Monday, July 18, 2016

Communist, Atheists - A Fraud


वामपंथी नास्तिकता : झूठ और धूर्तता 

(आशीष छारी जी की फेसबुक पोस्ट से साभार) 

कुछ दिन पहले जावेद अख्तर बड़े फकर से कह रहे थे कि वे एथीस्ट हैं, एथीस्ट मने नास्तिक....... बतला रहे थे कि जवान होते होते वे एथीस्ट हो गए थे, वे किसी अल्लाह को नहीं मानते, कभी रोज़ा नहीं रखा, मस्जिद नहीं गए नमाज़ नहीं पढ़े...... टोटल एथीस्ट....,,., लेकिन जब भी मैं इनकी दीवार फ़िल्म देखता हूँ तो चक्कर खा जाता हूँ, शक होता है कि ये एथीस्ट झूठ तो नहीं बोल रहा कहीं....... फ़िल्म देखिये, फ़िल्म में क्या दिखाया है कि वर्मा जी का लौंडा विजय (अमिताभ बच्चन) बचपन से ही भगवान से रूठ जाता है, मंदिर नहीं जाता, अपनी माँ सुमित्रा (निरुपमा रॉय) के कहने पर भी मंदिर की सीढ़ी नहीं चढ़ता...... जोर जबरदस्ती करने पर मंदिर का पुजारी टोक देता है, नहीं बहन भगवान् की पूजा जोर जबरदस्ती से नहीं होती श्रद्धा से होती जब इसके दिल में श्रद्धा जागेगी तब ये खुद ही मंदिर आ जाएगा....... वाह कितनी प्यारी बात कहीं पुजारी ने, खैर अच्छा था कि जगह मंदिर थी और सामने पुजारी था, कहीं मस्जिद होती और सामने मौलवी साहब होते तो पक्का फतवा जारी हो जाता...... ला हॉल विला कूवत इल्ला बिल्ला अल्लाह की तौहीन की है इस लौंडे ने, दीन को मानने से मना किया है इसने, ये काफ़िर हो चुका है, काफिरों के लिए मुताबिक ए दीन बस एक ही सजा है..... मुरतीद मुरतीद..... मने सर कलम कर फुटबॉल खेली जाए........ हुक्म की तालीम हो...... हेहेहे..... 


खैर छोड़िये, पिछली बात पे वापस आते हैं, तो मामला ये है कि पूरी फ़िल्म में विजय भगवान से छत्तीस का आंकड़ा बना कर चलता है, जताया कुछ यूँ गया है कि फ़िल्म का नायक भगवान् को नहीं मानता और मंदिर नहीं जाता......... मने एथीस्ट हो चुका है पर जब डॉकयार्ड पर काम करने वाले रहीम चच्चा विजय को उसकी बांह पर बंधे 786 नंबर के लॉकेट के बारे में इल्म देते हैं, कि बेटा 786 का मतलब होता है बिस्मिल्लाह, इसे हम लोगों में बड़ा मुबारक समझा जाता है......... सामन्त के आदमी की चलाई गोली जब विजय को लगती है, और बिल्ले की वजह से विजय बच जाता है तब विजय को इल्हाम होता है कि 786 नंबर तो बड़ा पावरफुल है तब वो बिल्ले को बार बार चूमता है और हमेशा अपने पास सीने से लगा कर रखता है और चूमता रहता है मने एक एथीस्ट को बिस्मिल्लाह में तो विश्वास है लेकिन भगवान में नहीं............. 

सियापे की हद तो देखिये जब विजय की माँ बीमार होती है, जिंदगी और मौत से जूझ रही होती है तब विजय को मंदिर की याद आती है अल्लाह मियाँ फ्रेम से ग़ायब हो जाते हैं...... मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ विजय भगवान् के सामने खड़ा है और कहता है- मैं आज तक तेरी सीढ़ियाँ नहीं चढ़ा...... अब कोई पूछे कि bc अब क्यों चढ़ा बे........ मैंने आज तक तुझसे कुछ नहीं माँगा....... तो अब क्यों मांग रहा है भो%* के............ बताओ भला अब ये क्या बात हुयी यार, वैसे एथीस्ट हैं, मंदिर की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ेंगे पर बिस्मिल्लाह (786) को चूमेंगे दिन में दस बार, छाती से चिपका कर रखेंगे और कहीं कुछ गलत हो जाए तो भगवान् की ऐसी-तैसी करेंगे, शुरू हो जाएंगे भगवन को हूल-पट्टी देने....... 


जावेद अख्तर साहब कहते हैं कि वे शुरू से एथीस्ट रहे हैं लेकिन फ़िल्म की कहानी लिखते समय इस्लाम की ओर झुक जाते हैं, उनका नायक एथीस्ट है, भगवान को नहीं मानता लेकिन अल्लाह और 786 को पूरी शिद्दत से मानता है, ये कैसा एथिस्टपना हुआ........ ये तो बिलकुल वैसा ही हुआ जैसे उमर खालिद की बहन कहती है कि उसका भाई किसी इस्लाम को नहीं मानता लेकिन नारे वो JNU में इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह के लगवाता है और पूरी शिद्दत से अपनी कौम के प्रति पूरी निष्ठा निभाते हुए हर मुस्लिम की तरह दूसरे मुस्लिम (अफज़ल गुरु) के प्रति पूरी वफादारी रखता है............ पिताजी जब ज़िंदा थे तो वे बताते थे कि जब ये फ़िल्म दीवार आई थी तब बहुत से लौंडे खुद को अमिताभ बच्चन समझकर मंदिर की सीढ़ियों पर मुंह फुलाये बैठे देखे जाते थे, मेले ठेलों से 786 के लॉकेट और बिल्ले खरीदकर अपनी चौड़े कॉलर की नीली शर्ट की ऊपरी जेब जो दिल के पास होती है उसमें खूब रखते देखे जाते थे......... खैर मैं फ़िल्में बहुत देखता हूँ और फिल्मों में अक्सर देखता है कि फ़िल्म का हिन्दू नायक भगवान में विश्वास नहीं रखता, मंदिर की सीढ़ी नहीं चढ़ता, प्रसाद नहीं खाता वगैरह वगैरह लेकिन आज तक किसी मुस्लिम या ईसाई नायक को अल्लाह या गॉड की खिलाफत करते नहीं देखा......... मस्जिद या गिरजे की सीढ़ियों पर बैठे नहीं देखा...... अल्लाह या गॉड से मुंह फुलाये नहीं बल्कि अपने मजहब के प्रति पूरी निष्ठा रखते जरूर देखा है....... दिखाया जाता है कि फ़िल्म के मुस्लिम या ईसाई नायक का अपने रिलिजन में पूरा पूरा फेथ रखता है बस असली गड़बड़ तो हीरो को भगवान् से है........ ये फिल्मों का ही असर है कि जब मैंने कई सुतियों को खुद को किसी फ़िल्मी नायक की तरह आज भी भगवान से मुंह फुलाये मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे देखा है....... 

एथीस्ट होना तो जैसे आजकल फैशन हो गया है वैसे ही जैसे JNU में हो गया है..... मैं फ़िल्मी एथीस्ट और JNU छाप एथीस्ट में बहुत समानता पाता हूँ........ फ़िल्मी एथीस्ट की लड़ाई सिर्फ भगवान से है बाकी अल्लाह और गॉड से उसे कोई दिक्कत नहीं, ठीक ऐसे ही JNU छाप एथीस्ट भी भगवान् के पीछे लठ्ठ लिए फिरते हैं....... देवी दुर्गा एक हिन्दू मिथक है लेकिन महिषासुर वास्तविकता है, माँ दुर्गा की पूजा करना अन्धविश्वास है लेकिन महिषासुर को पूजना आधुनिकता है......... राम राम बोलना कट्टरता है लेकिन इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह बोलना धार्मिकता है, दिवाली होली मनाना बुजुरुआ बोडमता का प्रतीक है लेकिन ईद और क्रिसमस मनाना साम्यवादिता का लोगो है, JNU कम्युनिस्ट कहते हैं कि वे एथीस्ट हैं धर्म उनके लिए अफीम है लेकिन उनका एथीसिस्म इस्लाम और ईसाईयत को रसगुल्ला समझता है और हिंदुत्व को अफीम, गांजा, चरस, कोकीन, हेरोइन......... सारी हूल-पट्टी भगवान् के लिए रख जोड़ी हैं बाकी अल्लाह या गॉड के लिए चूमा चाटी का इल्हाम है, बड़ा अजीब एथीसिस्म है यार इनका....... 

मैंने दुनिया में कई एथीस्ट ऐसे देखे हैं जिनका एथीस्टपना सभी मजहब के लिए बराबर होता है, वे जिनती ईमानदारी से दूसरे धर्म की कमियां निकालते हैं उससे अधिक ईमानदारी दिखाते हुए वे अपने धर्म की बखिया उधेड़ देते हैं लेकिन JNU में एथीस्ट होने के मायने थोड़ा अलग है बिकुल दीवार फ़िल्म के नायक के जैसे........... भगवान् से रूठकर मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ जाइए लेकिन जैसे ही 786 का बिल्ला मिले तो उसको चुमिये, माथे से लगाइये........ 

दरअसल JNU ही नहीं पूरे देश में एथीस्ट होने का मतलब है सिर्फ और सिर्फ हिन्दुज्म का आलोचक होना है गोया हिन्दुज्म न हुआ एथीस्टों की प्रेक्टिस के लिए पंचिंग बेग हो गया.........

(मूल लेखक - आशीष छारी)

Thursday, July 7, 2016

Demand for Seprarate Namaz Room in School : Secularism Flourished in Bengal



स्कूल में नमाज के लिए अलग कमरे की माँग... :- पश्चिम बंगाल में फलता-फूलता सेकुलरिज़्म...
 


बंगाल में हावड़ा से पच्चीस मिनट की दूरी पर स्थित कटवा पहुँचने के लिए बस एवं रेलसेवा दोनों उपलब्ध हैं. कटवा के पास ही स्थित है बांकापासी, जो कि बर्दवान जिले के मंगलकोट विकासखंड में आता है. इस बांकापासी कस्बे में एक स्कूल है जिसका नाम है बांकापासी शारदा स्मृति हाईस्कूल. इस स्कूल में प्रायमरी, सेकंडरी और हायर सेकंडरी की कक्षाएँ लगती हैं. यह स्कूल हिन्दू बहुल बस्ती में पड़ता है. स्कूल के 70% छात्र हिन्दू और 30% छात्र मुस्लिम हैं जो कि पास के गाँवों दुरमुट, मुरुलिया इत्यादि से आते हैं. स्कूल का मुख्य द्वार दो शेरों एवं हंस पर विराजमान वीणावादिनी सरस्वती की मूर्ति से सजा हुआ है. 

पिछले पखवाड़े के रविवार को स्कूल में पूर्ण शान्ति थी, परन्तु स्कूल के प्रिंसिपल डॉक्टर पीयूषकान्ति दान अपना पेंडिंग कार्य निपटाने के लिए स्कूल आए हुए थे. अचानक उन्हें भान हुआ कि स्कूल की दीवार के अंदर कोई हलचल हुई है, तो वे तत्काल अपने कमरे से बाहर निकलकर स्कूल के हरे-भरे लॉन में पहुँचे, परन्तु वहाँ कोई नहीं था. असल में प्रिंसिपल पीयूषकांत दान नहीं चाहते थे कि शुक्रवार के दिन स्कूल में हो हुआ, उसकी पुनरावृत्ति हो. असल में स्कूल में पढ़ने वाले 30% मुस्लिम लड़कों ने स्कूल में नमाज पढ़ने के लिए एक अलग विशेष कमरे की माँग करते हुए जमकर हंगामा किया था. 


२४ जून २०१६ को कुछ मुसलमान छात्रों ने अचानक दोपहर को अपनी कक्षाएँ छोड़कर स्कूल के लॉन में एकत्रित होकर नमाज पढ़ना शुरू कर दिया था, जबकि उधर हिन्दू छात्रों की कक्षाएँ चल रही थीं. चूँकि उस समय यह अचानक हुआ और नमाजियों की संख्या कम थी इसलिए स्कूल प्रशासन ने इसे यह सोचकर नज़रंदाज़ कर दिया कि रमजान माह चल रहा है तो अपवाद स्वरूप ऐसा हुआ होगा. लेकिन नहीं... २५ जून यानी शनिवार को पुनः मुस्लिम छात्रों का हुजूम उमड़ पड़ा, प्रिंसिपल के दफ्तर के सामने एकत्रित होकर “नारा-ए-तकबीर, अल्ला-हो-अकबर” के नारे लगाए जाने लगे. कुछ छात्र प्रिंसिपल के कमरे में घुसे और उन्होंने माँग की, कि उन्हें जल्दी से जल्दी स्कूल परिसर के अंदर पूरे वर्ष भर नमाज पढ़ने के लिए एक विशेष कमरा आवंटित किया जाए. इन्हीं में से कुछ छात्रों के माँग थी कि प्रातःकालीन सरस्वती पूजा पर भी रोक लगाई जाए. इन जेहादी मानसिकता वाले “कथित छात्रों” ने प्रिंसिपल को एक घंटे तक उनके कमरे में बंधक बनाकर रखा. 

प्रिंसिपल ने स्कूल की प्रबंध कमेटी के सदस्यों से संपर्क किया, जिसने मामले को सुलझाने के लिए आगे पुलिस से संपर्क किया. पुलिस ने आकर माहौल को ठण्डा किया, परन्तु यह सिर्फ तात्कालिक उपाय था. जब पूरे घटनाक्रम की खबर हिन्दू लड़कों को लगी, तो सभी शाम को बाज़ार हिन्दू मिलन मंदिर और कैचार हिन्दू मिलन मंदिर में मिले और एक बैठक की. इस बैठक में निर्णय लिया गया कि मुसलमान छात्रों की इस गुंडागर्दी और नाजायज़ माँग का पुरज़ोर विरोध किया जाएगा. अगले दिन सुबह हिन्दू छात्रों ने एकत्रित होकर प्रिंसिपल से यह माँग की, कि यदि मुस्लिम छात्रों को नमाज़ के लिए अलग कमरा दिया गया तो उन्हें भी “हरिनाम संकीर्तन” करने के लिए एक अलग कमरा दिया जाए. हिन्दू-मुस्लिम छात्रों के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए कैछार पुलिस चौकी से पुलिस आई और दोनों गुटों को अलग-अलग किया. 

जब हिन्दू छात्रों की ऐसी एकता की खबर फ़ैली तो प्रबंध कमेटी के ही एक मुस्लिम सदस्य उज्जल शेख ने घोषणा की, कि ना तो मुसलमानों को नमाज के लिए कोई अलग कमरा मिलेगा और ना ही हिंदुओं को संकीर्तन के लिए. प्रतिदिन स्कूल आरम्भ होने से पहले जो सरस्वती पूजा आयोजित होती है वह नियमित रहेगी. मामले की गहराई से जाँच-पड़ताल करने पर बांकापासी, पिंदिरा, लक्ष्मीपुर, बेलग्राम, कुल्सुना, दुर्मुट सहित आसपास के गाँवों में रह रहे हिंदुओं ने बताया कि जब से कट्टर मुस्लिम नेता TMC के सिद्दीकुल्लाह चौधरी इस विधानसभा सीट से जीते हैं, तभी से मुस्लिम धार्मिक और अतिवादी गतिविधियों में बढ़ोतरी हुई है. ममता बनर्जी की मुस्लिम-परस्त नीतियों और तुष्टिकरण से इलाके के मुसलमानों के हौसले बुलंद हो चले हैं, इसीलिए स्कूल में 30% होने के बावजूद उन्होंने इतना हंगामा कर डाला. 


ज्ञात हो कि सिद्दीकुल्लाह चौधरी अभी भी जमात-ए-उलेमा-हिन्द के कई समूहों का गुप्त रूप से संचालन करता है ताकि उसकी राजनैतिक शक्ति बनी रहे. सिद्दीकुल्लाह तृणमूल काँग्रेस में इसीलिए गया, ताकि वह अपनी सत्ता बरकरार रख सके. चौधरी द्वारा संचालित समूह “एक घंटे में कुरआन” नामक छोटे-छोटे समूह चलाता है, जिसमें इलाके के मुस्लिम छात्रों का ब्रेनवॉश किया जाता है. इस कार्य के लिए सिद्दीकुल्लाह को तबलीगी जमातों से चंदा भी मिलता है. चौधरी के निकट संबंधी हैं, बदरुद्दीन अजमल, जो कि असम में अपने ज़हरीले भाषणों के लिए जाने जाते हैं. 

हालाँकि फिलहाल बांकापासी हाईस्कूल में स्थिति तनावपूर्ण किन्तु नियंत्रण में बनी हुई है, परन्तु इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि मुस्लिम छात्रों का कोई और उग्र समूह, किसी और स्कूल में घुसकर सरस्वती पूजा पर प्रतिबन्ध एवं नमाज के लिए अलग विशेष कमरे की माँग न करने लगे. क्योंकि बंगाल के कुछ इलाकों के स्कूलों में यह माँग उठने लगी है कि मुस्लिम बच्चों को मध्यान्ह भोजन में गौमांस अथवा हलाल मीट दिया जाए, भले ही वहाँ हिन्दू बच्चे भी साथ में पढ़ रहे हों. मुमताज़ बानो, उर्फ ममता बनर्जी के शासन में बंगाल के प्रशासन का जिस तेजी से साम्प्रदायिकीकरण हो रहा है, उसे देखते हुए “मिशन मुस्लिम बांग्ला” का दिन दूर भी नहीं लगता. 

तो फिर इलाज क्या है??? इलाज है ये... जो दिल्ली के सुन्दर नगरी में हनुमान मंदिर में हिंदुओं ने किया... इसे पढ़िए और सोचिये कि क्या किया जाना चाहिए... 


Tuesday, July 5, 2016

Love for Outsiders and Ideological Distance : New Avatar of BJP


गैरों पे करम और विचारधारा से भटकाव – भाजपा का नया अवतार

हाल ही में जब उड़ीसा के पूर्व मुख्यमंत्री एवं धुर काँग्रेसी सांसद गिरधर गमांग को भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्त्व ने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल किया तो सुदूर कहीं जमीन पर बैठे भाजपा के लाखों कार्यकर्ताओं के दिल के ज़ख्मों से घाव पुनः रिसने लगा. यह ज़ख्म था 1999 में अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार के एक वोट से गिरने का कभी ना भूलने वाला घाव. कड़े जमीनी संघर्षों और कार्यकर्ताओं की अथक मेहनत से अटल जी की वह सरकार सत्ता में आई थी, जिसे संसद में इन्हीं गिरधर गमांग महोदय ने बड़ी दादागिरी से अपने एक “अवैध वोट” द्वारा गिरा दिया था. जब पिछले माह गिरधर गमांग भाजपा नेताओं के साथ मुस्कुरा रहे थे, उस समय इन कार्यकर्ताओं की आँखों के सामने अटल जी का मायूस चेहरा घूम गया. दुर्भाग्य की बात यह है कि गिरधर गमांग ठीक एक वर्ष पहले ही भाजपा में शामिल हुए थे, और उन्होंने भाजपा की विचारधारा अथवा उड़ीसा में पार्टी की उन्नति के लिए ऐसा कोई तीर नहीं मारा था, कि उन्हें सीधे कार्यसमिति सदस्य के रूप में पुरस्कृत कर दिया जाए, परन्तु ऐसा हुआ.... 

राजस्थान के मारवाड़ में एक कहावत है -- "मरण में मेड़तिया और राजकरण में जोधा". इसका अर्थ होता है :- मरने के लिए तो मेड़तिया और राजतिलक के लिए जोधा राठौड़, अर्थात जब युद्ध होता है, तब लड़ने और बलिदान के लिए मेड़तिया आगे किये जाते हैं, लेकिन जब राजतिलक का समय आता है तो जोधा राठौड़ों को अवसर मिलता है. यह कहावत और इसका अर्थ देने की आवश्यकता इसलिए महसूस हुई क्योंकि आजकल भारतीय जनता पार्टी एक नए “अवतार” में नज़र आ रही है. यह अवतार है “गैरों पे करम” वाला. पुरानी फिल्म “आँखें” पाठकों ने देखी ही होगी, उसमें माला सिन्हा पर यह प्रसिद्ध गीत फिल्माया गया था, “गैरों पे करम, अपनों पे सितम... ऐ जाने वफा ये ज़ुल्म न कर”. एक धुर संघी यानी अटलजी की सरकार को अपने वोट रूपी तमाचे से गिराने वाले धुर काँग्रेसी गिरधर गमांग का ऐसा सम्मान इसी का उदाहरण है. शायद आधुनिक भाजपा, डाकू “वाल्मीकि” के ह्रदय परिवर्तन वाली कहानी पर ज्यादा ही भरोसा करती है, हो सकता है कि भाजपा के उच्च रणनीतिकारों का यह विचार हो, कि गिरधर गमांग को इतना सम्मान देने देने से वे ऐसे बदल जाएँगे, कि शायद एक दिन रामायण लिखने लग पड़ें, परन्तु हकीकत में ना कभी ऐसा हुआ है, और न कभी होगा. क्योंकि राजनीति स्वार्थ और लोभ का दूसरा नाम है. मूल सवाल है कि जमीनी कार्यकर्ता की भावना का क्या??  


केदारनाथ त्रासदी आज भी प्रत्येक भारतीय के दिलों में गहन पीड़ा के रूप में मौजूद है. सभी को याद होगा कि उस समय उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री हुआ करते थे बहुगुणा साहब, यानी उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवतीनंदन बहुगुणा के सुपुत्र और पूर्व काँग्रेसी प्रवक्ता रीता बहुगुणा के भाई. अर्थात पूरा का पूरा परिवार वर्षों से धुरंधर काँग्रेसी. जब केदारनाथ त्रासदी हुई थी, उस समय विजय बहुगुणा के निकम्मेपन एवं हिन्दू विरोधी रुख के कारण भाजपा एवं संघ के सभी पदाधिकारियों ने उन्हें जमकर कोसा-गरियाया था. बहुगुणा के कुशासन एवं भूमाफिया के लालची जाल में फँसे केदारनाथ की इस भीषण त्रासदी को गंभीरता से नहीं लेने की वजह से हजारों हिन्दू काल-कवलित हो गए, और कई माह तक हजारों लाशें या तो गायब रहीं अथवा बर्फ व पहाड़ों में दबी रहीं. उत्तराखण्ड के सभी भाजपा नेताओं ने विजय बहुगुणा को “हिन्दू-द्रोही” ठहराया था. हाल ही में उत्तराखण्ड की हरीश रावत सरकार को अस्थिर करने के चक्कर में भाजपा के रणनीतिकारों ने वहाँ विधायकों को लेकर एक गैरजरूरी “स्टंट” किया, और उसमें वे औंधे मुँह गिरे. विधायकों की खरीद-फरोख्त एवं दलबदलुओं के इस स्टंट में काँग्रेस एक माहिर खिलाड़ी रही है. भाजपा ने अरुणाचल प्रदेश में यह स्टंट सफलतापूर्वक कर लिया था, इसलिए उन्होंने सोचा कि उत्तराखंड पर भी हाथ आजमा लिया जाए, परन्तु यहाँ भाजपा की दाल नहीं गली और हरीश रावत सरकार सभी बाधाओं को पार करते हुए पुनः जस-की-तस सत्तारूढ़ है और जिस लंगड़े घोड़े पर भाजपा ने भरोसे के साथ दाँव लगाया था, वह रेस में खड़ा भी न हो सका. ध्यान देने वाली बात यह है कि हरीश रावत सरकार का अब सिर्फ एक वर्ष का कार्यकाल बचा था, और जनता में सरकार की छवि गिरती जा रही थी. परन्तु विजय बहुगुणा और भाजपा की इस जुगलबंदी के कारण रावत सरकार के प्रति जनता में सहानुभूति की लहर चल पड़ी, और इस कहानी का असली मजेदार पेंच तो यह है कि वर्षों से खाँटी काँग्रेसी रहे एवं खुद भाजपा द्वारा “हिन्दू-द्रोही” घोषित किए जा चुके विजय बहुगुणा साहब भी “स-सम्मान” भाजपा की केन्द्रीय कार्यसमिति में शामिल कर लिए गए... तालियाँ, तालियाँ, तालियाँ. सवाल यह उठता है कि क्या इस कदम को भगतसिंह कोश्यारी एवं भुवनचंद्र खंडूरी के मुँह पर तमाचा माना जा सकता है?? आज तक किसी को समझ में नहीं आया कि आखिर विजय बहुगुणा को किस योग्यता के तहत यह सम्मान दिया गया? कहीं ऐसा तो नहीं कि भाजपा के रणनीतिकार यह सोचे बैठे हों कि बहुगुणा साहब उत्तराखण्ड में भाजपा को फायदा पहुँचाएंगे, भाजपा के वोटों में बढ़ोतरी करेंगे?? क्या भाजपाई आने वाले उत्तराखण्ड चुनावों में बहुगुणा को आगे रखकर चुनाव लड़ेंगे? यदि ऐसा हुआ तो इससे अधिक हास्यास्पद कुछ और नहीं होगा, परन्तु चूँकि “गैरों पे करम” करने की नीति चल पड़ी है तो जमीनी कार्यकर्ता भी क्या करे, मन मसोसकर घर बैठा है. 


भाजपा में गैरों पे करम वाला यह “ट्रेंड” लोकसभा के आम चुनावों से पहले तेजी से शुरू हुआ था. उस समय मौका देखकर काँग्रेस का जहाज छोड़कर भागने वाले कई चूहों को संसद का टिकट मिला और मोदी लहर के बलबूते वे फिर से सांसद बनने में कामयाब रहे. इनमें से कुछ काँग्रेसी तो मंत्रीपद हथियाने में भी कामयाब रहे. इसके बाद तो मानो लाईन ही लग गई. वर्षों से भाजपा के लिए मेहनत करने वाले कई वरिष्ठ कार्यकर्ताओं एवं नेताओं को दरकिनार करते हुए “बाहरियों” को न सिर्फ सम्मानित किया गया, पुरस्कृत किया गया, बल्कि उन्हीं नेताओं के सिर पर बैठा दिया गया, जिनसे वे कल तक वैचारिक और राजनैतिक लड़ाई लड़ते थे. भाजपा के कार्यकर्ताओं को बताया जा रहा है कि एमजे अकबर साहब बहुत बड़े बुद्धिजीवी हैं और पार्टी को एक अच्छा मुस्लिम चेहरा चाहिए था इसलिए उन्हें राज्यसभा सीट देकर उपकृत किया जा रहा है, परन्तु पार्टी में से किसी ने भी यह सवाल नहीं उठाया कि क्या एमजे अकबर पार्टी की विचारधारा के लिए समर्पित हैं? एक पूर्व पत्रकार के नाते गुजरात दंगों के समय अकबर साहब के लेखों को किसी ने पढ़ा होता, तो वह कभी उन्हें भाजपा में घुसने नहीं देता. लेकिन काँग्रेस मुक्त भारत करने के चक्कर में “काँग्रेस युक्त भाजपा” पर ही काम चल रहा है. एमजे अकबर का मध्यप्रदेश से कोई लेना-देना नहीं है, इसी प्रकार नजमा हेपतुल्ला का भी मध्यप्रदेश से कोई लेना-देना नहीं है, राज्यसभा में पहुँचने के बाद वे कभी मध्यप्रदेश की तरफ झाँकने भी नहीं आईं, लेकिन चूँकि भाजपा को कुछ “कॉस्मेटिक” टाईप के मुस्लिम चेहरे चाहिए इसलिए खामख्वाह किसी को भी भरे जा रहे हैं... जबकि उधर मोदी लहर के बावजूद शाहनवाज़ हुसैन बिहार में चुनाव हार गए थे. यह है भाजपा के मतदाताओं का मूड... लेकिन पार्टी इसे समझ नहीं रही और पैराशूट से कूदे हुए लोग सीधे शीर्ष पर विराजमान हुए जा रहे हैं. 


भाजपा जमीनी हकीकत से कितनी कट चुकी है और अपने संघर्षशील कार्यकर्ताओं की उपेक्षा में कितनी मगन है, इसका एक और ज्वलंत उदाहरण है महाराष्ट्र के कोल्हापुर से शिवाजी महाराज के “कथित” वंशज संभाजी राजे को भाजपा ने राज्यसभा में मनोनीत किया है. स्वयं को “छत्रपति” एवं कोल्हापुर के महान समाजसेवी कहलवाने का शौक रखने वाले ये सज्जन पहले राकांपा के टिकट पर कोल्हापुर से ही दो बार लोकसभा का चुनाव हार चुके हैं. परन्तु इनकी “खासियत”(?) सिर्फ इतनी ही नहीं है. संभाजी राजे नामक ये सज्जन महाराष्ट्र की कुख्यात “संभाजी ब्रिगेड” के एक प्रमुख कर्ताधर्ता भी हैं. राजनैतिक गलियारों में सभी जानते हैं कि संभाजी ब्रिगेड नामक यह जहरीली संस्था वास्तव में शरद पवार का जेबी संगठन है. पवार ने अपनी मराठा राजनीति चमकाने के लिए ही इस संगठन को पाला-पोसा और बड़ा किया. सोशल मीडिया पर संभाजी ब्रिगेड जो ब्राह्मण विरोधी ज़हर उगलता है वह तो अलग है ही, इसके अलावा इस संगठन के हिंसक कार्यकर्ताओं का एक बड़ा कारनामा वह था, जब इन्होंने “शिवाजी महाराज की अस्मिता” के नाम पर पुणे के भंडारकर रिसर्च इंस्टीट्यूट में तोड़फोड़ और आगज़नी की थी. कई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक पुस्तकें एवं दुर्लभ पांडुलिपियाँ इस हमले में नष्ट हो गई थीं, पवार साहब के वरदहस्त के चलते किसी का बाल भी बाँका न हुआ. कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसे धुर ब्राह्मण विरोधी एवं चुनाव हारे हुए व्यक्ति को भाजपा अपने पाले में लाकर सीधे राज्यसभा सीट का तोहफा देकर क्या हासिल करना चाहती है? क्या पश्चिम महाराष्ट्र में उत्तम मराठा नेताओं की कमी हो गई थी? क्या भाजपा में और कोई मराठा नेता नहीं हैं जो राज्यसभा के लिए उचित उम्मीदवार होते? संभाजी राजे ने हिंदुत्व एवं राष्ट्रवाद के समर्थन में ऐसा क्या कर दिया था कि उन्हें गायत्री परिवार के श्री प्रणव पंड्या द्वारा ठुकराई हुई राज्यसभा सीट पर ताबड़तोड़ मनोनीत करवा दिया गया? क्या पश्चिम महाराष्ट्र में भाजपा की कंगाली इतनी बढ़ गई है कि दो चुनाव हारने वाले व्यक्ति को वह इस क्षेत्र का तारणहार समझ बैठी है? जो संभाजी राजे शरद पवार के इशारे के बिना एक कदम भी नहीं चल पाते हैं, क्या वे “शकर बेल्ट” में भाजपा का जनाधार बढ़ाएँगे? यह तो वैसा ही हुआ जैसे उड़ीसा में वर्षों से संघर्ष कर रहे भाजपा कार्यकर्ताओं-नेताओं को दरकिनार कर, अब गिरधर गमांग साहब भाजपा को उड़ीसा में विजय दिलवाएँगे? खुशफहमी एवं अति-उत्साह की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा इसे, और यह निष्ठावान कार्यकर्ताओं की मानसिक बलि लेकर पैदा हुई है. 


सत्ता के गलियारों में अक्सर कहा जाता है कि यदि आप पार्टी के समर्पित और निष्ठावान कार्यकर्ता का ध्यान रखेंगे तो आपकी पार्टी चाहे जितने चुनाव हार जाए, वह या तो पुनः उठ खड़ी होगी अथवा उसके ये “पुरस्कृत” कार्यकर्ता-समर्थकों का झुण्ड सत्ताधारी दल को आसानी से काम नहीं करने देगा. इस सिद्धांत पर काम करने में काँग्रेस और वामपंथी पार्टियाँ सबसे आगे रही हैं. पिछले साठ वर्षों में काँग्रेस जहाँ-जहाँ और जब-जब सत्ता में रही है, उसने अपने कार्यकर्ताओं, नेताओं यहाँ तक कि अपने समर्थक अफसरों-बाबुओं को भी बाकायदा चुन-चुनकर और जमकर उपकृत किया. काँग्रेस और वामपंथ द्वारा उपकृत एवं पुरस्कृत लेखक, अभिनेता, स्तंभकार, पत्रकार, अफसर, न्यायाधीश ही उसकी असली ताकत हैं, उदाहरण “अवार्ड वापसी गिरोह का हंगामा”. जबकि भाजपा का व्यवहार इसके ठीक उलट है. जब भी और जिन राज्यों में भी भाजपा की सरकारें आती हैं अचानक उन्हें नैतिकता और ईमानदारी का बुखार चढ़ने लगता है. समस्या यह है कि यह बुखार वास्तविक नहीं होता है. नैतिकता, ईमानदारी के बौद्धिक लेक्चर सिर्फ निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को ही पिलाए जाते हैं, जबकि सत्ता की ऊपरी मलाईदार परत पर बिचौलियों, पूर्व कांग्रेसियों एवं नौसिखिए परन्तु “भूखे” भाजपाईयों तथा उनके प्यारे ठेकेदारों का कब्ज़ा हो जाता है. मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि भाजपा के थिंक टैंक या उच्च स्तरीय नेता इस बात का जवाब कभी नहीं दे पाएँगे कि जगदम्बिका पाल जैसे व्यक्ति को भाजपा द्वारा पुरस्कृत करने से भाजपा के उत्तरप्रदेश में कितने प्रतिशत वोट बढ़े... या बिहार में ऐन चुनावों से पहले साबिर अली को भाजपा में शामिल करके कितने प्रतिशत मुस्लिम प्रभावित हुए?? क्या साबिर अली अथवा जगदम्बिका पाल जैसे लोग भाजपा को उनके राज्यों में आगे बढ़ाने में मदद करेंगे? क्या ये भाजपा की विचारधारा के करीब हैं? यदि नहीं, तो फिर जमीनी और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करते हुए ऐसे पैराशूट छाप नेताओं को भाजपा मान-सम्मान क्यों दे रही है, यह समझ से परे है. 

कांग्रेस द्वारा तिरस्कृत व्यक्तियों को भाजपा अपने साथ मिलाकर खुद अपनी फजीहत किस तरह से करवा रही है इस का जीता-जागता उदाहरण बड़ोदरा की पारुल यूनिवर्सिटी के डायरेक्टर जयेश पटेल हैं. जयेश पटेल पूरी जिंदगी कांग्रेस मे रहे. कांग्रेस के टिकट पर तीन बार चुनाव लड़ा, लेकिन सिर्फ 6 महीने पहले यह भाजपा में आ गए और फिर इसने अपने ही यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली एक लड़की का बलात्कार किया. अब स्वाभाविक रूप से मीडिया में बैठे कांग्रेसी बार बार इसे भाजपा नेता कहकर प्रचारित कर रहे है. तकनीकी रूप से देखा जाए तो यह भाजपा के ही नेता माने जाएँगे, लेकिन इस बदनामी के लिए जिम्मेदार भी बीजेपी है, जो कांग्रेस से आए हुए किसी भी ऐरे-गैरे को शामिल कर रही है. इसी प्रकार 2000 करोड़ के ड्रग स्मगलर विक्की राठोड़ के केस में यही हुआ, इसके पिता पूरी जिंदगी कांग्रेस में रहे. कांग्रेस के टिकट पर विधायक भी बने, कांग्रेस की सरकार में मंत्री भी रहे. इन्होंने कांग्रेस के टिकट पर 2014 लोकसभा का चुनाव भी लड़ा लेकिन सिर्फ 3 महीने पहले वह भाजपा में आए और जब उसका बेटा 2000 करोड़ की ड्रग्स रैकेट में पकड़ा गया तो मीडिया और कांग्रेस ने उसे एक भाजपा नेता का बेटा कहकर प्रचारित किया. समझ नहीं आता कि जब भाजपा में इतने अच्छे अच्छे लोग हैं तो फिर इन बाहरियों को शामिल करके खुद की फजीहत करवा रही है ? 

कहने का तात्पर्य यह है कि गमांग, जगदम्बिका पाल, विजय बहुगुणा, संभाजी ब्रिगेडी अथवा साबिर अली को शामिल करने (बल्कि उन्हें राज्यसभा सीट आदि से सम्मानित करने) में पता नहीं कौन सी रणनीति है, जो पार्टी की मूल विचारधारा को खाए जा रही है और उधर लाठी खाने वाला कार्यकर्ता हताश हो रहा है. जो लोग जीवन भर संघ-भाजपा की खिल्ली उड़ाते आए, जिन्होंने अपना राजनैतिक जीवन हिंदुत्व के विरोध एवं काँग्रेस की चाटुकारिता में गुज़ार दी हो, वह कार्यकर्ता से सामंजस्य कैसे बिठाएगा?? यह हताशा सिर्फ इसी स्तर पर ही नहीं है, बल्कि नियुक्तियों और प्रशासनिक स्तर पर भी देखा जाए तो यह सरकार विफल होती दिखाई दे रही है. 

मोदी सरकार के दो वर्ष पूर्ण हो चुके हैं, और इस सरकार से कामकाज के अलावा विचारधारा के स्तर पर जिस काम की अपेक्षा थी, अब जमीनी कार्यकर्ताओं द्वारा उसकी समीक्षा आरम्भ हो चुकी है. यदि कामकाज के स्तर पर देखा जाए तो मनोहर पर्रीकर, सुषमा स्वराज, नितिन गड़करी, पीयूष गोयल और सुरेश प्रभु का कार्य संतोषजनक कहा जा सकता है. परन्तु बाकी के मंत्रालयों की हालत अच्छी नहीं कही जा सकती. केन्द्र सरकार का सबसे महत्त्वपूर्ण मंत्रालय होता है मानव संसाधन मंत्रालय. पिछले पचास वर्षों में इस मंत्रालय पर अधिकांशतः वाम अथवा समाजवाद समर्थक काँग्रेसी की नियुक्ति होती आई है. देश के तमाम विश्वविद्यालयों, शिक्षण संस्थाओं, शोध संस्थाओं सहित अकादमिक गतिविधियों को यह मंत्रालय अरबों रूपए की धनराशि मुहैया करवाता है. काँग्रेस और वाम मोर्चे द्वारा इसी मंत्रालय के जरिये पूरी तीन पीढ़ियों का “ब्रेनवॉश” किया गया है और उन्हें नकली सेकुलरिज़्म एवं कथित प्रगतिशीलता के बहाने भारतीय संस्कृति से तोड़ने का कार्य किया गया है. JNU हो, हैदराबाद विश्वविद्यालय का रोहित वेमुला मामला हो अथवा IIT चेन्नै का आंबेडकर पीठ वाला मामला हो या फिर पुणे की FTII संस्था ही क्यों ना हो... काँग्रेस-वामपंथ द्वारा पालित-पोषित एवं संरक्षित बौद्धिक गिरोह ने मोदी सरकार के प्रत्येक कदम में अड़ंगे लगाए हैं, हंगामे किए और विदेशों में बदनामी करवाई. ऐसा क्यों हुआ? जो काम काँग्रेस की सरकारें सत्ता में आते ही किया करती थीं, वह भाजपा पिछले दो साल में भी नहीं कर पाई है. 2004 को याद करें, जैसे ही वाजपेयी सरकार की विदाई हुई, और सोनिया-मनमोहन की जुगलबंदी वाली यूपीए-१ सरकार ने कार्यभार संभाला, उसके एक माह के भीतर ही काँग्रेस ने तमाम बड़े-बड़े संस्थानों से भाजपा द्वारा नियुक्त किए गए सभी प्रमुख पदों को खाली करवा लिया. जिसने खुशी-खुशी इस्तीफ़ा दिया, उसे सम्मानजनक तरीके से जाने दिया गया और जिसने इनकार किया, उसे बर्खास्त करने में भी कोई कसर बाकी नहीं रखी गई. इसके पश्चात तत्काल काँग्रेसी अथवा वामपंथी विचारधारा को समर्पित व्यक्तियों की नियुक्ति कर दी गई, जो दुर्भाग्य से आज भी कई संस्थानों में कब्ज़ा जमाए बैठे हैं. सरकार के प्रति धारणाएँ बनाने अथवा अवधारणाएँ बिगाड़ने में बौद्धिक जगत का बहुत बड़ा हाथ होता है. स्मृति ईरानी ने जब कार्यभार संभाला, तब उन्होंने शुरुआत तो बड़े धमाकेदार तरीके से की थी परन्तु इस महत्त्वपूर्ण मंत्रालय को लेकर उनसे जो अपेक्षाएँ थीं इन दो वर्षों में वह कोरी बातें, फालतू के विवाद और उनके बड़बोलेपन में ही खत्म होती दिखाई दे रही हैं. 


मानव संसाधन मंत्री ने जेएनयू तथा हैदराबाद विवि के रोहित वेमुला का मामला जिस तरह से हैंडल किया है, उससे यह बात स्पष्ट हो गई है कि स्मृति ईरानी में वामपंथियों जैसी धूर्तता एवं प्रोपोगंडा तकनीक का सर्वथा अभाव है. बौद्धिक क्षेत्र में चारों तरफ घुसे बैठे वामपंथियों एवं कांग्रेसियों से निपटना अनुभवहीन स्मृति ईरानी के बस की बात नहीं है. पिछले दो वर्ष में देश की प्रमुख शिक्षा एवं अकादमिक संस्थाओं में आज भी वही लोग बैठे हैं जो यूपीए-२ कार्यकाल में थे. ऐसा नहीं है कि भाजपा समर्थित विचारधारा में प्रतिभावान लोगों की कमी है, परन्तु भाजपा में नैतिकता बघारने का ऐसा उन्माद है कि स्मृति ईरानी बड़े गर्व से घोषणा करती हैं कि उन्होंने बदले की भावना से काम नहीं किया है और एक-एक करके कई नाम गिना देती हैं कि हमने इन्हें नहीं हटाया. तो सवाल बनता है कि क्यों नहीं हटाया? किस बात का इंतज़ार है? क्या पिछले साठ वर्ष से काँग्रेस-वामपंथ के हाथों मलाई चाटते इन लोगों के ह्रदय परिवर्तन का? या स्मृति ईरानी को विश्वास है कि ये तमाम बुद्धिजीवी इनकी यह नैतिकता देखकर पसीज जाएँगे और अपना संघ-भाजपा-मोदी विरोध वाला रवैया त्याग देंगे? इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने वालों, तीन-तीन पीढ़ियों को अपनी सेकुलर विचारधारा और झूठी कहानियों के माध्यम से बरगलाने वालों तथा बाकायदा अपना गिरोह बनाकर सभी विश्वविद्यालयों से भगवा बुद्धिजीवियों को षड्यंत्रपूर्वक बाहर करते हुए फेलोशिप्स, अवार्ड, ग्रांट्स इत्यादि पर काबिज रहने वालों से निपटना स्मृति ईरानी के बस की बात नहीं लग रही. जेएनयू के उस कुख्यात हंगामे के पश्चात ऐसी कोई गतिविधि नज़र नहीं आई, जिसमें मानव संसाधन मंत्रालय ने वहाँ की कार्यकारी परिषद् अथवा अकादमिक कौंसिल को भंग करने या उसमें व्यापक बदलाव करने की कोई इच्छाशक्ति दिखाई हो. जबकि यही काम काँग्रेस जब सत्ता में आती थी तो आवश्यकता पड़ने पर पहले दो माह में ही निपटा डालती थी. यदि कोई पार्टी अपनी सत्ता के दो वर्ष बाद भी अपनी समर्थित विचारधारा के लोगों को सही स्थान पर फिट नहीं कर पाती या ऐसा कोई उद्यम दिखाई भी नहीं देता तो तय मानिए कि कहीं न कहीं बड़ी गडबड़ी है.  

यहाँ पर एक उदाहरण देना ही पर्याप्त है... ICSSR (भारतीय सामाजिक विज्ञान शोध परिषद्) के अध्यक्ष हैं प्रोफ़ेसर सुखदेव थोरात. इन सज्जन ने दलितों के नाम पर NGO खड़े करके यूरोप एवं फोर्ड फाउन्डेशन से चन्दे लिए हैं. हिन्दू द्वेष एवं दलितों को भड़काने का काम ये साहब बखूबी करते रहे हैं, आज भी कर रहे हैं. इनके स्थान पर समावेशी विचारधारा वाले प्रोफ़ेसर के.वारिकू अथवा प्रोफ़ेसर जितेन्द्र बजाज को लाया जाना चाहिए था, ताकि इस महत्त्वपूर्ण संस्थान में यह हिन्दू द्वेष का ज़हर फैलने से रोका जा सके, लेकिन स्मृति ईरानी इनका कुछ नहीं कर पाईं. इसी प्रकार एक महत्त्वपूर्ण संस्थान है साउथ एशियन यूनिवर्सिटी, जिसके निदेशक प्रोफ़ेसर जीके चढ्ढा साहब पाकिस्तानी छात्रों को अधिक प्राधान्य देते थे और उनके अधिक प्यारे थे. चढ्ढा साहब के स्वर्गवास के पश्चात यह पद अभी खाली पड़ा है, क्योंकि मानव संसाधन मंत्रालय उस वामपंथी बौद्धिक गिरोह के हंगामों से सहमा हुआ रहता है. उधर बच्चों के दिमाग पर प्रभाव डालने वाले एवं पुस्तकों द्वारा बुद्धि दूषित करने वाले प्रमुख संस्थान NCERT में शंकर शरण जैसे विद्वान को होना चाहिए, जो वामपंथियों की नस-नस से वाकिफ हैं, परन्तु यह भी नहीं हो पा रहा. फिर भाजपा के मतदाता कैसे विश्वास करें कि यह सरकार पिछले साठ वर्ष की गन्दगी को साफ़ करने के प्रति गंभीर है तथा वैचारिक लड़ाई के लिए कटिबद्ध है? 

अब बात विचारधारा की निकली ही है तो यह जानना उचित होगा कि राज्यों में भाजपा की सरकारें सत्ता प्राप्त करने के बाद अचानक सेकुलरिज़्म का राग क्यों अलापने लगती हैं. जब तक भाजपा विपक्ष में रहती है वह भावनाओं को भड़काकर अपने समर्थकों को एक टांग पर खड़ा रखती है, परन्तु जैसा कि ऊपर केन्द्र का उदाहरण दिया कि सत्ता मिलते ही इनका “वैचारिक स्खलन” शुरू हो जाता है. ठीक वही स्थिति राज्यों में भी है. जिसमें सबसे (कु)ख्यात मामला है मध्यप्रदेश की भोजशाला का विवाद है. पिछले कई वर्षों से मध्यप्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला में वसंत पंचमी के दिन हिन्दू संगठन माँ सरस्वती की पूजा करते आए हैं, वहीं अतिक्रमण करके मुस्लिमों ने बाहर एक मस्जिद खड़ी कर ली है. मप्र में भाजपा की सरकार बने लगभग तेरह-चौदह वर्ष होने को आए, आज भी प्रतिवर्ष हिन्दू संगठनों को भोजशाला में पूजा-अर्चना करने के लिए या तो प्रशासन के आगे गिडगिडाना पड़ता है अथवा संघर्ष करना पड़ता है. हर बार हिन्दू संगठनों को लॉलीपाप देकर चलता कर दिया जाता है, जबकि मुस्लिम संगठन ठप्पे के साथ बाकायदा प्रशासन के संरक्षण में नमाज पढ़ते हैं. “मामाजी” की भाजपा सरकार को सेकुलरिज्म का ऐसा बुखार चढ़ा हुआ है कि वह इस मामले में अपने मातृ संगठन को भी अँधेरे में रखने से बाज नहीं आती. सत्ता की खातिर यह विचारधारा से भटकाव नहीं तो और क्या है? यदि हिन्दू भाजपा वोट देकर जितवाता है तो वह अपनी सरकार से उम्मीद भी तो रखता है कि वर्षों से लंबित पड़े विवादित मामलों में भाजपा सरकार या तो न्यायालयीन अथवा प्रशासनिक तरीके से उन्हें ख़त्म करे, परन्तु तेरह वर्ष की सत्ता के बावजूद हर साल क़ानून-व्यवस्था के नाम पर सरस्वती भक्त हिन्दुओं पर लाठियाँ बरसें यह उचित नहीं है. यही हाल राजस्थान में भी है. रानी साहिबा वसुंधरा राजे को भी केवल “सबका साथ, सबका विकास” का चस्का लगा हुआ है. विकास की दौड़ में रानी साहिबा ने जयपुर के वर्षों पुराने कई मंदिरों को सडक, पुल या मेट्रो की चाह में ध्वस्त कर दिया. कई मंदिर ऐसे भी थे जो आराम से विस्थापित किए जा सकते थे, जबकि कुछ मंदिरों को बचाते हुए सड़क का मार्ग बदला भी जा सकता था, कुछ मज़ारों और मस्जिदों को बचाने के लिए ऐसा किया भी गया. तमाम हिन्दू संगठनों ने इन मंदिरों को तोड़ने से बचाने के लिए अथवा वैकल्पिक मार्ग सुझाने के लिए कई आन्दोलन किए, परन्तु नतीजा शून्य. महारानी के बुलडोज़रों ने “अपने ही कार्यकर्ताओं और अपने ही मतदाताओं” की एक न सुनी. जोधपुर, अजमेर, जैसलमेर तथा बाड़मेर के कई इलाके तेजी से मुस्लिम बहुल बनते जा रहे हैं. इन क्षेत्रों में कई प्रकार की संदिग्ध गतिविधियाँ चल रही हैं. सीमा सुरक्षा बल लगातार चेतावनी जारी कर रहे हैं, परन्तु वसुंधरा राजे पर राजस्थान को औद्योगिक राज्य बनाने का भूत सवार है. राजस्थान में “मार्बल माफिया” के कई किस्से बच्चे-बच्चे की ज़बान पर मशहूर हैं, परन्तु शायद राजस्थान सरकार के कानों तक यह आवाज़ नहीं पहुँचती या शायद सेकुलरिज्म के बुखार से तप्त वह सुनना ही नहीं चाहतीं. राजस्थान में भाजपा का शासन आए तकरीबन तीन साल हो रहे हैं. हमेशा की तरह भाजपा कुछ ज्यादा ही नैतिक हो रही है. वे कर्मचारी जो संघी या भाजपा के मतदाता होने के कारण गहलोत सरकार द्वारा जानबूझकर रिमोट एरिया में फेंके गए थे, वे आज तक वहीँ पड़े सड़ रहे हैं, भाजपा को ऐसे समर्थक कर्मचारियों की सुध बुध लेने की कोई फ़िक्र नहीं और उधर काँग्रेस के लालित-पालित कर्मचारी अपनी पट्टाशुदा जगहों पर आज भी ठाठ से जमे हैं. यदि कांग्रेस अथवा वामपंथ का शासन होता तो पहले छः माह में ही उन्होंने अपने समर्थित कर्मचारियों को अपनी मनपसंद जगह पर पोस्ट कर दिया होता. लेकिन भाजपा निराली है, यहाँ दरी -पट्टी उठाने, सडकों पर उतरने, नारे लगा लगा कर गला फाड़ने, पुलिस के डंडे खाने अथवा मीडिया एवं सोशल मीडिया में विचारधारा का पक्ष रखने वालों को प्रतिबद्ध कार्यकर्ता अथवा 'त्यागी-बलिदानी' के रूप में आगे खड़ा कर दिया जाता है, और जब भाजपा को सत्ता मिलती है तो लाभ लेने के लिए गमांग-बहुगुणा टाइप नेता और जिन्दगी भर संघ की खिल्ली उड़ाने वाले नवप्रविष्ट 'भाई साहब' आगे आ जाते हैं. 


बालासाहब ठाकरे और अटलबिहारी वाजपेयी के ज़माने से महाराष्ट्र में शिवसेना, भाजपा की सबसे पुरानी और सबसे विश्वस्त साथी रही है. जब गुजरात दंगों के बाद अटल जी मोदी को गुजरात से लगभग हटाने ही वाले थे, तब बालासाहब चट्टान की तरह मोदी के पीछे खड़े रहे और अटल जी से स्पष्ट शब्दों में मोदी को बनाए रखने की बात कही थी. यदि बालासाहब ने उस समय अटल जी को उस समय वह धमकी ना दी होती, तो अटल जी की नैतिकता(??) और सरलता(?) तथा “कथित राजधर्म” के चक्कर में मोदी पता नहीं कहाँ ट्रांसफर कर दिए जाते. तब न तो मोदी गुजरात में बारह साल शासन कर पाते, और ना ही वाइब्रेंट गुजरात के जरिये अपनी छवि चमकाकर आज प्रधानमंत्री पद तक पहुँच पाते. यह संक्षिप्त भूमिका इसलिए बताई जा रही है कि महाराष्ट्र के गत विधानसभा चुनावों के पहले से ही भाजपा की “विस्तारवादी” नीतियों के कारण जिस तरह से केन्द्रीय नेतृत्त्व ने शिवसेना के साथ अपमानजनक एवं नीचा दिखाने जैसा व्यवहार किया है, यह हिंदुत्व के लिए ठीक नहीं है. यदि भाजपा को अपना विस्तार करना ही है तो महाराष्ट्र पर गिद्ध दृष्टि क्यों? वहां तो पहले से ही भाजपा का विश्वस्त सहयोगी मौजूद है, जो इक्का-दुक्का बार छोड़कर सदैव भाजपा के साथ खड़ा रहा है. महाराष्ट्र विधानसभा में “अकेले” बहुमत हासिल करने की होड़ में शिवसेना को तोड़ने का प्रयास करना अथवा शरद पवार जैसे भीषण भ्रष्ट व्यक्ति के साथ गलबहियाँ करना भाजपा को शोभा नहीं देता. परन्तु जब विचारधारा पर सत्ता प्राप्ति हावी हो जाती है, तब ऐसा ही होता है. ये बात और है कि शिवसेना टूटी नहीं, लेकिन फिर भी भाजपा ने संयुक्त मंत्रिमंडल में लगातार शिवसेना को दबाए रखा है और गाहे-बगाहे दोनों पार्टियों में चिंगारियाँ फूटती रहती हैं. जैसा कि लेख में पहले बताया जा चूका है, “संभाजी ब्रिगेड” नामक जहरीला संगठन शरद पवार का जेबी संगठन है और यह लगातार हिन्दुओं में फूट डालने तथा ब्राह्मणों को गाली देने का काम करता है, ऐसे संगठन के प्रति भाजपा में अचानक प्रेम की कोंपलें फूट पडी हैं. संघ की विचारधारा एवं हिंदुत्व के लिए यह अच्छे संकेत नहीं हैं. अपनी जड़ों को छोड़कर कोई भी वृक्ष अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकता. 

पश्चिम भारत के गोवा में एक छोटा सा संगठन है “सनातन संस्था” जो कि हिन्दू जनजागृति समिति के बैनर तले हिंदुत्व जागरण के अपने कई कार्यक्रम आयोजित करता है. यहाँ मैंने “छोटा संगठन” इसलिए कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे विराट संगठन तथा भाजपा जैसे विशाल पार्टी के सामने तुलनात्मक रूप से यह छोटा संगठन ही है. इस संगठन का विस्तार फिलहाल केवल महाराष्ट्र एवं कर्नाटक में ही थोडा बहुत प्रभावशाली है, परन्तु बाकी राज्यों में भी अब यह धीरे-धीरे अपने पैर पसार रहा है. यह संगठन राजनैतिक नहीं है, इसलिए यह “सत्ता प्राप्ति की लालसा” अथवा सेकुलरिज्म का भूत चढ़ने जैसी बीमारियों से बचा हुआ है. यह संगठन सिर्फ और सिर्फ हिन्दू जागरण, हिन्दू धर्म एवं संस्कृति की परम्पराओं एवं विधियों तथा विभिन्न प्रकार के हिन्दू-समाजसेवी कार्यक्रमों में भाग लेता रहता है. इस संगठन के मुखिया डॉक्टर आठवले जी अधिकाँश समय एकांतवास में ही रहते हैं. कांग्रेस और वामपंथियों तथा हाल ही में अपनी राजनैतिक महत्त्वाकांक्षाओं के तहत आपियों ने लगातार सनातन संस्था पर कई वैचारिक हमले किए हैं. महाराष्ट्र की पिछली कांग्रेस सरकार ने सनातन संस्था के खिलाफ कई मामले दर्ज कर रखे हैं. दाभोलकर एवं कलबुर्गी की हत्या के आरोप में खोजबीन और पूछताछ के बहाने महाराष्ट्र पुलिस सनातन संस्था के आश्रमों एवं गोवा के प्रमुख केंद्र पर जब-तब धावा बोलती रहती है. पिछले पांच वर्ष से यह संस्था अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन का आयोजन करती है, जिसमें देश-विदेश से दर्जनों ऐसे कार्याकार्य एवं संगठन भाग लेते हैं जो जमीनी स्तर पर हिंदुत्व के कार्य में जुटे हैं. इनमें बांग्लादेश, नेपाल जैसे देशों से भी प्रतिनिधि आते हैं जहां हिन्दुओं पर विभिन्न प्रकार के अत्याचार हो रहे हैं. बांग्लादेश के एक मानवाधिकार वकील हैं रवीन्द्र घोष, जो वहां के अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय के खिलाफ होने वाले अपराधों एवं उत्पीड़न के खिलाफ आए दिन लड़ते रहते हैं. बांग्लादेश और पाकिस्तान में हिन्दुओं की हालत बेहद दयनीय है यह बात सभी जानते हैं. पिछले चार वर्ष से रवीन्द्र घोष गोवा के इस हिन्दू अधिवेशन में भाग लेने आते रहे हैं, परन्तु इस वर्ष केंद्र सरकार ने रवीन्द्र घोष को वीसा नहीं दिया. इस अनुमति को नकारने के लिए क़ानून-व्यवस्था एवं बांग्लादेश से संबंधों का कारण दिया गया. गत वर्ष हुए चौथे हिन्दू अधिवेशन में भी कर्नाटक से प्रमोद मुथालिक इस सम्मेलन में आने वाले थे, परन्तु गोवा में भाजपा की “हिन्दुत्ववादी” सरकार ने प्रमोद मुतालिक के गोवा में घुसने पर प्रतिबन्ध लगा दिया. अब सोचने वाली बात यह है कि प्रमोद मुतालिक पर कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने कुछ मामले दर्ज कर रखे हैं, परन्तु गोवा में उनके खिलाफ एक भी मामला नहीं है. ऐसे में भारत के एक नागरिक को जो कि शांतिपूर्ण तरीके से एक अधिवेशन में भाग लेने जा रहा हो, किसी अंग्रेजी क़ानून के तहत, तानाशाहीपूर्ण पद्धति से राज्य में घुसने से रोकना और वो भी खुद को संघ की राजनैतिक बाँह कहलाने वाली भाजपा सरकार के शासन में?? इतना अन्याय तो कांग्रेस की सरकारों ने भी नहीं किया. परन्तु जैसा कि मैंने कहा, जब विचारधारा पर सत्ता हावी हो जाती है तब “अपने” लोग भी दुश्मन नज़र आने लगते हैं. 


सनातन संस्था एक पूर्णतः धार्मिक एवं हिंदुत्वनिष्ठ गैर-राजनैतिक संस्था है, जिसकी कोई राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा अभी तक सामने नहीं आई है, और मजे की बात यह है कि इस संस्था का संघ एवं उसकी कार्यशैली से तिनका भर भी सम्बन्ध नहीं है. संक्षेप में कहा जाए तो ऐसी कई संस्थाएं या संगठन हैं जो सिर्फ हिन्दू धर्म एवं हिंदुत्व तथा राष्ट्रवाद की “मूल विचारधारा” के लिए काम कर रहे हैं, परन्तु उनका सीधा सम्बन्ध संघ-भाजपा से नहीं है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ऐसी संस्थाओं एवं संगठनों को “राजनैतिक संरक्षण” देना हिन्दू हित का दम भरने वाली सत्ताधारी पार्टी का काम नहीं है?? क्या भाजपा-संघ की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह ऐसे संगठनों को जो कि उसके प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि पूरक हैं, उन्हें हर प्रकार की मदद करे? जब ऐसे संगठन अथवा समाज में बैठे हजारों-लाखों लोग जो कि भाजपा के सदस्य नहीं हैं परन्तु हिंदुत्व की विचारधारा के लिए काम करते हैं, वोट देते हैं और जिस कारण भाजपा को सत्ता की मलाई खाने मिलती है, क्या ऐसे लोगों का ख़याल रखना भाजपा की राज्य एवं केंद्र सरकार का काम नहीं है?? ऐसे हिन्दू संगठन किसी मदद के लिए किसकी तरफ आशा की निगाह से देखें, वैचारिक पितृ संगठन और पार्टी की तरफ या ओवैसी और चर्च की तरफ?? 

संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि “काँग्रेस मुक्त भारत” के नशे में भाजपा तेजी से “काँग्रेस युक्त भाजपा” की तरफ बढ़ती जा रही है. विचारधारा के स्खलन संबंधी और समर्थकों की नियुक्तियों को सही स्थान पर फिट नहीं करने संबंधी ऊपर जिन विभिन्न उदाहरणों को उल्लेखित किया है, उस प्रकार की ढीलीढाली कार्यशैली को देखते हुए काँग्रेस मुक्त भारत का सपना “राजनैतिक” रूप से तो संभव है, क्योंकि मूल काँग्रेस इस समय सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है. परन्तु उस काँग्रेस को विस्थापित करने वाली यह जो “डुप्लिकेट काँग्रेस” अर्थात भाजपा है वह प्रशासनिक रूप से कभी भी काँग्रेस मुक्त भारत नहीं कर सकती. पिछले साठ वर्ष में जिस चतुराई और धूर्तता से काँग्रेस और वामपंथ ने अपने मोहरे देश के प्रत्येक क्षेत्र में फिट कर रखे हैं उसका दस प्रतिशत भी प्राप्त करने में भाजपा को पूरे दस वर्ष चाहिए, परन्तु सत्ता में आने के बाद जिस प्रकार भाजपा पर “सेकुलरिज़्म का बुखार” चढ़ता है, एवं त्याग-बलिदान के बौद्धिक डोज़ पिलाते हुए पार्टी में अपनों की उपेक्षा की जाती है, उसे देखते हुए तो यह संभव नहीं लगता. 

Sunday, May 29, 2016

A Further Step for Congress Free India




मोदी सरकार के दो वर्ष – "कांग्रेस मुक्त भारत" की तरफ एक और कदम...


कहते हैं कि “मुसीबत कभी अकेले नहीं आती, साथ में दो-चार संकट और लेकर आती है”. वर्तमान में कांग्रेस के साथ शायद यही हो रहा है. नेशनल हेराल्ड घोटाले का मामला न्यायालय में है और इटली के अगस्ता हेलीकॉप्टरों संबंधी घूस का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव सिर पर आ धमके. कांग्रेस के राहुल बाबा अभी छुट्टियों के मूड में आने ही वाले थे कि भीषण गर्मी में उन्हें पसीना बहाने के लिए मैदान में उतरना पड़ा. दिल्ली और बिहार के चुनाव नतीजों से उत्साहित कांग्रेस ने सोचा कि अभी ये मौका बढ़िया है, जिसके द्वारा देश में यह हवा फैलाई जा अलावा कांग्रेस की मदद के लिए जेएनयू का “जमूरा” कन्हैया और उसकी वामपंथी बैंड पार्टी देश में नकारात्मक माहौल बनाने में जुटी हुई ही थी. लेकिन जब उन्नीस मई को चुनाव परिणाम घोषित हुए तो उन राज्यों की जनता ने अपना फैसला सुना दिया था कि नरेंद्र मोदी के “कांग्रेस-मुक्त” भारत को उनका समर्थन एक कदम और आगे बढ़ चूका है. कांग्रेस को केरल और असम जैसे राज्यों में सत्ता से बेदखल होना पड़ा, जबकि तमिलनाडु एवं बंगाल में अगले बीस वर्ष में दूर-दूर तक सत्ता में आने के कोई संकेत नहीं मिले. सांत्वना पुरस्कार के रूप में पुदुच्चेरी विधानसभा में कांग्रेस-द्रमुक गठबंधन को पूर्ण बहुमत हासिल हो गया. कांग्रेस को इस सदमे की हालत में, सबसे तगड़ा वज्राघात लगा असम के नतीजों से. पिछले पंद्रह वर्ष से असम में गोगोई सरकार कायम थी, इसलिए कांग्रेस इस मुगालते में थी कि वहां चाहे जितनी भी बुरी स्थिति हो, वह चुनाव-पश्चात बदरुद्दीन अजमल जैसे घोर साम्प्रदायिक व्यक्ति की पार्टी से गठबंधन करके येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल कर ही लेगी. लेकिन हाय री किस्मत... आसाम की जनता ने भाजपा को पूर्ण बहुमत देकर कांग्रेस के ज़ख्मों पर नमक मल दिया. 

आईये जरा राज्यवार विश्लेषण करें कि आखिर भारत लगभग कांग्रेस-मुक्त भारत की तरफ कैसे और क्यों बढ़ रहा है... 

केरल :- 
विधानसभा चुनावों से ठीक पहले सोलर घोटाले और सेक्स स्कैंडल में फंसे मुख्यमंत्री तथा अन्य मंत्रियों का भविष्य तो पहले से ही स्पष्ट दिखाई देने लगा था, परन्तु कांग्रेस ने सोचा कि चुनावों से ठीक पहले नेता बदलना पार्टी की एकता के लिए ठीक नहीं है. कांग्रेस की यह सोच उसके लिए बिलकुल उलट सिद्ध हुई. केरल की पढी-लिखी जनता, जो कि हर पांच साल में सत्ताधारी को बदल देती है, उसने ओमान चांदी को सत्ता से बेदखल करने का मूड बना लिया था. रही-सही कसर 93 वर्षीय “नौजवान” वीएस अच्युतानंदन ने धुआंधार प्रचार करके पूरी कर दी. इसके अलावा कांग्रेस का कुछ प्रतिशत सवर्ण हिन्दू वोट भी भाजपा ले उड़ी. कांग्रेस के कई नेता दबी ज़बान में यह स्वीकार करते हैं कि केरल में कांग्रेस के एक बड़े वोट बैंक में भाजपा ने जबरदस्त सेंध लगाई है. वाम मोर्चा को जहां एक तरफ समर्पित और हिंसक कैडर का लाभ मिला, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के भ्रष्टाचार और स्कैंडलों का भी फायदा हुआ. 

केरल चुनावों में कोई सबसे अधिक फायदे में रहा, तो वह है भाजपा. जिस राज्य में आज तक भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली थी, 2016 के इन चुनावों में वह बैरियर भी टूट गया और ओ. राजगोपाल के रूप में भाजपा के पहले विधायक ने वहां पार्टी का खाता खोल ही दिया. लगातार कई चुनाव हारने के बाद भी राजगोपाल ने हिम्मत नही हारी और अंततः वामपंथ की हिंसक गतिविधियों तथा RSS के दर्जनों स्वयंसेवकों की हत्याओं का खून रंग लाया और पार्टी ने अपना वोट प्रतिशत 4% से बढ़ाकर 14% कर लिया. हालांकि चुनाव परिणामों के बाद चैनलों को इंटरव्यू देते समय चांडी तथा पिनारेई विजयन ने भले ही यह दावा किया हो कि उन्होंने राज्य में भाजपा को एकदम किनारे कर दिया है, लेकिन वास्तविकता में आंकड़े कुछ और ही कहते हैं. चांडी और विजयन के खोखले दावों के विपरीत आंकड़े यह बताते हैं कि केरल में 14.4% वोट प्रतिशत के साथ प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में भाजपा और इसके सहयोगी तीसरे क्रमांक पर रहे हैं. 2011 के विधानसभा चुनावों के मुकाबले लगभग पचास विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा ने अपना वोट शेयर कहीं-कहीं दोगुना-तिगुना-चौगुना तक कर लिया है. पलक्कड इलाके की मलमपुझा विधानसभा सीट जिसे संभावित मुख्यमंत्री अच्युतानंदन ने जीता, वहां पर भाजपा उम्मीदवार सी.कृष्णकुमार को 46157 वोट मिले और वह दुसरे स्थान पर रहे, जबकि 2011 के चुनावों में यहाँ भाजपा उम्मीदवार को 2000 वोट ही मिले थे. त्रिवेंद्रम सीट पर भाजपा के उम्मीदवार क्रिकेटर श्रीसंत को 37764 वोट मिले और वे तीसरे स्थान पर रहे जबकि इस सीट पर हार-जीत का अंतर सिर्फ एक हजार वोट का रहा. कोल्लम जिले की चथान्नूर सीट पर भाजपा उम्मीदवार 33199 वोट लेकर वामपंथी उम्मीदवार से हारे और दुसरे नंबर पर रहे, यहाँ भी कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही. 2011 में इस सीट पर भाजपाई उम्मीदवार को सिर्फ 3824 वोट मिले थे, यानी सीधे दस गुना बढ़ोतरी. 


ये तो सिर्फ दो-चार ही उदाहरण हैं, केरल की लगभग प्रत्येक सीट पर ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जहाँ संघ के स्वयंसेवकों ने पिछले दस वर्ष में कड़ी मेहनत करके, और हिंसक वामपंथी कैडर द्वारा की गई हत्याओं के बावजूद हार नहीं मानी तथा कहीं दुसरे स्थान पर तो वोट संख्या में भारी बढ़ोतरी करते हुए कहीं तीसरे स्थान पर भी रहे. नरेंद्र मोदी की लगातार सक्रियता, नारायण गुरु जैसे आध्यात्मिक व्यक्ति के आशीर्वाद और उनकी वजह से एक समुदाय के थोक में मिले वोटों तथा कांग्रेस-मुस्लिम लीग की सरकार के भ्रष्टाचार एवं हिन्दू विरोधी नीतियों के कारण केरल की जनता को होने वाली परेशानी के कारण अंततः केरल में भाजपा का खाता खुल ही गया और एक सीट पर विजय मिली. 

विश्लेषको की मानें तो नरेंद्र मोदी के “सोमालिया” वाले बयान को भाजपा विरोधी मीडिया ने जिस तरह बढ़ाचढ़ाकर पेश किया तथा केरल की सुशिक्षित जनता ने इसे हाथोंहाथ लिया तथा इसे लेकर चुनाव के अंतिम चरण में “पो मोने मोदी” (मोदी दूर जाओ), जैसे छिटक गए. यदि यह अप्रिय विवाद नहीं हुआ होता तो भाजपा के वोट प्रतिशत में एकाध प्रतिशत की और बढ़ोतरी होती, तथा जिन सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार बहुत कम वोटों से हारे हैं, वहां शायद जीत मिल सकती थी और संभव है कि भाजपा दो-तीन सीटें और जीत जाती. बहरहाल, केरल में भाजपा की जमीन तैयार हो चुकी है, अब इंतज़ार इस बात का है कि पिछले तीस-चालीस वर्ष से जारी UDF-LDF की राजनैतिक लड़ाई में भाजपा उस स्थिति में पहुँचेगी, जहां वह दस-बारह सीटें जीतकर “किंगमेकर” की भूमिका में आ जाए... और वह दिन अब दूर नहीं. कांग्रेस की चिंताओं की असल वजह यही है कि भाजपा उसका वोट प्रतिशत खा रही है. 

तमिलनाडु :- 

पिछले पचास वर्ष में तमिल अस्मिता, द्रविड़ आन्दोलन तथा “मतदाताओं को मुफ्त में बांटो” वाली नीतियों के कारण आज भी तमिलनाडु में भाजपा-कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के लिए कोई स्थान नहीं है. इसीलिए वहां से यदि कोई आश्चर्यजनक समाचार प्राप्त हुआ तो यही हुआ कि चुनाव पूर्व सारे सर्वे को अंगूठा दिखाते हुए “अम्मा” यानी जयललिता ने क्योंकि उसने चुनाव पूर्व ही द्रमुक से गठबंधन कर लिया था. कांग्रेस का द्रमुक प्रेम कोई नई बात नहीं है. यूपीए सरकार के दौरान भी 2G का महाघोटाला रचने वाले ए.राजा, कनिमोझी तथा दयानिधि मारण जैसे सुपर-भ्रष्टों का जमकर बचाव करती हुई कांग्रेस लोगों को आज भी याद है. चूंकि तमिलनाडु में हर पांच वर्ष में सत्ता की अदला-बदली वाला “ट्रेंड” चलता रहा है, इसलिए कांग्रेस ने सोचा कि मौका अच्छा है. साथ ही जयललिता पर चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों में उन्हें जेल होने, जमानत पर छूटने जैसी बातों को लेकर भी कांग्रेस खासी उत्साहित थी, परन्तु तमिलनाडु की जनता कांग्रेस-द्रमुक को कोई मौका देने की इच्छुक नहीं दिखी. एमजी रामचंद्रन के बाद तीस वर्ष के अंतराल से यह पहली बार हुआ कि कोई पार्टी सत्ता में वापस आई हो. 

आखिर यह जादू कैसे हुआ? असल में तमिलनाडु की जनता ने “कौन कम भ्रष्टाचारी” है, इसमें चुनाव किया. जैसा कि मैंने ऊपर कहा कि द्रमुक भी भ्रष्ट है और जयललिता तो बाकायदा जेल होकर आई हैं. परन्तु तमिलनाडु की जनता के मन में आज भी जयललिता की छवि “सताई हुई महिला” की है, इसलिए उसने “कम भ्रष्ट” को चुन लिया. इसके अलावा जयललिता द्वारा “मुफ्तखोरी” को प्रवृत्ति को बढ़ावा देने की नीतियाँ भी आम गरीब जनता में खासी लोकप्रिय रहीं (दिल्ली के पिछले चुनावों में हम इसका उदाहरण देख चुके हैं). पिछले पांच वर्ष में जयललिता सरकार द्वारा “अम्मा इडली”, “अम्मा डिस्पेंसरी”, जैसी विभिन्न योजनाएं चलाई गईं, जिसमें सरकारी खजाने से गरीबों को लगभग मुफ्त इडली, मुफ्त दवाओं, सस्ते कपड़ों आदि के कारण भले ही सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ता रहा हो, लेकिन गरीब वर्ग जयललिता से दूर नहीं गया. आज की स्थिति यह है कि इस चुनाव में जयललिता ने मिक्सर, स्कूटी और लैपटॉप बांटने का भी वादा किया है और जनता को भरोसा है कि “अम्मा” अपना वादा निभाएगी. अब तमाम अर्थशास्त्री भले अपना माथा कूटते रहें, लेकिन वस्तुस्थिति यही है कि तमिलनाडु के कई गरीब घरों में भोजन नहीं बनता. जब बीस रूपए में एक व्यक्ति आराम से सरकारी भोजन पर अपना पेट भर रहा हो, तो वहां घर पर खाना बनाने की जरूरत क्या है? जिस तरह दिल्ली के चुनावों में भाजपा इस “मुफ्त बांटो” वाले खेल में पिछड़ गयी थी, उसी प्रकार द्रमुक-कांग्रेस भी जयललिता के इन “मुफ्तखोरी वादों” के खेल में पिछड़ गए और सत्ता में वापस नहीं आ सके.  

ऐसा भी नहीं है कि तमिलनाडु की जनता इस खेल को पसंद कर ही रही हो. अम्मा और करूणानिधि के परिवारवाद एवं दोनों के भ्रष्टाचार से जनता बेहद त्रस्त है, परन्तु उनके पास कोई विकल्प ही नहीं है. कांग्रेस लगभग मृतप्राय है और भाजपा के पास वहां कोई स्थानीय नेता ही नहीं है, कैडर भी नहीं है. परन्तु तमिलनाडु की जनता में असंतोष है, यह इस बात से सिद्ध होता है कि इस बार तमिलनाडु में NOTA (इनमें से कोई नहीं) के बटन दबाने वालों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है. लगभग पच्चीस विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां हार-जीत के अंतर के मुकाबले NOTA को मिले वोटों की संख्या ज्यादा रही. इनमें से 16 विधानसभा सीटों पर जयललिता की पार्टी जीती. अर्थात यदि कोई तीसरा मजबूत ईमानदार राजनैतिक विकल्प होता, तो निश्चित ही कम से कम दस-बीस सीटें तो ले ही जाता. उदाहरण के लिए तिरुनेलवेली में AIDMK के उम्मीदवाद नागेन्द्रन सिर्फ 800 वोटों से जीते, जबकि NOTA को 2218 वोट मिले. इसी प्रकार एक क्षेत्रीय पार्टी तमिलगम के नेता कृष्णासामी सिर्फ 87 वोटों से हारे, जहां NOTA वोटों की संख्या 2612 रही. कहने का तात्पर्य यह है कि तमिलनाडु में “तीसरे विकल्प” के लिए उर्वर जमीन तैयार है. वहां की कुछ प्रतिशत जनता इन दोनों द्रविड़ पार्टियों, उनके भ्रष्टाचार तथा मुफ्तखोर तरीकों से नाराज है... जरूरत सिर्फ इस बात की है कि वहां भाजपा अपना कैडर बढ़ाए, ईमानदार प्रयास करे और इन दोनों पार्टियों के अलावा बची हुई पार्टियों से गठबंधन करे. हालांकि यह इतना आसान भी नहीं है, क्योंकि भारत में ““मुफ्त और सस्ता”” का आकर्षण इतना ज्यादा होता है, कि दिल्ली जैसे राज्य भी इसकी चपेट में आ जाते हैं तो तमिलनाडु की क्या बिसात? 

अब आते हैं पश्चिम बंगाल पर...

वामपंथियों को “उन्हीं की हिंसक भाषा” में जवाब देने के लिए सदैव तत्पर तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने पिछले पाँच वर्ष में गाँव-गाँव में उसी पद्धति का कैडर बनाकर ममता दीदी के लिए यह सुनिश्चित कर दिया था कि बंगाल की जनता उन्हें एक बार पुनः चुने. सारदा घोटाला और अन्य दूसरे चिटफंड कंपनियों की लूट से बंगाल की गरीब जनता बुरी तरह त्रस्त थी, लेकिन ममता ने अपनी राजनैतिक परिपक्वता से जनता के इस क्रोध को तुरंत भाँप लिया और गरीबों की लुटी हुई रकम वापस करने के लिए 500 करोड़ का जो फंड स्थापित किया, उसने इन दोनों घोटालों की आँच से तृणमूल काँग्रेस को बचा लिया. इस राज्य में भी भाजपा की स्थिति केरल जैसी ही है, जहाँ वह कहीं भी रेस में नहीं थी. भाजपा को सिर्फ अपनी इज्जत बचानी थी और वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी करनी थी. ये दोनों ही काम भाजपा ने बखूबी किए. रूपा गांगुली, सिद्धार्थनाथ सिंह और बाबुल सुप्रियो में इतनी ताकत कभी नहीं थी कि वे बंगाल में भाजपा को सम्मानजनक स्थान दिला पाएं, लेकिन इन्होंने लगातार कड़ी मेहनत से भाजपा के वोट प्रतिशत में इजाफा जरूर किया. वैसे भी जिस राज्य में वामपंथ ने तीस साल शासन किया हो, तथा जिस राज्य के सत्रह जिलों में मुस्लिम आबादी तीस प्रतिशत से ऊपर पहुँच चुकी हो, वहाँ भाजपा के उभरते की संभावनाएँ दिनों क्षीण ही होती जाएँगी. तृणमूल के हिंसक कैडर, बांग्लादेशी घुसपैठियों से मुकाबला करने की अक्षमता तथा जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के अभाव ने भाजपा के लिए इस राज्य में करने के लिए कुछ खास छोड़ा ही नहीं था. सबसे अधिक आश्चर्यजनक और दयनीय स्थिति काँग्रेस की रही, जिसकी हालत यह हो गई कि उसे बंगाल में वामपंथी पार्टियों के साथ गठबंधन करना पड़ा. वैचारिक मखौल और विरोधाभास देखिए कि सोनिया गाँधी की पार्टी केरल में इन्हीं वामपंथियों के खिलाफ चुनाव लड़ रही थी. बहरहाल, पूरी तरह से मुस्लिम वोटों के एकतरफा ध्रुवीकरण तथा तृणमूल के कार्यकर्ताओं की जबरदस्त फील्डिंग के कारण काँग्रेस और वामपंथ दोनों मिलकर भी ममता दीदी को रोक नहीं सके और जयललिता की तरह ही ममता बनर्जी भी लगातार दूसरी बार बंगाल की क्वीन बनीं. भाजपा के लिए इस राज्य में खोने को कुछ था नहीं, इसलिए उसने सिर्फ पाया ही पाया. वामपंथ की जमीन और खिसकी तथा काँग्रेस को यह सबक मिला कि बंगाल में उठने के लिए अभी उसे कम से कम दस वर्ष और चाहिए.  



असम में भाजपा को “सर्व-आनंद” मिला... 

देश की सेकुलर बिरादरी और विभिन्न मोदी विरोधी गुटों को सबसे तगड़ा मानसिक सदमा लगा असम के चुनाव परिणामों से. जिस तरह से नरेंद्र मोदी सहित पूरी पार्टी और संगठन ने असम में अपनी पूरी ताकत झोंक रखी थी, वह इसीलिए थी कि पिछले पन्द्रह वर्ष के गोगोई कुशासन, भ्रष्टाचार और खासकर बांग्लादेशी घुसपैठ ने असम की जनता को बुरी तरह परेशान कर रखा था. RSS ने पिछले बीस वर्ष में इस राज्य में कड़ी जमीनी मेहनत की थी और बोडो उग्रवादियों तथा मुस्लिम कट्टरपंथियों के हाथों अपने कई स्वयंसेवक भी खोए, परन्तु हार नहीं मानी. इसी तरह आदिवासी समुदाय से आने वाले सर्बानंद सोनोवाल को पहले ही मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके भाजपा ने अपना तुरुप का पत्ता खेल दिया था. सोनोवाल की साफ़ छवि, मोहक मुस्कराहट तथा जमीनी मुद्दों पर उनकी पकड़ के कारण भाजपा की यह चाल काँग्रेस को चित करने के लिए पर्याप्त थी. इस रणनीति में काँग्रेस के ताबूत में अंतिम कील ठोकने वाले एक और प्रमुख व्यक्ति रहे हिमंता बिस्वा सरमा, जो एक समय पर तरुण गोगोई के खासमखास हुआ करते थे. परन्तु काँग्रेस पार्टी में अपनी भीषण उपेक्षा और समुचित सम्मान नहीं मिलने के कारण हिमंता ने भाजपा की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया और भाजपा ने भी इसे लपकने में देर नहीं की. हिमंता ने काँग्रेस की तमाम रणनीतियों को पहले ही भाँप लिया और समयानुकूल छिन्न-भिन्न भी कर दिया. भाजपा ने असम के चुनावों में बांग्लादेशी घुसपैठ तथा “असमिया अस्मिता” को प्रमुख मुद्दा बनाया और सीधे काँग्रेस को निशाना बनाने की बजाय AIUDF के बदरुद्दीन अजमल को निशाना बनाया. इसका फायदा भाजपा को इस तरह मिला कि वोटों के ध्रुवीकरण की संभावना से काँग्रेस डर गई और उसने अंतिम मौके पर बदरुद्दीन अजमल की पार्टी से गठबंधन नहीं किया. इसका खामियाज़ा काँग्रेस और अजमल दोनों को भुगतना पड़ा. जहाँ एक तरफ काँग्रेस ऊपरी असम में सिर्फ एक सीट (गोगोई) ही जीत पाई वहीं 2006 में धमाकेदार एंट्री मारने वाले बदरुद्दीन अजमल की पार्टी घटकर सिर्फ तेरह सीटों पर सिमट गई, और वे खुद ही चुनाव हार गए...

असम में भाजपा को दो-तिहाई बहुमत मिल जाएगा, यह तो वास्तव में किसी ने भी नहीं सोचा था. हालाँकि असम में भाजपा के लिए जमीन पिछले चुनावों में ही तैयार हो चुकी थी, परन्तु सिर्फ कार्यकर्ता या माहौल होने से चुनाव नहीं जीता जा सकता. चुनाव जीतने के लिए विपक्षी की रणनीति समझना और एक करिश्माई नेता की जरूरत होती है. असम में भाजपा के लिए यह कमी पूरी की AGP से आए सर्बानान्द सोनोवाल ने और काँग्रेस से भाजपा में आए हिमंता सरमा ने. असम में हिन्दू आबादी घटते-घटते 68% तक पहुँच चुकी है, जबकि काँग्रेस की मेहरबानियों से बांग्लादेशी घुसपैठियों और बदरुद्दीन अजमल जैसों के कारण मुस्लिम आबादी 32% तक पहुँच चुकी है. इस बार असम में असली राजनीति 68 बनाम 32 की ही थी, जिसे भाजपा ने बखूबी भुनाया. इसके अलावा काँग्रेस के भीतर उठता असंतोष, गोगोई परिवार का एकाधिकारवाद एवं दिल्ली में बैठे काँग्रेसी नेतृत्त्व द्वारा गोगोई पर अंधविश्वास करते हुए पार्टी की दूसरी पंक्ति को बिलकुल नज़रंदाज़ कर दिया जाना भी एक प्रमुख कारण रहा. असम में भाजपा ने अपना वोट प्रतिशत 12% से बढ़ाकर सीधे तीन गुना यानी 36% कर लिया, और सीटें सीधा दो-तिहाई. 


चुनाव परिणामों को देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि जहाँ काँग्रेस सिकुड़ती जा रही है, भाजपा उन्हीं क्षेत्रों में अपने पैर पसारती जा रही है. भाजपा का वोट प्रतिशत भले ही अभी सीटों में नहीं बदल रहा है, लेकिन आने वाले कुछ ही वर्षों में जब यह वोट प्रतिशत बीस-बाईस प्रतिशत से ऊपर निकल जाएगा, तो सबसे पहले केरल जैसे राज्य में भाजपा “किंगमेकर” की भूमिका में आ जाएगी. तमिलनाडु में फिलहाल दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों के लिए कोई स्थान नहीं है. तमिलनाडु में जीके मूपनार ने काँग्रेस को जहाँ छोड़ा था, आज काँग्रेस उससे भी नीचे चली गई है, ना तो मणिशंकर अय्यर उसे बचा सकते हैं और ना ही राहुल गाँधी. जब भी राहुल गाँधी का विषय आता है, कई वरिष्ठ काँग्रेसी भी दबी ज़बान से यह स्वीकार करते हैं कि राहुल गाँधी में ना तो चुनाव जीतने का करिश्मा है और ना ही उनमें राजनैतिक इच्छाशक्ति दिखाई देती है. ऐसा प्रतीत होता है मानो अनिच्छुक होते हुए भी उन्हें जबरदस्ती काँग्रेस उपाध्यक्ष पद पर बैठाए रखा गया है. कई कांग्रेसियों को अब अपने भविष्य की चिंता सताने लगी है, इसीलिए जैसे रीता बहुगुणा समाजवादी पार्टी में चली गईं अथवा दिग्विजय सिंह सरेआम “पार्टी में सर्जरी” की बातें कहने लगे हैं अथवा जब सलमान खुर्शीद कहते हैं कि मोदी पर आक्रमण को लेकर काँग्रेस को गहन आत्मचिंतन करना चाहिए, तो इन सभी का मतलब एक ही होता है कि अब काँग्रेस पार्टी गंभीर अवस्था में पहुँच चुकी है. 

इन सभी पुराने कांग्रेसियों की चिंता वाजिब भी है. राहुल गाँधी के उपाध्यक्ष बनने के बाद से पार्टी लोकसभा चुनाव समेत ग्यारह चुनाव हार चुकी है. असम और केरल की सत्ता हाथ से निकल जाने के बाद तो यह स्थिति बनी है कि देश की मात्र 7.3% जनता पर ही काँग्रेस का शासन है, जबकि 43.1% देश की जनता पर भाजपा का अकेले शासन है. बचा हुआ पचास प्रतिशत राजद, जदयू, जयललिता, ममता, बीजद, वामपंथी जैसे क्षेत्रीय दलों का है, जो अपने-अपने इलाके में काँग्रेस से बहुत मजबूत हैं. अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में कर्नाटक, उत्तराखंड और हिमाचल में काँग्रेस रहेगी या जाएगी, कहा नहीं जा सकता. 


आखिर काँग्रेस की लगातार यह दुर्गति क्यों होती जा रही है? कारण है मोदी सरकार द्वारा निरंतर शुरू की जारी नई-नई योजनाएँ और उनका सफल क्रियान्वयन. देश की जनता भले ही आज महँगाई से त्रस्त हो, परन्तु उन्होंने काँग्रेस का जो भीषण और नंगा भ्रष्टाचार देखा था, उसके मुकाबले पिछले दो वर्ष में मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं लगा है. मोदी सरकार के कुछ मंत्री तो बेहद उम्दा कार्य कर रहे हैं, चाहे बिजली और कोयला क्षेत्र में पीयूष गोयल हों, सड़क परिवहन और नए राजमार्ग बनाने के मामले में नितिन गड़करी हों, रक्षा मंत्रालय जैसे अकूत धन सम्पदा वाले मंत्रालय को संभालने वाले ईमानदार मनोहर पर्रीकर हों या रेलवे मंत्रालय में नित-नवीन प्रयोग करते हुए जनता के लिए सुविधाएँ जुटाने वाले सुरेश प्रभू हो... अथवा विदेश में फँसे किसी भारतीय के एक ट्वीट पर पूरे दूतावास को दौड़ाने वाली सुषमा स्वराज हों... सभी के सभी बेहतरीन कार्य कर रहे हैं. इन सबके ऊपर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जिन्होंने पिछले दो वर्ष में प्रशासन में भ्रष्टाचार के कई छेद बन्द किए हैं, तथा नवीन तकनीक अपनाते हुए राशन कार्ड, गैस, केरोसीन की कालाबाजारी करने वाले तथा बोगस (नकली) उपभोक्ताओं की पहचान की है. सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद कोयला ब्लॉक आवंटन की नई नीति ने तो कमाल ही कर दिया है, तथा उच्च स्तर पर होने वाले भीषण भ्रष्टाचार को काफी हद तक कम किया है. 

यूँ तो दो वर्ष में मोदी सरकार की कई उपलब्धियाँ रही हैं, परन्तु यहाँ हम संक्षेप में कुछ बिंदुओं को देखते हैं, जिनके कारण मोदी सरकार की लोकप्रियता बढ़ी और काँग्रेस की घटी. मोदी सरकार की सबसे सफल योजना “जन-धन योजना” कही जा सकती है, जिसमें पन्द्रह करोड़ बैंक खाते खुलवाए गए. इन खातों में दस करोड़ खाते ऐसे हैं जिन्हें रू-पे डेबिट कार्ड भी दिया गया है, जिसमें जीवन बीमा भी शामिल है. गैस सब्सिडी, मनरेगा का पैसा इत्यादि अब सीधे बैंक खाते में जाता है, जिसके कारण निचले स्तर पर भ्रष्टाचार में भारी कमी आई है. इसके अलावा दवाओं के दामों पर नियंत्रण के लिए जो क़ानून लाया गया और सभी जीवनरक्षक एवं अति-आवश्यक दवाओं के दामों में भारी कमी हुई, उसके कारण जनता में एक अच्छा सन्देश गया है. फ्रांस सरकार से 36 राफेल विमानों की खरीदी में त्वरित निर्णय एवं पिछली सरकार के मुकाबले इन विमानों के दामों में कमी करवाना हो, या फिर “मेक इन इण्डिया” और मुद्रा बैंक कार्यक्रम के तहत छोटे-मझोले उद्योगों को प्राथमिकता देने तथा पचास हजार से दस लाख रूपए के ऋण सरलता से देने जैसी नीतियाँ हों, इन सभी कार्यक्रमों को समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों ने हाथोंहाथ लिया है. 

देश की जनता यह भी देख रही है कि किस तरह काँग्रेस और विपक्षी दल मोदी सरकार को GST बिल पास नहीं करने दे रहे, किस तरह विभिन्न मुद्दों पर संसद ठप रखे रहते हैं... किस तरह कन्हैया-उमर खालिद जैसे देशद्रोहियों को समर्थन देकर देश में अशांति का माहौल पैदा कर रहे हैं... जातिवादी राजनीति का ज़हर युवाओं के दिमाग में घोल रहे हैं... जनता अब इन सब हथकंडों से ऊब चुकी है, परन्तु काँग्रेस इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं है. इसीलिए जब राहुल गाँधी अचानक रात को JNU पहुँच जाते हैं, अथवा जबरिया दलित घोषित किए गए रोहित वेमुला की लाश पर आँसू बहाते नज़र आते हैं या फिर मल्लिकार्जुन खड़गे खामख्वाह किसी बात पर संसद ठप्प करने की कोशिश करते हैं तो जनता मन में ठानती जाती है कि अब काँग्रेस को वोट नहीं देना है. नतीजा वही हो रहा है, जो इन विधानसभा चुनावों में हमें देखने को मिल रहा है... जनता अब क्षेत्रीय दलों को काँग्रेस से बेहतर समझने लगी है, जो कि देश और खासकर काँग्रेस के लिए अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता... देखना तो यही है कि काँग्रेस खुद में “बदलाव” कब लाती है? या फिर लाती भी है कि नहीं?? कहीं ऐसा ना हो कि अगले वर्ष हिमाचल, उत्तराखण्ड या कर्नाटक में से एकाध-दो राज्य भी उसके हाथ से खिसक जाएँ और 125 साल पुरानी काँग्रेस एक “क्षेत्रीय दल” बनकर रह जाए... देखा जाए तो यह स्थिति भाजपा के लिए भी ठीक नहीं है, लेकिन क्या किया जा सकता है, “होईहे वही, जो राम रचि राखा”... क्योंकि नेशनल हेरल्ड और अगस्ता मामले में अब राम ही बचाएँ तो बचाएँ...

Friday, April 29, 2016

Posting Rapist Bishop in India



वेटिकन द्वारा रेपिस्ट पादरी की भारत में नियुक्ति 


पिछले कुछ वर्षों में चर्च के पादरियों द्वारा बाल यौन शोषण की घटनाएँ पश्चिम में अत्यधिक मात्रा में बढ़ गई हैं. समूचा वेटिकन प्रशासन एवं स्वयं पोप पादरियों की इस “मानसिक समस्या” से बहुत त्रस्त हैं. पोप फ्रांसिस और इससे पहले वाले पोप ने भी मीडिया के सामने खुद स्वीकार किया है कि पादरियों में बाल यौन शोषण की “बीमारी” एक महामारी बन चुकी है. पश्चिमी देशों में मुक्त यौन व्यवहार एवं खुले समाज के कारण इस प्रकार की घटनाएँ जल्द ही सामने भी आ जाती हैं, इसीलिए सन 2001 से 2014 के बीच वेटिकन ने अपने पादरियों के गुनाह छिपाने के लिए न्यायालय से बाहर “सहमति से समझौते” के तहत लाखों डॉलर मुआवजे के रूप में बाँटे हैं. 

दूसरी तरफ भारत एक सांस्कृतिक समाज है, जहाँ यौन स्वच्छंदता कतई आम बात नहीं है. यहाँ पर लड़कियाँ अक्सर पीछे रहती हैं, और जब मामला यौन शोषण अथवा बलात्कार का हो, तो उस लड़की पर समाज और परिवार का इतना जबरदस्त दबाव होता है कि वह खुलकर अपने अत्याचारी के खिलाफ सामने आ ही नहीं पाती. एक सर्वे के अनुसार बलात्कार एवं यौन शोषण के 92% मामले वहीं दबा दिए जाते हैं, जबकि बचे हुए 8% में भी सजा होने का प्रतिशत बहुत कम है, क्योंकि जागरूकता की कमी है. भारत के ऐसे माहौल में वेटिकन के उच्चाधिकारी एक बलात्कारी पादरी को भारत में नियुक्त कर रहे हैं. 


जी हाँ, चौंकिए नहीं... रेव्हरेंड जोसफ जेयापौल नामक पादरी की नियुक्ति जल्द ही भारत के किसी चर्च में की जाने वाली है. रेवरेंड जेयापौल 2011 तक अमेरिका के मिनेसोटा प्रांत में डायोसीज ऑफ क्रुक्सटन में पादरी था, जहाँ इसने मीगन पीटरसन नाम की चौदह वर्षीय लड़की के साथ लगातार एक वर्ष तक बलात्कार और यौन शोषण किया. कोर्ट में खुद पीटरसन के लिखित बयान के अनुसार, “मैं फादर जेयापौल से सबसे पहली बार 2004 में मिली, जब उनका ट्रांसफर कनाडा की सीमा पर स्थित मिनेसोटा प्रांत के एक गाँव ग्रीनबुश में ब्लेस्ड सेक्रामेन्टो चर्च में हुआ. मैं बचपन से ही बहुत ही धार्मिक लड़की थी, और रोज़ाना चर्च जाती थी. मेरा सपना था कि मैं नन बनूँ. पहली ही भेंट में फादर जेयापौल ने मुझे धार्मिक किताबें देने के बहाने अपने निजी कमरे में बुलाया. मैं छोटी थी, इसलिए उसकी नीयत नहीं भाँप सकी. लेकिन उसने मुझे बहला-फुसलाकर मुझे “पापी” होने का अहसास दिलाया और पापों से मुक्त करने के बदले उसने लगातार एक वर्ष तक उस चर्च में यौन शोषण किया. मुझे जान से मारने और पीटने की धमकी देकर उसने मुझे बहुत डरा दिया था, इसलिए मैं किसी के सामने मुँह खोलने से घबराती थी. लेकिन जब यह सिलसिला लगातार चलता रहा और मैं थोड़ी बड़ी हुई, तब मुझमे हिम्मत जागी और मैंने अपने परिवार वालों को इसके बारे में बताया”. 


जब पीटरसन के परिवार वालों ने वेटिकन में शिकायत की तो पहले अधिकारियों द्वारा लीपापोती की कोशिशें की गईं, लेकिन जब परिवार ने सीधे पोप फ्रांसिस से संपर्क किया तब जाकर काफी टालमटोल के बाद 2010 में रेवरेंड जोसफ जेयापौल को चर्च से निलंबित (सिर्फ निलंबित) किया गया. पीटरसन के परिजनों ने वेटिकन पर मुकदमा दायर कर दिया और 2011 में पादरी की सजा कम करने के समझौते के तहत कोर्ट के बाहर आपसी सहमति से सात लाख पचास हजार डॉलर का मुआवज़ा वसूल किया. सजा सुनते ही यह पादरी भारत भाग निकला, लेकिन 2012 में इंटरपोल ने इसे पकड़कर पुनः अमेरिकी पुलिस के हवाले कर दिया. दो वर्ष की जेल काटने के बाद रेवरेंड जोसफ रिहा हो गया और वेटिकन ने इसे पुनः चर्च की सेवाओं में शामिल कर लिया. 

ताज़ा खबर यह है कि फरवरी 2016 में जब इस बहादुर लड़की पीटरसन को यह पता चला कि फादर जोसफ जेयापौल को एक नए असाइनमेंट के तहत विशेष नियुक्ति देकर भारत के किसी चर्च में भेजा जा रहा है, तब इसे और इसके परिवार को तगड़ा झटका लगा. पीटरसन कहती हैं, कि “यह बेहद अपमानजनक निर्णय है, वेटिकन कैसे एक बलात्कारी को पुनः किसी चर्च में नियुक्त कर सकता है? भारत जाकर यह आदमी पता नहीं कितनी लड़कियों का जीवन खराब करेगा, जहाँ वे इसके खिलाफ खुलकर सामने भी नहीं आ सकेंगी” अब इसने पुनः वेटिकन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. फिलहाल पादरी जेयापौल 61 वर्ष का है, और पीटरसन द्वारा इस मामले में पुनः आवाज़ उठाने के कारण भारत भेजने का फैसला कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया गया है, लेकिन यह स्थिति कब तक रहेगी कहा नहीं जा सकता. हो सकता है निकट भविष्य में दिल्ली अथवा तमिलनाडु के किसी चर्च में रेवरेंड जोसफ जेयापौल को बिशप नियुक्त कर दिया जाए... 

बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत के “प्रगतिशील”(??) महिला संगठन वेटिकन के इस निर्णय के खिलाफ अपना मुँह खोलेंगे?? भारत के वामपंथी और सेकुलर बुद्धिजीवी, जेल काट चुके इस बाल यौन अपराधी को भारत में पादरी बनाने का विरोध करेंगे?? या फिर इनकी सारी बौद्धिक तोपें सिर्फ हिन्दू संतों के विरोध हेतु आरक्षित हैं??