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Wednesday, July 30, 2014

Modi Budget - First Step towards Brand India


मोदी सरकार का बजट : ब्राण्ड इण्डिया की तरफ पहला कदम


जब घर में नई बहू आती है, तो परिवार के प्रत्येक सदस्य की उससे अति-अपेक्षाएँ होती हैं, जो कि स्वाभाविक भी है. सास सोचती है कि बहू रोज उसके पैर दबाएगी, ससुर सोचते हैं कि सुबह-सुबह वह उन्हें चाय लाकर देगी, ननद सोचती है कि वह भाभी की सारी साड़ियों की स्वयंभू हकदार हो गई है... नरेंद्र मोदी सरकार नामक नई बहू को लेकर भी देश के विभिन्न तबकों की अपेक्षाएँ यही थीं. ऐसा इसलिए, क्योंकि नई बहू के आने से पहले ही ससुराल में यह माहौल बना दिया गया था कि बस!! बहू के घर में पहला कदम रखते ही अब अच्छे दिन आने वाले हैं. वास्तविकता में ऐसा नहीं होता. जिस प्रकार नई बहू को ससुराल की तमाम व्यवस्थाएँ समझने में समय लगता है, सभी पुराने जमे-जमाए सदस्यों के व्यवहार और मूड को भाँपने में समय लगता है, घाघ-कुटिल-शातिर किस्म के रिश्तेदारों की आंतरिक राजनीति समझने में वक्त लगता है, ठीक वैसा ही वक्त इस समय नरेंद्र मोदी सरकार के पास है.

सत्ता सूत्र संभालने के दो माह बाद मोदी सरकार ने अपना पहला बजट पेश किया. जैसा कि हम जानते हैं प्रत्येक वर्ष भारत के बजट निर्माण की प्रक्रिया सितम्बर-अक्टूबर से ही शुरू हो जाती है. चूँकि इस वर्ष लोकसभा चुनाव होने थे, इसलिए पूर्ण बजट पेश नहीं किया जा सका, सिर्फ लेखानुदान से काम चलाया गया. परन्तु सितम्बर २०१३ से मार्च २०१४ तक बजट की जो प्रक्रिया चली, जो सुझाव आए, यूपीए-२ सरकार (जिसे पता था कि अब वह सत्ता में वापस नहीं आ रही) के वित्तमंत्री चिदंबरम द्वारा रखे गए प्रस्तावों से मिलकर एक खुरदुरा सा बजट खाका तैयार था. नरेंद्र मोदी सरकार के पास सिर्फ दो माह का समय था, कि वे इस बजट को देश की वर्तमान अर्थव्यवस्था की चुनौतियों और संसाधनों तथा धन की कमी की सीमाओं को देखते हुए इस बजट को चमकीला और चिकनाबनाएँ... और यह काम मोदी-जेटली की जोड़ी ने बखूबी किया.


हालाँकि बजट पेश करने से पहले ही पिछले दो माह में मोदी सरकार ने कई महत्त्वपूर्ण निर्णय और ठोस कदम उठा लिए थे, जिनका ज़िक्र मैं आगे करूँगा, लेकिन बजट पेश होने और उसके प्रावधानों को देखने के बाद समूचे विपक्ष का चेहरा उतरा हुआ था. उन्हें सूझ ही नहीं रहा था कि आखिर विरोध किस बात पर, कहाँ और कैसे करें. जबकि उद्योग जगत, मझोले व्यापारी, सेना सहित लगभग सभी तबकों ने बजट की भूरि-भूरि प्रशंसा की, आलोचनाओं के कतिपय स्वर भी उठे, लेकिन इतने बड़े देश में यह तो स्वाभाविक है. इस प्रकार नरेंद्र मोदी ने अगले पाँच साल में देश को एक मजबूत ब्राण्ड इण्डिया बनाने की तरफ सफलतापूर्वक पहला कदम बढ़ा दिया. आईये देखें कि बजट से पहले और बजट के भीतर नरेंद्र मोदी सरकार ने कौन-कौन से जरूरी और त्वरित कदम उठा लिए हैं. ये सभी निर्णय आने वाले कुछ ही वर्षों में भारत के लिए एक गेम चेंजर साबित होने वाले हैं.

     नरेंद्र मोदी सरकार ने सबसे पहले अपना ध्यान सेनाओं की तरफ केंद्रित किया है. रक्षा मंत्रालय ने भारत-चीन की विवादित सीमाओं पर तत्काल प्रभाव से सड़कों के निर्माण हेतु मंजूरी दे दी है. इसी प्रकार कर्नाटक में कारवाड नौसेना बेस को अत्याधुनिक बनाने के लिए २०० करोड़ रूपए की तात्कालिक राशि उपलब्ध करवा दी है, ताकि नौसेना का यह बेस मुम्बई बंदरगाह पर आ रहे बोझ को थोड़ा कम कर सके. अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में एक नए उन्नत किस्म के राडार और दूरबीन की मंजूरी दे दी गई है. जहाँ से चीन, बांग्लादेश और इंडोनेशिया तक नज़र रखी जा सकती है. यह निर्णय बजट से पहले के हैं, जिनमें संसद की मंजूरी जरूरी नहीं, लेकिन बजट प्रावधान रखते ही नरेंद्र मोदी ने सेना की वर्षों से लंबित एक रैंक एक पेंशन की माँग को पूरा कर दिया. उल्लेखनीय है कि यह मुद्दा भाजपा के घोषणापत्र और जनरल वीके सिंह की इच्छाओं के अनुरूप है.

     मोदी सरकार हिन्दुत्व और विकास के मुद्दों पर सत्ता में आई है. जैसा कि ऊपर लिखा है, वर्तमान बजट की प्रक्रिया पिछली सरकार के दौर में ही आरम्भ हो चुकी थी और मोदी सरकार के पास सिर्फ दो माह का ही समय था, इसलिए देखा जाए तो देश के आर्थिक व सामाजिक विकास हेतु उनका पूरा खाका अगले बजट में और भी स्पष्ट होगा. परन्तु फिर भी दो महीने में ही नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से ताबड़तोड़ निर्णय लिए हैं वह उनकी निर्णय क्षमता और सोच को पूर्णतः प्रदर्शित करता है, उदाहरण के तौर पर नर्मदा बाँध की ऊँचाई 121 मीटर से बढ़ाकर 138 मीटर करने का निर्णय. यह मामला पिछले कई वर्ष से यूपीए सरकार की अनिर्णय नीति के कारण लटका हुआ था. मेधा पाटकर के नेतृत्व में चल रहे NGOs का दबाव तो था ही, साथ ही यूपीए सरकार के कारिंदे सोच रहे थे कि कहीं इस मुद्दे का फायदा नरेंद्र मोदी विधानसभा चुनावों में ना ले लें. मोदी सरकार ने आते ही गुजरात और मध्यप्रदेश हेतु पानी, सिंचाई और बिजली की समस्या को देखते हुए इसे तत्काल मंजूरी दे दी और उधर बाँध पर काम भी शुरू हो गया. अब जब तक सम्बन्धित पक्ष सुप्रीम कोर्ट, ट्रिब्यूनल वगैरह जाएँगे नर्मदा बाँध पर काफी तेजी से काम पूरा हो चुका होगा. मोदी सरकार का पूरा ध्यान बिजली, सिंचाई, सड़कों और स्वास्थ्य पर है... विकास के यही तो पैमाने होते हैं. जबकि यूपीए सरकार देश के विशाल मध्यमवर्ग को समझ ही नहीं पाई और मनरेगा के भ्रष्टाचार एवं आधार कार्ड जैसे अनुत्पादक कार्यों में अरबों रूपए लुटाती रही.


     यूपीए सरकार के कार्यकाल में ही CAG और FICCI की एक आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट आई थी, जिसमें बताया गया था कि NDA के पाँच साल में राष्ट्रीय राजमार्गों पर जितना काम हुआ, यूपीए के दो कार्यकालों में उससे आधी सड़कें भी नहीं बनीं थी. NDA, अन्य राज्यों की भाजपा सरकारों तथा गुजरात के अनुभवों को देखते हुए नरेंद्र मोदी ने अर्थव्यवस्था के मुख्य इंजन अर्थात सड़कों पर अधिक बल देने की कोशिश की है. इसीलिए बजट में राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए 37800 करोड़ रूपए रखे गए हैं, जो अगले चार वर्ष में और बढ़ेंगे. ज़ाहिर है कि पाँच साल में नरेंद्र मोदी देश में चौड़ी सड़कों का जाल और बिजली का उत्पादन बढ़ाने की फिराक में हैं. राजमार्गों की इस भारी-भरकम राशि के अलावा उन्होंने इन राजमार्गों के किनारे वाले गाँवों के बेरोजगार युवाओं हेतु दो सौ करोड़ अलग से रखे हैं, जो इन राजमार्गों पर पेड़-पौधे लगाने हेतु दिए जाएँगे और इन दो सौ करोड़ रूपए को मनरेगा से जोड़ दिया जाएगा, ताकि कोई उत्पादक कार्य शुरू हो. एक लाख किमी के राजमार्गों को हरा-भरा करने की इस प्रक्रिया में लगभग तीस लाख युवाओं को संक्षिप्त ही सही, लेकिन रोजगार मिलेगा. मनरेगा को उत्पादकता एवं कार्य लक्ष्य से जोड़ना बहुत जरूरी हो गया था, अन्यथा पिछले पाँच साल से यह अरबों-खरबों की राशि सिर गढ्ढे खोदने और पुनः उन्हें भरने में ही खर्च हो रहे थे. सरकार का यह कदम इसलिए बेहतरीन कहा जा सकता है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, पुल, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र निर्माण, वृक्षारोपण आदि कामों में मनरेगा के धन, ऊर्जा और मानव श्रम का उपयोग किया जाएगा, न कि सरपंचों और छुटभैये नेताओं का घर भरने में.

     तम्बाकू, सिगरेट, शराब पर टैक्स बढ़ाना या व्यक्तिगत आयकर की छूट बढ़ाना जैसे कदम तो प्रत्येक सरकार अपने बजट में देती ही है. बजट का असली उद्देश्य होता है जनता को, उद्योगों को एवं विदेशों को क्या सन्देश दिया जा रहा है. इस दिशा में जेटली-मोदी की जोड़ी ने बहुत ही दूरदर्शितापूर्ण बजट पेश किया है. राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए भारी धनराशि के साथ ही उत्तर-पूर्व में रेलवे विकास हेतु अभी प्रारंभिक तौर पर 1000 करोड़ रूपए रखे गए हैं, इसी प्रकार ऊर्जा के मामले में पूरे देश को गैस के संजाल से कवर करने हेतु 15,000 किमी गैस पाईपलाइन बिछाने की पब्लिक-प्रायवेट पार्टनरशिप योजना का पायलट प्रोजेक्ट आरम्भ कर दिया गया है. इसके अलावा तमिलनाडु और राजस्थान के तेज़ हवा वाले इलाकों में पवन एवं सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए पाँच सौ करोड़ रूपए रखे हैं. अपने शुरुआती वर्ष में नरेंद्र मोदी का पूरा ध्यान सिर्फ ढांचागत (इंफ्रास्ट्रक्चर) सुधार एवं विकास में लगने वाला है, क्योंकि इस दिशा में यूपीए-२ सरकार ने बहुत अधिक अनदेखी की है. चूँकि मोदी वाराणसी से चुन कर आए हैं तो उन्होंने इलाहाबाद से हल्दिया तक गंगा में बड़ी नौकाएं या छोटे जहाज चलाने की महत्त्वाकांक्षी जल मार्ग विकास परियोजना के सर्वेक्षण एवं आरंभिक क्रियान्वयन हेतु 4200 करोड़ रुपए आवंटित किये हैं.

अब मुड़ते हैं शिक्षा के क्षेत्र में, नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने बजट में शिक्षा क्षेत्र में बजट की मात्रा जो 3% से बढ़ाकर 6% की जाने की माँग थी, वह तो पूरी नहीं की, परन्तु कई आधारभूत और ठोस योजनाओं को हरी झंडी दिखा दी है. विभिन्न राज्यों में पाँच नए आईआईटी और पाँच नए आईआईएम, मध्यप्रदेश में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नाम पर एक सर्वसुविधायुक्त उद्यमिता  विकास केंद्र, चार नए एम्स (आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल, विदर्भ और पूर्वांचल क्षेत्र) हेतु ५०० करोड़ और छह नवनिर्मित एम्स को पूर्ण कार्यकारी बनाने हेतु धन दिया जा रहा है. आंध्रप्रदेश और राजस्थान में नए कृषि विश्वविद्यालय, हरियाणा और तेलंगाना में नई होर्टिकल्चर विश्वविद्यालयों की स्थापना हेतु 200 करोड़ मंजूर हुए हैं. इसी प्रकार मिट्टी के परीक्षण हेतु समूचे देश की राजधानियों में मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालाओं को उन्नत बनाने के लिए 156 करोड़ रूपए दिए जा रहे हैं. देश को स्वस्थ रखने के लिए डॉ हर्षवर्धन के साथ मिलकर नरेंद्र मोदी ने बजट से परे यह निर्णय लिया है कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप एवं ह्रदय रोग से सम्बन्धित अति-आवश्यक 156 दवाएं पूरे देश में सरकारी अस्पतालों से मुफ्त में दी जाएँगी. हालाँकि यह निर्णय लेने आसान नहीं था, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर की कई फार्मास्युटिकल कम्पनियाँ इसे लागू नहीं करने का दबाव बना रही थीं, क्योंकि ऐसा करने पर कई बड़ी कंपनियों के मुनाफे में भारी कमी आने वाली है, परन्तु मोदी सरकार ने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए गरीबी रेखा से नीचे वालों के लिए सरकारी अस्पतालों में एक्सरे, एमआरआई तथा सीटी स्कैन को मुफ्त बना दिया.

शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, इंफ्रास्ट्रक्चर, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर जेटली-मोदी ने जो ध्यान दिया है और आरंभिक योजनाएँ बनाई हैं, वे तो खैर अपनी जगह पर उत्तम हैं ही साथ ही मोदी द्वारा देश के भविष्य की चिंताओं और उनके दृष्टिकोण को प्रदर्शित करती ही हैं, परन्तु देश के इतिहास में पहली बार नरेंद्र मोदी ने जाना-समझा है कि यदि की देश आर्थिक व्यवस्था मजबूत करना तथा बेरोजगारी हटाते हुए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन से मुकाबला करना है तो देश के कुटीर एवं छोटे उद्योगों को मजबूत करना होगा. बजट भाषण के पैराग्राफ 102 में नरेंद्र मोदी के इस आईडिया को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है, लेकिन जब यह आईडिया अपना पूर्ण आकार ग्रहण करेगा, तब भारत में उद्यमिता एवं विनिर्माण का जो दौर चलेगा, वह निश्चित रूप से चीन को चिंता में डालने वाला बनेगा. लघु एवं कुटीर उद्योगों की इस विराट अर्थव्यवस्था पर जरा एक संक्षिप्त निगाह तो डालिए – आधिकारिक आंकड़े के अनुसार देश में लगभग ऐसी साढ़े पाँच करोड़ यूनिट्स कार्यरत हैं, कृषि क्षेत्र को छोड़कर. इन सभी का राजस्व जोड़ा जाए तो यह लगभग 6.28 लाख करोड़ बैठता है, जो कि अर्थव्यवस्था का लगभग 70% है और ग्रामीण क्षेत्रों में पन्द्रह से अठारह करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करती हैं. इन छोटी यूनिट्स में से दो-तिहाई सेवा और मेनुफैक्चरिंग क्षेत्र में हैं, और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत इन इकाईयों में अधिकांशतः अजा-अजजा-ओबीसी वर्ग ही मालिक हैं.

मोदी सरकार की इस नवीनतम तथा क्रान्तिकारी योजना में कहा गया है कि – लघु विनिर्माण संस्थाएँ और कम्पनियाँ देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं. आज की तारीख में छोटे असंगठित उद्योग देश के अधिकाँश औद्योगिक उत्पादन तथा रोजगार का जिम्मा संभाले हुए हैं, लेकिन सदैव सभी सरकारों द्वारा उपेक्षित ही रहे. इनमें से अधिकाँश उद्योग चार-छः-दस-बीस व्यक्तियों को रोजगार तथा देश को राजस्व मुहैया करवा रहे हैं और मजे की बात यह है कि जिसे अंग्रेजी में SME (Small and Micro Enterprises) कहा जाता है, इनमें से अधिकाँश यूनिट अजा-अजजा- एवं पिछड़ा वर्ग द्वारा संचालित हैं. एशिया-पैसिफिक इक्विटी रिसर्च द्वारा प्रकाशित जर्नल के अनुसार भारत में बड़े उद्योगों एवं कारपोरेट हाउस ने देश की अर्थव्यवस्था में जो योगदान दिया है वह इसके आकार को देखते हुए सिर्फ पूँछ बराबर है. रिसर्च के अनुसार विशाल उद्योगों एवं आईटी क्षेत्र की दिग्गज सेवा कंपनियों ने देश की सिर्फ 15% अर्थव्यवस्था को ही अपना योगदान दिया है. रोजगार एवं राजस्व में बाकी का 85% देश की लघु और कुटीर उद्योगों ने ही दिया है, इसके बावजूद लगभग सभी सरकारों ने टैक्स में भारी छूट, रियायती जमीनें और कर्ज माफी अक्सर बड़े उद्योगों को ही दिया. यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि विराट उद्योगों द्वारा देश की तमाम बैंकों को खरबों रूपए का चूना लगाया जा चुका है. बैंक वाले जिसे अपनी भाषा में NPA (Non Performing Asset) कहते हैं, उसका महत्त्वपूर्ण डूबत खाता बड़े उद्योगों के हिस्से में ही है. कई बड़े कारपोरेट हाउस कर्ज डुबाने और न चुकाने के लिए बदनाम हो चुके हैं. जबकि छोटे एवं कुटीर उद्योगों के साथ ऐसा नहीं है. देखा गया है कि लघु उद्योग का मालिक बड़े उद्योगों के मुकाबले, बैंक अथवा अन्य वित्तीय संस्थाओं का कर्ज उतार ही देता है. बीमा कागज़ जमानत रखकर अथवा जमीन-जायदाद गिरवी रखकर छोटे उद्योगों को दिया गया ऋण सामान्यतः वापस आ जाता है. संक्षेप में कहा जाए तो अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी लघु और कुटीर उद्योग ही हैं. जैसा कि ऊपर बताया, देश की अर्थव्यवस्था, राजस्व और रोजगार में 70% हिस्सा रखने वाला यह क्षेत्र हमेशा से असंगठित और उपेक्षित ही रहा है.  अब चीन से सबक लेकर एक सधे हुए गुजराती व्यापारी की तरह नरेंद्र मोदी ने इस क्षेत्र की संभावनाओं पर ध्यान देने का फैसला किया है. चीन ने अपने विनिर्माण क्षेत्र को इसी तरह बढ़ाया और मजबूत किया. नरेंद्र मोदी की योजना ऐसी ही लघु-कुटीर एवं ग्रामीण इकाईयों को सस्ते ऋण, जमीन एवं शासकीय परेशानियों व लाईसेंस से मुक्ति दिलाने की है, यदि अगले पाँच वर्ष में मोदी के इस विचार ने जड़ें पकड़ लीं, तो देखते ही देखते हम विनिर्माण क्षेत्र में चीन को टक्कर देने लगेंगे. इस बजट में यह प्रस्ताव रखा गया है कि ऐसे ग्रामीण-लघु-कुटीर उद्योगों का सर्वेक्षण करके उन्हें सभी सुविधाएँ प्रदान की जाएँगी. इसीलिए अनुसूचित जाति-जनजाति की शिक्षा एवं विकास के लिए इस बजट में 50,548 करोड़ रूपए का जबरदस्त प्रावधान किया गया है. कहने का तात्पर्य यह है कि नरेंद्र मोदी की टीम के पास अगले दस साल का पूरा रोड मैप तैयार है. ब्रांड इण्डिया बनने की तरफ मोदी सरकार का यह तो पहला ही कदम है, अगले दो वर्ष के बजट पेश होने के बाद इस देश की दशा और दिशा में आमूलचूल परिवर्तन आना निश्चित है.

जहाँ एक तरफ नरेंद्र मोदी का पूरा ध्यान सिर्फ विकास के मुद्दों पर है, वहीं दूसरी ओर जिस जमीनी कैडर और सोशल मीडिया के जिन रणबांकुरों की मदद से भाजपा को सत्ता मिली है, वे हिंदुत्व के मुद्दों को ठन्डे बस्ते में डालने की वजह से अन्दर ही अन्दर बेचैन और निराश हो रहे हैं. नरेंद्र मोदी की जिस हिन्दुत्ववादी छवि से मोहित होकर तथा यूपीए-२ तथा वामपंथियों एवं सेकुलरों के जिस विध्वंसकारी नीतियों एवं अकर्मण्यता से निराश होकर कई तटस्थ युवा मोदी से चमत्कार की आशाएं लगाए बैठे थे, वे भी दबे स्वरों में इस सरकार पर उंगलियाँ उठाने लगे हैं. इस कैडर को उम्मीद थी कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने पर तुरंत ही धारा ३७०, सामान नागरिक संहिता, गौवध पर प्रतिबन्ध, गौमांस निर्यात पर पूर्ण प्रतिबन्ध, राम जन्मभूमि मामले में त्वरित प्रगति जैसे मूल हिंदूवादी मुद्दों पर प्रगति या निर्णयों की शुरुआत होगी. परन्तु पिछले दो माह में नरेंद्र मोदी ने इन मुद्दों पर एकदम चुप्पी साध रखी है, साथ ही भाजपा और संघ ने भी उनका पूरा साथ दिया है. हालांकि यह स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती, परन्तु फिर भी जानकारों का मानना है कि पहले नरेंद्र मोदी दिल्ली सिंहासन के जटिल प्रशासनिक ढाँचे को अच्छे से समझना चाहते हैं और अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं. संभवतः यह स्थिति अगले दो वर्ष तक बरकरार रहे, उसके बाद शायद नरेंद्र मोदी गुजरात की तरह अपने पत्ते खोलें और अपना शिकंजा कसने की शुरुआत करें.

कांग्रेस और अन्य सभी कथित सेकुलर पार्टियाँ अभी भी हार के सदमे से बाहर नहीं आ पाई हैं, और उन्हें अभी भी यह विश्वास नहीं हो रहा कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन चुके हैं. इसीलिए खिसियाहट में वे भाजपा सरकार के प्रत्येक निर्णय, प्रत्येक नियुक्ति, प्रत्येक बयान पर पहले दिन से ही लगातार अंध-विरोध किए जा रहे हैं. जिस तेजी और सफाई से नरेंद्र मोदी अपनी गोटियाँ चल रहे हैं, वह हैरान करने वाला है. सरकार बनने के पहले ही दिन से इस गैंग”” ने स्मृति ईरानी मामले को लेकर अपनी छाती कूटना शुरू किया था, तभी से लगने लगा था कि मोदी के अगले पांच साल इतने आसान नहीं रहेंगे. ये बात और है कि नरेंद्र मोदी चुपचाप अपना काम करते रहे. जैसे कि, ICHR में सुदर्शन राव की नियुक्ति का मामला हो, चाहे दिल्ली विवि के मामले में UGC की बांह मरोड़ना हो, मोदी सरकार ने कुंठित विपक्ष की परवाह किए बिना, अपना मनचाहा काम किया. सुप्रीम कोर्ट में गोपाल सुब्रह्मण्यम की नियुक्ति को भी सफलतापूर्वक वीटो किया गया, इसी प्रकार पांच-छह राज्यों के कुर्सी-प्रेमी कांग्रेसी राज्यपालों को ना-नुकुर के बावजूद सफाई से निपटाया गया. हताश विपक्ष ने नृपेन्द्र मिश्र की नियुक्ति पर भी बवाल खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन यहाँ भी मोदी ने राज्यसभा में सपा-बसपा-एनसीपी को साथ लेकर उनके मंसूबे कामयाब नहीं होने दिए. ज़ाहिर है कि जिस तरह यूपीए-२ कार्यकाल में मुलायम-मायावती की नकेल सोनिया के हाथ में थी, उसी प्रकार शायद अब मोदी के हाथ में है. विश्लेषक मानते हैं कि आगामी कुछ माह में कई प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. यदि इन राज्यों में भाजपा को आशातीत सफलता मिल जाती है और उसके विधायकों की संख्या पर्याप्त रूप से इतनी बढ़ जाए कि अगले वर्ष के अंत तक भाजपा का राज्यसभा में भी बहुमत पूर्ण हो जाए, संभवतः उसके बाद ही नरेंद्र मोदी अपने हिंदुत्व के मुद्दों पर आएँगे.

हाल-फिलहाल सरकार नई है, मोदी को अभी यह भांपने में समय लगेगा कि प्रशासन में कौन उनका मित्र है और कौन शत्रु है. इसीलिए नरेंद्र मोदी जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहते. अभी इस सरकार को सिर्फ दो-तीन माह हुए हैं, फिर भी माहौल को भांपने हेतु समान नागरिक संहिता पर एक अशासकीय प्रस्ताव एक भाजपा सांसद की तरफ से संसद में पेश किया जा चुका है. लेकिन जिस तरह से मोदी सरकार ने मदरसों को आधुनिक बनाने के लिए सौ करोड़ रूपए का प्रावधान किया, जिस तरह से यूपी में लगातार भाजपा के जमीनी नेताओं की हत्याओं पर चुप्पी साधे रखी, अमरनाथ में लंगरों पर हमले के मामले में कश्मीर सरकार से कोई जवाब-तलब तक नहीं किया, गौमांस निर्यात रोकने हेतु एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया, इन सभी से हिंदूवादी लॉबी और कार्यकर्ता नाराज चल रहे हैं. चूंकि अभी मोदी नए-नए हैं, इसलिए यह कैडर उन्हें कुछ समय देना चाहता है, परन्तु मन ही मन आशंकित भी है कि, कहीं मोदी सरकार भी पूर्ववर्ती सरकारों की तरह फर्जी सेकुलरिज्म”” के जाल में न फँस जाए. जबकि नरेंद्र मोदी का पूरा ध्यान देश की अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक पकड़ बनाने पर है.

उधर प्रशासनिक सर्जरी की शुरुआत कर दी गई है.लुटेरे जीजा के होश ठिकाने लगाने वाले अशोक खेमका तथा चर्चित अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को प्रधानमंत्री कार्यालय में लाया जा रहा है. मंत्रालयों के सचिवों को सीधे प्रधानमंत्री से मिल सकने की सुविधा प्रदान कर दी गई है. मंत्रियों को अपने निजी स्टाफ में अपना कोई भी रिश्तेदार रखने की अनुमति नहीं है. बहुत से कार्यक्षम तथा ईमानदार आईएएस अधिकारी अपने-अपने राज्यों को छोड़कर केंद्र में प्रतिनियुक्ति हेतु लगातार आवेदन दे रहे हैं. उन्हें पता है कि नरेंद्र मोदी ही ऐसे नेता हैं जो उनका सम्मान बनाए रखते हुए भी अधिकारियों से उचित काम लेना जानते हैं. निश्चित है कि देश का भविष्य उज्जवल है, बस ये जरूर है कि अति-उत्साही और अति-महत्त्वाकांक्षी कार्यकर्ताओं को थोडा सब्र रखना होगा, नरेंद्र मोदी को थोडा समय देना होगा. क्योंकि पिछले दस वर्ष से जमा हुआ कूड़ा-करकट साफ़ करने में थोडा वक्त तो लगेगा ही... अगले दो-तीन वर्ष में जब मोदी अपनी पकड़ मजबूत कर लेंगे, राज्यसभा में बहुमत हासिल हो जाएगा, उस समय कश्मीर, धारा ३७०, राम मंदिर, समान नागरिक संहिता, गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध जैसे कई कदम निश्चित ही उठाए जाएँगे.

मोदी की कार्यशैली का एक संक्षिप्त उदाहरण - सरकार ने त्वरित निर्णय लेते हुए यह निश्चित किया है कि देश-विदेश में आयोजित होने वाली किसी भी विज्ञान गोष्ठी अथवा तकनीकी सेमीनार इत्यादि के दौरान सरकारी प्रतिनिधिमंडल में सिर्फ स्थापित वैज्ञानिक एवं तकनीकी लोग ही जाएंगे, कोई नेता या अफसर नहीं. इस निर्णय पर लगभग नए अंदाज में अमल करते हुए स्वयं नरेंद्र मोदी, ब्राजील में संपन्न BRICS सम्मेलन में अपने साथ सिर्फ विदेश विभाग के अधिकारियों तथा दूरदर्शन एवं PTI के संवाददाताओं को ही ले गए. किसी भी निजी चैनल अथवा अखबार के पत्रकार को सरकारी धन पर सैरसपाटे की इजाजत नहीं दी गई. सन्देश साफ़ है – मुफ्तखोरी नहीं चलेगी, काम करके दिखाना होगा. ब्राण्ड इण्डियाकी तरफ पहला कदम सफलतापूर्वक बढ़ाया जा चुका है... अब युवाओं को अपनी उद्यमिता दिखानी होगी.

-         सुरेश चिपलूनकर, उज्जैन


Sunday, May 25, 2014

Narendra Modi Magic :Mandal, Mandir and Marketing Combination

मोदी का मैजिक – भगवा क्रान्ति, जो सिर चढ़कर बोले...

सत्तर के दशक में भारतीय फिल्मों के दर्शक राजेश खन्ना के आँखें मटकाने वाले रोमांस, देव आनंद के झटके खाते संवादों से लगभग ऊब चले थे. उसी दौरान भारत में इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में जो काँग्रेस सरकार चल रही थी, उसके कारनामों से भी आम जनता बेहद परेशान, त्रस्त, बदहाल और हताश हो चुकी थी. ठीक उसी समय रुपहले परदे पर अमिताभ बच्चन नामक एंग्री-यंगमैन का प्रादुर्भाव हुआ जो युवा वर्ग के गुस्से, निराशा और आक्रोश का प्रतीक बना. थाने में रखी कुर्सी को अपनी बपौती समझने वाले शेर खान के सामने ही गरजकर उस कुर्सी को लात मारकर गिराने वाले इस महानायक का भारत की जनता ने जैसा स्वागत किया, वह आज तक न सिर्फ अभूतपूर्व है, बल्कि आज भी जारी है. जी हाँ, आप बिलकुल सही समझे... सभी पाठकों के समक्ष अमिताभ बच्चन का यह उदाहरण रखने का तात्पर्य लोकसभा चुनाव 2014 के हालात और नरेंद्र मोदी की जीत से तुलना करना ही है.


विगत दस वर्ष में यूपीए-१ एवं यूपीए-२ के कार्यकाल में देश का बेरोजगार युवा, व्यापारी वर्ग, ईमानदार नौकरशाह, मजदूर तथा किसान जिस तीव्रता से निराशा और उदासीनता के गर्त में जा रहे थे, उसकी मिसाल विगत शताब्दी के राजनैतिक इतिहास में मिलना मुश्किल है. लूट, भ्रष्टाचार, कुशासन, मंत्रियों की अनुशासनहीनता, काँग्रेस की मनमानी इत्यादि बातों ने इस देश के भीतर गुस्से की एक अनाम, अबूझ लहर पैदा कर दी थी. फिर इस परिदृश्य पर आगमन हुआ गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्रभाई दामोदरदास मोदी का... और इस व्यक्ति ने अपने ओजस्वी भाषणों, अपनी योजनाओं, अपने सपनों, अपने नारों, अपनी मुद्राओं से जनमानस में जो लहर पैदा की, उसकी तुलना अमिताभ बच्चन के प्रति निराश-हताश युवाओं दीवानगी से की जा सकती है. काँग्रेस से बुरी तरह क्रोधित और निराश भारत की जनता ने नरेंद्र मोदी में उसी अमिताभ बच्चन की छवि देखी और नरेंद्र मोदी ने भी इस गुस्से को भाँपने में कतई गलती नहीं की.

भारत के इतिहास में इस आम चुनाव से पहले कोई चुनाव ऐसा नहीं था, जिसके परिणामों को लेकर जनमानस में इतनी अधिक उत्सुकता रही हो. क्योंकि इन चुनावों में जहाँ एक तरफ काँग्रेसी कुशासन एवं यूपीए घटक दलों की महालूट के खिलाफ खड़ा युवा एवं मध्यमवर्ग था... वहीं दूसरी तरफ पिछले दस वर्ष में मनरेगा, खाद्य सुरक्षा, शिक्षा का अधिकार जैसे कानूनों द्वारा अल्प लाभान्वित लेकिन अधिकाँशतः बरगलाया हुआ निम्न वर्ग था. परिणामों वाले दिन अर्थात 16 मई की सुबह से ही वातावरण में सनसनी थी. चौराहों-गाँवों-शॉपिंग मॉल्स-चाय की दुकानों पर चहुँओर सिर्फ इसी बात की उत्सुकता थी कि भाजपा को कितनी सीटें मिलती हैं? काँग्रेस की विदाई का विश्वास तो सभी को था, परन्तु साथ ही मन में एक आशंका भी थी कि कहीं देश पुनः 1996-1998 वाली खिचड़ी और भानुमती के कुनबे जैसी तीसरा मोर्चा सरकारों के युग में न जा धँसे. कहीं नरेंद्र मोदी को 272 से कम सीटें मिलीं तो क्या वे खुले हाथ से काम कर सकेंगे या जयललिता-माया और ममता वाजपेयी सरकार की तरह ही नरेंद्र मोदी को ब्लैकमेल करने में कामयाब हो जाएँगी? तमाम आशंकाएँ, कुशंकाएँ, भय निर्मूल सिद्ध हुए और NDA को 334 सीटें मिलीं जिसमें भाजपा को अकेले ही 284 सीटें मिल गईं.


16 मई 2014 की सुबह नौ बजे के आसपास टीवी स्क्रीन पर जो पहला चुनाव परिणाम झलका, वह था कि पश्चिमी उप्र की बागपत सीट से चौधरी अजित सिंह को मुम्बई के पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह ने पराजित कर दिया है. जाट बहुल बेल्ट में, एक पूर्व प्रधानमंत्री के बेटे और केन्द्रीय मंत्री अजित सिंह अपने-आप में एक बड़ी हस्ती हैं. नौकरी छोड़कर राजनीति में कदम रख रहे मुम्बई पुलिस कमिश्नर, जिन्हें चुनावी छक्के-पंजे मालूम नहीं, पहली बार चुनाव लड़ रहे हों, अजित सिंह की परम्परागत सीट पर चुनौती दे रहे हों... इसके बावजूद वे जीत जाएँ, यह टीवी देख रहे राजनैतिक पंडितों और विश्लेषकों के लिए बेहद चौंकाने वाला था. उसी समय लग गया था, कि यूपी में कुछ ऐतिहासिक होने जा रहा है.

और वैसा ही हुआ... दोपहर के तीन बजते-बजते यूपी के चुनाव परिणामों ने दिल्ली में काँग्रेस और गाँधी परिवार को झकझोरना आरम्भ कर दिया. भाजपा की बम्पर 71 सीटें, जबकि मुलायम सिंह सिर्फ अपने परिवार की पाँच सीटें तथा सोनिया-राहुल अपनी-अपनी सीटें बचाने में ही कामयाब रहे. सबसे अधिक भूकम्पकारी परिणाम रहा बहुजन समाज पार्टी का. जाति से बुरी तरह ग्रस्त यूपी में मायावती की बसपा अपना खाता भी न खोल सके, यह बात पचाने में बहुत लोगों को काफी समय लगा. इसी प्रकार जैसे-जैसे यूपी के परिणाम आते गए यह स्पष्ट होता गया, कि इस बार यूपी में एक भी मुस्लिम प्रतिनिधि चुनकर नहीं आने वाला. हालांकि भाजपा के कट्टर से कट्टर समर्थक ने भी यूपी में 71 सीटों का अनुमान या आकलन नहीं किया था. लेकिन यह जादू हुआ और नमो के इस जादू की झलक पूर्वांचल तथा बिहार की उन सीटों पर भी दिखाई दी, जो बनारस के आसपास थीं.



आखिर यूपी-बिहार में ऐसी कौन सी लहर चली कि 120 सीटों में से NDA को 100 से अधिक सीटें मिल गईं. बड़े-बड़े दिग्गज धूल चाटते नज़र आए. न ही जाति चली और ना ही सेकुलर धर्म चला, न कोई चालबाजी चली और ना ही EVM मशीनों की हेराफेरी या बूथ लूटना काम आया. यह नमो लहर थी या नमो सुनामी थी? गहराई से विश्लेषण करने पर दिखाई देता है कि जहाँ एक तरफ मुज़फ्फरनगर के दंगों में सपा की विफलता, मीडिया तथा काँग्रेस द्वारा जानबूझकर हिन्दू-मुस्लिम के बीच खाई पैदा करने की कोशिश, भाजपा के विधायकों पर मुक़दमे तथा बसपा और सपा के विधायकों को वरदहस्त प्रदान करने से पश्चिमी उप्र में जमकर ध्रुवीकरण हुआ. संगठन में जान फूंकने में माहिर तथा कुशल रणनीतिकार अमित शाह की उपस्थिति ने इसमें घी डाला, तथा बनारस सीट से नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी ने यूपी में जमकर ध्रुवीकरण कर दिया. रही-सही कसर बोटी काटने वाले इमरान मसूद, बेनीप्रसाद वर्मा, नरेश अग्रवाल, राशिद अल्वी जैसे कई नेताओं ने खुलेआम नरेंद्र मोदी के खिलाफ अपशब्द कहे, जिस तरह उनकी खिल्ली उड़ाई... उससे महँगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त हो चुकी जनता और भी नाराज हो गई. जनता ने देखा-सोचा और समझा कि आखिर अकेले नरेंद्र मोदी के खिलाफ पिछले बारह साल से केन्द्र सरकार तथा अन्य सभी पार्टियों के नेता किस कारण आलोचना से भरे हुए हैं. कसाई, रावण, मौत का सौदागर, भस्मासुर जैसी निम्न श्रेणी की उपमाओं के साथ-साथ मोदी को गुजरात से बाहर जानता कौन है?, भारत की जनता कभी साम्प्रदायिक व्यक्ति को स्वीकार नहीं करेगी, अडानी-अंबानी का आदमी है, अगर ये आदमी किसी तरह 200 सीटें ले भी आया, तो सुषमा-राजनाथ इसे कभी प्रधानमंत्री बनने नहीं देंगे, दूसरे दलों का समर्थन कहाँ से लाएगा? जैसी ऊलजलूल बयानबाजियां तो जारी थी हीं, लेकिन इससे भी पहले नरेंद्र मोदी के पीछे लगातार कभी CBI , कभी इशरत जहाँ, कभी सोहराबुद्दीन मुठभेड़, कभी बाबू बजरंगी- माया कोडनानी, अशोक भट्ट, डीडी वंजारा, बाबूभाई बोखीरिया, महिला जासूसी कांड जैसे अनगिनत झूठे मामले लगातार चलाए गए… मीडिया तो शुरू से काँग्रेस के शिकंजे में था ही. इनके अलावा ढेर सारे NGOs की गैंग, जिनमें तीस्ता जावेद सीतलवाड़, शबनम हाशमी सहित तहलका के आशीष खेतान और तरुण तेजपाल जैसे लोग शामिल थे.. सबके सब दिन-रात चौबीस घंटे नरेंद्र मोदी के पीछे पड़े रहे, जनता चुपचाप सब देख रही थी. लेकिन नरेंद्र मोदी जिस मिट्टी के बने हैं और जैसी राजनीति वे करते आए हैं, उनका कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं पाया, और यही काँग्रेस की ईर्ष्या और जलन की सबसे बड़ी वजह भी रही.

दूसरी तरफ यूपी-बिहार की अपनी तमाम जनसभाओं में नरेंद्र मोदी ने अक्सर विकास को लेकर बातें कीं. बिजली कितने घंटे आती है? गाँव में सड़क कब से नहीं बनी है? ग्रामीण युवा रोजगार तलाशने के लिए मुम्बई, पंजाब और गुजरात क्यों जाते हैं? जैसी कई बातों से नरेंद्र मोदी ने जातिवाद से ग्रस्त इस राज्य की ग्रामीण और शहरी जनता के साथ तादात्म्य स्थापित कर लिया. इसी कारण मोदी की तूफानी सभाओं के बाद सपा-बसपा-काँग्रेस-जदयू के प्रत्याशियों को अपने इलाके में इस बात की सफाई देना मुश्किल हो रहा था, कि आखिर पिछले बीस-पच्चीस साल के शासन और उससे पहले काँग्रेस के शासन के बावजूद गन्ना उत्पादक, चूड़ी कारीगर, पीतल कारीगर, बनारस के जुलाहे सभी आर्थिक रूप से विपन्न और परेशान क्यों हैं? बचा-खुचा काम दिल्ली-गुजरात-मप्र से गए भाजपा कार्यकर्ताओं ने पूरा कर दिया, गाँव-गाँव घूम-घूमकर उन्होंने लोगों के मन में यह सवाल गहरे रोप दिया कि जब गुजरात में चौबीस घंटे बिजली आती है तो यूपी-बिहार में क्यों नहीं आती? आखिर इस राज्य में क्या कमी है? धीरे-धीरे लगातार दो-तीन माह के सघन प्रचार अभियान, तगड़ी मार्केटिंग और अमित शाह, संघ-विहिप कार्यकर्ताओं तथा सोशल मीडिया के हवाई हमलों के कारण यूपी-बिहार की जनता को समझ में आ गया कि देश को एक मजबूर और कमज़ोर नहीं बल्कि मजबूत और निर्णायक प्रधानमंत्री चाहिए. हालांकि ऐसा भी नहीं कि नरेंद्र मोदी ने काँग्रेस और विपक्षी दलों की चालबाजी का समुचित जवाब नहीं दिया हो. शठे शाठ्यं समाचरेत की नीति अपनाते हुए मोदी ने भी फैजाबाद की आमसभा में मंच के पीछे प्रस्तावित राम मंदिर का फोटो लगाकर उन्होंने कईयों की नींद हराम की. जबकि अमेठी-रायबरेली में बैठकर मीडियाई हवाई हमले करने वाली प्रियंका गाँधी ने जैसे ही नीच राजनीति शब्द का उच्चारण किया, नरेंद्र मोदी ने तत्काल इस शब्द को पकड़ लिया और नीच शब्द को लेकर जैसे शाब्दिक हमले किए, खुद को नीच जाति का प्रोजेक्ट करते हुए चुनाव के अंतिम दौर में यूपी में सहानुभूति बटोरी वह काँग्रेसी शैली में मुंहतोड़ जवाब देने का अदभुत उदाहरण था. असम और पश्चिम बंगाल में अवैध बांग्लादेशियों का मुद्दा जोरशोर से उठाकर उन्होंने तरुण गोगोई और ममता बनर्जी को ख़ासा परेशान किया. इस मुहिम का फायदा भी उन्हें मिला और असम में भाजपा को ऐतिहासिक जीत मिली. जबकि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी समझ गईं कि अगले विधानसभा चुनावों में वाम दलों की बजाय भाजपा भी उसकी प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बनने जा रही है, और इसीलिए ममता ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ लगातार अपने मुँह का मोर्चा खोले रखा. हालांकि इसके बावजूद वे आसनसोल से बाबुल सुप्रियो को जीतने से रोक न सकीं.


तमिलनाडु, सीमान्ध्र, तेलंगाना, उड़ीसा, अरुणाचल एवं कश्मीर-लद्दाख जैसे नए-नए क्षेत्रों में भाजपा को पैर पसारने में नरेंद्र मोदी के तूफानी दौरों ने काफी मदद की. मात्र दस माह में लाईव और 3-D की मिलाकर 3800 से अधिक रैलियाँ करते हुए नरेंद्र मोदी ने समूचे भारत को मथ डाला. असाधारण ऊर्जा और परिश्रम का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने नौजवानों को मात दी और एक तरह से अकेले ही भाजपा का पूरा चुनावी अभियान कारपोरेट स्टाईल में चलाया. नतीजा भाजपा का अब तक का सर्वोच्च बिंदु, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक प्रचारक पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ दिल्ली के तख़्त पर काबिज हुआ. पहले स्वयंसेवक अटल जी थे, लेकिन उन्हें ममता-माया-जयललिता-नायडू ने इतना ब्लैकमेल किया, इतना दबाया कि उनके घुटने खराब हो गए थे. परन्तु इस बार इनकी दाल नहीं गलने पाई. नरेंद्र मोदी जिस कार्यशैली के लिए जाने-माने जाते हैं, वह आखिरकार उन्हें दिल्ली में भी जनता ने सौंप दी है.

यूपी-बिहार के बाद भाजपा को सबसे बड़ी सफलता हाथ लगी महाराष्ट्र में. यहाँ भी नरेंद्र मोदी की रणनीति काम आई, उन्होंने चुनाव से पहले ही भाँप लिया था कि दलित वोटों का नुक्सान कम से कम करने के लिए आरपीआई के रामदास आठवले से गठबंधन फायदे का सौदा रहेगा. इसी प्रकार राज ठाकरे से ‘दो हाथ की दूरी’ बनाए रखना भी लाभकारी ही सिद्ध हुआ, क्योंकि यूपी-बिहार में राज ठाकरे के खिलाफ गुस्से की एक लहर मौजूद है. इसके अलावा महाराष्ट्र की जनता कांग्रेस-राकांपा के पंद्रह साल के कुशासन, बांधों में मूतने की बात करने वाले उनके घमंडी मंत्रियों से बेहद परेशान थी. नतीजा, कांग्रेस सिर्फ चार सांसदों पर सिमट गई, जो कि आपातकाल के बाद हुए चुनावों से भी कम है. यह नरेंद्र मोदी की सुनामी नहीं तो और क्या है, कि जिस राज्य में शकर लॉबी की सहकारी संस्थाओं और शकर मिलों के जरिये कांग्रेस ने वोटों का महीन जाल बुन रखा है उसी राज्य में ऐसी दुर्गति कि जनता ने कांग्रेस की अर्थी उठाने के लिए सिर्फ चार सांसद भेजे? और वो भी तब जबकि विधानसभा के चुनाव सर पर आन खड़े हैं. नरेंद्र मोदी ने विदर्भ-मराठवाड़ा और मुम्बई क्षेत्र में स्थानीय समस्याओं को सही तरीके से भुनाया.

गुजरात की २६ में से २६ सीटें मिलना अधिक आश्चर्यजनक नहीं था, लेकिन राजस्थान की २५ में से २५ सीटें जरूर कई विश्लेषकों को हैरान कर गईं. जाट-ठाकुर-मीणा जैसे जातिगत समीकरणों तथा जसवंत सिंह जैसे कद्दावर नेता द्वारा सार्वजनिक रूप से ख़म ठोकने के कारण खुद भाजपा के नेता भी बीस सीटों का ही अनुमान लगा रहे थे. जबकि उधर मध्यप्रदेश में सिर्फ सिंधिया और कमलनाथ ही अपनी इज्जत बचाने में कामयाब हो सके.

तमाम चुनाव विश्लेषकों ने इस आम चुनाव से पहले सोशल मीडिया की ताकत को बहुत अंडर-एस्टीमेट किया था. अधिकाँश विश्लेषकों का मानना था कि सोशल मीडिया सिर्फ शहरी और पढ़े=लिखे मतदाताओं को आंशिक रूप से प्रभावित कर सकता है. उनका आकलन था कि सोशल मीडिया, लोकसभा की अधिक से अधिक सौ सीटों पर कुछ असर डाल सकता है. जबकि नरेंद्र मोदी ने आज से तीन वर्ष पहले ही समझ लिया था कि मुख्यधारा के मीडिया द्वारा फैलाए जा रहे दुष्प्रचार एवं संघ-द्वेष से निपटने में सोशल मीडिया बेहद कारगर सिद्ध हो सकता है. जिस समय कई पार्टियों के नेता ठीक से जागे भी नहीं थे, उसी समय अर्थात आज से दो वर्ष पहले ही नरेंद्र मोदी ने अपनी सोशल मीडिया टीम को चुस्त-दुरुस्त कर लिया था. कई बैठकें हो चुकी थीं, रणनीति और प्लान ले-आऊट तैयार किया जा चूका था. ऐसी ही एक बैठक में नरेंद्र मोदी ने इस लेखक को भी आमंत्रित किया था. जहाँ IIT और IIM से पास-आऊट युवाओं की टीम के साथ, ठेठ ग्रामीण इलाकों में मोबाईल के सहारे कार्य करने वाले कम पढ़े-लिखे कार्यकर्ता भी मौजूद थे. नरेंद्र मोदी ने प्रत्येक कार्यकर्ता के विचार ध्यान से सुने. जिस बैठक में मैं मौजूद था, वह तीन घंटे चली थी. उस पूरी बैठक के दौरान नरेंद्र मोदी जी ने प्रत्येक बिंदु पर विचार किया, विस्तार से चर्चा की और अन्य सभी प्रमुख कार्य सचिवों पर छोड़ दिए. जिस समय अन्य मुख्यमंत्री गरीबों-मजदूरों को बेवकूफ बनाकर अथवा झूठे वादे या मुफ्त के लैपटॉप-मंगलसूत्र बाँटने की राजनीति पर मंथन कर रहे थे, उससे काफी पहले ही नरेंद्र मोदी ने ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्स एप्प, हैंग-आऊट, स्काईप को न सिर्फ आत्मसात कर लिया था, बल्कि ई-कार्यकर्ताओं की एक ऐसी सेवाभावी सशक्त फ़ौज खड़ी कर चुके थे जो नरेंद्र मोदी के खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी, बल्कि तमाम बुद्धिजीवियों को ताबड़तोड़ और त्वरित गति से तथ्यों के साथ जवाब देने में सक्षम भी थी. ऐसे ही हजारों सोशल मीडिया कार्यकर्ताओं ने दिन-रात मेहनत करके नरेंद्र मोदी की काफी मदद की. हालांकि सोशल मीडिया ने वास्तविक रूप से कांग्रेस को कितनी सीटों का नुक्सान पहुँचाया, यह पता लगाना अथवा इसका अध्ययन करना लगभग असंभव ही है, परन्तु जानकार इस बात पर सहमत हैं कि इस माध्यम का उपयोग सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी ने ही प्रभावशाली रूप से किया. कहने का तात्पर्य यह है कि चाहे 3D  हो या फेसबुक.. आधुनिक तकनीक के सही इस्तेमाल और युवाओं से सटीक तादात्म्य स्थापित करने तथा समय से पहले ही उचित कदम उठाने और विरोधियों की चालें भांपने में माहिर नरेंद्र मोदी की जीत सिर्फ वक्त की बात थी. मजे की बात ऐसी कि यह पूरी मुहीम अकेले नरेंद्र मोदी के दिमाग की देन थी, आरएसएस तो अभी भी अपनी परम्परागत जमीनी तकनीक और “मैन-टू-मैन मार्किंग” पर ही निर्भर था.

विगत दस वर्ष में भारत की राजनीति एवं समाज पर 3M अर्थात “मार्क्स-मुल्ला-मिशनरी” का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा था. नक्सलियों के लगातार बढ़ते जा रहे लाल गलियारे हों, सिमी और इन्डियन मुजाहिदीन के स्लीपर सेल हों अथवा स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या सहित ईसाई धर्मांतरण के बढ़ते मामले हों... इन तीनों “M” ने भारत को काफी नुक्सान पहुँचाया है इसमें कोई शक नहीं है. 3M के इस घातक विदेशी कॉम्बिनेशन का मुकाबला संघ-भाजपा ने अपनी स्टाईल के 3M से किया, अर्थात “मंदिर-मंडल-मार्केटिंग”. संक्षेप में कहा जाए तो इसका अर्थ है पहला M = मंदिर अर्थात संघ के परम्परागत कैडर और भाजपा के स्थायी वोटरों को हिंदुत्व और राम मंदिर के नाम पर गोलबंद किया... फिर उसमें मिलाया दूसरा M= मंडल, अर्थात नरेंद्र मोदी की पिछड़ी जाति को प्रोजेक्ट किया और अंतिम दो दौर में तो सीधे नीच जाति का हूँकहकर मायावती-मुलायम के वोट बैंक पर चोट कर दी... और सबसे महत्त्वपूर्ण रहा तीसरा M= मार्केटिंग. नरेंद्र मोदी को हिंदुत्व-मंडल और विकास के मार्केट मॉडल की पन्नी में लपेटकर ऐसा शानदार तरीके से पेश किया गया, कि लुटी-पिटी जनता ने थोक में भाजपा को वोट दिए. जनता माफ नहीं करेगी, अबकी बार, अच्छे दिन आने वाले हैं, चाय पर चर्चा जैसे सामान्य व्यक्ति के दिल को छूने वाले स्लोगन एवं जनसंपर्क अभियानों के जरिये नरेंद्र मोदी की छवि को लार्जर देन लाईफ बनाया गया. बहरहाल, यह सब करना जरूरी था, वर्ना विदेशी 3M (मार्क्स-मुल्ला-मिशनरी) का घातक मिश्रण अगले पाँच वर्ष में भारत के हिंदुओं को अँधेरे की गर्त में धकेलने का पूरा प्लान बना चुका था.

कुल मिलाकर कहा जाए तो लोकसभा का यह चुनाव जहाँ एक तरफ काँग्रेसी कुशासन, भ्रष्टाचार, निकम्मेपन और घमण्ड के खिलाफ जनमत था, परन्तु ये भी सच है कि नरेंद्र मोदी की यह विजय भाजपा-संघ के कार्यकर्ताओं, अमित शाह की योजनाओं एवं संगठन, भारतीय कारपोरेट जगत द्वारा उपलब्ध करवाए गए संसाधनों, नारों-भाषणों-आक्रामक मुद्राओं के बिना संभव नहीं थी. यह संघ-मोदी की शिल्पकारी में बुनी गई एक खामोश क्रान्ति थी, जिसमें 18 से 30 वर्ष के करोड़ों मतदाताओं ने अपना योगदान दिया. जिस पुरोधा को देश की जनता ने अपना बहुमत दिया, वह बिना रुके, बिना थके शपथ लेने से पहले ही काम पर लग गया. देश ने पहली बार एक चुने हुए प्रधानमंत्री को गंगा आरती करते देखा, वर्ना अभी तक तो मजारों पर चादर चढाते हुए ही देखा था. देश ने पहली बार किसी नेता को लोकतंत्र के मंदिर अर्थात संसद की सीढ़ियों पर मत्था टेकते भी देखा. नरेंद्र मोदी ने 19 मई को ही गृह सचिव से मुलाक़ात कर ली, तथा 21 मई को कैबिनेट सचिव के माध्यम से सभी प्रमुख मंत्रालयों के सचिवों को निर्देश प्राप्त हो गए हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले सप्ताह में ही उनके द्वारा पिछले पाँच वर्ष में किए गए कार्यों, उनके सुझाव, कमियों एवं योजनाओं के बारे में पावर पाईंट प्रेजेंटेशन देखेंगे. सुस्त पड़ी नौकरशाही में मोदी के इस कदम के कारण जोश भी है और घबराहट भी. देखना यही है कि उनके द्वारा जनता से माँगे गए 60 महीने में वे उम्मीदों के इस महाबोझ पर कितना खरे उतर पाते हैं? यूपीए-१ और २ की सरकारों ने बहुत कचरा फैलाया है, कई समस्याओं को जन्म दिया और कुछ पुरानी समस्याओं को उलझाया-पकाया है. इसे समझने में ही नरेंद्र मोदी का शुरुआती समय काफी सारा निकल ही जाएगा. अलबत्ता उनके समक्ष उपस्थित प्रमुख चुनौतियाँ महँगाई, भ्रष्टाचार पर नकेल, बेरोजगारी, आंतरिक सुरक्षा और षडयंत्रकारियों इत्यादि से निपटना है.

1967 में तमिलनाडु में बुरी तरह हारने के बाद काँग्रेस आज तक वहाँ कभी उबर नहीं सकी है, बल्कि आज तो उसे वहाँ चुनाव लड़ने के लिए सहयोगी खोजने पड़ते हैं. उड़ीसा में नवीन पटनायक भी काँग्रेस का लगभग समूल नाश कर चुके हैं. यूपी-बिहार में पिछले बीस वर्ष में काँग्रेस लगभग नदारद ही रहती है. पश्चिम बंगाल में वामपंथियों की खाली की गई जगह पर ममता ने कब्ज़ा किया है वहाँ भी काँग्रेस कहीं नहीं है. तेलंगाना-सीमान्ध्र में काँग्रेस को दोनों हाथों में लड्डू रखने की चाहत भारी पड़ी है, फिलहाल अगले पाँच वर्ष तो काँग्रेस वहाँ भी साफ ही है. भाजपा शासित राज्यों जैसे गुजरात-मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में काँग्रेस का संगठन चरमरा चुका है और ये तीनों राज्य भी लगभग काँग्रेस-मुक्तहो चुके हैं. अर्थात नरेंद्र मोदी द्वारा आव्हान किए गए काँग्रेस-मुक्त भारत की दिशा में भारत की लगभग 250 सीटों ने तो मजबूती से कदम बढ़ा दिया है. अब यदि नरेंद्र मोदी अगले पाँच वर्ष में केन्द्र की सत्ता के दौरान कोई चमत्कार कर जाते हैं, कोई उल्लेखनीय कार्य कर दिखाते हैं, तो उन्हें अगला मौका भी मिल सकता है और यदि ऐसा हुआ तो निश्चित जानिये 2024 आते-आते काँग्रेस के बुरे दिन और डरावनी रातें शुरू हो जाएँगी.

सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतने दबावों, इतनी अपेक्षाओं, भयानक उम्मीदों, आसमान छूती आशाओं के बीच नरेंद्र मोदी भारत की तकदीर बदलने के लिए क्या-कितना और कैसा कर पाते हैं यह ऐसा यक्ष-प्रश्न है जिसके जवाब का करोड़ों लोग दम साधे इंतज़ार कर रहे हैं...