Sunday, August 2, 2015

Missionaries, NGOs and Child Labour

मिशनरी संस्थाएँ और एनजीओ :- बाल श्रमिक तथा यौन शोषण दुष्चक्र  


हमारे भारत के “तथाकथित मेनस्ट्रीम” मीडिया में कभीकभार भूले-भटके महानगरों में काम करने वाले घरेलू नौकरों अथवा नौकरानियों पर होने वाले अत्याचारों एवं शोषण की दहला देने वाली कथाएँ प्रस्तुत होती हैं. परन्तु चैनलों अथवा अखबारों से जिस खोजी पत्रकारिता की अपेक्षा की जाती है वह इस मामले में बिलकुल नदारद पाई जाती है. आदिवासी इलाके से फुसलाकर लाए गए गरीब नौकरों-नौकरानियों की दर्दनाक दास्तान बड़ी मुश्किल से ही “हेडलाइन”, “ब्रेकिंग न्यूज़” या किसी “स्टिंग स्टोरी” में स्थान पाती हैं. ऐसा क्यों होता है? जब एक स्वयंसेवी संस्था ने ऐसे कुछ मामलों में अपने नाम-पते गुप्त रखकर तथा पहचान छिपाकर खोजबीन और जाँच की तब कई चौंकाने वाले खुलासे हुए. दिल्ली-मुम्बई-कोलकाता-अहमदाबाद जैसे महानगरों में की गई इस जाँच से पता चला कि बड़े-बड़े शक्तिशाली NGOs तथा कई मिशनरी संस्थाएँ एक बड़े “रैकेट” के रूप में इस करोड़ों रूपए के “धंधे” को चला रही हैं

इस संस्था को जितनी जानकारी प्राप्त हुई है उसके अनुसार इन NGOs एवं मिशनरी संस्थाओं की कार्यशैली इस प्रकार है. सबसे पहले ईसाई मिशनरियाँ भारत के दूरदराज आदिवासी क्षेत्रों में गरीब आदिवासियों को शहर में अच्छी नौकरी और परिवार को नियमित मासिक धन का ऐसा लालच देती हैं कि उसे नकार पाना मुश्किल ही होता है. उस गरीब परिवार की एक लड़की को वह संस्था पहले अपनी शरण में लेकर ईसाई बनाती है और उसे महानगर में उन्हीं की किसी कथित “प्लेसमेंट एजेंसी” के जरिये नौकरानी बनाकर भेज देती है. यह प्लेसमेंट एजेंसी उस धनाढ्य परिवार से पहले ही 30 से 50,000 रूपए “विश्वसनीय नौकरानी” की फीस के रूप में वसूल लेते हैं. 

गाँव में बैठी मिशनरी संस्था और महानगरों की एजेंसी के बीच में भी “दलालों” की एक कड़ी होती है, जो इन नौकरों-नौकरानियों को बेचने अथवा ट्रांसफर करने का काम करते हैं. यह एक तरह से “मार्केट सप्लाय चेन” के रूप में काम करता है और प्रत्येक स्तर पर धन का लेन-देन किया जाता है. महानगर में जो कथित प्लेसमेंट एजेंसी होती है, वह इन नौकरानियों को किसी भी घर में चार-छह माह से अधिक टिकने नहीं देती और लगातार अलग-अलग घरों में स्थानान्तरित किया जाता है. जो परिवार पूरी तरह सिर्फ नौकरों के भरोसे रहते हैं, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके यहाँ कौन काम कर रहा है, क्योंकि उन्हें तो सिर्फ अपने काम पूर्ण होने से मतलब रहता है. चूँकि विश्वसनीयता (खासकर उस नौकर द्वारा चोरी करने वगैरह) की जिम्मेदारी उस एजेंसी की होती है, इसलिए मालिक को कोई फर्क नहीं पड़ता कि नौकरानी कौन है, कहाँ से आई है या चार महीने में ही क्यों बदल गई? इस प्रकार यह प्लेसमेंट एजेंसी एक ही नौकरानी को तीन-चार-छः घरों में स्थानांतरित करते हुए उन धनाढ्यों से धन वसूलती रहती है.  

सामान्यतः इन घरेलू नौकरानियों को ना तो अच्छी हिन्दी आती है और ना ही अंग्रेजी. चूँकि उधर सुदूर गाँव में मिशनरी ने मोर्चा संभाला हुआ होता है, इसलिए परिवार को भी कोई चिंता नहीं होती, क्योंकि उस नौकरानी के वेतन में से अपना कमीशन काटकर वह NGO उस परिवार को प्रतिमाह एक राशि देता है, इसलिए वे कोई शिकायत नहीं करते. परन्तु इधर महानगर में वह नौकरानी सतत तनाव में रहती है और बार-बार घर बदलने तथा प्लेसमेंट एजेंसी अथवा NGO पर अत्यधिक निर्भरता के कारण अवसादग्रस्त हो जाती है. इसी बीच इन तमाम कड़ियों में कुछ व्यक्ति ऐसे भी निकल आते हैं जो इनका यौन शोषण कर लेते हैं, परन्तु परिवार से कट चुकी इन लड़कियों के पास वहीं टिके रहने के अलावा कोई चारा नहीं होता. एक अनुमान के मुताबिक़ अकेले दिल्ली में लगभग 6000 ऐसी नौकरानियां काम कर रही हैं. जबकि उधर दूरस्थ आदिवासी इलाके में उसका परिवार चर्च से एकमुश्त मोटी रकम लेकर धर्मान्तरित ईसाई बन चुका होता है



अपने “शिकार” पर मजबूत पकड़ तथा इन संस्थाओं की गुण्डागर्दी की एक घटना हाल ही में दिल्ली में दिखाई दी थी, जब एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में ऊँचे वेतन पर पदस्थ एक महिला को दिल्ली पुलिस ने अपनी “नौकरानी पर अत्याचार” के मामले में थाने पर बैठा लिया था. महिला पर आरोप था कि उसने एक नाबालिग आदिवासी लड़की के साथ मारपीट की है. पुलिस जाँच में पता चला कि वह लड़की झारखण्ड के संथाल क्षेत्र से आई है और उसका परिवार बेहद गरीब है. हमारी “सनसनी-प्रिय” मीडिया ने खबर को हाथोंहाथ लपका और दिन भर “बालश्रम” विषय पर तमाम लेक्चर झाडे, खबरें बनाईं. जाँच में आगे पता चला कि उस लड़की को सिर्फ तीन माह पहले ही उस संभ्रांत महिला के यहाँ किसी एजेंसी द्वारा लाया गया था और इससे पहले कम से कम बीस घरों में वह इसी प्रकार काम कर चुकी थी. दिल्ली पुलिस ने जब झारखंड संपर्क किया तो पता चला कि लड़की 18 वर्ष पूर्ण कर चुकी है. यहाँ पर पेंच यह है कि जब उस महिला ने पुलिस को पैसा खिलाने से इनकार कर दिया तब पुलिस ने मामला रफा-दफा कर दिया, जबकि होना यह चाहिए था कि पुलिस उस नौकरानी द्वारा काम किए पिछले सभी घरों की जाँच करती (क्योंकि तब वह नाबालिग थी) और साथ ही उस कथित प्लेसमेंट एजेंसी के कर्ताधर्ताओं की भी जमकर खबर लेती, तो तुरंत ही यह “रैकेट” पकड़ में आ जाता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि जिस NGO और मिशनरी संस्था से उस एजेंसी की साँठगाँठ थी, उसने ऊपर से कोई राजनैतिक दवाब डलवा दिया और वह नौकरानी चुपचाप किसी और मालिक के यहाँ शिफ्ट कर दी गई. केस खत्म हो गया

दिल्ली पुलिस के अधिकारी भी इस रैकेट के बारे में काफी कुछ जानते हैं, परन्तु कोई भी कार्रवाई करने से पहले उन्हें बहुत सोचना पड़ता है. क्योंकि अव्वल तो वह नौकरानी “ईसाई धर्मान्तरित” होती है, और उसके पीछे उसका बचाव करने वाली शक्तिशाली मिशनरी संस्थाएँ, NGOs होते हैं, जिनके तार बड़े राजनेताओं से लेकर झारखंड-उड़ीसा के दूरदराज स्थानीय संपर्कों तक जुड़े होते हैं. इन्हीं संगठनों द्वारा ऐसे ही कामों और ब्लैकमेलिंग के लिए महानगरों में कई मानवाधिकार संगठन भी खड़े किए होते हैं. इसलिए पुलिस इनसे बचकर दूर ही रहती है. दिल्ली की उस संभ्रांत महिला के मामले में भी यही हुआ कि वृंदा करात तत्काल मामले में कूद पड़ी और उस महिला पर दबाव बनाते हुए उसे शोषण, अत्याचार वगैरह का दोषी बता डाला, लेकिन इस बात की माँग नहीं की, कि उस एजेंसी तथा उस नौकरानी के पूर्व-मालिकों की भी जाँच हो. क्योंकि यदि ऐसा होता तो पूरी की पूरी “सप्लाय चेन” की पोल खुलने का खतरा था. यही रवैया दूसरे राजनैतिक दलों का भी रहता है. उन्हें भी अपने आदिवासी गरीब वोट बैंक, मिशनरी संस्थाओं से मिलने वाले चन्दे और दूरदराज में काम कर रहे NGOs से कार्यकर्ता आदि मिलते हैं. इसलिए कोई भी राजनैतिक दल इस मामले में गंभीर नहीं है और यथास्थिति बनाए रखता है

बालश्रम, शोषण के ऐसे मामलों में कुछ शातिर NGOs इसमें भी ब्लैकमेलिंग के रास्ते खोज लेते हैं. चूँकि उनके पास संसाधन हैं, अनुभव है, नेटवर्क है, तो वे धनाढ्य परिवार को धमकाते हैं कि यदि वे अपनी भलाई चाहते हों तथा पुलिस के चक्करों से बचना चाहते हों तो फलाँ राशि उन्हें दें अन्यथा नौकरानी कैमरे और पुलिस के सामने कह देगी कि उसके साथ यौन शोषण भी किया गया है. पुलिस के अनुसार कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि जब उस एजेंसी (अथवा NGO) को यह लगने लगता है कि बात बिगड़ने वाली है या अब उस परिवार को नौकरानी की जरूरत नहीं रहेगी इसलिए भविष्य में उस परिवार से उनकी आमदनी का जरिया खत्म होने वाला है तो वे इन्हीं नौकरानियों को डरा-धमकाकर महँगे माल की चोरी करवाकर उन्हें रातोंरात वापस उनके गाँव भेज देती हैं. यदि कभी कोई लड़की गलती से तेजतर्रार निकली, बातचीत अच्छे से कर लेती हो, थोड़ी बहुत अंग्रेजी भी सीख चुकी है तो उसे “गोद लेने” के नाम पर अपने किसी विदेशी नेटवर्क के जरिये यूरोप अथवा खाड़ी देशों में भेज दी जाती है. 

भारत के मीडिया के बारे में तो कहना ही क्या?? “खोजी पत्रकारिता” किस चिड़िया का नाम है, ये तो वे बरसों पहले भूल चुके हैं. इतने सारे संसाधन और रसूख होने के बावजूद उन्हें मानवता से कोई लेना-देना नहीं. किसी घरेलू नौकरानी के शोषण और अत्याचार का मामला उनके लिए TRP बढ़ाने और सनसनीखेज खबर बनाने का माध्यम भर होता है, उन्हें इस बात की कतई चिंता नहीं है कि आखिर ये नौकरानियाँ कहाँ से आती हैं? क्यों आती हैं? कौन इन्हें लाता है? इनका पूरा वेतन क्या वास्तव में उनके ही पास अथवा परिवार के पास पहुँचता है या नहीं? “प्लेसमेंट एजेंसी” क्या काम कर रही है? उनकी फीस कितनी है? ऐसे अनगिनत सवाल हैं परन्तु मीडिया, नेता, पुलिस, तंत्र सभी खामोश हैं और उधर खबर आती है कि 2014-15 में पश्चिम बंगाल से सर्वाधिक 11,000 लड़कियाँ रहस्यमयी तरीके से गायब हुई हैं, जिनका कोई एक साल से कोई अतापता नहीं चला. 

यदि केन्द्र सरकार अपनी सक्षम एजेंसियों के मार्फ़त महानगरों में काम करने वाली नौकरानियों के बारे में एक विस्तृत जाँच करवाए तो कई जाने-माने मिशनरी संस्थाएँ एवं NGOs के चेहरे से नकाब उतारा जा सकता है, जो दिन में "Save the Girl Child", "Donate for a Girl Child" के नारे लगाते हैं, लेकिन रात में "मानव तस्कर" बन जाते हैं... 

Sunday, July 26, 2015

ICHR and Intellectual Thugs

ICHR में बौद्धिक लुटेरे


क्या आपने कभी सुना है कि सरकार ने एक पुस्तक लिखवाने के लिए चालीस लाख रूपए खर्च कर दिए हों? या फिर कभी किसी ऐसे बौद्धिक प्रोजेक्ट(?) के बारे में सुना है जो पिछले 43 वर्ष से चल रहा हो, जिस पर करोड़ों रूपए खर्च हो चुके हों और अभी भी पूरा नहीं हुआ हो? 

यदि नहीं सुना हो, तो दिल थामकर बैठिये... ICHR जिसे हम “भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद्” के नाम से जानते हैं, वहाँ पर ऐसी कई बौद्धिक लूट हुई हैं. जैसा कि शायद आप जानते ही होंगे, पिछले साठ वर्षों से इतिहास शोध, संगोष्ठियों, सेमिनारों, फेलोशिप्स, स्कॉलरशिप से लेकर पाठ्यक्रमों में हिन्दू विरोधी तथा भारत विरोधी ज़हर भरने का ठेका वामपंथ के पास था. केन्द्र में जो भी काँग्रेस सरकार आई, उसने कभी इन अजगरों की आरामतलबी में कोई खलल उत्पन्न नहीं किया, बल्कि इन्हें समुचित हड्डियाँ देकर पाला-पोसा. पिछले कई वर्षों से “स्पेशल रिसर्च प्रोजेक्ट्स” के नाम पर यह बौद्धिक डाकाजनी चल रही थी. 


उपरोक्त स्पेशल रिसर्च प्रोजेक्ट्स, जिन्हें मात्र कुछ वर्षों एवं दो-चार लाख रुपयों में खत्म हो जाना चाहिए था, करदाताओं की गाढ़ी कमाई के बल पर इन्हें लगातार कई वर्षों तक घसीटा गया. ना तो कोई हिसाब दिया गया और ना ही देरी की वजह बताई गई. कई तथाकथित सम्माननीय इतिहासकार और विद्वान इस खुली लूट में शामिल रहे, जिनमें प्रमुख हैं बिपन चंद्रा, इरफ़ान हबीब और के एम श्रीमाली. आधुनिक भारतीय इतिहास के “विद्वान”(??) माने जाने वाले स्वर्गीय बिपन चंद्रा साहब का एक प्रोजेक्ट “Towards Freedom” तो 1972 में शुरू हुआ था, लेकिन आज तक खत्म नहीं हुआ. लाखों रूपए खर्च हो गए, बिपन चंद्रा साहब बिना हिसाब दिए स्वर्गवासी भी हो गए, लेकिन यह प्रोजेक्ट आज भी अधूरा है. ऐसे होते हैं महान बुद्धिजीवी... इसी महालूट से व्यथित होकर ही श्री अरुण शौरी ने 1998 में रोमिला थापर समेत ऐसे ढेरों फर्जी बुद्धिजीवियों की सरेआम पोल खोलते हुए एक पुस्तक लिखी थी “Eminent Historians” जिसमें तथ्य-दर-तथ्य इस गिरोह के बखिए उधेड़े गए हैं. अरुण शौरी के अनुसार बिपन चंद्रा साहब के इस कथित प्रोजेक्ट पर कम से कम तीन करोड़ रूपए खर्च हो चुके थे. पहले बिपन चंद्रा के बचाव में उतरे कुछ बुद्धिजीवियों ने तर्क दिया कि इस प्रोजेक्ट में सहायकों आदि के वेतन भत्ते को भी इस राशि में जोड़ा गया और छवि खराब करने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया. लेकिन जैसे ही पिछली ऑडिट रिपोर्ट सामने आना शुरू हुईं इनके नकली तर्कों और कथित बौद्धिकता की पोल खुल गई. 

ICHR की 2006-07 की सालाना रिपोर्ट के अनुसार प्रोफ़ेसर बिपन चंद्रा को दो सहायक “विशेष बजट मद” के तहत दिए गए थे. प्रोफ़ेसर विशालाक्षी मेनन और IGNOU के प्रोफ़ेसर सलिल मिश्र को बिपन चंद्रा के मदद हेतु नियुक्त किया गया जिसका पूरा खर्च ICHR ने दिया, इस शर्त पर कि पहले ही प्रोजेक्ट देरी से चल रहा है, अतः अब इस प्रोजेक्ट को किसी भी हालत में 2008 तक पूरा किया जाना है. तो अब सवाल उठता है कि 2008 से लेकर बिपन चंद्रा की मौत तक (अर्थात 30 अगस्त 2014 तक) यह प्रोजेक्ट कहाँ अटका पड़ा था?? और इस पर जो खर्च जारी रहा, उसका हिसाब कौन देगा? करदाताओं के धन का ऐसा अनुपम अपव्यय करने वाले ये कथित बुद्धिजीवी इसके लिए जिम्मेदार क्यों नहीं माने जाने चाहिए? 

जब वाजपेयी सरकार ने ऐसे तमाम प्रोजेक्ट्स पर लगाम कसने की कोशिश की थी, उस समय भी पेट पर लात पड़ने के कारण यह गिरोह बुरी तरह बौखला गया था, परन्तु वाजपेयी सरकार को ना तो बहुमत हासिल था और ना उस सरकार में इस गिरोह से निपटने की इच्छाशक्ति थी. इसलिए जब कुछ वामपंथी बुद्धिजीवियों से ऐसे बाँटे गए लाखों रुपयों का हिसाब-किताब और प्रोजेक्ट्स में देरी की वजह पूछी गई तो जवाब देने में भारी टालमटोल की और बहाने बनाए. 

इरफ़ान हबीब और श्रीमाली का मामला भी इतना ही “रोचक”(??) है. इन्हें 1989 में एक प्रोजेक्ट सौंपा गया था, अगले पन्द्रह वर्ष में जिसके नौ खंड प्रकाशित होने चाहिए थे. प्रोजेक्ट का नाम था “Dictionary of Social, Economic and Administrative Terms in Indian/South Asian Inscriptions”, (अर्थात भारत एवं दक्षिण एशियाई देशों के शिलालेखों की सामाजिक, आर्थिक एवं प्रशासनिक डिक्शनरी). आज तक इस प्रोजेक्ट पर 42 लाख रूपए खर्च हो चुके हैं और श्रीमाली साहब ने ICHR में अभी तक पन्द्रह में से एक भी पांडुलिपि जमा नहीं करवाई है. नवनियुक्त अध्यक्ष सुदर्शन राव के अनुसार उन्हें आज भी पता नहीं है कि वास्तव में इस डिक्शनरी प्रोजेक्ट की आज की स्थिति क्या है? रिकॉर्ड के अनुसार 1990 से लेकर अब तक श्रीमाली के पास सिर्फ कुछ हजार कंप्यूटराइज्ड कार्ड भर हैं, जो कि उनके शोध सहायकों ने तैयार किए हैं (जिनका वेतन भी ICHR ने दिया). फिर सवाल उठता है कि पिछले पच्चीस वर्ष में किस बात का शोध हुआ? जो शोध हुआ, उसकी रिपोर्ट क्यों नहीं सौंपी गई? जो पैसा खर्च हुआ, उसका हिसाब कौन देगा? लेकिन यदि आप ऐसे सवाल पूछते हैं तो तत्काल “साम्प्रदायिक” और भाजपा के एजेंट” घोषित कर दिए जाते हैं. 

इरफ़ान हबीब नामक कथित महान इतिहासकार का रिकॉर्ड तो और भी खराब है. वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक़ उन्हें दिए गए प्रोजेक्ट की मियाद 2006-07 में ही खत्म हो चुकी है, लेकिन उन्होंने अभी तक अपनी पांडुलिपि ICHR में जमा ही नहीं की है. मजे की बात यह है कि 2011-12 और 2012-13 की वार्षिक रिपोर्ट में उनके शोध कार्य की फाईल पर “संतोषजनक प्रगति” लिखा गया है. जब कुछ पत्रकारों ने इस सम्बन्ध में पूछताछ की तो पता चला कि हबीब साहब ने खुद को उस प्रोजेक्ट से अलग कर लिया है और अब प्रोफ़ेसर शिरीन मूसावी उस पर काम कर रही हैं. फिर वही सवाल उठता है कि फिर तथाकथित इतिहास शोध के नाम पर जो लाखों रूपए खर्च हुए, उसकी उपयोगिता और हिसाब-किताब कौन देगा? क्या ये पैसा इरफ़ान हबीब से वसूला नहीं जाना चाहिए? 

यह तो मात्र तीन उदाहरण दिए हैं, जबकि वास्तव में यदि काँग्रेस-वामपंथ के तथाकथित बुद्धिजीवियों को मिले फंड्स, ग्रांट्स और फेलोशिप की सूक्ष्मता से जाँच की जाए तो एक विराट फर्जीवाड़ा सामने आ सकता है. इसके अलावा सेमीनार आयोजित करने, संगोष्ठियों और विभिन्न शोध यात्राओं के नाम पर हुए अनाप-शनाप खर्च का तो कोई हिसाब ही नहीं है. क्योंकि “जब सैंयाँ भए कोतवाल तो डर काहे का?”. इसीलिए जब मोदी सरकार पूर्ण बहुमत के साथ आई और स्मृति ईरानी, सुदर्शन राव आदि की नियुक्तियाँ हुईं तो इन कथित बुद्धिजीवियों और तथाकथित प्रोफेसरों/इतिहासकारों की तबियत यकायक गडबड होने लगी. अचानक इन्हें शिक्षा के स्तर की चिंता सताने लगी? इतिहास के विकृतिकरण (जो इन्होंने खुद किया) को लेकर बयान जारी होने लगे... क्योंकि इनकी असली बेचैनी यही है कि पिछले साठ साल की “पोलमपोल” खुलने वाली है. 


इसी ‘हिन्दू विरोधी मानसिकता’ से जुड़ा ताज़ा मामला FTII में गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति को लेकर होने वाले विरोध का है. कथित बुद्धिजीवियों को गजेन्द्र चौहान अयोग्य मालूम पड़ते हैं, लेकिन इन वामपंथी बुद्धिजीवियों ने यूआर अनंतमूर्ति की योग्यता पर कभी सवाल नहीं उठाए, जबकि उनका फिल्मज्ञान शून्य था लेकिन उनकी एकमात्र योग्यता “वामपंथी” और “हिन्दू-विरोधी” होना थी. अब FTII में पिछले दो माह से जो हडताल और प्रदर्शनों की नौटंकी चल रही है, उसकी परतें खुलने लगी हैं और जानकारी मिली है कि लगभग 40 छात्र वहाँ ऐसे हैं जो “घुसपैठिये” हैं. अर्थात जिनका कोर्स और पढ़ाई खत्म हो चुकी है, लेकिन वे होस्टलों पर कब्जा जमाए बैठे हैं और यही लोग गुण्डागर्दी करके बाकी छात्रों को भड़का रहे हैं कि वे गजेन्द्र चौहान का विरोध करें. सवाल उठता है कि पिछले पाँच वर्ष में इन गुर्गों को पाला-पोसा किसने? जवाब वही है... “कथित बौद्धिक गिरोह” ने. 

पिछले साठ वर्ष से “मिलीभगत द्वारा मुफ्त की मलाई” खाती हुई बिल्ली को, अचानक कोई डंडा मार दे, तो वह कैसे किकियाएगी?? बिलकुल वही ICHR, FTII जैसी संस्थाओं में हो रहा है...

Friday, July 17, 2015

Brihadishwara Temple - Classic Indian Architechture

बृहदीश्वर मंदिर : अदभुत वास्तुकला का उदाहरण 


क्या आप पीसा की झुकी हुई मीनार के बारे में जानते हैं?? जरूर जानते होंगे. बच्चों की पाठ्य-पुस्तकों से लेकर जवानी तक आप सभी ने पीसा की इस मीनार के बारे में काफी कुछ पढ़ा-लिखा होगा. कई पैसे वाले भारतीय सैलानी तो वहाँ होकर भी आए होंगे. पीसा की मीनार के बारे में, वहाँ हमें बताया जाता है कि उस मीनार की ऊँचाई 180 फुट है और इसके निर्माण में 200 वर्ष लगे थे तथा सन 2010 में इस मीनार ने अपनी आयु के 630 वर्ष पूर्ण कर लिए. हमें और आपको बताया गया है कि यह बड़ी ही शानदार और अदभुत किस्म की वास्तुकला का नमूना है. यही हाल मिस्त्र के पिरामिडों के बारे में भी है. आज की पीढ़ी को यह जरूर पता होगा कि मिस्त्र के पिरामिड क्या हैं, कैसे बने, उसके अंदर क्या है आदि-आदि. 

लेकिन क्या आपको तंजावूर स्थित “बृहदीश्वर मंदिर” (Brihadishwara Temple) के बारे में जानकारी है? ये नाम सुनकर चौंक गए ना?? मुझे विश्वास है कि पाठकों में से अधिकाँश ने इस मंदिर के बारे में कभी पढ़ना तो दूर, सुना भी नहीं होगा. क्योंकि यह मंदिर हमारे बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल नहीं है. ना तो भारतवासियों ने कभी अपनी समृद्ध परंपरा, विराट सांस्कृतिक विरासत एवं प्राचीन वास्तुकला के बारे में गंभीरता से जानने की कोशिश की और ना ही पिछले साठ वर्ष से लगभग सभी पाठ्यक्रमों पर कब्जा किए हुए विधर्मी वामपंथियों एवं सेकुलरिज़्म की “भूतबाधा” से ग्रस्त बुद्धिजीवियों ने इसका गौरव पुनर्भाषित एवं पुनर्स्थापित करने की कोई कोशिश की. भला वे ऐसा क्योंकर करने लगे?? उनके अनुसार तो भारत में जो कुछ भी है, वह सिर्फ पिछले 400 वर्ष (250 वर्ष मुगलों के और 150 वर्ष अंग्रेजों के) की ही देन है. उससे पहले ना तो कभी भारत मौजूद था, और ना ही इस धरती पर कुछ बनाया जाता था. “बौद्धिक फूहड़ता” की हद तो यह है कि भारत की खोज वास्कोडिगामा द्वारा बताई जाती है, तो फिर वास्कोडिगामा के यहाँ आने से पहले हम क्या थे?? बन्दर?? या भारत में कश्मीर से केरल तक की धरती पर सिर्फ जंगल ही हुआ करते थे?? स्पष्ट है कि इसका जवाब सिर्फ “नहीं” है. क्योंकि वास्कोडिगामा के यहाँ आने से पहले हजारों वर्षों पुरानी हमारी पूर्ण विकसित सभ्यता थी, संस्कृति थी, मंदिर थे, बाज़ार थे, शासन थे, नगर थे, व्यवस्थाएँ थीं... और यह सब जानबूझकर बड़े ही षडयंत्रपूर्वक पिछली तीन पीढ़ियों से छिपाया गया. उन्हें सिर्फ उतना ही पढ़ाया गया अथवा बताया गया जिससे उनके मन में भारत के प्रति “हीन-भावना” जागृत हो. पाठ्यक्रम कुछ इस तरह रचाए गए कि हमें यह महसूस हो कि हम गुलामी के दिनों में ही सुखी थे, उससे पहले तो सभी भारतवासी जंगली और अनपढ़ थे... 


बहरहाल... बात हो रही थी बृहदीश्वर मंदिर की. दक्षिण भारत के तंजावूर शहर में स्थित बृहदीश्वर मंदिर भारत का सबसे बड़ा मंदिर कहा जा सकता है. यह मंदिर “तंजावूर प्रिय कोविल” के नाम से भी प्रसिद्ध है. सन 1010 में अर्थात आज से एक हजार वर्ष पूर्व राजराजा चोल ने इस विशाल शिव मंदिर का निर्माण करवाया था. इस मंदिर की प्रमुख वास्तु (अर्थात गर्भगृह के ऊपर) की ऊँचाई 216 फुट है (यानी पीसा की मीनार से कई फुट ऊँचा). यह मंदिर न सिर्फ वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है, बल्कि तत्कालीन तमिल संस्कृति की समृद्ध परंपरा को भी प्रदर्शित करता है. कावेरी नदी के तट पर स्थित यह मंदिर पूरी तरह से ग्रेनाईट की बड़ी-बड़ी चट्टानों से निर्मित है. ये चट्टानें और भारी पत्थर पचास किमी दूर पहाड़ी से लाए गए थे. इसकी अदभुत वास्तुकला एवं मूर्तिकला को देखते हुए UNESCO ने इसे “विश्व धरोहर” के रूप में चिन्हित किया हुआ है. 


दसवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में चोल वंश के अरुलमोझिवर्मन नाम से एक लोकप्रिय राजा थे जिन्हें राजराजा चोल भी कहा जाता था. पूरे दक्षिण भारत पर उनका साम्राज्य था. राजराजा चोल का शासन श्रीलंका, मलय, मालदीव द्वीपों तक भी फैला हुआ था. जब वे श्रीलंका के नरेश बने तब भगवान शिव उनके स्वप्न में आए और इस आधार पर उन्होंने इस विराट मंदिर की आधारशिला रखी. चोल नरेश ने सबसे पहले इस मंदिर का नाम “राजराजेश्वर” रखा था और तत्कालीन शासन के सभी प्रमुख उत्सव इसी मंदिर में संचालित होते थे. उन दिनों तंजावूर चोलवंश की राजधानी था तथा समूचे दक्षिण भारत की व्यापारिक गतिविधियों का केन्द्र भी. इस मंदिर का निर्माण पारंपरिक वास्तुज्ञान पर आधारित था, जिसे चोलवंश के नरेशों की तीन-चार्फ़ पीढ़ियों ने रहस्य ही रखा. बाद में जब पश्चिम से मराठाओं और नायकरों ने इस क्षेत्र को जीता तब इसे “बृहदीश्वर मंदिर” नाम दिया. 


तंजावुर प्रिय कोविल अपने समय के तत्कालीन सभी मंदिरों के मुकाबले चालीस गुना विशाल था. इसके 216 फुट ऊँचे विराट और भव्य मुख्य इमारत को इसके आकार के कारण “दक्षिण मेरु” भी कहा जाता है. 216 फुट ऊँचे इस शिखर के निर्माण में किसी भी जुड़ाई मटेरियल का इस्तेमाल नहीं हुआ है. इतना ऊँचा मंदिर सिर्फ पत्थरों को आपस में “इंटर-लॉकिंग” पद्धति से जोड़कर किया गया है. इसे सहारा देने के लिए इसमें बीच में कोई भी स्तंभ नहीं है, अर्थात यह पूरा शिखर अंदर से खोखला है. भगवान शिव के समक्ष सदैव स्थापित होने वाली “नंदी” की मूर्ति 16 फुट लंबी और 13 फुट ऊँची है तथा एक ही विशाल पत्थर से निर्मित है. अष्टकोण आकार का मुख्य शिखर एक ही विशाल ग्रेनाईट पत्थर से बनाया गया है. इस शिखर और मंदिर की दीवारों पर चारों तरफ विभिन्न नक्काशी और कलाकृतियां उकेरी गई हैं. गर्भगृह दो मंजिला है तथा शिवलिंग की ऊँचाई तीन मीटर है. आगे आने वाले चोल राजाओं ने सुरक्षा की दृष्टि से 270 मीटर लंबी 130 चौड़ी बाहरी दीवार का भी निर्माण करवाया. सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी तक यह मंदिर कपड़ा, घी, तेल, सुगन्धित द्रव्यों आदि के क्रय-विक्रय का प्रमुख केन्द्र था. आसपास के गाँवों से लोग सामान लेकर आते, मंदिर में श्रद्धा से अर्पण करते तथा बचा हुआ सामान बेचकर घर जाते. सबसे अधिक आश्चर्य की बात यह है कि यह मंदिर अभी तक छः भूकंप झेल चुका है, परन्तु अभी तक इसके शिखर अथवा मंडपम को कुछ भी नहीं हुआ. दुर्भाग्य की बात यह है कि शिरडी में सांई की “मजार” की मार्केटिंग इतनी जबरदस्त है, परन्तु दुर्भाग्य से ऐसे अदभुत मंदिर की जानकारी भारत में कम ही लोगों को है. इस मंदिर के वास्तुशिल्पी कुंजारा मल्लन माने जाते हैं. इन्होंने प्राचीन वास्तुशास्त्र एवं आगमशास्त्र का उपयोग करते हुए इस मंदिर की रचना में (एक सही तीन बटे आठ या 1-3/8 अर्थात, एक अंगुल) फार्मूले का उपयोग किया. इसके अनुसार इस मात्रा के चौबीस यूनिट का माप 33 इंच होता है, जिसे उस समय "हस्त", "मुज़म" अथवा "किश्कु" कहा जाता था. वास्तुकला की इसी माप यूनिट का उल्लेख चार से छह हजार वर्ष पहले के मंदिरों एवं सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माण कार्यों में भी पाया गया है. कितने इंजीनियरों को आज इसके बारे में जानकारी है??

सितम्बर 2010 में इस मंदिर की सहस्त्राब्दि अर्थात एक हजारवाँ स्थापना दिवस धूमधाम से मनाया गया. UNESCO ने इसे “द ग्रेट चोला टेम्पल” के नाम से संरक्षित स्मारकों में स्थान दिया. इसके अलावा केन्द्र सरकार ने इस अवसर को यादगार बनाने के लिए एक डाक टिकट एवं पाँच रूपए का सिक्का जारी किया. परन्तु इसे लोक-प्रसिद्ध बनाने के कोई प्रयास नहीं हुए. 


अक्सर हमारी पाठ्यपुस्तकों में पश्चिम की वास्तुकला के कसीदे काढ़े जाते हैं और भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा को कमतर करके आँका जाता है अथवा विकृत करके दिखाया जाता है. इस विराट मंदिर को देखकर सहज ही कुछ सवाल भी खड़े होते हैं कि स्वाभाविक है इस मंदिर के निर्माण के समय विभिन्न प्रकार की गणितीय एवं वैज्ञानिक गणनाएँ की गई होंगी. खगोलशास्त्र तथा भूगर्भशास्त्र को भी ध्यान में रखा गया होगा. ऐसा तो हो नहीं सकता कि पत्थर लाए, फिर एक के ऊपर एक रखते चले गए और मंदिर बन गया... जरूर कोई न कोई विशाल नक्शा अथवा आर्किटेक्चर का पैमाना निश्चित हुआ होगा. तो फिर यह ज्ञान आज से एक हजार साल पहले कहाँ से आया? इस मंदिर का नक्शा क्या सिर्फ किसी एक व्यक्ति के दिमाग में ही था और क्या वही व्यक्ति सभी मजदूरों, कलाकारों, कारीगरों, वास्तुविदों को निर्देशित करता था? इतने बड़े-बड़े पत्थर पचास किमी दूर से मंदिर तक कैसे लाए गए?? 80 टन वजनी आधार पर दूसरे बड़े-बड़े पत्थर इतनी ऊपर तक कैसे पहुँचाया गया होगा?? या कोई स्थान ऐसा था, जहाँ इस मंदिर के बड़े-बड़े नक़्शे और इंजीनियरिंग के फार्मूले रखे जाते थे?? फिर हमारा इतना समृद्ध ज्ञान कहाँ खो गया और कैसे खो गया?? क्या कभी इतिहासकारों ने इस पर विचार किया है?? यदि हाँ, तो इसे संरक्षित करने अथवा खोजबीन करने का कोई प्रयास हुआ?? सभी प्रश्नों के उत्तर अँधेरे में हैं. 

संक्षेप में तात्पर्य यह है कि भारतीय कला, वास्तुकला, मूर्तिकला, खगोलशास्त्र आदि विषयों पर ज्ञान के अथाह भण्डार मौजूद थे (बल्कि हैं) सिर्फ उन्हें पुनर्जीवित करना जरूरी है. बच्चों को पीसा की मीनार अथवा ताजमहल (या तेजोमहालय??) के बारे में पढ़ाने के साथ-साथ शिवाजी द्वारा निर्मित विस्मयकारी और अभेद्य किलों, बृहदीश्वर जैसे विराट मंदिरों के बारे में भी पढ़ाया जाना चाहिए. इन ऐतिहासिक, पौराणिक स्थलों की “ब्राण्डिंग-मार्केटिंग” समुचित तरीके से की जानी चाहिए, वर्ना हमारी पीढियाँ तो यही समझती रहेंगी कि मिस्त्र के पिरामिडों में ही विशाल पत्थरों से निर्माण कार्य हुआ है, जबकि तंजावूर के इस मंदिर में मिस्त्र के पिरामिडों के मुकाबले चार गुना वजनी पत्थरों से निर्माण कार्य हुआ है.