Wednesday, August 24, 2016

DRDO Gift for Indian Soldiers - A Meat Technology



सैनिकों के लिए DRDO का तोहफा...


सामान्यतः जब मटन को काट लिया जाता है, तब वह सामान्य परिस्थितियों में केवल छः घंटे ही बिना रेफ्रिजेरेशन के शुद्ध रह सकता है और यदि फ्रिज या बर्फ में रखा जाए तो दो दिनों तक सुरक्षित रह सकता है. मटन विक्रेताओं और कोल्ड स्टोरेज मालिकों/मैनेजरों के अनुसार कटे हुए मटन को दो दिनों के बाद फेंकना ही पड़ता है. लेकिन भारत के रक्षा अनुसन्धान की प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों ने इसका इलाज खोज निकाला है और एक ऐसे बैक्टीरिया का पता लगाया है जो मटन को एक सप्ताह से लेकर पन्द्रह दिनों तक एकदम ताजा रखेगा. 

मैसूर स्थित डिफेन्स रिसर्च लेबोरेटरी (DFRL) ने अनार के छिलकों से एक विशेष द्रव्य तैयार किया है, जिसे कटे हुए माँस पर छिडकने अथवा उसका इंजेक्शन लगाने पर उस मटन में उत्पन्न होने वाले हानिकारक बैक्टीरिया का नाश होगा और उसे सड़ने से बचाया जा सकेगा ताकि मटन का प्राकृतिक स्वाद और सुगंध बरकरार रहेगी. DFRL के वैज्ञानिकों ने आगे बताया कि उनका रिसर्च मुख्यतः मटन को लेकर ही था, लेकिन अनार के छिलकों से तैयार होने वाले इस उपयोगी द्रव्य को चिकन एवं पोर्क (सूअर के माँस) को भी सुरक्षित रखने में उपयोग किया जा सकेगा. वर्तमान में मटन को सुरक्षित रखने के लिए रासायनिक परिरक्षकों का उपयोग किया जाता है, यह रसायन इस मटन को अधिकतम बीस से चौबीस घंटे ही शुद्ध रख पाते थे, उसके बाद उसमें सड़ने की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है. भारत के सुदूर पहाड़ी, बर्फीले और समुद्री इलाकों में तैनात भारतीय सैनिकों को मैदानी इलाकों से भोजन के लिए मटन भेजा जाता है, लेकिन अक्सर वह उन्हें तुरंत ही खत्म करना होता है. कई बार लद्दाख, लेह, कारगिल, अंडमान जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में भोजन सामग्री पहुँचाने वाले विमानों की उड़ान में देरी अथवा किसी अन्य कारण से सैनिकों को दिए जाने वाले मटन के खराब होने की नौबत आ जाती थी. 


अब DRDO के इस शोध के बाद यह स्थिति नहीं नहीं आएगी. DFRL के प्रमुख वैज्ञानिक पीई पत्की ने बताया कि अनार का छिलका एंटी-ऑक्सीडेंट्स से भरपूर होता है, और इससे उत्पन्न होने वाले “मित्र बैक्टीरिया” भोजन को सुरक्षित रखने में सहायक होते हैं. ऐसे में यदि मटन पर इसका छिड़काव किया जाए तो न सिर्फ सैनिकों को रासायनिक अपशिष्ट से बचाया जा सकेगा, बल्कि भोज्य पदार्थ प्राकृतिक रूप से लंबे समय तक सुरक्षित रखे जा सकेंगे. बर्फ अथवा कोल्ड स्टोरेज से बाहर रखने पर मटन में Escherichia coli, salmonella, campylobacter jenuni, Clostri-dium botulinum, Clostridium perfringens, जैसे कई हानिकारक बैक्टीरिया पैदा हो जाते हैं, जो कि खाने वाले के लिए घातक होते हैं. इन बैक्टीरिया से सिरदर्द, पेटदर्द, डायरिया जैसी बीमारियाँ आम होती हैं. पत्की के अनुसार इनसे बचाव के लिए जो रसायन छिड़के जाते हैं, वे भी एक-दो दिन बाद घातक रूप ग्रहण कर लेते हैं. इसलिए ऐसे किसी खाद्य रक्षक की सख्त आवश्यकता महसूस की जा रही थी, जो कि भोजन को लंबे समय तक शुद्ध और स्वादिष्ट बनाए रख सके. 

अंततः DRDO के वैज्ञानिकों की मेहनत सफल हुई और अनार के छिलकों से एक विशेष द्रव्य बना लिया गया, जो गीले-सूखे सभी पदार्थों, विशेषकर मटन-चिकन को आराम से पूरा सप्ताह भर सुरक्षित रख सकता है.

Sunday, July 31, 2016

Islamic Terror : History, Reason and Solution


इस्लामिक आतंकवाद : इतिहास, कारण और निवारण  


जब रेतीले क्षेत्र में तूफ़ान आते हैं, उस समय शतुरमुर्ग अपना सिर रेत में धँसा लेता है और पृष्ठभाग को तूफ़ान की ओर कर लेता है. ऐसा करके शतुरमुर्ग सोचता है की शायद तूफ़ान टल जाएगा और वह बच जाएगा. इसी प्रकार जब बिल्ली दूध पी रही होती है, उस समय आँखें बंद कर लेती है, तात्कालिक रूप से उसे ऐसा महसूस होता है कि कोई उसे नहीं देख रहा. जबकि ऐसा होता नहीं है. तूफ़ान तो आता ही है और वह शतुरमुर्ग को उड़ा ले जाता है, उसके पंखों के तिनके-तिनके बिखेर देता है, जबकि आँख बंद करके दूध पीती हुई बिल्ली को लाठी पड़ जाती है. समूचे विश्व में पिछले दस-पंद्रह वर्षों से इस्लामिक आतंकवाद ने जिस तेजी से अपने पैर पसारे हैं, उसकी जड़ में गैर-इस्लामिक देशों और समुदायों का यही शतुरमुर्ग वाला रवैया रहा है. फ्रांस पर हुए हालिया “ट्रक बम” हमले के बाद विश्व में पहली बार किसी प्रमुख नेता ने ““इस्लामिक आतंकवाद”” शब्द का उपयोग किया है, वर्ना अमेरिका में जब मोहम्मद अत्ता ने हवाई जहाज लेकर ट्विन टावर गिराए थे, उस समय भी जॉर्ज बुश ने “इस्लामिक” शब्द को छोड़ दिया था, केवल “आतंकवाद” शब्द का उपयोग किया था. अर्थात “आतंकवाद” शब्द से “इस्लामिक आतंकवाद” शब्द तक आते-आते शतुरमुर्गों को इतने वर्ष लग गए. खैर, देर आयद दुरुस्त आयद... फ्रांस के राष्ट्रपति ने “इस्लामिक आतंकवाद” शब्द उपयोग करके संकेत दिया है कि कम से कम यूरोप और पश्चिमी देशों में ही सही, अब यह “बौद्धिक शतुरमुर्ग” अपना सिर रेत से निकालकर तूफ़ान की तरफ देखने और उसके खतरों को सही तरीके से समझने लगा है. 


आज चारों ओर “इस्लामिक स्टेट” नामक क्रूर और खूँखार आतंकी संगठन के चर्चे हैं. कुछ वर्ष पहले जब तक ओसामा जीवित था, तब “अल-कायदा” का डंका बजता था... और उससे भी पहले जब अफगानिस्तान में बुद्ध की प्रतिमा को उड़ाया गया था, तब “तालिबान” का नाम चलता था. लेकिन इस्लामिक आतंक के इन विभिन्न नामधारी चेहरों का मूल बीज कहाँ है, इसकी शुरुआत कहाँ से हुई?? अतः इस वैश्विक समस्या को समझने के लिए हमें थोडा और पीछे जाना होगा. पहले हम समस्या के बारे में समझते हैं, फिर इसका निदान क्या हो, इस पर चर्चा होगी... 

रणनीतिज्ञ सैयद अता हसनैन लिखते हैं कि आजकल किसी भी वैश्विक समस्या को हल करने के लिए नेताओं अथवा कूटनीतिज्ञों या बुद्धिजीवियों के पास इतिहास पढ़ने का समय कम ही होता है, और आम जनता तो बिलकुल हालिया इतिहास तक भूल जाती है, जिस कारण समस्या की गहराई को समझने में सभी गच्चा खा जाते हैं. कट्टर इस्लाम की अवधारणा के बारे में यदि बहस करनी है, अथवा वैश्विक आतंकवाद को समझना है तो सबसे पहले हमें इतिहास में पीछे-पीछे चलते जाना होगा. चौदह सौ वर्ष पीछे न भी जाएँ तो भी सन 1979 को हम एक मील का पत्थर मान सकते हैं. अयातुल्लाह खोमैनी की याद तो सभी पाठकों को होगी?? जी हाँ, इस्लामी आतंक को “वैश्विक” आयाम देने की शुरुआत करने वाले खुमैनी ही थे. आज हम सीरिया, ईराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में जो खूनी खेल देख रहे हैं, इसके मूल में 1979 में घटी तीन प्रमुख घटनाएँ ही हैं. पहली घटना है खुमैनी द्वारा प्रवर्तित “ईरानी क्रान्ति”, जिसमें अयातुल्लाह खोमैनी ने ईरान के शाह रजा पहलवी को अपदस्थ करके सत्ता हथिया ली थी. इस दौर में तेहरान में अमेरिकी दूतावास के बावन राजनयिकों को 04 नवंबर 1979 से 20 जनवरी 1981 तक खोमैनी समर्थकों ने बंधक बनाकर रखा था. दूसरी महत्त्वपूर्ण घटना भी 1979 में ही घटित हुई, जिसमें तत्कालीन सोवियत युनियन ने अफगानिस्तान में तख्तापलट करके अपना वर्चस्व कायम करने की कोशिश की, जिसके परिणामस्वरूप अमेरिका समर्थित और प्रशिक्षित “मुजाहिदीनों” एवं पाकिस्तान की मदद से लगातार नौ वर्ष तक रूस से युद्ध लड़ा. तीसरी घटना के बारे में अधिक लोग नहीं जानते हैं और ना ही इतिहास में यह अधिक प्रचारित हुई, वह थी सऊदी वहाबी सैनिकों के एक समूह “इख्वान” के एक सदस्य जुहामान-अल-तैयबी ने अपने समर्थकों के साथ मक्का में अल-मस्जिद-अल-हरम पर कब्ज़ा कर लिया. जुहामान ने यह कदम सऊदी राजवंश के कथित गैर-इस्लामी बर्ताव के विरोध में उठाया था, और इस घटना में उसके समर्थकों ने मक्का में आए हुए श्रध्दालुओं को चौदह दिनों तक बंधक बनाकर रखा. अंततः नवंबर 1979 में सऊदी राजवंश द्वारा फ्रांसीसी विशेष सुरक्षा बलों को बुलाया गया, जिन्होंने इस पवित्र मस्जिद में घुसकर इन आतंकियों का खात्मा किया था. 


केवल तीस दिनों के अंतराल में घटी इन तीनों घटनाओं ने दुनिया का चेहरा ही बदलकर रख दिया. जैसा कि सभी जानते हैं, ईरान के शाह एक अमेरिकी मोहरे के रूप में काम करने वाले एक तानाशाह भर थे और अयातुल्लाह खोमैनी नामक मौलवी ने इस्लाम के नाम पर ईरान के युवाओं को अमेरिका और पश्चिमी संस्कृति के खिलाफ भड़काकर सत्ता हासिल कर ली. सऊदी राजवंश के लिए हैरानी की बात यह थी इस्लाम के इस कट्टर रूप को उनके वहाबी आंदोलन से नहीं, बल्कि ईरान के शिया आंदोलन ने बढ़ाया. सऊदी अरब जो चतुराई के साथ कट्टर इस्लाम को बढ़ावा देने में लगा हुआ था, उसे यह देखकर झटका लगा कि “शिया” समुदाय उसके खेल में उससे आगे निकला जा रहा है. दूसरी बात यह थी कि काबा की उस पवित्र मस्जिद में “इख्वान” के आतंकियों ने जिस प्रकार नागरिकों और सुरक्षा बलों को दो सप्ताह तक बंधक बनाया और हत्याएँ कीं, और इसके जवाब में सऊदी राजशाही ने फ्रांसीसी सैनिकों को मस्जिद में घुसने की अनुमति दी, उसके कारण सऊदी राजपरिवार पर मस्जिद को अपवित्र करने के गंभीर आरोप लगने लगे थे. यानी उधर ईरान में शियाओं के नेता खुमैनी द्वारा कट्टरता को बढ़ावा देने और इधर सऊदी में मस्जिद को अपवित्र करने के आरोपों के चलते सऊदी अरब के राजपरिवार और इस्लामी मौलवियों ने अपने “वहाबी कट्टरता” को और तीखा स्वरूप देने का फैसला कर लिया. यही वह मोड़ था जहाँ से पेट्रो-डॉलर के बूते दुनिया में “इस्लामिक वहाबी” को क्रूर, तीखा और सर्वव्यापी बनाने की योजनाएँ शुरू हुईं. 

“कट्टर वहाबियत” को और हवा मिली अफगानिस्तान की घटनाओं से. रूस ने अफगानिस्तान के काबुल में अतिक्रमण करते हुए अपने कठपुतली बबरक करमाल की सरकार बनवा दी और जमकर शक्ति प्रदर्शन किया. इस कारण अफगानिस्तान से लगभग पचास लाख मुस्लिम शरणार्थी पड़ोसी पाकिस्तान और ईरान में भाग निकले. इस क्षेत्र में कच्चे तेल की प्रचुर मात्रा को देखते हुए सऊदी अरब में अड्डा जमाए बैठे अमेरिका को अपनी बादशाहत पर खतरा महसूस होने लगा और वह भी तालिबानों को प्रशिक्षण देकर रूस को कमज़ोर करने के इस हिंसक खेल में एक खिलाड़ी बन गया. “तेल के इस निराले खेल” के बारे में हम बाद में देखेंगे, पहले हम वहाबियत और सुन्नी आतंक के प्रसार पर आगे बढ़ते हैं. अफगानिस्तान में हुए इस घटनाक्रम ने सऊदी राजशाही को वहाबी विचारधारा फैलाने में खासी मदद की. उसने अमेरिका की मदद से पाकिस्तान की अफगान सीमा पर हजारों शरणार्थी कैम्प बनाए और उन कैम्पों को “तालिबान” का मानसिक प्रशिक्षण केन्द्र बना डाला. सऊदी ब्राण्ड मौलवियों ने इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान और अफगानिस्तान में लाखों लोगों का जमकर “ब्रेनवॉश” किया, जो कि सऊदी राजशाही को पसंद आया, क्योंकि ऐसा करने से उसकी “कट्टर इस्लामी” छवि बरकरार रही और मुसलमान काबा की मस्जिद का अपवित्रीकरण वाला मामला भूल गए. इस खेल में सऊदी अरब को केवल पैसा लगाना था, बाकी का काम वहाबी काम मुल्ला-मौलवियों को और सैनिक कार्य अमेरिका को करना था. सोवियत संघ के अफगानिस्तान से चले जाने के बाद भी यह खेल जारी रहा और अन्य इस्लामिक देशों में पहुँचा. कहने का तात्पर्य यह है कि 1979 में घटित होने वाली इन्हीं प्रमुख घटनाओं ने मध्य एशिया में वहाबी विचारधारा का प्रचार-प्रसार किया और साथ ही मुसाब-अल-ज़रकावी (ISIS का जनक), ओसामा बिन लादेन और आयमान-अल-जवाहिरी जैसे कुख्यात आतंकियों को फलने-फूलने का मौका दिया. इन लोगों ने सऊदी पैसों का जमकर उपयोग करते हुए न सिर्फ अपना जलवा कायम किया, बल्कि “वहाबी इस्लाम की कट्टर विचारधारा को विश्वव्यापी बनाया, जिसका जहरीला व्यापक रूप हम इक्कीसवीं शताब्दी में देख रहे हैं. 


आतंक के इस वहाबी खेल में एक और खिलाड़ी सारे घटनाक्रम को चुपचाप देख रहा था और इसमें उसका और उसके देश का फायदा कैसे हो यह सोच रहा था... वह “खिलाड़ी”(?) था पाकिस्तान का जनरल जिया-उल-हक. विश्व में घट रहे इस घटनाक्रम ने जनरल ज़िया को यह मौका दिया कि वह खुद को जिन्ना के बाद पाकिस्तान के सबसे वफादार इस्लामिक रहनुमा के रूप में खुद को पेश कर सके. 1977 में जुल्फिकार अली भुट्टो को अपदस्थ करके सैनिक विद्रोह से तानाशाह बने जनरल जिया-उल-हक ने 1979 में भुट्टो को सूली पर लटका दिया था. जिया-उल-हक यह बात अच्छी तरह से समझ चुका था कि भारत से सीधे युद्ध में नहीं जीता जा सकता, क्योंकि पिछले दोनों युद्ध जिया ने करीब से देखे थे. भारत को नुक्सान पहुँचाने के लिए जनरल जिया ने “Thousand Cuts” नामक नई रणनीति बनाई, जिसमें भारत के अंदर ही अंदर विवादित मुद्दों को हवा देना, आतंकियों से हमले करवाना, सेना और नागरिकों पर छोटे-छोटे हमले करवाना प्रमुख था (जनरल ज़िया की यह रणनीति पाकिस्तान और उसकी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI आज भी जारी रखे हुए है). जनरल ज़िया ने समय रहते ताड़ लिया था कि अमेरिका-रूस-सऊदी अरब के इस “युद्ध त्रिकोण” में यदि अधिकतम फायदा उठाना है तो “वहाबी विचारधारा” को बढ़ावा देते हुए सऊदी अरब और अमेरिका से पैसा झटकते रहना है. जनरल ज़िया जानता था कि यदि सुरक्षित रहना है और अनंतकाल तक विश्व को ब्लैकमेल करना हो तो “परमाणु ताकत” बनना जरूरी है, और इस काम के लिए बहुत सा धन चाहिए, जो केवल सऊदी अरब और जेहाद के नाम पर ही हासिल किया जा सकता है. उसने ठीक ऐसा ही किया, एक तरफ लगातार भारत के खिलाफ छद्म युद्ध जारी रखा और दूसरी तरफ सऊदी अरब को खुश करने के लिए उनका प्रिय बना रहा. सऊदी अरब का अकूत धन, वहाबी विचारधारा और परमाणु ताकत बनने के लिए सारे इस्लामिक जगत का राजनैतिक समर्थन, ज़िया-उल-हक को और क्या चाहिए था. बड़ी चतुराई से जनरल ज़िया ने पाकिस्तान को वहाबी आतंक की मुख्य धुरी बना लिया. और चीन एवं उत्तर कोरिया की मदद से परमाणु ताकत हासिल करके अमेरिका को ब्लैकमेल करने की स्थिति में ला दिया. ज़िया-उल-हक ने सऊदी राजपरिवार और प्रशासन की सुरक्षा हेतु 1989 में पाकिस्तान से एक पूरी ब्रिगेड बनाकर दी. इसके अलावा उसने अफगान सीमा पर स्थित शरणार्थी कैम्प में मदरसों की खासी संख्या खड़ी कर दी, जहाँ कट्टर मौलवियों ने सोवियत संघ के खिलाफ मुजाहिदीन तालिबानों को तैयार कर दिया. इन्हीं मुजाहिदीनों ने इस्लाम के नाम पर लगातार अपना युद्ध जारी रखा और अंततः नब्बे के दशक में अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्ज़ा कर ही लिया. इसके बाद तालिबान कश्मीर, बोस्निया, चेचन्या सहित बाकी विश्व में फैलना शुरू हो गए. अस्सी के दशक के अंत तक वहाबी विचारधारा और आतंक को मजबूत करने का यह खेल लगातार जारी रहा, क्योंकि वहाबियों को किसी भी कीमत पर ईरान के “शियाओं” के साथ शक्ति संतुलन में अपना वर्चस्व बनाए रखना था. इसीलिए जब से ईरान ने भी अपनी परमाणु शक्ति बढ़ाने का खुल्लमखुल्ला ऐलान कर दिया तो वहाबी पाकिस्तान अपने इस्लामिक परमाणु एकाधिकार को लेकर चिंतित हो गया. शिया ईरान को रोकने के लिए वहाबी विचारक अमेरिका की चमचागिरी से लेकर अन्य किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार थे. अमेरिका ने इन दोनों का बड़े ही शातिराना ढंग से उपयोग किया और अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने तथा उपभोगवादी जनता के लिए इन देशों से जमकर तेल चूसा. 


अमेरिका के इस खेल को सबसे पहली चुनौती मिली इराक के सद्दाम हुसैन से. सद्दाम हुसैन ने अमेरिका का खेल समझ लिया था और उसने सोचा कि क्यों न वह खुद ही इस खेल को खेले और ईराक को ईरान के मुकाबले मजबूत बना ले. इसी मुगालते में सद्दाम ने कुवैत पर हमला कर दिया और दर्जनों हत्याओं के साथ कुवैत के सैकड़ों तेल कुंए जला डाले. लेकिन सद्दाम का यह दुस्साहस उसे भारी पड़ा. अमेरिका से सीधी दुश्मनी और तेल पर कब्जे की लड़ाई में खुद तनकर खड़े होने अमेरिका को रास नहीं आया और उसने सद्दाम को ठिकाने लगाने के लिए नए जाल बुनने शुरू कर दिए. कहने का तात्पर्य यह है कि इस्लामी अर्थात वहाबी विचारधारा से पोषित आतंकवाद को समझने के लिए इस इतिहास को खंगालना बेहद जरूरी है. खुमैनी, सऊदी अरब और ज़िया-उल-हक की तिकड़ी तथा अमेरिका-रूस के बीच वैश्विक वर्चस्व की इस लड़ाई ने आतंकवाद को पोसने में बड़ी भूमिका निभाई... आज फ्रांस, फ्लोरिडा, बेल्जियम, ढाका आदि में जो लगातार हमले हम देख रहे हैं, वह इसी ऐतिहासिक “रक्तबीज” के अंश ही हैं

किसी समस्या को जड़-मूल से ख़त्म करने के लिए आयुर्वेदिक चिकित्सक सबसे पहले उस बीमारी का इतिहास जानते हैं, फिर कारण जानते हैं और उसी के अनुसार निवारण भी करते हैं. अभी जो हमने देखा वह इस्लामिक आतंकवाद की जड़ को, उसके इतिहास को समझने का प्रयास था. अब हम आते हैं कारण की ओर. आतंकवाद वर्तमान समय में इस विश्व की सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरा है, ऐसी समस्या जो कम होने की बजाय लगातार बढती ही जा रही है. यह समस्या ऐसा गंभीर रोग बन गयी है जिसका आज तक समाधान नहीं निकल पाया है. इस्लामिक आतंकवाद की इस समस्या को समझने के लिए सबसे पहले तो विश्व के तमाम नेताओं, लेखकों, बुद्धिजीवियों को यह समझना और मान्य करना होगा कि इसका सीधा सम्बन्ध मज़हबी व्याख्याओं से है. इस्लामिक आतंकवाद से लड़ने के लिए सैनिक, गोला-बारूद और टैंक कतई पर्याप्त नहीं हैं. जब तक हम शार्ली हेब्दो के कार्टून पर फ्रांस में मचाए गए कत्लेआम, अथवा डेनमार्क के कार्टूनिस्ट की हत्या अथवा सलमान रश्दी के खिलाफ फतवे अथवा यजीदी महिलाओं के साथ बलात्कार और उन्हें गुलामों की तरह खरीदे-बेचे जाने के पीछे की मानसिकता को नहीं समझते, और स्वीकार करते तब तक सभी लोग केवल अँधेरे में तीर चला रहे होंगे और अनंतकाल तक चलने वाले इस युद्ध में खुद को झोंके रखेंगे. जिस तरह फ्रांस के राष्ट्रपति अथवा अमेरिका के राष्ट्रपति उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने खुलेआम कहा, उसी तरह स्वीकार कीजिए कि इस्लाम की शिक्षाओं एवं कुरआन की व्याख्याओं के गलत-सलत अनुवादों एवं मुल्ला-मौलवियों द्वारा मनमाने तरीके से हदीस और शरीयत को लागू करने के कारण ही यह समस्या नासूर बनी है. यह एक तरह से मलेरिया के खिलाफ युद्ध है. केवल मच्छर मारने अथवा कुनैन की गोली खिलाने से मरीज की बात नहीं बनेगी, बल्कि जिस गंदे पानी में मलेरिया के लार्वा पनप रहे हैं, जहां से प्रेरणा ले रहे हैं, उस पानी में दवा का छिड़काव जरूरी है. अर्थात मूल समस्या यह है की इस्लामिक धर्मगुरुओं द्वारा मनमाने तरीके से कुरआन-हदीस की व्याख्या की गई है, सबसे पहले बौद्धिक रूप से युद्ध करके उसे दुरुस्त करना पड़ेगा. भारत के इस्लामिक बुद्धिजीवी मौलाना वहीदुद्दीन खान ने समस्या की जड़ को बिलकुल सही पकड़ा है. वहीदुद्दीन लिखते हैं कि चूंकि विभिन्न देशों में कार्यरत मौलवियों, उलेमाओं और काज़ियों की उनके इलाके की जनता पर खासी पकड़ होती है, इसलिए वे चाहते हैं कि उनका यह वर्चस्व बना रहे, इसलिए तात्कालिक परिस्थितियों के मुताबिक़ वे कुरआन-हदीस और शरीयत के मनमाने मतलब निकालकर मुस्लिम समुदाय को दबाए रखते हैं. कुछ मौलवी तो इस हद तक चले जाते हैं, कि उनके अलावा कोई दूसरा मुसलमान कुरआन की व्याख्या कर ही नहीं सकता. 


मौलाना वहीदुद्दीन खान के अनुसार कुरआन के नाज़िल होने के पश्चात कई वर्षों तक इस्लामिक समाज के नियमों एवं मान्यताओं पर कई विद्वानों ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार उसकी व्याख्या की जिसे तत्कालीन शासकों का समर्थन भी मिलता रहा, और धीरे-धीरे यह मान लिया गया कि यह सब कुरआन में ही है और मौलवी कह रहे हैं तो सही ही होगा. एक और इस्लामिक विद्वान तारेक फतह कहते हैं कि पैगम्बर मोहम्मद द्वारा पूरी कुरआन लगभग तेईस वर्ष में नाज़िल की गई. ईस्वी सन 632 में पैगम्बर मोहम्मद की मृत्यु के पश्चात ही विवाद शुरू हो गए थे. अपनी पुस्तक में तारिक लिखते हैं की पैगम्बर मोहम्मद की जीवनी जिसे सूरा कहते हैं, लगभग सौ वर्ष बाद लिखी गई, इसी प्रकार हदीस को भी लगभग दो सौ से चार सौ वर्षों के बीच लगातार लिखा जाता रहा. जबकि शरीयत क़ानून पैगम्बर की मौत के चार सौ से छः सौ वर्ष बाद तक लिखे जाते रहे, उसमें बदलाव होते रहे, उसकी मनमानी व्याख्याएँ की जाती रहीं. इस्लाम की सबसे कट्टर व्याख्याएँ अब्दुल वहाब (1703-1792) द्वारा की गईं. सन 1803 से 1813 तक मक्का पर सऊदी नियंत्रण था, उसके बाद ओटोमान ने इसे वापस हासिल किया. हालांकि अंत में 1925 में यह पुनः सऊदी कब्जे में आया और सऊदी साम्राज्य ने मक्का-मदीना की लगभग 90% इमारतें गिरा दीं, यहाँ तक की जिसमें खुद पैगम्बर मोहम्मद रहते थे उस इमारत को भी नहीं छोड़ा. अब ये कट्टर वहाबी रूप इस कदर फ़ैल गया है की ISIS ने भी विभिन्न मज़ारों और इस्लाम की ऐतिहासिक धरोहरों को ही नष्ट करना शुरू कर दिया है. ऐसे में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इस्लाम की धार्मिक व्याख्याओं में कितना घालमेल है, और इसी वजह से भारत में जाकिर नाईक, पाकिस्तान में अल-जवाहिरी अथवा ब्रिटेन में अंजेम चौधरी जैसे तथाकथित इस्लामिक विद्वान बड़ी आसानी से युवाओं को बरगला लेते हैं. इस्लाम के संस्थापक पैगम्बर मोहम्मद निश्चित रूप से एक चतुर और बुद्धिमान व्यक्ति थे, उन्होंने अपनी प्रत्येक रणनीति को सीधे “अल्लाह” से जोड़ दिया और अपने प्रत्येक विरोधी को काफ़िर घोषित कर दिया. तत्कालीन परिस्थितियों में उनकी वह रणनीति कामयाब भी रही, लेकिन उनकी मृत्यु के पश्चात इसी विचार को आगे बढाते हुए ढेरों मौलवियों ने सैकड़ों वर्ष तक कुरआन की मनमानी व्याख्या की. ऐसे में इस विचारधारा का मुकाबला केवल गोलियों-बम-बन्दूकों से संभव नहीं है, इसे तो बौद्धिक स्तर पर लड़ना होगा. वहाबी इस्लाम तो शियाओं के साथ सहा-अस्तित्त्व को भी राजी नहीं है. वहाबी मूवमेंट में निशाने पर सबसे पहले शिया ही रहे हैं, जिनका अस्तित्व खत्म करने के लिए सऊदी अरब पोषित इस्लाम ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया. अतः कोई यह कैसे कह सकता है कि, आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता? परन्तु आतंकी तो मौलवियों द्वारा इस्लाम की गलत व्याख्या के कारण इसे अल्लाह और कुरान का आदेश मानते हैं. मुस्लिम समुदाय के अन्दर से आवाज़ उठनी चाहिए कि वे ऐसे आरोपों से बचना चाहते हैं. ये लोग खुलकर आतंकवाद के खिलाफ आगे आएँ और कहें कि आतंकवादी अपने साथ इस्लाम शब्द को जोड़ना बंद करें. अपने कुकर्मों को अल्लाह या कुरान का आदेश बताना बंद करें. तमाम आतंकी संगठनों के नाम में इस्लाम के पवित्र शब्दों को रखना बंद करें. क्योंकि जब तक मुस्लिम समुदाय खुद को नहीं बदलता, और अपनी मजहबी संकीर्ण सोच खत्म करके आतंकियों, मुल्ला-मौलवियों के खिलाफ उठ खड़ा नहीं होता, तब तक उसे ऐसे आरोप झेलने ही पड़ेंगे. ज़ाहिर है कि यह काम इस्लाम के भीतर से ही होगा, बाहर से कोई गैर-इस्लामी व्यक्ति इस बहस में घुसेगा तो न सिर्फ मुंह की खाएगा, बल्कि उसकी मंशा पर भी शक किया जाएगा. इसलिए तारिक फतह, तसलीमा नसरीन, सलमान रश्दी, मौलाना वहीदुद्दीन खान, जूडी जेसर, अली सिना, इमरान फिरासत जैसे लोगों को आगे आना होगा, विमर्श आरम्भ करने होंगे, विभिन्न देशों में स्थित मुसलमानों को इस्लाम की सही व्याख्या करके दिखानी होगी, सेमिनार-पुस्तकें इत्यादि आयोजित करने होंगे. लेकिन साथ ही साथ आतंकियों के सामने घुटने नहीं टेकने की ठोस नीति बनानी होगी. इसीलिए विभिन्न सरकारों, गुप्तचर सेवाओं को साथ लेना होगा, तथा विशेषकर पाकिस्तान (जो इस आतंक का वैचारिक पोषक है) पर नकेल कसनी होगी. 


ये तो हुआ पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण कदम यानी कट्टर इस्लाम का उदार इस्लाम से बौद्धिक युद्ध. इसी के साथ जुडी हुई वैचारिक भ्रान्तियों को भी दूर करने की जरूरत है. यह वैचारिक भ्रान्तियाँ वामपंथियों तथा सेकुलर बुद्धिजीवियों ने फैला रखी हैं. जिसमें से सबसे पहली भ्रान्ति है कि – “ये आतंकी गरीब और अनपढ़ हैं, इसलिए मौलवियों के जाल में फँस जाते हैं”. यह सबसे बड़ा झूठ है जो चरणबद्ध तरीके से फैलाया गया है, क्योंकि खुद ओसामा बिन लादेन अरबपति था, अच्छा-ख़ासा पढ़ा लिखा था. ट्विन टावर से हवाई जहाज भिड़ाने वाला मोहम्मद अत्ता पायलट था, बंगलौर से ISIS का ट्विटर हैंडल चलाने वाला प्रमुख स्लीपर सेल सॉफ्टवेयर इंजीनियर है. यानी कि पेट्रो-डॉलर में अरबों रूपए कमाने वाले देशों द्वारा बाकायदा जिन मुस्लिम लड़कों का ब्रेनवॉश किया जाता है, उनमें से अधिकाँश पढ़े-लिखे इंजीनियर, डॉक्टर, सॉफ्टवेयर कर्मी तथा मैनेजमेंट स्तर की पढ़ाई कर चुके लोग हैं. ज़ाहिर है कि शिक्षा की कमी वाला तर्क एकदम बेकार है... इसी प्रकार यह कहना भी एकदम बकवास है कि मुस्लिम आतंक के पीछे शोषण या गरीबी है. जब “तथाकथित” बुद्धिजीवी यह बहानेबाजी बन्द कर देंगे कि इस्लामिक आतंक की समस्या शोषण, गरीबी, अथवा अशिक्षा है, तभी इस समस्या का हल निकाला जा सकता है, क्योंकि यह सिद्ध हो चुका है कि यह समस्या केवल और केवल मौलवियों तथा निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा कुरआन-हदीस-शरीयत की गलत व्याख्या और जेहाद तथा बहत्तर हूरों जैसी कहानियाँ सुनाकर मज़हबी वैचारिक ज़हर फैलाने के कारण है. इसका मुकाबला करने के लिए वैचारिक पाखण्ड छोड़ना पड़ेगा, और मिलकर काम करना होगा. जहाँ-जहाँ सैनिक शक्ति जरूरी है, वह तो सरकारें कर ही रही हैं, परन्तु बौद्धिक युद्ध ज्यादा महत्त्वपूर्ण है. इस्लामी जगत में बच्चों को वैचारिक रूप से जागरूक बनाना होगा, उनके सामने इस्लाम की सही तस्वीर पेश करनी होगी और जवाहिरी-लादेन-ज़ाकिर-अंजुम जैसे इस्लाम को विकृत करने वाले प्रचारकों पर लगाम कसनी होगी. 


इस्लामिक आतंकवाद की समस्या का एक और महत्त्वपूर्ण पहलू है, जो कि अर्थव्यवस्था और धन से जुड़ा हुआ है और इस पहलू पर भी केवल इस्लामिक देशों द्वारा ही काबू पाया जा सकता है. यह पहलू है कच्चे तेल से जुडी राजनीति का. विश्व की महाशक्तियाँ इस्लामी देशों से निकलने वाले तेल पर शुरू से निगाह बनाए हुए हैं. कच्चे तेल के बैरलों की भूख ने दुनिया में लाखों मासूमों का खून बहाया है. उल्लेखनीय है कि अमेरिका ने सऊदी अरब के राजपरिवार पर लगभग कब्ज़ा किया हुआ है. अमेरिका ने सऊदी अरब में अपना स्थायी अड्डा जमा रखा है. सभी जानते हैं कि अमेरिका महा-उपभोगवादी देश है और पेट्रोल का प्यासा है. सबसे पहले अमेरिका ने ही “तेल का खेल” शुरू किया और सऊदी अरब को अपने जाल में फँसाया. सद्दाम हुसैन पर नकली आरोप मढ़कर ईराक को बर्बाद करने और वहाँ के तेल कुओं से कच्चा तेल हथियाने का खेल भी अमेरिका ने ही खेला. अमेरिका की देखादेखी रूस भी इस खेल में कूदा और दस साल तक अफगानिस्तान में जमा रहा. चाहे नाईजीरिया हो, अथवा वेनेजुएला हो.. जिस-जिस देश में अकूत तेल की सम्पदा है, वहाँ-वहाँ अमेरिका की टेढ़ी निगाह जरूर पड़ती है. हाल ही में तुर्की में हुए जी20 शिखर सम्मेलन के मौके पर दुनिया के सभी देशों ने पेरिस में हुए आंतकी हमले की भरसक निंदा की. परन्तु सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने हैरतअंगेज खुलासा किया कि दुनिया के चालीस से अधिक देश आंतकवाद को फाइनेंस कर रहे हैं, और इसमें से कई देश जी20 समूह में शामिल हैं. 

पुतिन ने इन देशों के नाम तो नहीं लिया लेकिन यह जरूर साफ किया कि इनमें से कुछ ऐसे देश हैं, जो दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हैं. चूँकि जी20 समूह दुनिया की बीस सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का समूह है. इनमें अमेरिका, चीन, फ्रांस, सउदी अरब, ब्राजील और भारत या खुद रूस भी हो सकता है. पिछले एक साल में जिस तरह से इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने काला झंडा उठा रखा है और सीरिया तथा ईराक के तेल के भंडारों पर कब्जा किया है, उससे साफ है कि यह आतंकवाद का नया दौर है, जहां एक इस्लामिक कट्टर संगठन एक स्वयंभू “राज्य” बनने की कोशिश कर रहा है. पश्चिमी मीडिया और कच्चे तेल के कारोबार से जुड़े संगठन दावा कर चुके हैं, कि ISIS अपने कब्जे वाले तेल के भंडारों से तेल निकाल कर बहुत कम दामों पर बेच रहा है. जिस कारण तेल की कीमतों के अन्तर्राष्ट्रीय भावों में अस्थिरता बनी हुई है और कई देश इस उतार-चढ़ाव की चपेट में हैं. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में पिछले एक साल से कच्चा तेल 110 डॉलर के स्तर से गिरकर 40 डॉलर के आसपास बिक रहा है. उधर ओपेक देशों (जिनमें सभी इस्लामिक देश हैं) की आपसी खींचतान में ईराक सरकार के तेल भंडारों से जमकर तेल निकाला जा रहा है. तेल के बाजार में अपनी उपस्थिति बनाए रखने के लिए ईराक सरकार को 30 डॉलर प्रति बैरल की दर पर कच्चा तेल बेचना पड़ रहा है. जबकि उधर ISIS अपने कब्जे वाले भंडारों से तेल निकाल कर अंतरराष्ट्रीय बाजार में 20 डॉलर प्रति बैरल की दर से बेच रहा है. रूसी राष्ट्रपति पुतिन के अनुसार रूस ने अपने सैटेलाइट के द्वारा देखा है कि ISIS के कब्जे वाले इलाकों में हजारों की संख्या में कच्चा तेल लेने के लिए टैंकरों के भीड़ लगी हुई है.  


अब यहाँ सवाल उठता है कि जब ISIS बीस डॉलर की दर से तेल बेच रहा है और करोड़ों रूपए कमा रहा है तो यह पैसा कहाँ जा रहा है? ज़ाहिर है कि हथियार और अन्य सैन्य उपकरण खरीदने में. विश्व में हथियारों का सबसे बड़ा विक्रेता कौन है, अमेरिका. अर्थात घूम-फिरकर पैसा पुनः अमेरिका के पास ही पहुँच रहा है. तमाम इस्लामिक आतंकी संगठन दावा करते हैं कि अमेरिका और इजरायल उनके दुश्मन नंबर वन हैं, लेकिन वास्तव में देखा जाए तो “कच्चे तेल के इस आर्थिक गेम” में सबसे बड़ा खिलाड़ी, अम्पायर और विपक्ष खुद अमेरिका ही है. इस्लामिक देशों के शासक या तो बेवकूफ हैं, या लालची हैं. अमेरिका ने सऊदी अरब में अपनी मनमर्जी चला रखी है, इसी तरह “ओपेक” देशों में से कई देशों में उसकी कठपुतली सरकारें काम कर रही हैं. परन्तु गलती अकेले अमेरिका की ही क्यों मानी जाए? मुस्लिम बुद्धिजीवी और इस्लामिक जगत के प्रभावशाली लोग इन इस्लामी शासकों को यह बात क्यों नहीं समझाते कि जब तक पश्चिमी देशों का दखल इस इलाके में बना रहेगा, तब तक आपस में युद्ध भी चलते रहेंगे, मारकाट और आतंक भी पाला-पोसा जाता रहेगा. हमेशा से अमेरिका के दोनों हाथों में लड्डू रहते हैं. ईरान-ईराक के दस वर्ष लंबे युद्ध में दोनों देशों को हथियार बेचकर सबसे अधिक कमाई अमेरिका ने ही की. जब युद्ध समाप्त हो गया, तब भी विभिन्न बहाने बनाकर वह क्षेत्र में पैर जमाए बैठा रहा. रूस और चीन, अमेरिका का यह खेल समझते हैं परन्तु खुलकर उससे दुश्मनी लेने से बचते रहे हैं. यदि अमेरिका और पश्चिमी देश चाहें तो कभी भी ISIS का खात्मा कर सकते हैं, लेकिन फिर बीस डॉलर के भाव से मिलने वाला कच्चा तेल भी मिलना बन्द हो जाएगा और हथियारों की बिक्री भी बन्द हो जाएगी. 

अंत में संक्षेप में इतना ही कहना है कि “इस्लामिक आतंकवाद” की समस्या केवल जलेबी ही नहीं बल्कि इमरती और नूडल्स की तरह टेढ़ी-मेढ़ी और उलझी हुई है. इसमें कई पक्ष आपस में एक-दूसरे से टकरा रहे हैं. फिर भी जैसा कि लेख में सुझाया गया है, यदि इस्लामिक विद्वान और बुद्धिजीवी कुरआन-हदीस की सही और सटीक व्याख्याएँ करके आने वाली पीढ़ी को जेहादी मानसिकता से दूर ले जाने में सफल हों तथा इस्लामिक देश अपने यहाँ अमेरिका व पश्चिमी देशों का दखल बन्द करके अपने लालच (और मूर्खता) में कमी लाएँ, तो काफी हद तक इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है. ज़ाहिर है कि ये उपाय अपनाना इतना सरल भी नहीं है, तो लड़ाई लंबी है. कल फ्रांस था, आज इस्ताम्बुल है, तो कल बाली या परसों कोलकाता भी हो सकता है और मानवता के पैरोकार व शांति की चाहत रखने वाले सामान्य मनुष्य के लिए फिलहाल तो कोई राहत नहीं है... 

Monday, July 18, 2016

Communist, Atheists - A Fraud


वामपंथी नास्तिकता : झूठ और धूर्तता 

(आशीष छारी जी की फेसबुक पोस्ट से साभार) 

कुछ दिन पहले जावेद अख्तर बड़े फकर से कह रहे थे कि वे एथीस्ट हैं, एथीस्ट मने नास्तिक....... बतला रहे थे कि जवान होते होते वे एथीस्ट हो गए थे, वे किसी अल्लाह को नहीं मानते, कभी रोज़ा नहीं रखा, मस्जिद नहीं गए नमाज़ नहीं पढ़े...... टोटल एथीस्ट....,,., लेकिन जब भी मैं इनकी दीवार फ़िल्म देखता हूँ तो चक्कर खा जाता हूँ, शक होता है कि ये एथीस्ट झूठ तो नहीं बोल रहा कहीं....... फ़िल्म देखिये, फ़िल्म में क्या दिखाया है कि वर्मा जी का लौंडा विजय (अमिताभ बच्चन) बचपन से ही भगवान से रूठ जाता है, मंदिर नहीं जाता, अपनी माँ सुमित्रा (निरुपमा रॉय) के कहने पर भी मंदिर की सीढ़ी नहीं चढ़ता...... जोर जबरदस्ती करने पर मंदिर का पुजारी टोक देता है, नहीं बहन भगवान् की पूजा जोर जबरदस्ती से नहीं होती श्रद्धा से होती जब इसके दिल में श्रद्धा जागेगी तब ये खुद ही मंदिर आ जाएगा....... वाह कितनी प्यारी बात कहीं पुजारी ने, खैर अच्छा था कि जगह मंदिर थी और सामने पुजारी था, कहीं मस्जिद होती और सामने मौलवी साहब होते तो पक्का फतवा जारी हो जाता...... ला हॉल विला कूवत इल्ला बिल्ला अल्लाह की तौहीन की है इस लौंडे ने, दीन को मानने से मना किया है इसने, ये काफ़िर हो चुका है, काफिरों के लिए मुताबिक ए दीन बस एक ही सजा है..... मुरतीद मुरतीद..... मने सर कलम कर फुटबॉल खेली जाए........ हुक्म की तालीम हो...... हेहेहे..... 


खैर छोड़िये, पिछली बात पे वापस आते हैं, तो मामला ये है कि पूरी फ़िल्म में विजय भगवान से छत्तीस का आंकड़ा बना कर चलता है, जताया कुछ यूँ गया है कि फ़िल्म का नायक भगवान् को नहीं मानता और मंदिर नहीं जाता......... मने एथीस्ट हो चुका है पर जब डॉकयार्ड पर काम करने वाले रहीम चच्चा विजय को उसकी बांह पर बंधे 786 नंबर के लॉकेट के बारे में इल्म देते हैं, कि बेटा 786 का मतलब होता है बिस्मिल्लाह, इसे हम लोगों में बड़ा मुबारक समझा जाता है......... सामन्त के आदमी की चलाई गोली जब विजय को लगती है, और बिल्ले की वजह से विजय बच जाता है तब विजय को इल्हाम होता है कि 786 नंबर तो बड़ा पावरफुल है तब वो बिल्ले को बार बार चूमता है और हमेशा अपने पास सीने से लगा कर रखता है और चूमता रहता है मने एक एथीस्ट को बिस्मिल्लाह में तो विश्वास है लेकिन भगवान में नहीं............. 

सियापे की हद तो देखिये जब विजय की माँ बीमार होती है, जिंदगी और मौत से जूझ रही होती है तब विजय को मंदिर की याद आती है अल्लाह मियाँ फ्रेम से ग़ायब हो जाते हैं...... मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ विजय भगवान् के सामने खड़ा है और कहता है- मैं आज तक तेरी सीढ़ियाँ नहीं चढ़ा...... अब कोई पूछे कि bc अब क्यों चढ़ा बे........ मैंने आज तक तुझसे कुछ नहीं माँगा....... तो अब क्यों मांग रहा है भो%* के............ बताओ भला अब ये क्या बात हुयी यार, वैसे एथीस्ट हैं, मंदिर की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ेंगे पर बिस्मिल्लाह (786) को चूमेंगे दिन में दस बार, छाती से चिपका कर रखेंगे और कहीं कुछ गलत हो जाए तो भगवान् की ऐसी-तैसी करेंगे, शुरू हो जाएंगे भगवन को हूल-पट्टी देने....... 


जावेद अख्तर साहब कहते हैं कि वे शुरू से एथीस्ट रहे हैं लेकिन फ़िल्म की कहानी लिखते समय इस्लाम की ओर झुक जाते हैं, उनका नायक एथीस्ट है, भगवान को नहीं मानता लेकिन अल्लाह और 786 को पूरी शिद्दत से मानता है, ये कैसा एथिस्टपना हुआ........ ये तो बिलकुल वैसा ही हुआ जैसे उमर खालिद की बहन कहती है कि उसका भाई किसी इस्लाम को नहीं मानता लेकिन नारे वो JNU में इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह के लगवाता है और पूरी शिद्दत से अपनी कौम के प्रति पूरी निष्ठा निभाते हुए हर मुस्लिम की तरह दूसरे मुस्लिम (अफज़ल गुरु) के प्रति पूरी वफादारी रखता है............ पिताजी जब ज़िंदा थे तो वे बताते थे कि जब ये फ़िल्म दीवार आई थी तब बहुत से लौंडे खुद को अमिताभ बच्चन समझकर मंदिर की सीढ़ियों पर मुंह फुलाये बैठे देखे जाते थे, मेले ठेलों से 786 के लॉकेट और बिल्ले खरीदकर अपनी चौड़े कॉलर की नीली शर्ट की ऊपरी जेब जो दिल के पास होती है उसमें खूब रखते देखे जाते थे......... खैर मैं फ़िल्में बहुत देखता हूँ और फिल्मों में अक्सर देखता है कि फ़िल्म का हिन्दू नायक भगवान में विश्वास नहीं रखता, मंदिर की सीढ़ी नहीं चढ़ता, प्रसाद नहीं खाता वगैरह वगैरह लेकिन आज तक किसी मुस्लिम या ईसाई नायक को अल्लाह या गॉड की खिलाफत करते नहीं देखा......... मस्जिद या गिरजे की सीढ़ियों पर बैठे नहीं देखा...... अल्लाह या गॉड से मुंह फुलाये नहीं बल्कि अपने मजहब के प्रति पूरी निष्ठा रखते जरूर देखा है....... दिखाया जाता है कि फ़िल्म के मुस्लिम या ईसाई नायक का अपने रिलिजन में पूरा पूरा फेथ रखता है बस असली गड़बड़ तो हीरो को भगवान् से है........ ये फिल्मों का ही असर है कि जब मैंने कई सुतियों को खुद को किसी फ़िल्मी नायक की तरह आज भी भगवान से मुंह फुलाये मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे देखा है....... 

एथीस्ट होना तो जैसे आजकल फैशन हो गया है वैसे ही जैसे JNU में हो गया है..... मैं फ़िल्मी एथीस्ट और JNU छाप एथीस्ट में बहुत समानता पाता हूँ........ फ़िल्मी एथीस्ट की लड़ाई सिर्फ भगवान से है बाकी अल्लाह और गॉड से उसे कोई दिक्कत नहीं, ठीक ऐसे ही JNU छाप एथीस्ट भी भगवान् के पीछे लठ्ठ लिए फिरते हैं....... देवी दुर्गा एक हिन्दू मिथक है लेकिन महिषासुर वास्तविकता है, माँ दुर्गा की पूजा करना अन्धविश्वास है लेकिन महिषासुर को पूजना आधुनिकता है......... राम राम बोलना कट्टरता है लेकिन इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह बोलना धार्मिकता है, दिवाली होली मनाना बुजुरुआ बोडमता का प्रतीक है लेकिन ईद और क्रिसमस मनाना साम्यवादिता का लोगो है, JNU कम्युनिस्ट कहते हैं कि वे एथीस्ट हैं धर्म उनके लिए अफीम है लेकिन उनका एथीसिस्म इस्लाम और ईसाईयत को रसगुल्ला समझता है और हिंदुत्व को अफीम, गांजा, चरस, कोकीन, हेरोइन......... सारी हूल-पट्टी भगवान् के लिए रख जोड़ी हैं बाकी अल्लाह या गॉड के लिए चूमा चाटी का इल्हाम है, बड़ा अजीब एथीसिस्म है यार इनका....... 

मैंने दुनिया में कई एथीस्ट ऐसे देखे हैं जिनका एथीस्टपना सभी मजहब के लिए बराबर होता है, वे जिनती ईमानदारी से दूसरे धर्म की कमियां निकालते हैं उससे अधिक ईमानदारी दिखाते हुए वे अपने धर्म की बखिया उधेड़ देते हैं लेकिन JNU में एथीस्ट होने के मायने थोड़ा अलग है बिकुल दीवार फ़िल्म के नायक के जैसे........... भगवान् से रूठकर मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ जाइए लेकिन जैसे ही 786 का बिल्ला मिले तो उसको चुमिये, माथे से लगाइये........ 

दरअसल JNU ही नहीं पूरे देश में एथीस्ट होने का मतलब है सिर्फ और सिर्फ हिन्दुज्म का आलोचक होना है गोया हिन्दुज्म न हुआ एथीस्टों की प्रेक्टिस के लिए पंचिंग बेग हो गया.........

(मूल लेखक - आशीष छारी)

Thursday, July 7, 2016

Demand for Seprarate Namaz Room in School : Secularism Flourished in Bengal



स्कूल में नमाज के लिए अलग कमरे की माँग... :- पश्चिम बंगाल में फलता-फूलता सेकुलरिज़्म...
 


बंगाल में हावड़ा से पच्चीस मिनट की दूरी पर स्थित कटवा पहुँचने के लिए बस एवं रेलसेवा दोनों उपलब्ध हैं. कटवा के पास ही स्थित है बांकापासी, जो कि बर्दवान जिले के मंगलकोट विकासखंड में आता है. इस बांकापासी कस्बे में एक स्कूल है जिसका नाम है बांकापासी शारदा स्मृति हाईस्कूल. इस स्कूल में प्रायमरी, सेकंडरी और हायर सेकंडरी की कक्षाएँ लगती हैं. यह स्कूल हिन्दू बहुल बस्ती में पड़ता है. स्कूल के 70% छात्र हिन्दू और 30% छात्र मुस्लिम हैं जो कि पास के गाँवों दुरमुट, मुरुलिया इत्यादि से आते हैं. स्कूल का मुख्य द्वार दो शेरों एवं हंस पर विराजमान वीणावादिनी सरस्वती की मूर्ति से सजा हुआ है. 

पिछले पखवाड़े के रविवार को स्कूल में पूर्ण शान्ति थी, परन्तु स्कूल के प्रिंसिपल डॉक्टर पीयूषकान्ति दान अपना पेंडिंग कार्य निपटाने के लिए स्कूल आए हुए थे. अचानक उन्हें भान हुआ कि स्कूल की दीवार के अंदर कोई हलचल हुई है, तो वे तत्काल अपने कमरे से बाहर निकलकर स्कूल के हरे-भरे लॉन में पहुँचे, परन्तु वहाँ कोई नहीं था. असल में प्रिंसिपल पीयूषकांत दान नहीं चाहते थे कि शुक्रवार के दिन स्कूल में हो हुआ, उसकी पुनरावृत्ति हो. असल में स्कूल में पढ़ने वाले 30% मुस्लिम लड़कों ने स्कूल में नमाज पढ़ने के लिए एक अलग विशेष कमरे की माँग करते हुए जमकर हंगामा किया था. 


२४ जून २०१६ को कुछ मुसलमान छात्रों ने अचानक दोपहर को अपनी कक्षाएँ छोड़कर स्कूल के लॉन में एकत्रित होकर नमाज पढ़ना शुरू कर दिया था, जबकि उधर हिन्दू छात्रों की कक्षाएँ चल रही थीं. चूँकि उस समय यह अचानक हुआ और नमाजियों की संख्या कम थी इसलिए स्कूल प्रशासन ने इसे यह सोचकर नज़रंदाज़ कर दिया कि रमजान माह चल रहा है तो अपवाद स्वरूप ऐसा हुआ होगा. लेकिन नहीं... २५ जून यानी शनिवार को पुनः मुस्लिम छात्रों का हुजूम उमड़ पड़ा, प्रिंसिपल के दफ्तर के सामने एकत्रित होकर “नारा-ए-तकबीर, अल्ला-हो-अकबर” के नारे लगाए जाने लगे. कुछ छात्र प्रिंसिपल के कमरे में घुसे और उन्होंने माँग की, कि उन्हें जल्दी से जल्दी स्कूल परिसर के अंदर पूरे वर्ष भर नमाज पढ़ने के लिए एक विशेष कमरा आवंटित किया जाए. इन्हीं में से कुछ छात्रों के माँग थी कि प्रातःकालीन सरस्वती पूजा पर भी रोक लगाई जाए. इन जेहादी मानसिकता वाले “कथित छात्रों” ने प्रिंसिपल को एक घंटे तक उनके कमरे में बंधक बनाकर रखा. 

प्रिंसिपल ने स्कूल की प्रबंध कमेटी के सदस्यों से संपर्क किया, जिसने मामले को सुलझाने के लिए आगे पुलिस से संपर्क किया. पुलिस ने आकर माहौल को ठण्डा किया, परन्तु यह सिर्फ तात्कालिक उपाय था. जब पूरे घटनाक्रम की खबर हिन्दू लड़कों को लगी, तो सभी शाम को बाज़ार हिन्दू मिलन मंदिर और कैचार हिन्दू मिलन मंदिर में मिले और एक बैठक की. इस बैठक में निर्णय लिया गया कि मुसलमान छात्रों की इस गुंडागर्दी और नाजायज़ माँग का पुरज़ोर विरोध किया जाएगा. अगले दिन सुबह हिन्दू छात्रों ने एकत्रित होकर प्रिंसिपल से यह माँग की, कि यदि मुस्लिम छात्रों को नमाज़ के लिए अलग कमरा दिया गया तो उन्हें भी “हरिनाम संकीर्तन” करने के लिए एक अलग कमरा दिया जाए. हिन्दू-मुस्लिम छात्रों के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए कैछार पुलिस चौकी से पुलिस आई और दोनों गुटों को अलग-अलग किया. 

जब हिन्दू छात्रों की ऐसी एकता की खबर फ़ैली तो प्रबंध कमेटी के ही एक मुस्लिम सदस्य उज्जल शेख ने घोषणा की, कि ना तो मुसलमानों को नमाज के लिए कोई अलग कमरा मिलेगा और ना ही हिंदुओं को संकीर्तन के लिए. प्रतिदिन स्कूल आरम्भ होने से पहले जो सरस्वती पूजा आयोजित होती है वह नियमित रहेगी. मामले की गहराई से जाँच-पड़ताल करने पर बांकापासी, पिंदिरा, लक्ष्मीपुर, बेलग्राम, कुल्सुना, दुर्मुट सहित आसपास के गाँवों में रह रहे हिंदुओं ने बताया कि जब से कट्टर मुस्लिम नेता TMC के सिद्दीकुल्लाह चौधरी इस विधानसभा सीट से जीते हैं, तभी से मुस्लिम धार्मिक और अतिवादी गतिविधियों में बढ़ोतरी हुई है. ममता बनर्जी की मुस्लिम-परस्त नीतियों और तुष्टिकरण से इलाके के मुसलमानों के हौसले बुलंद हो चले हैं, इसीलिए स्कूल में 30% होने के बावजूद उन्होंने इतना हंगामा कर डाला. 


ज्ञात हो कि सिद्दीकुल्लाह चौधरी अभी भी जमात-ए-उलेमा-हिन्द के कई समूहों का गुप्त रूप से संचालन करता है ताकि उसकी राजनैतिक शक्ति बनी रहे. सिद्दीकुल्लाह तृणमूल काँग्रेस में इसीलिए गया, ताकि वह अपनी सत्ता बरकरार रख सके. चौधरी द्वारा संचालित समूह “एक घंटे में कुरआन” नामक छोटे-छोटे समूह चलाता है, जिसमें इलाके के मुस्लिम छात्रों का ब्रेनवॉश किया जाता है. इस कार्य के लिए सिद्दीकुल्लाह को तबलीगी जमातों से चंदा भी मिलता है. चौधरी के निकट संबंधी हैं, बदरुद्दीन अजमल, जो कि असम में अपने ज़हरीले भाषणों के लिए जाने जाते हैं. 

हालाँकि फिलहाल बांकापासी हाईस्कूल में स्थिति तनावपूर्ण किन्तु नियंत्रण में बनी हुई है, परन्तु इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि मुस्लिम छात्रों का कोई और उग्र समूह, किसी और स्कूल में घुसकर सरस्वती पूजा पर प्रतिबन्ध एवं नमाज के लिए अलग विशेष कमरे की माँग न करने लगे. क्योंकि बंगाल के कुछ इलाकों के स्कूलों में यह माँग उठने लगी है कि मुस्लिम बच्चों को मध्यान्ह भोजन में गौमांस अथवा हलाल मीट दिया जाए, भले ही वहाँ हिन्दू बच्चे भी साथ में पढ़ रहे हों. मुमताज़ बानो, उर्फ ममता बनर्जी के शासन में बंगाल के प्रशासन का जिस तेजी से साम्प्रदायिकीकरण हो रहा है, उसे देखते हुए “मिशन मुस्लिम बांग्ला” का दिन दूर भी नहीं लगता. 

तो फिर इलाज क्या है??? इलाज है ये... जो दिल्ली के सुन्दर नगरी में हनुमान मंदिर में हिंदुओं ने किया... इसे पढ़िए और सोचिये कि क्या किया जाना चाहिए... 


Tuesday, July 5, 2016

Love for Outsiders and Ideological Distance : New Avatar of BJP


गैरों पे करम और विचारधारा से भटकाव – भाजपा का नया अवतार

हाल ही में जब उड़ीसा के पूर्व मुख्यमंत्री एवं धुर काँग्रेसी सांसद गिरधर गमांग को भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्त्व ने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल किया तो सुदूर कहीं जमीन पर बैठे भाजपा के लाखों कार्यकर्ताओं के दिल के ज़ख्मों से घाव पुनः रिसने लगा. यह ज़ख्म था 1999 में अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार के एक वोट से गिरने का कभी ना भूलने वाला घाव. कड़े जमीनी संघर्षों और कार्यकर्ताओं की अथक मेहनत से अटल जी की वह सरकार सत्ता में आई थी, जिसे संसद में इन्हीं गिरधर गमांग महोदय ने बड़ी दादागिरी से अपने एक “अवैध वोट” द्वारा गिरा दिया था. जब पिछले माह गिरधर गमांग भाजपा नेताओं के साथ मुस्कुरा रहे थे, उस समय इन कार्यकर्ताओं की आँखों के सामने अटल जी का मायूस चेहरा घूम गया. दुर्भाग्य की बात यह है कि गिरधर गमांग ठीक एक वर्ष पहले ही भाजपा में शामिल हुए थे, और उन्होंने भाजपा की विचारधारा अथवा उड़ीसा में पार्टी की उन्नति के लिए ऐसा कोई तीर नहीं मारा था, कि उन्हें सीधे कार्यसमिति सदस्य के रूप में पुरस्कृत कर दिया जाए, परन्तु ऐसा हुआ.... 

राजस्थान के मारवाड़ में एक कहावत है -- "मरण में मेड़तिया और राजकरण में जोधा". इसका अर्थ होता है :- मरने के लिए तो मेड़तिया और राजतिलक के लिए जोधा राठौड़, अर्थात जब युद्ध होता है, तब लड़ने और बलिदान के लिए मेड़तिया आगे किये जाते हैं, लेकिन जब राजतिलक का समय आता है तो जोधा राठौड़ों को अवसर मिलता है. यह कहावत और इसका अर्थ देने की आवश्यकता इसलिए महसूस हुई क्योंकि आजकल भारतीय जनता पार्टी एक नए “अवतार” में नज़र आ रही है. यह अवतार है “गैरों पे करम” वाला. पुरानी फिल्म “आँखें” पाठकों ने देखी ही होगी, उसमें माला सिन्हा पर यह प्रसिद्ध गीत फिल्माया गया था, “गैरों पे करम, अपनों पे सितम... ऐ जाने वफा ये ज़ुल्म न कर”. एक धुर संघी यानी अटलजी की सरकार को अपने वोट रूपी तमाचे से गिराने वाले धुर काँग्रेसी गिरधर गमांग का ऐसा सम्मान इसी का उदाहरण है. शायद आधुनिक भाजपा, डाकू “वाल्मीकि” के ह्रदय परिवर्तन वाली कहानी पर ज्यादा ही भरोसा करती है, हो सकता है कि भाजपा के उच्च रणनीतिकारों का यह विचार हो, कि गिरधर गमांग को इतना सम्मान देने देने से वे ऐसे बदल जाएँगे, कि शायद एक दिन रामायण लिखने लग पड़ें, परन्तु हकीकत में ना कभी ऐसा हुआ है, और न कभी होगा. क्योंकि राजनीति स्वार्थ और लोभ का दूसरा नाम है. मूल सवाल है कि जमीनी कार्यकर्ता की भावना का क्या??  


केदारनाथ त्रासदी आज भी प्रत्येक भारतीय के दिलों में गहन पीड़ा के रूप में मौजूद है. सभी को याद होगा कि उस समय उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री हुआ करते थे बहुगुणा साहब, यानी उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवतीनंदन बहुगुणा के सुपुत्र और पूर्व काँग्रेसी प्रवक्ता रीता बहुगुणा के भाई. अर्थात पूरा का पूरा परिवार वर्षों से धुरंधर काँग्रेसी. जब केदारनाथ त्रासदी हुई थी, उस समय विजय बहुगुणा के निकम्मेपन एवं हिन्दू विरोधी रुख के कारण भाजपा एवं संघ के सभी पदाधिकारियों ने उन्हें जमकर कोसा-गरियाया था. बहुगुणा के कुशासन एवं भूमाफिया के लालची जाल में फँसे केदारनाथ की इस भीषण त्रासदी को गंभीरता से नहीं लेने की वजह से हजारों हिन्दू काल-कवलित हो गए, और कई माह तक हजारों लाशें या तो गायब रहीं अथवा बर्फ व पहाड़ों में दबी रहीं. उत्तराखण्ड के सभी भाजपा नेताओं ने विजय बहुगुणा को “हिन्दू-द्रोही” ठहराया था. हाल ही में उत्तराखण्ड की हरीश रावत सरकार को अस्थिर करने के चक्कर में भाजपा के रणनीतिकारों ने वहाँ विधायकों को लेकर एक गैरजरूरी “स्टंट” किया, और उसमें वे औंधे मुँह गिरे. विधायकों की खरीद-फरोख्त एवं दलबदलुओं के इस स्टंट में काँग्रेस एक माहिर खिलाड़ी रही है. भाजपा ने अरुणाचल प्रदेश में यह स्टंट सफलतापूर्वक कर लिया था, इसलिए उन्होंने सोचा कि उत्तराखंड पर भी हाथ आजमा लिया जाए, परन्तु यहाँ भाजपा की दाल नहीं गली और हरीश रावत सरकार सभी बाधाओं को पार करते हुए पुनः जस-की-तस सत्तारूढ़ है और जिस लंगड़े घोड़े पर भाजपा ने भरोसे के साथ दाँव लगाया था, वह रेस में खड़ा भी न हो सका. ध्यान देने वाली बात यह है कि हरीश रावत सरकार का अब सिर्फ एक वर्ष का कार्यकाल बचा था, और जनता में सरकार की छवि गिरती जा रही थी. परन्तु विजय बहुगुणा और भाजपा की इस जुगलबंदी के कारण रावत सरकार के प्रति जनता में सहानुभूति की लहर चल पड़ी, और इस कहानी का असली मजेदार पेंच तो यह है कि वर्षों से खाँटी काँग्रेसी रहे एवं खुद भाजपा द्वारा “हिन्दू-द्रोही” घोषित किए जा चुके विजय बहुगुणा साहब भी “स-सम्मान” भाजपा की केन्द्रीय कार्यसमिति में शामिल कर लिए गए... तालियाँ, तालियाँ, तालियाँ. सवाल यह उठता है कि क्या इस कदम को भगतसिंह कोश्यारी एवं भुवनचंद्र खंडूरी के मुँह पर तमाचा माना जा सकता है?? आज तक किसी को समझ में नहीं आया कि आखिर विजय बहुगुणा को किस योग्यता के तहत यह सम्मान दिया गया? कहीं ऐसा तो नहीं कि भाजपा के रणनीतिकार यह सोचे बैठे हों कि बहुगुणा साहब उत्तराखण्ड में भाजपा को फायदा पहुँचाएंगे, भाजपा के वोटों में बढ़ोतरी करेंगे?? क्या भाजपाई आने वाले उत्तराखण्ड चुनावों में बहुगुणा को आगे रखकर चुनाव लड़ेंगे? यदि ऐसा हुआ तो इससे अधिक हास्यास्पद कुछ और नहीं होगा, परन्तु चूँकि “गैरों पे करम” करने की नीति चल पड़ी है तो जमीनी कार्यकर्ता भी क्या करे, मन मसोसकर घर बैठा है. 


भाजपा में गैरों पे करम वाला यह “ट्रेंड” लोकसभा के आम चुनावों से पहले तेजी से शुरू हुआ था. उस समय मौका देखकर काँग्रेस का जहाज छोड़कर भागने वाले कई चूहों को संसद का टिकट मिला और मोदी लहर के बलबूते वे फिर से सांसद बनने में कामयाब रहे. इनमें से कुछ काँग्रेसी तो मंत्रीपद हथियाने में भी कामयाब रहे. इसके बाद तो मानो लाईन ही लग गई. वर्षों से भाजपा के लिए मेहनत करने वाले कई वरिष्ठ कार्यकर्ताओं एवं नेताओं को दरकिनार करते हुए “बाहरियों” को न सिर्फ सम्मानित किया गया, पुरस्कृत किया गया, बल्कि उन्हीं नेताओं के सिर पर बैठा दिया गया, जिनसे वे कल तक वैचारिक और राजनैतिक लड़ाई लड़ते थे. भाजपा के कार्यकर्ताओं को बताया जा रहा है कि एमजे अकबर साहब बहुत बड़े बुद्धिजीवी हैं और पार्टी को एक अच्छा मुस्लिम चेहरा चाहिए था इसलिए उन्हें राज्यसभा सीट देकर उपकृत किया जा रहा है, परन्तु पार्टी में से किसी ने भी यह सवाल नहीं उठाया कि क्या एमजे अकबर पार्टी की विचारधारा के लिए समर्पित हैं? एक पूर्व पत्रकार के नाते गुजरात दंगों के समय अकबर साहब के लेखों को किसी ने पढ़ा होता, तो वह कभी उन्हें भाजपा में घुसने नहीं देता. लेकिन काँग्रेस मुक्त भारत करने के चक्कर में “काँग्रेस युक्त भाजपा” पर ही काम चल रहा है. एमजे अकबर का मध्यप्रदेश से कोई लेना-देना नहीं है, इसी प्रकार नजमा हेपतुल्ला का भी मध्यप्रदेश से कोई लेना-देना नहीं है, राज्यसभा में पहुँचने के बाद वे कभी मध्यप्रदेश की तरफ झाँकने भी नहीं आईं, लेकिन चूँकि भाजपा को कुछ “कॉस्मेटिक” टाईप के मुस्लिम चेहरे चाहिए इसलिए खामख्वाह किसी को भी भरे जा रहे हैं... जबकि उधर मोदी लहर के बावजूद शाहनवाज़ हुसैन बिहार में चुनाव हार गए थे. यह है भाजपा के मतदाताओं का मूड... लेकिन पार्टी इसे समझ नहीं रही और पैराशूट से कूदे हुए लोग सीधे शीर्ष पर विराजमान हुए जा रहे हैं. 


भाजपा जमीनी हकीकत से कितनी कट चुकी है और अपने संघर्षशील कार्यकर्ताओं की उपेक्षा में कितनी मगन है, इसका एक और ज्वलंत उदाहरण है महाराष्ट्र के कोल्हापुर से शिवाजी महाराज के “कथित” वंशज संभाजी राजे को भाजपा ने राज्यसभा में मनोनीत किया है. स्वयं को “छत्रपति” एवं कोल्हापुर के महान समाजसेवी कहलवाने का शौक रखने वाले ये सज्जन पहले राकांपा के टिकट पर कोल्हापुर से ही दो बार लोकसभा का चुनाव हार चुके हैं. परन्तु इनकी “खासियत”(?) सिर्फ इतनी ही नहीं है. संभाजी राजे नामक ये सज्जन महाराष्ट्र की कुख्यात “संभाजी ब्रिगेड” के एक प्रमुख कर्ताधर्ता भी हैं. राजनैतिक गलियारों में सभी जानते हैं कि संभाजी ब्रिगेड नामक यह जहरीली संस्था वास्तव में शरद पवार का जेबी संगठन है. पवार ने अपनी मराठा राजनीति चमकाने के लिए ही इस संगठन को पाला-पोसा और बड़ा किया. सोशल मीडिया पर संभाजी ब्रिगेड जो ब्राह्मण विरोधी ज़हर उगलता है वह तो अलग है ही, इसके अलावा इस संगठन के हिंसक कार्यकर्ताओं का एक बड़ा कारनामा वह था, जब इन्होंने “शिवाजी महाराज की अस्मिता” के नाम पर पुणे के भंडारकर रिसर्च इंस्टीट्यूट में तोड़फोड़ और आगज़नी की थी. कई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक पुस्तकें एवं दुर्लभ पांडुलिपियाँ इस हमले में नष्ट हो गई थीं, पवार साहब के वरदहस्त के चलते किसी का बाल भी बाँका न हुआ. कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसे धुर ब्राह्मण विरोधी एवं चुनाव हारे हुए व्यक्ति को भाजपा अपने पाले में लाकर सीधे राज्यसभा सीट का तोहफा देकर क्या हासिल करना चाहती है? क्या पश्चिम महाराष्ट्र में उत्तम मराठा नेताओं की कमी हो गई थी? क्या भाजपा में और कोई मराठा नेता नहीं हैं जो राज्यसभा के लिए उचित उम्मीदवार होते? संभाजी राजे ने हिंदुत्व एवं राष्ट्रवाद के समर्थन में ऐसा क्या कर दिया था कि उन्हें गायत्री परिवार के श्री प्रणव पंड्या द्वारा ठुकराई हुई राज्यसभा सीट पर ताबड़तोड़ मनोनीत करवा दिया गया? क्या पश्चिम महाराष्ट्र में भाजपा की कंगाली इतनी बढ़ गई है कि दो चुनाव हारने वाले व्यक्ति को वह इस क्षेत्र का तारणहार समझ बैठी है? जो संभाजी राजे शरद पवार के इशारे के बिना एक कदम भी नहीं चल पाते हैं, क्या वे “शकर बेल्ट” में भाजपा का जनाधार बढ़ाएँगे? यह तो वैसा ही हुआ जैसे उड़ीसा में वर्षों से संघर्ष कर रहे भाजपा कार्यकर्ताओं-नेताओं को दरकिनार कर, अब गिरधर गमांग साहब भाजपा को उड़ीसा में विजय दिलवाएँगे? खुशफहमी एवं अति-उत्साह की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा इसे, और यह निष्ठावान कार्यकर्ताओं की मानसिक बलि लेकर पैदा हुई है. 


सत्ता के गलियारों में अक्सर कहा जाता है कि यदि आप पार्टी के समर्पित और निष्ठावान कार्यकर्ता का ध्यान रखेंगे तो आपकी पार्टी चाहे जितने चुनाव हार जाए, वह या तो पुनः उठ खड़ी होगी अथवा उसके ये “पुरस्कृत” कार्यकर्ता-समर्थकों का झुण्ड सत्ताधारी दल को आसानी से काम नहीं करने देगा. इस सिद्धांत पर काम करने में काँग्रेस और वामपंथी पार्टियाँ सबसे आगे रही हैं. पिछले साठ वर्षों में काँग्रेस जहाँ-जहाँ और जब-जब सत्ता में रही है, उसने अपने कार्यकर्ताओं, नेताओं यहाँ तक कि अपने समर्थक अफसरों-बाबुओं को भी बाकायदा चुन-चुनकर और जमकर उपकृत किया. काँग्रेस और वामपंथ द्वारा उपकृत एवं पुरस्कृत लेखक, अभिनेता, स्तंभकार, पत्रकार, अफसर, न्यायाधीश ही उसकी असली ताकत हैं, उदाहरण “अवार्ड वापसी गिरोह का हंगामा”. जबकि भाजपा का व्यवहार इसके ठीक उलट है. जब भी और जिन राज्यों में भी भाजपा की सरकारें आती हैं अचानक उन्हें नैतिकता और ईमानदारी का बुखार चढ़ने लगता है. समस्या यह है कि यह बुखार वास्तविक नहीं होता है. नैतिकता, ईमानदारी के बौद्धिक लेक्चर सिर्फ निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को ही पिलाए जाते हैं, जबकि सत्ता की ऊपरी मलाईदार परत पर बिचौलियों, पूर्व कांग्रेसियों एवं नौसिखिए परन्तु “भूखे” भाजपाईयों तथा उनके प्यारे ठेकेदारों का कब्ज़ा हो जाता है. मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि भाजपा के थिंक टैंक या उच्च स्तरीय नेता इस बात का जवाब कभी नहीं दे पाएँगे कि जगदम्बिका पाल जैसे व्यक्ति को भाजपा द्वारा पुरस्कृत करने से भाजपा के उत्तरप्रदेश में कितने प्रतिशत वोट बढ़े... या बिहार में ऐन चुनावों से पहले साबिर अली को भाजपा में शामिल करके कितने प्रतिशत मुस्लिम प्रभावित हुए?? क्या साबिर अली अथवा जगदम्बिका पाल जैसे लोग भाजपा को उनके राज्यों में आगे बढ़ाने में मदद करेंगे? क्या ये भाजपा की विचारधारा के करीब हैं? यदि नहीं, तो फिर जमीनी और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करते हुए ऐसे पैराशूट छाप नेताओं को भाजपा मान-सम्मान क्यों दे रही है, यह समझ से परे है. 

कांग्रेस द्वारा तिरस्कृत व्यक्तियों को भाजपा अपने साथ मिलाकर खुद अपनी फजीहत किस तरह से करवा रही है इस का जीता-जागता उदाहरण बड़ोदरा की पारुल यूनिवर्सिटी के डायरेक्टर जयेश पटेल हैं. जयेश पटेल पूरी जिंदगी कांग्रेस मे रहे. कांग्रेस के टिकट पर तीन बार चुनाव लड़ा, लेकिन सिर्फ 6 महीने पहले यह भाजपा में आ गए और फिर इसने अपने ही यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली एक लड़की का बलात्कार किया. अब स्वाभाविक रूप से मीडिया में बैठे कांग्रेसी बार बार इसे भाजपा नेता कहकर प्रचारित कर रहे है. तकनीकी रूप से देखा जाए तो यह भाजपा के ही नेता माने जाएँगे, लेकिन इस बदनामी के लिए जिम्मेदार भी बीजेपी है, जो कांग्रेस से आए हुए किसी भी ऐरे-गैरे को शामिल कर रही है. इसी प्रकार 2000 करोड़ के ड्रग स्मगलर विक्की राठोड़ के केस में यही हुआ, इसके पिता पूरी जिंदगी कांग्रेस में रहे. कांग्रेस के टिकट पर विधायक भी बने, कांग्रेस की सरकार में मंत्री भी रहे. इन्होंने कांग्रेस के टिकट पर 2014 लोकसभा का चुनाव भी लड़ा लेकिन सिर्फ 3 महीने पहले वह भाजपा में आए और जब उसका बेटा 2000 करोड़ की ड्रग्स रैकेट में पकड़ा गया तो मीडिया और कांग्रेस ने उसे एक भाजपा नेता का बेटा कहकर प्रचारित किया. समझ नहीं आता कि जब भाजपा में इतने अच्छे अच्छे लोग हैं तो फिर इन बाहरियों को शामिल करके खुद की फजीहत करवा रही है ? 

कहने का तात्पर्य यह है कि गमांग, जगदम्बिका पाल, विजय बहुगुणा, संभाजी ब्रिगेडी अथवा साबिर अली को शामिल करने (बल्कि उन्हें राज्यसभा सीट आदि से सम्मानित करने) में पता नहीं कौन सी रणनीति है, जो पार्टी की मूल विचारधारा को खाए जा रही है और उधर लाठी खाने वाला कार्यकर्ता हताश हो रहा है. जो लोग जीवन भर संघ-भाजपा की खिल्ली उड़ाते आए, जिन्होंने अपना राजनैतिक जीवन हिंदुत्व के विरोध एवं काँग्रेस की चाटुकारिता में गुज़ार दी हो, वह कार्यकर्ता से सामंजस्य कैसे बिठाएगा?? यह हताशा सिर्फ इसी स्तर पर ही नहीं है, बल्कि नियुक्तियों और प्रशासनिक स्तर पर भी देखा जाए तो यह सरकार विफल होती दिखाई दे रही है. 

मोदी सरकार के दो वर्ष पूर्ण हो चुके हैं, और इस सरकार से कामकाज के अलावा विचारधारा के स्तर पर जिस काम की अपेक्षा थी, अब जमीनी कार्यकर्ताओं द्वारा उसकी समीक्षा आरम्भ हो चुकी है. यदि कामकाज के स्तर पर देखा जाए तो मनोहर पर्रीकर, सुषमा स्वराज, नितिन गड़करी, पीयूष गोयल और सुरेश प्रभु का कार्य संतोषजनक कहा जा सकता है. परन्तु बाकी के मंत्रालयों की हालत अच्छी नहीं कही जा सकती. केन्द्र सरकार का सबसे महत्त्वपूर्ण मंत्रालय होता है मानव संसाधन मंत्रालय. पिछले पचास वर्षों में इस मंत्रालय पर अधिकांशतः वाम अथवा समाजवाद समर्थक काँग्रेसी की नियुक्ति होती आई है. देश के तमाम विश्वविद्यालयों, शिक्षण संस्थाओं, शोध संस्थाओं सहित अकादमिक गतिविधियों को यह मंत्रालय अरबों रूपए की धनराशि मुहैया करवाता है. काँग्रेस और वाम मोर्चे द्वारा इसी मंत्रालय के जरिये पूरी तीन पीढ़ियों का “ब्रेनवॉश” किया गया है और उन्हें नकली सेकुलरिज़्म एवं कथित प्रगतिशीलता के बहाने भारतीय संस्कृति से तोड़ने का कार्य किया गया है. JNU हो, हैदराबाद विश्वविद्यालय का रोहित वेमुला मामला हो अथवा IIT चेन्नै का आंबेडकर पीठ वाला मामला हो या फिर पुणे की FTII संस्था ही क्यों ना हो... काँग्रेस-वामपंथ द्वारा पालित-पोषित एवं संरक्षित बौद्धिक गिरोह ने मोदी सरकार के प्रत्येक कदम में अड़ंगे लगाए हैं, हंगामे किए और विदेशों में बदनामी करवाई. ऐसा क्यों हुआ? जो काम काँग्रेस की सरकारें सत्ता में आते ही किया करती थीं, वह भाजपा पिछले दो साल में भी नहीं कर पाई है. 2004 को याद करें, जैसे ही वाजपेयी सरकार की विदाई हुई, और सोनिया-मनमोहन की जुगलबंदी वाली यूपीए-१ सरकार ने कार्यभार संभाला, उसके एक माह के भीतर ही काँग्रेस ने तमाम बड़े-बड़े संस्थानों से भाजपा द्वारा नियुक्त किए गए सभी प्रमुख पदों को खाली करवा लिया. जिसने खुशी-खुशी इस्तीफ़ा दिया, उसे सम्मानजनक तरीके से जाने दिया गया और जिसने इनकार किया, उसे बर्खास्त करने में भी कोई कसर बाकी नहीं रखी गई. इसके पश्चात तत्काल काँग्रेसी अथवा वामपंथी विचारधारा को समर्पित व्यक्तियों की नियुक्ति कर दी गई, जो दुर्भाग्य से आज भी कई संस्थानों में कब्ज़ा जमाए बैठे हैं. सरकार के प्रति धारणाएँ बनाने अथवा अवधारणाएँ बिगाड़ने में बौद्धिक जगत का बहुत बड़ा हाथ होता है. स्मृति ईरानी ने जब कार्यभार संभाला, तब उन्होंने शुरुआत तो बड़े धमाकेदार तरीके से की थी परन्तु इस महत्त्वपूर्ण मंत्रालय को लेकर उनसे जो अपेक्षाएँ थीं इन दो वर्षों में वह कोरी बातें, फालतू के विवाद और उनके बड़बोलेपन में ही खत्म होती दिखाई दे रही हैं. 


मानव संसाधन मंत्री ने जेएनयू तथा हैदराबाद विवि के रोहित वेमुला का मामला जिस तरह से हैंडल किया है, उससे यह बात स्पष्ट हो गई है कि स्मृति ईरानी में वामपंथियों जैसी धूर्तता एवं प्रोपोगंडा तकनीक का सर्वथा अभाव है. बौद्धिक क्षेत्र में चारों तरफ घुसे बैठे वामपंथियों एवं कांग्रेसियों से निपटना अनुभवहीन स्मृति ईरानी के बस की बात नहीं है. पिछले दो वर्ष में देश की प्रमुख शिक्षा एवं अकादमिक संस्थाओं में आज भी वही लोग बैठे हैं जो यूपीए-२ कार्यकाल में थे. ऐसा नहीं है कि भाजपा समर्थित विचारधारा में प्रतिभावान लोगों की कमी है, परन्तु भाजपा में नैतिकता बघारने का ऐसा उन्माद है कि स्मृति ईरानी बड़े गर्व से घोषणा करती हैं कि उन्होंने बदले की भावना से काम नहीं किया है और एक-एक करके कई नाम गिना देती हैं कि हमने इन्हें नहीं हटाया. तो सवाल बनता है कि क्यों नहीं हटाया? किस बात का इंतज़ार है? क्या पिछले साठ वर्ष से काँग्रेस-वामपंथ के हाथों मलाई चाटते इन लोगों के ह्रदय परिवर्तन का? या स्मृति ईरानी को विश्वास है कि ये तमाम बुद्धिजीवी इनकी यह नैतिकता देखकर पसीज जाएँगे और अपना संघ-भाजपा-मोदी विरोध वाला रवैया त्याग देंगे? इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने वालों, तीन-तीन पीढ़ियों को अपनी सेकुलर विचारधारा और झूठी कहानियों के माध्यम से बरगलाने वालों तथा बाकायदा अपना गिरोह बनाकर सभी विश्वविद्यालयों से भगवा बुद्धिजीवियों को षड्यंत्रपूर्वक बाहर करते हुए फेलोशिप्स, अवार्ड, ग्रांट्स इत्यादि पर काबिज रहने वालों से निपटना स्मृति ईरानी के बस की बात नहीं लग रही. जेएनयू के उस कुख्यात हंगामे के पश्चात ऐसी कोई गतिविधि नज़र नहीं आई, जिसमें मानव संसाधन मंत्रालय ने वहाँ की कार्यकारी परिषद् अथवा अकादमिक कौंसिल को भंग करने या उसमें व्यापक बदलाव करने की कोई इच्छाशक्ति दिखाई हो. जबकि यही काम काँग्रेस जब सत्ता में आती थी तो आवश्यकता पड़ने पर पहले दो माह में ही निपटा डालती थी. यदि कोई पार्टी अपनी सत्ता के दो वर्ष बाद भी अपनी समर्थित विचारधारा के लोगों को सही स्थान पर फिट नहीं कर पाती या ऐसा कोई उद्यम दिखाई भी नहीं देता तो तय मानिए कि कहीं न कहीं बड़ी गडबड़ी है.  

यहाँ पर एक उदाहरण देना ही पर्याप्त है... ICSSR (भारतीय सामाजिक विज्ञान शोध परिषद्) के अध्यक्ष हैं प्रोफ़ेसर सुखदेव थोरात. इन सज्जन ने दलितों के नाम पर NGO खड़े करके यूरोप एवं फोर्ड फाउन्डेशन से चन्दे लिए हैं. हिन्दू द्वेष एवं दलितों को भड़काने का काम ये साहब बखूबी करते रहे हैं, आज भी कर रहे हैं. इनके स्थान पर समावेशी विचारधारा वाले प्रोफ़ेसर के.वारिकू अथवा प्रोफ़ेसर जितेन्द्र बजाज को लाया जाना चाहिए था, ताकि इस महत्त्वपूर्ण संस्थान में यह हिन्दू द्वेष का ज़हर फैलने से रोका जा सके, लेकिन स्मृति ईरानी इनका कुछ नहीं कर पाईं. इसी प्रकार एक महत्त्वपूर्ण संस्थान है साउथ एशियन यूनिवर्सिटी, जिसके निदेशक प्रोफ़ेसर जीके चढ्ढा साहब पाकिस्तानी छात्रों को अधिक प्राधान्य देते थे और उनके अधिक प्यारे थे. चढ्ढा साहब के स्वर्गवास के पश्चात यह पद अभी खाली पड़ा है, क्योंकि मानव संसाधन मंत्रालय उस वामपंथी बौद्धिक गिरोह के हंगामों से सहमा हुआ रहता है. उधर बच्चों के दिमाग पर प्रभाव डालने वाले एवं पुस्तकों द्वारा बुद्धि दूषित करने वाले प्रमुख संस्थान NCERT में शंकर शरण जैसे विद्वान को होना चाहिए, जो वामपंथियों की नस-नस से वाकिफ हैं, परन्तु यह भी नहीं हो पा रहा. फिर भाजपा के मतदाता कैसे विश्वास करें कि यह सरकार पिछले साठ वर्ष की गन्दगी को साफ़ करने के प्रति गंभीर है तथा वैचारिक लड़ाई के लिए कटिबद्ध है? 

अब बात विचारधारा की निकली ही है तो यह जानना उचित होगा कि राज्यों में भाजपा की सरकारें सत्ता प्राप्त करने के बाद अचानक सेकुलरिज़्म का राग क्यों अलापने लगती हैं. जब तक भाजपा विपक्ष में रहती है वह भावनाओं को भड़काकर अपने समर्थकों को एक टांग पर खड़ा रखती है, परन्तु जैसा कि ऊपर केन्द्र का उदाहरण दिया कि सत्ता मिलते ही इनका “वैचारिक स्खलन” शुरू हो जाता है. ठीक वही स्थिति राज्यों में भी है. जिसमें सबसे (कु)ख्यात मामला है मध्यप्रदेश की भोजशाला का विवाद है. पिछले कई वर्षों से मध्यप्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला में वसंत पंचमी के दिन हिन्दू संगठन माँ सरस्वती की पूजा करते आए हैं, वहीं अतिक्रमण करके मुस्लिमों ने बाहर एक मस्जिद खड़ी कर ली है. मप्र में भाजपा की सरकार बने लगभग तेरह-चौदह वर्ष होने को आए, आज भी प्रतिवर्ष हिन्दू संगठनों को भोजशाला में पूजा-अर्चना करने के लिए या तो प्रशासन के आगे गिडगिडाना पड़ता है अथवा संघर्ष करना पड़ता है. हर बार हिन्दू संगठनों को लॉलीपाप देकर चलता कर दिया जाता है, जबकि मुस्लिम संगठन ठप्पे के साथ बाकायदा प्रशासन के संरक्षण में नमाज पढ़ते हैं. “मामाजी” की भाजपा सरकार को सेकुलरिज्म का ऐसा बुखार चढ़ा हुआ है कि वह इस मामले में अपने मातृ संगठन को भी अँधेरे में रखने से बाज नहीं आती. सत्ता की खातिर यह विचारधारा से भटकाव नहीं तो और क्या है? यदि हिन्दू भाजपा वोट देकर जितवाता है तो वह अपनी सरकार से उम्मीद भी तो रखता है कि वर्षों से लंबित पड़े विवादित मामलों में भाजपा सरकार या तो न्यायालयीन अथवा प्रशासनिक तरीके से उन्हें ख़त्म करे, परन्तु तेरह वर्ष की सत्ता के बावजूद हर साल क़ानून-व्यवस्था के नाम पर सरस्वती भक्त हिन्दुओं पर लाठियाँ बरसें यह उचित नहीं है. यही हाल राजस्थान में भी है. रानी साहिबा वसुंधरा राजे को भी केवल “सबका साथ, सबका विकास” का चस्का लगा हुआ है. विकास की दौड़ में रानी साहिबा ने जयपुर के वर्षों पुराने कई मंदिरों को सडक, पुल या मेट्रो की चाह में ध्वस्त कर दिया. कई मंदिर ऐसे भी थे जो आराम से विस्थापित किए जा सकते थे, जबकि कुछ मंदिरों को बचाते हुए सड़क का मार्ग बदला भी जा सकता था, कुछ मज़ारों और मस्जिदों को बचाने के लिए ऐसा किया भी गया. तमाम हिन्दू संगठनों ने इन मंदिरों को तोड़ने से बचाने के लिए अथवा वैकल्पिक मार्ग सुझाने के लिए कई आन्दोलन किए, परन्तु नतीजा शून्य. महारानी के बुलडोज़रों ने “अपने ही कार्यकर्ताओं और अपने ही मतदाताओं” की एक न सुनी. जोधपुर, अजमेर, जैसलमेर तथा बाड़मेर के कई इलाके तेजी से मुस्लिम बहुल बनते जा रहे हैं. इन क्षेत्रों में कई प्रकार की संदिग्ध गतिविधियाँ चल रही हैं. सीमा सुरक्षा बल लगातार चेतावनी जारी कर रहे हैं, परन्तु वसुंधरा राजे पर राजस्थान को औद्योगिक राज्य बनाने का भूत सवार है. राजस्थान में “मार्बल माफिया” के कई किस्से बच्चे-बच्चे की ज़बान पर मशहूर हैं, परन्तु शायद राजस्थान सरकार के कानों तक यह आवाज़ नहीं पहुँचती या शायद सेकुलरिज्म के बुखार से तप्त वह सुनना ही नहीं चाहतीं. राजस्थान में भाजपा का शासन आए तकरीबन तीन साल हो रहे हैं. हमेशा की तरह भाजपा कुछ ज्यादा ही नैतिक हो रही है. वे कर्मचारी जो संघी या भाजपा के मतदाता होने के कारण गहलोत सरकार द्वारा जानबूझकर रिमोट एरिया में फेंके गए थे, वे आज तक वहीँ पड़े सड़ रहे हैं, भाजपा को ऐसे समर्थक कर्मचारियों की सुध बुध लेने की कोई फ़िक्र नहीं और उधर काँग्रेस के लालित-पालित कर्मचारी अपनी पट्टाशुदा जगहों पर आज भी ठाठ से जमे हैं. यदि कांग्रेस अथवा वामपंथ का शासन होता तो पहले छः माह में ही उन्होंने अपने समर्थित कर्मचारियों को अपनी मनपसंद जगह पर पोस्ट कर दिया होता. लेकिन भाजपा निराली है, यहाँ दरी -पट्टी उठाने, सडकों पर उतरने, नारे लगा लगा कर गला फाड़ने, पुलिस के डंडे खाने अथवा मीडिया एवं सोशल मीडिया में विचारधारा का पक्ष रखने वालों को प्रतिबद्ध कार्यकर्ता अथवा 'त्यागी-बलिदानी' के रूप में आगे खड़ा कर दिया जाता है, और जब भाजपा को सत्ता मिलती है तो लाभ लेने के लिए गमांग-बहुगुणा टाइप नेता और जिन्दगी भर संघ की खिल्ली उड़ाने वाले नवप्रविष्ट 'भाई साहब' आगे आ जाते हैं. 


बालासाहब ठाकरे और अटलबिहारी वाजपेयी के ज़माने से महाराष्ट्र में शिवसेना, भाजपा की सबसे पुरानी और सबसे विश्वस्त साथी रही है. जब गुजरात दंगों के बाद अटल जी मोदी को गुजरात से लगभग हटाने ही वाले थे, तब बालासाहब चट्टान की तरह मोदी के पीछे खड़े रहे और अटल जी से स्पष्ट शब्दों में मोदी को बनाए रखने की बात कही थी. यदि बालासाहब ने उस समय अटल जी को उस समय वह धमकी ना दी होती, तो अटल जी की नैतिकता(??) और सरलता(?) तथा “कथित राजधर्म” के चक्कर में मोदी पता नहीं कहाँ ट्रांसफर कर दिए जाते. तब न तो मोदी गुजरात में बारह साल शासन कर पाते, और ना ही वाइब्रेंट गुजरात के जरिये अपनी छवि चमकाकर आज प्रधानमंत्री पद तक पहुँच पाते. यह संक्षिप्त भूमिका इसलिए बताई जा रही है कि महाराष्ट्र के गत विधानसभा चुनावों के पहले से ही भाजपा की “विस्तारवादी” नीतियों के कारण जिस तरह से केन्द्रीय नेतृत्त्व ने शिवसेना के साथ अपमानजनक एवं नीचा दिखाने जैसा व्यवहार किया है, यह हिंदुत्व के लिए ठीक नहीं है. यदि भाजपा को अपना विस्तार करना ही है तो महाराष्ट्र पर गिद्ध दृष्टि क्यों? वहां तो पहले से ही भाजपा का विश्वस्त सहयोगी मौजूद है, जो इक्का-दुक्का बार छोड़कर सदैव भाजपा के साथ खड़ा रहा है. महाराष्ट्र विधानसभा में “अकेले” बहुमत हासिल करने की होड़ में शिवसेना को तोड़ने का प्रयास करना अथवा शरद पवार जैसे भीषण भ्रष्ट व्यक्ति के साथ गलबहियाँ करना भाजपा को शोभा नहीं देता. परन्तु जब विचारधारा पर सत्ता प्राप्ति हावी हो जाती है, तब ऐसा ही होता है. ये बात और है कि शिवसेना टूटी नहीं, लेकिन फिर भी भाजपा ने संयुक्त मंत्रिमंडल में लगातार शिवसेना को दबाए रखा है और गाहे-बगाहे दोनों पार्टियों में चिंगारियाँ फूटती रहती हैं. जैसा कि लेख में पहले बताया जा चूका है, “संभाजी ब्रिगेड” नामक जहरीला संगठन शरद पवार का जेबी संगठन है और यह लगातार हिन्दुओं में फूट डालने तथा ब्राह्मणों को गाली देने का काम करता है, ऐसे संगठन के प्रति भाजपा में अचानक प्रेम की कोंपलें फूट पडी हैं. संघ की विचारधारा एवं हिंदुत्व के लिए यह अच्छे संकेत नहीं हैं. अपनी जड़ों को छोड़कर कोई भी वृक्ष अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकता. 

पश्चिम भारत के गोवा में एक छोटा सा संगठन है “सनातन संस्था” जो कि हिन्दू जनजागृति समिति के बैनर तले हिंदुत्व जागरण के अपने कई कार्यक्रम आयोजित करता है. यहाँ मैंने “छोटा संगठन” इसलिए कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे विराट संगठन तथा भाजपा जैसे विशाल पार्टी के सामने तुलनात्मक रूप से यह छोटा संगठन ही है. इस संगठन का विस्तार फिलहाल केवल महाराष्ट्र एवं कर्नाटक में ही थोडा बहुत प्रभावशाली है, परन्तु बाकी राज्यों में भी अब यह धीरे-धीरे अपने पैर पसार रहा है. यह संगठन राजनैतिक नहीं है, इसलिए यह “सत्ता प्राप्ति की लालसा” अथवा सेकुलरिज्म का भूत चढ़ने जैसी बीमारियों से बचा हुआ है. यह संगठन सिर्फ और सिर्फ हिन्दू जागरण, हिन्दू धर्म एवं संस्कृति की परम्पराओं एवं विधियों तथा विभिन्न प्रकार के हिन्दू-समाजसेवी कार्यक्रमों में भाग लेता रहता है. इस संगठन के मुखिया डॉक्टर आठवले जी अधिकाँश समय एकांतवास में ही रहते हैं. कांग्रेस और वामपंथियों तथा हाल ही में अपनी राजनैतिक महत्त्वाकांक्षाओं के तहत आपियों ने लगातार सनातन संस्था पर कई वैचारिक हमले किए हैं. महाराष्ट्र की पिछली कांग्रेस सरकार ने सनातन संस्था के खिलाफ कई मामले दर्ज कर रखे हैं. दाभोलकर एवं कलबुर्गी की हत्या के आरोप में खोजबीन और पूछताछ के बहाने महाराष्ट्र पुलिस सनातन संस्था के आश्रमों एवं गोवा के प्रमुख केंद्र पर जब-तब धावा बोलती रहती है. पिछले पांच वर्ष से यह संस्था अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन का आयोजन करती है, जिसमें देश-विदेश से दर्जनों ऐसे कार्याकार्य एवं संगठन भाग लेते हैं जो जमीनी स्तर पर हिंदुत्व के कार्य में जुटे हैं. इनमें बांग्लादेश, नेपाल जैसे देशों से भी प्रतिनिधि आते हैं जहां हिन्दुओं पर विभिन्न प्रकार के अत्याचार हो रहे हैं. बांग्लादेश के एक मानवाधिकार वकील हैं रवीन्द्र घोष, जो वहां के अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय के खिलाफ होने वाले अपराधों एवं उत्पीड़न के खिलाफ आए दिन लड़ते रहते हैं. बांग्लादेश और पाकिस्तान में हिन्दुओं की हालत बेहद दयनीय है यह बात सभी जानते हैं. पिछले चार वर्ष से रवीन्द्र घोष गोवा के इस हिन्दू अधिवेशन में भाग लेने आते रहे हैं, परन्तु इस वर्ष केंद्र सरकार ने रवीन्द्र घोष को वीसा नहीं दिया. इस अनुमति को नकारने के लिए क़ानून-व्यवस्था एवं बांग्लादेश से संबंधों का कारण दिया गया. गत वर्ष हुए चौथे हिन्दू अधिवेशन में भी कर्नाटक से प्रमोद मुथालिक इस सम्मेलन में आने वाले थे, परन्तु गोवा में भाजपा की “हिन्दुत्ववादी” सरकार ने प्रमोद मुतालिक के गोवा में घुसने पर प्रतिबन्ध लगा दिया. अब सोचने वाली बात यह है कि प्रमोद मुतालिक पर कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने कुछ मामले दर्ज कर रखे हैं, परन्तु गोवा में उनके खिलाफ एक भी मामला नहीं है. ऐसे में भारत के एक नागरिक को जो कि शांतिपूर्ण तरीके से एक अधिवेशन में भाग लेने जा रहा हो, किसी अंग्रेजी क़ानून के तहत, तानाशाहीपूर्ण पद्धति से राज्य में घुसने से रोकना और वो भी खुद को संघ की राजनैतिक बाँह कहलाने वाली भाजपा सरकार के शासन में?? इतना अन्याय तो कांग्रेस की सरकारों ने भी नहीं किया. परन्तु जैसा कि मैंने कहा, जब विचारधारा पर सत्ता हावी हो जाती है तब “अपने” लोग भी दुश्मन नज़र आने लगते हैं. 


सनातन संस्था एक पूर्णतः धार्मिक एवं हिंदुत्वनिष्ठ गैर-राजनैतिक संस्था है, जिसकी कोई राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा अभी तक सामने नहीं आई है, और मजे की बात यह है कि इस संस्था का संघ एवं उसकी कार्यशैली से तिनका भर भी सम्बन्ध नहीं है. संक्षेप में कहा जाए तो ऐसी कई संस्थाएं या संगठन हैं जो सिर्फ हिन्दू धर्म एवं हिंदुत्व तथा राष्ट्रवाद की “मूल विचारधारा” के लिए काम कर रहे हैं, परन्तु उनका सीधा सम्बन्ध संघ-भाजपा से नहीं है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ऐसी संस्थाओं एवं संगठनों को “राजनैतिक संरक्षण” देना हिन्दू हित का दम भरने वाली सत्ताधारी पार्टी का काम नहीं है?? क्या भाजपा-संघ की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह ऐसे संगठनों को जो कि उसके प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि पूरक हैं, उन्हें हर प्रकार की मदद करे? जब ऐसे संगठन अथवा समाज में बैठे हजारों-लाखों लोग जो कि भाजपा के सदस्य नहीं हैं परन्तु हिंदुत्व की विचारधारा के लिए काम करते हैं, वोट देते हैं और जिस कारण भाजपा को सत्ता की मलाई खाने मिलती है, क्या ऐसे लोगों का ख़याल रखना भाजपा की राज्य एवं केंद्र सरकार का काम नहीं है?? ऐसे हिन्दू संगठन किसी मदद के लिए किसकी तरफ आशा की निगाह से देखें, वैचारिक पितृ संगठन और पार्टी की तरफ या ओवैसी और चर्च की तरफ?? 

संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि “काँग्रेस मुक्त भारत” के नशे में भाजपा तेजी से “काँग्रेस युक्त भाजपा” की तरफ बढ़ती जा रही है. विचारधारा के स्खलन संबंधी और समर्थकों की नियुक्तियों को सही स्थान पर फिट नहीं करने संबंधी ऊपर जिन विभिन्न उदाहरणों को उल्लेखित किया है, उस प्रकार की ढीलीढाली कार्यशैली को देखते हुए काँग्रेस मुक्त भारत का सपना “राजनैतिक” रूप से तो संभव है, क्योंकि मूल काँग्रेस इस समय सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है. परन्तु उस काँग्रेस को विस्थापित करने वाली यह जो “डुप्लिकेट काँग्रेस” अर्थात भाजपा है वह प्रशासनिक रूप से कभी भी काँग्रेस मुक्त भारत नहीं कर सकती. पिछले साठ वर्ष में जिस चतुराई और धूर्तता से काँग्रेस और वामपंथ ने अपने मोहरे देश के प्रत्येक क्षेत्र में फिट कर रखे हैं उसका दस प्रतिशत भी प्राप्त करने में भाजपा को पूरे दस वर्ष चाहिए, परन्तु सत्ता में आने के बाद जिस प्रकार भाजपा पर “सेकुलरिज़्म का बुखार” चढ़ता है, एवं त्याग-बलिदान के बौद्धिक डोज़ पिलाते हुए पार्टी में अपनों की उपेक्षा की जाती है, उसे देखते हुए तो यह संभव नहीं लगता.