Sunday, April 26, 2015

What is the Mystery of Oregon Sriyantra

अमेरिका के ओरेगॉन का रहस्यमयी श्रीयंत्र


इडाहो एयर नेशनल गार्ड का पायलट बिल मिलर 10 अगस्त 1990 को अपनी नियमित प्रशिक्षण उड़ान पर था. अचानक उसने ओरेगॉन प्रांत की एक सूखी हुई झील की रेत पर कोई विचित्र आकृति देखी. यह आकृति लगभग चौथाई मील लंबी-चौड़ी और सतह में लगभग तीन इंच गहरे धंसी हुई थी. बिल मिलर चौंका, क्योंकि लगभग तीस मिनट पहले ही उसने इस मार्ग से उड़ान भरी थी तब उसे ऐसी कोई आकृति नहीं दिखाई दी थी. उसके अलावा कई अन्य पायलट भी इसी मार्ग से लगातार उड़ान भरते थे, उन्होंने भी कभी इस विशाल आकृति के निर्माण की प्रक्रिया अथवा इसे बनाने वालों को कभी नहीं देखा था. आकृति का आकार इतना बड़ा था, कि ऐसा संभव ही नहीं कि पायलटों की निगाह से चूक जाए.

 


(9000 फुट की ऊँचाई से दिखाई देती है ऐसी आकृति) 

सेना में लेफ्टिनेंट पद पर कार्यरत बिल मिलर ने तत्काल इसकी रिपोर्ट अपने उच्चाधिकारियों को दी, कि ओरेगॉन प्रांत की सिटी ऑफ बर्न्स से सत्तर मील दूर सूखी हुई झील की चट्टानों पर कोई रहस्यमयी आकृति दिखाई दे रही है. मिलर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि यह आकृति अपने आकार और लकीरों की बनावट से किसी मशीन की आकृति प्रतीत होती है. इस खबर को लगभग तीस दिनों तक आम जनता से छिपाकर रखा गया, कि कहीं उस स्थान पर भीडभाड ना हो जाए. लेकिन फिर भी 12 सितम्बर 1990 को प्रेस को इसके बारे में पता चल ही गया. सबसे पहले बोईस टीवी स्टेशन ने इसकी ब्रेकिंग न्यूज़ दर्शकों को दी. जैसे ही लोगों ने उस आकृति को देखा तो तत्काल ही समझ गए कि यह हिन्दू धर्म का पवित्र चिन्ह “श्रीयंत्र” है. परन्तु किसी के पास इस बात का जवाब नहीं था कि हिन्दू आध्यात्मिक यन्त्र की विशाल आकृति ओरेगॉन के उस वीरान स्थल पर कैसे और क्यों आई? 

(श्रीयंत्र आकृति की एकदम सटीक लोकेशन इस प्रकार है) 

14 सितम्बर को अमेरिका असोसिएटेड प्रेस तथा ओरेगॉन की बैण्ड बुलेटिन ने भी प्रमुखता से दिखाया और इस पर चर्चाएं होने लगीं. समाचार पत्रों ने शहर के विख्यात वास्तुविदों एवं इंजीनियरों से संपर्क किया तो उन्होंने भी इस आकृति पर जबरदस्त आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि इतनी बड़ी आकृति को बनाने के लिए यदि जमीन का सिर्फ सर्वे भर किया जाए तब भी कम से कम एक लाख डॉलर का खर्च आएगा. श्रीयंत्र की बेहद जटिल संरचना और उसकी कठिन डिजाइन को देखते हुए जब इसे सादे कागज़ पर बनाना ही मुश्किल होता है तो सूखी झील में आधे मील की लम्बाई-चौड़ाई में जमीन पर इस डिजाइन को बनाना तो बेहद ही मुश्किल और लंबा काम है, यह विशाल आकृति रातोंरात नहीं बनाई जा सकती. इस व्यावहारिक निष्कर्ष से अंदाजा लगाया गया कि निश्चित ही यह मनुष्य की कृति नहीं है.

तमाम माथापच्ची के बाद यह निष्कर्ष इसलिए भी निकाला गया, क्योंकि जितनी विशाल यह आकृति थी, और इसकी रचना एवं निश्चित पंक्तियों की लम्बाई-चौड़ाई को देखते हुए इसे जमीन पर खड़े रहकर बनाना संभव ही नहीं था. बल्कि यह आकृति को जमीन पर खड़े होकर पूरी देखी भी नहीं जा सकती थी, इसे पूरा देखने के लिए सैकड़ों फुट की ऊँचाई चाहिए थी. अंततः तमाम विद्वान, प्रोफ़ेसर, आस्तिक-नास्तिक, अन्य धर्मों के प्रतिनिधि इस बात पर सहमत हुए कि निश्चित ही यह आकृति किसी रहस्यमयी घटना का नतीजा है. फिर भी वैज्ञानिकों की शंका दूर नहीं हुई तो UFO पर रिसर्च करने वाले दो वैज्ञानिक डोन न्यूमन और एलेन डेकर ने 15 सितम्बर को इस आकृति वाले स्थान का दौरा किया और अपनी रिपोर्ट में लिखा कि इस आकृति के आसपास उन्हें किसी मशीन अथवा टायरों के निशान आदि दिखाई नहीं दिए, बल्कि उनकी खुद की बड़ी स्टेशन वैगन के पहियों के निशान उन चट्टानों और रेत पर तुरंत आ गए थे.

ओरेगॉन विश्वविद्यालय के डॉक्टर जेम्स देदरोफ़ ने इस अदभुत घटना पर UFO तथा परावैज्ञानिक शक्तियों से सम्बन्धित एक रिसर्च पेपर भी लिखा जो “ए सिम्बल ऑन द ओरेगॉन डेज़र्ट” के नाम से 1991 में प्रकाशित हुआ. अपने रिसर्च पेपर में वे लिखते हैं कि अमेरिकी सरकार अंत तक अपने नागरिकों को इस दैवीय घटना के बारे कोई ठोस जानकारी नहीं दे सकी, क्योंकि किसी को नहीं पता था कि श्रीयंत्र की वह विशाल आकृति वहाँ बनी कैसे? कई नास्तिकतावादी इस कहानी को झूठा और श्रीयंत्र की आकृति को मानव द्वारा बनाया हुआ सिद्ध करने की कोशिश करने वहाँ जुटे. लेकिन अपने तमाम संसाधनों, ट्रैक्टर, हल, रस्सी, मीटर, नापने के लिए बड़े-बड़े स्केल आदि के बावजूद उस श्रीयंत्र की आकृति से आधी आकृति भी ठीक से और सीधी नहीं बना सके. 


आज भी वह आकृति रहस्य ही बनी हुई है... वैज्ञानिक उस पर अपनी रिसर्च जारी रखे हुए हैं.

Sunday, April 19, 2015

What is Rest in Peace (RIP)

ये "रिप-रिप-रिप-रिप" क्या है? 


आजकल देखने में आया है कि किसी मृतात्मा के प्रति RIP लिखने का "फैशन" चल पड़ा है. ऐसा इसलिए हुआ है, क्योंकि कान्वेंटी दुष्प्रचार तथा विदेशियों की नकल के कारण हमारे युवाओं को धर्म की मूल अवधारणाएँ, या तो पता ही नहीं हैं, अथवा विकृत हो चुकी हैं...

RIP शब्द का अर्थ होता है "Rest in Peace" (शान्ति से आराम करो). यह शब्द उनके लिए उपयोग किया जाता है जिन्हें कब्र में दफनाया गया हो. क्योंकि ईसाई अथवा मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार जब कभी "जजमेंट डे" अथवा "क़यामत का दिन" आएगा, उस दिन कब्र में पड़े ये सभी मुर्दे पुनर्जीवित हो जाएँगे... अतः उनके लिए कहा गया है, कि उस क़यामत के दिन के इंतज़ार में "शान्ति से आराम करो".


लेकिन हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है. हिन्दू शरीर को जला दिया जाता है, अतः उसके "Rest in Peace" का सवाल ही नहीं उठता. हिन्दू धर्म के अनुसार मनुष्य की मृत्यु होते ही आत्मा निकलकर किसी दूसरे नए जीव/काया/शरीर/नवजात में प्रवेश कर जाती है... उस आत्मा को अगली यात्रा हेतु गति प्रदान करने के लिए ही श्राद्धकर्म की परंपरा निर्वहन एवं शान्तिपाठ आयोजित किए जाते हैं. अतः किसी हिन्दू मृतात्मा हेतु "विनम्र श्रद्धांजलि", "श्रद्धांजलि", "आत्मा को सदगति प्रदान करें" जैसे वाक्य विन्यास लिखे जाने चाहिए. जबकि किसी मुस्लिम अथवा ईसाई मित्र के परिजनों की मृत्यु पर उनके लिए RIP लिखा जा सकता है...

होता यह है कि श्रद्धांजलि देते समय भी "शॉर्टकट(?) अपनाने की आदत से हममें से कई मित्र हिन्दू मृत्यु पर भी "RIP" ठोंक आते हैं... यह विशुद्ध "अज्ञान और जल्दबाजी" है, इसके अलावा कुछ नहीं... अतः कोशिश करें कि भविष्य में यह गलती ना हो एवं हम लोग "दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि" प्रदान करें... ना कि उसे RIP (apart) करें. मूल बात यह है कि चूँकि अंग्रेजी शब्द SOUL का हिन्दी अनुवाद "आत्मा" नहीं हो सकता, इसलिए स्वाभाविक रूप से "RIP और श्रद्धांजलि" दोनों का अर्थ भी पूर्णरूप से भिन्न है.


धार्मिक अज्ञान एवं संस्कार-परम्पराओं के प्रति उपेक्षा की यही पराकाष्ठा, अक्सर हमें ईद अथवा क्रिसमस पर देखने को मिलती है, जब अपने किसी ईसाई मित्र अथवा मुस्लिम मित्र को बधाईयाँ एवं शुभकामनाएँ देना तो तार्किक एवं व्यावहारिक रूप से समझ में आता है, लेकिन "दो हिन्दू मित्र" आपस में एक-दूसरे को ईद की शुभकामनाएँ अथवा "दो हिन्दू मित्रानियाँ" आपस में क्रिसमस केक बाँटती फिरती रहें... अथवा क्रिसमस ट्री सजाने एक-दूसरे के घर जाएँ, तो समझिए कि निश्चित ही कोई गंभीर "बौद्धिक-सांस्कारिक गडबड़ी" है...

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"हिन्दू श्मशान एवं शवयात्रा" पर बहुत समय पहले तीन भागों में लेख लिखे थे... यदि वाकई समझना चाहते हों तो इन लेखों को भी पढ़ें...

http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2008/05/less-wood-hindu-cremation-environment.html

http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2008/05/less-wood-hindu-cremation-environment_06.html

http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2008/05/less-wood-hindu-cremation-environment_07.html


Wednesday, April 1, 2015

Bharti Singh - The Chinese Bamboo

बच्चे नहीं, बल्कि प्रतिभा परीक्षण का हमारा "सिस्टम" खराब है... 

(प्रस्तुत पोस्ट भाई Ajit Singh - https://www.facebook.com/SinghCorpt की फेसबुक वाल से साभार ली गई है. अजीत सिंह एक मस्तमौला लेखक हैं जो दिल से लिखते हैं तथा अपनी लेखनी में हिन्दी शब्दों की शुद्धता अथवा व्याकरण आदि की कतई परवाह नहीं करते. अजीत सिंह, माहपुर में "मुसहर" बच्चों के लिए अपने NGO "उदयन" के तहत एक स्कूल भी चलाते हैं... मैं अजीत सिंह जी की इस पोस्ट को बिना किसी सुधार के जस का तस रहने देना चाहता हूँ, ताकि अन्य पाठक भी देखें-समझे-जानें कि लिखने के लिए भाषा की नहीं "दिल" की जरूरत होती है, हिन्दी-अंग्रेजी की खिचड़ी, देशज शब्दों के उपयोग के सहारे भी कोई शानदार लेख लिख सकता है, उसके लिए किसी को लेखक होना जरूरी नहीं है, बस आँखें-कान खुले हों और मन में तड़प हो). 
पूरा पढ़िए और एक सच्चाई से रू-ब-रू होने का आनंद लीजिए... 


सावधान, आपके आसपास ज़मीन में चाईनीज बाँस गड़े हुए हैं. 
दोस्तों........अपने लेख कई बार मैं एक कहानी सुना के शुरू करता हूँ जो ज़्यादातर काल्पनिक होती है ....आज फिर एक कहानी सुना रहा हूँ ,,,,,पर ये काल्पनिक नहीं है. यह एक सच्ची घटना है .........काफी पुरानी बात है ...एक लड़की थी ........बचपन में एकदम सामान्य ........सामान्य से घर में जन्मी थी .अक्सर बीमार रहती थी .....बचपन में पैर जल गए ...महीनों बिस्तर में पड़ी रही ....dull सी personality थी ......स्कूल जाने लगी ......पढने में शुरू से ही dull थी ....बाकी activities में भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी .........सो ऐसे बच्चों को स्कूल में भी कोई विशेष प्रोत्साहन नहीं मिलता ..........वो अक्सर back benchers बन के रह जाते हैं ...स्कूल के गुमनाम चेहरे ........तो साहब उसके जीवन में शुरू से ही एक सिलसिला शुरू हो गया ....fail होने का ......हर टेस्ट में fail .....क्लास टेस्ट में ...fail ....unit टेस्ट में fail ....half yearly ....fail ...annual exam ...fail ....अब CBSE बोर्ड की कोई policy है शायद की पांचवीं तक किसी को fail नहीं करना है ...उसे अगली क्लास में promote कर देना है ...... सो वो fail होते होते 6th में पहुँच गयी ........अब साहब fail होना तो उसका जैसे trade mark हो गया था सो वो 6th में भी fail हो गयी ......

इस बीच ऐसा भी नहीं था की घर वालों ने कोई कोशिश नहीं की ...पर तमाम कोशिशों का कोई रिजल्ट नहीं निकला ....और ये भी नहीं की स्कूल वालों का कोई दुराग्रह था क्योंकि स्कूल तो उसका हर 2 या 3 साल में बदल जाता था ....खैर जब 6th में भी फेल हो गयी तो इस बार promotion नहीं हुआ ...उसी क्लास में रोक दी गयी ......घर वालों ने हाथ पाँव जोड़ के किसी तरह अगली क्लास में promote कराया .......और इसी तरह वो लुढ़कते पुढ़कते .......consistently and persistently ....हर एक टेस्ट में fail होती हुआती 10th में पहुँच गयी .......अब CBSE बोर्ड के exam में कौन सी सिफारिश चलनी थी सो वहां भी उसने असफलता का झंडा गाड़ दिया .....यानी 10th में भी फेल.......... 

अब आप ये बताइये की क्या किया जा सकता है ..........एक बच्चा जो लगातार 10 साल तक रोजाना fail हुआ उसका क्या किया जा सकता है .....कभी सोच के देखा है ????????? 10th fail लड़की का क्या future होता है ....आइये मैं बताता हूँ...
१) वो 11th में admission नहीं ले सकती .इसलिए BA का भी कोई चांस नहीं ......
२) वो सारी जिंदगी 10th fail कहलाएगी .
३) उसे कोई सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी .....चपरासी की भी नहीं .....अब तो फ़ौज में भी भर्ती नहीं हो सकती ...वहां भी 10th पास मांगते हैं .....
४) उसकी शादी किसी अच्छे, पढ़े लिखे well settled लड़के से नहीं होगी .... अजी 10th फ़ैल लड़की से कौन शादी करना चाहता है आजकल .....
५) कहने का मतलब उसका future ख़तम ......

आइये अब ये देखते हैं की ऐसे बच्चे ,जो की पढ़ाई में dull होते हैं उनके साथ क्या होता है समाज में ........रोज़ रोज़ का तिरस्कार .....teachers की रोज़ रोज़ की डांट फटकार ...कई बार तो मार पीट .....हर रोज़ हर subject में failure का ठप्पा ......ऊपर से घर में डांट .... उन्हें पूरी तरह नकारा ...निकम्मा ...कामचोर ....नालायक ....मान लिया जाता है ........सहपाठियों द्वारा तिरस्कार ,दुत्कार ....ऐसे बच्चों से अक्सर तेज़ तर्रार बच्चे कोई मेल मिलाप नहीं रखते .......और वो और ज्यादा dull होते चले जाते हैं .......उन्हें एक ऐसे सिस्टम ने failure ...नकारा घोषित किया है जो की एक फूल प्रूफ सिस्टम माना जाता है ........जो हर साल लाखों करोड़ों बच्चों का मूल्यांकन करता है ...सैकड़ों साल पुराना एक जांचा परखा सिस्टम है .......अब आप यूँ समझ लीजिये की जौहरियों की एक संस्था जो हर साल लाखों पत्थरों का मूल्यांकन करती है ,उसने एक पत्थर का 10 साल मूल्यांकन कर के उसे पत्थर घोषित कर दिया और बाकियों को हीरा तो ऐसी संस्था के ऊपर शक भी कैसे किया जा सकता है .......तो साहब अब आप कल्पना कीजिये की उस लड़की का क्या हुआ होगा .... ज्यादातर लोग यही कहेंगे की शादी कर के बच्चे पाल रही होगी ........ 

तो सुनिए साहब ....जिस दिन उस लड़की को certified नाकारा यानि failure ....... घोषित किया गया ,उसके ठीक 10 साल बाद वो लड़की राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में ....हिन्दुस्तान की नामचीन और महान हस्तियों की तालियों की गडगडाहट के बीच , अपने क्षेत्र में सर्वोत्कृष्ट सेवाओं और उपलब्धियों के लिए ...देश का सबसे बड़ा पुरस्कार ,खुद महामहिम राष्ट्रपति जी के हाथों से प्राप्त कर रही थी .......उस लड़की का नाम है भारती सिंह ......और उसे मैं इसलिए जानता हूँ क्योंकि वो मेरी सगी छोटी बहन है ..........और मैंने उसे प्रतिदिन ......असफलता से आगे निकल कर सफलता की बुलंदियों तक पहुँचते देखा है .......भारती ने 1996 में भारत का sports का सर्वोच्च पुरस्कार ..."अर्जुन पुरस्कार" प्राप्त किया और वो अपने करियर में विश्व के सबसे महान weightlifters में गिनी गयीं ...और उन्होंने world championship और Asian games में कई पदक जीते ......Olympics में उन दिनों Women Weightlifting नहीं थी ....नहीं तो वहां भी मेडल जीतती .उन्होंने हाल ही में CISF से ASSISTANT COMMANDANT के पद से Voluntary Retirement लिया है ...अगर वो अपनी पूरी नौकरी करती तो शायद DIG या IG बन के retire होतीं ......अब सोचने वाली बात ये है की आखिर गड़बड़ कहाँ हुई इस कहानी में ...और भारती सिंह की लाइफ में turning point कहाँ से आया . 


गौर से देखने पर पता लगता है की वो जीवन में कभी भी एक dull या failure बच्चा नहीं थी ...दरअसल हमारा सिस्टम उसको गलत पैमाने से नाप रहा था .........अब साहब अगर आपको Quadratic Equation ...और Trignometry नहीं आती तो आप fail .......अगर आप लिखने में Spelling Mistake करते हैं तो आप fail .....सूर्य ग्रहण कैसे लगता है ... ये आपने रटा नहीं है तो आप fail .......फिर आपमें चाहे जितनी भी प्रतिभा है ....चाहे आप किसी अन्य field में विश्व की महानतम हस्ती बनने की क्षमता रखते हों ..........पर चूंकि आपको quadratic equation नहीं आती इसलिए आप फेल ...और आपका future ख़तम .......हमारे education system ने तो आपको fail यानी नकारा घोषित कर दिया है .......अब आप ऐसा करो सब्जी की रेड़ी लगा लो सड़क पे.. 


(चित्र में बाँए से तीसरी भारती सिंह... अर्जुन सिंह एवं राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा के साथ)

कायदे से होना तो ये चाहिए कि सिस्टम उस बच्चे का मूल्यांकन करे और यह बताये की बेशक इस बच्चे को Trignometry नहीं आती ..और ये Shakespeare के नाटकों पर निबंध नहीं लिख सकता ...पर इसमें ... xyz field में अपार क्षमता है लिहाजा इसे 10th में पास किया जाता है और आगे पढने की इजाज़त दी जाती है ...इसे आगे इस इस field में पढाई करनी चाहिए ...... अब मुझे आप ये बताइये की भारती सिंह के केस में ...भारती सिंह fail हुई या भारती सिंह का मूल्यांकन करने में हमारा education system fail हुआ ..... दरअसल भारती सिंह तो एक विलक्षण प्रतिभा की धनी थीं ...पर उस प्रतिभा को पहचानने में हमारे अकादमिक महारथी और हमारा अकादमिक सिस्टम fail हो गए और खामखाह 10 साल तक उस बेचारी बच्ची को परेशान करते रहे ...उसे दुत्कारते रहे ..........अब ये तो उसकी हिम्मत थी की उसने हार नहीं मानी और तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी संघर्ष करती रही और एक दिन दुनिया के शीर्ष पर विराजमान हुई .......पर न जाने ऐसी कितनी भारती सिंह होंगी इस दुनिया में जिसे ये सिस्टम अपने पैरों तले कुचल देता है.

यहाँ एक बात मैं और साफ़ कर देना चाहता हूँ की अपने Professional Career में भारती ने सिर्फ sports में ही excell नहीं किया बल्कि हर field में टॉप किया ..........कॉलेज से BA किया 2nd division ...बढ़िया अंग्रेजी बोलती है .........फिर CISF में सब इंस्पेक्टर के पद पर ज्वाइन किया और promotion ले कर Assistant Commandant तक पहुंची .......300 से 500 मर्दों की कंपनी को सफलता पूर्वक कमांड किया .....लखनऊ .जोधपुर और दिल्ली के International Airports की security की incharge रही और इस दौरान लीडरशिप की मिसाल पेश की ....अपने करियर के दौरान उन्होंने कुछ ऐसे cases solve किये जहाँ उनकी intelligence को देख के उनके senior officers दंग रह गए, CISF की ट्रेनिंग की passing out parade में बेस्ट कैडेट घोषित हुई और परेड को command किया .......1 किलोमीटर लम्बे मैदान में हजारों Dignitries की भीड़ के सामने 1500 officers को command देना कोई हंसी खेल नहीं होता ....अच्छे अच्छों की टांगें कांपने लगती हैं ......जब वो retirement लेने लगी तो उनके एक senior ऑफिसर ने कहा था की आप गलती कर रही हैं ...अगर आप पूरी नौकरी करेंगी तो IG बन के retire होंगी .........विचारणीय विषय ये है की हमारे education system ने शुरू में ऐसी विलक्षण प्रतिभा को पहचानने में चूक कैसे कर दी ........क्या ये सिस्टम ऐसी ही हज़ारों लाखों प्रतिभाएं हर साल नष्ट कर रहा है ......मैं अक्सर ये प्रश्न अपने व्याख्यानों में उठता हूँ ........तो कुछ लोग इसका ये जवाब देते हैं की आप जिस सिस्टम की इतनी आलोचना कर रहे हैं वही सिस्टम विश्व स्तरीय प्रतिभाएं पैदा भी तो कर रहा है ....तो इसका जवाब ये है मेरे दोस्त ...की खराब से खराब सिस्टम भी कुछ results तो देता ही है ....100 किलो सरसों में 35 किलो तेल निकलना ही चाहिए ........अब अगर एक कोल्हू 20 किलो निकालता है तो आप उसे 20 किलो के लिए शाबाशी देंगे या उससे उस 15 किलो का हिसाब मांगेंगे जो waste हो गया.


यहाँ मैं ये बता दूं की इस success स्टोरी में उनके parents का क्या role रहा ....पहले तो उन्होंने उसे किसी तरह (व्याख्या करने की ज़रुरत नहीं है ) 10th पास कराया .अब चूंकि उसका maths और science से पिंड छूट गया इसलिए आगे पढ़ाई में कोई समस्या नहीं हुई .दुसरे जब उसे इतने सालों तक नाकारा घोषित किया जाता था तब उसके parents रोजाना ground में ये सिद्ध करते थे की देखो ...you are the best ...तुम तो यहाँ दौड़ में लड़कों को भी हरा देती हो ...you are the best ......तुम तो एक दिन world champion बनोगी ........और वो रोज़ इसी तरह जीतती रही ...रोज़ शाम को उसके लिए तालियाँ बजती थीं ......शाम को वो दिन भर का अपमान और तिरस्कार भूल जाती थी .........और इसी तरह धीरे धीरे ..एक दिन वो सचमुच world champion बन गयी ...... ज़रा कल्पना करें ...अगर उसके parents भी स्कूल वालों की तरह उसे नाकारा मान लेते तो ??

Moral of the Story

1 ) अगर आपका बच्चा आज पढने में कमजोर है तो ,निराश न हों .......वो कल का Thomas Alva Edison हो सकता है .

2 ) सब बच्चों को 9 नंबर का जूता पहना के मत दौड़ाओ ...........भाई मेरे सबके पाँव छोटे बड़े होते हैं .......आखिर एक ही question paper और एक ही syllabus से सारे देश के बच्चों का मूल्यांकन कैसे किया जा सकता है .......
3 ) 20 किस्म का बीज एक साथ खेत में डाल दोगे ...तो ध्यान रखो सबका जमाव एक साथ नहीं होगा .........मूंग तीसरे दिन जम जाएगी ,आम १५ दिन बाद निकलेगा ,सूरन ( जिमीकंद, yam ) दो महीने बाद जमेगा और chinese bamboo ...... 2 साल बाद निकलेगा ... इसलिए आपको कोई हक़ नहीं की आप उस बेचारे Chinese Bamboo को निकम्मा ,नाकारा या failure घोषित करें ......क्योकि आपको पता होना चाहिए की Chinese Bamboo बेशक शुरू में थोडा ज्यादा टाइम लेता है Germination में ,पर जिस दिन वो जमीन तोड़ के ऊपर आ जाता है तो सिर्फ 7 हफ्ते में 40 फुट लम्बा हो जाता है ........
सावधान : कृपया ध्यान दीजिये .....आपके इर्द गिर्द ज़मीन में ,आपके घर में , स्कूल में या समाज में .........कुछ Chinese Bamboo गड़े हो सकते हैं ....कृपया उन्हें अपने पैरों तले न कुचलें .......क्योंकि एक दिन वो जमीन तोड़ के बहार आने वाले हैं... 

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