Wednesday, March 4, 2015

Ban on Beef : Save Water and Cow

"बीफ" प्रतिबन्ध का समर्थन करें - गाय और पानी दोनों बचाएँ... 

(Anand kumar जी द्वारा लिखित एक तार्किक एवं तथ्यात्मक लेख.)
उनकी फेसबुक नोट से साभार लिया गया...

जब हम छोटे थे तो घर में चापाकल हुआ करता था, अब ये सिर्फ सरकारी ही देखने मेंआता है | जब घर में एक नया चापाकल लगवाने की बात हुई तो दादाजी सारे पुर्जे ख़रीदने निकले | करीब सात सौ रुपये का चापाकल था, और उसके साथ लगनी थी लम्बी सी पाइप |मिस्त्री ने 20 – 25 फ़ीट की पाइप के लिए कहा था, दादाजी ने ख़रीदा 40 फुट का पाइप | हम लोग रिक्शे से लौटने लगे तो दादाजी से पूछे बिना नहीं रहा गया, हमने सवाल दागा,क्या हमारे घर दो नए चापाकल लगेंगे | दादाजी ने समझाया, कुछ साल में पानी और नीचे चला जायेगा तब हमें दोबारा बोरिंग न करवानी पड़े इसलिए इतना लम्बा पाइप ख़रीदा है |

Water Table समझने लायक नहीं थे उस ज़माने में, लेकिन आज जब उसी इलाके में चापाकल लगाया जाता है तो करीब 100 फ़ीट का पाइप तो चाहिए ही चाहिए | वैसे तो वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट कहती है की भारत में पानी शायद 2020 तक ख़त्म हो जाए, लेकिन ये अतिशयोक्ति है, हाँ कमी होगी इसमें कोई शक़ नहीं है|

जहाँ हमारी आबादी तेज़ी से बढ़ रही है वहीँ ज़मीन के नीचे और सतह पर, दोनों जगह पानी घट रहा है | अगर आज ध्यान नहीं दिया गया तो थोड़े ही दिनों में ये एक विकराल समस्या होगी | पाकिस्तानी या चीनी आतंकी उठने लोगों को नहीं मार पायेंगे जितना पानी की कमी मार डालेगी |



एक समस्या हमारे खान पान का बदलना भी है

कुछ ही समय पहले हमने कई कलाकारों को देखा जो होली के त्यौहार पर तेज़ हमले कर रहे थे | सब सिखाने आ गए की हम लोग होली पर कितना पानी बर्बाद कर देते हैं | ये लोग ALS challenge में होने वाले पानी की बर्बादी पर भी भाषण देते थे | अच्छी बात है की आपका ध्यान पानी की बर्बादी पर गया, लेकिन “कहीं न कहीं, कहीं न कहीं” आप गलत तरीके से समस्या के निवारण की सोच रहे हैं बन्धु ! हमारे खान पान का बदलता तरीका इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार है |

एक किलो BEEF के लिए करीब 15400 लीटर पानी लगता है, अगर आलू उपजाना हो तो करीब 50 किलो आलू उपजा सकते हैं इतने पानी से | दुसरे शब्दों में कहा जाए तो एक दावत जिसमे पांच लोगों को BEEF परोस दिया गया हो, उस दावत के बदले आप जिन्दगी भर होली खेल सकते हैं | एक गाय को अपने जीवन काल में करीब दो मिलियन लीटर पानी की जरूरत होती है, जब जानवरों को मीट के लिए पाल पोस रहे हों तो हिसाब लगा लीजिये की कितना खर्चीला है ये |

1 किलो के लिए खर्च होने वाला पानी :
BEEF : 15400 लीटर
मटन : 6400 लीटर
चिकन : 4300 लीटर
चावल : 1400 लीटर
आलू : 290 लीटर

(इसके अलावा BEEF में कहीं ज्यादा कार्बन खर्च हो जाता है, भविष्य में इस से एनर्जी resources पर भी असर पड़ेगा, कार्बन फुटप्रिंट जुमला शायद सुना हो !)



खेती में पानी का बेतरतीब इस्तेमाल

दुसरे कई विकासशील देशों की तरह (खास तौर पर जहाँ पानी की कमी है, जैसे चीन), भारत में सतह से नीचे के पानी पर कानूनी बंदिशें कम हैं, लगभग ना के बराबर | कोई भी पानी निकाल सकता है, बोरिंग करने या कुआं खुदवाने पर कोई रोक टोक नहीं होती | इनके लिए सरकार को कोई टैक्स भी नहीं देना होता इसलिए पानी बचाने या उसके दोबारा इस्तेमाल की कोई कोशिश भी नहीं की जाती | सतह के नीचे से पानी निकाल कर सबसे ज्यादा खेती के लिए खर्च किया जाता है, मुफ्त बिजली और सब्सिडी वाले पम्पिंग सेट की वजह से कई इलाकों का वाटर टेबल लगातार नीचे जा रहा है | लेकिन किसान काफ़ी ताकतवर वोटिंग ब्लाक हैं इसलिए कोई सरकार उन्हें नाराज़ नहीं करना चाहती | थोड़े ही दिनों में पानी सतह से इतना नीचे जा चुका होगा की आफत किसान के लिए भी होगी और खेती ना करने वालों के लिए भी |



तो अब करें क्या ?

1.      खाने के बेहतर विकल्प इस्तेमाल करें
जैसा की देख चुके हैं की BEEF के मुकाबले मटन और चिकन काफी कम पानी इस्तेमाल करता है | सीधा शाकाहारी तो आप होंगे नहीं, कम से कम BEEF के बदले मुर्गा खाना तो शुरू कर ही सकते हैं | सही खान पान शुरू करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ज्यादातर पानी भोजन के उत्पादन में ही ख़र्च होता है | टीवी पर अपने खाने में पनीर के बदले टोफू, BEEF के बदले चिकन, और चावल खाने की सलाह देने वाला खानसामा देश सेवा ही कर रहा है, चाहे आप मानें या न मानें |

2.      कम पानी खर्च करने वाले बीज
देश भर में कृषि अनुसन्धान केंद्र हैं, ऐसे बीज बनाये जा सकते हैं जिनमे पानी का खर्च कम से कम हो | यहाँ ज्यादातर सरकारी मदद की जरूरत होगी, इसके अलावा कृषि प्रयोगशालाओं में मिट्टी की जांच करके सबसे बेहतरीन फ़सल का चुनाव किया जा सकता है| इसके लिए किसानों को प्रोत्साहित करना पड़ेगा |

3.      सिंचाई के बेहतर तरीके
यहाँ भी सरकारी मदद की जरूरत होगी, लोगों को स्प्रिंकलर जैसे बेहतर सिंचाई के तरीके अगर सिखाये जाएँ तो खेती में खर्च होने वाला पानी काफी हद तक बचाया जा सकता है | चावल की खेती में अगर उन्नत तरीकों से सिंचाई की जाए तो पानी दो तिहाई तक बचाया जा सकता है |

4.      बारिश के पानी का संरक्षण
राजस्थान या फिर गुजरात के इलाकों में देखें तो पारंपरिक तरीकों से वर्षा का जल बचाया जाता रहा है | तालाब खुदवाना पूरे भारत में पुण्य का काम माना जाता है | अगर बारिश का हिसाब देखें तो हर भारतीय के लिए करीब चार मिलियन लीटर पानी बरसता है, मतलब जरूरत से करीब दस गुना ज्यादा ! अगर इसे बचाने पर ध्यान दिया जाए तो समस्या काफी हद तक सुलझ सकती है |

5.      Desalination के बेहतर तरीकों का इस्तेमाल
खारे पानी के शुद्धिकरण की सारी तकनीकों का इस्तेमाल करना शुरू करना होगा | कई इलाके जहाँ सतह के नीचे से आने वाला पानी पीने योग्य नहीं होता वहां पानी साफ़ करने के बेहतर तरीकों का इस्तेमाल शुरू करना होगा | ये ज्यादातर आदिवासी और पिछड़े इलाके हैं जहाँ ज्यादा काम करने की जरूरत पड़ेगी |



स्थाई, टिकाऊ पानी के लिए खान पान

कई बार sustainability की कक्षाओं में लोग भयावह ग्राफ और नंबर लेकर आते हैं | जब जल संरक्षण पर ऐसी वर्कशॉप में जाना होता है तो हमें बड़ा मज़ा आता है | हिन्दुओं ने इसके लिए एक बड़ा ही आसान तरीका निकाला था सदियों पहले | उन्होंने गाय को धर्म से जोड़ दिया, अब चाहे आप लाख मेहनत कर लें, हिन्दू आसानी से BEEF खाने के लिए तैयार नहीं होता, इस तरह लाखों लीटर पानी अपने आप ही बच जाता है | इतनी बड़ी आबादी में अगर लोग BEEF खाते तो क्या होता इसका अंदाजा लगाना है तो किस राज्य में कितने इसाई हैं उसका एक ग्राफ नीचे है एक नज़र देख लीजिये |

आहार बदलें कैसे ?

आहार बदलने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करने की जरूरत है | कानून अगर गौ हत्या के खिलाफ़ होगा तो BEEF मिलना ऐसे ही कम हो जायेगा ! मुश्किल से चोरी छिपे मिलने वाली चीज़ महंगी भी होगी, तो उसकी खरीदारी अपने आप कम हो जाएगी| थोड़ा सा जोर लगाकर अगर संजीव कपूर जैसे नामी कुक से अगर बढ़िया शाकाहारी, या टोफू या चिकन के आइटम कुछ दिन टीवी पर बनवाए जाएँ तो उस से भी प्रचार होगा ऐसे खाने का | अमरीकी सरकार भी लोगों को शाकाहारी बनाने के लिए बड़ी मेहनत करती है | 

मेरे ख़याल से तो अब समय आ गया है की हमारी सरकार भी कानून और मार्केटिंग को मिला के लोगों के आहार की आदतें बदले |

अब आप सोच रहे होंगे की ये पानी बचाने, खेती और मांस पर हमने ये बोरिंग सा लेख क्यों लिख डाला ? अब मेरा कारण तो लेख के अंतिम पैराग्राफ में होता है ! तो साहब ऐसा है की होली आ रही है और कोई न कोई “बुद्धिजीवी” हमें पानी बचाने की सलाह तो देगा ही | वैसे कई बुद्धिजीवी महाराष्ट्र सरकार के गौहत्या पर प्रतिबन्ध पर भी शोर मचा रहे हैं | कितना पानी बचेगा इस से ये उनकी बुद्धि में शायद इस लेख से चला जाए !

(आनंद कुमार जी के अन्य फेसबुक नोट पढ़ने के लिए यहाँ संपर्क करें... 
https://www.facebook.com/notes/852809351449898/  )

Friday, February 27, 2015

A Boost for RSS Ghar Vapsi

"घर वापसी" पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर... 


हिन्दू धर्म के लिए खुशखबरी तथा...हिन्दू धर्म द्रोहियों, चर्च-वेटिकन के गुर्गों और गाँव-गाँव में सेवा के नाम पर "धंधा" करने वाले फादरों के लिए बुरी खबर है कि सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के निर्णय को धता बताते हुए यह निर्णय सुनाया है कि यदि कोई व्यक्ति हिन्दू धर्म में वापसी करता है तो उसका दलित स्टेटस बरकरार रहेगा और उसे आरक्षण की सुविधा मिलती रहेगी... 

मामला केरल का है, जहाँ एक व्यक्ति ने हिन्दू धर्म में "घर-वापसी" की. उसे उसकी मूल दलित जाति का प्रमाण-पत्र जारी कर दिया गया. जब वह आरक्षण लेने पहुँचा तो वेटिकन के "दोगलों" ने हंगामा खड़ा करते हुए केरल हाईकोर्ट में याचिका लगा दी कि वह ईसाई बन चुका था, इसलिए उसे अब आरक्षण नहीं दिया जा सकता. अब सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दे दी है कि हिन्दू धर्म में लौटने के बाद भी वह दलित माना जाएगा और उसे आरक्षण मिलेगा.

ऊपर मैंने चर्च के सफ़ेद शांतिदूतों को "दोगला" इसलिए कहा, क्योंकि इन्हीं लोगों की माँग थी कि जो दलित ईसाई धर्म में जाए उसे भी "दलित ईसाई" श्रेणी में आरक्षण मिलना चाहिए. लेकिन जब वही व्यक्ति उनके चंगुल से निकलकर हिन्दू धर्म में वापस आया तो उसे आरक्षण के नाम पर रुदालियाँ गाने लगे. ठीक ऐसी ही दोगली कोलकाता निवासी एक महिला भी थी जिसे "सेवा"(?) उसी स्थिति में करनी थी, जब सरकार कठोर धर्मांतरण विरोधी क़ानून न बनाए. इस प्रस्तावित क़ानून के विरोध में मोरारजी देसाई को चिठ्ठी भी लिख मारी.

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पाखण्ड, धूर्तता, चालाकी, झूठ, फुसलाना आदि के सहारे हिंदुओं को बरगलाने वालों को तगड़ा झटका लगा है... अब गरीब दलितों के सामने अच्छा विकल्प है कि पहले वे चर्च से "मोटा माल" लेकर ईसाई बन जाएँ फिर कुछ वर्ष बाद हिन्दू धर्म में "घर वापसी" कर लें और मजे से आरक्षण लें... "आम के आम, गुठलियों के दाम'.." wink emoticon wink emoticon 


Wednesday, February 25, 2015

How to Debate Effectively on TV

टीवी बहस और उसकी प्रभावोत्पादकता 

(साभार - आनंद राजाध्यक्ष जी)

Jeet Bhargava जी ने मुद्दा उठाया है कि टीवी डिबेट में आने वाले हिन्दू नेता न तो स्मार्ट ढंग से अपनी बात रख पा रहे है और ना ही विरोधियो के तर्कों को धार से काट रहे हैं.




विहिप, बजरंग दल और हिन्दू महासभा वाले बंधुओ, ज़रा ढंग के ओरेटर लाओ. होम वर्क करके बन्दे भेजो. 
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जीत भार्गव जी, मुद्दा आप ने १००% सही उठाया है लेकिन उत्तर इतना सहज और सरल नहीं है. वैसे इस विषय पर बहुत दिनों से लिखने की मंशा थी, आज आप ने प्रेरित ही कर दिया. लीजिये : 
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अच्छे वक्ता जो अच्छे तर्क भी दे सकें, और विषय की गहरी जानकारी भी रखते हों, आसानी से नहीं मिलते. मैंने ऐसे लोग देखे हैं जो लिखते बेहद तार्किक और मार्मिक भी हैं, लेकिन लेखन और वक्तृत्व में फर्क होता है, डिलीवरी का अंदाज, आवाज, बॉडी लैंग्वेज इत्यादि बहुतही मायने रखते हैं जो हर किसी में उपलब्ध नहीं होते. अंदाज, आवाज और बॉडी लैंग्वेज तो खैर, सीखे और विक्सित भी किये जा सकते हैं लेकिन मूल बुद्धिमत्ता भी आवश्यक है. अनपढ़ गंवार के हाथों में F16 जैसा फाइटर विमान भी क्या काम का? 
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एक्टर और ओरेटर में यही तो फर्क होता है. अक्सर जो देखने मिलते हैं उन्हें वक्ता न कहकर बकताकहना ही सही होगा. 


ज्ञान के साथ साथ वक्ते के वाणी मैं ओज और अपनी बात मैं कॉन्फिडेंस होना अत्यावश्यक है, तभी उसकी बात सुननेवाले के दिल को छू पाएगी. यह सब कुछ नैसर्गिक देन नहीं होता. कुछ अंश तक होता है, बाकी लगन, मेहनत और प्रशिक्षण अत्यावश्यक है. हीरा तराशने के बाद ही निखरता है .
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टीवी डिबेट एक और ही विधा है, केवल वक्तृत्व से काम नहीं चलता. भारतीय दर्शन परंपरा मैं वाद विवाद पद्धति पर ज्ञान उपलब्ध है; जरूरत है उसके अभ्यास की. इसको टीवी डिबेट के तांत्रिक अंगों से align करना आवश्यक है कि विपक्ष से कैसे फुटेज खाया जा सके, आवाज कैसी लगानी चाहिए, बॉडी लैंग्वेज कैसी होनी चाहिए, मुख मुद्रा (एक्सप्रेशन) कैसे हों, आवाज के चढ़ उतार इत्यादि.
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पश्चिमी देशों की और अपने यहाँ वामपंथियों की इस विषय में गहरी सोच है, यह विषय का महत्त्व समझते हैं. पश्चिमी देशों में यह तो बाकायदा एक व्यवसाय है और ऐसे प्रोफेशनल्स की सेवाएं लेना वहां के राजनेता अनिवार्य मानते हैं. मोदीजी ने भी ऐसे मीडिया कंसल्टेंट्स की सेवाएं लेने की बात सुनी है, लेकिन अधिकारिक रूप से पुष्टि नहीं कर सकता. वैसे, डिबेट के स्तर का नेता या प्रवक्ता और मंच पर जनसमुदाय को सम्बंधित करनेवाला वक्ता उन दोनों में अंतर रहता है, लेकिन वो विषय विस्तार इस पोस्ट के दायरे से बाहर है. अमेरिका में प्रेसिडेंट पद के लिए शीर्ष के दो प्रत्याशियों को डिबेट करनी पड़ती है, अपने यहाँ वो प्रणाली नहीं है. 
अपने यहाँ वामपंथी लोग कॉलेज स्तर से ही विद्यार्थियों को अपने जाल में फंसाते हैं और उनका कोचिंग करना शुरू होता है. एक सुनियोजित पद्धति से उनकी जमात बनाई जाती है जो उनकी सामाजिक सेना भी है. यहाँ http://on.fb.me/1mFlPkB और यहाँhttp://on.fb.me/1CFIwMO पढ़ें. 
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इसमें अब हिन्दुत्ववादी संघटनों को करने जैसे तात्कालिक उपाय क्या होंगे जो बिना प्रचुर धन खर्चे हो सके? हाँ, समय अवश्य लगेगा, लेकिन बच्चा शादी के दूसरे दिन तो पैदा नहीं हो सकता भाई ! Full term delivery ही सही होगी. तो प्रस्तुत है :
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1.
संघ की हर "शाखा" में विषय चुन कर वक्तृत्व को उत्तेजन दें. अभ्यासी, होनहार लोगों / मेधावी बच्चों का चयन करें. विविध विषयों का चयन हो, और वक्ता के आकलन शक्ति, delivery इत्यादि उपरनिर्दिष्ट शक्तियों का अभ्यास किया जाए, बिना पक्षपात के. 
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2.
इनमे से छंटे वक्ताओं की तालुका, जिला, शहर और राज्य स्तर पर परीक्षा हो. किसमें कौनसी / कितनी भाषा में किस हद तक धाराप्रवाह और तार्किक वक्तृत्व की क्षमता है यह जांचा जाए. कौनसा वक्ता मंच का है और कौन सा टीवी डिबेट का, किसे प्रचार टीम में जोड़ा जाए, किसे थिंक टैंक में समाया जाए ये काफी उपलब्धियां इस उपक्रम से हो सकती हैं. इसी परीक्षा का विस्तार राष्ट्रीय स्तर पर भी किया जाए ये भी अत्यावश्यक है, सारी मेहनत इसी के लिए ही तो है. 
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3.
उनमें जो कॉलेज के छात्र हों उन्हें अपने सहाध्यायिओं को प्रभावित कर के इस धारा में जोड़ने का प्रयास करना चाहिए. कॉलेज में भी वक्तृत्व स्पर्धा में अवश्य भाग लें, इस से लोकप्रियता भी बढ़ेगी, एक neutral या hostile क्राउड का भी अनुभव होगा, stage-fright जाती रहेगी. 
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4.
अभी जो लोग लिख रहे हैं, विडिओ पर भाषण देने का भी अभ्यास करें. आजकल विडियो बिलकुल मुफ्त की चीज हो गई है मोबाइल के चलते. कम से कम ढाई मिनट और ज्यादा से ज्यादा दस मिनट तक भाषण कर के देख सकते हैं कहाँ तक प्रभावशाली हैं और कहाँ तक लोगों को पकड़ में रख सकते हैं. आपस में स्काइप पर विडिओ कॉन्फ़्रेंसिंग कर के डिबेट कर के भी देख सकते हैं कि किस लायक है नेशनल टीवी पर जाने के लिए ?
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5.
उपरोक्त जो विडिओ टॉक की बात कही गई है, अपने आप में एक स्वतंत्र और महत्वपूर्ण विधा भी है. अपना फोल्लोविंग बढाकर पक्ष विचार से अधिकाधिक लोग जोड़ सकते हैं. सेना में हर कोई जनरल नहीं होता, पर हर किसी का योगदान अपनी जगह पर बहुत महत्त्व रखता है, और बिना १००% योगदान के मुहीम फेल हो सकती है. वो कहावत तो आप ने पढ़ी ही होगी . नाल से गिरी कील वापस न ठोंकने पर घोडा गिरा, इसीलिए घुड़सवार गिरा.... कील ही सही, लेकिन यह जान लें की यह कील दुश्मन के coffin में ठोंकी जा रही है, अगर मजबूत न रही तो coffin तोड़कर Dracula बाहर आएगा जरूर...
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6.
और जो प्रभावी लेखक हैं अगर वक्ता नहीं है तो कोई बात नहीं, आदमी पढ़ना नहीं छोडनेवाला... आप की भी बहुत भारी जरुरत है भाई, बस आप भी अपनी क्षमता की एक बार जांच कर लें और अपने niche में अपनी तलवार मतलब कलम को और धारदार बनाए वार उसका भी खाली नहीं जाता और न जाए...