Sunday, May 29, 2016

A Further Step for Congress Free India




मोदी सरकार के दो वर्ष – "कांग्रेस मुक्त भारत" की तरफ एक और कदम...


कहते हैं कि “मुसीबत कभी अकेले नहीं आती, साथ में दो-चार संकट और लेकर आती है”. वर्तमान में कांग्रेस के साथ शायद यही हो रहा है. नेशनल हेराल्ड घोटाले का मामला न्यायालय में है और इटली के अगस्ता हेलीकॉप्टरों संबंधी घूस का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव सिर पर आ धमके. कांग्रेस के राहुल बाबा अभी छुट्टियों के मूड में आने ही वाले थे कि भीषण गर्मी में उन्हें पसीना बहाने के लिए मैदान में उतरना पड़ा. दिल्ली और बिहार के चुनाव नतीजों से उत्साहित कांग्रेस ने सोचा कि अभी ये मौका बढ़िया है, जिसके द्वारा देश में यह हवा फैलाई जा अलावा कांग्रेस की मदद के लिए जेएनयू का “जमूरा” कन्हैया और उसकी वामपंथी बैंड पार्टी देश में नकारात्मक माहौल बनाने में जुटी हुई ही थी. लेकिन जब उन्नीस मई को चुनाव परिणाम घोषित हुए तो उन राज्यों की जनता ने अपना फैसला सुना दिया था कि नरेंद्र मोदी के “कांग्रेस-मुक्त” भारत को उनका समर्थन एक कदम और आगे बढ़ चूका है. कांग्रेस को केरल और असम जैसे राज्यों में सत्ता से बेदखल होना पड़ा, जबकि तमिलनाडु एवं बंगाल में अगले बीस वर्ष में दूर-दूर तक सत्ता में आने के कोई संकेत नहीं मिले. सांत्वना पुरस्कार के रूप में पुदुच्चेरी विधानसभा में कांग्रेस-द्रमुक गठबंधन को पूर्ण बहुमत हासिल हो गया. कांग्रेस को इस सदमे की हालत में, सबसे तगड़ा वज्राघात लगा असम के नतीजों से. पिछले पंद्रह वर्ष से असम में गोगोई सरकार कायम थी, इसलिए कांग्रेस इस मुगालते में थी कि वहां चाहे जितनी भी बुरी स्थिति हो, वह चुनाव-पश्चात बदरुद्दीन अजमल जैसे घोर साम्प्रदायिक व्यक्ति की पार्टी से गठबंधन करके येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल कर ही लेगी. लेकिन हाय री किस्मत... आसाम की जनता ने भाजपा को पूर्ण बहुमत देकर कांग्रेस के ज़ख्मों पर नमक मल दिया. 

आईये जरा राज्यवार विश्लेषण करें कि आखिर भारत लगभग कांग्रेस-मुक्त भारत की तरफ कैसे और क्यों बढ़ रहा है... 

केरल :- 
विधानसभा चुनावों से ठीक पहले सोलर घोटाले और सेक्स स्कैंडल में फंसे मुख्यमंत्री तथा अन्य मंत्रियों का भविष्य तो पहले से ही स्पष्ट दिखाई देने लगा था, परन्तु कांग्रेस ने सोचा कि चुनावों से ठीक पहले नेता बदलना पार्टी की एकता के लिए ठीक नहीं है. कांग्रेस की यह सोच उसके लिए बिलकुल उलट सिद्ध हुई. केरल की पढी-लिखी जनता, जो कि हर पांच साल में सत्ताधारी को बदल देती है, उसने ओमान चांदी को सत्ता से बेदखल करने का मूड बना लिया था. रही-सही कसर 93 वर्षीय “नौजवान” वीएस अच्युतानंदन ने धुआंधार प्रचार करके पूरी कर दी. इसके अलावा कांग्रेस का कुछ प्रतिशत सवर्ण हिन्दू वोट भी भाजपा ले उड़ी. कांग्रेस के कई नेता दबी ज़बान में यह स्वीकार करते हैं कि केरल में कांग्रेस के एक बड़े वोट बैंक में भाजपा ने जबरदस्त सेंध लगाई है. वाम मोर्चा को जहां एक तरफ समर्पित और हिंसक कैडर का लाभ मिला, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के भ्रष्टाचार और स्कैंडलों का भी फायदा हुआ. 

केरल चुनावों में कोई सबसे अधिक फायदे में रहा, तो वह है भाजपा. जिस राज्य में आज तक भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली थी, 2016 के इन चुनावों में वह बैरियर भी टूट गया और ओ. राजगोपाल के रूप में भाजपा के पहले विधायक ने वहां पार्टी का खाता खोल ही दिया. लगातार कई चुनाव हारने के बाद भी राजगोपाल ने हिम्मत नही हारी और अंततः वामपंथ की हिंसक गतिविधियों तथा RSS के दर्जनों स्वयंसेवकों की हत्याओं का खून रंग लाया और पार्टी ने अपना वोट प्रतिशत 4% से बढ़ाकर 14% कर लिया. हालांकि चुनाव परिणामों के बाद चैनलों को इंटरव्यू देते समय चांडी तथा पिनारेई विजयन ने भले ही यह दावा किया हो कि उन्होंने राज्य में भाजपा को एकदम किनारे कर दिया है, लेकिन वास्तविकता में आंकड़े कुछ और ही कहते हैं. चांडी और विजयन के खोखले दावों के विपरीत आंकड़े यह बताते हैं कि केरल में 14.4% वोट प्रतिशत के साथ प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में भाजपा और इसके सहयोगी तीसरे क्रमांक पर रहे हैं. 2011 के विधानसभा चुनावों के मुकाबले लगभग पचास विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा ने अपना वोट शेयर कहीं-कहीं दोगुना-तिगुना-चौगुना तक कर लिया है. पलक्कड इलाके की मलमपुझा विधानसभा सीट जिसे संभावित मुख्यमंत्री अच्युतानंदन ने जीता, वहां पर भाजपा उम्मीदवार सी.कृष्णकुमार को 46157 वोट मिले और वह दुसरे स्थान पर रहे, जबकि 2011 के चुनावों में यहाँ भाजपा उम्मीदवार को 2000 वोट ही मिले थे. त्रिवेंद्रम सीट पर भाजपा के उम्मीदवार क्रिकेटर श्रीसंत को 37764 वोट मिले और वे तीसरे स्थान पर रहे जबकि इस सीट पर हार-जीत का अंतर सिर्फ एक हजार वोट का रहा. कोल्लम जिले की चथान्नूर सीट पर भाजपा उम्मीदवार 33199 वोट लेकर वामपंथी उम्मीदवार से हारे और दुसरे नंबर पर रहे, यहाँ भी कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही. 2011 में इस सीट पर भाजपाई उम्मीदवार को सिर्फ 3824 वोट मिले थे, यानी सीधे दस गुना बढ़ोतरी. 


ये तो सिर्फ दो-चार ही उदाहरण हैं, केरल की लगभग प्रत्येक सीट पर ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जहाँ संघ के स्वयंसेवकों ने पिछले दस वर्ष में कड़ी मेहनत करके, और हिंसक वामपंथी कैडर द्वारा की गई हत्याओं के बावजूद हार नहीं मानी तथा कहीं दुसरे स्थान पर तो वोट संख्या में भारी बढ़ोतरी करते हुए कहीं तीसरे स्थान पर भी रहे. नरेंद्र मोदी की लगातार सक्रियता, नारायण गुरु जैसे आध्यात्मिक व्यक्ति के आशीर्वाद और उनकी वजह से एक समुदाय के थोक में मिले वोटों तथा कांग्रेस-मुस्लिम लीग की सरकार के भ्रष्टाचार एवं हिन्दू विरोधी नीतियों के कारण केरल की जनता को होने वाली परेशानी के कारण अंततः केरल में भाजपा का खाता खुल ही गया और एक सीट पर विजय मिली. 

विश्लेषको की मानें तो नरेंद्र मोदी के “सोमालिया” वाले बयान को भाजपा विरोधी मीडिया ने जिस तरह बढ़ाचढ़ाकर पेश किया तथा केरल की सुशिक्षित जनता ने इसे हाथोंहाथ लिया तथा इसे लेकर चुनाव के अंतिम चरण में “पो मोने मोदी” (मोदी दूर जाओ), जैसे छिटक गए. यदि यह अप्रिय विवाद नहीं हुआ होता तो भाजपा के वोट प्रतिशत में एकाध प्रतिशत की और बढ़ोतरी होती, तथा जिन सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार बहुत कम वोटों से हारे हैं, वहां शायद जीत मिल सकती थी और संभव है कि भाजपा दो-तीन सीटें और जीत जाती. बहरहाल, केरल में भाजपा की जमीन तैयार हो चुकी है, अब इंतज़ार इस बात का है कि पिछले तीस-चालीस वर्ष से जारी UDF-LDF की राजनैतिक लड़ाई में भाजपा उस स्थिति में पहुँचेगी, जहां वह दस-बारह सीटें जीतकर “किंगमेकर” की भूमिका में आ जाए... और वह दिन अब दूर नहीं. कांग्रेस की चिंताओं की असल वजह यही है कि भाजपा उसका वोट प्रतिशत खा रही है. 

तमिलनाडु :- 

पिछले पचास वर्ष में तमिल अस्मिता, द्रविड़ आन्दोलन तथा “मतदाताओं को मुफ्त में बांटो” वाली नीतियों के कारण आज भी तमिलनाडु में भाजपा-कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के लिए कोई स्थान नहीं है. इसीलिए वहां से यदि कोई आश्चर्यजनक समाचार प्राप्त हुआ तो यही हुआ कि चुनाव पूर्व सारे सर्वे को अंगूठा दिखाते हुए “अम्मा” यानी जयललिता ने क्योंकि उसने चुनाव पूर्व ही द्रमुक से गठबंधन कर लिया था. कांग्रेस का द्रमुक प्रेम कोई नई बात नहीं है. यूपीए सरकार के दौरान भी 2G का महाघोटाला रचने वाले ए.राजा, कनिमोझी तथा दयानिधि मारण जैसे सुपर-भ्रष्टों का जमकर बचाव करती हुई कांग्रेस लोगों को आज भी याद है. चूंकि तमिलनाडु में हर पांच वर्ष में सत्ता की अदला-बदली वाला “ट्रेंड” चलता रहा है, इसलिए कांग्रेस ने सोचा कि मौका अच्छा है. साथ ही जयललिता पर चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों में उन्हें जेल होने, जमानत पर छूटने जैसी बातों को लेकर भी कांग्रेस खासी उत्साहित थी, परन्तु तमिलनाडु की जनता कांग्रेस-द्रमुक को कोई मौका देने की इच्छुक नहीं दिखी. एमजी रामचंद्रन के बाद तीस वर्ष के अंतराल से यह पहली बार हुआ कि कोई पार्टी सत्ता में वापस आई हो. 

आखिर यह जादू कैसे हुआ? असल में तमिलनाडु की जनता ने “कौन कम भ्रष्टाचारी” है, इसमें चुनाव किया. जैसा कि मैंने ऊपर कहा कि द्रमुक भी भ्रष्ट है और जयललिता तो बाकायदा जेल होकर आई हैं. परन्तु तमिलनाडु की जनता के मन में आज भी जयललिता की छवि “सताई हुई महिला” की है, इसलिए उसने “कम भ्रष्ट” को चुन लिया. इसके अलावा जयललिता द्वारा “मुफ्तखोरी” को प्रवृत्ति को बढ़ावा देने की नीतियाँ भी आम गरीब जनता में खासी लोकप्रिय रहीं (दिल्ली के पिछले चुनावों में हम इसका उदाहरण देख चुके हैं). पिछले पांच वर्ष में जयललिता सरकार द्वारा “अम्मा इडली”, “अम्मा डिस्पेंसरी”, जैसी विभिन्न योजनाएं चलाई गईं, जिसमें सरकारी खजाने से गरीबों को लगभग मुफ्त इडली, मुफ्त दवाओं, सस्ते कपड़ों आदि के कारण भले ही सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ता रहा हो, लेकिन गरीब वर्ग जयललिता से दूर नहीं गया. आज की स्थिति यह है कि इस चुनाव में जयललिता ने मिक्सर, स्कूटी और लैपटॉप बांटने का भी वादा किया है और जनता को भरोसा है कि “अम्मा” अपना वादा निभाएगी. अब तमाम अर्थशास्त्री भले अपना माथा कूटते रहें, लेकिन वस्तुस्थिति यही है कि तमिलनाडु के कई गरीब घरों में भोजन नहीं बनता. जब बीस रूपए में एक व्यक्ति आराम से सरकारी भोजन पर अपना पेट भर रहा हो, तो वहां घर पर खाना बनाने की जरूरत क्या है? जिस तरह दिल्ली के चुनावों में भाजपा इस “मुफ्त बांटो” वाले खेल में पिछड़ गयी थी, उसी प्रकार द्रमुक-कांग्रेस भी जयललिता के इन “मुफ्तखोरी वादों” के खेल में पिछड़ गए और सत्ता में वापस नहीं आ सके.  

ऐसा भी नहीं है कि तमिलनाडु की जनता इस खेल को पसंद कर ही रही हो. अम्मा और करूणानिधि के परिवारवाद एवं दोनों के भ्रष्टाचार से जनता बेहद त्रस्त है, परन्तु उनके पास कोई विकल्प ही नहीं है. कांग्रेस लगभग मृतप्राय है और भाजपा के पास वहां कोई स्थानीय नेता ही नहीं है, कैडर भी नहीं है. परन्तु तमिलनाडु की जनता में असंतोष है, यह इस बात से सिद्ध होता है कि इस बार तमिलनाडु में NOTA (इनमें से कोई नहीं) के बटन दबाने वालों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है. लगभग पच्चीस विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां हार-जीत के अंतर के मुकाबले NOTA को मिले वोटों की संख्या ज्यादा रही. इनमें से 16 विधानसभा सीटों पर जयललिता की पार्टी जीती. अर्थात यदि कोई तीसरा मजबूत ईमानदार राजनैतिक विकल्प होता, तो निश्चित ही कम से कम दस-बीस सीटें तो ले ही जाता. उदाहरण के लिए तिरुनेलवेली में AIDMK के उम्मीदवाद नागेन्द्रन सिर्फ 800 वोटों से जीते, जबकि NOTA को 2218 वोट मिले. इसी प्रकार एक क्षेत्रीय पार्टी तमिलगम के नेता कृष्णासामी सिर्फ 87 वोटों से हारे, जहां NOTA वोटों की संख्या 2612 रही. कहने का तात्पर्य यह है कि तमिलनाडु में “तीसरे विकल्प” के लिए उर्वर जमीन तैयार है. वहां की कुछ प्रतिशत जनता इन दोनों द्रविड़ पार्टियों, उनके भ्रष्टाचार तथा मुफ्तखोर तरीकों से नाराज है... जरूरत सिर्फ इस बात की है कि वहां भाजपा अपना कैडर बढ़ाए, ईमानदार प्रयास करे और इन दोनों पार्टियों के अलावा बची हुई पार्टियों से गठबंधन करे. हालांकि यह इतना आसान भी नहीं है, क्योंकि भारत में ““मुफ्त और सस्ता”” का आकर्षण इतना ज्यादा होता है, कि दिल्ली जैसे राज्य भी इसकी चपेट में आ जाते हैं तो तमिलनाडु की क्या बिसात? 

अब आते हैं पश्चिम बंगाल पर...

वामपंथियों को “उन्हीं की हिंसक भाषा” में जवाब देने के लिए सदैव तत्पर तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने पिछले पाँच वर्ष में गाँव-गाँव में उसी पद्धति का कैडर बनाकर ममता दीदी के लिए यह सुनिश्चित कर दिया था कि बंगाल की जनता उन्हें एक बार पुनः चुने. सारदा घोटाला और अन्य दूसरे चिटफंड कंपनियों की लूट से बंगाल की गरीब जनता बुरी तरह त्रस्त थी, लेकिन ममता ने अपनी राजनैतिक परिपक्वता से जनता के इस क्रोध को तुरंत भाँप लिया और गरीबों की लुटी हुई रकम वापस करने के लिए 500 करोड़ का जो फंड स्थापित किया, उसने इन दोनों घोटालों की आँच से तृणमूल काँग्रेस को बचा लिया. इस राज्य में भी भाजपा की स्थिति केरल जैसी ही है, जहाँ वह कहीं भी रेस में नहीं थी. भाजपा को सिर्फ अपनी इज्जत बचानी थी और वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी करनी थी. ये दोनों ही काम भाजपा ने बखूबी किए. रूपा गांगुली, सिद्धार्थनाथ सिंह और बाबुल सुप्रियो में इतनी ताकत कभी नहीं थी कि वे बंगाल में भाजपा को सम्मानजनक स्थान दिला पाएं, लेकिन इन्होंने लगातार कड़ी मेहनत से भाजपा के वोट प्रतिशत में इजाफा जरूर किया. वैसे भी जिस राज्य में वामपंथ ने तीस साल शासन किया हो, तथा जिस राज्य के सत्रह जिलों में मुस्लिम आबादी तीस प्रतिशत से ऊपर पहुँच चुकी हो, वहाँ भाजपा के उभरते की संभावनाएँ दिनों क्षीण ही होती जाएँगी. तृणमूल के हिंसक कैडर, बांग्लादेशी घुसपैठियों से मुकाबला करने की अक्षमता तथा जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के अभाव ने भाजपा के लिए इस राज्य में करने के लिए कुछ खास छोड़ा ही नहीं था. सबसे अधिक आश्चर्यजनक और दयनीय स्थिति काँग्रेस की रही, जिसकी हालत यह हो गई कि उसे बंगाल में वामपंथी पार्टियों के साथ गठबंधन करना पड़ा. वैचारिक मखौल और विरोधाभास देखिए कि सोनिया गाँधी की पार्टी केरल में इन्हीं वामपंथियों के खिलाफ चुनाव लड़ रही थी. बहरहाल, पूरी तरह से मुस्लिम वोटों के एकतरफा ध्रुवीकरण तथा तृणमूल के कार्यकर्ताओं की जबरदस्त फील्डिंग के कारण काँग्रेस और वामपंथ दोनों मिलकर भी ममता दीदी को रोक नहीं सके और जयललिता की तरह ही ममता बनर्जी भी लगातार दूसरी बार बंगाल की क्वीन बनीं. भाजपा के लिए इस राज्य में खोने को कुछ था नहीं, इसलिए उसने सिर्फ पाया ही पाया. वामपंथ की जमीन और खिसकी तथा काँग्रेस को यह सबक मिला कि बंगाल में उठने के लिए अभी उसे कम से कम दस वर्ष और चाहिए.  



असम में भाजपा को “सर्व-आनंद” मिला... 

देश की सेकुलर बिरादरी और विभिन्न मोदी विरोधी गुटों को सबसे तगड़ा मानसिक सदमा लगा असम के चुनाव परिणामों से. जिस तरह से नरेंद्र मोदी सहित पूरी पार्टी और संगठन ने असम में अपनी पूरी ताकत झोंक रखी थी, वह इसीलिए थी कि पिछले पन्द्रह वर्ष के गोगोई कुशासन, भ्रष्टाचार और खासकर बांग्लादेशी घुसपैठ ने असम की जनता को बुरी तरह परेशान कर रखा था. RSS ने पिछले बीस वर्ष में इस राज्य में कड़ी जमीनी मेहनत की थी और बोडो उग्रवादियों तथा मुस्लिम कट्टरपंथियों के हाथों अपने कई स्वयंसेवक भी खोए, परन्तु हार नहीं मानी. इसी तरह आदिवासी समुदाय से आने वाले सर्बानंद सोनोवाल को पहले ही मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके भाजपा ने अपना तुरुप का पत्ता खेल दिया था. सोनोवाल की साफ़ छवि, मोहक मुस्कराहट तथा जमीनी मुद्दों पर उनकी पकड़ के कारण भाजपा की यह चाल काँग्रेस को चित करने के लिए पर्याप्त थी. इस रणनीति में काँग्रेस के ताबूत में अंतिम कील ठोकने वाले एक और प्रमुख व्यक्ति रहे हिमंता बिस्वा सरमा, जो एक समय पर तरुण गोगोई के खासमखास हुआ करते थे. परन्तु काँग्रेस पार्टी में अपनी भीषण उपेक्षा और समुचित सम्मान नहीं मिलने के कारण हिमंता ने भाजपा की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया और भाजपा ने भी इसे लपकने में देर नहीं की. हिमंता ने काँग्रेस की तमाम रणनीतियों को पहले ही भाँप लिया और समयानुकूल छिन्न-भिन्न भी कर दिया. भाजपा ने असम के चुनावों में बांग्लादेशी घुसपैठ तथा “असमिया अस्मिता” को प्रमुख मुद्दा बनाया और सीधे काँग्रेस को निशाना बनाने की बजाय AIUDF के बदरुद्दीन अजमल को निशाना बनाया. इसका फायदा भाजपा को इस तरह मिला कि वोटों के ध्रुवीकरण की संभावना से काँग्रेस डर गई और उसने अंतिम मौके पर बदरुद्दीन अजमल की पार्टी से गठबंधन नहीं किया. इसका खामियाज़ा काँग्रेस और अजमल दोनों को भुगतना पड़ा. जहाँ एक तरफ काँग्रेस ऊपरी असम में सिर्फ एक सीट (गोगोई) ही जीत पाई वहीं 2006 में धमाकेदार एंट्री मारने वाले बदरुद्दीन अजमल की पार्टी घटकर सिर्फ तेरह सीटों पर सिमट गई, और वे खुद ही चुनाव हार गए...

असम में भाजपा को दो-तिहाई बहुमत मिल जाएगा, यह तो वास्तव में किसी ने भी नहीं सोचा था. हालाँकि असम में भाजपा के लिए जमीन पिछले चुनावों में ही तैयार हो चुकी थी, परन्तु सिर्फ कार्यकर्ता या माहौल होने से चुनाव नहीं जीता जा सकता. चुनाव जीतने के लिए विपक्षी की रणनीति समझना और एक करिश्माई नेता की जरूरत होती है. असम में भाजपा के लिए यह कमी पूरी की AGP से आए सर्बानान्द सोनोवाल ने और काँग्रेस से भाजपा में आए हिमंता सरमा ने. असम में हिन्दू आबादी घटते-घटते 68% तक पहुँच चुकी है, जबकि काँग्रेस की मेहरबानियों से बांग्लादेशी घुसपैठियों और बदरुद्दीन अजमल जैसों के कारण मुस्लिम आबादी 32% तक पहुँच चुकी है. इस बार असम में असली राजनीति 68 बनाम 32 की ही थी, जिसे भाजपा ने बखूबी भुनाया. इसके अलावा काँग्रेस के भीतर उठता असंतोष, गोगोई परिवार का एकाधिकारवाद एवं दिल्ली में बैठे काँग्रेसी नेतृत्त्व द्वारा गोगोई पर अंधविश्वास करते हुए पार्टी की दूसरी पंक्ति को बिलकुल नज़रंदाज़ कर दिया जाना भी एक प्रमुख कारण रहा. असम में भाजपा ने अपना वोट प्रतिशत 12% से बढ़ाकर सीधे तीन गुना यानी 36% कर लिया, और सीटें सीधा दो-तिहाई. 


चुनाव परिणामों को देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि जहाँ काँग्रेस सिकुड़ती जा रही है, भाजपा उन्हीं क्षेत्रों में अपने पैर पसारती जा रही है. भाजपा का वोट प्रतिशत भले ही अभी सीटों में नहीं बदल रहा है, लेकिन आने वाले कुछ ही वर्षों में जब यह वोट प्रतिशत बीस-बाईस प्रतिशत से ऊपर निकल जाएगा, तो सबसे पहले केरल जैसे राज्य में भाजपा “किंगमेकर” की भूमिका में आ जाएगी. तमिलनाडु में फिलहाल दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों के लिए कोई स्थान नहीं है. तमिलनाडु में जीके मूपनार ने काँग्रेस को जहाँ छोड़ा था, आज काँग्रेस उससे भी नीचे चली गई है, ना तो मणिशंकर अय्यर उसे बचा सकते हैं और ना ही राहुल गाँधी. जब भी राहुल गाँधी का विषय आता है, कई वरिष्ठ काँग्रेसी भी दबी ज़बान से यह स्वीकार करते हैं कि राहुल गाँधी में ना तो चुनाव जीतने का करिश्मा है और ना ही उनमें राजनैतिक इच्छाशक्ति दिखाई देती है. ऐसा प्रतीत होता है मानो अनिच्छुक होते हुए भी उन्हें जबरदस्ती काँग्रेस उपाध्यक्ष पद पर बैठाए रखा गया है. कई कांग्रेसियों को अब अपने भविष्य की चिंता सताने लगी है, इसीलिए जैसे रीता बहुगुणा समाजवादी पार्टी में चली गईं अथवा दिग्विजय सिंह सरेआम “पार्टी में सर्जरी” की बातें कहने लगे हैं अथवा जब सलमान खुर्शीद कहते हैं कि मोदी पर आक्रमण को लेकर काँग्रेस को गहन आत्मचिंतन करना चाहिए, तो इन सभी का मतलब एक ही होता है कि अब काँग्रेस पार्टी गंभीर अवस्था में पहुँच चुकी है. 

इन सभी पुराने कांग्रेसियों की चिंता वाजिब भी है. राहुल गाँधी के उपाध्यक्ष बनने के बाद से पार्टी लोकसभा चुनाव समेत ग्यारह चुनाव हार चुकी है. असम और केरल की सत्ता हाथ से निकल जाने के बाद तो यह स्थिति बनी है कि देश की मात्र 7.3% जनता पर ही काँग्रेस का शासन है, जबकि 43.1% देश की जनता पर भाजपा का अकेले शासन है. बचा हुआ पचास प्रतिशत राजद, जदयू, जयललिता, ममता, बीजद, वामपंथी जैसे क्षेत्रीय दलों का है, जो अपने-अपने इलाके में काँग्रेस से बहुत मजबूत हैं. अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में कर्नाटक, उत्तराखंड और हिमाचल में काँग्रेस रहेगी या जाएगी, कहा नहीं जा सकता. 


आखिर काँग्रेस की लगातार यह दुर्गति क्यों होती जा रही है? कारण है मोदी सरकार द्वारा निरंतर शुरू की जारी नई-नई योजनाएँ और उनका सफल क्रियान्वयन. देश की जनता भले ही आज महँगाई से त्रस्त हो, परन्तु उन्होंने काँग्रेस का जो भीषण और नंगा भ्रष्टाचार देखा था, उसके मुकाबले पिछले दो वर्ष में मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं लगा है. मोदी सरकार के कुछ मंत्री तो बेहद उम्दा कार्य कर रहे हैं, चाहे बिजली और कोयला क्षेत्र में पीयूष गोयल हों, सड़क परिवहन और नए राजमार्ग बनाने के मामले में नितिन गड़करी हों, रक्षा मंत्रालय जैसे अकूत धन सम्पदा वाले मंत्रालय को संभालने वाले ईमानदार मनोहर पर्रीकर हों या रेलवे मंत्रालय में नित-नवीन प्रयोग करते हुए जनता के लिए सुविधाएँ जुटाने वाले सुरेश प्रभू हो... अथवा विदेश में फँसे किसी भारतीय के एक ट्वीट पर पूरे दूतावास को दौड़ाने वाली सुषमा स्वराज हों... सभी के सभी बेहतरीन कार्य कर रहे हैं. इन सबके ऊपर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जिन्होंने पिछले दो वर्ष में प्रशासन में भ्रष्टाचार के कई छेद बन्द किए हैं, तथा नवीन तकनीक अपनाते हुए राशन कार्ड, गैस, केरोसीन की कालाबाजारी करने वाले तथा बोगस (नकली) उपभोक्ताओं की पहचान की है. सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद कोयला ब्लॉक आवंटन की नई नीति ने तो कमाल ही कर दिया है, तथा उच्च स्तर पर होने वाले भीषण भ्रष्टाचार को काफी हद तक कम किया है. 

यूँ तो दो वर्ष में मोदी सरकार की कई उपलब्धियाँ रही हैं, परन्तु यहाँ हम संक्षेप में कुछ बिंदुओं को देखते हैं, जिनके कारण मोदी सरकार की लोकप्रियता बढ़ी और काँग्रेस की घटी. मोदी सरकार की सबसे सफल योजना “जन-धन योजना” कही जा सकती है, जिसमें पन्द्रह करोड़ बैंक खाते खुलवाए गए. इन खातों में दस करोड़ खाते ऐसे हैं जिन्हें रू-पे डेबिट कार्ड भी दिया गया है, जिसमें जीवन बीमा भी शामिल है. गैस सब्सिडी, मनरेगा का पैसा इत्यादि अब सीधे बैंक खाते में जाता है, जिसके कारण निचले स्तर पर भ्रष्टाचार में भारी कमी आई है. इसके अलावा दवाओं के दामों पर नियंत्रण के लिए जो क़ानून लाया गया और सभी जीवनरक्षक एवं अति-आवश्यक दवाओं के दामों में भारी कमी हुई, उसके कारण जनता में एक अच्छा सन्देश गया है. फ्रांस सरकार से 36 राफेल विमानों की खरीदी में त्वरित निर्णय एवं पिछली सरकार के मुकाबले इन विमानों के दामों में कमी करवाना हो, या फिर “मेक इन इण्डिया” और मुद्रा बैंक कार्यक्रम के तहत छोटे-मझोले उद्योगों को प्राथमिकता देने तथा पचास हजार से दस लाख रूपए के ऋण सरलता से देने जैसी नीतियाँ हों, इन सभी कार्यक्रमों को समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों ने हाथोंहाथ लिया है. 

देश की जनता यह भी देख रही है कि किस तरह काँग्रेस और विपक्षी दल मोदी सरकार को GST बिल पास नहीं करने दे रहे, किस तरह विभिन्न मुद्दों पर संसद ठप रखे रहते हैं... किस तरह कन्हैया-उमर खालिद जैसे देशद्रोहियों को समर्थन देकर देश में अशांति का माहौल पैदा कर रहे हैं... जातिवादी राजनीति का ज़हर युवाओं के दिमाग में घोल रहे हैं... जनता अब इन सब हथकंडों से ऊब चुकी है, परन्तु काँग्रेस इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं है. इसीलिए जब राहुल गाँधी अचानक रात को JNU पहुँच जाते हैं, अथवा जबरिया दलित घोषित किए गए रोहित वेमुला की लाश पर आँसू बहाते नज़र आते हैं या फिर मल्लिकार्जुन खड़गे खामख्वाह किसी बात पर संसद ठप्प करने की कोशिश करते हैं तो जनता मन में ठानती जाती है कि अब काँग्रेस को वोट नहीं देना है. नतीजा वही हो रहा है, जो इन विधानसभा चुनावों में हमें देखने को मिल रहा है... जनता अब क्षेत्रीय दलों को काँग्रेस से बेहतर समझने लगी है, जो कि देश और खासकर काँग्रेस के लिए अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता... देखना तो यही है कि काँग्रेस खुद में “बदलाव” कब लाती है? या फिर लाती भी है कि नहीं?? कहीं ऐसा ना हो कि अगले वर्ष हिमाचल, उत्तराखण्ड या कर्नाटक में से एकाध-दो राज्य भी उसके हाथ से खिसक जाएँ और 125 साल पुरानी काँग्रेस एक “क्षेत्रीय दल” बनकर रह जाए... देखा जाए तो यह स्थिति भाजपा के लिए भी ठीक नहीं है, लेकिन क्या किया जा सकता है, “होईहे वही, जो राम रचि राखा”... क्योंकि नेशनल हेरल्ड और अगस्ता मामले में अब राम ही बचाएँ तो बचाएँ...

Friday, April 29, 2016

Posting Rapist Bishop in India



वेटिकन द्वारा रेपिस्ट पादरी की भारत में नियुक्ति 


पिछले कुछ वर्षों में चर्च के पादरियों द्वारा बाल यौन शोषण की घटनाएँ पश्चिम में अत्यधिक मात्रा में बढ़ गई हैं. समूचा वेटिकन प्रशासन एवं स्वयं पोप पादरियों की इस “मानसिक समस्या” से बहुत त्रस्त हैं. पोप फ्रांसिस और इससे पहले वाले पोप ने भी मीडिया के सामने खुद स्वीकार किया है कि पादरियों में बाल यौन शोषण की “बीमारी” एक महामारी बन चुकी है. पश्चिमी देशों में मुक्त यौन व्यवहार एवं खुले समाज के कारण इस प्रकार की घटनाएँ जल्द ही सामने भी आ जाती हैं, इसीलिए सन 2001 से 2014 के बीच वेटिकन ने अपने पादरियों के गुनाह छिपाने के लिए न्यायालय से बाहर “सहमति से समझौते” के तहत लाखों डॉलर मुआवजे के रूप में बाँटे हैं. 

दूसरी तरफ भारत एक सांस्कृतिक समाज है, जहाँ यौन स्वच्छंदता कतई आम बात नहीं है. यहाँ पर लड़कियाँ अक्सर पीछे रहती हैं, और जब मामला यौन शोषण अथवा बलात्कार का हो, तो उस लड़की पर समाज और परिवार का इतना जबरदस्त दबाव होता है कि वह खुलकर अपने अत्याचारी के खिलाफ सामने आ ही नहीं पाती. एक सर्वे के अनुसार बलात्कार एवं यौन शोषण के 92% मामले वहीं दबा दिए जाते हैं, जबकि बचे हुए 8% में भी सजा होने का प्रतिशत बहुत कम है, क्योंकि जागरूकता की कमी है. भारत के ऐसे माहौल में वेटिकन के उच्चाधिकारी एक बलात्कारी पादरी को भारत में नियुक्त कर रहे हैं. 


जी हाँ, चौंकिए नहीं... रेव्हरेंड जोसफ जेयापौल नामक पादरी की नियुक्ति जल्द ही भारत के किसी चर्च में की जाने वाली है. रेवरेंड जेयापौल 2011 तक अमेरिका के मिनेसोटा प्रांत में डायोसीज ऑफ क्रुक्सटन में पादरी था, जहाँ इसने मीगन पीटरसन नाम की चौदह वर्षीय लड़की के साथ लगातार एक वर्ष तक बलात्कार और यौन शोषण किया. कोर्ट में खुद पीटरसन के लिखित बयान के अनुसार, “मैं फादर जेयापौल से सबसे पहली बार 2004 में मिली, जब उनका ट्रांसफर कनाडा की सीमा पर स्थित मिनेसोटा प्रांत के एक गाँव ग्रीनबुश में ब्लेस्ड सेक्रामेन्टो चर्च में हुआ. मैं बचपन से ही बहुत ही धार्मिक लड़की थी, और रोज़ाना चर्च जाती थी. मेरा सपना था कि मैं नन बनूँ. पहली ही भेंट में फादर जेयापौल ने मुझे धार्मिक किताबें देने के बहाने अपने निजी कमरे में बुलाया. मैं छोटी थी, इसलिए उसकी नीयत नहीं भाँप सकी. लेकिन उसने मुझे बहला-फुसलाकर मुझे “पापी” होने का अहसास दिलाया और पापों से मुक्त करने के बदले उसने लगातार एक वर्ष तक उस चर्च में यौन शोषण किया. मुझे जान से मारने और पीटने की धमकी देकर उसने मुझे बहुत डरा दिया था, इसलिए मैं किसी के सामने मुँह खोलने से घबराती थी. लेकिन जब यह सिलसिला लगातार चलता रहा और मैं थोड़ी बड़ी हुई, तब मुझमे हिम्मत जागी और मैंने अपने परिवार वालों को इसके बारे में बताया”. 


जब पीटरसन के परिवार वालों ने वेटिकन में शिकायत की तो पहले अधिकारियों द्वारा लीपापोती की कोशिशें की गईं, लेकिन जब परिवार ने सीधे पोप फ्रांसिस से संपर्क किया तब जाकर काफी टालमटोल के बाद 2010 में रेवरेंड जोसफ जेयापौल को चर्च से निलंबित (सिर्फ निलंबित) किया गया. पीटरसन के परिजनों ने वेटिकन पर मुकदमा दायर कर दिया और 2011 में पादरी की सजा कम करने के समझौते के तहत कोर्ट के बाहर आपसी सहमति से सात लाख पचास हजार डॉलर का मुआवज़ा वसूल किया. सजा सुनते ही यह पादरी भारत भाग निकला, लेकिन 2012 में इंटरपोल ने इसे पकड़कर पुनः अमेरिकी पुलिस के हवाले कर दिया. दो वर्ष की जेल काटने के बाद रेवरेंड जोसफ रिहा हो गया और वेटिकन ने इसे पुनः चर्च की सेवाओं में शामिल कर लिया. 

ताज़ा खबर यह है कि फरवरी 2016 में जब इस बहादुर लड़की पीटरसन को यह पता चला कि फादर जोसफ जेयापौल को एक नए असाइनमेंट के तहत विशेष नियुक्ति देकर भारत के किसी चर्च में भेजा जा रहा है, तब इसे और इसके परिवार को तगड़ा झटका लगा. पीटरसन कहती हैं, कि “यह बेहद अपमानजनक निर्णय है, वेटिकन कैसे एक बलात्कारी को पुनः किसी चर्च में नियुक्त कर सकता है? भारत जाकर यह आदमी पता नहीं कितनी लड़कियों का जीवन खराब करेगा, जहाँ वे इसके खिलाफ खुलकर सामने भी नहीं आ सकेंगी” अब इसने पुनः वेटिकन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. फिलहाल पादरी जेयापौल 61 वर्ष का है, और पीटरसन द्वारा इस मामले में पुनः आवाज़ उठाने के कारण भारत भेजने का फैसला कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया गया है, लेकिन यह स्थिति कब तक रहेगी कहा नहीं जा सकता. हो सकता है निकट भविष्य में दिल्ली अथवा तमिलनाडु के किसी चर्च में रेवरेंड जोसफ जेयापौल को बिशप नियुक्त कर दिया जाए... 

बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत के “प्रगतिशील”(??) महिला संगठन वेटिकन के इस निर्णय के खिलाफ अपना मुँह खोलेंगे?? भारत के वामपंथी और सेकुलर बुद्धिजीवी, जेल काट चुके इस बाल यौन अपराधी को भारत में पादरी बनाने का विरोध करेंगे?? या फिर इनकी सारी बौद्धिक तोपें सिर्फ हिन्दू संतों के विरोध हेतु आरक्षित हैं??



New Nationalist Wave in India


राष्ट्रवाद का बढ़ता उफ़ान... 


जब किसी रबर की बड़ी गेंद को लगातार दबाया जाता है, तो एक सीमा के पश्चात वह दबाने वाले को वापस एक जोरदार धक्का लगाती है. जिसे हम “एक्शन का रिएक्शन” कहते हैं. कुछ सप्ताह पहले जब JNU में उमर खालिद और उसके कुछ जेहादी दोस्तों ने “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह” जैसे नारे लगाए होंगे तो उन्हें अनुमान भी नहीं होगा कि उनकी इस हरकत की प्रतिक्रिया में सोशल मीडिया से पैदा हुआ तूफ़ान न सिर्फ उन्हें उड़ा ले जाएगा, बल्कि भारत में एक नई राष्ट्रवादी लहर का निर्माण भी कर देगा. “पिछले कुछ दिनों से “भारत माता की जय” बोलना या नहीं बोलना तेजी से एक मुद्दा बनता जा रहा है, विपक्षी दल यह आरोप लगा रहे हैं कि संघ और भाजपा ने जानबूझकर इसे मुद्दा बनाया है ताकि मूल मुद्दों से ध्यान हटाया जा सके... लेकिन यह सच नहीं है. वास्तविकता तो यह है कि “भारत माता की जय” का मुद्दा जनता का अपना मुद्दा है, जिसे जनता ही परवान चढ़ाया और जनता के बीच उपजे क्रोध ने इस मुद्दे को यहाँ तक पहुंचा दिया है. आखिर इस उफनते राष्ट्रवाद और देशप्रेमी नारों की वजह क्या है, इसके लिए हमें इस विमर्श को हालिया घटनाओं में मद्देनज़र देखना होगा. तथ्यों को देखने पर यह पता चल जाएगा कि “भारत माता की जय” संघ-भाजपा का नहीं, बल्कि क्रोधित जनता का स्वयं का मुद्दा है. 


भारत माता की जय” इससे पहले कभी भी मुद्दा नहीं था, लेकिन JNU के इन वामपंथी सोच वाले छात्रों और उन्हें शह देने वाले प्रोफेसरों के कारण इस ““एक्शन” की “रिएक्शन”” हुई. ऐसा नहीं है कि JNU में ऐसे भारत विरोधी, व्यवस्था विरोधी एवं भारत से घृणा दर्शाते हुए नारे पहली बार लगे हों. JNU पिछले काफी समय से देशद्रोहियों का अड्डा बनता जा रहा था, यह बात यूपीए सरकार के बाशिंदे भी जानते थे, परन्तु अपने हितों एवं वामपंथ के साथ उनके मधुर संबंधों के कारण समस्या को लगातार उपेक्षित करते रहे. नतीजा यह हुआ कि JNU के ये भस्मासुर लगातार अपना आकार बढ़ाते गए. लेकिन इस बार एक बड़ा अंतर आ गया, वह है सोशल मीडिया. JNU में उस काली रात को सबसे पहली बार जब ये नारे लगे, उस समय लगभग रात के नौ बजे थे, नारे लगाने वालों ने अपना मुंह ढंक रखा था. कन्हैया और उमर खालिद के सामने ये नारे लगाए जा रहे थे और ये दोनों छात्र नेता न सिर्फ ऐसी हरकतों पर चुप्पी साधे हुए थे, बल्कि अपनी बॉडी लैंग्वेज द्वारा उसे मूक समर्थन भी दे रहे थे. जबकि छात्रसंघ अध्यक्ष होने के नाते कन्हैया का यह कर्त्तव्य था कि वह न सिर्फ ऐसे देशद्रोही नारे लगाने वालों (तथाकथित अज्ञात) को न सिर्फ रोकता, बल्कि उनकी पहचान करके खुद ही पहल करते हुए बाकायदा पुलिस में FIR दर्ज करता, परन्तु न तो ऐसा होना था और न हुआ, क्योंकि “भारत तेरे टुकड़े होंगे” की लालसा तो इन दोनों छात्र नेताओं के मन में भी थी. नारे लगाने वाले, जो कि ज़ाहिर है किसी पहचान वाले के साथ ही कैम्पस में आए होंगे और उन्हें दर्जनों छात्र पहचानते भी होंगे, चुपचाप कैम्पस में ही विलीन हो गए. ऐसी हरकतें JNU में कई बार दिनदहाड़े भी हो चुकी थीं, परन्तु इस बार मामला उलट गया. उधर रात नौ बजे नारे लगे, और इधर सवा नौ बजे उन नारों का वीडियो देशद्रोही नारों की स्पष्ट आवाज़ के साथ इंटरनेट पर अपलोड हो गया. देखते ही देखते यह वीडियो वायरल हो गया और समूचे देश के “टेक-सेवी” युवाओं को दो घंटे में ही पता चल गया कि JNU में पिछले कुछ वर्षों से क्या चल रहा था. फिर क्या था, बस एक बार पिटारा खुलने की देर थी, आजकल तो हर हाथ में मोबाईल है, देखते ही देखते अगले तीन दिनों में सात और वीडियो सामने आ गए, जिसमें स्पष्ट रूप से देशद्रोही नारे लगाने वाले “कथित छात्र” दिखाई दिए. भारत की तथाकथित मुख्य धारा की मीडिया, जिसने अभी तक JNU की इन हरकतों पर आँखें मूँद रखी थीं, सोशल मीडिया की इस जोरदार मुहीम के कारण उसे मजबूरी में ये हरकतें दिखानी पड़ीं. जब छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने CRPF के छिहत्तर जवान मार दिए थे, उस समय भी JNU में जश्न मनाया गया था, लेकिन हमारी मीडिया जो सिर्फ “धंधा करना” जानती है, उसने कभी भी ऐसे देशद्रोही विचारों और घटनाओं को तरजीह नहीं दी. 

धंधेबाज मीडिया यहीं नहीं रुका, मीडिया में बैठे वामपंथी पिठ्ठुओं ने कन्हैया और उमर खालिद को “क्रांतिकारी हीरो” के रूप में पेश करना शुरू कर दिया. उमर खालिद को बेक़सूर तथा कन्हैया को मासूम बताया जाने लगा. इसे देखते हुए देश की जनता का क्रोध धीरे-धीरे बढ़ने लगा. लेकिन मीडिया चाहे जितना प्रयास कर ले, आज के युग में कोई खबर दबाना मुश्किल हो चूका है. “भारत तेरे टुकड़े होंगे” जैसे नारे और विचार काफी लम्बे समय से JNU में पाले-पोसे जा रहे हैं, लेकिन देश की सामान्य जनता को इसकी खबर नहीं थी, परन्तु जब उमर खालिद और कन्हैया के बहाने सोशल मीडिया पर JNU के सारे कारनामे एक-एक करके सामने आने लगे, तब जाकर जनता को पता चला कि न सिर्फ ऐसी हरकतें इस विश्वविद्यालय में आम हो चली हैं, बल्कि वहां के प्रोफेसरों और छात्रों ने मिलकर एक ऐसा “गिरोह” तैयार कर लिया है जो अरशद आलम और खुर्शीद अनवर जैसे दुष्कर्म के आरोपियों के बचाव में भी सक्रीय हो जाता है. इस देशद्रोही घटना के बाद ही जनता का ध्यान इस बात पर गया कि JNU अथवा फिल्म इंस्टीट्यूट पुणे में भारत के करदाताओं की गाढ़ी कमाई से कैसे-कैसे लोग मस्ती छान रहे हैं, तीस-पैंतीस-चालीस साल की आयु तक के मुफ्तखोर वहां “छात्र”(??) बने बैठे हैं, होस्टलों के कमरों पर कब्जे जमाए बैठे हैं, शिक्षा सब्सिडी की आड़ में सस्ते कमरे और सस्ते भोजन के चक्कर में वर्षों से वहां जमे हुए हैं और विभिन्न NGOs के जरिये अपनी राजनीति चला रहे हैं. देश की जनता यह जानकार हैरान थी कि जाने कैसे-कैसे “फर्जी कोर्सेस” की आड़ में यह सारा खेल वर्षों से चल रहा था. इस समय तक “भारत माता की जय” जैसा कहीं कोई मुद्दा नहीं था. 



देश की जनता के खदबदाते क्रोध के बीच ही मानव संसाधन मंत्रालय का यह निर्णय आया कि युवाओं में देशप्रेम की भावना जागृत करने के लिए देश के सभी विश्वविद्यालयों में २०० फुट ऊंचा तिरंगा फहराया जाएगा. चेन्नई, हैदराबाद और JNU में जिस तरह की विचारधारा का पालन-पोषण किया जा रहा है और जिन लोगों द्वारा किया जा रहा है, उन्हें यह निर्णय कतई पसंद नहीं आया. तिरंगा फहराने जैसे सामान्य से देशप्रेमी निर्णय का भी दबे स्वरों में विरोध शुरू हो गया, क्योंकि मोदी के सत्ता में आने के बाद से ही देश में कुछ कथित बुद्धिजीवियों का एक ऐसा गिरोह तैयार हो गया है, जिसे सरकार के प्रत्येक निर्णय पर अपना विरोध जताना ही है. देश का मध्यमवर्ग यह हरकतें देखकर हैरान-परेशान था, आखिर ये हो क्या रहा है. इस नाजुक मोड़ पर संघ प्रमुख का बयान आया कि “सभी को भारत माता की जय बोलना ही चाहिए”. बस फिर क्या था, दिन-रात संघ को पानी पी-पीकर कोसने वाले तथा “राष्ट्रवाद” नामक शब्द से भी घृणा करने वाले उछलकूद मचाने लगे. सबसे पहले हमेशा की तरह ओवैसी सामने आए. एक हास्यास्पद बयान में उन्होंने कहा कि “संविधान में कहीं भी ऐसा नहीं लिखा है, कि भारत माता की जय बोलना जरूरी है”. ओवैसी ने तिरंगे को धर्म से जोड़ने की जो फूहड़ कोशिश की, उसके कारण इस विवाद में जो कुछ तटस्थ लोग थे, वे भी न सिर्फ आश्चर्यचकित हुए, बल्कि क्रोधित भी हुए. सामान्य लोग यह सोचकर हैरान होने लगे कि आखिर तिरंगा फहराने और भारत माता की जय बोलने जैसे मुद्दों में धर्म और विचारधारा कहाँ से घुस आई. देश की जनता यह सोचने पर मजबूर हो गई कि आखिर देश के विश्वविद्यालयों में तथा राजनीति में यह कैसा ज़हर भर गया है, कि मोदी और भाजपा से घृणा करने वाले अब तिरंगे और भारत माता से भी घृणा करने लगे? उल्लेखनीय है कि मोहम्मद अली जिन्ना ने कभी भी “भारत माता की जय” का नारा नहीं लगाया, जबकि मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद ने इस नारे का गर्व से उद्घोष किया. ओवैसी के ऐसे घृणित बयान से यह समझ में आता है कि ओवैसी जानबूझकर जिन्ना की राह पर आगे बढ़ रहे हैं क्योंकि तिरंगे और भारत माता को इस्लाम से जोड़ने की हिमाकत कोई मूर्ख या धूर्त ही कर सकता है. 

लेकिन बात यहीं तक नहीं थमी, ओवैसी के सुर में सुर मिलाते हुए देवबंद से सम्बंधित दारुल इफ्ता ने भी एक मुस्लिम के सवाल पूछने पर 19 मार्च को यह फ़तवा जारी किया कि “इस्लाम में भारत माता की जय बोलना निषिद्ध है, क्योंकि इस्लाम में बुत-परस्ती की मनाही है”. फतवे में कहा गया कि चूंकि भारत माता को एक मूर्ति के रूप में, एक देवी के रूप में पेश किया गया है इसलिए इसकी वंदना करना इस्लाम के अनुरूप नहीं है. जबकि सामान्य बुद्धि वाला कोई भी व्यक्ति बता सकता है कि भारत माता को देवी के रूप में किसी भी संगठन ने प्रोजेक्ट नहीं किया है. भारत माता की एक काल्पनिक छवि संघ ने जरूर गढ़ी है, परन्तु उसे सर्वमान्य रूप से “देवी” नहीं बल्कि “माता” के रूप में चित्रित किया जाता है. अब भला माता को पूजने अथवा उसके सामने सर झुकाने में क्या तकलीफ है? यदि हम बांग्लादेश के राष्ट्रीय गीत को ध्यान से सुनें और उसका अर्थ निकालें तो साफ़-साफ़ पता चलेगा कि उसमें भी “आमार शोनार बांगला” को मातृभूमि के रूप में पेश किया गया है और उसकी वंदना की गयी है. तो फिर ओवैसी अथवा देवबंद के उलेमाओं ने यह तर्क इस्लाम की किस किताब से निकाल लिया कि “माँ के आगे सजदा नहीं किया जा सकता”?? दरअसल यह कुछ और नहीं सिर्फ और सिर्फ मोदी एवं संघ का अंध-विरोध भर है. चूंकि संघ ने कहा है कि इसलिए हम उसका ठीक उल्टा ही करेंगे, यही जिद देश के लिए घातक है. 


पाठकों को याद ही होगा कि इससे पहले भी काफी लम्बे समय से इस्लामी “विद्वान”(??) वन्देमातरम का विरोध करते आए हैं. जबकि स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में गांधी-नेहरू के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर लड़ने वाले कई इस्लामी नेताओं ने उन दिनों बड़े गर्व से वन्देमातरम का नारा लगाया था, यह गीत भी गाया था. फिर पिछले साठ साल में ऐसा क्या हो गया कि “वन्देमातरम” गीतों को भी साम्प्रदायिक की श्रेणी में डाल दिया गया? सरस्वती वंदना के मामले में तो एकबारगी समझ में आता है, कि चूंकि वह हिन्दू देवी हैं, इसलिए इस्लामी कट्टरता सरस्वती वंदना का विरोध करते हैं, परन्तु “भारत माता” कोई देवी नहीं है, वह तो जन्मभूमि का पर्याय है. तो क्या जन्मभूमि की भी वंदना नहीं की जा सकती? ऐसा कट्टर रवैया ठीक नहीं है. यही नियम सूर्य नमस्कार एवं योग पर भी लागू होता है. सूर्य कोई भगवान् नहीं हैं, वह तो एक अखंड ज्योति पुंज है, जिसके बिना धरती पर जीवन संभव नहीं है. माना कि इस्लामी मान्यताओं में “ॐ सूर्याय नमः” कहना निषिद्ध है, लेकिन क्या अपने और अपने बच्चों के स्वास्थ्य हेतु बिना मन्त्र का उच्चारण किए सूर्य नमस्कार नहीं लगाए जा सकते? देवबंद के कट्टरपंथी मौलवियों द्वारा मनमाने तरीके से इस्लाम की व्याख्या करने के कारण ही उदारवादी मुस्लिम तबका भी धीरे-धीरे समाज से कटता चला जाता है. जबकि आज भी देश के हजारों गाँवों में रामनवमी की शोभायात्रा में मुस्लिम समाजजन फूलों से स्वागत करते हैं और ताजिए के जुलूस में कई हिन्दू भाई कन्धा लगाते हैं. ओवैसी और देवबंद जैसे लोगों के कारण अब “भारत माता” और सूर्य को भी संघी या साम्प्रदायिक बना दिया गया है, बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. अपनी राजनीति चमकाने के लिए ओवैसी के अनुयायी कैसे अंध विरोध में उतर सकते हैं, इसका उदाहरण है महाराष्ट्र विधानसभा में MIM के सदस्य वारिस पठान द्वारा सदन के अन्दर भी वन्देमातरम अथवा भारत माता की जय नहीं बोलने पर अड़ गए. स्वाभाविक है कि जब एक पक्ष अड़ियल रवैया अपनाता है तो सामने वाला पक्ष भी और अधिक अड़ियल बन जाता है. नतीजा यह हुआ कि शिवसेना और भाजपा के विधायकों ने एकमत से वारिस पठान को विधानसभा से निलंबित करवा दिया. कांग्रेस और वामपंथियों का तो क्या कहना, ये लोग भी बिलकुल कट्टर इस्लामी मानसिकता के समकक्ष व्यवहार करते हैं, अर्थात यदि मोदी-संघ-भाजपा ने कोई बात कही है तो चाहे वह कितनी भी अच्छी या सही हो, उसका विरोध जरूर करेंगे, और विरोध भी ऐसा कि ये लोग राष्ट्रहित के मुद्दे पर भी एकदम दुसरे छोर पर जा बैठते हैं. 



विपक्षी दलों एवं कथित बुद्धिजीवियों के इसी अंध-विरोध तथा जिद के कारण श्रीनगर की NIT में भी “राष्ट्रवादी विचार विस्फोट” हो गया. काँग्रेस शासन के दौरान वर्षों से स्थानीय कश्मीरियों द्वारा सताए जाने और अपमान झेलने के लिए अभिशप्त NIT श्रीनगर के छात्रों ने आखिर JNU के इस देशद्रोही कृत्य को देखते हुए तिरंगा उठा ही लिया... और जो काम श्रीनगर की वादी में पिछले बीस-पच्चीस वर्ष में नहीं हुआ था, वह इन उत्साही छात्रों ने कर दिखाया. श्रीनगर में तिरंगा लहराना और भारत माता की जय के नारे लगाते हुए दौड़ लगाना एक क्रान्तिकारी कदम कहा जाना चाहिए. हालाँकि छात्रों का यह दुस्साहस श्रीनगर के स्थानीय छात्रों एवं जम्मू-कश्मीर पुलिस-प्रशासन में घुसे बैठे देशद्रोही तत्त्वों को रास नहीं आया, और उन्होंने एकमत होकर बाहर से पढ़ाई करने आए छात्रों के साथ बुरी तरह मारपीट की, लड़कियों को अश्लील गालियाँ दीं और फोन पर ह्त्या करने की धमकी दी. ऐसे समय में जो कथित रूप से निष्पक्ष बुद्धिजीवी JNU मामले में अपना गला फाड़ रहे थे, अभिव्यक्ति स्वतंत्रता की दुहाई दे रहे थे और शिक्षा कैम्पस में पुलिस कैसे घुसी जैसे अनर्गल प्रश्नों का प्रलाप कर रहे थे, वे लोग अचानक गायब हो गए. इन वामपंथी प्रोफेसरों और समाजसेवा का झण्डा उठाए बुद्धिजीवियों को NIT श्रीनगर के छात्रों से कोई लेना-देना ही नहीं रहा. उमर खालिद के समर्थन में सरकार को कोसने वाले NIT श्रीनगर मामले में एकदम चुप्पी साध गए, क्योंकि भले ही दोनों स्थानों पर छात्र ही शामिल हों, लेकिन JNU में वामपंथ के प्यारे-दुलारे देशद्रोही नारे लगे थे जबकि श्रीनगर में वामपंथ को चिढ़ाने वाले “भारत माता की जय” के नारे लग रहे थे. अर्थात इनके सिद्धांत, इनकी कथित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, इनके दवात शिक्षा कैम्पसों की स्वायत्तता की बातें आदि सिर्फ और सिर्फ “वैचारिक पाखण्ड” निकला. देशवासी समझ गए कि छात्रों द्वारा “अफज़ल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं” तो वामपंथ का प्रिय नारा हो सकता है, लेकिन ऐसे ही छात्रों द्वारा श्रीनगर में “भारत माता की जय” का नारा इन्हें बीमार कर देता है. तात्पर्य यह है कि इस विवाद ने वामपंथियों को पूरी तरह बेनकाब कर डाला. 

यानी जो हंगामा JNU के देशद्रोहियों द्वारा उनकी राजनीति चमकाने और गिरोह बढाने के लिए शुरू किया गया था, वह ठेठ इस्लाम और कांग्रेस तक जा पहुंचा. वामपंथ ने इस देश के बौद्धिक वातावरण का बहुत नुकसान किया है. भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता वगैरह तो खैर उनके शब्दकोष में है ही नहीं, लेकिन वामपंथ ने कभी भी भारत को एक “राष्ट्र” माना ही नहीं. वामपंथियों के अनुसार भारत सिर्फ कुछ राज्यों का संघ है, जिसे जबरदस्ती एक साथ रखा गया है. इसीलिए जब जनेवि में ““भारत तेरे टुकड़े होंगे”” के नारे लगते हैं तो उसका बचाव करने के लिए सबसे पहले और सबसे आगे वामपंथी ही दिखाई देते हैं. दिनदहाड़े देश को तोड़ने का सपना देखने वाले इस वामपंथ को देश का युवा काफी पहले समझ चूका है, और इसी युवा ने विकास और रोजगार के लिए मोदी को केंद्र की सत्ता तक पहुँचाया है. यानी विचारधारा का मरते जाना, विभिन्न राज्यों में सीटों का सिमटते जाना और एक क्षेत्रीय दल के रूप में लगभग पहचान खोते जाने के सदमे ने वामपंथियों को खुलेआम देशद्रोह के साथ खड़े होने की स्थिति में ला दिया है. “भारत माता की जय” का विरोध इसी श्रृंखला की एक कड़ी है. मुख्यधारा से लगभग कट जाने की वजह से वामपंथ ने अब नई चाल चलने का फैसला किया है, और वह है देश के तमाम विश्वविद्यालयों में युवाओं को झूठी कहानियाँ सुनाकर भड़काने की. कभी रोहित वेमुला को नकली दलित बनाकर पेश करना, तो कभी आंबेडकर-पेरियार के नाम पर जातिवाद का ज़हर घोलना तो कभी उमर खालिद जैसे लोगों को सरेआम समर्थन देकर युवाओं में असंतोष भड़काना हो... ये सारे कारनामे वामपंथी या तो खुले तौर पर कर रहे हैं, या फिर वर्षों से विभिन्न संस्थाओं और विश्वविद्यालयों में जमेजमाए बैठे उनके गुर्गे प्रोफेसरों और NGOs के माध्यम से, जैसे भी हो और जितना भी हो मोदी सरकार के खिलाफ तथा देश-समाज को तोड़ने की दिशा में काम किए जा रहे हैं. परन्तु वे यह भूल जाते हैं कि “एक्शन” का “रिएक्शन” तो होता ही है, इसीलिए जब JNU में मुठ्ठी भर लोग “भारत तेरे टुकड़े होंगे” के नारे लगाते हैं तो उसकी प्रतिक्रिया में समूचे देश में राष्ट्रवाद एवं भारत माता की जय का रिएक्शन शुरू हो जाता है, क्योंकि अब देश का युवा समझदार हो चूका है. युवाओं को भी समझ में आने लगा है कि फैक्ट्रियों, उद्योगों, विश्वविद्यालयों एवं संस्थाओं में बैठे ये वामपंथी उन्हें अपना मोहरा बनाकर हड़ताल, धरने, प्रदर्शनों में झोंक देते हैं और खुद अपनी राजनीति चमकाकर चुपके से पीछे हट जाते हैं. 

पाठकों को याद होगा कि उमर खालिद और कन्हैया के साथ सरेआम देशद्रोही नारे लगाने वालों में एक और नाम आया था “अपराजिता राजा” का. यह कन्या वामपंथी नेता डी.राजा की बेटी है. अपराजिता राजा का गुनाह भी उमर खालिद और उसके साथियों जितना ही था. लेकिन क्या अब उसका नाम कहीं भी दिखाई देता है? क्या किसी पुलिस FIR में अथवा किसी न्यायालयीन मामले में अपराजिता राजा जुडी हुई दिखाई देती हैं? नहीं... क्योंकि वह बड़े वामपंथी नेता की बेटी है. यानी डी. राजा साहब ने अपनी बेटी को तो बड़े सुरक्षित तरीके से इस मामले से बाहर करके उसका भविष्य सुरक्षित कर लिया, लेकिन फँस गए उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य. सुनने में आया है कि केंद्र सरकार की एजेंसियों और डी. राजा के बीच अपराजिता को लेकर कोई गुप्त सौदा हुआ है, जिसके अनुसार सरकार ने अपराजिता को इस मामले से एकदम गायब करने के बदले, संसद में कुछ बिलों पर वामपंथी दलों सरकार को सहयोग करेंगे. संसद के बजट सत्र में हमने इस गुप्त समझौते की एक बानगी भी देख ली, जब सिर्फ GST को छोड़कर लगभग सभी बिल सरकार ने पास करवा लिए. विश्लेषकों का मानना यह भी है, कि यह मुद्दा दोनों की आपसी “गुप्त डील” के तहत बनाया गया, ताकि बंगाल चुनावों में काँग्रेस को थोड़ा नीचे किया जा सके. यानी डी.राजा भी खुश, उनकी राजनीति भी चमक गयी और इधर सरकार भी खुश... अब खालिद, अनिर्बान और कन्हैया विभिन्न मामलों एवं न्यायालयों में वर्षों तक रगड़े जाएंगे, जबकि अपराजिता राजा कुछ वर्ष बाद अपने पिता की वामपंथी पार्टी में किसी प्रमुख पद पर दिखाई देगी. अर्थात “राष्ट्रवाद का यह भावनात्मक उफान, तथा “भारत माता की जय”” विवाद भले ही अनजाने में एक बड़ा मुद्दा बन गया हो, परन्तु यह सरकार के लिए भी लाभ का सौदा रहा कि इधर संसद में उसके कुछ बिल पास हो गए और उधर श्रीनगर में राष्ट्रवाद के नारे पहली बार बुलंद हुए... और वामपंथियों के लिए भी, जिनकी राजनीति उनके वोट बैंक के बीच थोड़ी चमक गई, ताकि बंगाल के चुनावों में वे ममता से ढंग का मुकाबला कर पाएँगे. 

पुनश्च :- राष्ट्रवादी भावनाओं का यह तूफ़ान सिर्फ भारत में ही सीमित नहीं है, विश्व के अनेक देशों में राष्ट्रवाद की यह भावना तीव्र से तीव्रतर होती जा रही है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ में सबसे आगे चल रहे डोनाल्ड ट्रम्प. ट्रम्प ने अपने भाषणों में जिस तरह से खुलेआम इस्लामी आतंकवाद से निपटने के लिए अतिवादी उपाय अपनाने के संकेत दिए हैं, उसने समूचे विश्व को बेचैन कर दिया है. डोनाल्ड ट्रम्प की बढ़ती लोकप्रियता, एवं अमेरिकी युवाओं को अपने उत्तेजक भाषणों के जरिये उकसाने की उनकी शैली से परम्परागत अमेरिकी राजनीति में हलचल मची हुई है. अमेरिका वैसे ही 9/11 की घटना के बाद मुस्लिम प्रवासियों के प्रति कठोर रवैया अपना ही रहा है, लेकिन यदि डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति बने तो इस्लामी देशों के प्रति उसकी नीतियों में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं. इसी प्रकार ISIS के अत्याचारों से तंग आकर सीरिया सहित अनेक इस्लामी देशों से जो शरणार्थी यूरोप पहुँचने में कामयाब हो गए, वे वहाँ के खुले समाज को देखकर खुद पर काबू नहीं रख पा रहे. आए दिन जर्मनी, स्वीडन, नॉर्वे, बेल्जियम इत्यादि देशों से मुस्लिम शरणार्थियों द्वारा लूटपाट, बलात्कार की ख़बरें आना शुरू हो गई हैं. इन हरकतों की वजह से यूरोप में भी “प्रतिकारक रिएक्शन” की एक लहर जागने को है. यूरोप के निवासी सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि हमने इन जंगलियों को शरण देकर कहीं गलती तो नहीं कर दी. यदि मुस्लिम शरणार्थी नहीं सुधरे और उन्होंने सम्बन्धित देशों के नियम-कानूनों को नहीं माना तो “राष्ट्रवादी भावनाओं” के उभार की शुरुआत जो हमेशा की तरह जर्मनी और रूस से शुरू हुई है, आगे चलकर न सिर्फ उन शरणार्थियों, बल्कि कुछ इस्लामी देशों को भारी पड़ेगी. संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि जैसे भारत में JNU की नारेबाजी ने “उत्प्रेरक” का काम किया, वैसे ही अलग-अलग देशों में अलग-अलग मुद्दों पर युवा एवं देशप्रेमी जनता के बीच “राष्ट्रवाद” की भावना उफान मारने लगी है. कम से कम भारत में तो इसके लिए हमें वामपंथियों को धन्यवाद देना ही चाहिए, कि उन हरकतों की वजह से एक “अ-मुद्दा” भी महत्त्वपूर्ण बन गया, जिसने देश में जागरूकता बढ़ाने एवं एकात्मकता कायम करने में अच्छी भूमिका निभाई और इसी बहाने कुछ “तटस्थ” लोगों को भी संघ के पाले में धकेल दिया है.

Wednesday, March 30, 2016

Farmer Village Budget 2016 : Congress Free India Step 2


ग्रामीण एवं कृषि आधारित बजट 2016 :- “काँग्रेस मुक्त भारत” का दूसरा चरण 


जब कोई पहलवान अखाड़े में लड़ने उतरता है, तो वह सामने वाले पहलवान की शक्ति को आँकने के लिए शुरू में थोड़ी देर तक हलके-फुल्के दाँव आजमाता है, और जब उसे पूरा अंदाजा हो जाता है कि कौन सा दाँव लगाने से प्रतिद्वंद्वी चित हो जाएगा, तभी वह उसे पटखनी देने के लिए अपना पूरा जोर लगाता है. 2014 के आम चुनावों में नरेंद्र मोदी ने “काँग्रेस मुक्त भारत” का नारा दिया था. काँग्रेस के कुकर्मों की वजह से इस नारे में ऐसा आकर्षण पैदा हुआ कि देश की जनता ने मोदी को 282 सीटों से नवाज़ा और केन्द्र में पहली बार भाजपा बिना किसी की मदद के सत्तारूढ़ हुई. इसके बाद अगले एक वर्ष में जितने भी विधानसभा चुनाव हुए उनमें “मोदी लहर का हैंगओवर” ही काम करता रहा और भाजपा हरियाणा, महाराष्ट्र भी जीती. इसके बाद प्रतिद्वंद्वी पहलवान ने मोदी को दिल्ली और बिहार जैसे जोरदार दाँव लगाकर लगभग पटक ही दिया था... लेकिन ये पहलवान भी कच्ची गोलियाँ नहीं खेला हुआ है वह संभला और अब इस पहलवान ने शुरुआती कामकाज और विदेश यात्राओं द्वारा देश की छवि निर्माण करने के बाद “मूलभूत” मैदानी दाँव आजमाने का फैसला कर लिया है. 

2009 के आम चुनाव सभी को याद हैं, मनमोहन सिंह की सरकार इतनी भी लोकप्रिय नहीं थी कि उसे बहुमत मिल जाए, परन्तु काँग्रेस ने 2008 में 65,000 करोड़ रुपए का “मनरेगा” नामक ऐसा जोरदार दाँव मारा कि आडवानी चित हो गए. उन्हें समझ ही नहीं आया कि ये क्या हो गया. वह तो भला हो कलमाडी-राजा-बंसल-खुर्शीद जैसों का, तथा देश के युवाओं में काँग्रेसी भ्रष्टाचार के प्रति बढ़ते तीव्र क्रोध और सोशल मीडिया का, जिनकी वजह से नरेंद्र मोदी को उभरने और स्थापित होने का मौका मिला. मोदी ने इस मौके को बखूबी भुनाया भी और सीधे प्रधानमंत्री पद तक जा पहुँचे. संभवतः नरेंद्र मोदी ने सोचा था कि 44 सीटों पर सिमटने के बाद काँग्रेस को अक्ल आ जाएगी... संभवतः भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलने पर वामपंथी और अन्य जातिवादी दलों को भी विकास की महत्ता समझ में आ जाएगी, लेकिन देश के दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ. उधर मोदी आधारभूत संरचनाओं को तेजी से शुरू करने सहित विदेशों में देश की छवि निर्माण के काम में जुटे रहे, और इधर “नकारात्मक” विपक्ष अख़लाक़, रोहित वेमुला, कन्हैया, FTII, आईआईटी चेन्नै जैसे मामलों में न सिर्फ खुद उलझा रहा, बल्कि मीडिया की मदद से देश की जनता को भी भ्रमित करने में लगा रहा. इस बीच नरेंद्र मोदी दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनाव हार गए तो विरोधियों की तो मानो पौ-बारह हो गई. ऐसा अनुमान है कि इसी के बाद नरेंद्र मोदी ने काँग्रेस सहित समूचे विपक्ष को उन्हीं के खेल में, उन्हीं के दाँव से चित करने का मूड बना लिया. केन्द्र में सरकार होने के अपने लाभ होते हैं, जिसमें सबसे बड़ा लाभ होता है “बजट बनाने और उसके आवंटन” का. जैसा कि विशेषज्ञ मानते हैं कि नरेंद्र मोदी का असली वोट बैंक है शहरी माध्यम वर्ग एवं गैर-मुस्लिम युवा, जबकि माना जाता है कि विपक्ष का वोट बैंक है किसान, मजदूर और अल्पसंख्यक. 


जब वर्ष 2016-17 का बजट तैयार किया जा रहा था, जनता, उद्योगपतियों, किसान नेताओं एवं मजदूर संगठनों से विचार एवं सुझाव आमंत्रित किए जा रहे थे, उस समय विपक्षियों ने सोचा था कि इस बजट के बहाने वे नरेंद्र मोदी पर “चिपकाए गए उनके आरोप” अर्थात सूट-बूट की सरकार को एक बार पुनः ठोस तरीके से जनता के सामने रख सकेंगे, लेकिन जैसा कि ऊपर कहा गया कि लगता है नरेंद्र मोदी ने विपक्ष को उन्हीं के खेल में, उन्हीं के मैदान में और उन्हीं की चालों से मात देने का फैसला कर लिया है. इसीलिए जब अरुण जेटली ने लोकसभा में इस वर्ष का बजट पेश किया, उसके एक-एक बिंदु को जैसे-जैसे वे पढ़ते गए और समझाते गए वैसे-वैसे विपक्ष के हाथों से तोते उड़ने लगे. विपक्षी बेंच के सदस्यों के चेहरे देखने लायक हो रहे थे. विपक्ष ने सोचा भी नहीं था कि नरेंद्र मोदी उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसकाने वाला किसान समर्थक बजट पेश कर देंगे. हालाँकि “विपक्षी कर्मकांड” की परम्परा निभाते हुए काँग्रेस सहित समूचे विपक्ष ने केन्द्रीय बजट की आलोचना की, उसे हमेशा की तरह गरीब-किसान विरोधी बताने की कोशिश की, परन्तु जैसे-जैसे बजट के तमाम प्रावधान जनता के सामने आते गए वैसे-वैसे विपक्ष की आवाज़ दबती चली गई और वह पुनः अपने पुराने घिसेपिटे सेकुलरिज़्म, संघ की आलोचना, भारत माता की जय नहीं बोलेंगे जैसे बकवास मुद्दों पर लौट गया. भाजपा की सरकार ने अपने “पहले पूर्ण बजट” में जिस तरह से किसानों, माध्यम वर्गीय मतदाताओं तथा विशेषकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने एवं उसमें पैसा झोंकने के निर्णय लिए हैं, वह यदि अगले तीन वर्ष में धरातल पर उतर आएँ तो यह तय जानिये कि किसानों, ग्रामीणों और छोटे उद्यमियों की जेब में पैसा जाएगा. नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली की जोड़ी ने विपक्ष के पैरों के नीचे से दरी खींच ली है और अब बजट प्रस्तावों पर विरोध करने के लिए उनके पास कुछ बचा ही नहीं है. 

आईये पहले हम देखते हैं कि ग्रामीण विकास और कृषि को फोकस में लेकर इस “वास्तविक क्रान्तिकारी” बजट में मोदी सरकार ने ऐसा क्या कर दिया है, कि काँग्रेस और बाकी विपक्ष बजट के मुद्दों, अर्थव्यवस्था, आधारभूत संरचना एवं पानी-बिजली पर बात ही नहीं कर रहे और देश की जनता को फालतू के “अ”-मुद्दों पर भटकाने की असफल कोशिश कर रहे हैं. बजट को लेकर विपक्ष का सबसे पहला आरोप था कि यह बजट 2019 के आम चुनावों को ध्यान में रखकर बनाया गया “लॉलीपॉप” बजट है, इस बोदे आरोप से ही हमें समझ जाना चाहिए कि अपने बजट से नरेंद्र मोदी ने विपक्ष को किस तरह डरा दिया है. जब नरेंद्र मोदी ने अपने एक भाषण में कहा कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का उनका लक्ष्य है तो शुरू में हमेशा की तरह विपक्षियों एवं कथित बुद्धिजीवियों ने उनके इस बयान की खिल्ली उड़ाई. लेकिन अब जब हम बजट के प्रावधानों को देखते हैं तो साफ़-साफ़ दिखाई देता है कि अगले तीन वर्ष में जिस तरह मोदी सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि में पैसा और संसाधन झोंकने जा रही है, उससे किसान की आय दोगुनी करने का लक्ष्य असाध्य नहीं है. हम सभी जानते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है कृषि क्षेत्र एवं ग्रामीण विकास. पिछले साठ वर्षों में काँग्रेस की सरकारों ने पैसा ऊपर से नीचे की तरफ बहाया है और इस बहाव में अपने कैडर का “पूरा ख़याल” रखा है. दिल्ली से बहकर आने वाली पैसों की गंगा में निचले स्तर तक के लोगों ने जमकर हाथ धोए हैं, क्योंकि काँग्रेस की नीति है “बाँटो और राज करो”. काँग्रेस का यह “बाँटो” अभियान दोनों क्षेत्रों के लिए था अर्थात पहला समाज को धर्म एवं जाति के आधार पर “बाँटो”, तथा दूसरा जमकर पैसा “बाँटो” कि जनता को मुफ्तखोरी की आदत लग जाए. मोदी सरकार के आने के बाद इस पर अंकुश लगना शुरू हुआ है. मोदी सरकार ने बजट में सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि जब केन्द्र से पैसा बाँटा जाए तो उसका उसी कार्य में सदुपयोग हो, जिसके लिए यह आवंटित किया गया है. दिल्ली से आने वाले पैसे पर कड़ी निगरानी हो तथा तकनीक एवं सोशल मीडिया की मदद से भ्रष्टाचार पर नकेल कसी जाए क्योंकि जब ग्रामीण विकास और कृषि, यह दोनों प्रमुख क्षेत्र तीव्र विकास करेंगे, तो अपने-आप पैसा नीचे से ऊपर की तरफ भी आना शुरू हो जाएगा. यही देश को मजबूत बनाएगा. यानी काँग्रेस और विपक्ष के इस परम्परागत वोट बैंक को खुश करके एवं गाँवों में खुशहाली लाकर मोदी ने उनकी नींद उड़ाने का पूरा बंदोबस्त कर दिया है. ऐसे में यदि विपक्ष इन बजट प्रस्तावों की आलोचना करेगा अथवा उसमें मीनमेख निकालेगा तो ग्रामीणों और किसानों में उसका विपरीत सन्देश जाएगा. इसीलिए इस बार विपक्ष उलझ गया है और बजट छोड़कर बाकी के बेकार मुद्दों पर राजनीति में लग गया है. 


जब भी हम किसी किसान की आत्महत्या की खबर सुनते हैं तो मन विषाद से भर उठता है. जो अन्नदाता हमें अन्न प्रदान करता है, यदि वह पैसों की कमी अथवा संसाधनों की अल्पता के कारण फसल उगाने में असफल रहता है और कर्ज़दार बनकर आत्महत्या की तरफ उन्मुख होता है तो ज़ाहिर है कि इसका मतलब ये है कि देश की अर्थव्यवस्था के एक मजबूत स्तंभ में कीड़ा लग गया है, जिसे तत्काल प्रभाव से सही करने की आवश्यकता है. अब मूल सवाल उठता है कि किसान की स्थिति सुधारने के लिए क्या-क्या किया जाए? काँग्रेस शासित महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में सर्वाधिक किसानों ने आत्महत्याएँ की हैं, इससे कम से कम यह बात तो साफ़ हो जाती है कि काँग्रेस का जो विकास मॉडल है अथवा नीतियाँ हैं वे असफल सिद्ध हुई हैं. अर्थात काँग्रेस के शासनकाल ने किसानों को कृषि के लिए प्रोत्साहित करने, आधारभूत संरचनाओं जैसे सड़कों-नहरों का जाल बिछाने, बिजली की व्यवस्था सुधारने जैसे काम करने की बजाय उन्हें मजदूर बनाने में रूचि दिखाई और “मनरेगा” जैसी योजनाएँ चलाईं. मनरेगा में जितना पैसा 2009 से 2014 तक दिया गया, उतने में तो देश के गाँव-गाँव में तालाब और बिजली पहुँच सकती थी. अब नरेंद्र मोदी सरकार ने इन्हीं मूलभूत कार्यों पर ध्यान देना आरम्भ कर दिया है, ताकि किसान समृद्ध हो सके. 

सरकार ने एक स्पष्ट रोडमैप बनाकर बताया है कि पानी, बिजली, सड़क की समस्या कैसे दूर होगी, बाकायदा तारीख दी गई है कि इस समस्या का हल इस तारीख तक हो जाएगा. इस बजट में पानी की गंभीर समस्या को समझकर जमीन में पानी का स्तर बढ़ाने के लिए 60,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. अभी तक किसी भी पूर्ववर्ती बजट में किसी भी सरकार ने जमीन में पानी का स्तर बढ़ाने के लिए इतनी बड़ी रकम आवंटित नहीं की है. जमीन में पानी का स्तर उठाने के साथ ही सरकार ने सिंचाई पर भी ध्यान दिया है. इस बजट में अट्ठाइस लाख पचास हजार हेक्टेयर जमीन की सिंचाई को “प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना” के अंतर्गत सिंचित करने का लक्ष्य रखा गया है. एक अध्ययन के अनुसार भारत में कुल कृषि भूमि पर यदि सभी तरह के सिंचाई साधन जोड़ लें, तब भी देश के करीब दो-तिहाई खेत पानी का साधन न मिलने के कारण सिर्फ बारिश के भरोसे होते हैं. मोदी सरकार ने इस बजट में जमीन में पानी का लेवल उठाने तथा खेतों की सिंचाई पक्की करने का प्रावधान किया है. जेटली के अनुसार “नाबार्ड” बीस हजार करोड़ रुपये का सिंचाई फंड तैयार करेगा. किसान का नुक्सान कई बार खेत की मृत हो चुकी मिट्टी अथवा खराब बीजों के कारण भी होता है, इसके लिए इस बजट में “मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना” अधिक गंभीरता से लागू करने का संकल्प लिया गया है. इसके तहत मार्च 2017 तक चौदह करोड़ खेतों में मिट्टी एवं बीजों का परीक्षण करने का लक्ष्य रखा गया है. स्वाभाविक है कि जब मिट्टी उपजाऊ और बीज स्वस्थ होगा तो फसल अधिक होगी. साथ ही किसान का फायदा बढ़े और उसे ज्यादा उपज मिले, इस हेतु सरकार ऑर्गेनिक खेती को भी बढ़ावा दे रही है. अगले तीन वर्ष में पांच लाख एकड़ जमीन पर ऑर्गेनिक खेती का लक्ष्य रखा गया है, जो एक सराहनीय कदम कहा जाएगा. 


मैंने पिछले एक लेख में देश की बिजली समस्या हल करने के प्रति यह सरकार कितनी गंभीर है इस पर चर्चा की थी, और यह बताया था कि ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल मोदी जी द्वारा दिए गए लक्ष्य से भी आगे चल रहे हैं. चूँकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सभी गांवों तक एक हजार दिनों में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य तय किया था. इसलिए इस बजट में 1 मई 2018 का लक्ष्य घोषित किया गया है, जिसके बाद देश में ऐसा कोई गांव नहीं होगा, जहां बिजली नहीं हो. अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी इसके लिए ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल की तारीफ़ की. बिजली समस्या को लेकर यह सरकार जिस तरह से गंभीर दिखाई दे रही है, वह काँग्रेस के ग्रामीण वोट बैंक पर भीषण सेंधमारी साबित होने जा रही है. 

मोदी सरकार ने पानी और बिजली के साथ सड़क पर भी विशेष ध्यान देने का फैसला किया है. भाजपा की पिछली सरकार में वाजपेयी जी ने जो “स्वर्णिम चतुर्भुज” की योजना शुरू की थी और उस पर काफी काम भी किया था वैसे ही इस सरकार में भी नितिन गड़करी जैसे अनुभवी नेता हैं, जिन्होंने पिछले दो साल में लगातार तीस किलोमीटर प्रतिदिन राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने का लक्ष्य हासिल कर लिया है, जो कि काँग्रेस सरकार में बड़ी मुश्किल से अधिकतम बारह किमी प्रतिदिन तक पहुँच पाया था. जैसा कि लेख में मैंने ऊपर लिखा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जानते हैं कि अगर किसान अपने गाँव से जिला, और राज्य मुख्यालय तक अपनी उपज लेकर नहीं आ पाया, तो सन २०२२ में किसान की आमदनी दोगुनी करने का वादा पूरा नहीं हो पाएगा. इसीलिए इस बजट में विशेष रूप से ग्रामीण सड़कों के लिए उन्नीस हजार करोड़ रूपए रखे गए हैं. इनके अलावा दो हजार किलोमीटर के “स्टेट-हाईवे” को राष्ट्रीय राजमार्ग में बदलने का प्रस्ताव भी इस बजट में किया गया है. अन्य सड़कों के लिए 97000 करोड़ रुपये का प्रावधान इस बजट में है. अर्थात यदि रेलवे-सड़क दोनों को जोड़ें, तो इस बजट में करीब सवा दो लाख करोड़ रुपये का सिर्फ इसी काम के लिए रखे गए हैं, जो कि ऐतिहासिक है. स्वाभाविक है कि काँग्रेस सहित समूचे विपक्ष की बोलती बन्द होना ही है. नितिन गडकरी ने सभी सड़क परियोजनाओं को तेजी से लागू करने की अपनी छवि को और दुरुस्त किया है. पानी, बिजली और सड़क तीनों की सबसे ज्यादा मुश्किल देश के गांवों में ही है. अतः पहली बार किसी सरकार ने इन मुश्किलों की जड़ में जाकर समस्या को समझा है और उसी के अनुरूप बजट में योजनाएँ बनाई हैं. ज़ाहिर है कि यदि मानसून सामान्य रहा तो अगले तीन वर्ष में ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भारी उछाल आना ही है, और जब किसान और ग्रामीण की जेब में पैसा होगा, तो अंततः वह पैसा नीचे से ऊपर की ओर ही बहेगा तथा स्वाभाविक रूप से वोट में भी तब्दील होगा. 


इस बजट की एक और खास बात यह है कि मोदी सरकार ने गाँवों एवं नगरों की स्थानीय सरकारों को मजबूत करने का फैसला किया है. जेटली ने शहरी और ग्रामीण विकास के लिए इन संस्थाओं को दिए जाने वाले अनुदान में 228% की बम्पर बढ़ोतरी कर दी है. चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार यह राशि 2.87 लाख करोड़ रूपए होगी, जो अभी तक किसी सरकार ने कभी भी नहीं दी है. जबकि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के लिए 19,000 करोड़ रूपए अलग से रखे हैं. “मनरेगा” काँग्रेस का ड्रीम प्रोजेक्ट रहा है, इस योजना के जरिए ही काँग्रेस ने 2009 का आम चुनाव जीता था, लेकिन 2009-2014 के बीच यूपीए-२ के शासनकाल के दौरान इस योजना में इतना जमकर भ्रष्टाचार हुआ कि ग्रामीण मजदूर त्राहिमाम करने लगे. काँग्रेस के स्थानीय नेताओं और पंचों-सरपंचों ने इस योजना पर ऐसा कब्ज़ा जमाया कि कि निचले स्तर तक के सभी कार्यकर्ता मालामाल हो गए, जबकि वास्तविक गरीब मजदूरों को कोई फायदा नहीं पहुँचा और उन्हें रोजगार के लिए अपने गाँव से पलायन करना ही पड़ता था. स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा में “मनरेगा” को एक असफल स्मारक घोषित किया. मोदी जी के अनुसार, यदि वास्तव में मनरेगा योजना ईमानदारी से चलाई जाती, इसके तहत “उत्पादक” कार्यों को प्राथमिकता दी जाती और भ्रष्टाचार पर लगाम कस दी जाती तो ग्रामीण मजदूरों के लिए यह एक सुनहरी योजना होती. परन्तु काँग्रेस के शासनकाल में ऐसा होना संभव ही नहीं था, क्योंकि एक रिपोर्ट के अनुसार मनरेगा में अधिकाँश स्थानों पर बोगस रजिस्टर बनाए गए, कहीं-कहीं सिर्फ गढ्ढे खुदवाकर उसे तालाब दर्शा दिया गया, तो कहीं-कहीं मजदूरों को पूरे सौ दिन का रोजगार तक नहीं मिला और बजट में आया हुआ पैसा ताबड़तोड़ कागज़ों पर ही खत्म कर दिया गया. अब मोदी सरकार ने इस योजना को कसने और इसके भ्रष्टाचार पर नकेल डालने का फैसला कर लिया है. इस बार के बजट में मनरेगा के लिए 38500 करोड़ रूपए दिए गए हैं, जो अब तक के सर्वाधिक हैं. लेकिन साथ ही मोदी-जेटली की जोड़ी ने मनरेगा में मिलने वाली मजदूरी तथा बजट आवंटन को “जन-धन योजना” तथा “आधार कार्ड” एवं किए जाने वाले कार्यों की गुणवत्ता से जोड़ दिया है, ताकि पैसा नगद नहीं देकर सीधे मजदूरों के खाते में ही जाए, साथ ही गाँवों में इस मनरेगा के कारण कोई अच्छा निर्माण कार्य, तालाब, नहर, कुँवा जैसा स्थायी बुनियादी ढाँचा तैयार हो. स्वाभाविक है कि काँग्रेस नेताओं को इस कदम से बहुत तिलमिलाहट हुई है. 

हाल ही में सरकार ने लोकसभा में “राष्ट्रीय जलमार्ग विधेयक” भी पास करवा लिया है, जिसके तहत देश के सड़क और रेलमार्गों के अतिरिक्त अब नदी एवं समुद्री जलमार्गों को भी “राष्ट्रीय जलमार्ग” घोषित किया जाएगा तथा जहाज़ों के लिए नए “ग्रीनफील्ड” बंदरगाह बनाए जाएँगे. एक शोध के अनुसार देश में कम से कम 19 जलमार्ग ऐसे हैं जिन पर परिवहन किया जा सकता है, जो सड़क और रेलमार्ग दोनों के मुकाबले बेहद सस्ता सिद्ध होगा. इसके अलावा देश के कई छोटे शहरों में प्रयोग में नहीं आने वाली अथवा बहुत कम प्रयोग की जाने वाली हवाई पट्टियों के नवीनीकरण एवं उनका समुचित उपयोग आरम्भ करने के लिए प्रत्येक राज्य सरकार को 100 करोड़ रूपए उपलब्ध करवाए हैं, ताकि इन हवाई पट्टियों को भी काम में लिया जा सके. इन दोनों मार्गों के आरम्भ होने से रोजगार के नए रास्ते खुलेंगे तथा अर्ध-शहरी क्षेत्रों एवं नदी किनारे बसे नगरों में व्यावसायिक गतिविधियाँ तेज़ होंगी. इनके अलावा यूपीए-२ सरकार के दौरान धन की कमी एवं लेटलतीफी के कारण बन्द बड़े 138 बड़े प्रोजेक्ट्स को पुनः चालू करने का भी निर्देश दिया गया है. 

देश में काले धन और भ्रष्टाचार की समस्या आज से नहीं, बल्कि पिछले पचास साल से है. काँग्रेस की सरकारों ने इसे रोकने के लिए कोई कठोर कदम नहीं उठाए. काला धन उत्पन्न होने की सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा देश है, जहाँ सर्वाधिक नगद लेन-देन होता है. एक अध्ययन के अनुसार जितना अधिक नगद लेन-देन होगा, भ्रष्टाचार, कर चोरी तथा काले धन की समस्या उतनी अधिक बढ़ेगी. इसीलिए मोदी सरकार ने एक लाख से अधिक की किसी भी खरीदी के लिए PAN कार्ड अनिवार्य कर दिया है. इस प्रकार किसी भी बड़े लेन-देन पर सरकार के पास समुचित सूचना रहेगी. सरकार की योजना यह है कि नगद व्यवहार कम से कम हों तथा क्रेडिट कार्ड से लेन-देन अधिकाधिक हो ताकि काले धन पर थोड़ा सा अंकुश लगे. बड़े-बड़े उद्योगों एवं कंपनियों पर 15% की दर से डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स लगा दिया है, और इस धन का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के नाम पर लिए जाने वाले गैस कनेक्शन हेतु 2000 करोड़ रूपए की सब्सिडी में किया जाएगा. लंबे समय से बैंकों की यह माँग थी कि उनके पक्ष में एक मजबूत क़ानून बनाया जाए, ताकि ऋण लेकर नहीं चुकाने वाले लेनदारों द्वारा सख्ती से वसूली की जा सके. इस संसद सत्र में सरकार ने बैंकों को मजबूत करने के लिए एक क़ानून बना दिया है, और सभी सरकारी एवं निजी बैंक उनकी सुविधा एवं संसाधन के मुताबिक़ जानबूझकर ऋण नहीं चुकाने वालों के खिलाफ कई प्रकार की कानूनी कार्रवाई एवं कुर्की इत्यादि कर सकेंगी. 

बजट के बोझिल आँकड़ों में अधिक गहराई से न जाते हुए भी उपरोक्त बातों के आधार पर स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने काँग्रेस के परंपरागत वोट बैंक अर्थात किसानों एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सेंध लगाने की पूरी तैयारी कर ली है. काँग्रेस ने पिछले साठ वर्षों में किसानों और मजदूरों को विभिन्न प्रकार के लालच और झूठे आश्वासन देकर उन्हें अपने पाले में उलझाए रखा, परन्तु नरेंद्र मोदी की रणनीति दूरगामी है. नरेंद्र मोदी अगले तीन वर्ष में ग्रामीण क्षेत्रों हेतु सड़क-पानी और बिजली का ऐसा जाल बिछाने जा रहे हैं जिसके कारण किसान की आमदनी में अच्छा-ख़ासा इज़ाफ़ा होगा. काँग्रेस ने ऋण माफी दे-देकर किसानों को अपने पक्ष में किया था, लेकिन नरेंद्र मोदी “सकारात्मक” राजनीति करते हुए किसानों को ही इतना मजबूत बना देना चाहते हैं कि उन्हें ऋण लेने की जरूरत ही ना रहे, और यदि लेना भी पड़े तो वे साहूकारों की बजाय किसान क्रेडिट कार्ड से, अथवा “मुद्रा बैंक” से अथवा माईक्रो क्रेडिट बैंकों से ऋण लें और चुकाएँ. यह नीति थोड़ा समय जरूर लेगी, परन्तु इससे किसान आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनेगा, उसे किसी के आगे हाथ पसारने की जरूरत नहीं रहेगी, जबकि काँग्रेस यह चाहती थी कि किसान सदैव याचक बना रहे अथवा खेती छोड़कर मनरेगा में मजदूरी करने लगे. यदि जमीन की मिट्टी अच्छी हो जाए, बीज स्वस्थ मिलें, सिंचाई के लिए पानी और बिजली की व्यवस्था उत्तम हो जाए तथा फसलों को सही समय पर मंडी पहुँचाने के लिए अच्छी सड़कें मिल जाएँ तो किसान को और क्या चाहिए. भारत का किसान तो वैसे ही काफी जीवट वाला होता है, वह अत्यधिक विषम परिस्थिति से भी हार नहीं मानता. और अंत में, इतना सब कुछ करने के बावजूद, यदि फिर भी ईश्वर एवं प्रकृति नाराज़ हो जाएँ, तो मास्टर स्ट्रोक के रूप में NDA की सरकार ने “फसल बीमा योजना” भी लागू कर दी है, जिसके तहत खेत के आकार, उपज के प्रकार के आधार पर किसान को बीमे की प्रीमियम चुकानी होगी, लेकिन कम से कम उसकी मूल पूँजी सुरक्षित रहेगी. अर्थात ग्रामीण अर्थव्यवस्था का “शेर” अभी गरज भले ही न रहा हो, लेकिन उसने अंगड़ाई लेना शुरू कर दिया है. 

अधिक लंबा न खींचते हुए संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि पहले दो साल मोदी ने विदेश संबंधों, रक्षा उपकरणों, राजमार्गों एवं बिजली पर गंभीरता से काम किया... अब संभवतः अगले दो वर्ष नरेंद्र मोदी ग्रामीण विकास, कृषि अर्थव्यवस्था, किसान एवं ग्रामीण मजदूर के लिए जोरदार काम करेंगे, ताकि ये लोग आर्थिक रूप से थोड़े बहुत सुदृढ़ हो सकें. उसके बाद अंतिम वर्ष (अर्थात लोकसभा चुनावी वर्ष 2019) में नरेंद्र मोदी अपनी जेब से कौन सा जादू निकालेंगे यह अनुमान अभी से लगाना मुश्किल है... परन्तु इतना तो तय है कि जिस तरह 2016 के इस बजट में मोदी ने शहर छोड़कर गाँवों की तरफ रुख किया है, उसने काँग्रेस की बेचैनी बढ़ा दी है. इसके अलावा बाबा साहेब आंबेडकर से सम्बन्धित कार्यक्रमों में जिस तरह नरेंद्र मोदी अपनी उपस्थिति बढ़ा रहे हैं, आरक्षण के प्रति अपनी जोरदार प्रतिबद्धता दर्शा रहे हैं, उसके कारण अन्य छोटे दलों में भी बेचैनी है. स्वाभाविक है कि इस बजट में आलोचना के अधिक बिंदु नहीं मिलने के कारण ही विपक्ष द्वारा रोहित वेमुला और कन्हैया जैसे “पानी के बुलबुले” पैदा किए जा रहे हैं. लेकिन भाजपा के लिए असली चुनौती विपक्ष की तरफ से नहीं, बल्कि खुद भाजपा के “आलसी” सांसदों की तरफ से है. सरकार के विकास कार्यों, रक्षा संबंधी तैयारियों, सड़कों एवं बिजली के शानदार कार्यों को भाजपा के सांसद और राज्य सरकारें नीचे मतदाता तक ठीक से पहुँचा नहीं पा रहीं. उत्तरप्रदेश से भाजपा को सर्वाधिक सांसद मिले, लेकिन अधिकाँश सांसद नरेंद्र मोदी के नाम और जादू की आस में हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं, ना जमीन पर कोई संघर्ष दिखाई देता है और ना ही सक्रियता. नरेंद्र मोदी अकेले कहाँ-कहाँ तक, और क्या-क्या करेंगे? भाजपाई सांसदों के पक्ष में कम से कम ये अच्छी बात है कि काँग्रेस की तरफ से राहुल गाँधी मोर्चा संभाले हुए हैं, इसलिए मुकाबला आसान है, परन्तु राज्यों में यह स्थिति नहीं है, इसीलिए भाजपा को आगामी वर्ष के तमाम विधानसभा चुनावों जैसे असम, बंगाल, उत्तरप्रदेश, केरल, तमिलनाडु में अच्छा-ख़ासा संघर्ष करना पड़ेगा. विश्लेषकों के अनुसार असम छोड़कर बाकी चारों राज्यों में भाजपा पहले से ही मुकाबले में कहीं नहीं है, इसलिए वहाँ की हार-जीत से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन वास्तविकता तो यही है कि विपक्ष को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि मोदी का जादू खत्म हो गया है... और इसीलिए नरेंद्र मोदी ने समय से पहले ही किसानों एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का पाँसा फेंक दिया है, ताकि जब 2019 के लोकसभा चुनावों का समय आए, तब तक किसान-मजदूर की जेब में कुछ पैसा आ जाए और वोट देते समय वह काँग्रेस के बहकावे में ना आए... और हाँ!!! यदि नेशनल हेरल्ड और इशरत जहाँ जैसे मामलों को छोड़ भी दें, तब भी 2019 तक मध्यम वर्ग को लुभाने के लिए कोई न कोई “नया पैंतरा” आ ही जाएगा... काँग्रेस मुक्त भारत का दूसरा चरण आरम्भ हो चुका है... और पिछले पचास वर्ष के लोकतांत्रिक इतिहास को देखते हुए यह बात हम बिहार-उत्तरप्रदेश-तमिलनाडु-बंगाल-गुजरात-मध्यप्रदेश जैसे कई राज्यों में देख चुके हैं कि यदि काँग्रेस लगातार दस-पन्द्रह वर्ष तक सत्ता से बाहर रहे, तो वह पूरी तरह खत्म हो जाती है. आशा है कि काँग्रेस के खाँटी और घाघ नेता, राहुल बाबा के साथ जुड़े अपने भविष्य पर पुनः चिंतन-मनन करेंगे और मुँह खोलने की हिम्मत करेंगे... वर्ना खेती-सड़क और बिजली के जरिये नरेंद्र मोदी काँग्रेस के लंबे “बुरे दिनों” का इंतजाम करने के मूड में दिखाई दे रहे हैं. 

Saturday, March 19, 2016

Online Shopping Made Easy By this Start-up



ऑनलाइन खरीदी हेतु ग्राहक की समझ और विकल्प बढ़ाने वाली स्टार्ट-अप...


आधुनिक युग “ऑनलाइन” का युग है. प्रत्येक बच्चे-किशोर-युवा के हाथों में मोबाईल हैं, जिनके जरिये आज की नई पीढ़ी अपने बहुत से आवश्यक कार्य तेजी से निपटाती है. स्वाभाविक है कि आजकल समय की कमी के कारण, तथा ऑनलाइन खरीदी में ढेरों विकल्प मौजूद होने के कारण युवा पीढ़ी तेजी से इसी पद्धति की तरफ जा रही है. एक अनुमान के अनुसार सन 2020 तक भारत में ऑनलाइन शॉपिंग का बाज़ार लगभग सौ बिलियन डॉलर का हो जाएगा. ऑनलाइन शॉपिंग के क्षेत्र में कई स्थापित एवं जानी-मानी कम्पनियाँ बड़ी खिलाड़ी हैं, जिनकी वेबसाईटों से रोज़ाना लाखों भारतीय क्रय-विक्रय कर रहे हैं. चूँकि इस प्रतिद्वंद्वी बाज़ार में कई कम्पनियाँ हैं, इसलिए ग्राहक के सामने कई बार अच्छे, टिकाऊ एवं उचित दामों वाले उत्पाद की पहचान करके उन्हें छाँटना, ग्राहक की जेब, समय एवं पहुँच के अनुकूल उत्पाद को चुनना एक बेहद थकाऊ काम है. 

यदि हम मोबाईल का ही उदाहरण देखें, तो जब भी हमें कोई नया मोबाईल ऑनलाइन खरीदना हो, तो सबसे पहले हम Amazon, Flipkart, SnapDeal, PayTM जैसी कई वेबसाईटों को खंगालना शुरू करते हैं. अपनी पसंद का, मॉडल का, कम्पनी का, अपनी क्रय रेंज का, अपने दोस्तों से बेहतर चुनकर दिखाने का एक बेहद दुरूह कार्य आरम्भ होता है. विभिन्न वेबसाईटों के चक्कर लगाते-लगाते, उनके रेट्स एवं फीचर्स की तुलना करते-करते ग्राहक का दिमाग बुरी तरह पक जाता है, और इतना करने पर भी कोई जरूरी नहीं है कि “उपलब्ध उत्पादों में सबसे बेहतर” की तलाश पूरी हो ही जाए. ऐसा अनुभव सिर्फ मोबाईल ही नहीं, कपड़े, जूते, अन्य इलेक्ट्रॉनिक वस्तु अथवा सेवा के बारे में भी होता है, जब ग्राहक “सही उत्पाद” की तलाश करते-करते साईट-दर-साईट भटकते हुए बुरी तरह त्रस्त हो जाता है. 

इस समस्या का एक नवोन्मेषी एवं शानदार आईडिया लेकर आई है www.ReadyViews.com नाम की स्टार्ट-अप.. इस कम्पनी की वेबसाईट आपको “सबसे बेहतर” चुनने में मदद करती है, और इस चुनाव की प्रक्रिया गणितीय होते हुए भी ग्राहक के लिए बेहद सरल और सटीक रखी गई है, ताकि ग्राहक को वही मिले जो सबसे उत्तम हो. आईये संक्षेप में देखते हैं कि आखिर इस का नवोन्मेषी विचार क्या है और यह कैसे काम करती है. सामान्यतः हम भारतीय लोग “माउथ पब्लिसिटी” पर अधिक भरोसा करते हैं, अर्थात किसी उत्पाद या वस्तु अथवा सेवाप्रदाता के बारे में “लोग क्या कहते हैं”, इस बात को हम ध्यान से देखते-सुनते-पढ़ते हैं. यदि हमारा कोई मित्र हमें कहता है कि फलाँ मोबाईल बहुत शानदार है, अथवा हमारा कोई परिचित कहता है कि उस सेवाप्रदाता की सेवाएँ बहुत ही बेहतरीन हैं तो हम सरलता से मान जाते हैं और उस मोबाईल अथवा उत्पाद की तरफ आकर्षित हो जाते हैं, तथा उसके बारे में हमारी सकारात्मक राय पहले ही बन जाती है. तो हम लोग जब भी कोई वस्तु खरीदने निकलते हैं अथवा किसी सेवा का लाभ लेने के बारे में सोचते हैं तो सबसे पहले हम यह देखना चाहते हैं कि “लोग उसके बारे में क्या कह रहे हैं?” क्या मेरे दोस्त को फलाँ कम्पनी की वॉशिंग मशीन अच्छी लगी?? क्या मेरे रिश्तेदार के यहाँ फलाँ कम्पनी का फ्रिज इतने वर्षों बाद भी ठीक चल रहा है?? इस प्रकार किसी भी उत्पाद को खरीदने के सम्बन्ध में हमारी प्राथमिक समझ तथा लगभग 70% दृढ़ विचार इसी पद्धति से बनता है. इसलिए जब भी हम किसी वेबसाइट से ऑनलाइन खरीदी करने निकलते हैं तो वहाँ पर हम उस “प्रोडक्ट” को लेकर हमसे पहले के खरीदारों की प्रतिक्रियाएँ एवं विचार पढ़ते हैं. मोबाईल खरीदने से पहले हम इन सभी वेबसाईटों पर आने वाली ढेरों प्रतिक्रियाओं एवं तमाम विरोधी विचारों को एक साथ पढ़कर अपना मन बनाने की कोशिश करते हैं. परन्तु जैसा कि मैंने ऊपर कहा कि चूँकि कई-कई वेबसाईट हैं, कई प्रकार के उत्पाद हैं, विभिन्न उत्पादों के बीच ढेर सारे मानकों की तुलना करना एक बेहद थकाऊ और कठिन काम है. Readyviews.com यहीं आकर आपकी सहायता करती है. यह वेबसाईट आपके द्वारा इच्छित प्रोडक्ट के बारे में ढेरों वेबसाईटों पर उपलब्ध उपभोक्ता प्रतिक्रियाओं एवं विचारों को एकत्रित करके उस विशाल डाटाबेस का विवेचन करते हुए औसत निकालकर आपको बताती है कि आप जिस प्रोडक्ट के बारे में जानना-समझना और पसंद करना चाहते हैं, उस प्रोडक्ट के बारे में उन तमाम वेबसाईटों पर कितना सकारात्मक और कितना नकारात्मक लिखा अथवा कहा गया है... यह वेबसाईट आपको विश्लेषण करके बताती है कि आप जो खरीदना चाहते हैं, अथवा जो सेवा चाहते हैं, उपभोक्ता उस सेवा के बारे में क्या-क्या अच्छा-बुरा कहते हैं. आजकल लगभग सभी वेबसाईट्स पर “रेटिंग” की सुविधा भी दी जाती है, अधिकाँश ग्राहक कमेन्ट करने से बचते हैं तो वे चुपके से उस प्रोडक्ट के बारे में अपने अनुभवों के अनुसार एक स्टार, तीन स्टार या पाँच स्टार की रेटिंग दे देते हैं. Readyviews.com इन रेटिंग का भी विश्लेषण करती है, ताकि आपको एकदम सटीक जानकारी मिले और किसी उत्पाद को खरीदने से पहले उसके बारे में आप पूरा जान लें और ठगे न जाएँ. 

www.readyviews.com

इस वेबसाईट की कार्यपद्धति ऊपर दिए गए चित्र से स्पष्ट हो जाती है, जिसमें उदाहरण के रूप में हमने मोबाईल खरीदी संबंधी जानकारी चाही है.. – अब जैसा कि आप देख रहे हैं, पहले तो यह वेबसाइट विभिन्न शॉपिंग वेबसाइटों से “आधिकारिक” उपभोक्ताओं द्वारा दिए गए विचारों, प्रतिक्रियाओं को एकत्रित करती है. फिर उसके बाद उस प्रोडक्ट (अर्थात मोबाईल) के विभिन्न गुणधर्म (फीचर्स) के आधार पर उसके तीन भाग करती है , अर्थात मोबाईल की आवाज़, उसकी बैटरी एवं उसका कैमरा. फिर इन तीनों वर्गीकरणों को एक बार पुनः विश्लेषित किया जाता है और आपके सामने पेश किया जाता है, कि जिस उत्पाद के बारे में आपने जानना चाहा था, उसके बारे में लोगों की राय क्या-क्या हैं? तमाम वेबसाइटों पर संतुष्ट (या असंतुष्ट) ग्राहक उस मोबाईल की बैटरी, कैमरे एवं साउंड के बारे में कितने प्रतिशत की और कैसी राय रखते हैं. यह वेबसाईट उस प्रोडक्ट के विभिन्न फीचर्स के बारे में दूसरे संतुष्ट अथवा असंतुष्ट उपभोक्ताओं की “अच्छी", “बुरी" अथवा “तटस्थ" राय स्पष्ट रूप से बताती है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि आप ढेरों वेबसाईटों के चक्कर लगाने से बच जाते हैं, आपके समय की बचत भी होती है और सबसे बड़ी बात यह कि आप उस प्रोडक्ट को जानने के लिए अपना अत्यधिक दिमाग खपाने से भी बच जाते हैं, और तत्काल इस निर्णय पर पहुँच जाते हैं कि आपको यह उत्पाद खरीदना है या नहीं. शुरुआत में फिलहाल यह वेबसाईट सिर्फ डिजिटल उत्पादों, जैसे मोबाईल, पेन ड्राईव, पावर बैंक, टीवी, कंप्यूटर, लैपटॉप के बारे में अपनी सेवाएँ दे रही है, परन्तु जल्दी ही इसमें कई अन्य प्रोडक्ट्स एवं सेवाएँ जोड़ी जाएँगी. 

एक ही स्थान पर उपभोक्ताओं को शिक्षित एवं जानकारियों से लैस करने संबंधी अभी तक ऐसा विचार किसी भी कम्पनी के दिमाग में नहीं आया था. लेकिन भीलवाड़ा (राजस्थान) के युवा उद्यमी श्याम राठौर ने अपनी प्रतिभाशाली टीम के साथ शुरू की गई “स्टार्ट-अप” सॉफ्टवेयर कम्पनी www.ReadyViews.com में इस नवोन्मेषी आईडिया पर काम किया और उन्हें सफलता भी मिलने लगी है. 27 सितम्बर 2015 को अमेरिका में सम्पन्न Indo-US StartupConnect कार्यक्रम में भी “नैसकॉम” ने श्याम राठौर जी के इस नवोन्मेषी आईडिया को सराहा तथा मोदी जी ने अपने डिजिटल इण्डिया कार्यक्रम के तहत इनके स्टार्ट-अप को शुभकामनाएँ प्रदान कीं. 


अतः कोई भी प्रोडक्ट खरीदने से पहले यदि आप अपना समय, ऊर्जा एवं माथापच्ची बचाना चाहते हैं तो सीधे इस वेबसाइट पर पहुँचिये, जहाँ बड़े आराम से एक क्लिक पर आपको उस उत्पाद से सम्बन्धित तमाम जानकारियाँ बाकायदा छन-छनकर ठोस एवं विश्वसनीय स्वरूप तथा बाकायदा ग्राफिक्स में प्राप्त होंगी.