Monday, August 24, 2015

Maratha Queen Tarabai and Aurangzeb

रानी ताराबाई : औरंगज़ेब का सपना चूर करने वाली मराठा वीरांगना 


भारत के इतिहास की पुस्तकों में अधिकांशतः हिन्दू राजाओं-रानियों एवं योद्धाओं को “पराजित” अथवा युद्धरत ही दर्शाया गया है. विजेता हिन्दू योद्धाओं के साम्राज्य, उनकी युद्ध रणनीति, उनके कौशल का उल्लेख या तो पुस्तकों में है ही नहीं, अथवा बहुत ही कम किया गया है. ज़ाहिर है कि यह जानबूझकर एवं व्यवस्थित रूप से इतिहास को विकृत करने का एक सोचा-समझा दुष्कृत्य है. जिस समय औरंगज़ेब लगभग समूचे उत्तर भारत को जीतने के पश्चात दक्षिण में भी अपने पैर जमा चुका था, उसकी इच्छा थी कि पश्चिमी भारत को भी जीतकर वह मुग़ल साम्राज्य को अखिल भारतीय बना दे. परन्तु उसके इस सपने को तोड़ने वाला योद्धा कोई और नहीं, बल्कि एक महिला थी, जिसका नाम था “ताराबाई”. ताराबाई के बारे में इतिहास की पुस्तकों में अधिक उल्लेख नहीं है, क्योंकि वास्तव में उसने छत्रपति शिवाजी की तरह कोई साम्राज्य खड़ा नहीं किया, परन्तु इस बात का श्रेय उसे अवश्य दिया जाएगा कि यदि ताराबाई नहीं होतीं तो न सिर्फ मराठा साम्राज्य का इतिहास, बल्कि औरंगज़ेब द्वारा स्थापित मुग़ल साम्राज्य के बाद आधुनिक भारत का इतिहास भी कुछ और ही होता. 


जिस समय मराठा साम्राज्य पश्चिमी भारत में लगातार कमज़ोर होता जा रहा था, तथा औरंगजेब मराठाओं के किले-दर-किले पर अपना कब्ज़ा करता जा रहा था, उस समय ताराबाई (1675-1761) ने सारे सूत्र अपने हाथों में लेते हुए न सिर्फ मराठा साम्राज्य को खण्ड-खण्ड होने से बचाया, बल्कि औरंगज़ेब को हार मानने पर मजबूर कर दिया. छत्रपति शिवाजी के प्रमुख सेनापति हम्बीर राव मोहिते की कन्या ताराबाई का जन्म 1675 में हुआ, ताराबाई ने अपने पूरे जीवनकाल में मराठा साम्राज्य में शिवाजी के राज्याभिषेक से लेकर सन 1700 में औरंगजेब के हाथों कमज़ोर किए जाने, तथा उसके बाद पुनः जोरदार वापसी करते हुए सन 1760 में लगभग पूरे भारत पर मराठा साम्राज्य की पताका फहराते देखा और अंत में सन 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में अहमद शाह अब्दाली के हाथों मराठों की भीषण पराजय भी देखी. ताराबाई का विवाह आठ वर्ष की आयु में शिवाजी के छोटे पुत्र राजाराम के साथ किया गया. छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक के कुछ वर्ष बाद ही 1680 में शिवाजी की मृत्यु हो गई. यह खबर मिलते ही औरंगज़ेब बहुत खुश हो गया. शिवाजी ने औरंगज़ेब को बहुत नुकसान पहुँचाया था, इसलिए औरंगज़ेब चिढ़कर उन्हें “पहाड़ी चूहा” कहकर बुलाता था. आगरा के किले से शिवाजी द्वारा चालाकी से फलों की टोकरी में बैठकर भाग निकलने को औरंगज़ेब अपनी भीषण पराजय मानता था, वह इस अपमान को कभी भूल नहीं पाया. इसलिए शिवाजी की मौत के पश्चात उसने सोचा कि अब यह सही मौका है जब दक्षिण में अपना आधार बनाकर समूचे पश्चिम भारत पर साम्राज्य स्थापित कर लिया जाए. 

शिवाजी की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र संभाजी राजा बने और उन्होंने बीजापुर सहित मुगलों के अन्य ठिकानों पर हमले जारी रखे. 1682 में औरंगजेब ने दक्षिण में अपना ठिकाना बनाया, ताकि वहीं रहकर वह फ़ौज पर नियंत्रण रख सके और पूरे भारत पर साम्राज्य का सपना सच कर सके. उस बेचारे को क्या पता था कि अगले 25 साल वह दिल्ली वापस नहीं लौट सकेगा और दक्षिण भारत फतह करने का सपना उसकी मृत्यु के साथ ही दफ़न हो जाएगा. हालाँकि औरंगजेब की शुरुआत तो अच्छी हुई थी, और उसने 1686 और 1687 में बीजापुर तथा गोलकुण्डा पर अपना कब्ज़ा कर लिया था. इसके बाद उसने अपनी सारी शक्ति मराठाओं के खिलाफ झोंक दी, जो उसकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा बने हुए थे. 


मुगलों की भारीभरकम सेना की पूरी शक्ति के आगे धीरे-धीरे मराठों के हाथों से एक-एक करके किले निकलने लगे और मराठों ने ऊँचे किलों और घने जंगलों को अपना ठिकाना बना लिया. औरंगजेब ने विपक्षी सेना में रिश्वत बाँटने का खेल शुरू किया और गद्दारों की वजह से संभाजी महाराज को संगमेश्वर के जंगलों के 1689 में औरंगजेब ने पकड़ लिया. औरंगजेब ने संभाजी से इस्लाम कबूल करने को कहा, संभाजी ने औरंगजेब से कहा कि यदि वह अपनी बेटी की शादी उनसे करवा दे तो वह इस्लाम कबूल कर लेंगे, यह सुनकर औरंगजेब आगबबूला हो उठा. उसने संभाजी की जीभ काट दी और आँखें फोड़ दीं, संभाजी को अत्यधिक यातनाएँ दी गईं, लेकिन उन्होंने अंत तक इस्लाम कबूल नहीं किया और फिर औरंगजेब ने संभाजी की हत्या कर दी. 

औरंगजेब लगातार किले फतह करता जा रहा था. संभाजी का दुधमुंहे बच्चा “शिवाजी द्वितीय” अब आधिकारिक रूप से मराठा राज्य का उत्तराधिकारी था. औरंगजेब ने इस बच्चे का अपहरण करके उसे अपने हरम में रखने का फैसला किया ताकि भविष्य में सौदेबाजी की जा सके. चूँकि औरंगजेब “शिवाजी” नाम से ही चिढता था, इसलिए उसने इस बच्चे का नाम बदलकर शाहू रख दिया और अपनी पुत्री जीनतुन्निसा को सौंप दिया कि वह उसका पालन-पोषण करे. औरंगजेब यह सोचकर बेहद खुश था कि उसने लगभग मराठा साम्राज्य और उसके उत्तराधिकारियों को खत्म कर दिया है और बस अब उसकी विजय निश्चित ही है. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं पाया. 

संभाजी की मृत्यु और उनके पुत्र के अपहरण के बाद संभाजी का छोटा भाई राजाराम अर्थात ताराबाई के पति ने मराठा साम्राज्य के सूत्र अपने हाथ में लिए. उन्होंने महसूस किया कि इस क्षेत्र में रहकर मुगलों की इतनी बड़ी सेना से लगातार युद्ध करना संभव नहीं है, इसलिए उन्होंने अपने पिता शिवाजी से प्रेरणा लेकर, अपने विश्वस्त साथियों के साथ लिंगायत धार्मिक समूह का भेष बदला और गाते-बजाते आराम से सुदूर दक्षिण में जिंजी के किले में अपना डेरा डाल दिया. इसके बाद चमत्कारिक रूप से राजाराम ने जिंजी के किले से ही मुगलों के खिलाफ जमकर गुरिल्ला युद्ध की शुरुआत की. उस समय उनके सेनापति थे रामचंद्र नीलकंठ. राजाराम की सेना ने छिपकर वार करते हुए एक वर्ष के अंदर मुगलों की सेना के दस हजार सैनिक मार गिराए और उनका लाखों रूपए खर्च करा दिया. औरंगज़ेब बुरी तरह परेशान हो उठा. दक्षिण की रियासतों से औरंगज़ेब को मिलने वाली राजस्व की रकम सिर्फ दस प्रतिशत ही रह गई थी, क्योंकि राजाराम की सफलता को देखते हुए बहुत सी रियासतों ने उस गुरिल्ला युद्ध में राजाराम का साथ देने का फैसला किया. औरंगज़ेब के जनरल जुल्फिकार अली खान ने जिंजी के इस किले को चारों तरफ से घेर लिया था, परन्तु पता नहीं किन गुप्त मार्गों से फिर भी राजाराम अपना गुरिल्ला युद्ध लगातार जारी रखे हुए थे. यह सिलसिला लगभग आठ वर्ष तक चला. अंततः औरंगज़ेब का धैर्य जवाब दे गया और उसने जुल्फिकार से कह दिया कि यदि उसने जिंजी के किले पर विजय हासिल नहीं की तो गंभीर परिणाम होंगे. जुल्फिकार ने नई योजना बनाकर किले तक पहुँचने वाले अन्न और पानी को रोक दिया. राजाराम ने जुल्फिकार से एक समझौता किया कि यदि वह उन्हें और उनके परिजनों को सुरक्षित जाने दे तो वे जिंजी का किला समर्पण कर देंगे. ऐसा ही किया गया और राजाराम 1697 में अपने समस्त कुनबे और विश्वस्तों के साथ पुनः महाराष्ट्र पहुँचे और उन्होंने सातारा को अपनी राजधानी बनाया. 



82 वर्ष की आयु तक पहुँच चुका औरंगज़ेब दक्षिण भारत में बुरी तरह उलझ गया था और थक भी गया था. अंततः सन 1700 में उसे यह खबर मिली की किसी बीमारी के कारण राजाराम की मृत्यु हो गई है. अब मराठाओं के पास राज्याभिषेक के नाम पर सिर्फ विधवाएँ और दो छोटे-छोटे बच्चे ही बचे थे. औरंगजेब पुनः प्रसन्न हुआ कि चलो अंततः मराठा साम्राज्य समाप्त होने को है. लेकिन वह फिर से गलत साबित हुआ... क्योंकि 25 वर्षीय रानी ताराबाई ने सत्ता के सारे सूत्र अपने हाथ में ले लिए और अपने अपने चार वर्षीय पुत्र शिवाजी द्वितीय को राजा घोषित कर दिया. अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए ताराबाई ने मराठा सरदारों को साम-दाम-दण्ड-भेद सभी पद्धतियाँ अपनाते हुए अपनी तरफ मिलाया और राजाराम की दूसरी रानी राजसबाई को जेल में डाल दिया. मुग़ल इतिहासकार खफी खान लिखते हैं – “राजाराम के साथ रहकर ताराबाई भी गुरिल्ला युद्ध और सेना की रणनीतियों से खासी परिचित हो गई थीं और उन्होंने अपनी बहादुरी से कई मराठा सरदारों को प्रभावित भी किया था”.

अगले सात वर्ष में, अर्थात सन 1700 से 1707 तक ताराबाई ने तत्कालीन सबसे शक्तिशाली बादशाह अर्थात औरंगजेब के खिलाफ अपना युद्ध जारी रखा. वह लगातार आक्रमण करतीं, अपनी सेना को उत्साहित करतीं और किले बदलती रहतीं. ताराबाई ने भी औरंगजेब की रिश्वत तकनीक अपना ली और विरोधी सेनाओं के कई गुप्त राज़ मालूम कर लिए. धीरे-धीरे ताराबाई ने अपनी सेना और जनता का विश्वास अर्जित कर लिया. औरंगजेब जो कि थक चुका था, उसके सामने मराठों की शक्ति पुनः दिनोंदिन बढ़ने लगी थी. 

ताराबाई ने औरंगजेब को जिस रणनीति से सबसे अधिक चौंकाया और तकलीफ दी, वह थी गैर-मराठा क्षेत्रों में घुसपैठ. चूँकि औरंगजेब का सारा ध्यान दक्षिण और पश्चिमी घाटों पर लगा था, इसलिए मालवा और गुजरात में उसकी सेनाएँ कमज़ोर हो गई थीं. ताराबाई ने सूरत की तरफ से मुगलों के क्षेत्रों पर आक्रमण करना शुरू किया और धीरे-धीरे (आज के पश्चिमी मप्र) आगे बढ़ते हुए कई स्थानों पर अपनी वसूली चौकियां स्थापित कर लीं. ताराबाई ने इन सभी क्षेत्रों में अपने कमाण्डर स्थापित कर दिए और उन्हें सुभेदार, कमाविजदार, राहदार, चिटणीस जैसे विभिन्न पदानुक्रम में व्यवस्थित भी किया. 

मराठाओं को खत्म नहीं कर पाने की कसक लिए हुए सन 1707 में 89 की आयु में औरंगजेब की मृत्यु हुई. वह बुरी तरह टूट और थक चुका था, अंतिम समय पर उसने औरंगाबाद में अपना ठिकाना बनाने का फैसला किया, जहाँ उसकी मौत भी हुई और आखिर अंत तक वह दिल्ली नहीं लौट सका. औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मुगलों ने उसके द्वारा अपहृत किये हुए पुत्र शाहू को मुक्त कर दिया, ताकि सत्ता संघर्ष के बहाने मराठों में फूट डाली जा सके. यह पता चलते ही रानी ताराबाई ने शाहू को “गद्दार” घोषित कर दिया. ताराबाई ने विभिन्न स्थानों पर दरबार लगाकर जनता को यह बताया कि इतने वर्ष तक औरंगजेब की कैद में रहने और उसकी पुत्री द्वारा पाले जाने के कारण शाहू अब मुस्लिम बन चुका है, और वह मराठा साम्राज्य का राजा बनने लायक नहीं है. रानी ताराबाई के इस दावे की पुष्टि खुद शाहू ने की, जब वह औरंगजेब को श्रद्धांजलि अर्पित करने नंगे पैरों उसकी कब्र पर गया. ताराबाई के कई प्रयासों के बावजूद शाहू मुग़ल सेनाओं के समर्थन से लगातार जीतता गया और सन 1708 में उसने सातारा पर कब्ज़ा किया, जहाँ उसे राजा घोषित करना पड़ा, क्योंकि उसे मुगलों का भी समर्थन हासिल था. 

ताराबाई हार मानने वालों में से नहीं थीं, उन्होंने अगले कुछ वर्ष के लिए अपने मराठा राज्य की नई राजधानी पन्हाला में स्थानांतरित कर दी. अगले पाँच-छह वर्ष शाहू और ताराबाई के बीच लगातार युद्ध चलते रहे. मजे की बात यह कि इन दोनों ने ही दक्षिण में मुगलों के किलों और उनके राजस्व वसूली को निशाना बनाया और चौथ वसूली की. आखिरकार शाहू भी ताराबाई से लड़ते-लड़ते थक गया और उसने एक अत्यंत वीर योद्धा बालाजी विश्वनाथ को अपना “पेशवा” (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया. बाजीराव पेशवा के नाम से मशहूर यह योद्धा युद्ध तकनीक और रणनीतियों का जबरदस्त ज्ञाता था. बाजीराव पेशवा ने कान्होजी आंग्रे के साथ मिलकर 1714 में ताराबाई को पराजित किया तथा उसे उसके पुत्र सहित पन्हाला किले में ही नजरबन्द कर दिया, जहाँ ताराबाई और अगले 16 वर्ष कैद रही. 


1730 तक ताराबाई पन्हाला में कैद रही, लेकिन इतने वर्षों के पश्चात शाहू जो कि अब छत्रपति शाहूजी महाराज कहलाते थे उन्होंने विवादों को खत्म करते हुए सभी को क्षमादान करने का निर्णय लिया ताकि परिवार को एकत्रित रखा जा सके. हालाँकि उन्होंने ताराबाई के इतिहास को देखते हुए उन्हें सातारा में नजरबन्द रखा, लेकिन संभाजी द्वितीय को कोल्हापुर में छोटी सी रियासत देकर उन्हें वहाँ शान्ति से रहने के लिए भेज दिया. बालाजी विश्वनाथ उर्फ बाजीराव पेशवा प्रथम और द्वितीय की मदद से शाहूजी महाराज ने मराठा साम्राज्य को समूचे उत्तर भारत तक फैलाया. 1748 में शाहूजी अत्यधिक बीमार पड़े और लगभग मृत्यु शैया पर ही थे, उस समय ताराबाई 73 वर्ष की हो चुकी थीं लेकिन उनके दिमाग में मराठा साम्राज्य की रक्षा और सत्ता समीकरण घूम रहे थे. शाहूजी महाराज के बाद कौन?? यह सवाल ताराबाई के दिमाग में घूम रहा था. वह पेशवाओं को अपना साम्राज्य इतनी आसानी से देना नहीं चाहती थीं. तब ताराबाई ने एक फर्जी कहानी गढी और लोगों से बताया कि उसका एक पोता भी है, जिसे शाहूजी महाराज के डर से उसके बेटे ने एक गरीब ब्राह्मण परिवार में गोद दे दिया था, उसका नाम रामराजा है और अब वह 22 साल का हो चुका है, उसका राज्याभिषेक होना चाहिए. ताराबाई मजबूती से अपनी यह बात शाहूजी को मनवाने में सफल हो गईं और इस तरह 1750 में उस नकली राजकुमार रामराजा के बहाने ताराबाई पुनः मराठा साम्राज्य की सत्ता पर काबिज हो गई. रामाराजा को उसने कभी भी स्वतन्त्र रूप से काम नहीं करने दिया और सदैव परदे के पीछे से सत्ता के सूत्र अपने हाथ में रखे. 

इस बीच मराठों का राज्य पंजाब की सीमा तक पहुँच चुका था. इतना बड़ा साम्राज्य संभालना ताराबाई और रामराजा के बस की बात नहीं थी, हालाँकि गायकवाड़, भोसले, शिंदे, होलकर जैसे कई सेनापति इसे संभालते थे, परन्तु इन सभी की वफादारी पेशवाओं के प्रति अधिक थी. अंततः ताराबाई को पेशवाओं से समझौता करना पड़ा. मराठा सेनापति, सूबेदार, और सैनिक सभी पेशवाओं के प्रति समर्पित थे अतः ताराबाई को सातारा पर ही संतुष्ट होना पड़ा और मराठाओं की वास्तविक शक्ति पूना में पेशवाओं के पास केंद्रित हो गई. ताराबाई 1761 तक जीवित रही. जब उन्होंने अब्दाली के हाथों पानीपत के युद्ध में लगभग दो लाख मराठों को मरते देखा तब उस धक्के को वह बर्दाश्त नहीं कर पाई और अंततः 86 की आयु में ताराबाई का निधन हुआ. परन्तु इतिहास गवाह है कि यदि 1701 में ताराबाई ने सत्ता और मराठा योद्धाओं के सूत्र अपने हाथ में नहीं लिए होते, औरंगज़ेब को स्थान-स्थान पर रणनीतिक मात नहीं दी होती और मालवा-गुजरात तक अपना युद्धक्षेत्र नहीं फैलाया होता तो निश्चित ही औरंगज़ेब समूचे पश्चिमी घाट पर कब्ज़ा कर लेता. मराठों का कोई नामलेवा नहीं बचता और आज की तारीख में इस देश का इतिहास कुछ और ही होता. समूचे भारत पर मुग़ल सल्तनत बनाने का औरंगज़ेब का सपना, सपना ही रह गया. इस वीर मराठा स्त्री ने औरंगज़ेब को वहीं युद्ध में उलझाए रखा, दिल्ली तक लौटने नहीं दिया. औरंगज़ेब के बाद मुग़ल सल्तनत वैसे ही कमज़ोर पड़ गई थी. इस वीरांगना ने अकेले दम पर जहाँ एक तरफ औरंगज़ेब जैसे शक्तिशाली मुगल बादशाह को बुरी तरह थकाया, हराया और परेशान किया, वहीं दूसरी तरफ धीरे-धीरे मराठा साम्राज्य को भी आगे बढाती रहीं... 

एक समय पर मराठों का साम्राज्य दक्षिण में तंजावूर से लेकर अटक (आज का अफगानिस्तान) तक था, लेकिन आपको अक्सर इस इतिहास से वंचित रखा जाता है और विदेशी हमलावरों तथा लुटेरों को विजेता, दयालु और महान बताया जाता है, सोचिए कि ऐसा क्यों है??

Saturday, August 22, 2015

Terrorist Naved Wants to Kill "Hindus" only...

नावेद के बहाने हिंदुओं के लिए कुछ ज्ञान... 

(भाई तुफैल चतुर्वेदी जी की कलम से)...  

ख़ासा स्मार्ट, परिवार या पास-पड़ौस के ही शरारती लड़के जैसा किशोर, अभी मसें भी नहीं भीगीं, मीठी मुस्कराहट बिखेरता चेहरा और उदगार "मैं यहाँ हिन्दुओं को मारने आया हूं, मुझे ऐसा करने में मज़ा आता है " ये वर्णन जम्मू के नरसू क्षेत्र में बीएसएफ की एक बस पर ताबड़तोड़ फायरिंग के बाद गांव वालों की साहसिक सूझ-बूझ से दबोचे गये एक आतंकवादी का है। उसके जैसा ही एक हत्यारा मारा भी गया। इस पाकिस्तानी आतंकी की कई स्वीकारोक्तियों के अनुसार उसका नाम क़ासिम ख़ान या उस्मान या नावेद...ऐसा कुछ है और उसकी आयु भी 16 वर्ष से 20 वर्ष के बीच कहीं है। ये शायद वो भारतीय न्यायव्यवस्था के समक्ष अपने को नाबालिग़ बताने के लिए कर रहा है। 


भारत आकर ऐसी स्वीकारोक्ति करने वाले इस पाकिस्तानी आतंकवादी के मानस को समझना इस लिये भी आवश्यक है कि उसने कहा है " मैं यहाँ हिन्दुओं को मारने आया हूं, मुझे ऐसा करने में मज़ा आता है "। उसके कथन के दो भाग हैं। पहला " मैं यहाँ हिन्दुओं को मारने आया हूँ " यानी आप होंगे जाटव, कुर्मी, राजपूत, यादव, जाट, बाल्मीक, ब्राह्मण, बनिये इत्यादि कोई भी मगर आपको मारने आने वाले दुश्मन को आपकी वो असली पहचान पता है जिसे आप जान कर भी नहीं जानना चाहते। आप अपनी नज़र में पिछड़े, अन्त्यज, अनुसूचित, सवर्ण कोई तीसमारखां हों, मगर उसके और उसकी सोच वालों के लिये आप सब एक हैं। वो यहाँ जम्मू के डोगरे, पंजाबी, गुजरती, मराठी, तमिल, तेलगू, मलयाली, कन्नड़, बिहारी, असमी, नगा, मणिपुरी, बंगाली इत्यादि प्रान्त के किसी निवासी को मारने नहीं आया। न ही वो बाल्मीक, यादव, जाटव, ब्राह्मण, गूजर, राजपूत, जाट, वैश्य, तेली इत्यादि किसी जाति के व्यक्ति को मारने आया है। वो हिन्दुओं को मारने आया है। यहाँ क्या ये सवाल अपने आप से पूछना उचित और आवश्यक नहीं है कि दुश्मन के लिये आप सब एक हैं तो आप सब आपस में एक क्यों नहीं हैं ? एक इस्लामी आतंकी की दृष्टि में हम सब जातियों में बंटे समाज नहीं है बल्कि हिन्दू हैं तो हम इससे निबटने के लिये केवल और केवल हिन्दू क्यों नहीं हैं ? 

दूसरे उसने कहा है " मुझे ऐसा करने में मज़ा आता है " अर्थात ये एक विक्षिप्त उन्मादी का ही किया एक काम भर नहीं है अपितु लगातार की जा रही घटनाओं की एक अटूट श्रंखला है। वो पाकिस्तान से आया है। भारत का विभाजन कर बनाये गये देश पाकिस्तान में करोड़ों हिन्दुओं ने वहीँ रहने को प्राथमिकता दी थी। इस नरपिशाच के "मुझे ऐसा करने में मज़ा आता है" से मतलब ये है कि ये और उसके जैसे राक्षसों को पाकिस्तान में ऐसा करते रहने का अभ्यास है। आख़िर " मज़ा आता है " कथन इस बात का द्योतक है कि उसके लिये ये एक अनवरत प्रक्रिया है। बंधुओ ! पाकिस्तान में करोड़ों हिन्दू छूटे थे। विभाजन के बाद पाकिस्तानी जनसँख्या में हिन्दुओं का प्रतिशत दहाई के आंकड़ों में था। अब पाकिस्तान अपनी जनसंख्या में हिन्दू 1 प्रतिशत से भी कम क्यों दिखता है ? हमारे वो सारे भाई कहाँ गये ? उनका क्या हाल हुआ ? इस और इस जैसे इसके साथी लोगों ने पाकिस्तान में बचे हिन्दुओं की क्या दुर्दशा की ? आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का बहुत प्रसिद्द कथन है "साहित्य समाज का दर्पण है" आइये इस दर्पण को देखते हैं। पाकिस्तान के शाइर रफ़ी रज़ा साहब का एक शेर देखिये।

तलवार तो हटा मुझे कुछ सोचने तो दे 
ईमान तुझ पे लाऊँ कि जज़िया अदा करूँ 

कोई घटना यूँ ही शेर में नहीं ढलती। ये करोड़ों लोगों के साथ हुआ व्यवहार है जिसे रफ़ी रज़ा साहब ने बयान किया है। यही वो व्यवहार है जिसके कारण विश्व भर में इस्लाम का प्रसार हुआ है। आतंक एक उपकरण है और इसका प्रयोग इस्लाम में अरुचि रखने वालों को डराने और इस्लाम की धाक जमाने के लिये किया जाता है। बंधुओ ये जम्मू में हुई एक घटना भर नहीं है बल्कि सैकड़ों वर्षों से अनवरत चली आ रही घटनाओं की अटूट श्रंखला है। अफ़ग़ानिस्तान की सीमा पर एक पहाड़ का नाम ही हिन्दू-कुश है। इस शब्द का अर्थ है वो स्थान जहाँ हिन्दू काटे गये। अफ़ग़ानिस्तान हिन्दू क्षेत्र था और उसका इस्लामी स्वरूप अपने आप नहीं आया है। ऐसे ही हत्यारे वहां भी कार्यरत रहे हैं और उनके लगातार प्रहार करते रहने, राज्य के इन बातों पर ध्यान न देने, इन दुष्टों पर भरपूर प्रहार करके इन्हें नष्ट न करने का परिणाम अफ़ग़ानिस्तान का वर्तमान स्वरुप है। पाकिस्तान के ख़ैबर-पख्तूनख्वा क्षेत्र के चित्राल जनपद में कलश जनजाति समूह रहता है। ये बहुदेव-पूजक दरद समूह के लोग हैं। दरद योद्धाओं का वर्णन महाभारत में मिलता है। दुर्योद्धन के लिये कर्ण ने जो विजय यात्रा की है उसमें दरद लोगों से कर लेने का उल्लेख है। इस क्षत्रिय जाति के लोग महाभारत में कौरवों के गुरु कृपाचार्य के नेतृत्व में लड़े थे। महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में भी इनका उल्लेख है। अर्जुन की सेना में ये लोग साथ थे। ईरान सहित ये सारा क्षेत्र महाराज चन्द्र गुप्त मौर्य के शासन क्षेत्र के किनारे का नहीं अपितु मध्य का भाग रहा है। ये लोग भारत-ईरानी मिश्रित मूल की भाषा कलश बोलते हैं। पड़ौस के देश अफ़ग़ानिस्तान के पूर्वी प्रदेश नूरिस्तान जिसे पहले काफ़िरिस्तान कहा जाता था, के निवासी भी इसी भाषा को बोलते थे। उनकी भी संस्कृति हमारी तरह बहुदेव पूजक थी। 1895 में यहाँ के निवासियों को ऐसे ही नृशंस हत्यारों ने मुसलमान बनाया और यहाँ की भाषा, संस्कृति, मान्यताओं को बलात बदला। ज्ञान-शौर्य से चमचमाते माथों वाला यह समाज-क्षेत्र, आज मुसलमान हो चुका है और तालिबान की ख़ुराक बन कर विश्व को जिहाद, आतंक, अशांति का संदेश दे रहा है। 


बंधुओ ! ये बदलाव एक दिन में नहीं आये। ये सब कुछ सायास सोची-समझी गयी कट्टरता का परिणाम है। आख़िर आत्मघाती दुःसाहस अनायास नहीं हो सकता, निरंतर नहीं हो सकता, सदियों नहीं हो सकता। इसकी तह में जाना, इससे जूझने, निबटने की योजना बनाना सुख-चैन से रहने के लिये आवश्यक है। ये आतंकी स्पष्ट रुप से यहां आने का कारण बता रहा है कि " मै यहाँ हिन्दुओं को मारने आया हूं " । कोई बुरे से बुरा हत्यारा भी अकारण हत्याएं नहीं करता। उनकी हत्या नहीं करता जिन्हें वो जानता ही नहीं है। अनदेखे व्यक्तियों पर हमला कौन सी मानसिकता का व्यक्ति कर सकता है ? ऐसे हमले भारत, भारतवासियों पर ही नहीं विश्व भर में सैकड़ों वर्षों से हो रहे हैं। इसका प्रारम्भ इस्लाम की इस मनमानी सोच से हुआ है कि ख़ुदा एक है, उसमें कोई शरीक नहीं है, मुहम्मद उसका अंतिम पैग़म्बर है। जो इसको नहीं मानता वो काफ़िर है और काफ़िर वाजिब-उल-क़त्ल हैं। 

इस विचारधारा का जन्म मक्का में हुआ था और मुहम्मद जी ने अपनी ये सोच मक्का वासियों को मनवाने की कोशिश की। उन्होंने नहीं मानी और मुहम्मद जी के प्रति कड़े हो गए तो मुहम्मद जी भाग कर मदीना चले गए। वहां शक्ति जुटा कर सैन्य बल बनाया और फिर इस्लाम के प्रारंभिक लोगों से ही इन संघर्षों का बीज पड़ा। प्रारम्भिक इस्लामी विश्वासियों ने ही ये हत्याकांड मक्का-मदीना से प्रारम्भ करते हुए इसका दायरा लगातार बड़ा किया था, बढ़ाया था। मुहम्मद और उनके बाद के चार ख़लीफ़ाओं ने इसकी व्यवस्था की कि ऐसा अनवरत चलता रहे और इस्लाम का तलवार से प्रसार होता रहे। परिणामतः कुछ लाख की आबादी के तत्कालीन अरब में चालीस साल में हज़ारों अमुस्लिमों का नरसंहार हुआ और चार में से तीन खलीफा की हत्या हुई । इस्लाम का प्रारंभिक खिलाफत का दौर, तथाकथित स्वर्णिम काल मनुष्यता का काला युग था। उन लोगों ने आतंक का उपयोग कर लोगों को धर्मान्तरित किया। उसी दौर को विश्व भर में लाने के प्रयास फिर से चल रहे हैं। 

इस हत्यारी सोच के बीज मूल इस्लामी ग्रंथों में हैं। क़ुरआन, हदीसों में अमुस्लिम लोगों की हत्या करने, उन्हें लूटने के अनेकों आदेश हैं। ऐसे हत्यारों को मारे जाने पर जन्नत मिलने और वहां ऐश्वर्यपूर्ण जीवन आश्वासन भी इन्हीं ग्रंथों में हैं। कुछ उल्लेख दृष्टव्य हैं।

1) काफिरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 }
2) ओ मुसलमानों तुम गैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 }
और तुम उनको जहां पाओ कत्ल करो { 2-191 }
3) ऐ नबी ! काफिरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है { 9-73 और 66-9 }
4) अल्लाह ने काफिरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है { 9-68 }
5) उनसे लड़ो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं, न आखिरत पर; जो उसे हराम नहीं जानते जिसे अल्लाह ने अपने नबी के द्वारा हराम ठहराया है. उनसे तब तक जंग करो जब तक कि वे जलील हो कर जजिया न देने लगें { 9-29 }
6) तुम मनुष्य जाति में सबसे अच्छे समुदाय हो, और तुम्हें सबको सही राह पर लाने और गलत को रोकने के काम पर नियुक्त किया गया है { 3-110 }
7) जो कोई अल्लाह के साथ किसी को शरीक करेगा, उसके लिये ने जन्नत हराम कर दी है. उसका ठिकाना जहन्नुम है { 5-72 }
8) मुझे लोगों के खिलाफ तब तक लड़ते रहने का आदेश मिला है, जब तक ये गवाही न दें कि अल्लाह के सिवा कोई दूसरा काबिले-इबादत नहीं है और मुहम्मद अल्लाह का रसूल है और जब तक वे नमाज न अपनायें और जकात न अदा करें [ सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 33 }

अफ़ज़ल गुरू, अजमल कसाब, याक़ूब मेमन, नावेद, बोको हराम और आई एस आई एस के आतंकी सब एक ही श्रंखला के राक्षस हैं। ये उसी हत्यारे दर्शन में विश्वास रखते हैं और वही कर रहे है जो इनके प्रारम्भिक लोगों ने किया था और भारत में जिसकी शुरुआत हिन्द-पाक के मुसलमानों के चहेते हीरो मुहम्मद बिन कासिम ने की थी। इस हत्यारे आक्रमणकारी ने इस्लामी इतिहासकार के ही अनुसार 60 हज़ार लोगो (महिलाओं सहित) बंदी बनाया। मुहम्मद बिन कासिम ने इस्लामी कानून के मुताबिक़ लूट का 1/5 हिस्सा दमिश्क में खिलाफत निजाम को भेजा और बाकी मुस्लिम फौज में बांटा { reference- al-Baladhuri in his book The Origins of the Islamic State }। आज अफ़ज़ल गुरू, अजमल कसाब, याक़ूब मेमन, नावेद जो कर रहे हैं वो उनकी ही नहीं इस्लाम की दृष्टि में भी जन्नत का मार्ग खोलने का काम है। कई मुसलमान बड़े आराम से यह कह देते है ये या बोको हराम, आई एस आई एस के लोग जो कर रहे हैं वह इस्लाम नहीं है। बंधुओ ये केवल तब तक सायास बोला जाने वाला झूट है जब तक खुल कर कहने और सारे अमुस्लिम समाज को समाप्त करने का अवसर नहीं आ जाता।

ऐसी हत्यारी सोच ज्ञान के प्रकाश से समाप्त हो सकती थी अतः सावधान इस्लामी आचार्यों ने ज्ञान-विज्ञान को इसी लिये वर्जित घोषित कर दिया। 900 साल पहले मौलाना गजाली ने गणित को शैतानी ज्ञान बता कर वर्जित कर दिया था। अब उसी पथ पर आगे बढ़ते हुए अल-बग़दादी के ख़िलाफ़त निज़ाम ने PHILOSOPHY और CHEMISTRY पढने पर प्रतिबंध लगा दिया है। कोढ़ में खाज ये है कि पाकिस्तान की उजड़ी-बिखरी राजनैतिक स्थितियां, देश में आयी मदरसों की बाढ़, सऊदी अरब-क़तर से उँडेले जाते खरबों पेट्रो डॉलर ऐसे संगठनों के लिये अबाध भर्ती की परिस्थितियां बनाते हैं। इस या इस जैसी विचारधारा को चुनौती न देने के परिणाम व्यक्ति, देश और सम्पूर्ण मानवता हर स्तर पर भयानक होते हैं। अभी कुछ दिन पहले दुबई की एक घटना के बारे में जानना उपयुक्त होगा। एक पाकिस्तानी मूल का परिवार समुद्र में नहाने के लिये गया। 20 वर्ष की बेटी गहरे पानी में फंस गयी। रक्षा-कर्मी दल के लोग बचाव के लिये बढे तो उसके पिता ने उन्हें यह कह कर रोक दिया कि ग़ैर मर्द बेटी को छुएं इससे तो बेहतर है कि वो डूब कर मर जाये। वो लड़की मर गयी। ये मृत्यु उसके पिता के कारण नहीं हुई है। ये मृत्यु इस्लाम की सोच के कारण हुई है। इसका पाप इस्लाम के सार है. 


अंत में प्रेस के वाचालों, कोंग्रेसियों, सैक्यूलरवाद की खाल ओढ़े वामपंथी भेड़ियों का एक सामान्य दावा भी परखना चाहूंगा। इन ढपोरशँखों के अनुसार आतंकियों का कोई मज़हब नहीं होता ? चलिये मान लेते हैं, वाक़ई नहीं होता होगा मगर क्या कीजिये कि हम सबने अमरनाथ यात्रा पर घात लगा कर आतंकी हमले देखे-सुने हैं, मंदिरों पर हमले देखे-जाने हैं। क्या कभी किसी ने कभी हजयात्रियों पर आतंकी हमला सुना है ? क्या वाक़ई आतंकियों का कोई मज़हब नहीं होता ? वो सारे शरीर के बाल उतरवा कर अपनी समझ से ग़ुस्ल, नमाज़ अदा कर नास्तिकता के पथ पर जाने के लिये या इस्लाम छोड़ने के लिये निकलते हैं ?

ये सारे काम हमारे पड़ौसी देश पाकिस्तान से संचालित हो रहे हैं। ज़ाहिर है पाकिस्तान हमारा पड़ौसी देश है और हम पड़ौसी बदल नहीं सकते। हम पड़ौसी की चौखट पर गाँधीवादी मार्ग पर चलते हुए फूल तो रख सकते हैं ? बंधुओ ऐसी स्थितियों में फूल भेंट करने की सर्वोत्तम जगह क़ब्र है। ये भयानक-लोमहर्षक बदला लेने, उसकी योजना बनाने का क्षण है। यहाँ एक सवाल नावेद को पकड़ने वाले लोगों से भी करना है। क्या आपके घर में कोई चाक़ू, पेंचकस, हथौड़ा नहीं था। एक हत्यारा आतंकी समूचा-साबुत पुलिस को कैसे मिल गया ? आपसे उसके हाथ पैरों में 10-20 छेद नहीं किये गये ? उसके दोनों हाथ के अंगूठे नहीं काटे गये ? आपमें से कई बंधु अंगूठे काटने का अर्थ नहीं समझ पा रहे होंगे। इसका अर्थ है जब तक जीना पूर्ण अपाहिज हो जाना। अंगूठे के बिना कोई शौच-स्थान साफ़ तक नहीं कर सकता, खाना नहीं खाया जा सकता। कपड़े नहीं पहने जा सकते। हर पकड़ अंगूठे से ही सम्भव होती है। उसे पता तो चले चोट क्या होती है ? दर्द क्या होता है ? इस रास्ते पर अगले बढ़ने वाले को भी तो ये ध्यान रहे भारतीय केवल बिरयानी ही नहीं खिलते, ख़ून के आंसू भी रुलाते हैं।

- तुफ़ैल चतुर्वेदी

Tuesday, August 11, 2015

Indian Ancient Knowledge and Culture

अभिमन्यु, वामकुक्षी और भारतीय शौच पद्धति...


सदियों से भारतीय ज्ञान एवं संस्कारों की एक महान परंपरा रही है. वेदों-पुराणों-ग्रन्थों सहित विभिन्न उत्सवों एवं सामान्य सी दिखाई देने वाली प्रक्रियाओं में भी हमारे ऋषि-मुनियों ने मनुष्य के स्वास्थ्य एवं प्रकृति के संतुलन का पूरा ध्यान रखा है. जो परम्पराएं, रीति-रिवाज एवं खानपान से लेकर पहनावे तक जो भी ज्ञान ऋषि-मुनियों ने हमें विरासत में दिया है, वह न सिर्फ अदभुत है, बल्कि पूर्णतः तर्कसम्मत एवं वैज्ञानिक भी है. प्रस्तुत लेख में मैं सिर्फ तीन उदाहरण देना चाहूँगा. 

हमारे बुज़ुर्ग हमेशा कहा करते हैं कि गर्भवती स्त्री को हमेशा सदविचार रखने चाहिए, सात्त्विक भोजन करना चाहिए और उससे हमेशा मृदु भाषा में ज्ञानपूर्ण बातचीत करनी चाहिए, ताकि होने वाली संतान भी तेजोमय एवं बुद्धिमान हो. इन बुजुर्गों को यह ज्ञान कहाँ से मिला?? क्या उन दिनों तथाकथित आधुनिक विज्ञान की पढ़ाई होती थी? फिर इन लोगों ने कैसे जान लिया कि गर्भवती स्त्री का भ्रूण सुनने-समझने की क्षमता रखता है? हम सभी ने महाभारत की वह कथा पढ़ी है, जिसमें अर्जुन अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदन के गुप्त रहस्यों एवं पद्धति के बारे में विस्तार से बताते हैं. उस समय उनका पुत्र अभिमन्यु अपनी माता के गर्भ में था. यह बात हजारों वर्ष पूर्व लिखी गई महाभारत में कही गई है कि “गर्भवती स्त्री के गर्भ में पल रहा भ्रूण एक निश्चित समय के पश्चात पूरी तरह सुनने-समझने और स्मरण रखने की शक्ति रखता है”. जब अर्जुन ने चक्रव्यूह भेदन का रहस्य बताया उस समय सुभद्रा जाग रही थीं, लेकिन जब अर्जुन चक्रव्यूह तोड़कर बाहर निकलने की योजना बता रहे थे उस समय सुभद्रा सो गई थीं. इसीलिए अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घुसना तो स्मरण था, परन्तु उससे बाहर निकलने की कला उन्हें ज्ञात नहीं थी. 




अब ये वर्षों पुराना सिद्धांत पश्चिम के वैज्ञानिक हमें ही सिखा रहे हैं. वैज्ञानिक इस बात पर शोध कर रहे हैं कि गर्भवती स्त्री का भ्रूण किस सीमा तक सुनने-समझने-सोचने की क्षमता रखता है. आधुनिक विज्ञान द्वारा हमें बताया जा रहा है कि यह एक नई खोज है. कितना हास्यास्पद है ना?? 

मित्रों आपने अपने बुजुर्गों से “वामकुक्षी” नामक शब्द के बारे में तो सुना ही होगा, बहुत पुराना शब्द है, पीढ़ियों से चला आ रहा है. “वाम” यानी बाँया और “कुक्षी” यानी करवट. वामकुक्षी का अर्थ है बाँई करवट लेटना. हमारे बुजुर्गों को उनके आयुर्वेद एवं अनुभव ज्ञान से इस बात की पूरी जानकारी थी कि मनुष्य को भोजन के पश्चात कुछ देर “वामकुक्षी” लेनी चाहिए, अर्थात बाँई करवट लेटना चाहिए, ताकि पाचन क्रिया दुरुस्त रहती है. जब बुजुर्गों को यह बात पता थी, तो स्वाभाविकतः इसका अर्थ यह भी होता है कि निश्चित हेए उन्हें इसके पीछे छिपे विज्ञान एवं शारीरिक संरचना की जानकारी भी होगी, अन्यथा वे दाँयी करवट लेटने को भी कह सकते थे... या यह भी कह सकते थे कि भोजन के पश्चात वज्रासन में बैठने की बजाय रस्सी कूदना चाहिए. अब पश्चिमी विज्ञान हमें बता रहा है कि बाँई करवट सोने से लीवर में स्थित “पाचक अम्ल” नीचे की तरफ होता है, जिससे भोजन अच्छे से पचता है और यह ह्रदय के लिए भी लाभकारी होता है. तात्पर्य यह कि भारतीयों को “वामकुक्षी” से मिलने वाले शारीरिक लाभों की पूरी जानकारी थी. कैसे थी? क्या यह विज्ञान नहीं था?? या फिर विज्ञान उसी को माना जाए, जो अंग्रेजी शब्दों में पश्चिम के गोरे हमें बताएँ?? 


तीसरा उदाहरण है भारतीय पद्धति की शौच व्यवस्था. जैसा कि हम सभी जानते हैं भारत में सदियों से उकडूँ बैठकर शौच करने की परंपरा रही है. यहाँ तक कि हमें बचपन से यह सिखाया जाता है कि नीचे बैठकर ही मूत्र त्याग करना चाहिए. महिलाएँ तो आज भी बैठकर ही मूत्र-त्याग करती हैं, लेकिन अधिकाँश पुरुषों ने पश्चिम की नक़ल एवं पैंट-शर्ट वाले पहनावे के कारण खड़े-खड़े मूत्र त्याग की पद्धति अपना ली है. परन्तु पुराने जमाने ने जब पुरुष भी धोती धारण करते थे, तब वे नीचे बैठकर ही मूत्र-त्याग करते थे. यही पद्धति हम शौच करते समय भी अपनाते आए हैं. जब से भारतीयों का खान-पान विकृत हुआ है और उनके घुटनों में दर्द रहने लगा है तब से महानगरीय एवं अर्ध-नगरीय भारतीय भी पश्चिम की देन अर्थात “कमोड” का उपयोग करने लगे हैं. आधुनिक(?) वैज्ञानिक जाँच से पता चला है कि यदि शौच करते समय मनुष्य के दोनों घुटने उसके पेडू (या कहें बड़ी आँत) से ऊपर रहें तो बड़ी आँत पर दबाव नहीं रहता तथा शौच खुलकर होता है. जबकि जैसा कि चित्र में दिखाया है, कमोड पर बैठकर शौच करने से बड़ी आँत थोड़ी सी वक्राकार हो जाती है जिससे मल पूरी तरह साफ़ नहीं हो पाता. 


अब बताईये, क्या हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों एवं बुजुर्गों को इसका विज्ञान पता नहीं था?? उन्हें सब कुछ अपने अनुभव और ग्रंथों में लिखे ज्ञान के आधार पर पता था. यहाँ तक कि पर्यावरण और खेतों की उर्वरकता को बरकरार रखने के लिए पुराने जमाने में खेतों के किनारे शौच किया जाता था. अब यह संभव नहीं है, लेकिन फिर भी अपने-अपने घरों में भारतीय पद्धति से शौच तो किया ही जा सकता है. जिन बुजुर्गों अथवा मरीजों को घुटने में समस्या है और वे नीचे नहीं बैठ सकते, उनके कमोड हेतु पश्चिमी देशों से एक नया आविष्कार आया है जिसे “Squatty Potty” का नाम दिया गया है, इसे कमोड के पास पैरों के नीचे रखें ताकि आपके घुटने पेट से ऊपर हो जाएँ. वास्तव में अब पश्चिमी देश भी समझ चुके हैं, कि शौच की भारतीय पद्धति सर्वोत्तम है, लेकिन वहाँ पर भारतीय पद्धति के शौचालय नहीं हैं, तो उन्होंने इसकी जुगाड़ के रूप में इस उपकरण को निकाला है. शौच के पश्चात हाथ राख या मिट्टी से धोने चाहिए, पैरों को पीछे से भी धोना चाहिए, शौच करते समय बात नहीं करनी चाहिए जैसे कई “वैज्ञानिक” नियम हमारे प्राचीन ज्ञान ग्रंथों में मौजूद हैं, लेकिन चूँकि आधुनिक शिक्षा, पश्चिमी शिक्षा, वामपंथी विकृति तथा सेकुलरिज़्म नामक बीमारी के कारण हिन्दू संस्कृति को अक्सर हेय दृष्टि से देखने का फैशन चल पड़ा है. 

विगत साठ वर्षों में भारत की शिक्षा व्यवस्था को वामपंथी एवं सेकुलर बुद्धिजीवियों द्वारा अपने स्वार्थ एवं धर्म विरोधी मानसिकता के कारण इतना दूषित कर दिया है कि अधिकाँश लोगों को हमारे ग्रन्थ अथवा परम्पराएँ बेकार लगती हैं. जब भी पश्चिमी देश कोई शोध करके हमें बताते हैं तब यहाँ के “परजीवी” किस्म के बुद्धिजीवी उनकी जयजयकार में लग जाते हैं. जबकि वही बात सदियों पहले भारत के संत और आयुर्वेदिक चिकित्सक आदि हमें न सिर्फ लिखित में बता चुके थे बल्कि उन्होंने उन बातों को हमारे रोजमर्रा के जीवन में धर्म के साथ इतनी सुन्दर तरीके से पिरोया था कि अब वह हमें सामान्य सी बातें लगती हैं. इस पश्चिमी वैचारिक गुलामी और वैज्ञानिक आधार पर टिके हुए वृहद भारतीय ज्ञान एवं संस्कृति के सैकड़ों और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं... वे फिर कभी किसी अगले लेख में... 

तब तक के लिए नमस्कार...