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Thursday 29 July 2010

लोकतन्त्र खतरे में??? - वोटिंग मशीन, उसकी वैधता और हैकिंग से सम्बन्धित शानदार पुस्तक… EVM Hacking, Elections in India, Indian Democracy

गत लोकसभा चुनावों के बाद से ही कांग्रेस को छोड़कर बाकी सभी राजनैतिक दलों के मन में इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों को लेकर एक संशय है। इस विषय पर काफ़ी कुछ लिखा भी जा चुका है और विद्वानों और सॉफ़्टवेयर इंजीनियरों ने समय-समय पर विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के मॉडलों पर प्रयोग करके यह साबित किया है कि वोटिंग मशीनों को आसानी से "हैक" किया जा सकता है, अर्थात इनके परिणामों से छेड़छाड़ और इनमें बदलाव किया जा सकता है (अब चुनाव आयोग भी मान गया है कि छेड़छाड़ सम्भव है)। आम जनता को इन मशीनों के बारे में, इनके उपयोग के बारे में, इनमें निहित खतरों के बारे में अधिक जानकारी नहीं है, इसलिये हाल ही में प्रसिद्ध चुनाव विश्लेषक, शोधक और राजनैतिक लेखक श्री जीवीएल नरसिम्हाराव ने इस बारे में विस्तार से एक पुस्तक लिखी है… "डेमोक्रेसी एट रिस्क…"। इस पुस्तक की प्रस्तावना श्री लालकृष्ण आडवाणी और चन्द्रबाबू नायडू ने लिखी है, तथा दूसरी प्रस्तावना स्टेनफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर डेविड डिल द्वारा लिखी गई है।



इस पुस्तक में 16 छोटे-छोटे अध्याय हैं जिसमें भारतीय इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों के बारे में जानकारी दी गई है। शुरुआत में बताया गया है कि किस तरह इन मशीनों को अमेरिका और जर्मनी जैसे विकसित देशों में उपयोग में लाया गया, लेकिन लगातार आलोचनाओं और न्यूनतम सुरक्षा मानकों पर खरी न उतरने की वजह से उन्हें काबिल नहीं समझा गया। कई चुनावी विवादों में इन मशीनों की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठे, और अन्ततः लम्बी बहस के बाद अमेरिका, जर्मनी, हॉलैण्ड, आयरलैण्ड आदि देशों में यह तय किया गया कि प्रत्येक मतदाता द्वारा दिये गये वोट का भौतिक सत्यापन होना जरूरी है, इलेक्ट्रॉनिक सत्यापन भरोसेमन्द नहीं है। अमेरिका के 50 में से 32 राज्यों ने पुनः कागजी मतपत्र की व्यवस्था से ही चुनाव करवाना शुरु कर दिया।

इस विषय पर मैंने मई 2009 में ही दो विस्तृत पोस्ट लिखीं थी, जिन्हें यहाँ क्लिक करके… और यहाँ क्लिक करके… http://blog.sureshchiplunkar.com/2009/06/evm-rigging-elections-and-voting-fraud.html पढ़ा जा सकता है, जिसमें EVM से छेड़खानी के बारे में विस्तार से बताया था…।

जबकि इधर भारत में, चुनाव आयोग सतत इस बात का प्रचार करता रहा कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें पूर्णतः सुरक्षित और पारदर्शी हैं तथा इनमें कोई छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। कई पाठकों को यह पता नहीं होगा कि वोटिंग मशीनों की निर्माता कम्पनियों BEL (भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड) और ECIL (इलेक्ट्रॉनिक्स कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड) ने EVM के माइक्रोचिप में किये जाने वाले सीक्रेट सोर्स कोड (Secret Source Code) का काम विदेशी कम्पनियों को आउटसोर्स किया। लेखक ने सवाल उठाया है कि जब हमारे देश में ही योग्य और प्रतिभावान सॉफ़्टवेयर इंजीनियर हैं तो यह महत्वपूर्ण काम आउटसोर्स क्यों किया गया?

सूचना के अधिकार के तहत श्री वीवी राव को सरकार द्वारा दी गई जानकारी के पृष्ठ क्रमांक 33 के अनुसार "देश की 13.78 लाख वोटिंग मशीनों में से 9.30 मशीनें पुरानी हैं, जबकि 4.48 लाख मशीनें नई हैं। पुरानी मशीनों में हेराफ़ेरी की अधिक सम्भावनाओं को देखते हुए याचिकाकर्ता ने जानना चाहा कि इन मशीनों को किन-किन राज्यों की कौन-कौन सी लोकसभा सीटों पर उपयोग किया गया, लेकिन आज तक उन्हें इसका जवाब नहीं मिला। यहाँ तक कि चुनाव आयोग ने उन्हीं के द्वारा गठित समिति की सिफ़ारिशों को दरकिनार करते हुए लोकसभा चुनावों में इन मशीनों को उपयोग करने का फ़ैसला कर लिया। जब 16 मई 2009 को लोकसभा के नतीजे आये तो सभी विपक्षी राजनैतिक दल स्तब्ध रह गये थे और उसी समय से इन मशीनों पर प्रश्न चिन्ह लगने शुरु हो गये थे।

पुस्तक के अध्याय 4 में लेखक ने EVM की कई असामान्य गतिविधियों के बारे में बताया है। अध्याय 5 में बताया गया है कि कुछ राजनैतिक पार्टियों से "इलेक्ट्रॉनिक फ़िक्सरों" ने उनके पक्ष में फ़िक्सिंग हेतु भारी राशि की माँग की। बाद में लेखक ने विभिन्न उदाहरण देकर बताया है कि किस तरह चुनाव आयोग ने भारतीय आईटी विशेषज्ञों द्वारा मशीनों में हेराफ़ेरी सिद्ध करने के लिये किये जाने वाले प्रयोगों में अडंगे लगाने की कोशिशें की। इन मशीनों की वैधता, पारदर्शिता और भारतीय परिवेश और "भारतीय चुनावी वातावरण" में उपयोग को लेकर मामला न्यायालय में चल रहा है। पाठकों की जानकारी के लिये उन्हें इस पुस्तक को अवश्य पढ़ना चाहिये, यह पुस्तक अपने-आप में इकलौती है, क्योंकि ऐसे महत्वपूर्ण विषय पर सारी सामग्री एक साथ एक ही जगह पढ़ने को मिलती है। पुस्तक के प्रिण्ट फ़ॉर्मेट को मंगवाने के लिये निम्न पते पर सम्पर्क करें…

Veta Books,
B4/137,Safdarjung Enclave,
New Delhi 110 029
India
Email: veta@indianevm.com
Phone: +91 91 9873300800 (Sagar Baria)
Price: Rs. 295 -/-

जबकि इस पुस्तक को सीधे मुफ़्त में http://indianevm.com से डाउनलोड किया जा सकता है…(सिर्फ़ 1.38 MB)। इसी वेबसाइट पर आपको EVM से सम्बन्धित सभी आँकड़े, तथ्य और नेताओं और विशेषज्ञों के बयान आदि पढ़ने को मिल जायेंगे।

कांग्रेस समर्थकों, भाजपा विरोधियों और तटस्थों सभी से अपील है कि इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें, ताकि दिमाग के जाले साफ़ हो सकें, और साथ ही इन प्रश्नों के उत्तर अवश्य खोजकर रखियेगा -

1) इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में वोट देने के बाद क्या आप दावे से कह सकते हैं कि आपका वोट उसी पार्टी के खाते में गया जिसे आपने वोट दिया था? यदि आपको विश्वास है, तो इसका सबूत क्या है?

2) कागजी मतपत्र पर तो आप अपने हाथ से अपनी आँखों के सामने मतपत्र पर सील लगाते हैं, जबकि EVM में क्या सिर्फ़ पंजे या कमल पर बटन दबाने और "पीं" की आवाज़ से ही आपने कैसे मान लिया कि आपका वोट दिया जा चुका है? जबकि हैकर्स इस बात को सिद्ध कर चुके हैं कि मशीन को इस प्रकार प्रोग्राम किया जा सकता है, कि "हर तीसरा या चौथा वोट" "किसी एक खास पार्टी" के खाते में ही जाये, ताकि कोई गड़बड़ी का आरोप भी न लगा सके।

3) वोट देने के सिर्फ़ 1-2 माह बाद यदि किसी कारणवश यह पता करना हो कि किस मतदाता ने किस पार्टी को वोट दिया था, तो यह कैसे होगा? जबकि आपके वोट का कोई प्रिण्ट रिकॉर्ड ही मौजूद नहीं है।

4) अमेरिका, जर्मनी, हॉलैण्ड जैसे तकनीकी रुप से समृद्ध और विकसित देश इन मशीनों को चुनाव सिस्टम से बाहर क्यों कर चुके हैं?

अतः अब समय आ गया है कि इन मशीनों के उपयोग पर पुनर्विचार किया जाये तथा 2009 के लोकसभा चुनावों को तत्काल प्रभाव से दोबारा करवाया जाये…


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Monday 26 July 2010

ट्रेजरी मुद्दे पर मीडिया का दोगलापन और नीतीश की चुस्त कार्यप्रणाली… … Bihar Assembly Lalu Yadav and Congress

कुछ दिनों पहले बिहार की विधानसभा में जो कुछ हुआ उसने लोकतन्त्र को शर्मिन्दा तो किया ही है, लेकिन लोकतन्त्र भी अब ऐसी शर्मिन्दगी बार-बार झेलने को अभिशप्त है, और हम सब इसके आदी हो चुके हैं। बिहार विधानसभा में लालूप्रसाद और कांग्रेस ने जो हंगामा और तोड़फ़ोड़ की उसके पीछे कारण यह दिया गया कि महालेखाकार एवं नियंत्रक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में यह कहा है कि सन् 2002 से 2007 के बीच शासकीय कोषालय से करोड़ों रुपये निकाले गये और उनका बिल प्रस्तुत नहीं किया गया।

सिर पर खड़े आगामी विधानसभा चुनावों में मुद्दों के लिए तरस रहे लालू और कांग्रेस को इसमें "भ्रष्टाचार" की बू आ गई और उन्होंने बिना सोचे-समझे और मामले की तह में गये बिना हंगामा मचा दिया। बिहार विधानसभा के चुनावों में नीतीश अपनी साफ़-सुथरी छवि और बिहार में किये गये अपने काम के सहारे जाना चाहते हैं, जो लालू को कैसे सहन हो सकता है? और कांग्रेस, जो कि बिहार में कहीं गिनती में ही नहीं है वह भी ऐसे कूदने लगी, जैसे नीतीश के खिलाफ़ उसे कोई बड़ा मुद्दा हाथ लग गया हो और विधानसभा चुनाव में वे राहुल बाबा की मदद से कोई तीर मार लेंगे। विधानसभा में मेजें उलटी गईं, माइक तोड़े गये, गालीगलौज-मारपीट हुई, एक "वीरांगना" ने बाहर आकर गमले उठा-उठाकर पटके… यानी कुल मिलाकर जोरदार नाटक-नौटंकी की गई। मीडिया तो नीतीश और भाजपा के खिलाफ़ मौका ढूंढ ही रहा था, सारे चैनलों ने इस मामले को ऐसे दिखाया मानो यह करोड़ों का घोटाला हो। मीडिया के प्यारे-दुलारे लालू के "जोकरनुमा" बयान लिये गये, मनीष तिवारी इत्यादि ने भी जमकर भड़ास निकाली।

हालांकि पूरा मामला "खोदा पहाड़ निकली चुहिया" टाइप का है, लेकिन लालू, कांग्रेस और मीडिया को कौन समझाए। महालेखाकार एवं नियंत्रक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में सिर्फ़ इतना कहा है कि 2002 से 2007 के बीच कोषालय (Treasury) से जो पैसा निकला है उसका बिल प्रस्तुत नहीं हुआ है। अब भला इसमें घोटाले वाली बात कहाँ से आ गई? हालांकि यह गलत परम्परा तो है, लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि राज्य शासन के अधिकारी और विभिन्न विभाग अपनी आवश्यकतानुसार धन निकालते हैं और उसे खर्च करते हैं। विभागीय मंत्री को तो इन पैसों के उपयोग (या दुरुपयोग) से कोई मतलब होता नहीं, तो बिल और हिसाब-किताब की चिन्ता क्यों होने लगी। सम्बन्धित कलेक्टर और कमिश्नर की यह जिम्मेदारी है, लेकिन जब उन पर किसी का जोर या दबाव ही नहीं है तो वे क्यों अपनी तरफ़ से सारे शासकीय कामों के बिल शासन को देने लगे? ऐसा लगभग सभी राज्यों में होता है और बिहार भी कोई अपवाद नहीं है, हमारी "मक्कार कार्यसंस्कृति" में आलस और ढिलाई तो भरी पड़ी है ही, भ्रष्टाचार इसमें उर्वरक की भूमिका निभाता है। तात्पर्य यह कि 2002 से 2007 के बीच करोड़ों रुपये निकाले गये और खर्च हो गये कोई हिसाब-किताब और बिल नहीं पहुँचा, परन्तु विधानसभा में हंगामा करने वाले राजद और कांग्रेस सदस्यों ने इस बात पर दिमाग ही नहीं लगाया कि जिस CAG की रिपोर्ट के कालखण्ड पर वे हंगामा कर रहे हैं, उसमें से 2002 के बाद 42 माह तक लालू की ही सरकार थी, उसके बाद 11 माह तक राष्ट्रपति शासन था, जिसके सर्वेसर्वा एक और "महा-ईमानदार" बूटा सिंह थे, उसके बाद के 2 साल नीतीश सरकार के हैं, लेकिन गमले तोड़ने वाली उस वीरांगना से माथाफ़ोड़ी करे कौन? उन्हें तो बस हंगामा करने का बहाना चाहिये।


अब आते हैं हमारे "नेशनल"(?), "सबसे तेज़"(?) और "निष्पक्ष"(?) चैनलों के दोगलेपन और भाजपा विरोधी घृणित मानसिकता पर… जो लालू खुद ही करोड़ों रुपये के चारा घोटाले में न सिर्फ़ नामज़द आरोपी हैं, बल्कि न्यायालय उन्हें सजा भी सुना चुका… उसी लालू को पहले मीडिया ने रेल्वे मंत्री रहते हुए "मैनेजमेण्ट गुरु" के रुप में प्रचारित किया, जब ममता दीदी ने बाकायदा श्वेत-पत्र जारी करके लालू के मैनेजमेण्ट की पोल खोली तब वह फ़ुग्गा फ़ूटा, लेकिन फ़िर भी मीडिया को न तो अक्ल आनी थी, न आई। विधानसभा के हंगामे के बाद चैनलों ने लालू के बाइट्स और फ़ुटेज लगातार दिखाये, जबकि सुशील मोदी की बात तक नहीं सुनी गई। असल में मीडिया (और जनता) के लिये लालू एक "हँसोड़ कलाकार" से ज्यादा कुछ नहीं हैं, वह उनके मुँह से कुछ ऊटपटांग किस्म के बयान दिलवाकर मनोरंजन करवाता रहता है, लेकिन विधानसभा में जो हुआ वह मजाक नहीं था। ज़रा इन आँकड़ों पर निगाह डालिये -

- झारखण्ड सरकार के 6009 करोड़ और जम्मू-कश्मीर सरकार के 2725 करोड़ रुपये के खर्च का बरसों से अभी तक कोई हिसाब प्रस्तुत नहीं किया गया है।

- महाराष्ट्र सरकार का 3113 करोड़ रुपये के खर्च का बिल नहीं आया है।

- पश्चिम बंगाल सरकार ने 2001-02 में 7140 करोड़ रुपये खर्च किये थे, उसका हिसाब अब तक प्रस्तुत नहीं किया गया है।

- यहाँ तक कि केन्द्र सरकार के परिवार कल्याण मंत्रालय ने 1983 से लेकर अब तक 9000 करोड़ रुपये के खर्च का बिल नहीं जमा करवाया है।

कभी मीडिया में इस बारे में सुना है? नहीं सुना होगा, क्योंकि मीडिया सिर्फ़ वही दिखाता/सुनाता है जिसमें या तो महारानी (और युवराज) का स्तुति-गान होता है या फ़िर भाजपा-संघ-हिन्दूवादी संगठनों का विरोध होता है। क्या झारखण्ड, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के इन प्रकरणों को घोटाला माना जा सकता है? यदि "हाँ", तो कथित रुप से सबसे तेज मीडिया अब तक सो रहा था क्या? कई-कई बार बाकायदा उदाहरण देकर साबित किया जा चुका है कि भारत का वर्तमान मीडिया पूरी तरह से "अज्ञात शक्तियों" के नियन्त्रण में है, जो "निष्पक्ष" तो कतई नहीं है। ट्रेजरी से सम्बन्धित जिस तकनीकी गलती को "घोटाला" कहकर प्रचारित किया गया, यदि सभी राज्यों के हाइकोर्ट, सभी राज्यों के खर्चों का हिसाब-किताब देखने लगें तो सारे के सारे मुख्यमंत्री ही कठघरे में खड़े नज़र आयेंगे।

इस बीच 26 जुलाई को पटना उच्च न्यायालय में होने वाली सुनवाई के लिये नीतीश ने विपक्ष के विरोध को भोथरा करने के लिये ताबड़तोड़ काम करने के निर्देश जारी कर दिये हैं। सभी जिला कलेक्टरों को दिशानिर्देश जारी करके 2002 से 2008 तक के सभी खर्चों के बिल पेश करने को कह दिया गया है, लगभग सभी जिलों में बड़े उच्चाधिकारियों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गईं और वे रात-रात भर दफ़्तरों में बैठकर पिछले सारे रिकॉर्ड खंगालकर बिल तैयार कर रहे हैं। सीवान, बक्सर, समस्तीपुर, गया, जहानाबाद, सासाराम और छपरा में विशेष कैम्प लगाकर सारे पिछले पेण्डिंग बिल तैयार करवाये जा रहे हैं, तात्पर्य यह है कि विपक्ष की हवा निकालने और खुद की छवि उजली बनाये रखने के लिये नीतीश ने कमर कस ली है… फ़िर भी इस बीच मीडिया को जो "खेल" खेलना था, वह खेल चुका, अब चुनिंदा अखबारों, वेबसाईटों और ब्लॉग पर पड़े-पड़े लेख लिखते रहिये, कौन सुनेगा?  वैसे, बिहार के आगामी चुनावों को देखते हुए "मुसलमान-मुसलमान" का खेल शुरु हो चुका है, नीतीश भी नरेन्द्र मोदी को छूत की बीमारी की तरह दूर रखने लगे हैं और कांग्रेस भी मुस्लिमों को "आरक्षण" का झुनझुना बजाकर रिझा रही है… और वैसे भी चैनलों द्वारा "साम्प्रदायिकता" शब्द का उपयोग उसी समय किया जाता है, जब "हिन्दू" की बात की जाती है…
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चलते-चलते : उधर पूर्वोत्तर में ऑल असम माइनोरिटी स्टूडेंट्स यूनियन (AAMSU) ने राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के विरोध में बन्द का आयोजन किया, जिसमें जिला कलेक्टर के कार्यालय पर हमला किया गया और पुलिस फ़ायरिंग में चार लोग मारे गये। बांग्लादेशी शरणार्थियों (बल्कि हरामखोरों शब्द अधिक उचित है) द्वारा अब वहाँ की जनसंख्या में इतना फ़ेरबदल किया जा चुका है, कि असम में कम से कम 10 विधायक इन बाहरी लोगों की पसन्द के बन सकते हैं। इतने हंगामे के बाद NRC (National Register for Citizens) को स्थगित करते हुए मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कहते हैं कि "बातचीत" से मामला सुलझा लिया जायेगा। क्या आपने यह खबर किसी तथाकथित "निष्पक्ष" और सबसे तेज़ चैनल पर सुनी है? नहीं सुनी होगी, क्योंकि मीडिया को संत शिरोमणि श्रीश्री सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर और अमित शाह की खबर अधिक महत्वपूर्ण लगती है…


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Thursday 22 July 2010

स्विस बैंक से 180 देशों के हजारों खातों की जानकारी चोरी… "ईमानदार" प्रधानमंत्री जी, कुछ कीजिये… Swiss Bank Client list hacked

भारत के करोड़ों ईमानदार टैक्सदाताओं और नागरिकों के लिये यह एक खुशखबरी है कि फ़्रांस के HSBC बैंक के दो कर्मचारियों हर्व फ़ेल्सियानी और जॉर्जीना मिखाइल ने दावा किया है कि उनके पास स्विस बैंकों में से एक बैंक में स्थित 180 देशों के कर चोरों की पूरी डीटेल्स मौजूद हैं। 2 साल से इन्होंने लगातार यूरोपीय देशों की सरकारों को ईमेल भेजकर "टैक्स चोरों" को पकड़वाने में मदद की पेशकश की है। जर्मनी की गुप्तचर सेवा को भेजे अपने ईमेल में इन्होंने कहा कि ये लोग स्विटज़रलैण्ड स्थित एक निजी बैंक के महत्वपूर्ण डाटा और उस कम्प्यूटर तक पुलिस की पहुँच बना सकते हैं। इसी प्रकार के ईमेल ब्रिटेन, फ़्रांस और स्पेन की सरकारों, विदेश मंत्रालयों और पुलिस को भेजे गये हैं (यहाँ देखें…)। यूरोप के देशों में इस बात पर बहस छिड़ी है कि एक "हैकर" या बैंक के कर्मचारी द्वारा चोरी किये गये डाटा पर भरोसा करना ठीक है और क्या ऐसा करना नैतिक रुप से सही है? लेकिन फ़ेल्सियानी जो कि HSBC बैंक के पूर्व कर्मचारी हैं, पर फ़िलहाल फ़्रांस और जर्मनी तो भरोसा कर रहे हैं, जबकि स्विस सरकार लाल-पीली हो रही है। HSBC के वरिष्ट अधिकारियों ने माना है कि फ़ेल्सियानी ने बैंक के मुख्यालय और इसकी एक स्विस सहयोगी बैंक से महत्वपूर्ण डाटा को अपने PC में कॉपी कर लिया है और उसने बैंक की गोपनीयता सम्बन्धी सेवा शर्तों का उल्लंघन किया है।




फ़ेल्सियानी ने स्वीकार किया है कि उनके पास 180 देशों के विभिन्न "ग्राहकों" का डाटा है, लेकिन उन्होंने किसी कानून का उल्लंघन नहीं किया, क्योंकि इस डाटा से उनका उद्देश्य पैसा कमाना नहीं है, बल्कि स्विस बैंक द्वारा अपनाई जा रही "गोपनीयता बैंकिंग प्रणाली" पर सवालिया निशान लगाना भर है। बहरहाल, फ़्रांस सरकार फ़ेल्सियानी से प्राप्त जानकारियों के आधार पर टैक्स चोरों के खिलाफ़ अभियान छेड़ चुकी है। स्विस पुलिस ने फ़ेल्सियानी के निवास पर छापा मारकर उसका कम्प्यूटर और अन्य महत्वपूर्ण हार्डवेयर जब्त कर लिया है लेकिन फ़ेल्सियानी का दावा है कि उसका डाटा सुरक्षित है और वह किसी "दूरस्थ सर्वर" पर अपलोड किया जा चुका है। इधर फ़्रांस सरकार का कहना है कि उन्हें इसमें किसी कानूनी उल्लंघन की बात नज़र नहीं आती, और वे टैक्स चोरों के खिलाफ़ अभियान जारी रखेंगे। फ़्रांस सरकार ने इटली की सरकार को 7000 अकाउंट नम्बर दिये, जिसमें लगभग 7 अरब डालर की अवैध सम्पत्ति जमा थी। स्पेन के टैक्स विभाग ने भी इस डाटा का उपयोग करते हुए इनकी जाँच शुरु कर दी है।

फ़ेल्सियानी ने सन् 2000 मे HSBC बैंक की नौकरी शुरु की थी, वह कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग में स्नातक और बैंक के सुरक्षा सॉफ़्टवेयर के कोड लिखता है। बैंक में उसका कई बार प्रमोशन हो चुका है और 2006 में उसे जिनेवा स्थित HSBC के मुख्यालय में ग्राहक डाटाबेस की सुरक्षा बढ़ाने के लिये तैनात किया गया था। इसलिये फ़ेल्सियानी की बातों और उसके दावों पर शक करने की कोई वजह नहीं बनती। फ़ेल्सियानी का कहना है कि बैंक का डाटा वह एक रिमोट सर्वर पर बैक-अप के रुप में सुरक्षित करके रखता था, जो कि एक निर्धारित प्रक्रिया थी, और मेरा इरादा इस डाटा से पैसा कमाना नहीं है।


जून 2008 से अगस्त 2009 के बीच अमेरिका के कर अधिकारियों ने स्विस बैंक UBS के "नट-बोल्ट टाइट" किये तब उसने अमेरिका के 4450 कर चोरों के बैंक डीटेल्स उन्हें दे दिये। कहने का मतलब यह है कि स्विटज़रलैण्ड की एक बैंक (जी हाँ फ़िलहाल सिर्फ़ एक बैंक) के 180 देशों के हजारों ग्राहकों (यानी डाकुओं) के खातों की पूरी जानकारी फ़ेल्सियानी नामक शख्स के पास है… अब हमारे "ईमानदार" बाबू के ज़मीर और हिम्मत पर यह निर्भर करता है कि वे यह देखना सुनिश्चित करें कि फ़ेल्सियानी के पास उपलब्ध आँकड़ों में से क्या भारत के कुछ हरामखोरों के आँकड़े भी हैं? भले ही इस डाटा को हासिल करने के लिये हमें फ़ेल्सियानी को लाखों डालर क्यों न चुकाने पड़ें, लेकिन जब फ़्रांस, जर्मनी, स्पेन और अमेरिका जैसे देश फ़ेल्सियानी के इन आँकड़ों पर न सिर्फ़ भरोसा कर रहे हैं, बल्कि छापेमारी भी कर रहे हैं… तो हमें "संकोच" नहीं करना चाहिये।

भारत के पिछले लोकसभा चुनावों में स्विस बैंकों से भारत के बड़े-बड़े मगरमच्छों द्वारा वहाँ जमा किये गये धन को भारत वापस लाने के बारे में काफ़ी हो-हल्ला मचाया गया था। भाजपा की तरफ़ से कहा गया था कि सत्ता में आने पर वे स्विस सरकार से आग्रह करेंगे कि भारत के तमाम खातों की जानकारी प्रदान करे। भाजपा की देखादेखी कांग्रेस ने भी उसमें सुर मिलाया था, लेकिन चुनाव निपटकर एक साल बीत चुका है, और हमेशा की तरह कांग्रेस ने अब तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है।

एक व्यक्ति के रुप में, प्रधानमंत्री की ईमानदार छवि पर मुझे पूरा यकीन है, लेकिन क्या वे इस मौके का उपयोग देशहित में करेंगे…? यदि फ़ेल्सियानी की लिस्ट से भारत के 8-10 "मगरमच्छ" भी फ़ँसते हैं, तो मनमोहन सिंह भारत में इतिहास-पुरुष बन जायेंगे…। परन्तु जिस प्रकार की "आत्माओं" से वे घिरे हुए हैं, उस माहौल में क्या ऐसा करने की हिम्मत जुटा पायेंगे? उम्मीद तो कम ही है, क्योंकि दूरसंचार मंत्री ए राजा के खिलाफ़ पक्के सबूत, मीडिया में छपने के बावजूद वे उन पर कोई कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं, तो फ़ेल्सियानी की स्विस बैंक लिस्ट में से पता नहीं कौन सा "भयानक भूत" निकल आये और उनकी सरकार को हवा में उड़ा ले जाये…।


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