30 हजार डालर से कम वाले आय वर्ग में अश्वेत ईसाई 47% और मुस्लिम 35% लेकर नीचे की दो पायदानों पर थे, जबकि हिन्दुओं में यह प्रतिशत सिर्फ़ नौ प्रतिशत है। जबकि अमेरिका का राष्ट्रीय औसत एक लाख डालर से ऊपर सिर्फ़ 18% और 30 हजार से कम आय वर्ग में 31% है। प्रस्तुत ग्राफ़ देखने पर यह स्पष्ट नज़र आता है कि यहूदी और हिन्दू सबसे अधिक धनवान या कहें कि गरीबों में भी कम गरीब हैं, जबकि अश्वेत ईसाई और मुस्लिम समुदाय पिछड़ा हुआ है।



भारत में अक्सर यह मूर्खतापूर्ण आरोप लगाया जाता है कि मुसलमानों के साथ भेदभाव किया जाता है (जबकि हकीकत इसके ठीक उलट है), लेकिन अमेरिका में जहाँ कार्य संस्कृति अव्वल, प्रतिभाशाली को उचित स्थान और पूंजीवाद तथा पैसा कमाना ही सबसे महत्वपूर्ण माना जाता हो, ऐसे देश में बाहर से आकर बसे हुए हिन्दू और यहूदी अधिक धनवान और प्रभावशाली क्यों हैं? और अश्वेत तथा मुसलमान वहाँ भी पिछड़े हुए क्यों हैं? 9/11 के बाद पिछले कुछ वर्षों को छोड़ भी दिया जाये तो अमेरिका के सामाजिक हालात कम से कम भारत जैसे तो नहीं हैं। अमेरिका में भारत जैसी कांग्रेस पार्टी नहीं है जिसने मुसलमानों को सिर्फ़ एक वोट बैंक समझा है, अमेरिका में भाजपा भी नहीं है जिसका नाम लेकर मुसलमानों को इधर डराया जाता है, अमेरिका की शिक्षा व्यवस्था भी भारत की तरह की नहीं है, फ़िर क्या कारण है कि अमेरिका के अश्वेत और मुस्लिम आर्थिक रूप से इतनी तरक्की नहीं कर पाये?

इस सर्वे के परिणामों से यह सवाल उठने भी स्वाभाविक हैं कि हिन्दुओं के प्रति विश्व के अनेक देशों के समाज में नफ़रत की भावना के कारणों में से क्या यह (आर्थिक खुशहाली) भी एक कारण है? और यदि ऐसा ही है तो अमेरिका में बाकी धर्मों के लोगों को तरक्की करने से किसने रोका है? क्या अब अमेरिका में भी सच्चर और रंगनाथ आयोग जैसी कोई व्यवस्था करनी पड़ेगी? फ़िर अमेरिका के “सबको समान अवसर वाला देश” के नारे का क्या होगा? यदि अमेरिका में सबको समान अवसर मिलते हैं तो सिर्फ़ यहूदी और हिन्दू बाकियों से काफ़ी आगे क्यों हैं, बाकी धर्मों को छोड़ दें तो स्थानीय कैथोलिक गोरे ईसाई भी इन दोनों से पीछे क्यों हैं?

बहरहाल, हिन्दुओं के लिये भले ही यह एक खुशखबरी हो लेकिन अमेरिका सहित भारत के भी समाजशास्त्रियों के लिये यह एक शोध का विषय है कि हिन्दू जिस देश में भी जाते हैं वहाँ अपनी बुद्धि, कौशल, काम के प्रति समर्पण के कारण जल्दी ही एक महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर लेते हैं और उस देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं, लेकिन हिन्दू यही काम अपने देश भारत में नहीं कर पाते… ऐसा क्यों? इसके कुछ मोटे-मोटे कारण काफ़ी लोग जानते तो हैं लेकिन खुलकर कुछ कहते नहीं… क्योंकि सच कड़वा होता है… और हमारे कथित बुद्धिजीवी, समाजशास्त्री और राजनेता मीठा बोलने के आदी हो चले हैं… भले ही इससे देश का सतत नुकसान हो रहा हो।

ऊपर दिये गये सवालों पर अपनी राय भी रखें… शायद भारत के नीति-निर्माताओं को कुछ अक्ल आये (उम्मीद तो कम है) … 
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